Monday, 12 October 2020

क्योंकि हम जानते हुए भी नहीं जानना चाहते


 मुझसे ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते. लेकिन आज पूछा गया-

"हम अपने आख़िरी वक़्त में अपनी ख्वाहिशों को छोटा क्यों कर लेते हैं? ताउम्र बड़ी-बड़ी ख्वाहिशों को पूरा करने में अपना जीवन गुज़ार देते हैं और अंत में जब मौत बेहद नज़दीक होती है तब एक चॉकलेट का टुकड़ा माँगते हैं या फिर पार्क में बैठना चाहते हैं या फिर अम्मी की गोद में सिर रखना चाहते हैं. ऐसा क्यों है?"

ये सवाल एक बड़ा होता हुआ बच्चा मुझसे पूछ रहा है. मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह का सवाल मुझसे पूछ लेगा. 

मेरे पास वास्तव में जवाब नहीं था. लेकिन बैठे बैठे मैं उस पूरी उम्र में तैरने लगी जो मुझे बचपन से याद है. स्कूल जाना,लड़की होना, ये नहीं करना और सिर्फ वही करना, नौकरी करना, फिर छोड़ देना, कई बार हार जाना और कुछ बार जीत जाना. अंत में सब बराबर हो रहा है. और एक दिन मेरा इस शहर से और इस जगह से द्रव्यमान भी ग़ायब हो जाएगा. छू मंतर!

मैंने जवाब देने की कोशिश की. मुझे नहीं पता वो बच्चा मेरे जवाब से कितना संतुष्ट हुआ. लेकिन मैंने उसे बताया-

"मुझे लगता है जन्म से जिस दुनिया में हम दाख़िल होते हैं, उस दुनिया के हम निर्माता नहीं होते. वो एक बना बनाया पैकेज होता है. उसमें न हमारी पसंद होती है और न ही हमारी नापसंद शामिल होती है. कई बार यह लगता है कि ये हमें पसंद है या फिर वो हमें नापसंद है, लेकिन आख़िर में वो सब कुछ हमसे कृत्रिम रूप से जुड़ा हुआ है. हमारे इस दुनिया में आने के साथ ही बनने की प्रक्रिया शुरू होती है. यह तय होने लगता है कि हमें क्या और कैसा बनना है जबकि इस बात पर हम बात नहीं करते कि जिस जगह हम कुछ बनने की तैयारी ले रहे हैं उस जगह की भूमिका आख़िर किसने तय की और वही क्यों हमारे लिए तय की गई है. 

 


 इस पूरी प्रक्रिया के दौरान क़ुदरत अपना हस्तक्षेप करती रहती है. उदाहरण के लिए चीज़ों के जन्म के बाद उसके खात्मे तक या फिर किसी फल को खाने के बाद उसका स्वाद या फिर समुद्र को देखने के बाद एक उचाट/खुशनुमा एहसास...यह दृश्य भी हो सकता है या फिर न दिखने वाला भी. मुझे यह बिलकुल नहीं पता कि हम अपने आसपास के भीतर ही सोचते रह जाते हैं या फिर उससे बाहर भी. कुछ लोगों ने मुझे बताया कि हिमालय में  जोगी रहते हैं. मेरे लिंग की वजह से मेरे भीतर यह पहला सवाल आता है कि जोगिनें क्यों नहीं? खैर, उन जोगियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संसार को त्याग दिया है. इसलिए वह स्व या फिर उस शक्ति की खोज में तप में ध्यान लगा देते हैं. लेकिन दो मिनट को रूककर मैं यह सवाल फिर से सोचती हूँ कि जोगी को भी तो एक बनाई हुई दुनिया मिली है. हाँ, दोनों में फ़र्क होगा. जोगी भी कोई नयी दुनिया नहीं रचते, वे उसी दुनिया में जा रहे हैं, जिसकी संकल्पना अतीत के किन्हीं टुकड़ों में हुई है. 

फ़र्ज़ कीजिए जब हम जन्म लेते तब अमीर और ग़रीब के कांसेप्ट की बजाय कुछ और होता तब हम क्या एयर कैसे बनते? 

इस बनने के अभियान में हम ख़ुद को खो देते हैं. जीना भूल जाते हैं. इसलिए जब ज़िंदगी हाथ से फिसलने लगती है तब क़ुदरत के मैसेज को समझने लगते हैं. हमको मालूम चलता है कि किसी बगीचे में बैठना कहीं बेहतर और मूल ख़ुशनुमा एहसास है बजाय किसी ऊँची इमारत के किसी एसी घर में बैठना..."


मैं और जवाब खोज रही हूँ. आप को क्या लगता है मैं ठीक बोल रही हूँ?

Wednesday, 8 July 2020

Hope

 

Hope is important. It is like fresh air. When times are dark and our expectations are betrayed, be sure, the time to hope is near. Hope is like an older sister, who gives you the warmth of care or an older brother who gives the sense of security. It is like a big green tree,that gives the joy of fulfillment.It is a golden ray of sunshine that shines through the dark. It is like a long night which gives you the patience to wait something good. Hope, my dear hope! You don't know what is in the other side of time. Hope is one's connection with universe. Hope makes you understand the real meaning of your life.

   *(with a help of a friend)   

Tuesday, 2 June 2020

अनलॉक द व्हिस्पर

घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी के साथ फिर से सब कुछ सामान्य होने की बात हो रही है. 'अनलॉकडाउन' शब्द राजनीतिक, सामाजिक, रणनीतिक, व्यापारिक, पारिवारिक स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन औरतों के संदर्भ में कोई भी जल्दी अपना दिमाग 'अनलॉक' करने के लिए राज़ी नहीं होता और न हो रहा है. यह इसलिए सोच रही हूँ क्योंकि सुबह सुबह किसी महिला से फोन पर बात हुई और उसने बहुत हिम्मत इकठ्ठा कर के बात की. मुझे कुछ देर लगी कि उन्हें पहली बात क्या कहूँ? उन्हें ऐसा क्या कहूँ कि उनकी फिल्ड में परेशानी कम से कम हो. कमरों में बैठकर, दूर दिल्ली में बैठकर और विशेष अधिकारों का मज़ा लेकर मैं क्या सोचूं और क्या बताऊँ मुझे समझ नहीं आ रहा था. फोन रखने तक मैंने उनको कुछ बातें कहीं और अपने माँ पापा से यह कहा कि मुझे गाँवों में महिलाओं के बीच काम करना है. वहाँ बहुत ज़रुरत है काम करने की. अगर किसी एक की भी ज़िंदगी या दिमाग में बदलाव आया तब कुछ तो बेहतर करेंगे ज़िंदगी में. तब से अब तक गाँवों में रहने के ख़तरे मुझे बताए जा रहे हैं. और मैं चुपचाप सुन और उबल भी रही हूँ. मैं उन पर कतई ग़ुस्सा नहीं कर रही हूँ लेकिन कुछ तो ऐसा है जिस पर मुझे ग़ुस्सा आ रहा है और बहुत बेजोड़ ग़ुस्सा आ रहा है. जो बात का विषय था वह माहवारी और पैड्स के संदर्भ में था.

