Thursday, 25 January 2018

पश्मीना और एकांत (कहानी)


कमरे के एक कोने में टेबल रखा था। टेबल से सटी दीवार में बड़ी खिड़की थी। उसी से तेज़ हवा घर में आ रही थी। इसलिए टेबल पर खुली हुई डायरी के पन्ने हवा का मज़ा ले रहे थे। आनंद के लिए यह कमरा कोई मामूली कमरा नहीं था। उसने इस कमरे को पीला रंग दिया था। लेकिन ताज्जुब था कि उसे यह रंग पसंद नहीं था। फिर भी उसने इस रंग को अपने कमरे में जगह दी। खिड़की भी कौन सी उसे पसंद है! शोर के साथ साथ धूल और बरसातों का पानी घर में झोंकें के साथ आ जाता था। कितनी मेहनत लगती है, बरसातों में। कभी कभी उसे पूरा दिन साफ़ सफाई में लगाना पड़ता है। लेकिन जो चिढ़ शुरुआत में इस खिड़की से थी, वह अब हल्की पड़ गई है। गर्मियों के इस मौसम  में यह उसकी मनपसंद जगह है।
  
काफी समय हुआ कि अब वह घर से बाहर नहीं निकलता। न ही इस कमरे में कोई आता है। आनंद को लगता है कि वह कोई मरी हुई या हादसे की शिकार आत्मा है जिसे दूसरा जन्म नहीं मिला। उसे मुक्ति चाहिए भी नहीं थी! अरे, मरना भी तो नहीं चाहता! लेकिन अब इतना है कि वह बाहर घर के लोगों को और स्वयं को दिखाई नहीं देता। उसे यह भी नहीं मालूम कि वह बिना किसी से बात किए, देखे, सुने, अनुभव किए कैसे जिंदा है! एक साल में वह बेहद अजीब बन गया है। पिछली जनवरी की दिल्ली वाली कड़ाके की सर्दी में उसने स्वेटर ही पहनना बंद कर दिया था। वह अजीब है। कुछ दिनों से अजीब बात यह हुई है कि वह जब भी सांस लेता है तब पश्मीना नाम उसकी साँसों के साथ दिल में उतर जाता है।  वह पागल नहीं है, लेकिन!

हाँ, जनवरी में उसके बड़े भाई का जन्मदिन आता है इसलिए ही उसे यह महीना याद है। वह कई तरीके से महीने याद रखता है। यह उसकी कला है। स्कूल के समय, जनवरी उसे नोच खाने वाला महीना भी लगता था। उसका बस करता तो वह इन सर्दियों के दिनों को गरम तैल में तलकर ही बाहर परोसता। इतनी भी सर्दी होती है भला! उसे तुरंत याद आया कि अरे इसी महीने तो 26 जनवरी भी आती है। उसे बहुत बाद में पता चला कि गणतन्त्र किस चिड़िया का नाम होता है। या कानून को लागू करना कैसे होता है या फिर 1950 की तारीख उसे आखिर क्योंकर याद होनी चाहिए। ...उसे परेड और किचन में पकोड़े तलती हुई माँ की लाल छ-छ(दोनों हाथों में) चूड़ियों की खनखनाहट सुनाई दी। उसे महक भी आई। तैल के गरम होने की या पकोड़े की या फिर दोनों की। वह महक को अलग अलग नहीं कर पाता। वह आँखें बंद कर सोचता चला गया। 

परेड को वह कैसे भूल सकता है! पक्का एमपी वाला है। एमपी की झांकी के लिए वह अपनी कमर से गर्दन तक टेड़ी कर लेता था। और जब झांकी आती तो वह गुस्सा जाता कि मन माफिक क्यों नहीं बनाते। बेकार बनाई है। लेकिन अच्छी क्या होती है वह बतला भी नहीं पाता। वह इन बातों को सोचकर चकरा जाता और बिना पकोड़े खाये बाहर खेलने चला जाता। हाँ, उसकी जिंदगी में जनवरी महीने में ऐसे ही क़िस्से रहते हैं। वह साल को अलहदा ढंग से याद करता है। वह अजीब है। पूरा अजीब! अजीब बनने में पश्मीना ने उसका साथ दिया है। वह अदृश्य होकर भी उसके साथ निरंतर रहती है। पश्मीना उसकी ज़िंदगी है।
  
दीवार घड़ी में रात के बारह बज रहे हैं और वह बिना बत्ती बंद किए फरवरी के महीने के बारे में सोच रहा है। वह दिमाग पर ज़ोर डाल रहा है कि उसे फरवरी के खास होने के बारे में खयाल क्यों नहीं आ रहे? घड़ी में बारह बजकर दस मिनट हुए तो उसके दिमाग ने कहा- “दिल से सोचो!” उसने सोचने का स्थान बदला और करवट भी। उसे वह टीचर याद आई जिसे उसने कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हुए सुना था, देखा था और महसूस किया था। शायद उसने दिलचस्पी भी ली थी जो एक तरफा थी। राजपूतों के हार के कारणों, को जिस प्रकार से वह पढ़ा रही थी वे सभी कारण उसे याद है। वह याद कर रहा है कि पृत्थ्वीराज चौहान को किसने हराया था। गौरी या गजनावी ने? न जाने वह बार बार क्यों भूल जाता है! उसे बादाम अच्छे नहीं लगते। जब उस टीचर ने पलटकर आनंद से पूछा कि पहले विश्व युद्ध के कारणों में से कोई चार बताओ तो वह मन में संयुक्ता ही बोल पाया। जिसे उसने ही सुना। लेकिन वह उसे घूरती रही और बोली- “बच्चों, तुम क्लास में हो भी या नहीं?” इस तरफ आनंद यही बोलता रहा- “संयुक्ता संयुक्ता..!”

घड़ी में सुबह के चार बजे हैं और एक-डेढ़ घंटे की नींद लेकर वह उठ गया है। वह अधिक सो नहीं पाता और सोचते सोचते रात बिता डालता है। वह आज की नौजवान पीढ़ी का लड़का है। वह फिर से खिड़की के पास पहुंचा। कुर्सी, टेबल और फिर खिड़की। उसे खिड़की और अपने दरम्यान टेबल बाधा जैसा लगा सो उसने टेबल को परे खिसका दिया। अब क्रम बदल गया। कुर्सी, कुर्सी पर वह और खिड़की पर टंगी उसकी दोनों आँखें।   

बाहर देखते हुए भी वह बाहर के दृश्यों से जुड़ नहीं पा रहा। वह अब मार्च के बारे में सोच रहा है। वह नहीं जानता कि मार्च तीसरा महीना है। वह गिनतियों में ज़्यादा यकीन नहीं करता। बल्कि उसका साफ मानना है कि यह महीना आता ही क्यों है? उसकी ऐसी सोच बारहवीं के बोर्ड की परीक्षा के दौरान बनी थी। उसे उसी वक़्त से सिर दर्द की बीमारी भी शुरू हो गई थी। क्या कहते हैं, अर्ध कपारी या फिर मिग्रेन या फिर माइग्रेन...जाने दो मुझे क्या जो भी कहते हैं! लेकिन कितना सिर दर्द होता था। सबसे अधिक सिर दर्द अकाउंटेंसी के पेपर में हुआ था। लेकिन गया अच्छा था। पिछत्तर नंबर आ गए थे। अच्छे से पढ़कर जाता तो और आते। शेयर्स वाले सवाल सब गलत हो गए थे। कुछ नंबर तो दिये ही होंगे। फ़ाइनेंस वाले हिस्से में नंबर ज़्यादा आ गए होंगे। मन कहता है, उस हिस्से के सारे सवाल सही गए थे। मन कहता था कि डॉक्टर बनना है। डीएनए स्पेशलिस्ट...कहाँ बन पाया! ये स्साला मन क्या-क्या नहीं कहता... कॉमर्स बकवास है। मैंने तो कॉलेज में छोड़ ही दिया... न तो ठीक से हिसाब किताब कर पाया और न ही कुछ और। बैठे हुए सिगरेट ही फूँक रहा हूँ। मुझे मार्च का महीना पसंद नहीं। उसने उभरती हुई सुबह में खिड़की से चिल्लाकर कहा- “मुझे मार्च का महीना दुनिया में सबसे बकवास टाइम लगता है। आक्-थू...” उसने लगे हाथों थूक भी दिया...खिड़की से बाहर। इसी महीने तो वह पश्मीना से दूर होने के तरीके भी खोजता रहता था। उसे मार्च महीने से नफ़रत है, बहुत!

उसे सिगरेट पी लेने के बाद चाय की तलब जगी। उसने दरवाज़े पर लगी छोटी सी खिड़की पर ध्यान दिया। यही वह दूसरी खिड़की थी जिससे वह बाहर की दुनिया से जुड़ा हुआ था। उसी खिड़की से उसे खाना, पानी, अखबार, किताबें या फिर जो उसकी मांग होती वह सामान दिया जाता है। उसे यह ठीक भी लगता था। उसे भी कहाँ किसी से बात करने की इच्छा होती थी! उसे यही लगता था कि उसके कमरे के बाहर बहुत बड़ी खाई खुदी हुई है। जैसे ही दरवाजा खोलकर वह बाहर आएगा उसमें गिर जाएगा, रफ्तार के साथ। उसे याद नहीं कि ऐसा क्या हादसा हुआ जो उसने एक कमरे में कैद किया गया। वह तो एक रोज़ सिर दर्द की वजह से बेहोश हो गया था। कई दिन वह अस्पताल में रहा। उसे अस्पताल के दिन थी से याद नहीं हैं। वह जब घर लौटा तो कमरे में घुस गया और बाहर निकला ही नहीं। जब उसे बाहर निकालने की कोशिश की गई तो वह खुद ही नहीं गया। वह परजीवी सा महसूस करता है। पर वह क्या करे? मन अजीब हो चुका है। 

