Thursday, 21 October 2021

कोविड-19 और (हमारा?) मीडिया

  

मार्च 2020 के बाद से हममें और हमारी भाषा में बुनियादी भाषा परिवर्तन हुए हैं. ये परिवर्तन अब कुछ इस तरह से घुल गए हैं जिसे लेकर हमें कोई हैरानी नहीं हो रही. कोरोना महामारी के साथ ढेरों शब्द बनाकर तैयार किये गए हैं अथवा जो परिस्थिति वश जन्म ले चुके हैं वे कुछ दुखद और जटिल घटनाएँ लेकर हमारे समक्ष मौज़ूद हैं. सवाल यह भी है कि ये घटनाएँ क्या आने वाले वक़्त में समाज का महज दस्तावेज़ बनकर रह जाएँगी? क्या मीडिया और राजनितिक चरित्र भविष्य में सवालों के घेरे में आ जाएगा? क्या हमारी भाषा में सामूहिकता का एक दर्द चुपके से आकर बैठ जाएगा क्योंकि हम इस महामारी में अपने लोगों को को खो रहे हैं? इसके अलावा हम मनुष्यता यह कितना प्रभावित करेगा? 

                                           

    आगे आने वाले वर्षों में इनके बने रहने की सम्भावना भी है. इस बात को यूं भी कहा जा सकता है कि जब तक यह संक्रमण और संक्रमण के समय के अनुभव रहेंगे तब तक नए भाषाई शब्द भाषा में रमे रहेंगे. सामान्य जीवन शैली में जो भारी बदलाव हुए हैं वे शुरू में परेशानी का सबब लेकर आये पर धीरे धीरे वक़्त के साथ लोगों में उनकी आदतें बनने की प्रक्रिया चल रही है. इसका यह मतलब न निकाला जाए कि सब कुछ नियंत्रण में है अथवा लोग ठीक ठाक गुज़र बसर कर रहे हैं. यह फ़िलहाल ख़्वाब होगा जो दिन में खुली आँखों से देखने की कोशिश की जा रही है. यर्थाथ में स्थिति अनियंत्रित, दयनीय, भीषण, रोगग्रस्त और चुनौतियों से भरी हुई है. पाठकों को इस बात की खुली छूट है कि वे अपने तई इसमें और भी शब्द जोड़ लें.

    कोरोना महामारी में जिस तरह की शब्दावली बनकर तैयार हुई और जो आजकल लगभग पढ़े लिखे और ग़ैर पढ़े लिखे लोगों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है, वह बेहद पुरानी नहीं है और अचानक से दिनचर्या में शामिल हो गई है. इसमें एक बाहरी दबाव काम कर रहा है जिसने व्यक्ति के निजी क्षेत्र (स्पेस) में जगह बनाने के अच्छे प्रयास किये हैं. इन शब्दाव्लियों को कुछ वर्गों में बांटा जा सकता है. सरकारी, मेडिकल, समाचारों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली, संस्थाओं द्वारा, आम लोगों द्वारा इजाद की गई. इसमें और भी वर्ग शामिल किये जा सकते हैं. मिसाल के तौर पर लिंग आधारित शब्द.

    बीमारी चूँकि इंसानी शरीर और स्वास्थ्य से जुड़ी हुई होती है इसलिए विज्ञान और मेडिकल की दुनिया में कोरोना को लेकर ऐसी शब्दावली बनी जो अब न सिर्फ प्रचलन में है बल्कि उसके आधार पर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं और लोगों की सामान्य बैठकों में वे विषय बन रही हैं. जैसे कोरोना का नाम कोविड-19 रखा गया है पर आम लोग इसे कोरोना ही कहते हैं. ख़बरों में कोविड-19 ही छापा जाता है. जाँच हिंदी का शब्द है. अंग्रेज़ी में इसके लिए टेस्ट शब्द है. जाँच रिपोर्ट युगल शब्द के साथ जो डॉ और शब्द जुडें हैं वे- पॉजिटिव और नेगेटिव हैं. इससे पहले की ये दोनों शब्द सोच अथवा विचार के स्तर तक ख़ूब इस्तेमाल होते थे और जीवन प्रेरणादायक संगोष्ठियों में इन दोनों शब्दों को मुख्य धुरु बनाकर ख़ूब चर्चा होता था. लेकिन कोरोना वायरस ने इन दोनों शब्दों को हाईजैक कर अपने संदर्भ से मिला लिया है. पॉजिटिव शब्द को इसमें भारी तबाही मिल रही है. मिसाल के तौर पर कितने पॉजिटिव केस अभी भी बचे हैं, जैसे सवाल हर रोज़ मीडिया घरानों और अख़बारों द्वारा ऑनलाइन/ऑफलाइन पोस्ट किये जाते हैं अथवा छपे जाते हैं.

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिन शब्द को विश्वव्यापी बनाया है उनमें ‘टेस्ट’ शब्द अब हिंदी में बैगाना नहीं रहा है. लोग जाँच शब्द का कम इस्तेमाल कर रहे हैं. यह शब्द उन लोगों द्वारा अधिक इस्तेमाल हो रहा है जो कि अपने लेख और विचार प्रकाशित कर रहे हैं. वरना आम लोगों में टेस्ट ही शब्द छाया हुआ है. हाँ, कस्बों गांवों ज़रुर जाँच शब्द इस्तेमाल में होगा पर कितना प्रचलित होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. इसके अलावा सैंपल रिजल्ट, कोरोना वैक्सीन, क्वारान्टाइन शब्द को भी मेडिकल शब्दावली में लिया जाना चाहिए.  

    इतिहास गवाह है कि महामारियां इंसानी जगत में कुछ लोगों के लिए फ़ायदेमंद होती है. शुरुआती दौर में सेनेटाइज़र के दामों में जिस तरह से बढ़ोतरी हुई उसके चलते सरकार को इसके दामों पर लगाम लगाने के लिए मूल्य तय करना पड़ा. फिर भी आम घरों में अब यह मेडिकल उत्पाद आम बन चुका है. इससे पहले शहरी की भी बड़ी आबादी इससे अनभिज्ञ ही थी. कोरोना जो डर लाया है उसके एवज में मास्क के इस्तेमाल को खड़ा किया. मास्क, इससे पहले दिल्ली के प्रदूषण से जुड़ा हुआ था. लेकिन बहुत प्रचलित नहीं था. अब बाज़ार ने इसे भी स्टाइल से जोड़ते हुए इसकी कई प्रकार के रूप में बेचना शुरू कर दिया है.

    एक आवश्यक सामान जो कोरोना से पूर्व और बाद में महत्वपूर्ण रहा है, वह किट और स्कैनर शब्द हैं. मार्च के महीने में थर्मल स्कैनर जैसे शब्दों को हिंदी में में कैसे कहा जाए कोई नहीं जानता था. आज भी यही शब्द चलन में है. आम लोग इस बात को कुछ इस तरह बयां कर रहे हैं- अगर शुरू में ही सरकार ने स्कैन कर लिया होता तो आज यह नहीं होता. फ़िलहाल स्कैनर अभी तक कंप्यूटर से ही जुड़ा था जिसका इस्तेमाल दस्तावेज़ों को स्कैन करने में किया जाता था. लेकिन अब स्कैनर थर्मल से जुड़ा है जो वह उपकरण है जिससे व्यक्ति का तापमान जांचा जाता है. इसके अतिरिक्त मेडिकल की दुनिया से ही कोरोना वारियर्स शब्द आ चुका है जो मानसिक रूप से ग़ुस्से को शांत कर रहा है. पीपीइ किट को इसी में जोड़ सकते हैं.

    कोरोना वैक्सीन शब्द को कैसे भूल सकते हैं. वैक्सीन के लिए अभी तक टीका शब्द हमारे पास मौज़ूद था और वह भी पोलियो और बच्चों के टीकाकरण के तौर पर सामने आता था. उसका इस्तेमाल रोज़मर्रा की बातचीत में नहीं था. अब घरों में मीडिया ने वैक्सीन शब्द को आम बना दिया है इसके अलावा यह रोज़मर्रा प्रतियोगितानुमा संवादों में वैक्सीन शब्द ज़रुर व्यक्ति के बगल में बैठा हुआ मिलता है. इस वक़्त जिस शब्द को लोग प्रेम की नज़र से देख रहे हैं वह वैक्सीन ही है. इससे उम्मीद का पूरा एक जखीरा बंधा हुआ है. वैक्सीन के कंधे शायद दर्द हो रहे हों. रूस द्वारा वैक्सीन बना लेने के बाद भी देसी विदेशी वैक्सीन के इंतजार में सभी लोग हैं.

