Tuesday, 7 July 2026

दर्शन के उद्देश्य एवं भाषा के संदर्भ में -- पत्र - 48 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुमने विदेश यात्रा से जो पत्र मुझे भेजा था (एक ऐसा पत्र जो मानो यात्रा जितना ही लंबा था!), उसका उत्तर मैं बाद में दूँगा। अभी मुझे कुछ समय अकेले में जाकर यह विचार करना है कि तुम्हें क्या सलाह दूँ। क्योंकि मुझसे परामर्श करने से पहले तुमने भी इस विषय पर सोचने के लिए समय लिया था। वह भी केवल यह निर्णय करने के लिए कि मुझसे सलाह ली जाए या नहीं। इसलिए मेरे पास और भी अधिक कारण है कि मैं इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करूँ क्योंकि किसी पहेली को सुलझाने में उसे बनाने की अपेक्षा अधिक समय लगता है। यह बात विशेष रूप से इसलिए भी सत्य है कि इस मामले में मेरे हित और तुम्हारे हित एक-दूसरे से भिन्न हैं।

   
 

    क्या मैं फिर से किसी एपिक्यूरियन की तरह बोल रहा हूँ? वास्तव में, मेरे हित तुम्हारे हितों से भिन्न नहीं हैं। यदि तुम्हारे संबंध में आने वाली प्रत्येक बात मेरी चिंता न हो तो मैं तुम्हारा मित्र ही नहीं कहलाऊँगा। मित्रता हमारे बीच ऐसा साझा हित उत्पन्न करती है जिसमें सब कुछ सम्मिलित हो जाता है। न सुख केवल एक व्यक्ति को प्रभावित करता है और न ही दुख; हम एक साझा जीवन जीते हैं। कोई भी व्यक्ति सुखी जीवन नहीं जी सकता यदि वह केवल अपने ही बारे में सोचता रहे और हर बात को अपने लाभ के लिए मोड़ ले। यदि तुम अपने लिए जीना चाहते हो तो तुम्हें किसी दूसरे के लिए भी जीना होगा। सहचर्य की यही भावना सभी मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ती है। यह मानती है कि समस्त मानवजाति के लिए एक समान नियम है। यदि इसे सावधानी तथा श्रद्धा के साथ बनाए रखा जाए तो यह उस दूसरे सहचर्य जिसका मैंने उल्लेख किया था अर्थात् मित्रता के बंधन को भी दृढ़ बनाए रखने में बहुत सहायक होती है। क्योंकि जो व्यक्ति एक सह-मानव के साथ बहुत कुछ साझा करता है, वह अपने मित्र के साथ सब कुछ साझा करता है।

    हे श्रेष्ठ लूसीलियस, मैं चाहता हूँ कि वे शब्दों की बारीकियों में उलझने वाले विद्वान मुझे यह सिखाएँ कि मुझे एक मित्र के लिए क्या करना चाहिए या एक मनुष्य के लिए क्या करना चाहिए न कि यह कि 'मित्र' शब्द के कितने भिन्न-भिन्न अर्थ हो सकते हैं या 'मनुष्य' शब्द कितनी अलग-अलग वस्तुओं का संकेत कर सकता है। मैं देखता हूँ कि बुद्धिमत्ता और मूर्खता एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं में जा रही हैं। मुझे कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए? तुम मुझे किस दिशा में भेज रहे हो? कोई व्यक्ति प्रत्येक मनुष्य को अपना मित्र मानता है। दूसरा अपने मित्र के साथ भी मनुष्य जैसा व्यवहार नहीं करता। कोई मित्रता को अपने स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनाता है। दूसरा स्वयं को अपने मित्र के हित में समर्पित करने के लिए तत्पर रहता है। और उधर तुम शब्दों को मानो यातना-चक्र पर चढ़ाकर मरोड़ रहे हो, अक्षरों और शब्दांशों को अलग-अलग खींच रहे हो। क्या मैं अपने आप यह नहीं समझ सकता कि मुझे किन उद्देश्यों का अनुसरण करना चाहिए और किनका नहीं, जब तक कि मैं कुतर्कपूर्ण तर्क न गढ़ूँ और किसी सत्य आधार पर एक मिथ्या निष्कर्ष न जोड़ दूँ? लज्जा की बात है कि हम, जो परिपक्व और समझदार व्यक्ति हैं, इतने गंभीर विषयों को भी खेल-तमाशे की वस्तु बना दें!