वह इसी खयाल में था। उसने दरवाजे की खिड़की की तरफ देखा और पाया कि चाय का कप और ब्रेड के दो पीस एक प्लेट में पड़े हुए थे। उसने झट से कदम बढ़ा कर उन्हें हासिल किया और खिड़की के पास चल दिया। वह भूखा था। पहले ब्रेड खाई फिर चाय धीरे धीरे पीने लगा। उसके दिमाग में न जाने क्या होने लगा। वह आराम से कुर्सी पर बैठा रहा। फिर आँखें बंद कीं। उसे प्रमोद याद आया। उसका दोस्त। स्कूल वाला। कितना होशियार था। सुंदर भी। उसकी धाक जल्दी जम जाती थी। उसने कॉलेज में कॉमर्स ही लिया था। वह हिसाब किताब में अच्छा था। लेकिन वह मर गया। डीटीसी की बस के नीचे आकर मरा। अप्रैल का ही महीना था। उसके दिमाग में प्रमोद को सोचते ही एक तस्वीर उभरी। जैसे दो पाटों का बंद दरवाजा। हाँ, बंद दरवाजा। 

किसी का जाना यही तो होता है। चैप्टर बंद हो जाना...नहीं समाप्त हो जाना, शायद! प्रमोद के मर जाने पर आनंद ने उस के साथ बिताया जाने वाला समय खोया। उसकी बातें खो दीं। एक शख़्स खो दिया जो उसे समझता था। आनंद उसके साथ कुछ भी साझा कर सकता था। ऐसा नहीं है कि लड़कों को अपने स्पेस की ज़रूरत नहीं होती। सच है वे ठहाके लगाते हैं, पर निजी स्पेस की तमन्ना उन्हें भी होती है। उसने अपनी बहन को कई बार देखा था, अकेले में रोते हुए, फोन पर चिपके हुए। ऐसा वह भी तो करता ही था। ओह! प्रमोद की मौत के बाद एकांत में ही उसे राहत मिली। काफी अरसे तक भयानक ख़्वाब आते रहे थे। जब तक उसकी याद पुरानी नहीं हुई वह याद आता ही रहा। उसके बाद उसकी जगह कोई नहीं ले पाया। पश्मीना भी नहीं। ऐसा सोचते हुए उसकी आँखों में पानी उतर आया। हाँ, अप्रैल का महीना उसने नितांत अपने अहसास को महसूस करते हुए रोने के लिए सुरक्षित कर रखा है। इस महीने में वह थोड़ा गमगीन हो जाता है। 

उसका ध्यान टूटा तो उसे मालूम चला कि वह कब से चाय का खाली कप हाथ में लिए हुए बैठा है। वह कुर्सी से उठा और कमरे में टहलने लगा। इस काम में उसके दिमाग में हरकत नहीं होती। पर जैसे ही वह कहीं स्थिर होता है उसे बहुत कुछ याद आने लगता है। वह बहुत कुछ सोचने लगता है। वह सच में बीमार है शायद! कमरे में चलते हुए उसे लगा कि कमरा बहुत गंदा हो रहा है। उसने झाड़ू के लिए इधर उधर नज़र दौड़ाई। उसकी चारपाई के नीचे उसे झाड़ू दिखाई दी। वह उसकी तरफ बढ़ा और उठाकर दीवारों के कोने में बन गए जाले साफ करने लगा। वह लगभग दो घंटे उस कमरे में यहाँ वहाँ कुछ न कुछ करता रहा। उसकी गर्दन में दर्द हुआ तो वह कुर्सी पर बैठ गया। जैसे ही स्थिर हुआ वह सोचने लगा। साथ ही साथ गर्दन के दर्द को भी महसूस करने लगा। घड़ी पर नज़र दौड़ाई तो ग्यारह बजकर तीस मिनट हो रहे थे। उसने सिर कुर्सी के पीछे वाले हिस्से में टिकाया और आँखें बंद कर लीं।



उसे मई का महीना याद आया जब वह गर्मियों की छुट्टी में अपने गाँव में जाया करता था। बचपन तो मज़ेदार कटता था पर जैसे ही वह सोलह बरस का हुआ, गाँव भी काटने लगा। “अरे, इसे बस एक अच्छी सी नौकरी मिल जाये वही काफी है। दिन भर न जाने क्या सोचता रहता है। जब देखो कमरे में घुसा रहता है।” पिता के इन शब्दों पर उसकी माँ ने पिता को हैरानी से देखा और फिर चुप कराने की कोशिश में बोलीं- “अभी तो स्कूल में ही है। इसकी उम्र ही क्या है जो नौकरी-नौकरी लगाए बैठे रहते हो। जा आनंद...जा जरा बाहर घूम आ! आनंद सिर नीचे किए हुए ही निकला था उस कमरे से। सभी रिशतेदारों के सामने से। सब उसे किस अजीब नज़रों से देख रहे थे। 

आनंद ने कभी सोचा ही नहीं था कि आखिर बड़े होकर उसे करना क्या है? उसे झंझट होती है इस सवाल से। उसने खुद से पूछा- “जीने के लिए क्या कुछ बनना जरूरी है? ऐसे बिना सोचे क्यों नहीं जी सकते? जब हालात होंगे वैसा कुछ जिंदगी में आ जाएगा। ...सारा खेल इन स्कूल वालों ने बिगाड़ रखा है। बच्चा कलम थामता नहीं कि पूछ लो क्या बनना चाहते हो? लो मैं कुछ नहीं बनना चाहता। मैं आनंद ही रहना चाहता हूँ। किसी को इससे क्या परेशानी है?” यही सोचता सोचता वह पके हुए गेंहू के खेतों की ओर निकल गया था। उसने पाया कि वह बीच पगडंडी पर खड़ा है और अगल बगल बस खेत ही खेत हैं। दूर कुछ पेड़ भी हैं। लोग खेतों के काम निपटाकर घरों की तरफ लौट रहे हैं। वह और आगे बढ़ गया। वह चलता जा रहा था तभी किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई- “ए बाबू ...सुनो जरा ये गठरी तो सिर पर रखवा दो।” दो बार एक ही वाक्य दोहराया गया। वह पीछे लौटा। उसने सोच कोई महिला होगी। वह पास गया। जब पास पहुंचा तो पाया कि वह बीस या इक्कीस साल की लड़की है जो नितांत थकी हुई है। वह मुस्कुराई। पर वह कुछ नहीं बोला और गठरी उठवाकर उसके सिर पर रखवा दी। वह बात करने के लिए कुछ बोली। आनंद ने जवाब नहीं दिया और जल्दी जल्दी घर की तरफ बढ़ गया। आज उस बात को बीते हुए कितने बरस हो गए। पर वह उस मुसकुराती हुई लड़की का चेहरा नहीं भुला। सांवला सा। सफ़ेद दांत। हाँ, वह कुछ भूल ही नहीं पाता। उसकी यही सबसे बुरी और अच्छी बात है। मई का मतलब वह लड़की, जो मुस्कुराई थी उस शाम! पश्मीना भी तो कितनी सुंदर लगती है हँसती हुई, उसने अपनी आँखों में पश्मीना का चेहरा उतरता महसूस किया। 

पर वह इस तरह से क्यों नहीं रह पाता? मुस्कुराते हुए। इसी बीच दरवाजे पर बनी खिड़की खुली और एक खाने की थाली कमरे में दाखिल की गई। वह उठा और सुबह के चाय के बर्तन वापस कर खाने की थाली को लेकर चारपाई पर रख दिया। यह सब उसके लिए सामान्य घटना थी। हर दिन का रूटीन। 

वह कमरे से सटे गुसलखाने में गया। कुछ देर बाद नहाकर निकला। उसने सोचा आज मनपसंद रंग पहना जाये। अलमारी को खोला और कुछ देर जामुनी हर की कमीजों को देखा। पर उसने जामनी टी-शर्ट निकाली और पहन ली। खाने के लिए वह चारपाई की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने पहला कौर मुंह में रखा बिजली चली गई। उसे मन हुआ कि खाना फेंक दे। गर्मियों में बिजली क्यों काटते हैं? जून और जुलाई के बारे में सोचते हुए उसे दिमाग में दो जलते हुए गोले दिखते हैं जिनमें से भयावह आग निकलती है। उसे इन महीनों में पृथ्वी और लोगों की बहुत फिक्र होती है। इतनी गर्मी भी कहीं पड़नी चाहिए! खाना एक कोने में खिसका कर वह लेट गया। 

अखबार जो कि चारपाई पर ही पड़े थे, में से एक उठाया और अपने को हवा करने लगा। उसे अपनी एक बार गर्मी की छुट्टियाँ याद आईं जो उसके जीवन में सबसे अधिक शानदार थीं। उसने लकड़ी का एक कूलर बनाया था। और उसके अंदर की दीवारों पर स्टील लगाई थी। अंदर एक पुराने पंखें के बेकार पड़ी पंखुड़ी का इस्तेमाल किया था। उसने उसे आसमानी रंग से पेंट किया था और बीच-बीच में सफ़ेद रंग के धब्बे रंग किए थे जो बादलों का अहसास देते थे। बहुत ही सुंदर था। घर में उसकी इस रचनात्मकता को देखकर सब हैरान हो गए थे। पापा भी हैरान थे। उसकी बहन ने उसे इस मौके पर एक कमीज भी तोहफ़े में दी थी। 

इस खुशी के बाद उसने कई रचनात्मक काम किए। जैसे कुछ घड़े खरीदकर उन्हें रंग किया। उनमें सुंदर चित्र बनाए। घर में उन्हें कोने कोने में रखकर सजाया। जब मेहमान आते तब उनमें से कईयों ने उन घड़ों को मांगा भी पर माँ ने साफ़ मना कर दिया। ऐसे ही आनंद ने कुछ सिनरी भी बनाई जिन्हें बहन ने फ्रेम करवाकर अपने ऑफिस में लगाया और कुछ को तोहफों में भी बांटा। क्रिएटिव आनंद उसने कॉपी पर अपना नाम लिखा। वह खुश रहता था, जब वह कुछ रचता था। वह आँखें बंद कर अपनी इस रचनात्मकता को सोचकर मुस्कुरा रहा था तभी बिजली आने पर पंखा रफ़्तार से चलने लगा। वह फटाफट उठा और खाना जल्दी जल्दी खाने लगा। वह जब खा चुका तब कमरे में टहलने लगा। उसने सिगरेट का पैक खोजा। मिला। उसमें एक भी सिगरेट नहीं थी। वह चिढ़ गया। पैक कमरे में फेंक दिया। कुछ पल बाद उसे अपने इस गुस्से पर अफसोस हुआ। सिगरेट के पैक को उठा कर कूड़े के डिब्बे में डाला। उसने समय व्यतीत करने के लिए किताब पढ़ने का सोचा। लेकिन उसे लगा कि उसे ऐसी दशा में पश्मीना खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी देख रही है। उसने संयमित होने की कोशिश की।