    मेडिकल के बाद कुछ सरकारी शब्दावलियों ने भी जनता के जीवन में अपनी जगह बनाई है. इसमें जाहिर सी बात है आदेश का भाव बहुत अधिक समाया हुआ है. कुछ लोग इन्हें थोपे हुए शब्द कह सकते हैं. लेकिन सरकार ने समय समय पर कोरोना संक्रमण से जुड़ी एडवाईजरी और गाइडलाइन्स जारी की है. एडवाईजरी और गाइडलाइन्स जैसे शब्दों को हिंदी अख़बारों और हिंदी खबरिया चैनलों ने हाथो हाथ लिया है. इसके अतिरिक्त सरकार ने हेल्पलाइन नंबर, सोशल डिस्टेंसिंग, जनता कर्फ्यू, लॉकडाउन, अनलॉकडाउन, ऑनलाइन मीटिंग, ब्लॉक्ड, सील्ड, कन्टेनमेंट ज़ोन, शटडाउन, सरकारी पैकेज, कोरोना चैन, एअरपोर्ट स्क्रीनिंग आदि शब्दों को बिना सोचे संभले इस्तेमाल किया गया और किया जा रहा है. कोरोना को जब नियंत्रित किया जाएगा तब इन शब्दों से होकर भाषा विज्ञानी सरकारे द्वारा किये जा रहे कार्यों की आलोचना और विश्लेषण करेंगे. इनमें से अधिकांश शब्द अंग्रेज़ी से लिए गए हैं और सरकार ने उनको सरकारी शब्दावली में पचा लिया है. लोगों ने भी इसमें ख़ूब थाली और मोमबत्ती का साउंड और रौशनी मुहैया करवाई है. इसके अलावा शिक्षा जगत ने भी नए शब्दों को अपनाया है. सबसे प्रचलित शब्द वेबिनार बना हुआ है. फेसबुक लाइव हो या वीडियो चर्चा सबके बीच वॉच पार्टी ने भी जगह बनाई है.

    लेकिन इन शब्दों के प्रवाह के बीच जिस बात पर गौर करना चाहिए वह यह है कि इन शब्दों में साधारण जनता के अनुभव और दर्द की झलक नहीं मिलती. हजारों की तादाद में मजदूरों का पलायन हुआ और उस पलायन की यात्रा के दौरान उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था. मीडिया में उनकी छवि को बेहद असंवेदनशील तरीके से पेश किया गया. जो लोग मदद कर रहे थे उनको मीडिया ने केन्द्रित कर ख़बरों को फ्रेम किया जबकि मजदूरों का इतनी बड़ी तादाद में पलायन इंसानियत से अलग देश की राजनितिक, आर्थिक, सामाजिक और बेहद ख़राब नौकरशाही और योजनाओं से जुड़ी थी. इन्सानियत बेहद अलग मसला है. उस पर ख़बरें बनी ठीक है पर वे ख़बर के केंद्र में रहीं, ये दुर्भाग्यपूर्ण था. अगर मजदूरों की संख्या कम होती तो यह मीडिया के लिए कोई ख़बर नहीं हो सकती थी लेकिन, मजदूरों की संख्या इतनी अधिक थी कि वे उस भयानक गर्मी में अपने घरों की तरफ़ चल पड़े थे. महामारी में मजूदरों के साथ जो शब्द जुड़ा और जिसने भारत के विकास के काग़ज़ी महल को उड़ा दिया वह ‘पलायन’ था. एक विशाल जनता जो आंबेडकर और गाँधी के साथ कदम से कदम मिलाकर चली थी लगभग वैसी ही विशाल जनता अपने बच्चों को गोद और कन्धों पर बिठाए निकल पड़ी थी. इस बीच सरकारी तंत्र की भयानक नाकामयाबी को गिनने में सभ्य समाज को शर्म आनी चाहिए.

    देश की संघर्षशील और कर्मठ जनता के साथ एक शब्द और जुड़ा और वह ‘भयंकर भूख’ का मसला था. सरकारों द्वारा हवाई इंतज़ाम नाकाफ़ी साबित हुए और लोग भूख के कारण बेहद परेशान हुए. भारत में अनाज के भंडारों की कोई कमी नहीं थी लेकिन वह महामारी में अंतिम व्यक्ति तक सुचारू रूप से नहीं पहुँच पाया. टेलीविज़न पर कई लोग यह कहते हुए पाए गए कि अगर घर में रहे थे भूख से मर जाएंगे औरबाहर गए थे कोरोना मार देगा. भूख ने उन्हें महामारी में बाहर कर दिया. यह अचरज का ही विषय है कि पलायन पर अभी तक कोई शोध और चर्चा क्यों नहीं हुई. किसी तरह का आँकड़ा भी शोध कर के नहीं निकाला गया.              

 -----------

तस्वीर गूगल से 

Friday, 17 September 2021

क्या भारत की बढ़ती जनसंख्या एक बोझ है?

 

बहुत-सी कहानियों में कुछ दिलचस्प तथ्य मिल ही जाते हैं. इस लेख की शुरुआत एक अजीबोगरीब कहानी से करना ठीक होगा. गाँवों में यह कहानी कही जाती है, “पहले के जुग (युग) में हैजा-प्लेट(प्लेग) फैलता था तो बहुत लोग मर जाते थे. गाँव के गाँव ख़त्म हो जाते थे. लोग अपना घरबार सब छोड़कर बचने की खातिर दूर चले जाते थे...एक राजा था जो शान-ओ-शौकत से जीता था. उसके महल में एक चिड़िया भी पर नहीं मार सकती थी. एक दिन किसी सुबह राजा के महल के भीतर एक विचित्र चिड़िया घुस आई. राजा ने उससे पूछा, “तुम कौन हो?” वह बोली, “मैं हैजा-प्लेट हूँ.” राजा ने कहा, “मुझे यकीन नहीं हो रहा. ज़रा मेरी हथेली पर बैठो तब तुम्हें पास से देखूं तो यकीन करूँ.” चिड़िया चालाक राजा के झांसे में आ गई. वह जैसे ही राजा की हथेली पर बैठी राजा ने उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया और अपना हाथ कटवा कर लोहे के बक्से में बंद कर दिया. तब से उसके राज्य में ये बीमारियाँ नहीं फैलीं. लेकिन जब हमारे देश में अंग्रेज़ आए तो रेलवे का काम शुरू हुआ और उसी दौरान किसी लालची आदमी ने ख़जाना समझकर उस बक्से को खोल दिया और ये बीमारियाँ फिर से फ़ैल गईं.” इस कथा में जीवन की चाह और उसे बनाए रखने के संकेत मिलते हैं.  

                                        

    इस रोचक कथा का एक तार जनसंख्या से भी जुड़ा है. बीमारियाँ और आपदाएँ मनुष्य के अस्तित्व के लिए हमेशा ही चुनौतीपूर्ण रही हैं अतः उनसे बचे रहने के उपाय निरंतर किए गए. इंसान अपनी एक नक़ल इस पृथ्वी पर छोड़ कर जाना चाहता है. इसलिए वह अपने वंश को बढ़ाने में सम्मोहित रहता है. पुराने ज़माने की कहानियाँ उन साहसों को बटोर कर कथा में पेश कर देती है जिनके सहारे इंसान बचा रहा. जिस बुज़ुर्ग ने मेरी माँ को यह कथा सुनाई थी वह स्वयं कई भाई-बहन थे और उनमें कईयों की मृत्यु तरह-तरह की बीमारियों और कुपोषण के चलते हुई. लेकिन आधुनिक समय जब औद्योगिक क्रांति हुई और नए निर्माण हुए उससे रहन-सहन बदला और बीमारियों को काबू कर लेने की क्षमता से जनसंख्या में ख़ासी वृद्धि हुई. इसके अलावा चिकित्सीय सुविधाओं ने भी इंसानों को अच्छी उम्र का तोहफा दिया. भारत की आबादी अब तक एक अरब से बहुत अधिक बढ़ गई है. चीन और भारत पृथ्वी की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने क्षेत्रफलों में बसाए हुए हैं. आज आधुनिक समय में पूरा विश्व कोरोना संक्रमण की महामारी की चपेट में और इसका सीधा असर जनसंख्या पर है. बड़ी मात्रा में मानव समाज कई विकराल परिस्थितियों में उलझा हुआ है और लगातर जूझ रहा है. इसके पीछे की एक बड़ी वजह विशाल और बढ़ती जनसंख्या को बताया जाता है. पर क्या वास्तव में जनसंख्या एक बहुत बड़ी वजह है और अब क्या इससे जुड़ा कानून बना लेना ही चाहिए?  

