Friday, 25 September 2026

थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग दो : मार्केसा दे मोंतेमायोर)


भाग दो : मार्केसा दे मोंतेमायोर

आज किसी भी स्पेनी स्कूली बच्चे से अपेक्षा की जाती है कि वह डोना मारिया, मार्केसा दे मोंतेमायोर के बारे में उतना जानता हो, जितना ब्रदर जुनिपर ने वर्षों की खोजबीन के बाद जाना था। उनकी मृत्यु के एक शताब्दी के भीतर ही उनके पत्र स्पेनी साहित्य के महत्वपूर्ण स्मारकों में गिने जाने लगे थे और तब से उनका जीवन तथा उनका समय लगातार लंबे-लंबे अध्ययनों का विषय रहा है। लेकिन उनके जीवनचरित लिखने वालों ने भी एक दिशा में उतनी ही बड़ी भूल की है, जितनी दूसरी दिशा में फ्रांसिस्कन ने की थी। उन्होंने उनके व्यक्तित्व में तरह-तरह के गुण और आकर्षण भरने का प्रयास किया है। उनके पत्रों में बिखरी सुंदरताओं को उनके जीवन और व्यक्तित्व में भी पीछे की ओर आरोपित करने की कोशिश की है। जबकि इस अद्भुत स्त्री का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि पहले उनके व्यक्तित्व से वह सारी चमक-दमक हटा दी जाए और उन्हें विनम्रता से, उनकी कमियों और कुरूपताओं सहित देखा जाए, सिवाय एक सुंदरता के।



वह एक कपड़ा व्यापारी की बेटी थीं, जिसने प्लाज़ा से कुछ ही दूरी पर धन तो कमाया था, लेकिन साथ ही लीमा के लोगों की घृणा भी अर्जित कर ली थी। उनका बचपन सुखी नहीं था। वह कुरूप थीं। उन्हें हकलाने की आदत थी। उनकी माँ सामाजिक आकर्षण पैदा करने के प्रयास में व्यंग्य-बाणों से उन्हें सताती रहती थीं और उन्हें सचमुच गहनों के कवच में लादकर शहर में घूमने के लिए मजबूर करती थीं। वह अकेली रहती थीं और अकेली सोचती थीं। कई विवाह-प्रस्ताव उनके सामने आए, लेकिन जब तक संभव था, उन्होंने अपने समय की सामाजिक परंपरा के विरुद्ध संघर्ष किया और अविवाहित रहने का निश्चय बनाए रखा। उनकी माँ के साथ उन्मादी झगड़े होते, एक-दूसरे पर आरोप, चीख-पुकार और दरवाज़े पटकना। अंततः छब्बीस वर्ष की उम्र में वह एक घमंडी और बर्बाद हो चुके कुलीन व्यक्ति से विवाह करने के लिए मजबूर हो गईं। लीमा का गिरजाघर विवाह में आए मेहमानों की व्यंग्यपूर्ण फुसफुसाहटों से मानो गूँज उठा। फिर भी वह अकेली रहती रहीं और अकेली सोचती रहीं। और जब उनके यहाँ एक अत्यंत सुंदर बेटी का जन्म हुआ तो उन्होंने उस पर अपना मूर्तिपूजक जैसा प्रेम लुटा दिया। लेकिन छोटी-सी क्लारा अपने पिता पर गई थी। वह ठंडी और बौद्धिक स्वभाव की थी। आठ वर्ष की उम्र में ही वह शांति से अपनी माँ के बोलने का ढंग सुधारने लगी थी और कुछ ही समय बाद अपनी माँ को आश्चर्य और घृणा की दृष्टि से देखने लगी। डरी हुई माँ अत्यंत विनम्र और चापलूस हो गईं, लेकिन वे स्वयं को डोना क्लारा पर अपनी घबराई हुई देखभाल और थका देने वाले प्रेम की बौछार करने से रोक नहीं पाती थीं। फिर वही उन्मादी आरोप-प्रत्यारोप, चीखें और दरवाज़े पटकने की आवाज़ें लौट आईं। डोना क्लारा के सामने जितने विवाह-प्रस्ताव आए, उनमें से उसने जान-बूझकर वही प्रस्ताव चुना जिसमें उसे स्पेन जाकर रहना था। इसलिए वह स्पेन चली गई। उस देश में, जहाँ किसी को अपने पत्र का उत्तर मिलने में छह महीने लग जाते थे। इतनी लंबी समुद्री यात्रा पर विदा होने की रस्म पेरू में चर्च की एक औपचारिक धार्मिक सेवा का रूप ले चुकी थी। जहाज़ को आशीर्वाद दिया गया और जैसे-जैसे जहाज़ और समुद्र-तट के बीच की दूरी बढ़ती गई, दोनों ओर के लोग घुटनों के बल बैठकर एक भजन गाने लगे, जिसकी आवाज़ उस खुले आकाश और अथाह समुद्र के बीच हर बार कमजोर और भयभीत-सी लगती थी। डोना क्लारा अत्यंत संयम के साथ समुद्र-यात्रा पर निकल गईं और अपनी माँ को उस चमकते हुए जहाज़ को तब तक देखते हुए छोड़ गईं, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गया। माँ का एक हाथ कभी अपने हृदय पर जाता तो कभी मुँह पर। शांत प्रशांत महासागर और उसके ऊपर सदा स्थिर दिखाई देने वाले मोती जैसे विशाल बादलों का दृश्य उनकी आँखों के सामने धुँधला और आँसुओं से लकीरदार होता गया।

लीमा में अकेली रह गईं मार्केसा का जीवन धीरे-धीरे और भी अधिक उनके भीतर सिमटता गया। वे अपने पहनावे के प्रति लगातार अधिक लापरवाह होती गईं और सभी अकेले लोगों की तरह स्वयं से ऊँची आवाज़ में बातें करने लगीं। उनका पूरा अस्तित्व उनके मन के जलते हुए केंद्र में सिमट गया था। उस मानसिक मंच पर उनकी बेटी के साथ अंतहीन संवाद चलते रहते। ऐसे मेल-मिलाप, जो वास्तव में कभी हो ही नहीं सकते थे। पछतावे और क्षमा के वे दृश्य, जिन्हें वे बार-बार नए सिरे से जीती रहती थीं। सड़क पर आप एक बूढ़ी स्त्री को देखते। उसकी लाल रंग की विग एक कान के ऊपर कुछ झुकी हुई, बायाँ गाल कोढ़ जैसी बीमारी से सूजा और लाल और दायाँ गाल उसके अनुरूप लगाए गए गाढ़े श्रृंगार से रंगा हुआ। उसकी ठुड्डी कभी सूखी नहीं रहती थी। उसके होंठ कभी शांत नहीं होते थे। लीमा विचित्र लोगों का शहर था, लेकिन वहाँ भी वह लोगों के लिए हँसी का विषय बन गई थीं, जब वह सड़कों से अपनी गाड़ी में गुजरतीं या अपने चर्चों की सीढ़ियाँ घिसटते हुए चढ़तीं। लोग समझते थे कि वह लगातार नशे में रहती हैं। उनके बारे में इससे भी बुरी बातें कही जाती थीं और उन्हें बंद कर देने की माँग करते हुए अर्ज़ियाँ घूम रही थीं। इंक्विज़िशन के सामने उनके विरुद्ध तीन बार शिकायत की जा चुकी थी। यह असंभव नहीं था कि उन्हें जिंदा जला दिया जाता, यदि उनके दामाद का स्पेन में इतना प्रभाव न होता और यदि उन्होंने किसी तरह वायसराय के दरबार के आस-पास कुछ ऐसे मित्र न बना लिए होते, जो उनकी विचित्रताओं और व्यापक अध्ययन के कारण उन्हें सहन करते थे।

माँ और बेटी के बीच संबंधों का यह दुखद स्वरूप धन को लेकर पैदा हुई गलतफहमियों से और भी कड़वा हो गया। कॉनदेसा[3] को अपनी माँ से अच्छी-खासी आर्थिक सहायता और लगातार उपहार मिलते थे। डोना क्लारा शीघ्र ही स्पेन के राजदरबार में बुद्धिमत्ता और विद्वता की सबसे प्रमुख महिलाओं में से एक बन गईं। पेरू की सारी संपत्ति भी उस भव्य जीवन-शैली को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होती, जिसे वह अपने लिए पसंद करती थीं। अजीब बात यह थी कि उनकी यह फिजूलखर्ची उनके स्वभाव के सबसे अच्छे गुणों में से एक से पैदा हुई थी। वह अपने मित्रों, सेवकों और राजधानी के सभी दिलचस्प लोगों को अपनी संतान के समान समझती थीं। वास्तव में ऐसा लगता था कि संसार में केवल एक ही व्यक्ति ऐसा था, जिसके प्रति वह अपने सद्भाव और सेवा-भाव को नहीं लुटाती थीं। उनके संरक्षण में रहने वालों में मानचित्रकार दे ब्लासियिस भी था, जिसकी पुस्तक ‘मैप्स ऑफ द न्यू वर्ल्ड’ (Maps of the New World) मार्केसा दे मोंतेमायोर को समर्पित की गई थी। लीमा के दरबारियों ने जब यह पढ़ा कि वह “अपने नगर की प्रशंसा और पश्चिम में उगता हुआ सूर्य” हैं तो वे ठहाके लगाकर हँसे थे। एक अन्य व्यक्ति वैज्ञानिक अज़ुआरियस था, जिसका जल-प्रवाह-विज्ञान के नियमों पर लिखा ग्रंथ इंक्विज़िशन ने इसलिए दबा दिया था कि वह अत्यधिक उत्तेजक था। एक पूरे दशक तक कॉनदेसा ने वास्तव में स्पेन की सभी कलाओं और विज्ञानों को आर्थिक सहारा दिया। उस समय कुछ भी यादगार रचना उत्पन्न नहीं हुई, इसमें उसका कोई दोष नहीं था।

डोना क्लारा के चले जाने के लगभग चार वर्ष बाद डोना मारिया को यूरोप की यात्रा करने की अनुमति मिल गई। दोनों ओर से इस मुलाकात की तैयारी आत्मग्लानि से उपजी प्रतिज्ञाओं के साथ की गई थी। एक ओर प्रतिज्ञा थी कि धैर्य रखा जाएगा, दूसरी ओर यह कि भावनाओं को खुलकर प्रदर्शित नहीं किया जाएगा। दोनों ही प्रतिज्ञाएँ असफल रहीं। दोनों ने एक-दूसरे को यातना दी और आत्म-भर्त्सना तथा भावनाओं के विस्फोटों के बीच झूलते हुए लगभग अपना विवेक खो बैठीं। अंततः एक दिन डोना मारिया सूर्योदय से पहले उठीं। उन्होंने इतना साहस भी नहीं किया कि उस दरवाज़े को, जिसके पीछे उनकी बेटी सो रही थी, चूमने के अलावा कुछ और करें। फिर उन्होंने जहाज़ पकड़ा और अमेरिका लौट आईं। इसके बाद जो स्नेह वे एक-दूसरे के साथ प्रत्यक्ष जीवन में नहीं जी सकती थीं, उसकी जगह पत्र-लेखन ने ले ली।

ये वही पत्र थे जो एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहाँ ऐसी चीज़ें भी संभव थीं, स्कूली बच्चों की पाठ्य-पुस्तक और व्याकरणाचार्यों के लिए अध्ययन का विशाल क्षेत्र बन गए थे। यदि डोना मारिया जन्म से ही प्रतिभाशाली न होतीं तो भी वे अपनी प्रतिभा स्वयं गढ़ लेतीं क्योंकि अपनी दूर रह रही बेटी का ध्यान और शायद उसकी प्रशंसा भी अपनी ओर आकर्षित करना उनके प्रेम के लिए इतना आवश्यक था। उन्होंने स्वयं को समाज में जाने के लिए मजबूर किया ताकि वहाँ से उपहास और हास्य के विषय चुनकर ला सकें। उन्होंने अपनी आँखों को बारीकी से देखना सिखाया। अपनी भाषा की श्रेष्ठ कृतियाँ पढ़ीं ताकि यह जान सकें कि भाषा किस प्रकार प्रभाव उत्पन्न करती है। वे उन लोगों की संगति में स्वयं को शामिल करती रहीं जो अपनी बातचीत की कला के लिए प्रसिद्ध थे। रात-दर-रात अपने बारोक[4] महल में बैठकर वे उन अविश्वसनीय पृष्ठों को लिखतीं और फिर बार-बार दोबारा लिखतीं। वे अपने निराश मन से बुद्धि और लालित्य के उन चमत्कारों को निचोड़कर निकालती थीं, वायसराय के दरबार के उन सार-संकलित वृत्तांतों को, जिन्हें आज हम पढ़ते हैं। अब हम जानते हैं कि उनकी बेटी उन पत्रों पर मुश्किल से एक नज़र डालती थी और उन पत्रों के सुरक्षित रह जाने का श्रेय उनके दामाद को जाता है।