पॉइंट 1.
महिला ने कहा कि जब वह पैड्स लेकर अन्य महिलाओं के पास जाती है तब लोग मज़ाक उड़ाते हैं.
ओह! मेरा सिर झुक जाता है. कुछ दर्द, कहीं उठने लगता है. महिलाओं का शरीर, दिमाग, उनका रहन सहन, मिज़ाज, आदतें, शैली, परिधान, भाव सब कुछ चुटकुला जगत के लिए मसाला ही रहा है. लेकिन क्या माहवारी भी मज़ाक है? आपको मालूम है शरीर से खून बहना और लगातार कई दिनों तक बहना कितना ज़्यादा असहनीय है. सोचकर देखें तब यह महसूस होता है कि मेरी पूर्वजाओं ने कितना सहन किया होगा और हम कर रही हैं. हम औरतों और लड़कियों की ज़िंदगी सिर्फ हमारी माँ तक तो नहीं जुड़ी है बल्कि एक श्रृंखला है जिसमें हम सब अच्छी तरह से गुंथे हुए हैं. नाम याद नहीं आ रहा उस फिलोस्फ़र का जिसकी लिखी पंक्ति पढ़ी कि हम सब में कुछ एक जैसा है. वही एक जैसा हम सब औरतों में भी है. इसलिए अगर यह मज़ाक बनाने वाली महिलाओं से भी पंक्ति जुड़ी है तो उन्हें हम समझा सकते हैं कि यह मज़ाक नहीं एक व्यावहारिकता है और हम सब इससे यानी खून बहने की प्रक्रिया से गुज़रते हैं.  हमारी साथी औरतों को भी कई बार हमें बताने की ज़रुरत पड़ जाती है. इसलिए मैं समझती हूँ कि आपसी बाचीत से उनके बंद पड़े विचारों को 'अनलॉक' किया जा सकता है.

अगर हमआपस में ही महिलाएं मज़ाक मज़ाक खेलती रहेंगी तब पुरुष को कैसेइसके प्रति सामान्य बनाएंगी या कैसे पुरुष के लिए इस विषयको कठिन औरशर्म का बनाने के बजायव्यावहारिक बनायेंगी? अक्सर जब भी माहवारी का पुरुष लोगों के मध्य ज़िक्र आता है तब हम ख़ुद मुँह सी लेने की चेष्टा करने लगती हैं जबकि आपको उनको बतलाना चाहिए कि आप माहवारी में हैं और शरीर की परेशानी से गुज़र रही हैं. या फिर यह पैड अच्छा होता है या नर्म होता है! मुझे लगता है बात होनी ही चाहिए, फिर चाहे जैसे भी वाक्य हों!

अगर यह पोस्ट पुरुष लिखता तो सोच रही हूँ क्या लिखता? वह क्या शब्द इस्तेमाल करता जिससे वह महीने से जुड़े मज़ाक को तोड़ कर मिट्टी-मिला बना देता? मैं कोशिश भी करूँ तो उस ख़याल की बुनाई अभी नहीं कर पा रही कि पुरुष क्या कहता, अगर वह समझदारी से इस पर सोचता. इसलिए मैं यह कहूँगी कि उसे सबसे पहले अपनी बेटी और पत्नी के लिए हर महीने पैड्स लाकर घर में रख देने चाहिए, जिस तरीके से वह घर का बाक़ी ज़रूरी सामान लाकर रखता है. जैसे नमक के बिना आप खा नहीं सकते. वह ज़रूरी वस्तु है, ठीक उसी तरह से आपकी बड़ी होती बेटी के आराम के लिए भी आपको यह करना चाहिए. अगर आपकी बहन है तो बहन के लिए कीजिए, बड़ी दीदी है या भाभी है तो लाकर रख दीजिए. बात अब सेनिटरी पैड्स को काली पोलीथिन में या अख़बार में चुपके से लपेटकर तो पूरी नहीं की जा सकती. इसमें शर्म जैसा कुछ भी नहीं है. शर्म तो तब आनी चाहिए जब घर का मुखिया अपनी दारू को ज़रूरी समझता हो या फिर नौजावन होता भाई, अपनी बहन की माहवारी पर शर्म खाकर कुछ न कहता हो. क्या ग़लत कह रही हूँ? बहन को इज्जत बनाकर तब्दील करने में सीना चौड़ा हो जाता है तो बहन को भी तो हक़ या मौका दो कि भाई पैड्स ख़रीदकर लाया है, मुझे नाज़ है भाई पर, कहने का! क्या भाई बहन के लिए अपने विचार और व्यवहार को बदल लेने में कमजोर हैं? नहीं न. उन्हें दिमाग 'अनलॉक' करना ही पड़ेगा. इसमें ग़लत क्या है?

टीवी की दुनिया और न जाने किन किन साधनों से पुरुष ने औरत की मादक और कामुक छवि का जिस्म अपने ख़यालों में हजारों साल से लपेटा है वही औरत भीतरी तौर पर मज़ाक क्यों लगती है? अप्सराओं को भी तो पीरियड्स आते ही होंगे. भीष्म पितामह की माँ गंगा मैया को भी आता होगा, तभी तो पितामह जन्में. देवकी मैया को भी तभी तो कृष्णा जन्म लेकर क्या क्या बनें और बनाए जाते रहे! तो पुरुषों, आपको इसमें मज़ाक बनाने का क्या मसाला मिल रहा है मुझे नहीं मालूम जबकि तुम्हारी हैसियत ही इसी से उभर रही है. शरीर के भीतर के पुर्जे अपने को दुरुस्त फंक्शन में रखते हैं तभी तो शरीर का स्वास्थ्य बना हुआ है. यह पीरियड, माहवारी उसी का एक हिस्सा है!

तुम्हें शर्म नहीं ?
लो जी मैंने काम ही क्या किया जो मुझे शर्म आनी चाहिए? शर्म किस बात पर आनी चाहिए? इसकी लिस्ट बना सकते हैं लेकिन तब क्या आप अपनी लिस्ट भी बनाएंगे. कम से कम पढ़ाई लिखाई को इस दर्ज़े का तो होना चाहिए कि शर्म होती क्या है, समझा सके. शर्म यह नहीं है कि आप हाथ में सेनेटरी पैड लेकर खड़ी हैं या उसका इस्तेमाल कर रही हैं. शर्म जैसा मायावी जाल कहाँ से उड़कर हम औरतों के सिर पर बोझ बना हुआ है मुझे सोचने की दिलचस्पी अभी कम है. अगर औरत किसी लड़के को पसंद करती है तो हाय तौबा, तेज़ हँस दी तो हाय तौबा, ब्लाउज का कट ज़रा डीप हो गया तो हाय तौबा, बाल कटवा लिए तो हाय तौबा...कोई ऐसी जगह है जहाँ हाय तौबा और शर्म की बात न की जा सके. इसमें शर्म जैसा क्या है? शर्म तो तब है जब इसे जानते हुए नज़रन्दाज़ कर दिया जाता है.