    जनसंख्या का पेंच इतना जटिल है कि उससे समझने के लिए विस्तृत अध्ययन की ज़रूरत होती है. पर दुर्भाग्य यह है कि बिना विस्तृत अध्ययन के प्रचलित बातों की पूछ पकड़कर हम सब जनसंख्या की रेलगाड़ी में बैठकर छुक-छुक करना चाहते हैं. एक प्रतिष्ठित जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक अभी पूरे विश्व की जनसंख्या 7.8 अरब है जो वर्ष 2100 में 8.8 हो जाएगी.[1] इस बढ़ती हुई जनसंख्या को बहुत सारी मुश्किलों का कारण माना जाता रहा है. शायद ही भारत में कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने ‘हम दो, हमारे दो’ या ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार’ का नारा न सुना होगा. अतः आती-जाती सरकारों में जनसंख्या को लेकर एक संज्ञान तो ज़रूर रहा है. लेकिन कुछ वर्षों में सरकार ने जनसंख्या से जुड़े अभियानों में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई. या कम से कम उसे एक मुख्य मुद्दे की तरह नहीं लिया. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि जनता ने जनसंख्या को अपने दिल-दिमाग से हटाया हो. छोटे परिवार की अहमियत लोगों के संज्ञान में है. वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं इसलिए वे बड़े परिवार की कामना नहीं कर रहे. इसकी पुष्टि स्वयं सरकार द्वारा जारी आंकड़ें कर रहे हैं. गत वर्ष दिसंबर 2020 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों को जारी किया गया. पी.आई.बी. (Press Information Bureau/ Government of India) के प्रेस नोट के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के तहत पहले चरण में जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का सर्वे हुए किया गया उनमें करीब-करीब सभी में कुल प्रजनन दर में कमी आई है. कुल 22 राज्यों में से 19 में यह घटकर 2.1 पर आ गई है.”[2]    

    हाल ही में एक प्रदेश की सरकार द्वारा जनसंख्या स्थिरीकरण और कल्याण विधेयक 2021, बिल को पेश किया है. इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कानून पर बहस सियासी गलियारों में तेज़ हुई है. सत्तारूढ़ सरकारें और विपक्ष, दोनों असली मुद्दे पर बहस और समाधान के बजाय दूसरे मुद्दों में उलझी हुई दिखाई दे रही हैं. उत्तर प्रदेश के इस जनसंख्या संबंधी बिल पर राय बंट गई है. ‘पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया’ की निदेशिका पूनम मुत्तरेजा, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’ में छपे अपने लेख में कहती हैं, “2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या विकास दर में कमी आई है. 1991 से लेकर 2001 तक यह दर 21.5 थी तो वहीं 2001 से लेकर 2011 के बीच यह दर घटकर 17.7 हो गई. यह सभी धर्मों के लोगों के साथ है.” [3] अतः किसी एक मजहब के लोगों को निशाने पर लेना ग़लत होगा इसके साथ ही यह समझ आता है कि जनसंख्या अपनी गति से घट भी रही है.

    इसके अलावा पड़ोसी मुल्क चीन की जनसंख्या नीति का भी विश्लेष्ण कर लेना चाहिए. चीन ने अपने देश में बढ़ती जनसंख्या पर लगाम लगाने के लिए सन् 1979 में ‘एक संतान नीति’ लागू की. इसके परिणाम अलग आए. बी.बी.सी. की एक खबर में कहा गया है कि इस नीति को लाने के बाद चीन में लिंग अनुपात बिगड़ा और बेटे की चाह में कन्या भ्रूण हत्याएँ भी अधिक की गईं.[4] भारत में इस बात की कल्पना आसानी से की जा सकती है कि अगर जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू किया जाता है तो लिंगानुपात कितना बिगड़ सकता है! बेटे की चाह में बेटियों की जन्म से पहले हत्या बड़ी मात्रा में होने लगेगी. सरकार ने तो ख़ुद जागरूकता के लिए नारा भी लगवाया है, “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ!”

    जनसंख्या नियंत्रण कानून के पक्ष में कई अन्य दलीलें दी जाती हैं. प्राकृतिक संसाधनों का लगातार कम होना, जलवायु परिवर्तन, कार्बनडाइ ऑक्साइड गैस की अधिकता और अमीरी-ग़रीबी में घोर असमानता के पीछे बड़ी जनसंख्या को एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है. पर क्या वास्तव में ये सभी खतरनाक स्थितियाँ जनसंख्या के बढ़ने से जुड़ी हैं? सवाल का जवाब हाँ अथवा न की बजाय समझने की कोशिश होनी चाहिए. पूंजीवाद समाज में हमारा रहन-सहन तीव्रता से बदला है. उपभोग की बुनियादी शर्तें और नियम बदल गए हैं. यह समझना बहुत जटिल नहीं है कि किस तरह से विज्ञापन की जरिए पानी की प्यास अन्य पेय पदार्थों से बुझाई जा रही है. यदि किसी के पास कोई स्मार्टफोन न हो तो वह कितने सरकारी कामों और लाभों से मरहूम रह जाएगा. संसाधन अंधाधुंध उपभोग के चलते भी कम हो रहे हैं.  

    ऑनलाइन दुनिया में चुपचाप बैठे हुए आंकड़ों से बातें करें तो पता चलता है कि चीन, अमेरिका, भारत, रूस और जापान क्रमशः पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवे स्थान पर कार्बनडाइ ऑक्साइड उत्सर्जित करने वाले देश हैं. यह आंकड़ा ‘ग्लोबल कार्बन एटलस’ की वेबसाइट पर वर्ष 2019 के हवाले से पता चलता है. निश्चित रूप से चीन और भारत इस सूची में हैं पर आंकड़ों को सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर पता चलता है कि इस गैस के एमिशन में कंपनियों का बड़ा हाथ है. एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल सौ कंपनियाँ 70% से ज़्यादा ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ा रही हैं. यह सिलसिला सन् 1988 से है.[5] इसके अलावा अमीरों की जीवन शैली ने भी पृथ्वी को प्रभावित किया है. ऑक्सफेम की न्यूज़ रिपोर्ट बताती है कि ये ग़रीब नहीं हैं जो जलवायु को नुक्सान पहुंचा रहे हैं, बल्कि ये मुट्ठीभर धनवान लोग हैं जो कार्बन उत्सर्जन को बढ़ा रहे हैं.[6] इसलिए बढ़ती आबादी की बजाय उन मुख्य कारकों भी समझने की ज़रूरत है जिनके कारण जलवायु असंतुलन बढ़ रहा है. हाल ही में प्रकाशित ढेरों रिपोर्ट बताती हैं कि किस तरह इस कोरोना महामारी में गरीब और गरीब हुआ है और अमीर उम्मीद से भी ज़्यादा अमीर.

    अंत में यह सवाल पूछा जा सकता है, तो क्या बढ़ती जनसंख्या की भूमिका को छोड़ दिया जाए? जवाब है, नहीं. जनसंख्या को नियंत्रित करने के दूसरे ऐसे क़दम और उपाय आजमाए जा सकते हैं जिनसे देश की एक बड़ी और निर्धन जनता को नकारात्मकता का सामना न करना पड़े. सरकार को ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम लाने होंगे जिनमें ग़रीब तबके को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार के उचित अवसर मिलें. हम स्वयं अपने अनुभवों से जानते हैं कि आज की पीढ़ी किस कद्र अलग है! युवाओं का एक बड़ा हिस्सा देर से शादी करने की चाहत रखता है इतना ही नहीं वे अपना परिवार बनाने में भी वक़्त ले रहे हैं.  