यदि मार्केसा को यह पता चलता कि उनके पत्र अमर हो गए हैं तो उन्हें बहुत आश्चर्य होता। फिर भी अनेक आलोचकों ने उन पर यह आरोप लगाया है कि लिखते समय उनकी एक आँख भावी पीढ़ियों पर लगी रहती थी। वे ऐसे कई पत्रों की ओर संकेत करते हैं जिनमें प्रदर्शन-कौशल का पूरा आभास मिलता है, मानो वे अपनी साहित्यिक प्रतिभा का प्रदर्शन करने के लिए लिखे गए हों। उन्हें यह असंभव-सा लगता है कि डोना मारिया ने अपनी बेटी को चकित करने और मुग्ध करने के लिए उतनी ही मेहनत की होगी, जितनी अधिकांश कलाकार जनता को चकित करने के लिए करते हैं। लेकिन वे भी, उनके दामाद की तरह उन्हें समझ नहीं पाए। कॉनदेसा के पति को उनके पत्र बहुत आनंद देते थे, लेकिन उनका विचार था कि शैली का आनंद ले लेने के बाद उन्होंने उन पत्रों की सारी समृद्धि और उद्देश्य प्राप्त कर लिया है। इस तरह वे (जैसा कि अधिकांश पाठक करते हैं) साहित्य के पूरे आशय को समझने से चूक गए। और साहित्य का मूल उद्देश्य क्या है? हृदय का अंकन। शैली तो बस वह हल्का-सा तुच्छ पात्र है जिसमें दुनिया के सामने कड़वे द्रव को परोसा जाता है। मार्केसा को यह जानकर भी आश्चर्य होता कि उनके पत्र बहुत अच्छे थे। क्योंकि ऐसे लेखक सदैव अपने मन की उस ऊँची और निर्मल वायु में जीते हैं जहाँ उनके लिए वे रचनाएँ, जो हमें असाधारण लगती हैं, उनके लिए दिनचर्या के साधारण काम से अधिक नहीं होतीं।

यह वही बूढ़ी स्त्री थी जो घंटे-दर-घंटे अपनी बालकनी में बैठी रहती थी। उसकी विचित्र पुआल की टोपी उसके झुर्रियों से भरे पीले चेहरे पर बैंगनी छाया डालती रहती थी। कितनी ही बार, जब वह अपने रत्नजड़ित हाथों से अपने पत्रों के पन्ने पलटती तो लगभग मनोरंजन-भाव से स्वयं से पूछती कि उसके हृदय में लगातार बनी रहने वाली यह पीड़ा क्या वास्तव में किसी शारीरिक अंग में स्थित है। वह कल्पना करती कि कोई अत्यंत कुशल डॉक्टर उसके उस घायल सिंहासन अर्थात हृदय तक चीर-फाड़ करके पहुँच जाए और अंततः वहाँ कोई ऐसा निशान खोज ले, फिर अपना चेहरा उठाकर चिकित्सा के विद्यार्थियों से पुकारकर कहे, “इस स्त्री ने दुख सहा है और उसके दुख ने उसके हृदय की संरचना पर अपना निशान छोड़ दिया है।” यह विचार उसके मन में इतनी बार आया कि एक दिन उसने इसे अपने एक पत्र में लिख दिया। उसकी बेटी ने इसके लिए उसे डाँटा। कहा कि वह अत्यधिक आत्मविश्लेषण करती है और दुख को एक तरह का धर्म या पूजा बना रही है।

यह जान लेना कि उसे कभी भी बदले में प्रेम नहीं मिलेगा, उसकी सोच पर उसी तरह प्रभाव डालता था जैसे समुद्र की लहरें चट्टानों पर डालती हैं। सबसे पहले उसकी धार्मिक आस्थाएँ टूट गईं। क्योंकि ईश्वर से या अमरत्व से वह और कुछ नहीं माँग सकती थी, सिवाय ऐसी जगह के जहाँ बेटियाँ अपनी माताओं से प्रेम करती हों। स्वर्ग के बाकी सारे गुण उसे कौड़ी के मोल मिल सकते थे। इसके बाद उसे अपने आस-पास के लोगों की ईमानदारी पर विश्वास नहीं रहा। वह मन-ही-मन यह मानने से इनकार करने लगी कि (उसके अलावा) कोई भी किसी से प्रेम करता है। सभी परिवार रीति-रिवाजों के एक अपव्ययी वातावरण में जी रहे थे और एक-दूसरे को भीतर ही भीतर उदासीन रहते हुए चूमते थे। उसने देख लिया था कि इस संसार के लोग अहंकार के कवच में घूमते हैं। अपने ही प्रतिबिंब को निहारने में डूबे हुए हैं। प्रशंसा के लिए तरसते हैं। उनसे कही गई बातों में से बहुत कम सुनते हैं। अपने सबसे निकट के मित्रों पर पड़ने वाली विपत्तियों से भी विचलित नहीं होते और उन सभी पुकारों से डरते हैं जो उनकी अपनी इच्छाओं के साथ चल रहे लंबे एकांत-संवाद को बाधित कर सकती हैं। ये ही कैथे[5] से लेकर पेरू तक फैले संसार के आदम और हव्वा के बेटे-बेटियाँ थे। और जब बालकनी में बैठे-बैठे उसके विचार इस मोड़ तक पहुँचते तो शर्म से उसका मुँह सिकुड़ जाता क्योंकि वह जानती थी कि वह स्वयं भी पाप करती है। वह जानती थी कि अपनी बेटी के प्रति उसका प्रेम इतना विशाल था कि उसमें प्रेम के सभी रंग समा सकते थे, फिर भी उसमें अत्याचार की एक हल्की-सी छाया भी थी। वह अपनी बेटी से उसकी बेटी होने के कारण नहीं बल्कि अपने लिए प्रेम करती थी। वह इस नीच बंधन से स्वयं को मुक्त करना चाहती थी। लेकिन उसका प्रेम इतना प्रचंड था कि वह उस पर काबू नहीं पा सकती थी। और तब उस हरी-भरी बालकनी में उस कुरूप बूढ़ी स्त्री के भीतर एक विचित्र युद्ध छिड़ जाता। एक ऐसी प्रलोभन के विरुद्ध अत्यंत निरर्थक संघर्ष, जिसके सामने झुकने का अवसर भी उसे कभी मिलने वाला नहीं था। वह अपनी बेटी पर अधिकार कैसे जमा सकती थी, जब उसकी बेटी ने यह सुनिश्चित कर रखा था कि उन दोनों के बीच चार हजार मील की दूरी हो? फिर भी डोना मारिया अपने उस प्रलोभन के भूत से लड़ती रहती और हर बार पराजित होती। वह अपनी बेटी को केवल अपने लिए चाहती थी। वह चाहती थी कि उसकी बेटी उससे कहे, “आप संसार की सबसे अच्छी माँ हैं।” और वह तरसती थी कि उसकी बेटी उसके कान में धीरे से कहे, “मुझे क्षमा कर दीजिए।”

स्पेन से लौटने के लगभग दो वर्ष बाद कुछ ऐसी छोटी-छोटी, लगभग अनदेखी रह जाने वाली घटनाओं की एक श्रृंखला घटी, जिनसे मार्केसा के आंतरिक जीवन के बारे में बहुत कुछ पता चलता है। उनके पत्र-संग्रह में उनका केवल अत्यंत हल्का-सा संकेत मिलता है। लेकिन चूँकि वह संकेत पत्र संख्या XXII में है और उस पत्र में इसके अतिरिक्त भी कुछ महत्वपूर्ण संकेत मौजूद हैं, इसलिए मैं पत्र के पहले भाग का अनुवाद और उस पर टिप्पणी करने का पूरा प्रयास करूँगा:

“क्या स्पेन में कोई डॉक्टर नहीं हैं? वे अच्छे लोग कहाँ गए जो फ़्लैंडर्स[6] से आकर तुम्हारी इतनी सहायता किया करते थे? ओह, मेरी जान, तुम्हें इतने सप्ताह तक अपनी सर्दी को बने रहने देने के लिए हम तुम्हें कितनी भी सज़ा दें, कम होगी! डॉन विसेंटे (दामाद को इंगित किया है), मैं आपसे विनती करती हूँ कि मेरी बच्ची को समझाइए। स्वर्ग के देवदूतों, मैं आपसे विनती करती हूँ कि मेरी बच्ची को समझाइए। अब जबकि तुम ठीक हो गई हो, मैं तुमसे आग्रह करती हूँ कि यह निश्चय कर लो कि जब भी सर्दी-जुकाम का पहला संकेत मिले, तुम अपने शरीर को अच्छी तरह भाप दोगी और बिस्तर पर चली जाओगी। यहाँ पेरू में मैं असहाय हूँ। मैं कुछ नहीं कर सकती। अपनी ज़िद मत करो, मेरी प्यारी। ईश्वर तुम्हें आशीर्वाद दे। आज के पैकेट में मैं एक पेड़ का गोंद भेज रही हूँ, जिसे सैन तोमास की बहनें घर-घर घूमकर बेचती हैं। यह कितना उपयोगी है, मैं नहीं जानती। इससे कोई नुकसान तो नहीं हो सकता। मुझे बताया गया है कि कॉन्वेंट में वे मूर्ख बहनें इसे इतनी लगन से सूँघती हैं कि प्रार्थना के समय अगरबत्ती की गंध तक महसूस नहीं होती। यह सचमुच किसी काम की चीज़ है या नहीं, मैं नहीं जानती। तुम इसे आज़माकर देखो।

“निश्चिंत रहो, मेरी जान, मैं महामहिम कैथोलिक सम्राट के लिए वह बेहतरीन सोने की जंजीर भेज रही हूँ।” (उनकी बेटी ने उन्हें लिखा था: “जंजीर अच्छी हालत में पहुँच गई और मैंने उसे शिशु राजकुमार के बपतिस्मे के समय पहना था। महामहिम कैथोलिक सम्राट ने कृपा करके उसकी प्रशंसा की और जब मैंने उन्हें बताया कि आपने यह मुझे दी है तो उन्होंने आपके स्वाद की प्रशंसा करते हुए आपको अपना अभिवादन भेजा। आप उन्हें इसी तरह की एक और जंजीर भेजना न भूलें। उसे तुरंत राजमहल के चेम्बरलेन के माध्यम से भेजें।”) “उन्हें कभी पता नहीं चलना चाहिए कि इसे प्राप्त करने के लिए मुझे एक चित्र के भीतर चलकर जाना पड़ा। तुम्हें याद है कि सैन मार्तीन की सैक्रिस्टी में वेलास्केज़ की बनाई एक तस्वीर है, जिसमें उस वायसराय का चित्र है जिसने मठ की स्थापना की थी और उसके साथ उसकी पत्नी और उसका बदमाश-सा बच्चा भी है? और उसकी पत्नी ने सोने की एक जंजीर पहन रखी है? मैंने निश्चय कर लिया कि मुझे वही जंजीर चाहिए। इसलिए एक आधी रात को मैं चुपके से सैक्रिस्टी में घुसी, बारह वर्ष की लड़की की तरह वस्त्र रखने वाली मेज़ पर चढ़ी और चित्र के भीतर चलकर चली गई। कैनवास ने एक क्षण के लिए मेरा विरोध किया, लेकिन स्वयं चित्रकार आगे आया और उसने रंगों की परतों के बीच से मुझे भीतर खींच लिया। मैंने उससे कहा कि स्पेन की सबसे सुंदर लड़की संसार के सबसे कृपालु राजा को देने के लिए सबसे सुंदर सोने की जंजीर चाहती है। बस, बात इतनी ही सरल थी और फिर हम चारों उस धूसर और चाँदी जैसी रोशनी वाली हवा में खड़े बातें कर रहे थे, जो वेलास्केज़ की चित्रकला की विशेषता है। अब मैं लगातार एक और अधिक सुनहरी रोशनी के बारे में सोचती रहती हूँ। मैं महल की ओर देखती रहती हूँ। मुझे आज की शाम टिशियन के किसी चित्र के भीतर बितानी ही होगी। क्या वायसराय मुझे इसकी अनुमति देंगे?”

