Sunday, 3 December 2017

पंक्चर

कुछ दिनों से लिखना बिलकुल बंद रहा। जब लोगों ने मुझसे मैसेज और फोन कर के पूछा कि क्या हुआ है तब मैंने सवाल बहुत हल्के में लेते हुए तुरंत जवाब दिया-"मेरा लैपटाप खराब हो गया है इसलिए आप लोगों को झेलने का अवसर नहीं मिल रहा है।" हालांकि जवाब मुझे बहुत खराब लगा। ऐसा नहीं  है कि दिमाग में आइडिया नहीं आए। काफी विषय सूझे और मैंने लिखने की भी कोशिश की। पर एक बैठक में हाथ से लिख नहीं पा रही थी।  यह आधुनिक लेखन के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण परेशानी लगी और एक दोस्त ने मुझे इसे लिखने का सुझाव भी दिया। 
पेन और कॉपी लेकर लिखने में मैंने एक अपने स्तर का संघर्ष किया और पाया कि अक्षरों  की बनावट पर मैं अपना शासन खो चुकी हूँ। धीरे लिख रही हूँ। लिखने पर भी जूझ रही हूँ। लय नहीं बन पा रही आदि आदि। कॉलेज और उसके बाद तक के लिखने के सफर में लिखना एक खुशी के साथ आता था। लिखते वक़्त लगता था कि शब्दों का एक झरना बह रहा है और हाथ के माध्यम से पन्नों पर उतर रहा है। लेकिन पिछले तीन साल में मैंने लगातार इस मशीन पर ही लिखने को लिखना समझा और एक घाटे का सौदा किया। हालांकि बीच बीच में डायरी लिखी पर डायरी में 5 या 6 पन्ने लिखने में बहुत बड़ी मुश्किल नहीं लगी। एक वजह यह भी है कि डायरी लेखन एक ऐसी आज़ादी का भी अहसास लेकर चलता है जिसमें बाध्यता बहुत बड़ी बात नहीं होती। डायरी मनमर्ज़ी शब्द से भी कई बार जुड़ जाती है।

बटन दब जाने पर अक्षरों का तुरंत उभर आना एक निहायती बेदिली का काम और उत्पादन है। हाथ और की-बोर्ड के बीच का रिश्ता जैसे को तैसा वाला है। जो बटन दबेगा वही उभरेगा। और यहाँ लिखने की बात ही नहीं है। टाइप करना शब्द युग्म इस्तेमाल किया जाता है। हाथ और की-बोर्ड एक के बीच एक ही एक्शन निरंतर चलता है और परिणाम में लिखा हुआ उभर आता है। जबकि हाथ से लिखने में हाथ और पन्ने के बीच मशीनी रिश्ता नहीं महसूस होता। दूसरी महत्वपूर्ण बात लिखते समय लिपि की बनावट हाथ को एक घुमाव और स्वाभाविक एक्शन मुहैया करवाती है। जो कि हम इन्सानों के खून में है। इसका बढ़िया उदाहरण अगर खोजा जाए तो आपको ऐसे लोग मिलेंगे जो पेन पेंसिल को कान या फिर अपने जुड़े में अटका कर रखते हैं। छोटे बच्चों को जब नई नई पेंसिल दी जाये तब उस पेंसिल का इस्तेमाल लिखने के अलावा मुंह में, सिर में और बाकी तरह से वे करते हुए दिखते हैं। यह सब एक बेहद स्वाभाविक हिस्सा लगता है। 

लेखन से जुड़े दो उदाहरण और देना चाहूंगी। चूंकि JNU में मेरे वक़्त का कुछ हिस्सा चाय पीने में जाता है तो वहाँ कुछ जगहों पर अपने आप ध्यान चला जाता है। वहाँ का माहौल निश्चित रूप से यह बतलाता है कि आप अभी तक इंसान ही हो। इसलिए दिमाग कि तनी हुई सिराएँ थोड़ा ध्यान इधर उधर करने की इजाजत भी दे देती हैं। वहाँ एक लाइब्रेरी के पीछे वाली कैंटीन और मामू का ढाबा है। जब मैं शुरू शुरू में पढ़ने गई थी तब लाइब्रेरी के पीछे वाली कैंटीन में हाथ से कैंटीन के खुलने और बंद होने का समय लिखा रहता था। अब ठीक इसकी जगह टाइप हुए पर्चे पर यही बात लिखी होती है। हालांकि एक आम समझ में यह साफ है कि जो सूचना देने का उद्देश्य था वह पूरा हो चुका है फिर भी थोड़ा गौर करें तो पाएंगे कि अब एक या दो पंक्ति को भी हाथ से नहीं लिखा जा रहा। वास्तव में हाथ का लिखा रिप्लेस होने का शिकार हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे 19+38 को कोई मुझे जोड़ने को कहे तो अमूमन मैं मोबाइल का गणक निकाल कर बैठ जाती हूँ।