उसे किताब पढ़ने का बहुत शौक तो नहीं था। पर जबसे वह सिर्फ इस कमरे में रहने लगा था तब से ही किताबें पढ़ने के शौक को पनपाने की कोशिश में लगा है। अच्छा है। लोगों से बात करो तब कितनी ऊर्जा ज़ाया होती है। इसलिए वह दुनिया का महान साहित्य पढ़ना ही बेहतर समझता है। कुछ देर वह महान किताबें छांटता रहा और कनफ्यूज़ हो गया। उसने महान शब्द के बारे में सोचा। उसने अपने मन में ही एक बहस शुरू की। उसे याद आया कि उसकी स्कूल और कॉलेज की किताबों में इस शब्द का खूब इस्तेमाल देखा था। बहुत से लोगों से जुड़कर यह शब्द उसके सामने आया था। ऐसे शब्द महात्मा गांधी और बुद्ध आदि व्यक्तित्व के संदर्भ में आए थे। उसने कहा- “आखिर वह क्योंकर किसी के कहने पर किसी दूसरे को महान मान लें। उसे खुद ही पढ़कर समझकर किसी को महान कहना या न कहना चाहिए।” उसने मन में यह तय किया कि वह जब तक किसी के संदर्भ खुद से पूरी तरह निगाह नहीं डाल लेगा कभी महान नहीं मानेगा। 

उसे महात्मा से गांधीजी याद आए। गांधी जी से अगस्त का महीना याद आया। वह कभी भी गांधी जी के खिलाफ कुछ नहीं कह पाता क्योंकि उसकी माँ को उसकी केवल इसी एक बात पर बुरा लग सकता है। उसकी माँ गांधी जी की बेहद इज्जत करती हैं। वह अभी तक भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के बारे में ठीक से नहीं जानता। अगस्त के महीने में जब दिल्ली की हर एक जगह चाक-चौबन्द हो जाया करती थीं (जब वह घर से बाहर जाता था) तब उसे ठीक ठीक पता चल जाता था कि आज़ादी का दिन आने वाला है। अगस्त से वह बहुत कुछ याद कर सकता है। वह उड़ती-कटती पतंगें याद कर सकता है। वह पाँच वर्षीय योजनाओं को याद कर सकता है, भारत के पहले प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राष्ट्रपति आदि आदि सबको याद कर सकता है। उसे स्कूल की किताबों और अखबारों से यह जानकारी मिल जाती है कि उसका देश इसी महीने में सन् 1947 में आज़ाद हुआ था। 

एक बार उसके इंग्लिश के अध्यापक क्लास नौवीं में सबसे पूछ रहे थे- “देश कब आज़ाद हुआ था?” कईयों को मालूम नहीं था। उसका चौथा नंबर था। वह इतना गुस्से से भर गया था कि उसके मन ने कहा- “देश कभी आज़ाद ही नहीं हुआ। फिर ये आदमी पूछ क्यों रहा है? क्या वह अपना सामान्य ज्ञान अच्छा करना चाहता है? मुझसे पूछेंगे तो कहूँगा अभी देश आज़ाद होना बाकी है। ...नहीं हुआ आज़ाद। 47 तो एक पड़ाव था।” पर उस रोज़ उसकी बारी नहीं आई। उसे यह अच्छा लगा कि उसकी बारी नहीं आई।

उसे आज़ादी शब्द से सितंबर का महीना याद हो आया। कॉलेज में प्रमोद के बाद शाहजहाँ उसका दोस्त बना था। उसी के साथ उसने सिगरेट पीने की शुरुआत की थी। शाहजहाँ तो मान ही नहीं रहा था। लेकिन आनंद के ज़िद्द पर वह अच्छे सुट्टे लेना सीख गया। बाद में उसे यह भी पता लगा कि सिगरेट पीना कभी भी आज़ादी का प्रतीक नहीं है। बल्कि अपनी ही सेहत को खराब करना है। हालांकि वह इस लत से अभी तक निजात नहीं ले पाया है। कभी कभी वह इतना लंबा कश लेता था कि उसका दम निकल जाता था। हुतूतू फिल्म में भी एक गाना है- “इतना लंबा कश लो यारों दम निकल जाये..!” आनंद उसके साथ दिल्ली की कई जगहों पर बिना पिता और माँ के घूमा। उसे पहली बार किसी के कंधे या हाथ पकड़ने की इच्छा नहीं हुई। वह बस में यहाँ वहाँ जाता। जगहों और लोगों को करीब से देखता। लड़कियों से भी कॉलेज में थोड़ी बहुत बात करने की शुरुआत उसने इसी महीने से शुरू की थी। पश्मीना भी इसी महीने में उसकी दोस्त बनी थी। अजीब सी लगती थी। ऐसा लगता था कि वह कोई रूह है। सांवला सा रंग था। बाल लाल थे। कद कोई खास लंबा नहीं था। वह उससे काफी बातें साझा कर लेती थी। उसके पास रहने से आनंद में अजीब सी अंदरूनी हलचल रहती थी। सितंबर के महीने में वह ज़्यादा खूबसूरत लगती थी। इसलिए आनंद के लिए यह महीना प्रेम का महीना था। पश्मीना का महीना था। वह कहती थी- “मैं जहां भी रहूँ, मैं तुम्हें ऐसी वाइब्स भेजा करूंगी कि तुम्हें पता चल जाएगा कि मैं तुम्हें याद कर रही हूँ। मुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा बस मन में एक दर्द के साथ आनंद कहना होगा। तब देखना तुम्हारे दिल में भी पश्मीना...पश्मीना नाम की गूंज हुआ करेगी।” वह झटके से सोच से बाहर आया जब शाम की अजान ने उसे जगाया। 

अक्तूबर के महीने में उसे दीपावाली ही याद आती है। हालांकि अब उसे इस त्योहार को लेकर कोई खास उत्साह नहीं बचा। उसे किसी भी त्योहार के प्रति कोई खास लगाव नहीं है। थोड़ा बहुत क्रिसमस और नए साल में अब भी दिलचस्पी लेता है क्योंकि इन्हीं अवसरों पर पश्मीना उसे याद कर लेती है। अक्तूबर को वह अपनी घर बैठे करने वाली नौकरी के लिए भी याद करता है। वह लोगों और कंपनियों के लिए वेब डिजाइंग का काम घर बैठे कर देता है। इससे उसे ठीक ठाक कमाई हो जाती है। कई बार कुछ दूसरी सामाजिक संस्थाओं के प्रोपज़ल और रिपोर्टों को भी अच्छी क़ीमत पर तैयार कर देता है। उसने सबसे पहला काम और पहली कमाई अक्तूबर के महीने में ही की थी इसलिए वह जल्दी भूल नहीं पाता। उसे दो अक्तूबर को गांधी जी याद आ जाते हैं। गांधी जी के बारे में सोचकर वह कुछ पल मानो कहीं ठहर जाता है। उसका दिल धीमे धड़कता है। वह दिमाग में एक शांति का अनुभव करता है। जब वह शांति शब्द सोचता है तब उसे महात्मा बुद्ध भी दिखाई देते हैं। उसे मन करता है कि वह ध्यान लगाए और अपने आप को अंदरूनी शांति दे। लेकिन जब पश्मीना नाम उसके अंदर साँसों से गुज़रता है, तब उसे सबसे ज़्यादा शांति महसूस होती है।  

आजकल वह देश के हालातों पर भी कड़ी नज़र बनाए रखता है। हालांकि वह अखबार में बहुत दिलचस्पी नहीं लेता पर सोशल साइट्स से उसे काफी सटीक जानकारी मिल जाती है। उसने हर साइट्स पर अपने बिना फोटो वाले अकाउंट खोल रखे हैं। वह सब पर नज़र भी रख लेता है। वह समय की तरह है। सब जगह होते हुए भी वह कहीं नहीं है। क्योंकि वह किसी से चैट नहीं करता। इसकी एक वजह पश्मीना भी है। वह फेसबुक इस्तेमाल करती है। इसलिए वह उसे यहीं इसी जगह जी भर के देख लेता है। कई बार पश्मीना ने उससे अपनी भी प्रोफ़ाइल फोटो लगाने की गुजारिश की है। पर वह नहीं लगाता। वह सुंदर है या नहीं, उसने कभी ध्यान नहीं दिया। उसे क्या करना है आईने में खुद को देखकर! वह तो जब पश्मीना को देखता है तब उसके चेहरे में खुद को पा लेता है। क्या पश्मीना के साथ भी ऐसा होता है

नवंबर खुद के लिए वह ऐसा महीना मानता है जब वह ध्यान, मौन, अवलोकन, जीवन-मरण, परिपक्वता जैसे शब्दों को समझने और रत्ती भर भी अपने व्यक्तित्व में उतार लेने की कोशिश करता हुआ पाया गया था। एक बार फिर वह बुद्ध को याद करता है। यही वह परिवर्तनकारी महीना था जब वह अपने अंदर कुछ अलग सा महसूस करता था। हालांकि यह सब उसके लिए बहुत आसान नहीं था। आज भी नहीं है। वह इंकार भी नहीं करता अपनी कमजोरियों से। लोग लक्ष्य बनाकर जीते हैं। आनंद बिना लक्ष्य ही जीता है। उसे किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग दुनिया में तमाम तरह का ताम-झाम हासिल करना चाहते हैं। पर वह बिना किसी ताम-झाम के जीना चाहता है। वह हमेशा इस कमरे में बंद होकर नहीं  जिएगा। उसे दुनिया के रंग देखने है। शायद एक दिन किसी यात्री की तरह घूमने में उसकी मौत हो जाये पर वह उसी मौत को गले भी लगा लेगा। उसके घर के लोग उसके बारे में सोचते हैं कि उनका लड़का पागल हो गया है। पर यह सच नहीं है। यह उसके खुद के जीने का तरीका है। वह पागल नहीं है। वह बस ऐसा ही है। वह सभी की नक़ल नहीं कर सकता। इसलिए वह दिमागी तौर पर मजबूत बनना चाहता है। ताकि जब वह बाहर की दुनिया में प्रवेश करे तो अपने को तिनके की तरह गिरते हुए न पाये बल्कि एक पेड़ की तरह खड़ा पाये और अपने आप को हर तरह के अनुभवों से सींचे। नवंबर का महीना ही है जब वह अपने से बेहतर मुलाक़ात कर पाता है। उसे पश्मीना के लिए अपने व्यक्तित्व को और निखारने की तमन्ना भी तो है।  