“लेकिन महामहिम को फिर से गठिया हो गया है। मैं ‘फिर से’ इसलिए कह रही हूँ क्योंकि दरबार की चापलूसी यह मानने पर अड़ी रहती है कि कभी-कभी वे इससे मुक्त भी हो जाते हैं। आज सेंट मार्क का दिन है, इसलिए महामहिम विश्वविद्यालय जाने के लिए निकले थे, जहाँ बाईस नए डॉक्टरों को संसार में जन्म दिया जा रहा था। लेकिन उन्हें अभी उनके दीवान से उठाकर गाड़ी तक पहुँचाया ही गया था कि वे चीख पड़े और आगे जाने से इनकार कर दिया। उन्हें वापस उनके बिस्तर पर ले जाया गया, जहाँ उन्होंने बड़े स्वाद से पी जाने वाली एक सिगार तोड़ डाली और पेरिकोल[7] को बुलाने के लिए आदमी भेजा। और जब हम कमोबेश लैटिन में दिए जा रहे लंबे धार्मिक भाषण सुन रहे थे, तब उन्होंने हमारे बारे में कमोबेश स्पेनी भाषा में सब कुछ उस शहर के सबसे लाल और सबसे क्रूर होंठों से सुन लिया।” (डोना मारिया ने इस अनुच्छेद को लिखने की अनुमति स्वयं को दे दी थी, हालाँकि उन्होंने अपनी बेटी के पिछले पत्र में अभी-अभी यह पढ़ा था: “मुझे तुम्हें कितनी बार बताना पड़ेगा कि अपने पत्रों में कही जाने वाली बातों के मामले में अधिक सावधान रहो? तुम्हारे पत्रों से अक्सर यह संकेत मिलता है कि रास्ते में उन्हें खोला गया है। कुस्को[8] में उस बात, तुम समझती हो मैं किस बात की बात कर रही हूँ, के बारे में तुम्हारी टिप्पणियों से अधिक अविवेकपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। ऐसी टिप्पणियाँ मज़ेदार नहीं हैं, भले ही विसेंटे ने अपने पत्र के अंत में तुम्हारी उन बातों की प्रशंसा की हो। और उनसे यहाँ स्पेन में कुछ विशेष व्यक्तियों के साथ हमारे लिए बहुत बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है। मुझे अब भी यह देखकर आश्चर्य होता है कि तुम्हारी इन बेबाक बातों के कारण तुम्हें बहुत पहले ही अपने खेत पर जाकर रहने का आदेश क्यों नहीं दिया गया।”)

“धार्मिक अभ्यास के समय वहाँ बहुत भीड़ थी और बालकनी से दो स्त्रियाँ गिर पड़ीं। लेकिन ईश्वर ने अपनी कृपा से यह सुनिश्चित किया कि वे डोना मर्सेद पर गिरें। तीनों को बहुत चोट लगी है, लेकिन एक वर्ष के भीतर वे दूसरी ही बातों के बारे में सोच रही होंगी। दुर्घटना के समय राष्ट्रपति भाषण दे रहे थे और उनकी दृष्टि कमजोर होने के कारण वे समझ ही नहीं सके कि चीख-पुकार, बातचीत और गिरते हुए शरीरों की यह हलचल किस बारे में है। उन्हें सिर झुकाकर अभिवादन करते देखना बहुत सुखद था, इस भ्रम में कि लोग उनके लिए तालियाँ बजा रहे हैं।”

“पेरिकोल और तालियों की बात चली ही है तो तुम्हें यह जानना चाहिए कि पेपिता और मैंने आज शाम को कोमेदिया[9] जाने का निश्चय किया है। जनता अब भी अपनी पेरिकोल को देवता की तरह पूजती है। यहाँ तक कि वह उसकी उम्र को भी माफ कर देती है। हमें बताया जाता है कि वह हर सुबह अपने गालों पर बारी-बारी से बर्फ और आग की पेंसिलें फेरकर अपनी सुंदरता में से जितना बचा सकती है, बचा लेती है।” (इस कल्पना का अनुवाद विशेष रूप से मूल से बहुत कम प्रभावशाली हो जाता है क्योंकि इसमें स्पेनी भाषा की पूरी आडंबरपूर्ण चमक समाई हुई है। यह वास्तव में कॉनदेसा की खुशामद के लिए किया गया अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन था और सत्य नहीं था। उस समय महान अभिनेत्री की आयु अट्ठाईस वर्ष थी। उसके गाल गहरे पीले संगमरमर जैसी चिकनी और चमकदार त्वचा वाले थे और निश्चित रूप से कई वर्षों तक वैसे ही बने रहने वाले थे। अपने अभिनय के लिए आवश्यक प्रसाधनों के अतिरिक्त कैमिला पेरिकोल अपने चेहरे की देखभाल के लिए केवल इतना करती थी कि दिन में दो बार उसे ठंडे पानी से उसी तरह धोती थी जैसे, कोई किसान घोड़े को पानी पिलाने की नांद के पास उसके चेहरे पर पानी डालता है।) “जिस विचित्र व्यक्ति को लोग अंकल पियो कहते हैं, वह हर समय उसके साथ रहता है। डॉन रुबियो का कहना है कि वह समझ ही नहीं पाता कि अंकल पियो उसका पिता है, प्रेमी है या बेटा। पेरिकोल ने आज शानदार अभिनय किया। तुम मुझे प्रांतीय मूर्ख कहकर जितना चाहे डाँट सकती हो, लेकिन स्पेन में तुम्हारे पास ऐसी कोई अभिनेत्री नहीं है।” और इसी तरह आगे भी।

इसी थिएटर-यात्रा से आगे की एक महत्वपूर्ण घटना जुड़ी हुई है। उन्होंने उस कोमेदिया जाने का निश्चय किया, जहाँ पेरिकोल मोरेतो के नाटक ‘त्राम्पा अदेलेन्ते’ (Trampa Adelante) में डोना लियोनोर की भूमिका निभा रही थी। शायद इस यात्रा से उनकी बेटी के लिए अगले पत्र में लिखने लायक कुछ सामग्री मिल जाए। वह अपने साथ पेपिता को ले गईं, उस छोटी लड़की को, जिसके बारे में आगे हमें बहुत कुछ जानने को मिलेगा। डोना मारिया ने उसे सांता मारिया रोज़ा दे लास रोज़ास के कॉन्वेंट से जुड़े अनाथालय से अपने साथ रहने और उनका साथ देने के लिए लिया था। मार्केसा अपने निजी बॉक्स में बैठी हुई चमकदार मंच को उदासीन-सी दृष्टि से देख रही थीं। नाटकों के बीच पेरिकोल की आदत थी कि वह अपने दरबारी अभिनय-पात्र को कुछ देर के लिए छोड़कर पर्दे के सामने आती और तत्कालीन घटनाओं पर आधारित कुछ गीत गाती। उस शरारती अभिनेत्री ने मार्केसा को आते हुए देख लिया था और कुछ ही देर बाद उसने तात्कालिक रूप से ऐसे दोहे गढ़ने शुरू कर दिए जिनमें मार्केसा के रूप-रंग, उनकी कंजूसी, उनकी शराबखोरी और यहाँ तक कि उनकी बेटी के उनसे दूर चले जाने तक का मज़ाक उड़ाया गया था। धीरे-धीरे पूरे सभागार का ध्यान उस बूढ़ी स्त्री की ओर खींच दिया गया और दर्शकों की हँसी के साथ उनके तिरस्कार की बढ़ती हुई गुनगुनाहट भी सुनाई देने लगी। लेकिन मार्केसा, नाटक के पहले दो अंकों से गहराई से प्रभावित थीं। उन्होंने गायिका को लगभग देखा ही नहीं। वे सामने एकटक देखती बैठी रहीं और स्पेन के बारे में सोचती रहीं। कैमिला पेरिकोल और अधिक निर्भीक होती गई और भीड़ की घृणा तथा उल्लास से वातावरण मानो बिजली से भर गया। अंततः पेपिता ने मार्केसा की बाँह खींची और फुसफुसाकर कहा कि उन्हें वहाँ से चले जाना चाहिए। जैसे ही वे अपने बॉक्स से बाहर निकलीं, पूरा सभागार खड़ा हो गया और विजय के उल्लास में जोरदार शोर करने लगा। पेरिकोल उन्मत्त होकर नाचने लगी क्योंकि उसने हॉल के पीछे प्रबंधक को देख लिया था और समझ गई थी कि उसका वेतन बढ़ा दिया गया है। लेकिन मार्केसा को इस दौरान जो कुछ हुआ था, उसका तनिक भी आभास नहीं हुआ। बल्कि वे तो काफी प्रसन्न थीं क्योंकि इस यात्रा के दौरान उन्होंने कुछ सुंदर और प्रभावशाली वाक्य गढ़ लिए थे। ऐसे वाक्य, कौन जानता है, जो उनकी बेटी के चेहरे पर मुस्कान ला दें और उसे यह कहने पर मजबूर कर दें, “सचमुच, मेरी माँ कितनी आकर्षक हैं।”

समय आने पर यह खबर वायसराय के कानों तक पहुँची कि उसके किसी कुलीन व्यक्ति का थिएटर में खुलेआम उपहास किया गया है। उसने पेरिकोल को महल में बुलाया और आदेश दिया कि वह मार्केसा के घर जाकर उनसे क्षमा माँगे। उसे वहाँ नंगे पैर और काले वस्त्र पहनकर जाना था। कैमिला ने बहस की, विरोध किया और खूब लड़ाई की, लेकिन उसे केवल एक जोड़ी जूते की छूट मिल सकी।

वायसराय के इस आदेश पर अड़े रहने के तीन कारण थे। पहला, गायिका ने उसके दरबार की मर्यादा का उल्लंघन किया था। डॉन आंद्रेस ने निर्वासन को सहने योग्य बनाने के लिए दरबारी रस्मों का ऐसा जटिल संसार बना रखा था कि उसे केवल वही समाज याद रख सकता था जिसके पास सोचने के लिए कोई और काम नहीं था। वह अपने छोटे-से कुलीन वर्ग और उसके सूक्ष्म भेदों को बहुत सँजोकर रखता था और किसी मार्केसा का अपमान उसके अपने व्यक्तित्व का अपमान माना जाता था। दूसरा, डोना मारिया का दामाद स्पेन में लगातार अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनता जा रहा था। उसके पास वायसराय को नुकसान पहुँचाने की बहुत-सी संभावनाएँ थीं बल्कि स्वयं उसकी जगह लेने की भी संभावना थी। कॉनदे विसेंटे द'अबुइरे को नाराज़ नहीं किया जाना चाहिए था। यहाँ तक कि उसकी अर्धबुद्धि सास के कारण भी नहीं। अंततः, वायसराय को अभिनेत्री को नीचा दिखाने में विशेष आनंद मिल रहा था। उसे संदेह था कि वह किसी मतादोर के साथ, शायद किसी अभिनेता के साथ, उसे धोखा दे रही है। दरबार की चापलूसी और गठिया से पैदा हुई निष्क्रियता के बीच वह ठीक-ठीक समझ नहीं पा रहा था कि वह व्यक्ति कौन था। लेकिन इतना स्पष्ट था कि गायिका यह भूलने लगी थी कि वह संसार के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक है।