आपको एक वाकया बताती हूँ. जब मैं 7वीं में थी तब हमारी क्लास की एक लड़की महीने के दिनों में पेट पकड़कर अचानक रोने लगती थी. मुझे यह समझ नहीं आता था कि अचानक ऐसा क्या हो जाता था कि उसकी यह हालत हो जाती थी. उसकी आँखें खून में डूबी लाल हो जातीं और आँसूं तेज़ी से गिरने लगते. उसका शरीर कुछ इस कद्र दर्द में डूब जाता कि मुझे देखकर नितांत घबराहट होने लगती और बार बार टीचर के आने की राह देखती कि कब वह आये और उसे अस्पताल ले जाए या दवा दे दें. उस दिन मुझे बेहद अजीब सा महसूस होता. चूँकि मेरी उम्र कम थी और मुझे अभी तक पीरियड्स शुरू नहीं हुए थे इसलिए कुछ ख़ास नहीं पता था. क्लास की लड़कियां जिनको होता था वे यही कहती थीं कि इसमें तो दवा नहीं दे सकते! लेकिन मेरा छोटा दिमाग यही कहता कि आख़िर क्यों? हालाँकि मैंने घर में अपनी माँ साहेब को इससे जूझते हुए देखा भी था और शायद नहीं भी. क्योंकि माँ हमेशा ठीक ठाक ही रहती थी. हमेशा काम में लगी रहने वाली मशीन. मेरी बहनें भी माँ की नक़ल ही थीं. मुझे कोई ख़बर नहीं थी कि यह होता क्या है? मेरी दीदी के पास विस्पर पैड्स हुआ करते थे जो सफ़ेद-साफ़ होते थे. एक दिन मैंने उन्हें हाथों में लेकर उन पर हाथ फेरा तब इतना अच्छा अच्छा महसूस हुआ कि बता नहीं सकती. हालाँकि दीदी का डर था तो जल्दी से समेटकर यथास्थान रख दिया.

आज जब उस दृश्य को याद कर रही हूँ तो उसके दर्द को महसूस कर रही हूँ और चाहती हूँ कि आप भी महसूस करें. यह शर्म नहीं है बल्कि यह कुछ लोगों के लिए दर्द भरा है. आपको तो उन दिनों उन्हें आराम देना चाहिए, कमर पर हल्की मालिश कर देनी चाहिए, सिर पर तेल लगा देना चाहिए, कुछ बेहतरीन बातें करनी चाहिए. अपनी माँ को थपथपाते हुए दिन में एक से डेढ़ घंटे सुला देना चाहिए. ठीक यही काम बहन के साथ भी करें. लड़कियों की अश्लील छवि कब तक बनाएंगे? कभी तो ज़मीन पर आकर सोचें कि आपके मज़ाक में किसी का दर्द चुपचाप बैठा है. किसी को इस पर काम करने के लिए हौसला दें न कि उसे शर्म का बासी ताबीज़ बेचना शुरू कर दें.

मुझे नहीं शर्म आती इस पर बात करने पर! फिर आपको क्यों आ रही है? इसमें अश्लील हँसी जैसा कुछ नहीं है! समझदारी दिखाइए और समझिये यही काफी है.

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फोटो गूगल से साभार                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            

Sunday, 26 April 2020

...और इस तरह बुलबुल की आवाज़ गुम हो गई!

आप आधी रात तक जगे हैं और अपने आप को बिना बात के रोते हुए देखते हैं. शायद बहुत सी वजहें हों पर आपको ठीक से नहीं पता कि आप किस वजह से रो रहे हैं. आप अपनी दोस्त को मैसेज करते हैं और कहते हैं कि आप ठीक होना चाहते हैं, आप अपने पर काम कर रहे हैं. आपकी दोस्त आपको संभालती है और कुछ बातें करती है. वह आपको मेडीटेट करने के लिए कहती है. और भी काफी कुछ कहती है. लेकिन आप उसे मैसेज से यह कन्वे करने में सफ़ल होते हैं कि आप रो नहीं रहे आप ठीक हैं. आप थके हुए हैं पर नींद नहीं आ रही. आप कई दिनों से इसलिए भी परेशां हैं क्योंकि आपके जानने वाले बड़ी तादाद में आपको फोन कर आपकी हालत का जायज़ा लेना चाहते हैं. लेकिन आप इस रात में कहीं अटक गए हैं. उसी वक़्त आपके किसी और परिचित को आपके बारे में पता चलता है और वह फोन करता है. आप फोन नहीं उठाते. आप एक व्हाट्सएप पर स्टेटस लगाते हैं कि आप ठीक हैं लेकिन बात करने की हालत में नहीं हैं. ठीक होने पर सबको फोन करने की कोशिश होगी. आप उनको उनके केयर और कंसर्न के लिए शुक्रिया भी कहते हैं. लेकिन आप रो रहे हैं. चुपके से. आपके रोने के बारे में घर में किसी को ख़बर नहीं. होनी भी नहीं चाहिए वरना इमोशनल ब्रेक डाउन हो सकता है, आपका पहले से है. बाक़ी लोगों का आपको देखने के बाद. 


लॉक डाउन में कुछ ऐसे ही हालात हैं. खानपान ठीक है पर वह नाम के लिए है. आपके गले में हल्का सा भी कुछ दर्द है तो आप अपना आंतरिक और मानसिक मुआयना करने लगते हैं. आप गले को छूकर देखते हैं कि आपको दर्द किस हिस्से में है? आप डर जाते हैं कई बार, क्योंकि आपके पेरेंट्स ओल्ड एज में हैं. आपको लगता है कि कहीं कुछ ग़लत न हो जाए. यह ग़लत क्या है? आप रुकते हैं और फिर अपने गले पर हाथ फेरते हैं. आपको थोड़ा फिलोसफी से भी जीना आना चाहिए, ये आप सोचते हैं और उठ बैठते हैं. यह सिलसिला सुबह तक चलता हैं और आपको इस दौरान नींद का झोंका भर आता है. जब आपका नाम जाँच के लिए लिखा जा रहा था, उस दौरान आप सवालों के जवाब किसी मशीन की तरह दे रहे थे. आप सोचते हैं कि ये सब कब ख़त्म होगा? लेकिन इसी समय आप ये भी सवाल करते हैं कि ये सब कभी ख़त्म भी होगा?

आप कई दिनों से यह महसूस कर रहे हैं कि आप की आवाज़ जो काफी ठीक ठाक थी वह कहीं गले के अंदर अधूरे रास्ते में अटक गई है. आप के अंदर सब कुछ भरा हुआ है लेकिन आप बात करने में असमर्थ हैं. आपको पता है. ये वास्तव में खौफ़नाक है कि आप बोल नहीं पा रहे हैं, जबकि आप बोलना, बात करना या थोड़ा बहुत गा लेना जानते हैं. आपका एक दोस्त टेलीग्राम पर कर्ण से जुड़ा एक लेख जो जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था, भेजता है. आप उसे पढ़ते हैं और कुछ कोशिश में आप उसे पूरा पढ़ लेते हैं. आपको खुन्नस आती है कि ये क्या चल रहा है? कर्ण, महाभारत या रामायण का मतलब क्या है, इस मौके पर? आप को लेखक क्या कहना चाहता हैं, भी ठीक से समझ नहीं आता और आप अपने दोस्त से कहते हैं कि लेखक को अपनी बात साफ़ लिखनी चाहिए थी. आप साथ में एक लाइन और लिखते हैं- "ढोंग लगेगा, लेकिन जो बच्ची अपने गाँव से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर मार दी गई उसकी पहचान करें या उसे क्या जवाब दें.., इस घटना और इसी तरह की घटनाओं को देखकर, पढ़कर रात भर नींद नहीं आती." आपका दोस्त अंग्रेज़ी में 'same' लिखकर जवाब देता है. 