दिसंबर उसे एक रहस्यमयी महीना लगता है। या फिर वह कभी समझ नहीं पाता कि यह महीना आखिर उससे क्या कहता है। कभी कभी वह दुविधा में फंस जाता है। क्या करे वह? वह पश्मीना को पा ले, या फिर अपने देश भ्रमण की योजना को शुरू करे, या फिर समाज के लिए कुछ करना शुरू करे या फिर ध्यान लगाकर संत बन जाये। वह पागल हो जाएगा यदि दिसंबर को न समझ पाया। वह ठीक से सोच नहीं पाता। उसके दिमाग के सारे पुर्ज़े ढीले पड़ जाते हैं। वह अपनी चारपाई पर आकर लेट जाता है। वह रोता है कभी हँसता है। वह इसी दशा में न जाने कब सो गया। सुबह की चार बजे की अजान पर उसकी आँख खुली। वह उठ कर बैठ गया। उसने अपने दिल में कुछ हरकत होते हुए महसूस की। उसे लगा उसका दिल पश्मीना...पश्मीना बोल रहा है। वह जल्दी जल्दी तैयार हुआ। दाड़ी बनाई। गुलाबी टी-शर्ट जींस के साथ पहनी। हाथ घड़ी को टेबल पर ही छोड़ दिया। कई अरसे से बंद कमरे के दरवाज़े को खोलकर निकला। वह कुछ सोच नहीं रहा था क्योंकि उसका दिल बस पश्मीनापश्मीना कह रहा था। कुछ देर बाद वह अपने होठों से भी यही नाम दोहराता हुआ पश्मीना के घर की तरफ बढ़ गया।  




         

Saturday, 30 December 2017

टाइम-लेस

कल के बाद सन् 2017 भी बीत जाएगा। जब से होश संभाला और चीज़ों को वक़्त के दायरे में देखना सिखाया गया तब से यही महसूस होता है कि वक़्त सच में उड़ना जानता है। यह लगता है कि व्यक्ति के जीवन का मध्य भाग बहुत तेज़ी से गुज़रता है। आदि और अंत धीमे-धीमे। शायद यह पूरा सच भी नहीं है। जब अपने अन्तर्मन और बाहर की दुनिया में संपर्क स्थापित होने लगता है तब वक़्त के मायने या तो बदल जाते हैं या फिर हमारा ध्यान वक़्त से हटकर उन बिदुओं पर केन्द्रित हो जाता है, जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हम अपने जन्म के समय सबसे अधिक ख़ालिस होते हैं। पर समय के बीतते-बीतते एक सामाजिक व्यवहार की चादर ओढ़ने के कारण हम एक अजीब सी प्रजाति में बदल जाते हैं। इसलिए चुनौती यही है कि हम जब मरे तब भी ख़ालिस रहे जैसे अपने जन्म के समय थे। 

अख़बारों की परेशान कर देने वाली खबर से लेकर टीवी समाचार चैनलों के शोर तक में समय को किसी दूसरे की नज़र से समझा जा सकता है। मंदिर के घंटे और मस्जिद की आवाज़ से समय को हम जैसे लोग पकड़ लेते हैं। पिता के काम के जाने के समय से तो भाई के देर रात तक घर लौटने के समय को भी समय समझा जा सकता है। आम ज़िंदगियाँ सालों की घटना में सिमट कर जीने लगती हैं तो कुछ के लिए जन्मने, शादी होने, मरने की तारीखों में समय बैठा दिखाई देता है। 



पर इन सब से परे मुझे सपने ज़िंदगी अधिक करीब लगते हैं। समय की वहाँ बिसात नहीं है। आप हैं, आपके खयाल हैं, आपके किरदार हैं, आपकी परिस्थितियाँ हैं, आपका रंगमंच है, आपकी आवाज़ें हैं, आपकी मुश्किलें और खुशियाँ हैं और आपके लिए अटपटे परिदृश्य की बुनावट है, जिसे आपका दिमाग बखूबी रचना जानता है।
फिर भी सपने की बुनियाद आपके उसी जीवन से बनती है जहां आप समय के साथ रहते हैं। 

और कैसे समय को देखा जाये? यह हमेशा मौजूं सवाल है। जितने भी तर्क रख दिये जाएँ कि समय यहाँ नहीं हैं, वहाँ नहीं है...वो लगभग मन को बहलाने के लिए महज़ अच्छे खयाल ही हैं। अगला सवाल है यह होना चाहिए कि समय का शुद्ध रूप कहाँ मिलता है? वाज़िब है कला के अलग-अलग रूपों में समय के शुद्धतम रूप को देखा जाये। कला में या तो सबसे शुद्ध रूप होता है या फिर वह वहाँ होता ही नहीं। इस पर बहस हो सकती है। 

आगे आने वाली दस्तकों में इस बात को लेकर और समझा जाएगा और अपने मुताबिक लिखा जाएगा।

Sunday, 3 December 2017

पंक्चर

कुछ दिनों से लिखना बिलकुल बंद रहा। जब लोगों ने मुझसे मैसेज और फोन कर के पूछा कि क्या हुआ है तब मैंने सवाल बहुत हल्के में लेते हुए तुरंत जवाब दिया-"मेरा लैपटाप खराब हो गया है इसलिए आप लोगों को झेलने का अवसर नहीं मिल रहा है।" हालांकि जवाब मुझे बहुत खराब लगा। ऐसा नहीं  है कि दिमाग में आइडिया नहीं आए। काफी विषय सूझे और मैंने लिखने की भी कोशिश की। पर एक बैठक में हाथ से लिख नहीं पा रही थी।  यह आधुनिक लेखन के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण परेशानी लगी और एक दोस्त ने मुझे इसे लिखने का सुझाव भी दिया। 
पेन और कॉपी लेकर लिखने में मैंने एक अपने स्तर का संघर्ष किया और पाया कि अक्षरों  की बनावट पर मैं अपना शासन खो चुकी हूँ। धीरे लिख रही हूँ। लिखने पर भी जूझ रही हूँ। लय नहीं बन पा रही आदि आदि। कॉलेज और उसके बाद तक के लिखने के सफर में लिखना एक खुशी के साथ आता था। लिखते वक़्त लगता था कि शब्दों का एक झरना बह रहा है और हाथ के माध्यम से पन्नों पर उतर रहा है। लेकिन पिछले तीन साल में मैंने लगातार इस मशीन पर ही लिखने को लिखना समझा और एक घाटे का सौदा किया। हालांकि बीच बीच में डायरी लिखी पर डायरी में 5 या 6 पन्ने लिखने में बहुत बड़ी मुश्किल नहीं लगी। एक वजह यह भी है कि डायरी लेखन एक ऐसी आज़ादी का भी अहसास लेकर चलता है जिसमें बाध्यता बहुत बड़ी बात नहीं होती। डायरी मनमर्ज़ी शब्द से भी कई बार जुड़ जाती है।

बटन दब जाने पर अक्षरों का तुरंत उभर आना एक निहायती बेदिली का काम और उत्पादन है। हाथ और की-बोर्ड के बीच का रिश्ता जैसे को तैसा वाला है। जो बटन दबेगा वही उभरेगा। और यहाँ लिखने की बात ही नहीं है। टाइप करना शब्द युग्म इस्तेमाल किया जाता है। हाथ और की-बोर्ड एक के बीच एक ही एक्शन निरंतर चलता है और परिणाम में लिखा हुआ उभर आता है। जबकि हाथ से लिखने में हाथ और पन्ने के बीच मशीनी रिश्ता नहीं महसूस होता। दूसरी महत्वपूर्ण बात लिखते समय लिपि की बनावट हाथ को एक घुमाव और स्वाभाविक एक्शन मुहैया करवाती है। जो कि हम इन्सानों के खून में है। इसका बढ़िया उदाहरण अगर खोजा जाए तो आपको ऐसे लोग मिलेंगे जो पेन पेंसिल को कान या फिर अपने जुड़े में अटका कर रखते हैं। छोटे बच्चों को जब नई नई पेंसिल दी जाये तब उस पेंसिल का इस्तेमाल लिखने के अलावा मुंह में, सिर में और बाकी तरह से वे करते हुए दिखते हैं। यह सब एक बेहद स्वाभाविक हिस्सा लगता है। 

लेखन से जुड़े दो उदाहरण और देना चाहूंगी। चूंकि JNU में मेरे वक़्त का कुछ हिस्सा चाय पीने में जाता है तो वहाँ कुछ जगहों पर अपने आप ध्यान चला जाता है। वहाँ का माहौल निश्चित रूप से यह बतलाता है कि आप अभी तक इंसान ही हो। इसलिए दिमाग कि तनी हुई सिराएँ थोड़ा ध्यान इधर उधर करने की इजाजत भी दे देती हैं। वहाँ एक लाइब्रेरी के पीछे वाली कैंटीन और मामू का ढाबा है। जब मैं शुरू शुरू में पढ़ने गई थी तब लाइब्रेरी के पीछे वाली कैंटीन में हाथ से कैंटीन के खुलने और बंद होने का समय लिखा रहता था। अब ठीक इसकी जगह टाइप हुए पर्चे पर यही बात लिखी होती है। हालांकि एक आम समझ में यह साफ है कि जो सूचना देने का उद्देश्य था वह पूरा हो चुका है फिर भी थोड़ा गौर करें तो पाएंगे कि अब एक या दो पंक्ति को भी हाथ से नहीं लिखा जा रहा। वास्तव में हाथ का लिखा रिप्लेस होने का शिकार हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे 19+38 को कोई मुझे जोड़ने को कहे तो अमूमन मैं मोबाइल का गणक निकाल कर बैठ जाती हूँ।

                                                            By Justyna Kopania 

अब बात मामू के ढाबे की। यह जगह काफी लाजवाब है। खाना भी अच्छा है। लेकिन जो बात मुझे यहाँ बहुत अच्छी लगती है और मेरा ध्यान खींच लेती है वह अंग्रेज़ी में करसिव हैंड राइटिंग से लिखा हुआ मेन्यू। अगर आप कुछ ऑर्डर करने जाते हैं तब खाने के साथ साथ यह भी दिमाग में आता है कि क्या खूब लिखा है। कितनी सुंदर लिखाई के साथ। इसलिए बाहर कि दुनिया में जाते ही मुझे हर वह चीज जिस पर हाथ की लिखाई लिखी होती है, आकर्षित तो करती ही है और साथ ही दिलचस्प भी लगती है। आजकल डीटीसी की बसों में लहराते हुए शब्द दिखते हैं जो कहते हैं- जेबकतरों से सावधान!