                                                            By Justyna Kopania 

अब बात मामू के ढाबे की। यह जगह काफी लाजवाब है। खाना भी अच्छा है। लेकिन जो बात मुझे यहाँ बहुत अच्छी लगती है और मेरा ध्यान खींच लेती है वह अंग्रेज़ी में करसिव हैंड राइटिंग से लिखा हुआ मेन्यू। अगर आप कुछ ऑर्डर करने जाते हैं तब खाने के साथ साथ यह भी दिमाग में आता है कि क्या खूब लिखा है। कितनी सुंदर लिखाई के साथ। इसलिए बाहर कि दुनिया में जाते ही मुझे हर वह चीज जिस पर हाथ की लिखाई लिखी होती है, आकर्षित तो करती ही है और साथ ही दिलचस्प भी लगती है। आजकल डीटीसी की बसों में लहराते हुए शब्द दिखते हैं जो कहते हैं- जेबकतरों से सावधान!

जो सभ्यता नहीं लिखती थीं उनके इतिहास में बहुत झोल मौजूद है। एक झूठा और बनावटी इतिहास। मुझे 'बोलों' की दुनिया में यकीन है पर पूरा का पूरा इतिहास अगर उन पर टिका रहे तो मुझे आपत्ति है। आजकल हर चीज को मशीनों और कार्डों से जोड़ने के पीछे सुविधा की बात को ऊपर रखा जाता है। टीवी पर एक विज्ञापन आता है जिसमें सभी काम कार्ड-पेमेंट से किए जा रहे हैं पर जैसे ही एक व्यक्ति कैश रुपया निकलता है उसे हिकारत की नज़र से देखा जाता है। वह फास्ट लेनदेन में बाधा के रूप में दिखता है। लेकिन इसी विज्ञापन पर यह बहस भी की जा सकती है कि इंसानी दिमाग को लगभग पंक्चर करने की तैयारियां सरकार और कंपनियाँ ज़ोरों पर कर रही हैं। यही नहीं वे अपने काम में सफल भी हो रही हैं। चूंकि सभी पेमेंट कार्ड से हो रही हैं तो यह तय है कि आपसे हिसाब किताब करने का अभ्यास छिना जा रहा है। जहां अभी तक मशीनों से पेमेंट नहीं होता वहाँ हम खुद -ब-खुद जोड़ना शुरू करते हैं और दिमाग पर ज़ोर डालते हैं। इसलिए कई मर्तबा दिक्कत भी आती है। हमारे आसपास अब ऐसे लोगों की संख्या कम होती जा रही है जो मुंह-जुबानी हिसाब जोड़ लिया करते थे।

कितनी अजीब बात यह कि मैं यह सब फिर से उसी लैपटाप पर लिख रही हूँ जिससे अब थोड़ा सा डर लगता है। फिर भी मुझे अपने स्वाभाविक लिखने की रोज़मर्रा के छूटे हुए अभ्यास की तरफ दुबारा जाना चाहिए। इसलिए आजकल घरेलू खर्चों के हिसाब किताब की डायरी को मैंने अपने पिता से लेकर खुद लिखना शुरू किया है। शायद अधिक नहीं लिख पाऊँगी पर एक रोजनामचा (Journal) बनाना तो सीख ही जाऊँगी।  


Monday, 2 October 2017

ये जो प्रेम है

प्रेम एक ऐसा शब्द है जिसके बोलते ही कितनी हलचल मच जाती है। किसी को बॉलीवुड की फिल्म याद आ जाएगी किसी को कोई गीत याद आ जाएगा। किसी को अपना प्यार याद आ जाएगा। किसी को टूटा दिल या बेवफ़ाई याद आ जाएगी। कहने का मतलब यह है कि यह शब्द खाली रहने नहीं देगा। यह ऐसा विषय भी है जिस पर बोलने या लिखने से बचती रही हूँ। पर आज मैं लिखूँगी कि मैं किन किन लोगों की प्रेम दीवानी रही हूँ। हम जैसी बात बात पर शर्मा जाने वाली लड़कियों के अपने ढेरों कोने होते हैं और वहाँ बहुत से लोग ऐसे रहते हैं जिन्हें हम दुनिया की बुरी नज़र से छुपा कर रखना चाहते हैं। पहले पहल मुझे यह लगता था कि किसी को प्यार करना बदनाम हो जाने वाली वजह बन जाती है। लेकिन प्रेम पूर्वाग्रहों से संचालित नहीं होता। इस बात का संतोष और खुशी दोनों है। 