आप बैठ गए और सोचते हैं. आप सोचते हैं कि इस वजह से आपकी आवाज़ चली गई? आप फिर उन तमाम घटनाओं को सोचते हैं. आप सारी मौत का सोच रहे हैं. आप कभी अमरीका नहीं गए लेकिन जब वहाँ से मौत की ख़बरें आती हैं तब आप फिर रात में अपने आप को रोते हुए पाते हैं और किसी को खोजते हैं, बात करने के लिए. लेकिन दुःख की बात यह है कि आप अपनी आवाज़ खो चुके हैं. आप बोल नहीं पा रहे. इस दौरान आपके कॉलेज के बच्चे आपके साथी आपकी फ़िक्र करते हैं और वो सवाल करते हुए आपसे बात करना चाहते हैं. पर आप कैसे बताएं कि उनकी दोस्त और टीचर जो लेक्चर्स में कितनी बातें रखती थी, करती थी उसकी आवाज़ खो गई है. वह गुम गई है. वह हर जगह से ग़ायब हो जाना चाहती है. वह हर उस जगह और लोगों से कट जाना चाहती है, जो उससे बात करना या रहना चाहते हैं. आपको लगता है कहीं आप पागल तो नहीं हो रहे? लेकिन बात इतनी बड़ी नहीं है. बात महज यह है कि आपकी आवाज़ आपके भीतर घूम रही है लेकिन वह बाहर आकर ख़ुद को जाहिर नहीं करना चाहती. आप उसे भी परेशान कर देते हैं जिसे आप चाहने लगे हैं. आप अपनी ही कही बातों को ख़ारिज करते हैं. आप क्या क्या कह जाते हैं आपको ख़ुद नहीं मालूम. फिर भी वह आपके साथ बना हुआ था/है, क्योंकि वह जानता है कि आप ठीक नहीं हैं. इसलिए सम्भावना यह है कि वह जिसे आप चाहने लगे हैं अब 'था' में रहने लगा है. लेकिन उसे भी यह नहीं पता कि आप अपनी आवाज़ कुछ रोज़ पहले कैसे खो चुके हैं! है न भयानक? यह बात आपको सिर्फ आपको और पहले पैराग्राफ़ में आई दोस्त को पता है. शायद आपका मानस भी यह बात जानता है. एक एक कोशिका भी. 

आवाज़ खो जाने से क्या होता? बहुत कुछ! आपकी आँखों को बात करनी पड़ती है. उन्हें हर एहसास जाहिर करना पड़ता है. आँखों को हर रोज़ चौकन्ना रहना पड़ता है कि कहीं आवाज़ खो जाने के बारे में किसी को पता न चल जाए. आप फैले हुए आसमान के नीचे जाते हैं और उसे देखते हैं. लेकिन इस दौरान आप भूलते भी हैं. जैसे आप भूल गए कि आँखों का असली काम क्या होता है? आप भूल गए कि आपने फ्रिज का दरवाज़ा कौन से सामान को निकालने के लिए खोला था. आप कंफ्यूज हो जाते हो. आपकी कन्फ्यूज़न की गवाही आपका ख़ुद का कमरा देता है, क्योंकि वह आपकी तरह ही बिखरा पड़ा हुआ है. वह भी फीका सा पड़ा हुआ कहीं गुम हो चुका है. आपने कुछ दिन पहले ही यह तय किया था कि इस कमरे की दीवार को यह रंग देंगे, तो कितनी अच्छी फीलिंग आया करेगी. लेकिन आपकी योजना मर गई क्योंकि आप 1 मार्च की तारीख में दंगे के बीच में घिरे हुए थे, आप बहुत सी मौतों की ख़बरों से गुज़र रहे थे और फिर इस बीमारी के खौफ़ में जी रहे हैं. लेकिन यहाँ खौफ़ से भी गहरी बात है. वास्तव में आवाज़ जाने के कारण के पीछे कई कारण हैं. एक यह भी है कि जो लिस्ट आपने संक्रमित लोगों की देखी उसमें वे बच्चे भी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर आप शाम के वक़्त खेलते हुए देखते थे. शोर मचाते हुए पाते थे. शायद उन बच्चों ने चिड़ी या फुटबॉल से मारा भी होगा. शायद किसी ने चिल्लाकर कहा होगा- 'दीदी जल्दी हटो! आपको बॉल लग जाएगी.' 

आप अभी उन बच्चों की आवाज़ को अपने भीतर इकठ्ठा कर रहे हैं. हर उस बच्चे के दर्द को भी अपने अंदर रख रहे हैं जो लॉकडाउन के चलते रास्ते में मर गए. कुछ भूख से भी मर रहे हैं. लग रहा है आवाज़ जाने का ये भी एक और कारण है. फ़िलहाल ठीक से समझ नहीं आ रहा कि आवाज़ गुम कैसे हो गई? दोस्त के अलावा किसी को नहीं बताया कि आवाज़ चली गई है. लोग इसे ढोंग समझें शायद. बाक़ी जाने क्या क्या..! लेकिन सच्चाई तो यही है कि आवाज़ चली गई.

Friday, 24 April 2020

ब्लैक औरतें

                                         

आज लॉकडाउन का नहीं पता कौन-सा दिन है! यहाँ सभी के साथ ऐसा ही हो रहा है. दिन भर एक बेचैनी हम लोगों का पीछा करती है. जब शाम ढलती है तब थोड़ा थोड़ा बेहतर महसूस होता है. अब इस थोड़े थोड़े में ही हम जी रहे हैं. अगर लोगों के पास फोन न हो तो वो पूरी तरह से पागल हों जाएँ. यहाँ ऐसे लोग नहीं जो पढ़ाई लिखाई की बातें सोचें या कुछ लिखें. ख़ुद मेरे घर में यह माहौल नहीं. यहाँ के लोग अक्सर दूकान से सौदा लाते हैं तो अपनी एक कॉपी पर लिखवा लेते हैं. इसके अलावा बेहद कम घरों में अख़बार आने की व्यवस्था है. वाजिब है कि पहले तो घर में रोटी ही आनी चाहिए. कितना अजीब है न इस विकसित ज़माने में रोटी और अख़बार एक साथ नहीं आ पा रहे. वैसे ठीक भी है. अख़बार का जहर आजकल बर्दाश्त नहीं होता न!