जो सभ्यता नहीं लिखती थीं उनके इतिहास में बहुत झोल मौजूद है। एक झूठा और बनावटी इतिहास। मुझे 'बोलों' की दुनिया में यकीन है पर पूरा का पूरा इतिहास अगर उन पर टिका रहे तो मुझे आपत्ति है। आजकल हर चीज को मशीनों और कार्डों से जोड़ने के पीछे सुविधा की बात को ऊपर रखा जाता है। टीवी पर एक विज्ञापन आता है जिसमें सभी काम कार्ड-पेमेंट से किए जा रहे हैं पर जैसे ही एक व्यक्ति कैश रुपया निकलता है उसे हिकारत की नज़र से देखा जाता है। वह फास्ट लेनदेन में बाधा के रूप में दिखता है। लेकिन इसी विज्ञापन पर यह बहस भी की जा सकती है कि इंसानी दिमाग को लगभग पंक्चर करने की तैयारियां सरकार और कंपनियाँ ज़ोरों पर कर रही हैं। यही नहीं वे अपने काम में सफल भी हो रही हैं। चूंकि सभी पेमेंट कार्ड से हो रही हैं तो यह तय है कि आपसे हिसाब किताब करने का अभ्यास छिना जा रहा है। जहां अभी तक मशीनों से पेमेंट नहीं होता वहाँ हम खुद -ब-खुद जोड़ना शुरू करते हैं और दिमाग पर ज़ोर डालते हैं। इसलिए कई मर्तबा दिक्कत भी आती है। हमारे आसपास अब ऐसे लोगों की संख्या कम होती जा रही है जो मुंह-जुबानी हिसाब जोड़ लिया करते थे।

कितनी अजीब बात यह कि मैं यह सब फिर से उसी लैपटाप पर लिख रही हूँ जिससे अब थोड़ा सा डर लगता है। फिर भी मुझे अपने स्वाभाविक लिखने की रोज़मर्रा के छूटे हुए अभ्यास की तरफ दुबारा जाना चाहिए। इसलिए आजकल घरेलू खर्चों के हिसाब किताब की डायरी को मैंने अपने पिता से लेकर खुद लिखना शुरू किया है। शायद अधिक नहीं लिख पाऊँगी पर एक रोजनामचा (Journal) बनाना तो सीख ही जाऊँगी।  


Monday, 2 October 2017

ये जो प्रेम है

प्रेम एक ऐसा शब्द है जिसके बोलते ही कितनी हलचल मच जाती है। किसी को बॉलीवुड की फिल्म याद आ जाएगी किसी को कोई गीत याद आ जाएगा। किसी को अपना प्यार याद आ जाएगा। किसी को टूटा दिल या बेवफ़ाई याद आ जाएगी। कहने का मतलब यह है कि यह शब्द खाली रहने नहीं देगा। यह ऐसा विषय भी है जिस पर बोलने या लिखने से बचती रही हूँ। पर आज मैं लिखूँगी कि मैं किन किन लोगों की प्रेम दीवानी रही हूँ। हम जैसी बात बात पर शर्मा जाने वाली लड़कियों के अपने ढेरों कोने होते हैं और वहाँ बहुत से लोग ऐसे रहते हैं जिन्हें हम दुनिया की बुरी नज़र से छुपा कर रखना चाहते हैं। पहले पहल मुझे यह लगता था कि किसी को प्यार करना बदनाम हो जाने वाली वजह बन जाती है। लेकिन प्रेम पूर्वाग्रहों से संचालित नहीं होता। इस बात का संतोष और खुशी दोनों है। 

सन् 1972 में हिन्दी की दुनिया को एक बेहतरीन उपन्यास मिला था। उसका नाम है- धरती धन न अपना।  इसके लेखक जगदीश चंद्र हैं। जब मैं इग्नू से अपने एम.ए. हिन्दी की पढ़ाई कर रही थी तब यह उपन्यास कोर्स में लगा था। अधिक समय नहीं हुआ इस बात को। क्योंकि मेरा पूरा समय अपनी नौकरी में गुज़र जाता था इसलिए उपन्यासों को खरीदने की ज़िम्मेदारी मेरे पिता के जिम्मे हो गई थी। वे ही पुरानी दिल्ली के नई सड़क पर लगने वाले बाज़ार से मेरे लिए उन किताबों को खोज खोज कर लाये थे। मैंने उन्हें सभी उपन्यासों की फेहरिश्त दी थी और वे एक ही बार में कम से कम आठ उपन्यास खरीदकर ले आए थे। शाम को जब मैं घर पहुंची तब नई नई किताबों को देखकर एक खुशी अंदर मिनट में पैदा हो गई। मैंने किताबों को देखते हुए कहा- 'ये तो सारी नई लग रही हैं!' वे बोले- 'हाँ,  नई ही हैं। कला मंदिर नामक दुकान से लाया हूँ।' इतनी देर में मैंने कुछ उपन्यासों को उलट पलट कर देख लिया। वो बोले- 'तुम्हें काफी मेहनत करनी होगी।' मैंने किताबों पर हाथ फेरते हुए कहा- 'सो तो है।...पापा आप को कौन सी किताब अच्छी लग रही है?' वो आठों किताबों पर नज़र फेरने के बाद एक किताब मेरे आगे करते हुए बोले- 'ये वाली!' जब मैंने उस किताब को हाथ में लिया तो वह यही उपन्यास निकला- 'धरती धन न अपना'। 

लेकिन मैंने इस किताब को पहले नहीं पढ़ा। इससे पहले मैंने 'गोदान' को और इसके बाद 'सूखा बरगद' पढ़ा। दोनों ठीक-ठाक थे। इस उपन्यास की बारी तीसरी रही और पढ़ने के बाद अफसोस हुआ कि यह पहले क्यों नहीं पढ़ा। वास्तव में यह उपन्यास दिल में उतर जाने वाला लगा। लिखने की शैली ऐसी थी कि पाठक को एक पल को लगता है कि वह 'चमादड़ी' में ही पहुँच गया है। अगर मैं अपनी निजी पसंद कि बात करूँ तो 'गोदान' से पहले मैं इस उपन्यास का नाम लूँगी। फिर भी तुलना बेकार ही है। सभी किताब अपने महत्व को पारित ही करती हैं। खैर इस उपन्यास के चरित्रों 'काली और ज्ञानो' का प्रेम मुझे आज तक सुपर डुपर प्रेम लगता है। ज्ञानो का मरना मुझे एक झटके जैसा लगा था। हमारा खुद का समाज ही प्रेम की स्थापना नहीं करने देता। खैर इस उपन्यास की कहानी नहीं बताना चाहती। लोग खुद से पढ़ें तो अच्छा रहेगा। बात तो प्रेम पर होगी और आकर्षण पर।

इस किताबी प्रेम-कहानी से पहले लड़कियों के जीवन में प्रेम कहाँ-कहाँ से प्रवेश करता है यह भी बड़ा दिलचस्प होता है। मुझे नहीं मालूम की बड़े घर की बेटी का जीवन कैसा होता है पर अपने जैसे घर की लड़की के बारे में कह सकती हूँ कि इनकी रोज़मर्रा बहुत उथल-पुथल वाली होती है। आज भी तकनीक के आ जाने से कुछ खास बदलाव नहीं आया है। 13 या 14 बरस की उम्र में छाती को ढकने वाला दुपट्टा रिशतेदारों से तोहफे में मिलना शुरू हो जाता है। स्कूल की ड्रेस या तो लंबी हो जाती है या फिर वह सीधे सूट में तब्दील हो जाती है। बालों की चमक तैल में चुपड़े हुए बालों में बदल जाती है। और कसकर दो चोटियाँ बना दी जाती है कि बालों का दम घुटने लग जाता है। फिर भी आकर्षण, हिंदुओं की किताब में दिये गए आत्मा के गुण को धारण कर उस सूट सलवार वाली लड़की के जीवन में आ ही जाता है। यही खास खासियत भी है। 



स्कूल के आने जाने के रास्ते कम मोहक नहीं होते! कुछ छोटी उम्र की कहानियाँ वहाँ जन्म ले लेती हैं। कोई लड़का है अजनबी सा जो साथ जाने की ज़िद्द करता है। सुबह 7:30 के समय में वह लंबी वाली सड़क के एक कोने में मोशन में खड़ा है। वह चाहता है कि यह सूट वाली लड़की आए तो साथ रास्ता कट जाये। लड़की अंजान बनी हुई भी सब जानती है। धीरे धीरे जान पहचान मुस्कुराहटों से हो ही जाती है। आह! क्या अहसास है। वह कम उम्र का लड़का अब प्रेमी है और वह लड़की प्रेमिका। कितना केयरिंग नेचर है उस लड़के का। इतना अच्छा अहसास। लड़की को उसका जन्मदिन याद है। वह कुछ ऐसा सामान जो तोहफा हो, देना चाहती है कि वह लड़का अपने साथ उसकी निशानी बनाकर रख सके। वह क्या दे सकती है, सोचने में कई रातें जाग कर बिता देती है। पिछले हफ्ते पिता ने एक बात कही थी कि इंसान को एक घड़ी का साथ रखना चाहिए। उसे यहीं से तोहफे के बारे में इशारा मिल गया। बचे हुए रुपयों से उसने चोरी चुपके एक काले पट्टे वाली घड़ी खरीद ली। उसका खयाल था कि इससे अच्छा तोहफा कुछ हो नहीं सकता। उसने दिया। लड़का हैरानी और प्यार के मिले जुले भाव से घड़ी देखता रह गया। शायद उसकी आँखों में एक आँसू भी तैर गया था। उसने उस पल सोचा-क्या लड़कियां ऐसी होती हैं!' उसने उस लड़की जिसको वह अब प्यार करने लगा है, के भी एक तोहफा खरीदने की बात सोचनी शुरू की। लेकिन जब तक शोर मच गया। बस एक बात जो आसपास होती रही, वह थी- 'लड़की का चक्कर चल रहा है, लड़की का चक्कर चल रहा है!