सन् 1972 में हिन्दी की दुनिया को एक बेहतरीन उपन्यास मिला था। उसका नाम है- धरती धन न अपना।  इसके लेखक जगदीश चंद्र हैं। जब मैं इग्नू से अपने एम.ए. हिन्दी की पढ़ाई कर रही थी तब यह उपन्यास कोर्स में लगा था। अधिक समय नहीं हुआ इस बात को। क्योंकि मेरा पूरा समय अपनी नौकरी में गुज़र जाता था इसलिए उपन्यासों को खरीदने की ज़िम्मेदारी मेरे पिता के जिम्मे हो गई थी। वे ही पुरानी दिल्ली के नई सड़क पर लगने वाले बाज़ार से मेरे लिए उन किताबों को खोज खोज कर लाये थे। मैंने उन्हें सभी उपन्यासों की फेहरिश्त दी थी और वे एक ही बार में कम से कम आठ उपन्यास खरीदकर ले आए थे। शाम को जब मैं घर पहुंची तब नई नई किताबों को देखकर एक खुशी अंदर मिनट में पैदा हो गई। मैंने किताबों को देखते हुए कहा- 'ये तो सारी नई लग रही हैं!' वे बोले- 'हाँ,  नई ही हैं। कला मंदिर नामक दुकान से लाया हूँ।' इतनी देर में मैंने कुछ उपन्यासों को उलट पलट कर देख लिया। वो बोले- 'तुम्हें काफी मेहनत करनी होगी।' मैंने किताबों पर हाथ फेरते हुए कहा- 'सो तो है।...पापा आप को कौन सी किताब अच्छी लग रही है?' वो आठों किताबों पर नज़र फेरने के बाद एक किताब मेरे आगे करते हुए बोले- 'ये वाली!' जब मैंने उस किताब को हाथ में लिया तो वह यही उपन्यास निकला- 'धरती धन न अपना'। 

लेकिन मैंने इस किताब को पहले नहीं पढ़ा। इससे पहले मैंने 'गोदान' को और इसके बाद 'सूखा बरगद' पढ़ा। दोनों ठीक-ठाक थे। इस उपन्यास की बारी तीसरी रही और पढ़ने के बाद अफसोस हुआ कि यह पहले क्यों नहीं पढ़ा। वास्तव में यह उपन्यास दिल में उतर जाने वाला लगा। लिखने की शैली ऐसी थी कि पाठक को एक पल को लगता है कि वह 'चमादड़ी' में ही पहुँच गया है। अगर मैं अपनी निजी पसंद कि बात करूँ तो 'गोदान' से पहले मैं इस उपन्यास का नाम लूँगी। फिर भी तुलना बेकार ही है। सभी किताब अपने महत्व को पारित ही करती हैं। खैर इस उपन्यास के चरित्रों 'काली और ज्ञानो' का प्रेम मुझे आज तक सुपर डुपर प्रेम लगता है। ज्ञानो का मरना मुझे एक झटके जैसा लगा था। हमारा खुद का समाज ही प्रेम की स्थापना नहीं करने देता। खैर इस उपन्यास की कहानी नहीं बताना चाहती। लोग खुद से पढ़ें तो अच्छा रहेगा। बात तो प्रेम पर होगी और आकर्षण पर।

इस किताबी प्रेम-कहानी से पहले लड़कियों के जीवन में प्रेम कहाँ-कहाँ से प्रवेश करता है यह भी बड़ा दिलचस्प होता है। मुझे नहीं मालूम की बड़े घर की बेटी का जीवन कैसा होता है पर अपने जैसे घर की लड़की के बारे में कह सकती हूँ कि इनकी रोज़मर्रा बहुत उथल-पुथल वाली होती है। आज भी तकनीक के आ जाने से कुछ खास बदलाव नहीं आया है। 13 या 14 बरस की उम्र में छाती को ढकने वाला दुपट्टा रिशतेदारों से तोहफे में मिलना शुरू हो जाता है। स्कूल की ड्रेस या तो लंबी हो जाती है या फिर वह सीधे सूट में तब्दील हो जाती है। बालों की चमक तैल में चुपड़े हुए बालों में बदल जाती है। और कसकर दो चोटियाँ बना दी जाती है कि बालों का दम घुटने लग जाता है। फिर भी आकर्षण, हिंदुओं की किताब में दिये गए आत्मा के गुण को धारण कर उस सूट सलवार वाली लड़की के जीवन में आ ही जाता है। यही खास खासियत भी है। 