मार्केसा ने न केवल थिएटर में गाए गए अश्लील और अपमानजनक गीत नहीं सुने थे बल्कि दूसरे अर्थों में भी वह अभिनेत्री की यात्रा के लिए तैयार नहीं थीं। आपको यह जानना चाहिए कि बेटी के चले जाने के बाद डोना मारिया ने अपने दुख के लिए एक विचित्र सांत्वना खोज ली थी। उन्होंने शराब पीना शुरू कर दिया था। पेरू में हर कोई चिचा[10] पीता था और किसी उत्सव के दिन किसी व्यक्ति का बेहोश पड़ा मिलना कोई विशेष अपमान की बात नहीं मानी जाती थी। डोना मारिया ने धीरे-धीरे महसूस किया कि उनके बेचैन, उत्तेजित एकालाप उन्हें पूरी रात जगाए रखते हैं। एक बार सोने से पहले उन्होंने चिचा का एक नाजुक, नक्काशीदार गिलास भरकर पी लिया। बेहोशी कितनी मधुर थी, इसका अनुभव होते ही उन्होंने धीरे-धीरे अधिक मात्रा में पीना शुरू कर दिया और पेपिता से इसके प्रभाव छिपाने की कोशिश करने लगीं। वह संकेत देतीं कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है और स्वयं को ऐसी स्त्री के रूप में प्रस्तुत करतीं जो धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। अंततः उन्होंने दिखावा करना भी छोड़ दिया। स्पेन जाने वाले उनके पत्रों को ले जाने वाले जहाज़ महीने में एक बार से अधिक नहीं निकलते थे। पत्र भेजने वाले सप्ताह से पहले पूरे सप्ताह वह बहुत कठोर संयम बरततीं और अगले पत्र के लिए सामग्री जुटाने के उद्देश्य से पूरे शहर में बड़ी तत्परता से घूमतीं। आखिर डाक रवाना होने की पूर्वसंध्या पर वह पत्र लिखतीं, भोर होते-होते उसके सारे कागज़ बाँधकर पैकेट तैयार करतीं और उसे पेपिता के हाथ डाक के एजेंट तक पहुँचाने के लिए भेज देतीं। फिर सूरज निकलते ही वह स्वयं को अपने कमरे में बंद कर लेतीं, कुछ सुराहियाँ शराब की साथ रखतीं और अगले कुछ सप्ताह चेतना के बोझ के बिना बहते हुए गुज़ार देतीं। अंततः वह अपनी उस सुखद बेहोशी से बाहर आतीं और अगले पत्र को लिखने की तैयारी में फिर से एक प्रकार के “प्रशिक्षण” की अवस्था में चली जातीं।

इसलिए थिएटर में हुए उस कांड के अगले ही रात उन्होंने पत्र संख्या XXII लिखा और फिर शराब की एक सुराही लेकर बिस्तर पर चली गईं। अगले पूरे दिन पेपिता कमरे में इधर-उधर घूमती रही और बिस्तर पर पड़ी उस आकृति को चिंता से देखती रही। अगली दोपहर पेपिता अपना कढ़ाई का काम लेकर कमरे में आ गई। मार्केसा छत को चौड़ी खुली आँखों से घूरती हुई पड़ी थीं और स्वयं से बातें कर रही थीं। साँझ होने के करीब पेपिता को दरवाज़े पर बुलाया गया और बताया गया कि पेरिकोल मालकिन से मिलने आई है। पेपिता को थिएटर की घटना अच्छी तरह याद थी। उसने गुस्से में संदेश भिजवा दिया कि मालकिन उससे मिलने से इनकार करती हैं। वह आदमी संदेश लेकर बाहर के दरवाज़े तक गया, लेकिन लौटकर भय और विस्मय से भरी खबर सुनाई कि सेनोरा पेरिकोल के पास वायसराय का एक पत्र है, जिसमें उसे उस महिला से मिलने के लिए अधिकृत किया गया है। पेपिता पंजों के बल चलती हुई बिस्तर के पास पहुँची और मार्केसा से बातें करने लगी। उनकी धुँधली, स्थिर आँखें धीरे-धीरे लड़की के चेहरे की ओर मुड़ीं। पेपिता ने उन्हें हल्के से हिलाया। बड़े प्रयास से डोना मारिया ने अपना ध्यान उस बात पर केंद्रित करने की कोशिश की जो उनसे कही जा रही थी। दो बार वह फिर पीछे लेट गईं, मानो बात का अर्थ समझने से इनकार कर रही हों। लेकिन अंततः ठीक वैसे जैसे कोई सेनापति रात और बारिश के बीच अपनी सेना की बिखरी हुई टुकड़ियों को फिर से इकट्ठा करता है, उन्होंने अपनी स्मृति, ध्यान और कुछ अन्य मानसिक शक्तियों को कठिनाई से एकत्र किया। उन्होंने पीड़ा से अपना हाथ माथे पर दबाया और बर्फ से भरा एक कटोरा माँगा। जब वह लाया गया, तो उन्होंने देर तक उनींदी अवस्था में मुट्ठी-मुट्ठी बर्फ अपने कनपटियों और गालों पर दबाई। फिर उठकर वे बहुत देर तक बिस्तर का सहारा लेकर खड़ी रहीं और अपने जूतों को देखती रहीं। अंततः उन्होंने दृढ़ निश्चय के साथ सिर उठाया। उन्होंने फर की किनारी वाला अपना लबादा और एक घूँघट मँगवाया। उन्होंने उन्हें पहना और लड़खड़ाते हुए अपने सबसे सुंदर स्वागत-कक्ष में पहुँचीं, जहाँ अभिनेत्री उनका इंतज़ार कर रही थी।

कैमिला ने वहाँ केवल औपचारिकता पूरी करने और, यदि संभव हो, तो थोड़ी उद्दंडता दिखाने का निश्चय किया था। लेकिन अब पहली बार वह बूढ़ी स्त्री की गरिमा से प्रभावित हुई। कपड़ा व्यापारी की बेटी कभी-कभी अपने व्यवहार में मोंतेमायोर परिवार की पूरी कुलीनता धारण कर लेती थी और जब वह नशे में होती थी, तब उसमें हेक्यूबा[11] जैसी भव्यता आ जाती थी। कैमिला को उसकी आधी बंद आँखों में थकी हुई सत्ता और अधिकार का भाव दिखाई दिया और वह लगभग संकोच से बोली:

“मैं आई हूँ, सेनोरा, यह सुनिश्चित करने के लिए कि जिस शाम आपने मेरे थिएटर में आकर मुझे सम्मानित किया था, उस शाम मैंने जो कुछ कहा था, उसे आपने कहीं गलत तो नहीं समझ लिया।”

“गलत समझ लिया? गलत समझ लिया?” मार्केसा ने कहा।

“आपकी कृपा से, हो सकता है कि आपने यह समझ लिया हो कि मेरे शब्दों का उद्देश्य आपके प्रति अनादर करना था।”

“मेरे लिए?”

“क्या महामहिम अपनी इस विनम्र सेविका से नाराज़ तो नहीं हैं? महामहिम जानती हैं कि मेरी जैसी एक गरीब अभिनेत्री कभी-कभी अपने इरादे से आगे बढ़ जाती है... यह बहुत कठिन होता है... कि हर बात...।”

“मैं तुमसे नाराज़ कैसे हो सकती हूँ, सेन्योरा[12]? मुझे तो बस इतना याद है कि तुमने बहुत सुंदर अभिनय किया था। तुम एक महान कलाकार हो। तुम्हें प्रसन्न रहना चाहिए, बहुत प्रसन्न। मेरा रूमाल, पेपिता...।”

मार्केसा ने ये शब्द बहुत तेजी और कुछ अस्पष्ट ढंग से कहे, लेकिन पेरिकोल हतप्रभ रह गई। उसके भीतर शर्म की एक तीखी लहर उठी। उसका चेहरा लाल हो गया। आखिरकार वह बुदबुदा सकी, “वह नाटक के अंकों के बीच गाए गए गीतों में था। मुझे डर था कि महामहिम...।”

“हाँ, हाँ, अब मुझे याद आया। मैं जल्दी चली गई थी। पेपिता, हम जल्दी चले गए थे, है न? लेकिन सेन्योरा, आप मेरे जल्दी चले जाने को क्षमा कर देंगी न, हाँ, आपके उस अद्भुत अभिनय के बीच से ही चले जाने को भी? मुझे याद नहीं कि हम क्यों चले गए थे। पेपिता... ओह, शायद मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी...।”

थिएटर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हो सकता था जो उन गीतों का आशय समझ न पाया हो। कैमिला केवल यही मान सकती थी कि मार्केसा ने एक विचित्र प्रकार की उदारता के कारण यह दिखावा किया है कि उन्होंने गीतों पर ध्यान ही नहीं दिया था। उसकी आँखों में लगभग आँसू आ गए। “लेकिन आप मेरी इस बचकानी हरकत को नज़रअंदाज़ करके कितनी कृपा कर रही हैं, सेन्योरा... मेरा मतलब है, महामहिम। मुझे आपकी भलमनसाहत का पता ही नहीं था। सेन्योरा, मुझे अपना हाथ चूमने की अनुमति दीजिए।”

डोना मारिया ने आश्चर्य से अपना हाथ आगे कर दिया। बहुत लंबे समय बाद किसी ने उनसे इतने आदर और सम्मान के साथ बात की थी। उनके पड़ोसी, उनके दुकानदार, उनके नौकर, यहाँ तक कि पेपिता भी, जो उनसे हमेशा भय और श्रद्धा के साथ रहती थी और उनकी अपनी बेटी तक, किसी ने कभी उनसे इस तरह व्यवहार नहीं किया था। इससे उनके भीतर एक नया भाव जाग उठा। ऐसा भाव जिसे शायद भावुकता या अति-भावुकता कहना उचित होगा। वे बहुत बातें करने लगीं, “मैं तुमसे नाराज़? तुमसे, मेरी सुंदर... मेरी प्रतिभाशाली बच्ची? मैं कौन होती हूँ! एक... एक अविवेकी और अप्रिय वृद्धा, जो तुमसे नाराज़ हो? मेरी बच्ची, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं कवि क्या कहता है?... बादल के आर-पार से स्वर्गदूतों की बातचीत सुन रही हूँ। तुम्हारी आवाज़ हमारे मोरेतो[13] के नाटक में हर बार कोई नई अद्भुत बात खोज निकालती थी। जब तुमने कहा,

‘डॉन हुआन, यदि तुम मेरे प्रेम को मानते हो,

और यदि अटूट विश्वास मूर्खता है,

तो मेरे इन भय से नाराज़ होना

मेरी समझदारी के विरुद्ध होगा।

क्या तुम इतने निश्चित...’

“और इसी तरह आगे भी। वह बात बिल्कुल सच थी! और प्रथम अंक के अंत में तुमने कैसी भाव-भंगिमा बनाई थी। वहाँ, इस तरह हाथ उठाकर। ठीक वैसी भाव-भंगिमा जैसी कुँवारी मरियम ने गैब्रियल से कहते समय बनाई थी, ‘यह कैसे संभव है कि मेरे एक संतान होगी?’ नहीं, नहीं, तुम मुझसे नाराज़ होने लगोगी क्योंकि अब मैं तुम्हें एक ऐसी भाव-भंगिमा के बारे में बताने जा रही हूँ जिसे तुम किसी दिन याद रखकर इस्तेमाल कर सकती हो। हाँ, उस दृश्य में यह बहुत अच्छी लगेगी, जिसमें तुम अपने डॉन हुआन दे लारा को क्षमा करती हो। शायद मुझे तुम्हें यह भी बताना चाहिए कि एक दिन मैंने यह भाव-भंगिमा अपनी बेटी को करते हुए देखी थी। मेरी बेटी बहुत सुंदर स्त्री है... सब लोग ऐसा ही मानते हैं। क्या... क्या तुम मेरी डोना क्लारा को जानती थीं, सेन्योरा?”