एक वो वाला प्यार भी होता है जो ट्यूशन में होता है। वहाँ स्कूल ड्रेस या दो चोटियों की ज़िद्द नहीं होती। वहाँ बहाने से छू भी सकते हैं। बात भी हो सकती है। नज़रें भी मिल सकती हैं। यहाँ भी लड़की का दिल अभी सीने से बाहर आने को हुआ होता है। a+b का स्क्व्यर वाला सूत्र कितना अच्छा लगने लगता है। टेस्ट होगा मैथ्स का। एक सवाल गलत नहीं होना चाहिए। टेस्ट का दिन आया। कुल छ सवाल दिये गए। सब अकेले अकेले बैठेंगे। कोई किसी का नहीं देखेगा। लेकिन ये जो आकर्षण है, यह सब कुछ देखता और समझता है। मुंह में केडबरी चॉकलेट की तरह घुल जाता है। लड़के ने लड़की को जितना हो सका दिखाया। दोनों टेस्ट में पास हो गए। अभी तक आकर्षण की भनक किसी बड़ी नज़र को नहीं लगी। यहाँ अभी कोई बदनाम नहीं हुआ है। अच्छा है। सब ठीक ठाक है। 

एक मैगज़ीन वाला प्यार भी होता है। बड़ी होती लड़कियों की जानकारी देने वाली पत्रिका। इसके अलावा वहाँ 'पहला प्यार' वाला किस्सा भी होता है। कितना अच्छा लगता है इस पेज़ को छूकर। आत्मा तृप्त होती है। अगर उस लड़की को अपने पहले प्यार के बारे में कुछ लिखना होता क्या लिखेगी? वह सोच रही है। किससे प्यार हुआ है उस। कोई क्लास का लड़का भी नहीं है, क्योंकि कॉलेज ही लड़कियों वाला है। ट्यूशन है नहीं तो कहाँ और किस्से प्यार होगा। चान्स ही नहीं। मौका है कहाँ! फिर कॉमिक्स के हीरो से। कौन अच्छा लगता है। फिलहाल तो सुपरमैन! अरे वही जो पेंट के ऊपर चड्डी पहनता है, वो भी लाल रंग वाली। कुछ भी कहो अच्छा तो लगता ही है। क्रिप्टन से आया है। अपनी धरती का मुसाफिर नहीं है। चक्कर चला तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। हाँ, यह अच्छा वाला विकल्प है। कोई पूछेगा तो कह दूँगी कि है मेरा भी कोई। यहाँ का रहने वाला नहीं है... नहीं यह बताने की ज़रूरत नहीं है। है बस कोई, इतना काफी है। 

दूसरी तरफ उस बेचारे सुपरमैन को नहीं मालूम कि कितनी लड़कियों का वह प्रेमी है। कितने प्रेम पत्रों की वह वजह है। कितनी आँखों के गुलाबी हो जाने का वह कारण है। कितनी सारी डायरियों के पन्नो में वह चिपका हुआ उड़ रहा है, कहीं न जाने के लिए। यह डायरी वही खजाना है जिसके ऊपर सूरज की रोशनी नहीं पड़ा करती। जिसके बारे में कोई भी 'कैप्टन जैक स्पेरॉ' नहीं जानता। वह खोज नहीं सकता इस खजाने को। आज भी ऐसे खजाने रोज़ अहसासों की ज़मीन में छुपाए जा रहे हैं। अच्छा है। यह दुनिया खजाना रहित नहीं होगी। खोजने के लिए कुछ न भी रहा तो कम से कम ये अहसास तो रहेंगे ही न।




Sunday, 1 October 2017

अटेन्शन प्लीज़

जब तक बात 'अजीब' न हो वह ध्यान नहीं खींचती। अजीब का मतलब कुछ भी ऐसा जो जाना-पहचाना न हो या फिर मेरे दायरे से बाहर का हो। और भी बहुत मतलब हैं सभी को मालूम है कि अजीब होता क्या है! मुझे एक बैठक याद आ रही है। बहुत से अनुभवी लोग थे वहाँ, मेरे अलावा। उस आदमी ने कहा- "अपने कम्फर्ट ज़ोन से निकलना अपने आप को सबसे बड़ी चुनौती देने की औकात होती है। अगर आप लगातार उसी में रहते हैं तब मुमकिन है कि कुछ समय अच्छा लगे, पर बाद में खामियाज़ा भुगतना ही पड़ता है। बदलावों के लिए अपनी आराम तलबी तोड़नी ही पड़ती है। ...कैसे मुमकिन है कि सोचने भर से सब कुछ खुद से हो जाएगा! अगर आप पर वार हो रहे हैं तो हो सकता है आप कुछ न कहकर बेकार के पचड़ों में न पड़ने का रास्ता चुनें, पर अगर जवाब देंगे तो मुमकिन है सामने वाला सोचे।... कहने से पहले सोचे।... हो सकता है बोल ही न पाये। ...बच्चों और औरतों पर अपराध इसलिए नहीं बढ़ रहे कि अपराधी बढ़ रहे हैं, बल्कि उस पर प्रतिक्रियाएँ न के बराबर हैं। हमें सीखना और सिखाना होगा कि कैसे पलटवार किया जाता है। यह जरूरी है। अपराध का शिकार हो जाने पर दुबकना किस समाज का बर्ताव है? ऐसे तो घुटन हो जाएगी। कौन जिएगा ऐसे?..."

उसकी बातों में बहुत सी अच्छी बातों को समझा जा सकता है।आज उसकी बातों में से व्यवहार और आदत को ले सकते हैं। अपने व्यवहार को बर्ताव से समझा जा सकता है। यह एक मज़ेदार गतिविधि है। कई बार ऐसे ही पागलपन वाले काम कर लेने चाहिए। कुछ सीखने को मिल जाता है।

 
मुझे लगता है, मैंने बहुत सी बातें छोड़ दी हैं। बात काफी साल पहले की है सो याद रह जाने लायक ही याद आ रहा है। इस आदमी को मैं नहीं जानती थी। जानती थी तो बस इतना कि वह भी किसी संस्था में बच्चों को रेसक्यू करने का काम करता है। वह इतने सामान्य तरीके से बोल रहा था कि मुझे एक पल को अटपटा लगा। भला इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी इस तरह कोई बोलता है। बैठक खत्म हो जाने के बाद वह अपना कोना तलाश कर सिगरेट फूँक रहा था। मन में आया, ये आदमी बड़े अजीब होते हैं। पैक पर लिखे होने के बाद भी क्यों सिगरेट पीते हैं! मुझेअपनी तरफ देख वह थोड़ा सा मुस्कुराया। बैठक में जिस लड़की के जिस लड़की के साथ आया था, उसके चाय खत्म करने के बाद तुरंत निकल गया। मैं बात नहीं कर पाई। लेकिन उसकी बातें याद तो है। सही है कि हम सब का अपना अपना एक कोना है। चाहे सीलन हो या बदबू आ जाए हम नहीं निकलना चाहते उस कोने से। बात आराम की नहीं, बात आराम पसंद हो जाने की है। उस डर की है जो हममें कितनी खूबसूरती से अदृश्य रहता है। मैं भी इस डर से अभी तक मुक्त नहीं हो पाई। बहुत डर का असर यह हुआ कि लोगों की बातों के या हमलों के निशाने पर जल्दी आ जाती हूँ।

कुछ दिनों पहले सोशल साइट्स पर माहिरा खान की खुली पीठ और हाथों की सिगरेट का ऐसा तूफान आया था कि वह सभी संस्कारी लोगों के निशाने पर आ गई थीं। पहली नज़र में जब मैंने उन तस्वीरों को देखा था तब मुझे कोई खास और बड़ी बात नहीं लगी थी।आज भी नहीं लगती। लेकिन अजीब मुझे वे लोग लगे थे जो उनको गाली दे रहे थे। जो उनको इस्लाम का हवाला देते हुए नसीहत दे रहे थे। ठीक ऐसा ही वाकया प्रियंका चोपड़ा के साथ हुआ था जब वह जर्मनी में प्रधानमंत्री से मिलने गई थीं और तस्वीरों में उनके पैर दिख रहे थे। लोगों ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री से मिलने साड़ी पहनकर जाना चाहिए था। कुछ ने यह भी कहा कि उन्हें कम से कम संस्कार तो नहीं भूलने चाहिए थे। अभी कुछ दिन पहले हादिया का भी एक मामला आया था जो मन से अखिला से हादिया हो गई हैं। लेकिन वहाँ के न्यायलाय और समाज को बहुत असर पड़ चुका है। 

जब मैं स्नातक में थी तब अंग्रेज़ी की मैम ने पूरी क्लास को एक पेपर लिखने को कहा। यह बहुत दिलचस्प काम था। उन्होने कहा कि आप अपनी आठ दिनों के बारे में रोज़ लिखें और वही आपका पेपर होगा। उसी पर नंबर मिलेंगे। मेरा रोल नंबर ओड(विषम) था इसलिए मुझे और भी खुशी होती थी क्योंकि यही टीचर हमें पढ़ाया करती थी। बहरहाल उस वक़्त तक मैं कम से कम रोज़ डायरी लिखने की अभ्यासी नहीं थी। लिखती थी पर दिनों के अन्तराल में। इसलिए जब यह काम मिला तब मैंने अपने दिन में होने वाली बातों पर गहरी निगाह रखनी शुरू कर दी। इतना ही नहीं अपनी माँ और भाई, बहन और पिता को भी इस नज़र के दायरे में लेना शुरू कर दिया। एक तरफ मुझे अच्छे नंबर की लालसा था तो दूसरी तरफ उस महत्वपूर्ण चीज को दर्ज़ कर लेने की जद्दोजहद भी थी जो बहुत खास हो...अलग हो। 