    यहाँ बहुत से प्रवासी किराएदार हैं जो मजदूरी करते हैं या किसी फैक्ट्री में काम करते हैं. किसी का बहुत बड़ा काम नहीं है. लोगों की सरकारी नौकरी भी यहाँ नहीं है. इसलिए सबके रहन सहन में बहुत अधिक फ़र्क नहीं है. सबके यहाँ वही खाना बन रहा है जो किसी दूसरे के यहाँ बन रहा है. रोटी, सीज़न की सबसे सस्ती सब्ज़ियाँ, सीज़न के सबसे सस्ते फल और दूध, थोड़ा बहुत! कहने का मतलब यह नहीं है कि यहाँ अमीर लोगों की संख्या नहीं हैं, बल्कि है. काफ़ी लोग बहुत पैसे वाले हैं जो अपनी ख़ूबियों और सरकारी ख़ामियों से पैदा हुए हैं. यहाँ कुछ परिवारों ने पानी की बोरिंग करवा रखी है. उस पानी को बहुत महंगे दामों पर मिनटों के हिसाब से बेचा जाता है. पानी के काम में बहुत पैसा है. लोग पानी नहीं लेंगे तो मर जाएंगे. इसलिए यह धंधा जोरो पर है. इतनी पार्टी की सरकारें बदलीं लेकिन हर पार्टी इन बोरिंग वालों के प्रति वफादार निकली. आगे की ओर रोड के मुहाने की तरह जो बिल्डिंग हैं वो घर कम, बिल्डिंग ज़्यादा हैं. वहाँ बेहद अमीर लोग अपने छज्जों से सुबह सूरज देवता को नमस्कार करते हैं. पौधों को पानी डाला नहीं जाता बल्कि उनको गला दिया जाता है. यह सोचा जा सकता है कि चार लोगों में इतना बड़ी बिल्डिंग की ज़रुरत ही क्या है! ज़रुरत है. किरायेदारों को रखना भी अच्छा धंधा है. इन घरों में अमूमन ब्लैक प्रवासी लोग रहते हैं जो किसी भी क़ीमत पर कमरा ले लेते हैं.

    अगर वो लेंगे नहीं तो जाएंगे कहाँ? वे लोग पता नहीं अपना खूबसूरत मुल्क छोड़कर यहाँ क्यों रहते हैं? यहाँ जब वो सुबह कहीं जाने के लिए कमरे का ताला लगा रहे होते हैं तब उनके जाने के बाद मकान मालिक का लड़का उनके काले रंग का मज़ाक बना रहा होता है. लेकिन यही रंग इन काले प्रवासियों की बीवियों की छातियों को देखकर उन्हें बुरा नहीं लगता. वे इस तरह से देखते हैं जैसे वे उसके साथ दिन में, ठीक उसी पल में सो रहे हैं. हाँ, यहाँ कई आँखों में आपको ऐसा ही लगेगा. यह गन्दगी इतनी बदबूदार है जितना कूड़ा कचरा नहीं होता. यह बहुत महकता है लेकिन दिन के सामान्य उजाले में यह किसी को नज़र नहीं आता. यहाँ की औरतें जो ख़ुद घरों में बच्चे पैदा कर चुकी हैं और रोज़ अत्याचार झेलती हैं, इन काले प्रवासियों की पत्नियों को देखकर मज़ाक उड़ाती हैं. मुँह पर साड़ी या दुपट्टे के पल्लू रखकर- हाय! तौबा तौबा...करती रहती हैं. पर एक बात आपको जाननी चाहिए. वो यह कि इन्हीं औरतों की बेटियाँ और बेटे जब स्कूल से छुट्टी होती है तब इस तरह के शब्दों में बात करते हैं कि दो मिनट को आप हैरान होते हैं कि ये लोग जो सभ्य बने फिरते हैं, जो काले प्रवासियों की पत्नियों, बहनों, और औरतों को देखकर उनका मज़ाक उड़ाते हैं या आहे भरते हैं, वे उन सब कामों में शाब्दिक या शारीरिक तौर पर शामिल हैं. शाम को, दोपहर को मैंने उस नौजवान भीड़ में यह सब सुना और देखा है जो लोग बाहरी तौर पर गन्दा और बुरा मानते हैं. लेकिन मुझे तसल्ली इस बात की है कि ये स्कूल के लोग इन काली प्रवासी औरतों का थोड़ा कम मज़ाक उड़ाते हैं. लेकिन यकीन मानिए, मज़ाक उड़ाते तो वे भी हैं. 

    यह दोहरापन यहाँ के लोगों में ख़ूब मिल जाएगा. यहाँ नयी नयी शादी होकर आई दुल्हन को तबियत ख़राब होने पर बाइक पर बैठकर उसका पति, मालिक, बोस, जी, सुनो...आदि आदि उसे घूंघट में लपेटकर ले जाता है. लेकिन दिलचस्प यह भी है कि जब वह अपनी बीवी को डॉक्टर के पास इलाज कराने ले जा रहा है तब अगर उसे रास्ते में काले प्रवासियों में से कोई महिला दिखती है तब वह उसकी छाती देख लेता है. वह इतनी देर देखता कि आगे से आने वाली बाइक से उसका एक्सीडेंट हो सकता है. लेकिन इस काली प्रवासी महिला को कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि उसे अब रोज़ इस तरह के हादसों की आदत हो गई है. यह न दिखने वाली हिंसा है. उसके साथ शुरू शरू में बहुत हिंसा हुई और अब उसने इसका प्रतिकार थोड़ा बंद कर दिया है. लेकिन अगर किसी ने उसके शरीर को छुआ तो हो सकता है वह वार कर दे. 

    लेकिन इस बाइक के पीछे बैठी औरत जो घूंघट में है, जो औरत कम, पाली हुई बकरी ज़्यादा है, जिसका रंग गोरा है, जो शायद उतनी भी पढ़ी लिखी नहीं है, जो थकी हुई या बंधी-फंसी हुई है, वह चुपचाप पीछे बैठी है. जब उसके पति की बाइक काली प्रवासी महिला की छाती देखने के चक्कर में लड़खड़ाई तो इस पाली हुई बकरी का ध्यान हड़बड़ा गया. वह भी लड़खड़ा गई और उसने झटके से अपने पति के कन्धों को कसकर पकड़ लिया. उसका ध्यान सामने वाले यानी बाइक वाले पर गया. वह शायद कुछ नहीं बोली होगी. क्योंकि उसकी तो तबियत ख़राब है. उसका रंग गोरा है इसलिए अमीर बाप के बेटे से जिसके पास एक बाइक पहले से थी, ब्याह दी गई. पाली हुई बकरी के बाप ने अपने नए नए दामाद को रॉयल एनफील्ड बाइक तोहफे में दी जिसे आज भी लोग दहेज़ कहते हैं. लोगों को का क्या, वे तो कुछ भी कहते हैं. लेकिन देखिए, लड़की के पिता जो उसका बाप भी है, ने उसे कुछ भी नहीं दिया सिवा कुछ गहनों के. वे चाहते तो उसके नाम एफडी कर सकते थे. लेकिन लड़की के पिता ने पहली बात तो बैंक में एफडी करना नहीं सीखा. लेकिन अगर कुछ ने सीखा भी तो वो बकरी उर्फ़ लड़की के नाम से इसलिए रखा ताकि जब उसकी शादी हो तो उसकी शादी में जाने पहचाने लोगों को खाना खिलाया जा सके, टेंट लगवाया जा सके, सजावट की जा सके ताकि लोग यह न कह दें कि इन्हों ने लड़की की शादी में कम ख़र्चा किया. उन एफडी के रुपयों से बहुत कुछ हुआ जो उस लड़की के नाम से थे पर उस लड़की उर्फ़ बकरी के नाम से नहीं हुआ. 