“महामहिम अक्सर मेरे रंगमंच पर आने का सम्मान देती थीं। मैंने कोंदेसा को अच्छी तरह देखा था।”

“इस तरह एक घुटने पर मत बैठी रहो, मेरी बच्ची। पेपिता, जेनेरितो से कहो कि इस महिला के लिए तुरंत कुछ मिठाइयाँ ले आए। सोचो, एक दिन हमारा आपस में झगड़ा हो गया था। मुझे याद नहीं किस बात पर। अरे, इसमें आश्चर्य की क्या बात है। हम सभी माताएँ समय-समय पर...। देखो, क्या तुम थोड़ा और पास आ सकती हो? तुम्हें शहर की उन बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए जो कहती हैं कि वह मेरे प्रति दयालु नहीं थी। तुम एक महान स्त्री हो, तुम्हारा स्वभाव बहुत सुंदर है और इन मामलों में तुम भीड़ की नज़र से कहीं आगे देख सकती हो। तुमसे बात करके मुझे बहुत आनंद हो रहा है। तुम्हारे बाल कितने सुंदर हैं! कितने सुंदर बाल हैं! मैं जानती हूँ कि उसका स्वभाव बहुत गर्मजोशी और सहज स्नेह से भरा हुआ नहीं था। लेकिन, मेरी बच्ची, उसके भीतर कितनी बुद्धिमत्ता और शालीनता भरी हुई है। हमारे बीच जो भी गलतफहमियाँ रही हैं, उनमें दोष साफ़-साफ़ मेरा ही है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि वह मुझे इतनी जल्दी क्षमा कर देती है? आज फिर ऐसा ही एक छोटा-सा क्षण आया था। हम दोनों ने जल्दबाज़ी में कुछ कड़वी बातें कह दीं और अपने-अपने कमरों में चले गए। फिर दोनों ही एक-दूसरे से क्षमा माँगने के लिए वापस मुड़ आएँ। अंत में हमारे बीच केवल एक दरवाज़ा रह गया और हम दोनों उसे अपनी-अपनी ओर खींच रही थीं। लेकिन आखिरकार उसने... मेरा... चेहरा... इस तरह, अपने दोनों सफेद हाथों में थाम लिया। ऐसे! देखो!”

मार्केसा आगे झुकते हुए लगभग अपनी कुर्सी से गिर ही पड़ीं। उनके चेहरे पर खुशी के आँसू बह रहे थे और उन्होंने वह आनंदमय भाव-भंगिमा करके दिखाई। कहना चाहिए कि वह एक काल्पनिक भाव-भंगिमा थी क्योंकि वह घटना वास्तव में केवल बार-बार आने वाला एक स्वप्न थी।

“मुझे खुशी है कि तुम यहाँ हो,” उन्होंने आगे कहा, “क्योंकि अब तुमने मेरे अपने मुँह से सुन लिया है कि, जैसा कुछ लोग कहते हैं, वह मेरे प्रति निर्दयी नहीं है। सुनो, सेन्योरा, गलती मेरी थी। मेरी ओर देखो। मेरी ओर देखो। कोई ऐसी भूल हुई थी कि मैं इतनी सुंदर लड़की की माँ बन गई। मेरे साथ रहना कठिन है। मैं कोशिश कर रही हूँ। तुम और वह दोनों महान स्त्रियाँ हो। नहीं, मुझे रोकना मत। तुम दोनों असाधारण स्त्रियाँ हो और मैं केवल एक घबराई हुई... एक मूर्ख... एक नासमझ स्त्री हूँ। मुझे तुम्हारे पैर चूमने दो। मैं असहनीय हूँ। मैं असहनीय हूँ। मैं असहनीय हूँ।”

और सचमुच, इस बार बूढ़ी स्त्री अपनी कुर्सी से गिर पड़ीं। पेपिता ने उन्हें उठाया और वापस उनके बिस्तर तक ले गई। पेरिकोल स्तब्ध होकर घर गई और बहुत देर तक आईने में अपनी आँखों को देखती रही। उसकी हथेलियाँ उसके गालों पर दबी हुई थीं।

लेकिन मार्केसा के कठिन और पीड़ादायक समय को सबसे अधिक देखने वाली उनकी छोटी-सी साथी पेपिता थी। पेपिता अनाथ थी और लीमा की उस विचित्र प्रतिभाशाली महिला, अबेस मद्रे मारिया देल पिलार, ने उसका पालन-पोषण किया था। पेरू की इन दो महान स्त्रियों का (जैसा कि इतिहास की दूरदर्शी दृष्टि बाद में उन्हें बताएगी) आमने-सामने केवल एक बार मिलना हुआ था। वह दिन था जब डोना मारिया ने सांता मारिया रोसा दे लास रोज़ास के कॉन्वेंट की प्रधान महिला से मिलने जाकर पूछा था कि क्या वह अनाथालय की किसी हँसमुख लड़की को अपनी साथी के रूप में अपने साथ रख सकती हैं। अबेस  ने उस विचित्र बूढ़ी स्त्री को गौर से देखा। दुनिया के सबसे बुद्धिमान लोग भी पूर्णतः बुद्धिमान नहीं होते और मद्रे मारिया देल पिलार, जो मूर्खता और विद्रोह के सभी मुखौटों के पीछे छिपे उस बेचारे मानवीय हृदय को पहचान लेने में सक्षम थीं, फिर भी मार्केसा दे मोंतेमायोर को ऐसा मानने से हमेशा इनकार करती रही थीं। उन्होंने उससे बहुत-से प्रश्न किए और फिर कुछ देर सोचने लगीं। वह चाहती थीं कि पेपिता को महल में रहकर संसार का अनुभव मिले। साथ ही वह बूढ़ी स्त्री को अपने उद्देश्यों के अनुकूल भी ढालना चाहती थीं। और उनके भीतर एक गंभीर आक्रोश उमड़ रहा था क्योंकि वह जानती थीं कि उनके सामने पेरू की सबसे धनी स्त्रियों में से एक बैठी है और सबसे अधिक अंधी भी।

वह उन लोगों में से थीं जिन्होंने अपने जीवन को इसलिए क्षीण होने दिया था क्योंकि वे अपने समय से कई शताब्दियाँ पहले ही किसी ऐसे विचार के प्रेम में पड़ गई थीं, जिसका इतिहास में प्रकट होने का समय अभी नहीं आया था। महिलाओं के जीवन में थोड़ी-सी गरिमा लाने की अपनी इच्छा में उन्होंने अपने समय की जड़ता और हठ के विरुद्ध स्वयं को झोंक दिया था। आधी रात को, जब वह अपने संस्थान के हिसाब-किताब जोड़ चुकी होतीं, तब वे पागलपन जैसी कल्पनाओं में डूब जातीं। ऐसे युग की कल्पना करतीं जिसमें स्त्रियाँ स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए संगठित हो सकें। स्त्रियाँ यात्रा कर सकें। महिला नौकरों की व्यवस्था हो। वृद्ध या बीमार स्त्रियों की देखभाल हो। उन स्त्रियों की सहायता हो जिन्हें उन्होंने पोतोसी[14] की खानों में या कपड़ा व्यापारियों की कार्यशालाओं में देखा था और उन लड़कियों की भी, जिन्हें उन्होंने बरसाती रातों में दरवाज़ों के बाहर से उठाकर अपने आश्रय में लिया था। लेकिन हर सुबह उन्हें फिर इस तथ्य का सामना करना पड़ता था कि पेरू की स्त्रियाँ यहाँ तक कि उनकी ननें भी दो ही धारणाओं के साथ जीवन बिताती थीं, पहली, कि उनके साथ होने वाली सारी विपत्तियाँ केवल इसलिए हैं कि वे इतनी आकर्षक नहीं हैं कि किसी पुरुष को अपने भरण-पोषण के लिए अपने साथ बाँध सकें और दूसरी, कि संसार का सारा दुख भी उस पुरुष के एक स्नेह-स्पर्श के योग्य है। उन्होंने लीमा के आस-पास के इलाके के अलावा कोई दूसरा देश देखा ही नहीं था और वह मानती थीं कि वहाँ जो भी भ्रष्टाचार था, वही मनुष्य जाति की सामान्य अवस्था है। हम अपनी इस शताब्दी से पीछे मुड़कर देखें तो उनकी आशा की पूरी निरर्थकता दिखाई देती है। उस युग पर ऐसी बीस स्त्रियाँ भी कोई प्रभाव नहीं डाल पातीं। फिर भी वह अपने काम में पूरी लगन से लगी रहीं। वह उस दंतकथा की अबाबील जैसी थीं, जो हर एक हजार वर्ष में केवल गेहूँ का एक दाना उठाकर ले जाती थी, इस आशा में कि एक दिन उस दाने से ऐसा पर्वत खड़ा हो जाएगा जो चाँद तक पहुँच सके। ऐसे लोग हर युग में जन्म लेते हैं। वे हठपूर्वक अपने-अपने गेहूँ के दाने ढोते रहते हैं और राह चलते लोगों के उपहास से भी एक विचित्र उत्साह प्राप्त करते हैं। “वे कितने अजीब कपड़े पहनते हैं!” हम पुकारते हैं। “वे कितने अजीब कपड़े पहनते हैं!”

उसका सादा, लालिमा लिए चेहरा अत्यंत दयालु था बल्कि उसमें दयालुता से भी अधिक आदर्शवाद था और आदर्शवाद से भी अधिक नेतृत्व-कौशल। उसके सारे काम, उसके अस्पताल, अनाथालय, कॉन्वेंट और अचानक की जाने वाली बचाव-यात्राएँ पैसे पर निर्भर थे। मात्र भलाई के प्रति उससे अधिक सच्ची प्रशंसा किसी और के मन में नहीं थी, लेकिन उसे बार-बार यह देखना पड़ा था कि किस तरह धन और सहायता जुटाने की कठिन लड़ाइयों में, जो उसे चर्च के अपने वरिष्ठ अधिकारियों से लड़नी पड़ती थीं, उसे अपनी दयालुता, यहाँ तक कि अपने आदर्शवाद तक को लगभग त्यागकर कुशल रणनीतिकार बनना पड़ता था। लीमा का आर्चबिशप, जिससे हमारा परिचय आगे चलकर एक अधिक सुखद प्रसंग में होगा, उससे ऐसी घृणा करता था जिसे वह स्वयं “वेटिनियस जैसी घृणा”[15] कहता था, और उसकी मृत्यु के बाद मिलने वाले सुखों में वह उसके यहाँ आना बंद कर देने को भी गिनता था।

हाल के दिनों में उसे न केवल अपने गाल पर बुढ़ापे की साँस का स्पर्श महसूस होने लगा था बल्कि उससे भी गंभीर एक चेतावनी सुनाई देने लगी थी। उसके भीतर अपने लिए नहीं बल्कि अपने काम के लिए भय की एक सिहरन दौड़ जाती थी। पेरू में ऐसा कौन था जो उन चीज़ों का मूल्य समझता, जिन्हें वह जीवन भर मूल्यवान मानती आई थी? एक दिन भोर में उठकर उसने अपने अस्पताल, कॉन्वेंट और अनाथालय का तेजी से दौरा किया। वह ऐसी आत्मा खोज रही थी जिसे वह अपना उत्तराधिकारी बना सके। वह एक खाली चेहरे से दूसरे खाली चेहरे की ओर जल्दी-जल्दी बढ़ती रही और कभी-कभी रुकती भी थी, विश्वास से अधिक आशा के कारण। आँगन में उसे लड़कियों का एक समूह मिला, जो कपड़े धोने के काम में लगी थीं। तभी उसकी नज़र बारह वर्ष की एक लड़की पर पड़ी, जो पानी की नांद के पास दूसरी लड़कियों को निर्देश दे रही थी और उसी समय बड़े नाटकीय उत्साह के साथ उन्हें लीमा की संत रोज़ के जीवन में घटे उन चमत्कारों की कहानियाँ सुना रही थी, जिनके सच होने की संभावना सबसे कम थी। इस तरह उसकी खोज पेपिता पर जाकर समाप्त हुई। किसी भी समय किसी को महान बनने के लिए तैयार करना पर्याप्त कठिन होता है, लेकिन कॉन्वेंट की भावनाओं और ईर्ष्याओं के बीच ऐसा प्रशिक्षण विचित्र रूप से अप्रत्यक्ष ढंग से देना पड़ता था। पेपिता को हाउस के सबसे अप्रिय काम सौंपे गए, लेकिन धीरे-धीरे वह उसके प्रशासन के हर पहलू को समझने लगी। वह अबेस के साथ उनकी यात्राओं पर भी जाती, हालाँकि उसकी जिम्मेदारी अंडों और सब्ज़ियों की रखवाली करने की होती थी। और हर जगह, अचानक, ऐसे कुछ घंटे निकल आते जिनमें डायरेक्ट्रेस अचानक उसके पास आ जातीं और उससे बहुत देर तक बातें करतीं। सिर्फ धार्मिक अनुभव के बारे में ही नहीं बल्कि स्त्रियों को कैसे संभालना है, संक्रामक रोगियों के लिए वार्ड कैसे व्यवस्थित करने हैं और पैसे के लिए लोगों से कैसे विनती करनी है, इन सबके बारे में भी। महानता के इस प्रशिक्षण की एक कड़ी वह दिन था जब पेपिता को अचानक डोना मारिया की साथी बनने के इस विचित्र दायित्व में भेज दिया गया। पहले दो वर्षों तक वह केवल कभी-कभार दोपहर के समय वहाँ जाती रही, लेकिन अंततः वह महल में रहने लगी। उसे कभी यह उम्मीद करना नहीं सिखाया गया था कि जीवन में सुख मिलेगा, इसलिए उसकी नई स्थिति की असुविधाएँ बल्कि आतंक तक चौदह वर्ष की लड़की के लिए उसे असहनीय नहीं लगीं। उसे यह पता नहीं था कि अबेस वहाँ भी उस घर पर अपनी नज़र रखे हुए थीं। वे स्वयं यह देख रही थीं कि उस लड़की पर कितना दबाव पड़ रहा है और किस क्षण कोई बोझ उसे मजबूत करने के बजाय नुकसान पहुँचाने लगता है।