मेरे घर में मेरे होश संभालने से पहले ही चम्पक, नन्दन और अखबारों का गहरा प्रभाव था। कभी कभी किसी माह की पत्रिका रह जाती तब पढ़ी हुई पत्रिका ही दुबारा पढ़ लेती। इसलिए शब्द और खयाल वहाँ से भी मुझे अपने कॉलेज के दिये काम में मिल रहे थे। मैंने आठ दिनों में वह सब नोट किया या फिर अपने कच्ची बुद्धि के संज्ञान में ले लिया जो मैं ले सकती थी। परिणाम हैरान करने वाला था। मैंने एक बात को बार बार लिखा था। वह यह बात थी कि हम दूसरों को हर 10 या 20 मिनट में जज करते हैं। लगभग हर रोज़। किसी को कैसा बर्ताव करना चाहिए या फिर कैसा नहीं यह हममें तय करने की लगभग एक ज़िद्द है। घर और क्लास में ये बातें बड़े ही सामान्य तरीकों से होती थीं। इनका होना ऐसा है जो हमारा ध्यान भी नहीं खिंचतीं। जैसे मेरे घर में खाने में नमक की हल्की सी बात पर ही हम माँ को नसीहत थमाते चलते थे कि कम है तो कभी ज़्यादा हो गया। बहन के लिए था कि वह खाने में दिल रखकर नहीं पकाती। पकाना चाहिए। दीदी को घर जल्दी लौट आना चाहिए। भाई को पढ़कर अकाउंटैंट बन ही जाना चाहिए। मझला भाई देरी से आता है। जल्दी आना चाहिए। ज़रूर आवारागर्दी करता होगा। ठीक ऐसा ही क्लास में मेरे मन में होता था जो मस्ती करते थे आ फिर मेरे लिंक-अप्स की खबरें यहाँ वहाँ उछालते थे। मन में आता था कि एक एक को पकड़कर कूट डालूँ। कॉलेज में कुछ ऐसे लोगों को भी हल्का फुल्का सुना कि जो लड़की कम कपड़ों में हो वह जरा ऐसी वैसी होती है। 

ऊपर वाले पैरे का पूरा मतलब यह है कि हम किसी को भी एकदम से पोथी लेकर जज करने बैठ जाते हैं। यह हमारी आदतों में से एक गंदी वाली आदत है। कौन क्या पहन रहा है, कौन क्या कर रहा है, कौन क्या खा रहा है, आदि को जानने के लिए हमारी ताक झांक कुछ इस कद्र बढ़ जाती है कि यह एक बहुत बड़े ऐब में तब्दील हो जाती है। समाजों में ऐब ही अपराधों की वजह बन जाते हैं। मैंने पाया है कि हममें अपनी आदतों पर काम करने की बेतरह कमी भी है। व्यक्तिगत से लेकर सरकार तक अब आधार कार्ड के जरिये हमारे निजी जीवन में ताक झांक कर रही है। अगर आप एक औरत हो तो यह बात लोगों के लिए बहुत ही मज़ेदार और आसानी से निशाना साधने लायक बन जाती है। यह व्यक्तिगत गिरावट की निशानी है।  

इसका मैं एक ऐसा उदाहरण देती हूँ जिससे हम अपने व्यवहार को आदत बनते देख और समझ सकते हैं। आजकल मेट्रो का सफर अधिक होता है इसलिए वहाँ से उदाहरण लेना ठीक रहेगा। जब मैं महिलाओं के डिब्बे में जाकर सफर करती हूँ तब ऐसे हर उम्र की औरतों लड़कियों को एक दूसरे को घूरते और कानों में फुसफुसाते हुए पाती हूँ। हमें हंसी भी आ जाती है। उस दिन एक लड़की खूबसूरत सी स्कर्ट पहनकर खड़ी थी तभी कुछ लड़कियां उसकी स्कर्ट को देखकर हंसी और फुसफुसाई। जब मैंने उस स्कर्ट वाली लड़की को ठीक से देखा तो पता चला कि स्कर्ट में एक लंबा कट था जिससे उसके पैर दिख रहे थे। लेकिन फिर भी मुझे यह बात कोई विषय नहीं लगी। ऐसा पढ़ी लिखी लड़कियां बहुत करती हैं। मैंने देखा है कि मज़दूरीनें तो आराम से बैठकर सफर को सफर की तरह कर रही होती हैं। 

ठीक कोई शॉर्ट ड्रेस में लड़की मेट्रो के जनरल डिब्बे में आ जाये तब तो हाहाकार ही मच जाता है। जो लोग मोबाइल में सफ़ेद कमीज पहने हुए हनुमान चालीसा पढ़ रहे होते हैं या फिर टोपी लगाकर दीन के बारे में सोच रहे होते हैं, वे सभी नज़र उठा उठाकर उसे देखते भी हैं और लड़की के स्टेशन पर उतर जाने पर कहते हैं अब तो जमाना ही खराब हो गया है। कोई शरमों हया नहीं बची। वास्तव में जमाना अपने मुताबिक ठीक ही है, दोष तो नज़रों का ही है। खैर मैंने अपने पर बहुत काम किया है कि किसी के जीवन में अपनी नाक न अड़ाऊँ। मैं चाहती हूँ कि यह जज न करने की शैली ताउम्र बनी रहे। 

टिप्पणी के तौर पर यह भी कहूँगी कि बहुत से मसलों पर हमें अच्छा बुरा जज करना ही पड़ता है। इसलिए उन जगहों पर यह शैली भी खुद से विकसित करनी चाहिए। पढ़ने वाले लोग इतने दिमागदार तो होंगे ही कि वे समझेंगे कि मेरा मतलब और मकसद कौन सी बातों के लिए है। 



Sunday, 24 September 2017

दमदार औरतें: अपने स्पेस पर दावा

ज़ोर-जुल्म-जबर्दस्ती के खिलाफ़ सिर मुंडा लेने वाली वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्रा इस समय की सबसे बेहतर प्रेरणास्रोत है। कम से कम मेरे लिए तो है ही। विरोध जताने का नया हथियार ही बता दिया। अब हमारा सिर मुंडवाना ही हमारे विरोधों के तरीकों में से एक होगा। विधवा हो जाने पर सिर के बाल हटा देने वाली परंपरा को जबरन थोपने वाले इस अजीब तरह के लोगों के कबीले के मुंह पर बीएचयू की उस लड़की ने झापड़ रशीद कर उन्हें अपनी जगह दिखला दी है। जैसे बंदूक की नली घुमाकर शिकार करने वालों के आगे ही रख दी है। लो जी चला लो अब गोली! जिल्लत को हथियार में भी तब्दील किया जा सकता है। 

कवि और शायरों ने जिनकी ज़ुल्फों पर किताबें लिखी हों, जिनकी चोटियों को साँप सी लहराती हुई बताया गया हो, जिनके जुड़ों में फूलों को दिखाया गया हो, जिनके लिए बालों को उनकी सुंदरता का अहम हिस्सा बताया जाता हो, जहां बाल धोने के घोल से लेकर बढ़ाने तक के सूत्र बाज़ार में बिकते हों, जो लंबे बालों को शान समझते हैं, वहाँ उसी देश में एक लड़की ने अपने विरोध में उन्हें त्याग दिया और या जतलाया कि गलत के खिलाफ कैसे आवाज़ बुलंद की जाती हो। जिनको यह बात मामूली लगती है लगे, मुझे नहीं लगती।

महिलाओं के विरोधों पर नज़र डाली जाये तो उनके विरोध एक निश्चित खाँचें में दिखते हैं। विरोधों में खामोशी, झगड़े, कहासुनी, बात न करना, खाना छोड़ देना, शादी ब्याह में या किसी भी रस्म पर गीतों के माध्यम से गुबार निकाल लेना शामिल हैं। हो सकता है और भी ऐसे निजी व घरेलू तरीकें हों और अपने अपने अवसर पर वे करगार भी रहे हैं।  पर घर की चौहद्दी से बाहर के विरोधों में नारे लगाने, रैली निकालने और अनशन कर लेने में अब बराबर दिखाई देती हैं। मेधा पाटकर द्वारा नर्मदा बांध के खिलाफ़ किए गए अनशन अति प्रभावी और सम्मानीय रहे। ठीक इसी तरह इतिहास में चिपको आंदोलन में महिलाओं का पेड़ों से चिपक जाना और उन्हें कटने से बचाना भी महिला द्वारा विरोध जतलाने का नायाब उदाहरण हैं। स्वतन्त्रता संग्राम में कविता से लेकर कदम ताल-करने तक वे बहुत आगे थीं।  



आदिवासी आंदोलनों में भी महिलाओं की समान भागीदारी दिखती है। अगर ऐसा नहीं होता था दक्षिण कोरिया की विश्व की सबसे बड़ी स्टील कंपनियों में से एक कंपनी पॉस्को उड़ीसा में अभी तक अपना कारख़ाना लगा चुकी होती। इसके पीछे वहाँ के लोगों का वाजिब मजबूत विरोध रहा, जिसमें औरत मर्द और बच्चों ने पूरा पूरा हिस्सा लिया। एक ब्लॉग के अनुसार जब पुलिस गाँव में जाती थी तब वहाँ की स्थानीय औरतें उनके विरोध में अपने कपड़े उतार देतीं और तेज़ चिल्लाकर कहतीं- 'तुम यहाँ क्यों आए हो? क्या देखना चाहते हो?' ऐसा ही हाल मणिपुर में औरतों के विरोध में दिखा। 