    हाँ तो यही बकरी उर्फ़ लड़की उर्फ़ पत्नी अब बाइक के पीछे बैठी है और इलाज करवाने जा रही है. जब वह घर लौटेगी तब उसे घर के काम भी तो करने हैं. ऐसे कैसे बैठ सकती है? लेकिन कुछ बकरियां उर्फ़ बहुएं ठीक हैं, क्योंकि उन्हें काम करने वाली औरत की मदद मिली हुई है और ये मालकिन बकरियां इन काम करने वाली असली औरतों पर बेहद ख़तरनाक नज़र बनाए हुए रखती हैं ताकि वे घर के सामान या उनके पति की चोरी न कर बैठे. कहीं सुस्ता न ले. काम के रुपए भी तो वसूलने हैं. अगर नहीं वसूले तो कितना नुकसान हो सकता है. 

    तो ये पाली हुई बकरी गर्भवती है. उसका इसी उम्र में बच्चा होगा. कुछ महीनो बाद प्रसव हुआ और बच्चा हो गया. बच्चे की तबियत ख़राब है. वह बच्चे को बाइक पर लेकर बैठी है. मैनेज कर के. उसका पति फिर लड़खड़ा गया और वह औरत उर्फ़ बकरी गिर गई. इस बार ज़ोर से किसी कार से टक्कर हुई. अगर वह छातियों के बजाय सामने देखकर आराम से बाइक चलाता तो ऐसा नहीं होता. लेकिन अब ऐसा हो गया. कुछ भी नहीं बदला जा सकता. कुछ भी नहीं. जच्चा और बच्चा दोनों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत हो गई. लड़की के पिता जिन्होंने लड़की के लिए नहीं बल्कि उसकी शादी के लिए एफडी की थी आए, और ख़ूब रोने लगे. दहाड़कर. बोलने लगे डॉक्टर सही समय पर देख लेता तो मेरी बच्ची मरती नहीं. बच जाती. मैंने उन्हें रोते हुए देखकर ख़ामोशी से कहा अगर शादी के लिए रखी एफडी से उसे ही डॉक्टर बना दिया होता तो वह ख़ुद बाइक से गिर रही बकरियों की मौतों को रोक देती. वो कितनी बकरियों उर्फ़ लड़कियों को बचाती. मुझे तो अफ़सोस है. मैं कर भी क्या सकती हूँ. लोग कह रहे थे गाड़ी वाले की गलती से हुआ. पति या मालिक चुप था. लेकिन सच कहूँ, ये सब उन काले प्रवासियों की औरतों जो बड़ी बड़ी छाती वालियां हैं, उनके कारण हुआ.     

    ओह! बताना भूल गई. अख़बार में ख़बर छपी है कि आजकल लॉकडाउन में घरेलू हिंसा बहुत बढ़ गई है. बाक़ी भी ख़बरें हैं. पढ़ते हैं फिर बात करते हैं. 

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फ़ोटो गूगल से
  

Tuesday, 21 April 2020

'सील्ड और लकी' के बीच में रहने वाले लोगों के लिए

वैसे तो क़िस्मत वाली बात नहीं करनी चाहिए. लेकिन अभी कहना ही पड़ेगा. अगर आपका एरिया सील्ड एरिया नहीं है तो आप बहुत क़िस्मत वाले हैं. जी हाँ, आपकी क़िस्मत शानदार है. आप सुरक्षित हवा में साँस ले रहे हैं. आपको खाने पीने का सामान मिल जा रहा है. आपको पीने के पानी की चिंता नहीं है तो आप बड़े भाग्य वाले हैं. अगर आपको नहाने धोने का पानी मिल जा रहा है तो आप क़िस्मत वाले हैं. अगर आप सारी दुनिया के दुःख भूलकर रामायण और महाभारत का मज़ा ले रहे हैं तो आप हीरा क़िस्मत के मालिक हैं. अगर आपके अपने सब ठीक हैं तो भी आप अच्छे सितारे वाले हैं. अगर आपके बच्चे अभी भी ख़ुश होकर आपके आगे खेल रहे हैं तो आप क़िस्मत वाले हैं.आप लकी हैं

ये क़िस्मत आपके लिए तभी तक है जब तक आप घर में हैं. घर से मत निकलिए. एक रोटी कम खा लीजिए लेकिन घर से बाहर मत निकलिए. हालात बेहद गंभीर हो चुके हैं. जो अनुभव कर रही हूँ वह आप लोगों के लिए लिख रही हूँ. हम सील्ड हो चुके हैं. पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है. दुकानें बंद हैं. गलियों के मुहाने पर पुलिस बैठी हुई है गिद्ध की नज़र लिए हुए कि कोई अंदर से बाहर न आ जाए. पुलिस वालों में भी दहशत है. बहुत दहशत. वे दिन रात काम कर रहे हैं. वे हमारे यहाँ आये और टेस्ट के लिए ले जाए जा रहे लोगों की संख्या बता गए. वो ये भी बोले कि तुम सब मर सकते हो अगर घर में नहीं रहे. मुझे जिसने यह बात बताई वे बोले कि पुलिस वाला बेहद हताशा में था. शायद अंदर से डरा भी हुआ था. हमें नहीं पता कि ले जाए गए हमारे निकट पड़ोसियों को कहाँ ले जाया गया है. लेकिन जो संक्रमित लोगों की सूची आई है उनमें बच्चे भी शामिल हैं, हमें यह पता है. महज सात साल के बच्चे भी. कुछ दिनों से जो दहशत, डर और धक्का लगा वो इन्हीं बच्चों और बुज़ुर्ग लोगों के लिए लगा. बहुत मुश्किल है साँस लेना इस तरह. अंदर यह एहसास आ गया है कि आप चूहों की तरह हैं और आप चाहे संक्रमित हैं या नहीं लेकिन आपको पिंजरे में रखा गया है. आपकी जान का मूल्य सिर्फ आपको है. सरकार पर कुछ नहीं कहना चाहती. मुझे नहीं पता कि कहाँ क्या वे लोग कर रहे हैं? शायद बहुत ही कर रही है. यह पोस्ट सरकार पर है भी नहीं.


मुझे कई दिन लग गए इस पोस्ट को लिखने में. मैंने इस दौरान कई लोगों को रोकर परेशां भी किया. मैं निरंतर अपने लोगों से संवाद में हूँ. तब भी मानसिक स्तर हिला रहता है. अभी कुछ स्थिरता है तो आप लोगों के लिए यह पोस्ट लिख रही हूँ. आप लोग घर से बाहर मत निकलिए. आपको नहीं पता कि हम दुनिया से कटा हुआ महसूस कर रहे हैं. हमारे घरों के ऊपर जो आसमान है बस वही रह गया है जो हमें यह बताता है कि बाहर की दुनिया से आप आसमानी तौर पर जुड़े हुए हो. बस आसमान ही है जो हमारी ज़िन्दगी में बाहर की दुनिया को जोड़े हुए हैं. हम सभी लोग (जो आसपास के घर हैं) न तो हँसते हैं और न रोते हैं. बस एक जबरन ओढ़ी हुई चुप्पी और दहशत के साथ जी रहे हैं. जो लोग चिल्लाकर 'सी फ़ूड' खाने की सलाह दे रहे हैं, बेशक उनकी सलाह ठीक होगी पर हमारे यहाँ के लोग अपनी भूख को इसलिए जिंदा किये हुए हैं कि वे अगर इस आपदा में बच गए तो ठीक है वरना स्वाद के लिए कोई नहीं खा पा रहा. हम सील्ड एरिया के लोगों को किसी की हमदर्दी नहीं चाहिए. इतनी उम्र और दहशत देखकर हमने एक दूसरे को हमदर्दी देना सीख लिया है. बस हम यह बताना चाहते हैं कि आप लोग अपनी ख़ुशकिस्मती बरक़रार रखना चाहते हैं तो घर पर रहिये. अपने लोगों के लिए रहिये. समाज के बाकि लोगों के लिए रहिये.