    जनसंख्या का कानून यदि बनता है तो स्त्रियों पर इसका अधिक असर पड़ेगा. यदि स्त्री की राजनीतिक भागीदारी अथवा सरकारी नौकरी में उनका आना, उनके द्वारा जन्में गए बच्चों की संख्या से जोड़ा जाएगा तब निश्चित रूप से बहुत-सी महिलाएँ देश की तरक्की में योगदान नहीं दे पाएंगी. यही नहीं गर्भ में ही लिंग परिक्षण कर लड़कियों को मारने की घटनाएं बढ़ेंगी. महिलाओं पर ही चूँकि परिवार नियोजन की जिम्मेदारी पितृसत्तात्मक समाज में अधिक है अतः, शहरी और ग्रामीण स्त्रियों के लिए गर्भ निरोधक दवाएँ और अन्य तरीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा. इसके अलावा जनसंख्या संबंधी जागरूक अभियानों की ज़रूरत पर बल दिया जा सकता है. बच्चों को पाठ्यक्रम में शुरू से ही इसके प्रभावों को पढ़ाना होगा. शारीरिक संबंधों पर खुलकर बातें करने की ज़रूरत है. अपनी परंपराओं और रीतियों को स्त्री के शरीर और मानिसक स्वास्थ्य से बड़ा नहीं माना जा सकता. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 2015-16 के मुताबिक 40% पुरुषों का मानना है कि गर्भ-निरोध सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है. साथ में 20% पुरुष यह मानते हैं कि जो स्त्री गर्भ-निरोध का इस्तेमाल करती है वह कई पुरुषों से संबंध बनाने वाली स्त्री होती है.[7] यह दोहरापन समाज की सच्चाई है. सरकार को सभी महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर सोचकर ही किसी कानून का निर्माण करना चाहिए. जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ा कानून प्रत्येक नागरिक को प्रभावित करेगा अतः इस पर पर्याप्त सोच व शोध करने की ज़रूरत है. कानून बनाने में पर्याप्त संवेदनशील होने के साथ-साथ वैज्ञानिक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यावहारिकता की ज़रूरत होती है. यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि कोई कानून ऐसा न बना दिया जाए जो मौलिक अधिकारों और राज्य के कल्याणकारी रूप में दख़ल करे.      

 

कोरोना महामारी और पर्यावरण विमर्श

सन् २०२० किसी भी देश और मनुष्य जाति के लिए अभी तक बेहद दुखद और चुनौतियों से भरा हुआ साल है. कोरोना संक्रमण और चौपट होती अर्थव्यवस्था से जुड़ी ख़बरों ने अख़बार के हर ख़ाने को अपनी आगोश में ले लिया है. भारत में हर रोज़ कोरोना संक्रमण के मामले तेज़ी से रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं. देश में मरने वाले लोगों की संख्या एक लाख होने की ओर जल्दी से बढ़ रही है. इस लेख को लिखे जाने तक कोविड-१९ से मरने वालों की संख्या ८३ हज़ार के पार हो गई है और संक्रमण के कुल मामले ५१ लाख के पार हो चुके हैं. वर्ल्डओमीटर वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक़ पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या ३ करोड़ से अधिक है. भारत संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर मौज़ूद है. इसी वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के अनुसार १७ सितम्बर तक विश्वशक्ति अमेरिका में कोरोना संक्रमण के ६८ लाख से अधिक मामले हैं और मरने वाले लोगों की संख्या २ लाख से अधिक है. दुखद यह है कि यह अंतिम आँकड़े नहीं हैं. इनमें प्रतिदिन तीव्र बढ़ोतरी हो रही है. इंसान, जो अपने को शक्तिशाली मान कर कुदरत को मुट्ठी में करने की ज़िद्द के साथ बढ़ रहा था, आज घुटनों के बल बैठा दिया गया. इंसान को घुटने के बल बैठाने वाला यह अदृश्य वायरस, नंगी आँखों से दिख भी नहीं रहा. क्या यह कुदरत की शक्ति का उदाहरण नहीं है?   



    इस महामारी के कारण इंसान को यह महसूस होना शुरू हो गया है कि वह कुदरत से बढ़कर नहीं है बल्कि उसके द्वारा की गई संरचनाओं में से एक है. हर व्यक्ति इस महामारी का गवाह बन रहा है. आगे आने वाले समय में कोरोना महामारी के दूरगामी प्रभाव मनुष्य जाति पर पड़ेंगे और साथ ही साथ ये प्रभाव एक राष्ट्र और समाज के रूप में पर्यावरण के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर करेंगे. हमें अब यह सोचना ही होगा कि क्या यह महामारी कुदरत का एक संकेत है, “अभी भी वक़्त है संभल जाने का?”

    कोरोना महामारी के मामले में अख़बारों और तमाम इलेक्ट्रोनिक मीडिया घरानों की रिपोर्टिंग में केवल कुछ ही जगहों पर पर्यावरण और कोरोना महामारी को जोड़कर देखा गया है.जबकि अधिकतर मीडिया स्रोतों को इस पर सोचने की फुर्सत भी नहीं है. एक समझदार नागरिक और मनुष्य को यह सोचना ही चाहिए कि ख़बरों में गैप कहाँ-कहाँ हैं और क्या छोड़ा जा रहा है. इस साल मार्च के महीने से सरकार हरक़त में आई. कोरोना संक्रमण ने देश में पहले से चल रहे हलचल के माहौल में दस्तक दी. इससे पहले अमरीकी राष्ट्रपति का भारत दौरा, दिल्ली में दंगे और सी. ए. ए. एक्ट के खिलाफ़ बड़े पैमाने पर जगह-जगह विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी था. इस बीच बीती सर्दियों में दिल्ली के प्रदूषण को कोई नहीं भूल सकता जो लोगों की साँसों में जहर की तरह घुल रहा था. इन सब भयावह परिस्थितियों के बाद भी पर्यावरण अभी तक माध्यमिक कक्षाओं में निबंध की शक्ल में दबा पड़ा हुआ है. सरकारों ने इसे एक पाठ्यक्रम के रूप में तब्दील कर दिया है. विद्यार्थियों ने भी इसे रट्टा लगाकर याद कर लिया है. यह अभी तक गंभीर चर्चा का विषय भी नहीं बना है. वर्तमान में जब कई करोड़ लोगों की नौकरियाँ छुट रही हैं तब वाजिब है कोरोना और अर्थव्यवस्था के बीच पर्यावरण के साथ जुड़ी मानुष हरक़त की समस्याओं पर कौन ही सोचे और चर्चा करे?

    इस वर्ष २३ मार्च को देशव्यापी लॉक डाउन का ऐलान हुआ और तमाम जन गतिविधियाँ एक झटके में ही ‘पॉज़’ की स्थिति में आ गईं. राजधानी दिल्ली की हवा बीते कई सालों से जहर में तब्दील हो चुकी थी. इस ‘पॉज़’ की स्थिति के चलते हवा और वातावरण बिलकुल साफ़ हो गए. वातावरण में सौम्य पारदर्शिता को लोगों ने महसूस किया. काला आसमान नीला दिखाई देने लगा. छोटे बच्चों को बादलों के अठखेलियों में तरह-तरह की शक्लें दिखाई दीं. घरों में क़ैद लोगों को गहराई से यह आभास हुआ कि प्रकृति बहुत अद्भुत और सुखमय है. लॉकडाउन के अन्तराल में पर्यावरण की स्थिति में बेहद अच्छे बदलाव देखे गए. इसी वजह से पर्यावरणीय चर्चाओं और चिंताओं की समाज के हर वर्ग तक लहर पहुंची. यह सच है कि कोरोना महामारी हमसे बहुत कुछ छीन रही है पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि इसने कहीं भीतर जाकर यह समझने की स्थिति और स्पेस बनाया है कि मनुष्य को प्रकृति पर विजय के बजाय उसके संग अपने अस्तित्व को देखना चाहिए. प्रकृति इस्तेमाल कर फेंकने से नहीं जुड़ी है.  

    दीवाली जैसे त्यौहार पर बम पटाखे फोड़े जाने पर लोगों में बहस कितने ही सालों से चल रही है. एक बहस दिल्ली की सड़कों पर चलने वाले वाहनों को लेकर भी है जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि वायु और ध्वनि प्रदूषण का मुख्य स्रोत ये वाहन ही हैं. कोरोना महामारी के चलते किये गए लॉकडाउन के कारण यह बहस अब पुष्ट हो चुकी है कि भारी संख्या में सड़कों पर दौड़ती इंसानी जगत द्वारा ईजाद की गई मशीनें प्राण वायु को नष्ट कर रही हैं. जैसे ही सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के पहियों पर लगाम लगी वैसे ही हवा साफ़ होना शुरू हुई और ध्वनि प्रदूषण में गिरावट आई. आसमान का रंग जो आसमानी था वह भुलाया जा चुका था. अब हर आँख और ज़ेहन में वह आसमानी रंग उभरा जो आसमान की सच्चाई है. इसके साथ ही एयर क्वालिटी इंडेक्स में भारी बदलाव दर्ज़ किया जा रहा है. पर्टिकुलेट मैटर २.५ और १० जैसे कण जो दिखाई नहीं देते, परन्तु उनमें धूल और धातु के बेहद महीन कण शामिल होते हैं, साँसों में घुसकर हमारी ज़िंदगी की उम्र घटा देते हैं. लॉकडाउन में पर्टिकुलेट मैटर में भारी गिरावट दर्ज़ की गई.