    “चूहा” एक शब्द है। लेकिन चूहा पनीर खाता है। अतः एक शब्द पनीर खाता है।

    मान लो कि मैं इस तर्क का समाधान नहीं कर पाता तो इससे मुझे क्या हानि होने वाली है? इसे न जानने से मुझे कैसी असुविधा होगी? क्या सचमुच मुझे यह डर होना चाहिए कि किसी दिन मैं चूहेदानियों में चूहों के बजाय शब्दों को पकड़ने लगूँगा? या फिर सावधान रहना पड़ेगा कि कहीं मेरी किताब ही पनीर न खा जाए! लेकिन ठहरो, शायद यह तर्क उससे भी अधिक चतुर है —

“चूहा” एक शब्द है।

लेकिन कोई शब्द पनीर नहीं खाता।

अतः चूहा पनीर नहीं खाता।

    यह कैसी बचकानी शरारतें हैं! क्या इन्हीं बातों के लिए हम अपनी भौंहें तानते हैं? क्या इसी कारण हम लंबी दाढ़ियाँ बढ़ाते हैं? क्या हम इन्हीं बातों को सिखाने के लिए इतने गंभीर, चिंतनशील और संयमी बने रहते हैं?

    क्या तुम जानना चाहते हो कि दर्शन मानवजाति को क्या प्रदान करता है— परामर्श और मार्गदर्शन। कोई मृत्यु के बुलावे से घिरा हुआ है, कोई निर्धनता की अग्नि में जल रहा है, कोई धन के कारण पीड़ित है। चाहे वह दूसरों का धन हो या उसका अपना। कोई दुर्भाग्य से भयभीत होकर सिमट जाता है तो कोई अपनी समृद्धि से ही बच निकलना चाहता है। कोई मनुष्यों के अत्याचार का शिकार है तो कोई देवताओं की कठोरताओं से पीड़ित है। तुम यह शब्दों के खेल क्यों रच रहे हो? तुम्हारे पास व्यर्थ की हँसी-मज़ाक के लिए समय नहीं है। तुम्हें तो संकटग्रस्त लोगों की सहायता के लिए बुलाया गया है। तुमने वचन दिया है कि तुम जलपोत-भंग के शिकार लोगों, बंदियों, रोगियों, निर्धनों और उन लोगों की सहायता करोगे जिन्हें अपना सिर जल्लाद की कुल्हाड़ी के सामने झुकाना पड़ता है। फिर तुम कहाँ भटके जा रहे हो? और यह क्या कर रहे हो?