पेपिता की कुछ परीक्षाएँ शारीरिक थीं। उदाहरण के लिए घर के नौकरों ने डोना मारिया की अस्वस्थता का फायदा उठाया। वे महल के शयनकक्ष अपने रिश्तेदारों के लिए खोल देते और खुलेआम चोरी करते। पेपिता अकेली ही उनके विरुद्ध खड़ी रही और छोटी-छोटी परेशानियों तथा व्यावहारिक मज़ाकों के रूप में होने वाले उत्पीड़न को सहती रही। उसका मन भी इसी तरह पीड़ित रहता था। जब वह शहर में डोना मारिया के साथ उनके कामों से जाती तो कभी-कभी उस वृद्धा को अचानक किसी चर्च में दौड़ जाने की इच्छा होती। उन्होंने आस्था के रूप में जितना धर्म खो दिया था, उसकी जगह उन्होंने धर्म को एक प्रकार के जादू के रूप में अपना लिया था। “तुम यहाँ धूप में रुको, मेरी प्यारी बच्ची। मुझे अधिक देर नहीं लगेगी,” वे कहतीं। फिर डोना मारिया वेदी के सामने किसी स्वप्निल तंद्रा में अपने को पूरी तरह भुला देतीं और चर्च से किसी दूसरे दरवाज़े से बाहर निकल जातीं। मद्रे मारिया देल पिलार ने पेपिता को लगभग अस्वाभाविक सीमा तक आज्ञाकारी बनाकर पाला था। इसलिए कई घंटे बीत जाने के बाद जब वह चर्च के भीतर जाती और यह सुनिश्चित कर लेती कि उसकी मालकिन वहाँ नहीं हैं, तब भी वह वापस उसी सड़क के कोने पर आकर खड़ी हो जाती और इंतज़ार करती रहती, जब तक कि धीरे-धीरे चौक पर परछाइयाँ फैल नहीं जातीं। इस तरह सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर प्रतीक्षा करते हुए उसे एक छोटी लड़की की आत्म-सचेतता की सारी यातना सहनी पड़ती। वह अब भी अनाथालय की वर्दी पहने रहती थी, जिसे डोना मारिया थोड़ी-सी भी सावधानी बरतकर बदल सकती थीं और उसे ऐसे भ्रम होने लगते जिनमें पुरुष उसे घूरते और उसके बारे में फुसफुसाते दिखाई देते। हालाँकि वे भ्रम हमेशा केवल भ्रम ही नहीं होते थे। उसका हृदय भी कम पीड़ित नहीं था। कुछ दिनों में डोना मारिया अचानक उसे पहचान लेतीं और उससे आत्मीयता तथा विनोद के साथ बातें करतीं। उन कुछ घंटों के लिए उनके पत्रों में झलकने वाली सारी अद्भुत संवेदनशीलता मानो जीवित हो उठती। फिर अगले ही दिन वे फिर अपने भीतर सिमट जातीं और यद्यपि कभी कठोर नहीं होतीं, एक निर्लिप्त और अन्यमनस्क स्त्री बन जातीं। पेपिता के भीतर जो आशा और स्नेह उमड़ने को इतने आतुर थे, वे घायल हो जाते। वह महल में दबे पाँव, चुपचाप और असमंजस में घूमती रहती। केवल अपने कर्तव्य-बोध और अपनी “प्रभु में माता”, मद्रे मारिया देल पिलार के प्रति अपनी निष्ठा को थामे हुए, जिन्होंने उसे वहाँ भेजा था।

........

अंततः एक नई बात सामने आई, जिसका मार्केसा और उनकी साथी, दोनों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ने वाला था। “मेरी प्यारी माँ,” कोंदेसा ने लिखा, “मौसम बहुत थका देने वाला रहा है और बागों तथा उपवनों का फूलों से भर जाना इसे और भी कष्टदायक बना रहा है। मैं फूलों को सह सकती, यदि उनमें सुगंध न होती। इसलिए मैं आपसे अनुमति माँगती हूँ कि सामान्य से कुछ कम लिखूँ। यदि विसेंते डाक रवाना होने से पहले लौट आए तो वह इस पन्ने को पूरा करने में प्रसन्न होगा और मेरे बारे में वे उबाऊ-से विवरण आपको दे देगा, जिन्हें पढ़ना आपको इतना अच्छा लगता है। इस शरद ऋतु में मैं प्रोवांस के ग्रिन्याँ नहीं जाऊँगी, जैसा कि मैंने सोचा था क्योंकि अक्टूबर के आरंभ में बच्चे का जन्म होने वाला है।”

“कौन-सा बच्चा?” मार्केसा दीवार से जा लगीं। डोना क्लारा जानती थीं कि इस खबर से उनकी माँ के भीतर कितनी थका देने वाली पूछताछ और चिंता जाग उठेगी, इसलिए उन्होंने जानबूझकर इसे बहुत सहज ढंग से लिखा था। लेकिन उनकी यह चाल सफल नहीं हुई। इसके उत्तर में वह प्रसिद्ध पत्र संख्या XLII आया।

अब, आखिरकार, मार्केसा के पास चिंता करने के लिए कोई वास्तविक कारण था। उनकी बेटी माँ बनने वाली थी। यह घटना, जो डोना क्लारा के लिए केवल एक उबाऊ-सी बात थी, मार्केसा के भीतर भावनाओं का एक बिल्कुल नया संसार खोल गई। वे चिकित्सकीय ज्ञान और सलाह का जैसे खजाना बन गईं। उन्होंने पूरे शहर में समझदार बूढ़ी औरतों को ढूँढ़-ढूँढ़कर उनके विचार जाने और अपने पत्रों में नई दुनिया के लोक-ज्ञान की पूरी धारा उड़ेल दी। वे भयंकर अंधविश्वास में डूब गईं। उन्होंने अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए अपमानजनक ढंग की अनेक वर्जनाएँ अपना लीं। उन्होंने घर में किसी भी गाँठ को रहने नहीं दिया। नौकरानियों को अपने बाल बाँधने तक की मनाही थी और वे स्वयं प्रसव सकुशल होने के लिए अपने शरीर पर तरह-तरह के हास्यास्पद ताबीज़ और प्रतीक छिपाकर रखने लगीं। सीढ़ियों पर सम संख्या वाली सीढ़ियों को लाल चॉक से चिह्नित कर दिया गया था और यदि कोई नौकरानी भूल से ऐसी किसी सीढ़ी पर पैर रख देती तो उसे आँसू और चीख-पुकार के बीच घर से निकाल दिया जाता। डोना क्लारा अब उस दुष्ट प्रकृति के हाथों में थीं, जो अपने बच्चों पर सबसे भयावह मज़ाक करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखती है। पीढ़ियों से गाँव की स्त्रियों ने प्रसन्नतापूर्वक कुछ ऐसे रीति-रिवाज अपनाए थे, जिनके द्वारा वे प्रकृति की कृपा प्राप्त करने की कोशिश करती थीं। इतने विशाल समूह का इन पर विश्वास करना निश्चित ही इस बात का संकेत था कि इनमें कुछ न कुछ सच्चाई अवश्य होगी। कम-से-कम इनसे कोई नुकसान तो नहीं होना था और शायद लाभ ही हो जाता। लेकिन मार्केसा ने केवल इन प्राचीन, लगभग मूर्तिपूजक रीति-रिवाजों को ही नहीं निभाया, उन्होंने ईसाई धर्म के उपायों का भी अध्ययन किया। वे अँधेरे में उठतीं और गलियों से ठोकरें खाती हुई सबसे पहली प्रार्थना-सभाओं और मिस्सा[16] में पहुँचतीं। वे वेदी की रेलिंग को हिस्टीरिया जैसी व्याकुलता में पकड़ लेतीं और चमकीले रंगों वाली छोटी-छोटी मूर्तियों से कोई संकेत... सिर्फ एक संकेत, मुस्कान की एक झलक, मोम से बने सिर का कोई छिपा हुआ-सा हल्का-सा हिलना... खींच लेने की कोशिश करतीं। “सब ठीक होगा न? हे प्यारी, प्यारी माता, सब ठीक होगा न?”

कभी-कभी, ऐसी प्रार्थनाओं के लिए पूरे दिन की उन्मत्त भागदौड़ के बाद, उनके भीतर अचानक एक तीखा प्रतिघात उठता। प्रकृति बहरी है। ईश्वर उदासीन है। मनुष्य की शक्ति में कुछ भी ऐसा नहीं जो नियम की गति को बदल सके। तब कभी किसी सड़क के मोड़ पर वे रुक जातीं, निराशा से चकराती हुईं, दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो जातीं और उस ऐसी दुनिया से उठा लिए जाने की कामना करतीं जिसमें कोई योजना ही नहीं थी। लेकिन शीघ्र ही उनके स्वभाव की गहराइयों से उस महान शायद (एक महान आशा) में विश्वास फिर उमड़ पड़ता और वे लगभग दौड़ती हुई घर लौटतीं ताकि अपनी बेटी के बिस्तर के ऊपर जल रही मोमबत्तियों को फिर से जला सकें।

अंततः वह समय भी आया जब इस घटना की प्रतीक्षा कर रहे पेरू के घरों की सर्वोच्च धार्मिक रस्म पूरी करना आवश्यक हो गया। उन्होंने सांता मारिया दे क्लुखाम्बुकुआ के तीर्थ की यात्रा की। यदि भक्ति में वास्तव में कोई शक्ति थी तो निश्चय ही वह इस महान तीर्थ की यात्रा में होनी चाहिए थी। यह धरती तीन धर्मों के लिए पवित्र रही थी। इंका सभ्यता से भी पहले, व्याकुल मनुष्य इन चट्टानों से लिपटते थे और आकाश से अपनी इच्छा मनवाने के लिए स्वयं को कोड़ों से मारते थे। मार्केसा को पालकी में बैठाकर वहाँ ले जाया गया। वे सैन लुइस रे के पुल को पार करती हुई पहाड़ियों की ओर ऊपर चढ़ीं और उस शहर की ओर बढ़ीं जहाँ कमर पर चौड़ी पट्टियाँ बाँधे भारी-भरकम स्त्रियाँ रहती थीं। एक शांत शहर, जिसकी गति धीमी थी और जिसकी मुस्कान भी धीमी, क्रिस्टल जैसी निर्मल हवा वाला शहर, जो उन असंख्य झरनों की तरह ठंडा था जो उसके अनेक फव्वारों को पानी देते थे, घंटियों का शहर, कोमल, मधुर घंटियों का, जिनकी ध्वनि ऐसी लगती थी मानो वे एक-दूसरे के साथ सबसे सुखद झगड़े में लगी हों। क्लुखाम्बुकुआ नगर में यदि कभी कोई बात निराशाजनक भी हो जाती तो उसका दुख किसी तरह एंडीज़ पर्वतों की विराट उपस्थिति और गलियों में चारों ओर बहते शांत आनंद के वातावरण में घुल-मिल जाता। जैसे ही मार्केसा ने दूर से इस नगर की सफेद दीवारों को देखा, जो सबसे ऊँची पर्वत-चोटियों की गोद में बसा हुआ था, उनकी उँगलियाँ माला के दानों को फेरना बंद कर दीं और भय से भरी उनकी व्यस्त प्रार्थनाएँ उनके होंठों पर ही थम गईं।