     अप्रैल २०१९ को ‘बिज़नस स्टैण्डर्ड’ अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार, साल २०१७ में एक मिलियन से भी अधिक लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण हुई. इसी ख़बर में एक बात यह भी कही गई है कि वायु प्रदूषण साइलेंट किलर होता है और यूनाइटेड नेशन विशेषज्ञों के अनुसार हर वर्ष ७ मिलियन लोगों की जान ले लेता है. बीबीसी समाचार वेबसाइट ने इसी संख्या को अपने एक लेख में ४ मिलियन बताया है. इसके अलावा इंटरनेट पर मौज़ूद अन्य प्रकार की दिल दहला देने वाली जानकारी मौज़ूद है जिसे पढ़कर पता चलता है कि प्रकृति का संतुलन किस हद तक इंसानों ने अपनी गतिविधियों से बिगाड़ दिया है. लेकिन क्या बात यहीं ख़त्म होती है? जवाब है नहीं. पर्यावरण की क्षति का विवरण हमारी आधुनिक जीवन शैली में छुपा हुआ है. ‘विकास’ शब्द के इर्द-गिर्द दौड़ती जीवन शैली और विलासी समाज की सनक ने मनुष्य जगत को तो मौत के क़रीब पहुँचाया ही है साथ ही सम्पूर्ण प्रकृति के जीव-जंतु और वनस्पति संसार को भी भयानक हानि पहुंचाई है. इसका उदहारण बाढ़ की घटनाओं में बढ़ोतरी, भूकंप, बादल फटने की घटनाएँ, जंगलों में लगने वाली आग, ग्लेशियरों का पिघलना, पृथ्वी के तापमान में वृद्धि जैसे कारकों में देखा और अनुभव किया जा सकता है. 

    ख़बरों के मुताबिक़ कोरोना वायरस संक्रमण का पहले केस पिछले साल नवम्बर में ही आ गया था. पहला केस चीन में हुआ. इसके बाद चर्चाओं और अफ़वाहों का जो दौर शुरू हुआ वह अभी तक समाप्त नहीं हुआ है. ‘न्यूज़ 18’ की वेबसाइट पर, ९ मार्च तारीख में लिखे लेख में १ दिसंबर २०१९ में चीनी शहर वुहान में कोविड-१९ के पहले केस की बात लिखी गई है. यह बात ‘लैंसेट जर्नल’ में छपी एक रिपोर्ट के हवाले से लिखी गई है. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि कोरोना संक्रमण नवम्बर में ही फैलना शुरू हो गया था. इस वायरस का स्रोत क्या है और यह कैसे इंसानों तक पहुँचा, इसे लेकर भी कई तरह की बातें सामने आ रही हैं. सोशल मीडिया पर वुहान शहर के जानवरों के बाज़ारों की तस्वीरों को यह कह कर जम कर साझा किया गया कि इसी बाज़ार से वायरस इंसान तक पहुँचा और दुनिया को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया. सोशल मीडिया में साझा की जाने वाली हर तस्वीर का सत्यापन करना मुश्किल है. महामारी में अफ़वाहों का बाज़ार गरम रहा है. इसके अलावा लोगों पर नस्लीय हमले भी हुए. कुल मिलाकर आम समझ में यह बात तय है कि यह महामारी प्रकृति की उस सीमा रेखा को लांघने का नतीजा है जो संतुलन बनाए रखता है. मौज़ूद संतुलन को इंसानी गतिविधियों ने हानी पहुंचाई है. इंसान की शक्तिशाली बनने की सनक ने अवश्य ही कुदरत के कुछ अटल नियम तोड़े हैं.

    इस बात पर लगभग सभी का एक मत है कि कोरोना वायरस चीन से ही निकला है. चर्चाओं के गुब्बारे में बहुत सारी बातें गैस बनकर यहाँ वहाँ घूम रही हैं. एक कहानी यह है कि वुहान में स्थित वायरोलोजी केंद्र से यह वायरस किसी प्रयोग के दौरान निकला और तबाही ले आया. दूसरी थ्योरी यह दी जा रही है कि यह वायरस किसी तरह वुहान के जानवरों के मांस के बाज़ार से इंसानों में आया जिससे लोग संक्रमित होना शुरू हो गए. इसके अलावा इस वायरस की कहानी में सियासत के दांव पेंच और कई अमीर व्यक्तियों के नाम भी शामिल हैं. लेकिन इन सभी बातों का दूसरा पहलू पर्यावरण से ही जुड़ा हुआ है. अगर यह वायरस लैब में बनाया जा रहा था तब इसके पीछे क्या मंशा थी? आखिर इसके बनने के ख़तरे को जानते हुए भी ज़ोखिम क्यों उठाया गया? किन वजहों से ऐसा हुआ? कुछ अमीर व्यक्तियों द्वारा टीका बनाकर करोड़ों रुपए कमाने की कहानियाँ भी सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिलीं.   

    इन उपर्युक्त बातों से अलग कोरोना संक्रमण महामारी के बीच प्रकृति से जुड़ी हुई जिन बातों को हर व्यक्ति ने अनुभव किया वे ही हमारी इंसानी जाति के लिए एक बहुत बड़ा सबक़ हैं. हम सब अब अपने अनुभवों से कह सकते हैं नीला आसमान देखने में कितना अच्छा लगता है. दिल्ली के लोगों ने साफ़ यमुना नदी को देखा जो कई अरसे से करोड़ों रूपयों के प्रोजेक्ट के चलते भी साफ़ नहीं हो पा रहा थी. कुछ शहरों से तो पहाड़ों की चोटियों के साफ़ दिखने की तस्वीरें भी इंटरनेट पर वायरल हुईं. विजिबिलिटी के चलते नज़रों ने स्पष्ट देखना जाना. जब लोग अपने-अपने घरों में क़ैद थे तब सड़कों पर जंगली जानवरों को घूमते देखा गया. कुछ जानवरों के बारे में कहा गया कि वे लुप्त प्राणी की श्रेणी में हैं. घरों के आँगन और छतों पर गोरैया को भी देखने का मौका मिला जो गुमशुदा थीं. ओडिशा में मिले पीले कछुए की तस्वीरें कई दिनों तक सोशल मीडिया में साझा की जाती रहीं जिसके बारे में बताया गया कि यह दुर्लभ प्रजाति से है.      

    कोरोना महामारी के बीच बुरी घटनाओं ने झकझोरा है. देश के पूर्वी हिस्से में विशेषरूप से पश्चिम बंगाल में अम्फन तूफ़ान ने भी देश की सरकार और जनता को पर्यावरण के मुद्दों को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर किया. उम्मीद से भी तेज़ हवाओं ने लोगों के घरों को एक झटके में उड़ा दिया साथ ही शीशे के घरों में रहने वाले रईस लोगों को इशारा दिया कि पर्यावरण में होने वाले बदलावों से अमीर या ग़रीब, कोई भी नहीं बच सकता. सब पर बदलती जलवायु के मिज़ाज का असर होगा. हो सकता है असर की मात्रा कम या ज़्यादा हो, पर कोई भी कुदरत के बदलते मिज़ाज से बच नहीं सकेगा. इसी साल असम और बिहार में आई बाढ़ को भले ही समाचार पत्रों और चैनलों में जगह नहीं दी गई पर इसका मतलब यह नहीं है कि इस पर लोगों को ध्यान नहीं गया. लाखों लोगो कोरोना महामारी में आई इस आपदा के कारण बुरी तरह प्रभावित हुए. बीबीसी की वेबसाइट पर छपी २८ मई की रिपोर्ट के अनुसार अम्फन तूफान का विश्व धरोहर सुंदरबन में जैव विविधता पर असर पड़ा और मेंग्रोव के जंगलों को भी भारी नुकसान हुआ. इलाक़े में अब पलायन की दर के बढ़ने की आशंका भी जताई गई है. जून माह में भारतीय तट सीमा पर निसर्ग तूफान ने दस्तक दी जिसके चलते भारी अव्यवस्था देखने में आई. तूफान का असर रायगढ़ में अधिक देखने को मिला जिसमें धरती की गोद में सोई पेड़ों की मजबूत जडें भी उखड़ गईं.