    जिस व्यक्ति के साथ तुम यह खेल खेल रहे हो, वह भयभीत है। उसकी सहायता करो। वह चिंता और अनिश्चितता में पड़ा है। उसे जकड़े हुए बंधनों को काट दो। तुम्हारे चारों ओर के लोग अपने हाथ तुम्हारी ओर बढ़ा रहे हैं। वे सहायता की याचना कर रहे हैं। उनके जीवन या तो नष्ट हो चुके हैं या विनाश के कगार पर हैं। तुम ही उनकी आशा हो, तुम ही उनका सहारा हो। वे तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं कि उन्हें इस उथल-पुथल से बाहर निकालो। वे बिखरे हुए हैं, भटके हुए हैं। उन्हें सत्य के उज्ज्वल प्रकाश का मार्ग दिखाने के लिए तुम्हारी आवश्यकता है। उन्हें बताओ कि प्रकृति ने किन वस्तुओं को आवश्यक बनाया है और कौन-सी वस्तुएँ अनावश्यक हैं। उन्हें समझाओ कि प्रकृति के नियम कितने सरल हैं और जो लोग उनका अनुसरण करते हैं उनका जीवन कितना सुखद और निर्बाध होता है जबकि जो लोग प्रकृति के स्थान पर लोकमत और भ्रांत धारणाओं पर विश्वास करते हैं, उनका जीवन कितना कटु और बोझिल बन जाता है। लेकिन सबसे पहले उन्हें ऐसी शिक्षा दो जो उनके दुःखों को कुछ राहत पहुँचा सके। तुम्हारी इन पहेलियों में से कौन-सी इच्छाओं का अंत करती है? कौन-सी उन्हें थोड़ा भी कम करती है? वे किसी प्रकार की सहायता नहीं करतीं और यही सबसे बड़ी समस्या भी नहीं है। काश, बात यहीं तक सीमित होती! वास्तव में, वे हानि पहुँचाती हैं। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से सिद्ध कर सकता हूँ कि ऐसी उलझनों और कुतर्कों में फँसकर एक उदात्त और श्रेष्ठ चरित्र दुर्बल तथा क्षीण हो जाता है। देखो, ये लोग ऐसे सैनिक हैं जिन्हें भाग्य के विरुद्ध युद्ध लड़ना है। पर उन्हें किस प्रकार सुसज्जित किया जा रहा है? उन्हें कौन-से अस्त्र-शस्त्र दिए जा रहे हैं? यह कहते हुए मुझे लज्जा आती है।

    क्या यही परम कल्याण तक पहुँचने का मार्ग है? “यदि यह”, “यदि वह” जैसी शर्तों और उन कुतर्कों के माध्यम से, जो वकीलों के लिए भी संदिग्ध और शोभाहीन माने जाएँ! जब तुम किसी व्यक्ति से प्रश्न पूछकर जान-बूझकर उसे किसी असत्य कथन के जाल में फँसा देते हो तो यह उससे कितना भिन्न है कि किसी को केवल कानूनी तकनीकी त्रुटि के आधार पर मुक़दमे में हरा दिया जाए? किंतु जैसे प्रेटर (न्यायाधीश) प्रतिवादी को सही मार्ग दिखाता है, वैसे ही दर्शन अपने शिष्यों को सीधा और सत्य मार्ग दिखाता है। तुम लोग अपनी महान प्रतिज्ञाओं से क्यों भटक गए हो? तुमने कितनी बड़ी-बड़ी बातें कही थीं! तुमने कहा था कि तुम मुझे इस स्थिति तक पहुँचा दोगे कि स्वर्ण की चमक मेरे लिए तलवार की चमक से अधिक आकर्षक न रहे कि मैं इतना दृढ़ और अडिग बन जाऊँगा कि उन वस्तुओं को भी अपने पैरों तले रौंद दूँगा जिन्हें संसार एक ओर तो अत्यंत चाहता है और दूसरी ओर अत्यंत भय करता है। अब तुम स्वयं को साहित्य की सबसे प्राथमिक और तुच्छ कक्षाओं तक गिरा रहे हो! तुम ही तो कहा करते थे, “इसी प्रकार हम तारों तक पहुँचते हैं।” दर्शन का वचन तो यह है कि वह मुझे देवताओं के समकक्ष बना देगा। इसी आशा से मुझे बुलाया गया था। इसी उद्देश्य से मैं तुम्हारे पास आया था। अब अपना वचन निभाओ!

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, जहाँ तक संभव हो, दार्शनिकों की ऐसी चुनौतियों और शब्द-जालों से स्वयं को दूर रखो। सच्ची सद्गुणिता के लिए ईमानदार, स्पष्ट और सीधी बात कहीं अधिक उपयुक्त है। यदि तुम्हारे सामने अभी जीवन का बहुत लंबा समय भी पड़ा होता तब भी तुम्हें अपने समय का अत्यंत सावधानी से उपयोग करना पड़ता है ताकि आवश्यक कार्यों के लिए पर्याप्त समय बचा रहे। परंतु वास्तविकता यह है कि समय पहले ही बहुत सीमित है। ऐसे में उन बातों को सीखने में अपना समय नष्ट करना कितना बड़ा पागलपन है जो पूर्णतः अनावश्यक और निरर्थक हैं!


अभी के लिए विराम 

विदा 

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