पर मणिपुर को शर्मिला इरोम के कारण लोग जान पाये। सोलह वर्षों का उपवास रखकर प्रशासन को उसके अत्याचार के बदले रचनात्मक और बिना बंदूकों का विरोध बहुत महंगा पड़ा। उनके इतने लंबे अंतराल का विरोध ही था जो देश में एक लहर की तरह दौड़ा और बहुत से सोते हुए लोगों को जगाया। लोकतंत्र में विरोधों की क्या अहमियत होती है यह शर्मिला इरोम से सीखा जा सकता है। ज़रा फर्ज़ कीजिये, एक तरफ आपके पास सारे हथियार व साधन हैं और दूसरी तरह एक औरत का अनशन जैसा हथियार कि तुम गलत हो। गलत को गलत कहना और उसकी सही समय पर पहचान कर लेना बहदुरी के उदारणों में गिना जाता है। मणिपुर में हुए हालिया चुनाव में उन्हें महज़ 90 वोट मिले। लेकिन क्या यह सही नहीं कि कम से कम 90 लोगों में शर्मिला के प्रति एक भाव था। उनके विरोध की क़द्र थी। ऐसे ही शायद देश के बहुत से लोगों में उनके इस जज़्बे को लेकर सम्मान है। 

मेधा पाटकर को तो मैंने जब से होश संभाला है एक मजबूत विरोध करते हुए देखा है। मैंने बांध की खासियत और लाभ जरूर किताबों से जाने पर बांध के पीछे की तस्वीर मेधा पाटकर और उन तमाम लोगों से समझे कि बांध बेघर किए जाने की लंबी दास्तान अपने पीछे छोड़ जाते हैं। बहुत कुछ खत्म हो जाता है बांध के निर्माण में। ऐसे कई और विरोधों में भी उनकी अहम भूमिका होती है। ऐसे ही दिल्ली विश्वविद्यालय का एक आंदोलन है जिसका नाम-'पिजड़ा तोड़' है। मुझे यह आंदोलन भी बेहद रचनात्मक लगता है। वजह, छात्राएँ वे तमाम तरह के कदम उठाती हैं जिनमें वे अपने गुस्से और असहमति को मजबूती से दर्ज़ करवा पाएँ। पोस्टर्स से लेकर गीत संगीत और रैलियों के जरिये प्रशासन की नींद उड़ा देती हैं। लड़की हो तो घड़ी की सुइयों के मुताबिक चलने की हिदायत देने वाले कॉलेज के प्रशासन को वे जतला देती हैं कि अब और नहीं चलेगा! ठीक इसी तरह हमारा दिन और हमारी रात वाले अभियान में भी लड़कियों का रात पर सड़कों पर उतरना और यह कहना कि रात में भी हमारा समय है और दिन में भी जैसे अभियान, औरतों के अपने अभियानों और आंदोलनों को पुख्ता करते हैं। फेसबुक से लेकर ट्विटर तक पर गलत के खिलाफ, आज़ादी की सांस के लिए दमदार महिला दस्तक नज़र आ जाती है।

अहिंसक विरोधों की भारत में लंबी परंपरा रही है। इसलिए बीएचयू के गेट पर धरने पर बैठी उन छात्राओं के विरोध को आधी आबादी के जागरण अभियानों में से एक अभियान समझा जाये तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा। ठीक इसी तरह और भी मजबूत दस्तक हो रही हैं। मैं अपनी बात रखने की कोशिश में हूँ कि आधी आबादी बोलना भी खूब जान चुकी है। नहीं दोगे हक़ तो छिन कर लेंगी। हलक से भी निकाल लेंगी, वो भी सलीके से! महाभारत के बाद अब बारी महाभारती लिखने की है।

Saturday, 23 September 2017

कुछ छवियों से परहेज़ करना चाहिए


इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर जमकर औरत और मर्द दोनों ही नवरात्र के इन दिनों में एक दूसरे से बाँट रहे हैं और प्रोफ़ाइल भी अपडेट कर रहे हैं। भारत में तस्वीरों का एक बहुत बड़ा बाज़ार है जिनके पीछे की वजह यह है कि यहाँ के अधिकांश देवी देवता चित्र में मौजूद हैं। सभी देवी देवताओं की कल्पना कर के उनको एक प्रभावी और खूबसूरत रूप दिया गया है।  इसके अलावा दिल्ली की परिवहन सेवा में हिन्दी सिनेमा से लेकर दूसरी भाषाओं के सिनेमा के कलाकारों ने भी तस्वीरों में एक बड़ी जगह बनाई है। फेसबुक के आ जाने से सोशल मीडिया का रंग कुछ इस तरह बदला कि नए तकनीकी कैमरों से हर कोई अपनी तस्वीर साझा का सकता है। मैं कभी किसी दूसरे देश नहीं गई इस लिए मुझे नहीं पता कि वहाँ का रंग तस्वीरों के मामले में कैसा है? लेकिन अपने देश के भी बहुत छोटे से हिस्से को ही जिया है। अधिकतर घर से। लड़की होने की बहुत क़ीमत तो चुकानी ही पड़ती है। इसलिए गर लोग यह समझे कि भारत के 29 राज्यों के आधार पर तस्वीर वाली बात कह रही हूँ तो वे सबसे पहले खुद की राय दिमाग में उगा लें। 


हमारे यहाँ बचपन से ही तस्वीरों से मुलाक़ात शुरू हो जाती है। अगर आप स्कूल में दाखिल होने जा रहे हैं तब यह निश्चित है कि आपका फोटो पासपोर्ट साइज़ में आना तय है। इसके अलावा स्कूल के ढेर सारे समारोह में भी आपकी तस्वीरों में ख़ास जगह तय ही होती है। लेकिन स्कूल से पहले आपको अपने पारिवारिक फोटो का हिस्सा होना ही होता है। सवाल यादों का होता है। छुटकी कैसी लगती है या फिर छोटू बचपन में कितना ताज़ा मोटा था, यह बात आगे चलकर तस्वीरें ही बताती हैं। इसलिए तस्वीरआपकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है।इससे पहले और कहाँ तस्वीर देखने को मिलती है? घर की दीवारों ने परिवार को कभी दगा दाग नहीं दिया। हिन्दू हूँ इसलिए कह सकती हूँ कि दीवारों पर मुख्य धारा के देवताओं और देवियों का श्रद्धा से कब्जा हुआ होता था। आज भी है पर अब जरूरत तारीख़ और त्योहारों तक सिमटी है। 

अब सोचती हूँ तब पाती हूँ कि मैं कितने प्रभावपूर्ण नज़रिये से सरस्वती माँ के कपड़ों, गहनों, गोरे रंग को, वीणा को और मोर को ताका करती थी। इससे अधिक लक्ष्मी और शेरवाली माता की तस्वीरें अव्वल दर्ज़े की प्रभाव छोड़ने वाली होती थीं। ज़रा सोचिए, जिन शेरों को देखने से ही सिहरन हो जाए भला उस पर कोई देवी सवार हो जाये तो बच्चा दिमाग भगवान जैसे तत्व को न माने तो क्या करे। इस सारी कहानी को कहने का यही मकसद है कि तस्वीरें बहुत ही प्रभावित करती हैं। और इसे मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर देना ठीक बात नहीं। इसलिए जब एक औरत की बहु भुजाओं वाली तस्वीर देखी तो मेरा माथा ठनका, भला औरत को यह क्योंकर देवी बनाने पर तुले हैं?

एक ही  व्यक्ति का बहुत से काम कर देना पहली नज़र में उसका गुण हो सकता है पर उसके ऊपर आरोपित छवियों का एक हिस्सा भी समझा जा सकता है। औरत के बहुत से हाथ बनाकर उसमें काम और व्यस्तता के सभी उपकरण जबरन रचकर क्या  साबित होता है? यही कि वह आला दर्ज़े की नौकरानी है। मुफ्त का श्रम किया करती है। उसके पास पढ़ने का या कुछ भी रचनात्मक करने का समय नहीं है। वह इतनी अव्वल है कि सभी काम करने के चक्कर में अपने को आईने में देखना भी भूल जाती है। उफ़्फ़ ! गजब है! यह औरत है या गधी?

लोग तारीफ़ करें तो करें इस छवि की, मुझसे न हो पाएगी। भला क्योंकर मैं अपने को इस छवि में देखूँ? या भला कोई क्यों मुझे इस छवि में उभारे? हो सकता है जब इस छवि की रचना हुई हो तब इसके पीछे अच्छी मंशा हो। लेकिन अब तो यह मुझे छुपा हुआ चाकू-मार क़त्ल लगता है। टीवी पर आने वाला एक विज्ञापन तो इतने भयानक है कि कई दिन मैं उसके बारे में सोचती ही रही। पति, पत्नी से दफ़्तर में नीचे के पद पर है और पत्नी किसी भी हाल में उसे जरूरी काम निपटाने को कहती है। घर जाती है और फोन कर कहती है कि खाना क्या खाना पसंद करोगे?...बस यहीं वह निहायती बेवकूफ लगती है। मैडम, आप दफ़्तर में तो खट कर आई हैं और अब घर में भी कीचन की रौनक बनेंगी।  

यह बात कौन नहीं जानता कि औरतें बहुगुणी होती हैं और कलाकार भी। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि वे इस लिबास को मनपसन्दगी से औढ़ती हैं। तीन चार स्केच पेन उठाए और लग गए कलाकारी में कि देखिये औरतें तो बहुभुज हैं। जो काम कोई न कर पाये वह काम ये कर लेती हैं। बात को ठहर कर सोचिए। 'सेल्फी विद डॉटर' जैसा काम नहीं कि मोबाइल आगे किया और फोटो खींचकर एफ़बी पर पोस्ट कर दी और महिला जागृति और सशक्तिकरण कर दिया। फोटो खींचने से मजबूती आती तो लोग अंबुजा सीमेंट का काम सेल्फी खींचकर कर लेते और रुपया बचाते। लड़कियों अपना दिमाग दौड़ाओ। ऐसी तस्वीरों के पीछे अपने गधी होने की बात को समझो जो दिन रात मशीन की तरह काम करती है। जिसका रूटीन और समय काम के नाम है। यार, तुम्हें क्या अपने लिए एक कप चाय बनाकर खिड़की से बाहर गली को देखने का मन नहीं करता? या फिर कोई अपना मनपसंद गाना सुनने का मन नहीं होता? कभी दिन में थकावट से दस्तक दे गई झपकी लेने का मन नहीं करता? करता तो होगा। तुम इंसान ही तो हो!  

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...