    हमारी पर्यावरण संबंधी समझ का दायरा सिमटा हुआ है. सक्रिय गतिविधि से दूर जनता सोशल मीडिया में उन बेवजह की चर्चाओं में लिप्त हैं, जो महत्त्व नहीं रखतीं. चालाक व्यवसायी और सरकारें इस असक्रियता का भरपूर फ़ायदा उठा रही हैं. जिन विरोध प्रदर्शनों में जनता पर्यावरण के समर्थन में आई वहाँ बेहतर परिणाम मिले हैं . लेकिन इतना काफी नहीं है. कोरोना वायरस ने यह तो समझा ही दिया है कि कुदरत के बगैर इंसान का अस्तित्व न के बराबर है. कुदरत वह नहीं है जो मान पर चोट लगने पर मानहानि का मुकद्दमा दायर करती है, बल्कि वह जब ग़ुस्सा होती है तब अपना बहुत कुछ छीन लेती है. हमें अपनी प्रकृति संबंधी समझ-संग-सहयोग को विद्यालय में निबंध लिखने से आगे बढ़ाना होगा. कड़वी ही सही सच्चाई यह है कि हम मानसिक रूप से बेकार समझ से संक्रमित समाज बन गए थे. कोरोना महामारी ने केवल हमारे शरीर को संक्रमित किया है और यह बताने का प्रयास किया है कि एक बेहतर दुनिया संभव है, बशर्तें इंसान अपनी गतिविधि और भूमिका में बदलाव करे.   

   -----------

चित्र: एम. एफ. हुसैन 

Friday, 19 March 2021

 

मुझे अभी क्या याद रह गया है? मेरी समस्या और सुविधा यही है कि मुझे सब कुछ याद नहीं रहता. सामान्य इंसानी दिमाग है. दिमाग को स्टोर हाउस नहीं बनाना चाहती. कई बार सोचती हूँ कि दिमाग को यादख़ाना बना लिया जाए तो क्या हश्र हो. अक्सर होता भी है, ‘हश्र’, जो मानसिक तौर पर परेशान करता है. दो दिन पहले छत्तीसगढ़ से होकर आई हूँ. जिस जगह गई थी उसका नाम सिरपुर है. वहाँ अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी थी. बहुत सारे लोग, बहुत सारी बातें कर रहे थे. कुछ को ध्यान से सुना कईयों को ध्यान से सुनने की कोशिश की!

मैं अब बहुत सामाजिक नहीं रह गई हूँ. पब्लिक स्पेस में जाते ही एक बिखराव शुरू हो जाता है और भीतर एक कुंआ तैयार होता है. पहले बाह्यमुखी थी पर वो सब नकली था जिसमें मुझे इत्मिनान नहीं मिलता था. पहले के मुकाबले बहुत अधिक अन्तर्मुखी हो चुकी हूँ. हालाँकि इसमें भी अपनी तरह की दिक्कतें हैं फिर भी यह दायरा मुझे पसंद है. जब कोई अपनी जगह को बदलता है तब शायद वह बाह्यमुखी होने की स्थितियों से टकराता है. यह बुरा नहीं है. भीतर की दुनिया का बड़ा हिस्सा बाहर की दुनिया से निर्मित होता है पर बाद में वो सब अपनी तरह से परिष्कृत होता है. इसकी बड़ी दिलचस्प प्रक्रिया होती है. लेकिन बात इस पर नहीं करनी है.

मुझे अपनी सिरपुर की यात्रा में जो याद रह गया है उसमें जंगल सबसे पहले है. कमल है कि मुझे बुद्ध, बौद्ध विहार, मूर्तियाँ, खाना, भाषा, सेमिनार, विषय और लोगों से अधिक जंगल ज्यादा याद है. यात्रा के आखिरी दिन हमें जंगल घुमाया गया. बहुत बड़ा जंगल. मुझे जो जानकारी मिली, उससे यह पता चलता है कि यह जंगल तीन सौ किलोमीटर में फैला हुआ है. अभी भी सोच रही हूँ कि रंगों की दुनिया को करीब से प्यार करने वाली मैं जंगल को ही क्यों याद कर रही हूँ?

जंगल मेरे पूर्वज हैं. जंगल में कितनी कहानियाँ घूमती होंगी. कार के भीतर से एक फ्रेम बनता है और उसी फ्रेम में आपको जो दीखता है उसे हम देखना मान लेते हैं. मैंने भी यही माना. घर पर बैठकर सोच रही हूँ अगर कार की खिड़की वाला फ्रेम नहीं होता तो मैं क्या क्या देख पाती? कितना बड़ा फ्रेम मेरी दोनों आँखें बनाती? मिट्टी जो उड़कर मेरे चेहरे पर आती तब क्या होता? खिड़की से जो दिखे वो पेड़ थे. बुलंद पेड़. जिनकी पत्तियाँ तलाक के मूड में थीं और बिना कुछ कहे नीचे गिरने को बेताब दिख रही थी. बादल से जैसे बूँदें उसकी इजाजत के बगैर गिर जाती हैं ठीक उसी तरह पत्तियाँ पेड़ों से गिर रही थीं. पेड़ों की लंबाई काफी थी. इतनी कि उनका तना ही दिखाई दे रहा था. लंबा और पतला होता हुआ. जाने वे पेड़ किसे चूमना चाह रहे हों.

कुछ छोटे छोटे पेड़ भी थे. पेड़ मुझे इतनी मात्रा में दिखे कि मैंने उनमें कुछ और देखना शुरू कर दिया. मिसाल के तौर पर एक जगह छोटे बड़े पेड़ दिखाई दिए. उनकी टहनियाँ कुछ इस तरह थीं कि मुझे लगा कि छोटा पेड़ उछल रहा है और बड़ा पेड़ उसका पिता है. उछलते हुए बच्चे को गिरने से बचाने के लिए बड़े पिता-पेड़ ने अपनी टहनियां यानी बाहें फैला ली हैं.

हाँ, हमने पेड़ों से बहुत कुछ सिखा है. पेड़ों ने हमसे क्या सिखा है, ये मुझे नहीं मालूम. पेड़ों के पास बैठकर हम उस पुराने रिश्तों को महसूस करते हैं जब हम दोनों आदिम अवस्था में रहे होंगे. फेलिनी की एक और खुबसूरत फिल्म ‘द नाईट ऑफ़ किबैरिया’ में जंगल और सड़क एक मुख्य स्पेस की तरह उभरते हैं. जंगल में उसका होने वाला पति उसे लूट लेता है. लेकिन इस लूट के दृश्य से पहले वही लड़की उसमें छोटे छोटे फूल इकठ्ठा करती है और बहार की तरह इठलाती है. इन दोनों दृश्यों के बाद वो सबसे बड़ा आइकोनिक दृश्य आता है जब अदाकारा/किरदार, सड़क पर चले जा रहे बैंड के साथ जाती है और आँखों में पानी होठों पर मुस्कराहट आती है.

लेकिन में तो छत्तीसगढ़ के जंगल में थी फिर फिल्म पर कैसे आ गई?

छत्तीसगढ़ की इस बेहद कम दिन की यात्रा में मैंने आवाजों को सुनने में भी ध्यान दिया. सेमिनार और कार्यक्रम में तो ‘हेलो टेस्टिंग टेस्टिंग’ ज़्यादा चलता है और फिर माइक की वही लम्बी बहती हुई ख़राब आवाज़ जिसे कोई नहीं सुनना चाहता. गाँवों में एक खास आवाजों की क़िस्में होती हैं. मिसाल के तौर पर सुबह के वक़्त. अगर आपको थोड़ी हरियाली के आसपास कमरा नसीब हुआ है तो जंगली जानवरों और तरह तरह की चिड़ियों की आवाज़ आपके कानों में आ जाएगी. ऐसा यहाँ भी था. जो आवाजें प्रकृति से आती हैं उन पर हम इंसानों ने कम ध्यान दिया है. वो आवाजें हमारे व्यक्तित्व में या तो घुल गई हैं या फिर उन्हें हमने सुनना छोड़ दिया है. मैंने अभी सुनना शुरू किया है.