उन्होंने सराय में उतरने तक की प्रतीक्षा भी नहीं की। पेपिता को उनके ठहरने की व्यवस्था करने के लिए छोड़कर वे सीधे चर्च चली गईं और बहुत देर तक घुटनों के बल बैठी रहीं, धीरे-धीरे अपनी हथेलियाँ आपस में थपथपाती हुईं। वे अपने भीतर उठती हुई उस नई त्याग-भावना को सुन रही थीं। शायद समय के साथ वे यह सीख जाएँगी कि अपनी बेटी और अपने देवताओं, दोनों को अपने-अपने मामले स्वयं सँभालने दें। वे गद्देदार वस्त्र पहने उन बूढ़ी औरतों की फुसफुसाहटों से भी परेशान नहीं हुईं, जो मोमबत्तियाँ और पदक बेचती थीं और सुबह से रात तक पैसों की बातें करती रहती थीं। एक बहुत ही तत्परता दिखाने वाले चर्च के कर्मचारी ने भी उनका ध्यान नहीं भटकाया, जो किसी न किसी बात के लिए उनसे शुल्क लेने की कोशिश कर रहा था और फिर द्वेषवश, फर्श की एक टाइल ठीक कराने का बहाना बनाकर उन्हें अपनी जगह बदलने के लिए मजबूर कर दिया। कुछ देर बाद वे धूप में बाहर निकलीं और फव्वारे की सीढ़ियों पर बैठ गईं। उन्होंने बीमार लोगों के छोटे-छोटे जुलूसों को बगीचों के चारों ओर धीरे-धीरे घूमते देखा। उन्होंने आकाश में गोता लगाते तीन बाज़ों को देखा। फव्वारे के पास खेल रहे बच्चों ने एक क्षण उन्हें घूरकर देखा और घबराकर वहाँ से चले गए। लेकिन एक लामा (लंबी गर्दन और कोमल, कुछ भोली आँखों वाली वह महिला-सदृश प्राणी, जिस पर उसकी अपनी देह के लिए बहुत भारी फर की चादर लदी थी और जो एक अंतहीन सीढ़ी से बहुत नाज़ुक ढंग से अपने पैर रखते हुए नीचे उतर रही थी) उनके पास आ गई और अपना मखमली, दो फाँकों वाला थूथन सहलाने के लिए आगे कर दिया। लामा अपने आस-पास के मनुष्यों में बहुत रुचि रखती है। उसे तो कभी-कभी यह दिखावा करना भी अच्छा लगता है कि वह स्वयं भी मनुष्यों में से एक है और वह उनकी बातचीत में इस तरह अपना सिर डाल देती है, मानो अगले ही क्षण अपनी आवाज़ में कोई फीकी-सी, मददगार टिप्पणी कर देगी। जल्द ही डोना मारिया ऐसी कई लामा-बहनों से घिर गईं, जो मानो उनसे पूछने ही वाली थीं कि वे इस तरह ताली क्यों बजा रही हैं और उनके घूँघट की एक गज कीमत कितनी है।

डोना मारिया ने पहले से व्यवस्था कर रखी थी कि स्पेन से आने वाला कोई भी पत्र एक विशेष दूत द्वारा तुरंत उनके पास पहुँचा दिया जाए। वे लीमा से धीरे-धीरे यात्रा करती हुई यहाँ पहुँची थीं और अब जब वे चौक में बैठी थीं, तभी उनके खेत से आया एक लड़का दौड़ता हुआ पहुँचा और उनके हाथ में पार्चमेंट में लिपटा हुआ एक बड़ा पैकेट रख गया, जिसमें सील लगाने वाली मोम की कुछ लड़ियाँ लटक रही थीं। उन्होंने धीरे-धीरे उसकी पैकिंग खोली। संयत, स्टोइक भाव-भंगिमा के साथ पहले उन्होंने अपने दामाद का स्नेहपूर्ण और मज़ाकिया-सा पत्र पढ़ा। फिर अपनी बेटी का पत्र। वह पत्र चोट पहुँचाने वाली टिप्पणियों से भरा था। हालाँकि उन्हें बड़ी कुशलता से लिखा गया था, शायद केवल इस कलात्मक दक्षता के प्रदर्शन के लिए कि किसी को कितनी सुघड़ता से चोट पहुँचाई जा सकती है। उसकी हर पंक्ति मार्केसा की आँखों से होकर उनके भीतर उतरती गई और फिर समझ तथा क्षमा के आवरण में लिपटकर उनके हृदय में बैठती गई। अंततः वे उठीं, सहानुभूति जताती उन लामाओं को धीरे से अपने आस-पास से हटा दिया और गंभीर चेहरे के साथ वापस तीर्थस्थल की ओर चली गईं।

जब डोना मारिया देर दोपहर तक चर्च और चौक में समय बिता रही थीं, तब पेपिता को उनके रहने की व्यवस्था करने के लिए छोड़ दिया गया था। उसने सामान ढोने वालों को बताया कि विशाल बेंत की टोकरियाँ कहाँ रखनी हैं और वेदी, अंगीठी, दीवार पर लटकने वाले कपड़े तथा डोना क्लारा के चित्र खोलकर जमाने लगी। फिर वह रसोई में गई और रसोइए को उस विशेष दलिये को बनाने के बारे में बिल्कुल स्पष्ट निर्देश दिए, जिस पर मार्केसा मुख्यतः अपना जीवन निर्वाह करती थीं। उसके बाद वह कमरों में लौट आई और प्रतीक्षा करने लगी। उसने अबेस को एक पत्र लिखने का निश्चय किया। काफी देर तक वह कलम पर झुकी रही और काँपते होंठों के साथ दूर शून्य में देखती रही। उसे मद्रे मारिया देल पिलार का चेहरा दिखाई दिया। लाल और अच्छी तरह धुला हुआ चेहरा, और उनकी अद्भुत काली आँखें। उसे उनकी आवाज़ सुनाई दी जैसे, रात के भोजन के अंत में जब अनाथ लड़कियाँ आँखें नीची किए और हाथ जोड़े बैठी होती थीं, वे दिनभर की घटनाओं पर टिप्पणी करती थीं या जैसे मोमबत्ती की रोशनी में अस्पताल के बिस्तरों के बीच खड़ी होकर वे रात के ध्यान के लिए विषय बताती थीं। लेकिन सबसे अधिक स्पष्ट रूप से पेपिता को वे अचानक होने वाली मुलाकातें याद थीं, जब अबेस (लड़की के और बड़ी होने तक प्रतीक्षा करने का साहस न करते हुए) उससे उसके भावी दायित्वों के बारे में बातें करती थीं। वे पेपिता से एक बराबर की तरह बात करती थीं। ऐसी बातचीत किसी बुद्धिमान बच्चे के लिए एक साथ विचलित करने वाली भी होती है और अद्भुत भी। और मद्रे मारिया देल पिलार ने इस विशेषाधिकार का कुछ अधिक ही उपयोग किया था। उन्होंने पेपिता के मन में यह दृष्टि उसकी उम्र की सीमा से कहीं आगे तक फैला दी थी कि उसे कैसा महसूस करना चाहिए और कैसे व्यवहार करना चाहिए। और उन्होंने अनजाने में अपने व्यक्तित्व की पूरी चमक पेपिता पर डाल दी थी। ठीक वैसे ही जैसे ज्यूपिटर ने सेमेले[17] पर अपनी पूरी ज्योति डाल दी थी। पेपिता अपनी अपर्याप्तता की अनुभूति से भयभीत हो गई थी। उसने उस भय को छिपाया और रोती रही। फिर अबेस ने उस बच्ची को इस लंबे एकांत के अनुशासन में डाल दिया, जहाँ पेपिता लगातार संघर्ष करती रही और अपने आपको यह विश्वास करने नहीं दिया कि उसे छोड़ दिया गया है। और अब, इन अपरिचित पहाड़ों की इस अपरिचित सराय में, जहाँ ऊँचाई के कारण उसका सिर हल्का हो रहा था, पेपिता उस प्रिय उपस्थिति के लिए तरस रही थी, उसके जीवन की एकमात्र वास्तविक चीज़ के लिए।

उसने एक पत्र लिखा, स्याही के धब्बों और असंबद्ध बातों से भरा हुआ। फिर वह ताज़ा कोयला लेने और दलिये को चखने के लिए नीचे चली गई।

मार्केसा भीतर आई और मेज़ पर बैठ गई। उसने धीमे से कहा, “अब मैं और कुछ नहीं कर सकती। जो होना है, होगा।” उसने अपनी गर्दन में पहने हुए अंधविश्वास के ताबीज़ खोलकर उतारे और उन्हें दहकते अंगारों में डाल दिया। उसे एक अजीब-सा एहसास हो रहा था कि उसने बहुत अधिक प्रार्थना करके मानो ईश्वर को अपने विरुद्ध कर लिया है। इसलिए अब वह उनसे सीधे नहीं बल्कि घुमा-फिराकर बात करने लगी। “आख़िरकार, यह किसी दूसरे के हाथ में है। अब मेरा ज़रा भी प्रभाव नहीं रहा। जो होना है, होगा।” वह बहुत देर तक बैठी रही, अपनी हथेलियाँ गालों से लगाए हुए, जैसे अपने मन को बिल्कुल शून्य कर रही हो। उसकी नज़र पेपीता के पत्र पर पड़ी। उसने यंत्रवत् उसे खोला और पढ़ना शुरू किया। पत्र का लगभग आधा हिस्सा पढ़ लेने के बाद ही उसका ध्यान उन शब्दों के अर्थ की ओर गया, “...लेकिन यह सब कुछ भी नहीं है, अगर तुम मुझे पसंद करती हो और चाहती हो कि मैं उसके साथ रहूँ। मुझे तुम्हें यह नहीं बताना चाहिए, लेकिन कभी-कभी वे बुरी नौकरानियाँ मुझे कमरों में बंद कर देती हैं और चीज़ें चुरा लेती हैं और शायद मेरी मालकिन सोचेंगी कि वे चीज़ें मैंने चुराई हैं। आशा है, ऐसा नहीं होगा। आशा है, तुम ठीक हो और अस्पताल में या कहीं और तुम्हें कोई परेशानी नहीं हो रही है। हालाँकि मैं तुम्हें कभी नहीं देखती, फिर भी मैं हर समय तुम्हारे बारे में सोचती हूँ और मुझे वह सब याद है जो तुमने मुझसे कहा था, मेरी ईश्वर में प्रिय माँ। मैं केवल वही करना चाहती हूँ जो तुम चाहती हो। अगर तुम मुझे कुछ दिनों के लिए फिर से कॉन्वेंट में आने दे सको तो अच्छा होगा। लेकिन तभी, जब तुम भी यह चाहो। लेकिन मैं यहाँ बहुत अकेली हूँ और किसी से बात भी नहीं कर पाती और न जाने क्या-क्या... कभी-कभी मुझे नहीं मालूम होता कि तुम मुझे भूल गई हो या नहीं। अगर तुम्हें एक मिनट भी मिल सके कि मुझे एक छोटा-सा पत्र या कुछ लिख दो, तो मैं उसे सँभालकर रख सकती हूँ। लेकिन मैं जानती हूँ कि तुम कितनी व्यस्त रहती हो...”