एक बात और. न्यूज़ चैनल्स ने हमारी जगह की रिपोर्टिंग कि उसमें एक व्यक्ति को बार बार बोलते हुए कहा गया कि उसकी वजह से फ़ैल गया जबकि यह कहा जा सकता था कि अनजाने में उससे अन्य व्यक्ति संक्रमित हो गए. ये तोहमत सा फील दे रहा था. यहाँ किसी को ब्लेम मत कीजिए. मैंने नहीं किया. क्योंकि हम सब इस वायरस के शिकार हैं. वे ख़ुद सबसे पहले इसकी जद में आए और बाक़ी उनके संपर्क में होकर संक्रमित हो गए. मुझे नहीं लगता की दोष देखकर हम कुछ कर और कह पाएंगे. जो हो चुका है उससे मिटाया नहीं जा सकता. मेरा चाहना यह है कि वे सब ठीक होकर वापस अपने घरों में आ जाएं.संक्रमित लोगों को प्यार, हौसले औरसांत्वना की ज़रुरत है.

एक बार और कहूँगी, आप लोग घरों से बाहर मत निकलिए. हो सकता है कि आपके कारण आपको, आपके घर के लोगों और बाहर के लोगों को हमारी तरह हमारे ही एरिया में कैद कर दिया जाए. यह महसूस करना ही किसी व्यक्ति को मारने जैसा है कि वे जहाँ पैदा हुआ वह उसी जगह में कैद हो रहा है. मीठा बोलिए. कम बोल रहे हैं चलेगा. ग़ुस्सा न करें. रो लें. अपने दोस्तों रिश्तेदारों से बात कर लें. हर पल बेहतर जिएं. हमको नहीं पता कि हमारा क्या होगा? अगर हम बच भी गए तो शायद एक सदमा हमारे साथ उम्रभर रहेगा. अचानक से हम सील्ड, ब्लॉक्ड, बैरिकेड, पुलिस, निगरानी, संक्रमण, सेनिटाज़ेशन, रेड जोन, रिस्क ज़ोन, संक्रमित एरिया, हॉटस्पॉट जैसे शब्दों से पहचाने जाने लगे हैं. लेकिन हम इन शब्द शब्दावली के साथ भी एक धीमी सी ज़िंदगी जी रहे हैं. हम बहादुर हैं. हम साथ साथ हैं!  

Wednesday, 15 April 2020

सोशल-वोशल

जब सब कुछ धुंधला सा हो जाए तब क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, ये बाद की बातें हैं. सबसे पहले अपने दिल-दिमाग का ख़याल रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. इससे हम सब जूझ रहे हैं. हम बहुत खुशकिस्मत हैं कि हम इस बात को सोच रहे हैं. लेकिन याद रखिए कि कई परिवार और लोग ऐसे हैं जिनके पास भोजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. यह सोचकर ही बहुत ख़तरनाक लगता है कि हम इस दौर में ऐसे भूख के दृश्य देख रहे हैं. लोगों को सामूहिक तौर पर बेवकूफी करते हुए देख रहे हैं, यह सोचनीय विषय है. न सिर्फ यह इन लोगों के लिए ख़तरनाक है, बल्कि यह उन आम लोगों के लिए भी ख़तरनाक है जो मामूली सी ज़िंदगी को भी अपना तोहफा मानते हैं. 

                                                    

    यह बहुत बड़ी घटना हमारी आँखों के आगे घट रही हैं और हम सब इसके गवाह बन रहे हैं. यादाश्त का मसला बेहद संगीन होता है. लेकिन यह जानना जरुरी है कि आपको जो याद रहता है वह ही पूरा दृश्य नहीं होता. एक बहुत बड़े दृश्य में आपकी यादाश्त ज़रूरी हिस्सा होती है. हमारे इतिहास के साथ यही दिक्क़त भी है. और भी होंगी लेकिन इन तमाम दिक्कतों के साथ यह भी है कि आप इतिहास जानना बंद नहीं कर सकते. इसलिए आपको करना यह है कि अपने दृश्य को जितना अधिक सच से भर सकते हैं, भर दीजिए. मुझे लगता है सच से भर देना ही सब कुछ नहीं है. सच के साथ मानवता को ऊपर रखना होगा. kindness या फिर compassion को दिल और दिमाग में कूट कूटकर भर देना होगा. तब कहीं जाकर हमारा दृश्य पूरा होने की तरफ़ अग्रसर होगा. प्रेम और स्नेह भी मिला दीजिएगा तो तस्वीर के रंग बेहतर उभर आएंगे. 

    लेकिन इसके एवज में अगर आप कुछ इच्छा रखते हैं तब मामला अलग हो सकता है. इस पोस्ट में इसी जूझने को लिखने की कोशिश करती हूँ. मुझे किसी ने कहा- "दिमाग बेहद ख़राब हो रहा है. क्या करें कुछ समझ नहीं आता!" मैंने कहा- "मैं आपको सुन रही हूँ इसका मतलब यह नहीं कि आप अपनी परेशानी को मुझे घड़ा समझकर उड़ेल देंगे! कुछ हद तक तो मुझे ऐतराज नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता कि मुझे आपके गम को अपना समझना चाहिए." उन्हें बुरा लगा और उन्हों ने फोन काट दिया. मेरी उम्र तक आते आते हम सबको खुश रखने वाला खयाल छोड़ने लग जाते हैं. यह बुरा नहीं है. ज़िन्दगी मुझे सिर्फ इसलिए तो नहीं मिली कि मेरे पास लोग आयें और अपना गम मेरे कन्धों पर चिपका कर चले जाएं. मुझे ऐसे लोगों से बहुत कुफ्त होती है जो एक परिपक्व उम्र में भी आकर अपने अच्छे दोस्तों का कंधा तलाशते हैं और जब उनका काम सध जाता है तब ख़ुशी के दिनों में नज़रन्दाज़ कर देते हैं. मैंने ऐसे लोगों से मुँह मोड़ना शुरू कर दिया है. मुझे लगता है मेरी ख़ुद की कहानी ही इतनी पेचीदा है कि मैं उनकी नहीं सुन सकती.