Monday, 12 October 2020

क्योंकि हम जानते हुए भी नहीं जानना चाहते


 मुझसे ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते. लेकिन आज पूछा गया-

"हम अपने आख़िरी वक़्त में अपनी ख्वाहिशों को छोटा क्यों कर लेते हैं? ताउम्र बड़ी-बड़ी ख्वाहिशों को पूरा करने में अपना जीवन गुज़ार देते हैं और अंत में जब मौत बेहद नज़दीक होती है तब एक चॉकलेट का टुकड़ा माँगते हैं या फिर पार्क में बैठना चाहते हैं या फिर अम्मी की गोद में सिर रखना चाहते हैं. ऐसा क्यों है?"

ये सवाल एक बड़ा होता हुआ बच्चा मुझसे पूछ रहा है. मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह का सवाल मुझसे पूछ लेगा. 

मेरे पास वास्तव में जवाब नहीं था. लेकिन बैठे बैठे मैं उस पूरी उम्र में तैरने लगी जो मुझे बचपन से याद है. स्कूल जाना,लड़की होना, ये नहीं करना और सिर्फ वही करना, नौकरी करना, फिर छोड़ देना, कई बार हार जाना और कुछ बार जीत जाना. अंत में सब बराबर हो रहा है. और एक दिन मेरा इस शहर से और इस जगह से द्रव्यमान भी ग़ायब हो जाएगा. छू मंतर!

मैंने जवाब देने की कोशिश की. मुझे नहीं पता वो बच्चा मेरे जवाब से कितना संतुष्ट हुआ. लेकिन मैंने उसे बताया-

"मुझे लगता है जन्म से जिस दुनिया में हम दाख़िल होते हैं, उस दुनिया के हम निर्माता नहीं होते. वो एक बना बनाया पैकेज होता है. उसमें न हमारी पसंद होती है और न ही हमारी नापसंद शामिल होती है. कई बार यह लगता है कि ये हमें पसंद है या फिर वो हमें नापसंद है, लेकिन आख़िर में वो सब कुछ हमसे कृत्रिम रूप से जुड़ा हुआ है. हमारे इस दुनिया में आने के साथ ही बनने की प्रक्रिया शुरू होती है. यह तय होने लगता है कि हमें क्या और कैसा बनना है जबकि इस बात पर हम बात नहीं करते कि जिस जगह हम कुछ बनने की तैयारी ले रहे हैं उस जगह की भूमिका आख़िर किसने तय की और वही क्यों हमारे लिए तय की गई है. 

 


 इस पूरी प्रक्रिया के दौरान क़ुदरत अपना हस्तक्षेप करती रहती है. उदाहरण के लिए चीज़ों के जन्म के बाद उसके खात्मे तक या फिर किसी फल को खाने के बाद उसका स्वाद या फिर समुद्र को देखने के बाद एक उचाट/खुशनुमा एहसास...यह दृश्य भी हो सकता है या फिर न दिखने वाला भी. मुझे यह बिलकुल नहीं पता कि हम अपने आसपास के भीतर ही सोचते रह जाते हैं या फिर उससे बाहर भी. कुछ लोगों ने मुझे बताया कि हिमालय में  जोगी रहते हैं. मेरे लिंग की वजह से मेरे भीतर यह पहला सवाल आता है कि जोगिनें क्यों नहीं? खैर, उन जोगियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संसार को त्याग दिया है. इसलिए वह स्व या फिर उस शक्ति की खोज में तप में ध्यान लगा देते हैं. लेकिन दो मिनट को रूककर मैं यह सवाल फिर से सोचती हूँ कि जोगी को भी तो एक बनाई हुई दुनिया मिली है. हाँ, दोनों में फ़र्क होगा. जोगी भी कोई नयी दुनिया नहीं रचते, वे उसी दुनिया में जा रहे हैं, जिसकी संकल्पना अतीत के किन्हीं टुकड़ों में हुई है. 

फ़र्ज़ कीजिए जब हम जन्म लेते तब अमीर और ग़रीब के कांसेप्ट की बजाय कुछ और होता तब हम क्या एयर कैसे बनते? 

इस बनने के अभियान में हम ख़ुद को खो देते हैं. जीना भूल जाते हैं. इसलिए जब ज़िंदगी हाथ से फिसलने लगती है तब क़ुदरत के मैसेज को समझने लगते हैं. हमको मालूम चलता है कि किसी बगीचे में बैठना कहीं बेहतर और मूल ख़ुशनुमा एहसास है बजाय किसी ऊँची इमारत के किसी एसी घर में बैठना..."


मैं और जवाब खोज रही हूँ. आप को क्या लगता है मैं ठीक बोल रही हूँ?

Wednesday, 8 July 2020

Hope

 

Hope is important. It is like fresh air. When times are dark and our expectations are betrayed, be sure, the time to hope is near. Hope is like an older sister, who gives you the warmth of care or an older brother who gives the sense of security. It is like a big green tree,that gives the joy of fulfillment.It is a golden ray of sunshine that shines through the dark. It is like a long night which gives you the patience to wait something good. Hope, my dear hope! You don't know what is in the other side of time. Hope is one's connection with universe. Hope makes you understand the real meaning of your life.

   *(with a help of a friend)   

Tuesday, 2 June 2020

अनलॉक द व्हिस्पर

घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी के साथ फिर से सब कुछ सामान्य होने की बात हो रही है. 'अनलॉकडाउन' शब्द राजनीतिक, सामाजिक, रणनीतिक, व्यापारिक, पारिवारिक स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन औरतों के संदर्भ में कोई भी जल्दी अपना दिमाग 'अनलॉक' करने के लिए राज़ी नहीं होता और न हो रहा है. यह इसलिए सोच रही हूँ क्योंकि सुबह सुबह किसी महिला से फोन पर बात हुई और उसने बहुत हिम्मत इकठ्ठा कर के बात की. मुझे कुछ देर लगी कि उन्हें पहली बात क्या कहूँ? उन्हें ऐसा क्या कहूँ कि उनकी फिल्ड में परेशानी कम से कम हो. कमरों में बैठकर, दूर दिल्ली में बैठकर और विशेष अधिकारों का मज़ा लेकर मैं क्या सोचूं और क्या बताऊँ मुझे समझ नहीं आ रहा था. फोन रखने तक मैंने उनको कुछ बातें कहीं और अपने माँ पापा से यह कहा कि मुझे गाँवों में महिलाओं के बीच काम करना है. वहाँ बहुत ज़रुरत है काम करने की. अगर किसी एक की भी ज़िंदगी या दिमाग में बदलाव आया तब कुछ तो बेहतर करेंगे ज़िंदगी में. तब से अब तक गाँवों में रहने के ख़तरे मुझे बताए जा रहे हैं. और मैं चुपचाप सुन और उबल भी रही हूँ. मैं उन पर कतई ग़ुस्सा नहीं कर रही हूँ लेकिन कुछ तो ऐसा है जिस पर मुझे ग़ुस्सा आ रहा है और बहुत बेजोड़ ग़ुस्सा आ रहा है. जो बात का विषय था वह माहवारी और पैड्स के संदर्भ में था.

पॉइंट 1.
महिला ने कहा कि जब वह पैड्स लेकर अन्य महिलाओं के पास जाती है तब लोग मज़ाक उड़ाते हैं.
ओह! मेरा सिर झुक जाता है. कुछ दर्द, कहीं उठने लगता है. महिलाओं का शरीर, दिमाग, उनका रहन सहन, मिज़ाज, आदतें, शैली, परिधान, भाव सब कुछ चुटकुला जगत के लिए मसाला ही रहा है. लेकिन क्या माहवारी भी मज़ाक है? आपको मालूम है शरीर से खून बहना और लगातार कई दिनों तक बहना कितना ज़्यादा असहनीय है. सोचकर देखें तब यह महसूस होता है कि मेरी पूर्वजाओं ने कितना सहन किया होगा और हम कर रही हैं. हम औरतों और लड़कियों की ज़िंदगी सिर्फ हमारी माँ तक तो नहीं जुड़ी है बल्कि एक श्रृंखला है जिसमें हम सब अच्छी तरह से गुंथे हुए हैं. नाम याद नहीं आ रहा उस फिलोस्फ़र का जिसकी लिखी पंक्ति पढ़ी कि हम सब में कुछ एक जैसा है. वही एक जैसा हम सब औरतों में भी है. इसलिए अगर यह मज़ाक बनाने वाली महिलाओं से भी पंक्ति जुड़ी है तो उन्हें हम समझा सकते हैं कि यह मज़ाक नहीं एक व्यावहारिकता है और हम सब इससे यानी खून बहने की प्रक्रिया से गुज़रते हैं.  हमारी साथी औरतों को भी कई बार हमें बताने की ज़रुरत पड़ जाती है. इसलिए मैं समझती हूँ कि आपसी बाचीत से उनके बंद पड़े विचारों को 'अनलॉक' किया जा सकता है.