डोना मारिया ने आगे नहीं पढ़ा। उसने पत्र को मोड़कर एक ओर रख दिया। एक क्षण के लिए उसके भीतर ईर्ष्या भर उठी। वह तरस उठी कि काश, वह भी किसी दूसरे की आत्मा पर उतना ही पूर्ण अधिकार रख पाती, जितना यह नन रख पाने में सक्षम थी। सबसे बढ़कर, वह फिर से प्रेम की इसी सरलता में लौट आना चाहती थी। वह अपने उस अहंकार और दंभ के बोझ को उतार फेंकना चाहती थी, जिसे उसकी आत्मा हमेशा ढोती आई थी। अपने मन के भीतर उठ रहे उथल-पुथल को शांत करने के लिए उसने भक्ति की एक पुस्तक उठाई और उसके शब्दों पर अपना ध्यान टिकाने की कोशिश की। लेकिन कुछ ही क्षण बाद उसे अचानक पूरा पत्र फिर से पढ़ने की तीव्र इच्छा हुई ताकि यदि संभव हो तो वह उस इतने गहरे आनंद का रहस्य जान सके।

            पेपीता रात का खाना हाथों में लिए लौट आई। उसके पीछे एक नौकरानी भी थी। डोना मारिया अपनी किताब के ऊपर से उसे इस तरह देख रही थी, जैसे वह स्वर्ग से आया कोई आगंतुक हो। पेपीता दबे पाँव कमरे में इधर-उधर घूमती हुई मेज़ लगाने लगी और अपनी सहायक को फुसफुसाकर निर्देश देती रही।

आख़िरकार उसने कहा, “आपका खाना तैयार है, माय लेडी।”

“लेकिन बच्ची, तुम मेरे साथ खाना खाओगी?” लीमा में पेपीता आम तौर पर अपनी मालकिन के साथ ही मेज़ पर बैठकर खाना खाती थी।

“मुझे लगा आप थकी हुई होंगी, मेरी माय लेडी। मैंने नीचे ही खाना खा लिया था।”

“वह मेरे साथ खाना नहीं खाना चाहती,” मार्केसा ने सोचा। “वह मुझे समझती है और उसने मुझे ठुकरा दिया है।”

“जब आप खाना खा रही हों तो क्या मैं आपको कुछ पढ़कर सुनाऊँ, माय लेडी?” पेपीता ने पूछा। उसे लगा कि उससे कोई गलती हो गई है।

“नहीं। अगर तुम चाहो तो सोने जा सकती हो।”

“धन्यवाद, मेरी माय लेडी।”

डोना मारिया उठकर मेज़ के पास आ गई। एक हाथ कुर्सी की पीठ पर रखते हुए उसने अटकते हुए कहा, “मेरी प्यारी बच्ची, मैं सुबह लीमा के लिए एक पत्र भेज रही हूँ। अगर तुम्हारे पास भी कोई पत्र हो तो उसे मेरे पत्र के साथ भेज सकती हो।”

“नहीं, मेरे पास कोई पत्र नहीं है,” पेपीता ने कहा। फिर उसने जल्दी से जोड़ा, “मुझे नीचे जाना होगा और आपके लिए नया कोयला लाना होगा।”

“लेकिन, मेरी प्यारी, तुम्हारे पास एक पत्र है... मद्रे मारिया देल पिलार के लिए। क्या तुम...?”

पेपीता ने अंगीठी के पास व्यस्त होने का बहाना किया। “नहीं, मैं उसे नहीं भेजने वाली,” उसने कहा। इसके बाद जो लंबी चुप्पी छाई, उसमें पेपीता जानती थी कि मार्केसा उसे अविश्वास से घूर रही है। “मैंने अपना मन बदल लिया।”

“मुझे मालूम है कि वह तुमसे एक पत्र पाकर बहुत खुश होंगी, पेपीता। इससे उन्हें बहुत खुशी होगी। मुझे मालूम है।”

पेपीता का चेहरा लाल पड़ने लगा। उसने ऊँची आवाज़ में कहा, “सराय वाले ने कहा था कि रात होने तक आपके लिए नया कोयला तैयार हो जाएगा। मैं उनसे कहती हूँ कि उसे अभी ऊपर पहुँचा दें।” उसने जल्दी से बूढ़ी स्त्री की ओर देखा और पाया कि वह अब भी अपनी बड़ी, उदास और प्रश्नवाचक आँखों से उसे लगातार देख रही थी। पेपीता को लगा कि ये ऐसी बातें नहीं थीं जिनके बारे में बात की जाती है, लेकिन वह अजीब स्त्री इस बात को इतनी गहराई से महसूस कर रही थी कि पेपीता एक और उत्तर देने के लिए तैयार हो गई। “नहीं, वह एक बुरा पत्र था। वह अच्छा पत्र नहीं था।”

डोना मारिया लगभग हाँफ उठी। “अरे, मेरी प्यारी पेपीता, मुझे तो वह बहुत सुंदर लगा था। मेरा विश्वास करो, मुझे मालूम है। नहीं, नहीं… ऐसी कौन-सी बात थी जिसने उसे बुरा पत्र बना दिया?”

पेपीता ने माथे पर बल डाला और ऐसा शब्द खोजने लगी जिससे यह बात समाप्त हो जाए।

“वह... वह... बहादुर नहीं था,” उसने कहा। और फिर उसने आगे कुछ नहीं कहा। वह पत्र अपने कमरे में ले गई और उसे फाड़ने की आवाज़ सुनाई दी। फिर वह बिस्तर पर लेट गई और अँधेरे में आँखें खोले पड़ी रही। इस तरह की बातें कर डालने के कारण उसे अब भी असहज महसूस हो रहा था। और डोना मारिया विस्मित होकर अपने खाने के सामने बैठी रही।

उसने अपने जीवन में न तो जीवन के सामने और न ही प्रेम के सामने कभी साहस दिखाया था। उसकी आँखें अपने हृदय को जैसे टटोलने लगीं। उसे अपने ताबीज़ और अपनी माला याद आई, अपनी शराबखोरी याद आई... उसे अपनी बेटी याद आई। उसे वह लंबा संबंध याद आया, जो दफ्न हो चुकी पुरानी बातचीतों को फिर खोद निकालने से बचे हुए मलबे, कल्पित अपमानों, अनुचित समय पर की गई आत्मीय बातों और उपेक्षा तथा बहिष्कार के आरोपों से भरा हुआ था। (लेकिन उस दिन तो वह पागल ही हो गई होगी। उसे याद आया कि उसने मेज़ पर मुक्के बरसाए थे।) “लेकिन इसमें मेरी गलती नहीं है,” वह चिल्लाई। “मेरी गलती नहीं है कि मैं ऐसी थी। यह परिस्थितियाँ थीं। मेरा पालन-पोषण ही ऐसा हुआ था। कल से मैं एक नया जीवन शुरू करूँगी। देखना, मेरी बच्ची।” आख़िरकार उसने मेज़ साफ़ की और बैठकर वह पत्र लिखा जिसे उसने अपना पहला पत्र कहा, साहस में लिखा गया उसका पहला लड़खड़ाता, गलत वर्तनी वाला पत्र। उसे लज्जा के साथ याद आया कि पिछले पत्र में उसने अपनी बेटी से दयनीय ढंग से पूछा था कि वह उससे कितना प्रेम करती है और डोना क्लारा ने हाल ही में संकोचपूर्वक जो थोड़े-से प्रेमभरे शब्द उससे कहे थे, उन्हें उसने लालच से उद्धृत किया था। डोना मारिया उन पुराने पन्नों को फिर याद नहीं करना चाहती थी, लेकिन वह नए पन्ने लिख सकती थी। ऐसे पन्ने जो खुले, उदार और निष्कपट हों। किसी और ने उन्हें “लड़खड़ाते हुए” नहीं माना। वह प्रसिद्ध पत्र संख्या LVI था, जिसे विश्वकोशकारों के बीच उसकी अमर प्रेम-विषयक अनुच्छेद के कारण “उसका दूसरा कुरिन्थियों”[18] कहा जाता था, “मेरी बच्ची, जीवन भर में हम जिन हज़ारों लोगों से मिलते हैं...” और आगे भी ऐसा ही। पत्र पूरा करते-करते लगभग भोर हो गई। उसने अपनी बालकनी का दरवाज़ा खोला और एंडीज़ के ऊपर चमकती हुई तारों की विशाल, सीढ़ीनुमा पंक्तियों को देखा। रात के उन घंटों में, यद्यपि उन्हें सुनने वाला शायद ही कोई था, पूरा आकाश इन तारामंडलों के गायन से गूँजता रहा था। फिर वह एक मोमबत्ती लेकर अगले कमरे में गई और सोती हुई पेपीता को देखा। उसने लड़की के चेहरे पर आए नम बालों को पीछे हटाया। “अब मुझे जीने दो,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मुझे फिर से शुरुआत करने दो।”

दो दिन बाद वे लीमा के लिए वापस चल पड़ीं और जब वे सैन लुईस रे के पुल को पार कर रही थीं, तभी वह दुर्घटना घटी जिसके बारे में हम जानते हैं कि वह उनके साथ हुई थी।

 



[1] बाबेल की मीनार बाइबिल के उत्पत्ति ग्रंथ की एक प्रसिद्ध कथा है। इसमें बताया गया है कि मनुष्यों ने आकाश तक पहुँचने वाली एक विशाल मीनार बनाने का प्रयास किया। उनके अहंकार को रोकने के लिए परमेश्वर ने उनकी भाषाएँ अलग-अलग कर दीं, जिससे वे एक-दूसरे को समझ नहीं सके और पृथ्वी पर बिखर गए।

[2] यहाँ Inquisition (इन्क्विज़िशन) से आशय विशेष रूप से कैथोलिक चर्च की उस धार्मिक जाँच-व्यवस्था से है, जो विधर्म या धार्मिक अपराध के संदेह में लोगों से पूछताछ करती थी।

[3] Condesa (कोंदेसा)। काउंटेस (Countess), यानी किसी Conde (काउंट) की पत्नी या स्वयं उस उपाधि वाली महिला।

[4] Baroque (बारोक) यूरोप की एक भव्य और अलंकृत स्थापत्य-कला शैली थी, जो लगभग 17वीं–18वीं शताब्दी में प्रचलित रही। इसमें बहुत अधिक सजावट, घुमावदार आकृतियाँ, बड़े-बड़े कक्ष, नक्काशी, चित्रकारी और भव्यता दिखाई देती है।

[5] Cathay (कैथे) चीन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पुराना यूरोपीय नाम है। मध्यकालीन यूरोप में चीन को Cathay कहा जाता था, जो संभवतः ख़ितान (Khitan) नाम से निकला है। ख़ितान (Khitan) एक प्राचीन मध्य एशियाई/पूर्वी एशियाई घुमंतू जातीय समूह था, जिसने बाद में चीन के एक बड़े हिस्से पर शासन किया।

[6] Flanders (फ्लैंडर्स) यूरोप का एक ऐतिहासिक क्षेत्र है, जो आज मुख्यतः बेल्जियम के उत्तरी भाग में स्थित है। इसका कुछ हिस्सा आज के नीदरलैंड और फ्रांस में भी आता है।

[7] उपन्यास में उसका पूरा नाम Camila Perichole (कैमिला पेरिकोल) है। वह लीमा में बहुत प्रसिद्ध रंगमंच की अभिनेत्री और गायिका है और उपन्यास की पाँच प्रमुख पात्रों में से एक है।

[8] पेरू का एक ऐतिहासिक शहर है।

[9] Comedia (कोमेदिया) स्पेनी शब्द है, जिसका सामान्य अर्थ है नाटक / हास्य-नाटक / रंगमंचीय प्रस्तुति।

[10] मकई (maize/corn) से बनाया गया मादक पेय होता था।

[11] Hecuba (हेक्यूबा) यूनानी पुराणकथाओं में ट्रॉय के राजा प्रियम की पत्नी और ट्रॉय की रानी थीं।

[12] महोदया

[13] मोरेतो (Agustín Moreto), 17वीं शताब्दी के प्रसिद्ध स्पेनी नाटककार।

[14] दक्षिण अमेरिका के वर्तमान बोलीविया में स्थित एक प्रसिद्ध शहर है। यहाँ के पहाड़, विशेषकर Cerro Rico (सेरो रिको), में 16वीं शताब्दी में चाँदी के अत्यंत विशाल भंडार मिले थे।

[15]पब्लियस वेटिनियस (लगभग 95–42 ई.पू.) रोमन राजनीति में अपने विरोधियों के प्रति तीखी शत्रुता के लिए प्रसिद्ध था। इसलिए अंग्रेज़ी में वेटिनियन का प्रयोग कभी-कभी अत्यंत कटु या विषैली घृणा के अर्थ में किया जाता है।

[16] सुबह बहुत तड़के होने वाली पहली मिस्सा-प्रार्थनाएँ। 

[17] ग्रीक-रोमन मिथक में ज्यूपिटर, यूनानी Zeus का रोमन रूप है। सेमेले एक नश्वर स्त्री थी, जिससे ज्यूपिटर प्रेम करता था। जब उसने ज्यूपिटर से उसका वास्तविक दिव्य रूप दिखाने को कहा, तो उसके दिव्य तेज को सह न पाने के कारण सेमेले की मृत्यु हो गई।

[18] बाइबल की दूसरी कुरिन्थियों की पत्री।

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