    एक रोज़ सुबह जब मैंने नेट ऑन किया तब व्हाट्सएप पर मैसेज की बाढ़ के बीच जो मैसेज मुझे चौंका गया वह एक ऐसे व्यक्ति का था जो बहुत दिनों से अपने ज़िंदगी के तरह तरह के जश्न में मशगुल थे. ऐसा उनके डीपी के बदलने से मालूम चलता था. मुझे उनकी ज़िंदगी की ख़ुशी देखकर सुखद एहसास होता था. मुझे यह लगता था कि मेरी न सही, लोगों की ज़िंदगी में जश्न तो है. यह क्या बुरा है! इस दौरान उन्होंने मुझे कभी भी याद नहीं किया. जिस रोज़ का ज़िक्र कर रही हूँ उस रोज़ उन्होंने मुझे अल सुबह याद कर लिया था. मैसेज वास्तव में बहुत दुखद था. मैसेज में मेरे नाम के बाद उनकी माँ के इंतकाल की ख़बर थी. आप सोचिए कि आप सुबह नींद और ख़्वाब की दुनिया से जागकर उठे हैं और आपको सुबह सुबह कोई अपनी ज़िंदगी का बड़ा दुःख साझा कर रहा है. आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? मैं घबरा गई और मैंने घबराहट में नेट ऑफ़ कर फ़ोन रख दिया. मेरे चेहरे पर सन्नाटा सा छा गया था. फटाफट बिस्तर से उठकर अपनी माँ साहेब को खोजा कि वे हैं कहाँ? जब उन्हें देख लिया तब वे बोलीं- "क्या हुआ है? ये भी कोई वक़्त हैं उठने का?" मैंने अपना मासूम सा चेहरा बनाया और ब्रश करने चल दी. ब्रश करने के बाद बहुत बेहतरीन तरीके से हाथ पैर धोकर चाय बनाई और अपने दिल को सांत्वना देने लगी. मुझे क्योंकर किसी दूसरे के गम में शरीक हो जाना चाहिए, वह भी फ़ोन से?

 
    मैंने लगभग 12 बजे उन्हें एक सांत्वना मैसेज भेजा. लेकिन चिंता ऐसी अंदर समा गई कि मुझे लगा फिलोसफी बाक़ी रह गई है इसलिए मौत और ज़िंदगी के बारे में जो भी पंक्तियाँ दिमाग में आईं, वह उन्हें लिखकर भेज दीं. बाद में उनका जवाब शुक्रिया के तौर पर आया. हालाँकि मुझे इस बात का ग़ुस्सा नहीं था लेकिन मुझे यह बहुत अजीब लगा कि लोग अपने दुःख लेकर मुझसे चर्चा क्यों करना चाहते हैं? यह तो सिर्फ एक नजीर है. ऐसे कई लोग हैं जिनको लगता है मेरे पास जादू की छड़ी है और मैं उनके गम कम कर सकती हूँ. लेकिन जब से मैंने रेंगता हुआ ही सही 'न' कहना शुरू किया है तब से मेरे दोस्त कम हो रहे हैं. यकीन मानिए आपके आसपास लोग जोंक की तरह भी हो सकते हैं. इसमें बहुत उर्ज़ा जाती है. लेकिन अगर एक बार आप नज़रन्दाज़ करना सीख जाएं तब आपके जीवन में सुकून बढ़ने लगेगा. मैं सीख रही हूँ. 

    इस प्रक्रिया में मुझे कभी कभी अपने में स्वार्थी होने की भावना विकसित होती महसूस होती है. लेकिन इसमें की खामी नहीं, ऐसा मैं मान कर चल रही हूँ. जब आप अपने बचे हुए दोस्तों से यह सब साझा करते हैं तब वे आपको अजीब सी सुई चुभोते हैं. वे कहते हैं- "हम्म! बात तो ठीक है पर सोशल होना भी ज़रूरी है. लोगों से न घुले मिलें तो नुकसान होता है." ओह! यह सुनकर एक चिंता तुरंत घुसने लगती है. क्या मैं लोगों से कटकर ठीक कर रही हूँ? लगातार इस पर सोचने के बाद मुझे अपने कटने वाले स्वभाव में फिर से कोई खामी नजर नहीं आती. मैं उन लोगों से कट रही हूँ जो मुझे सिर्फ ख़ास वजहों और स्थलों पर याद करते हैं. मेरे दोस्तों की फेहरिश्त लम्बी नहीं है. इसलिए वे सब अगर कटते भी हैं तो मुझे उन पर सोचने की बजाय नए दोस्त बनाने के बारे में सोचना चाहिए. मरी हुई लकीर को पीटने से फायदा नहीं होता. नए लोगों से मिलने पर कुछ नया तो हासिल होगा. 

    वास्तव में एक बात यह भी है कि कभी कभी जटिलता बहुत दुःख देती है. जो सभी में प्रिय है, वह बन जाना मंजूर नहीं. मुझे अपने आप का प्रिय बनने का मौका कम मिला है. इस एकांत में लोगों से बात करने की बजाय छत को घूरना बहुत बढ़िया लगता है. उन लेखकों को पढ़ना भी बहुत बढ़िया लगता है जो अपने शब्द आपसे बात करने में उड़ेल देते हैं. उनकी नितांत नयी कहानी, आपके लिए है न कि किसी और के लिए. उनके लिखे दुःख कितने सादे से होते हैं. कभी बहुत सींचे हुए से. अगर आप उनके हमदर्द बनते हो तो आपको सुकून मिलता है. आपको यह एहसास है कि आप किसी के दुःख में साझी हुए लेकिन, लेखक एक ऐसा व्यक्ति भी है जो अपनी ख़ुशी में भी आपको शामिल करता है. वो यह नहीं देखता कि आप कैसे कपड़े पहनकर उनके जन्मदिन की पार्टी में आए, आपकी त्वचा का रंग क्या है, आपका धर्म और आदत क्या है, आपका मजहब है भी या आप गैर मजहबी हैं. और तो और अगर उसकी किताब आप न भी पढ़ें तो आपके स्वाद की कद्र करता है न कि आपसे नाराज़गी रखता है. 

    इसलिए अगर अब कोई मुझे कहेगा कि मैं सोशल नहीं हूँ, तब मैं कहूँगी- "मैं आपसे ज़्यादा सोशल हूँ!" लेकिन मेरी मदद और compassion वाली बात का क्या? हम्म! यह करना चाहिए. इसे सबसे पहले यह सोचना चाहिए कि आप अपने ही इंसान बने रहने में सहयोग कर रहे हैं. आप उन लोगों की मदद करें जिन्हें वास्तव में इसकी ज़रुरत है. जैसे हमारी स्टूडेंट्स बिरादरी. इस बिरादरी को अफवाह फैला कर टारगेट किया जा रहा है और एक पूरी पौध को जहर से सींचा जा रहा है. आपको अगर वे कभी चर्चा के लिए याद करें तब उनके आगे सही तथ्य रख दें. सही ग़लत किये बगैर. बाक़ी उन पर छोड़ दें कि उनका क्या सोचना है! इसके अलावा हमारे आसपास के लोग जिनसे हम रूबरू नहीं हैं. आप ख़ुद सोचिये, आप ख़ुद खाकर सो लिए और बगल में कोई भूख से बिलख रहा है तो सो पाएंगे? नहीं न! तो कीजिए उनकी मदद लेकिन ख़ुद को मत छोड़िये इन मामलों में भी. याद रखिए आपके सही होने का तराजू ख़ुद आपके पास भी है. ग़लत बाट मत रख लेना. वरना नींद नहीं आएगी.

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फोटो: गूगल से        


खलील जिब्रान (Khalil Gibran) की प्रसिद्ध पुस्तक द प्रोफेट (The Prophet) का हिंदी अनुवाद (संपूर्ण पुस्तक)

  द प्रोफेट जहाज़ का आगमन   अलमुस्तफ़ा, चुना हुआ और प्रिय, जो अपने ही युग के लिए प्रभात के समान था , बारह वर्षों से   नगर में उस जहाज़...