अगर हमआपस में ही महिलाएं मज़ाक मज़ाक खेलती रहेंगी तब पुरुष को कैसेइसके प्रति सामान्य बनाएंगी या कैसे पुरुष के लिए इस विषयको कठिन औरशर्म का बनाने के बजायव्यावहारिक बनायेंगी? अक्सर जब भी माहवारी का पुरुष लोगों के मध्य ज़िक्र आता है तब हम ख़ुद मुँह सी लेने की चेष्टा करने लगती हैं जबकि आपको उनको बतलाना चाहिए कि आप माहवारी में हैं और शरीर की परेशानी से गुज़र रही हैं. या फिर यह पैड अच्छा होता है या नर्म होता है! मुझे लगता है बात होनी ही चाहिए, फिर चाहे जैसे भी वाक्य हों!

अगर यह पोस्ट पुरुष लिखता तो सोच रही हूँ क्या लिखता? वह क्या शब्द इस्तेमाल करता जिससे वह महीने से जुड़े मज़ाक को तोड़ कर मिट्टी-मिला बना देता? मैं कोशिश भी करूँ तो उस ख़याल की बुनाई अभी नहीं कर पा रही कि पुरुष क्या कहता, अगर वह समझदारी से इस पर सोचता. इसलिए मैं यह कहूँगी कि उसे सबसे पहले अपनी बेटी और पत्नी के लिए हर महीने पैड्स लाकर घर में रख देने चाहिए, जिस तरीके से वह घर का बाक़ी ज़रूरी सामान लाकर रखता है. जैसे नमक के बिना आप खा नहीं सकते. वह ज़रूरी वस्तु है, ठीक उसी तरह से आपकी बड़ी होती बेटी के आराम के लिए भी आपको यह करना चाहिए. अगर आपकी बहन है तो बहन के लिए कीजिए, बड़ी दीदी है या भाभी है तो लाकर रख दीजिए. बात अब सेनिटरी पैड्स को काली पोलीथिन में या अख़बार में चुपके से लपेटकर तो पूरी नहीं की जा सकती. इसमें शर्म जैसा कुछ भी नहीं है. शर्म तो तब आनी चाहिए जब घर का मुखिया अपनी दारू को ज़रूरी समझता हो या फिर नौजावन होता भाई, अपनी बहन की माहवारी पर शर्म खाकर कुछ न कहता हो. क्या ग़लत कह रही हूँ? बहन को इज्जत बनाकर तब्दील करने में सीना चौड़ा हो जाता है तो बहन को भी तो हक़ या मौका दो कि भाई पैड्स ख़रीदकर लाया है, मुझे नाज़ है भाई पर, कहने का! क्या भाई बहन के लिए अपने विचार और व्यवहार को बदल लेने में कमजोर हैं? नहीं न. उन्हें दिमाग 'अनलॉक' करना ही पड़ेगा. इसमें ग़लत क्या है?

टीवी की दुनिया और न जाने किन किन साधनों से पुरुष ने औरत की मादक और कामुक छवि का जिस्म अपने ख़यालों में हजारों साल से लपेटा है वही औरत भीतरी तौर पर मज़ाक क्यों लगती है? अप्सराओं को भी तो पीरियड्स आते ही होंगे. भीष्म पितामह की माँ गंगा मैया को भी आता होगा, तभी तो पितामह जन्में. देवकी मैया को भी तभी तो कृष्णा जन्म लेकर क्या क्या बनें और बनाए जाते रहे! तो पुरुषों, आपको इसमें मज़ाक बनाने का क्या मसाला मिल रहा है मुझे नहीं मालूम जबकि तुम्हारी हैसियत ही इसी से उभर रही है. शरीर के भीतर के पुर्जे अपने को दुरुस्त फंक्शन में रखते हैं तभी तो शरीर का स्वास्थ्य बना हुआ है. यह पीरियड, माहवारी उसी का एक हिस्सा है!

तुम्हें शर्म नहीं ?
लो जी मैंने काम ही क्या किया जो मुझे शर्म आनी चाहिए? शर्म किस बात पर आनी चाहिए? इसकी लिस्ट बना सकते हैं लेकिन तब क्या आप अपनी लिस्ट भी बनाएंगे. कम से कम पढ़ाई लिखाई को इस दर्ज़े का तो होना चाहिए कि शर्म होती क्या है, समझा सके. शर्म यह नहीं है कि आप हाथ में सेनेटरी पैड लेकर खड़ी हैं या उसका इस्तेमाल कर रही हैं. शर्म जैसा मायावी जाल कहाँ से उड़कर हम औरतों के सिर पर बोझ बना हुआ है मुझे सोचने की दिलचस्पी अभी कम है. अगर औरत किसी लड़के को पसंद करती है तो हाय तौबा, तेज़ हँस दी तो हाय तौबा, ब्लाउज का कट ज़रा डीप हो गया तो हाय तौबा, बाल कटवा लिए तो हाय तौबा...कोई ऐसी जगह है जहाँ हाय तौबा और शर्म की बात न की जा सके. इसमें शर्म जैसा क्या है? शर्म तो तब है जब इसे जानते हुए नज़रन्दाज़ कर दिया जाता है.

आपको एक वाकया बताती हूँ. जब मैं 7वीं में थी तब हमारी क्लास की एक लड़की महीने के दिनों में पेट पकड़कर अचानक रोने लगती थी. मुझे यह समझ नहीं आता था कि अचानक ऐसा क्या हो जाता था कि उसकी यह हालत हो जाती थी. उसकी आँखें खून में डूबी लाल हो जातीं और आँसूं तेज़ी से गिरने लगते. उसका शरीर कुछ इस कद्र दर्द में डूब जाता कि मुझे देखकर नितांत घबराहट होने लगती और बार बार टीचर के आने की राह देखती कि कब वह आये और उसे अस्पताल ले जाए या दवा दे दें. उस दिन मुझे बेहद अजीब सा महसूस होता. चूँकि मेरी उम्र कम थी और मुझे अभी तक पीरियड्स शुरू नहीं हुए थे इसलिए कुछ ख़ास नहीं पता था. क्लास की लड़कियां जिनको होता था वे यही कहती थीं कि इसमें तो दवा नहीं दे सकते! लेकिन मेरा छोटा दिमाग यही कहता कि आख़िर क्यों? हालाँकि मैंने घर में अपनी माँ साहेब को इससे जूझते हुए देखा भी था और शायद नहीं भी. क्योंकि माँ हमेशा ठीक ठाक ही रहती थी. हमेशा काम में लगी रहने वाली मशीन. मेरी बहनें भी माँ की नक़ल ही थीं. मुझे कोई ख़बर नहीं थी कि यह होता क्या है? मेरी दीदी के पास विस्पर पैड्स हुआ करते थे जो सफ़ेद-साफ़ होते थे. एक दिन मैंने उन्हें हाथों में लेकर उन पर हाथ फेरा तब इतना अच्छा अच्छा महसूस हुआ कि बता नहीं सकती. हालाँकि दीदी का डर था तो जल्दी से समेटकर यथास्थान रख दिया.

आज जब उस दृश्य को याद कर रही हूँ तो उसके दर्द को महसूस कर रही हूँ और चाहती हूँ कि आप भी महसूस करें. यह शर्म नहीं है बल्कि यह कुछ लोगों के लिए दर्द भरा है. आपको तो उन दिनों उन्हें आराम देना चाहिए, कमर पर हल्की मालिश कर देनी चाहिए, सिर पर तेल लगा देना चाहिए, कुछ बेहतरीन बातें करनी चाहिए. अपनी माँ को थपथपाते हुए दिन में एक से डेढ़ घंटे सुला देना चाहिए. ठीक यही काम बहन के साथ भी करें. लड़कियों की अश्लील छवि कब तक बनाएंगे? कभी तो ज़मीन पर आकर सोचें कि आपके मज़ाक में किसी का दर्द चुपचाप बैठा है. किसी को इस पर काम करने के लिए हौसला दें न कि उसे शर्म का बासी ताबीज़ बेचना शुरू कर दें.

मुझे नहीं शर्म आती इस पर बात करने पर! फिर आपको क्यों आ रही है? इसमें अश्लील हँसी जैसा कुछ नहीं है! समझदारी दिखाइए और समझिये यही काफी है.

 ----------------
फोटो गूगल से साभार                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...