स्कूल के आने जाने के रास्ते कम मोहक नहीं होते! कुछ छोटी उम्र की कहानियाँ वहाँ जन्म ले लेती हैं। कोई लड़का है अजनबी सा जो साथ जाने की ज़िद्द करता है। सुबह 7:30 के समय में वह लंबी वाली सड़क के एक कोने में मोशन में खड़ा है। वह चाहता है कि यह सूट वाली लड़की आए तो साथ रास्ता कट जाये। लड़की अंजान बनी हुई भी सब जानती है। धीरे धीरे जान पहचान मुस्कुराहटों से हो ही जाती है। आह! क्या अहसास है। वह कम उम्र का लड़का अब प्रेमी है और वह लड़की प्रेमिका। कितना केयरिंग नेचर है उस लड़के का। इतना अच्छा अहसास। लड़की को उसका जन्मदिन याद है। वह कुछ ऐसा सामान जो तोहफा हो, देना चाहती है कि वह लड़का अपने साथ उसकी निशानी बनाकर रख सके। वह क्या दे सकती है, सोचने में कई रातें जाग कर बिता देती है। पिछले हफ्ते पिता ने एक बात कही थी कि इंसान को एक घड़ी का साथ रखना चाहिए। उसे यहीं से तोहफे के बारे में इशारा मिल गया। बचे हुए रुपयों से उसने चोरी चुपके एक काले पट्टे वाली घड़ी खरीद ली। उसका खयाल था कि इससे अच्छा तोहफा कुछ हो नहीं सकता। उसने दिया। लड़का हैरानी और प्यार के मिले जुले भाव से घड़ी देखता रह गया। शायद उसकी आँखों में एक आँसू भी तैर गया था। उसने उस पल सोचा-क्या लड़कियां ऐसी होती हैं!' उसने उस लड़की जिसको वह अब प्यार करने लगा है, के भी एक तोहफा खरीदने की बात सोचनी शुरू की। लेकिन जब तक शोर मच गया। बस एक बात जो आसपास होती रही, वह थी- 'लड़की का चक्कर चल रहा है, लड़की का चक्कर चल रहा है!

एक वो वाला प्यार भी होता है जो ट्यूशन में होता है। वहाँ स्कूल ड्रेस या दो चोटियों की ज़िद्द नहीं होती। वहाँ बहाने से छू भी सकते हैं। बात भी हो सकती है। नज़रें भी मिल सकती हैं। यहाँ भी लड़की का दिल अभी सीने से बाहर आने को हुआ होता है। a+b का स्क्व्यर वाला सूत्र कितना अच्छा लगने लगता है। टेस्ट होगा मैथ्स का। एक सवाल गलत नहीं होना चाहिए। टेस्ट का दिन आया। कुल छ सवाल दिये गए। सब अकेले अकेले बैठेंगे। कोई किसी का नहीं देखेगा। लेकिन ये जो आकर्षण है, यह सब कुछ देखता और समझता है। मुंह में केडबरी चॉकलेट की तरह घुल जाता है। लड़के ने लड़की को जितना हो सका दिखाया। दोनों टेस्ट में पास हो गए। अभी तक आकर्षण की भनक किसी बड़ी नज़र को नहीं लगी। यहाँ अभी कोई बदनाम नहीं हुआ है। अच्छा है। सब ठीक ठाक है। 

एक मैगज़ीन वाला प्यार भी होता है। बड़ी होती लड़कियों की जानकारी देने वाली पत्रिका। इसके अलावा वहाँ 'पहला प्यार' वाला किस्सा भी होता है। कितना अच्छा लगता है इस पेज़ को छूकर। आत्मा तृप्त होती है। अगर उस लड़की को अपने पहले प्यार के बारे में कुछ लिखना होता क्या लिखेगी? वह सोच रही है। किससे प्यार हुआ है उस। कोई क्लास का लड़का भी नहीं है, क्योंकि कॉलेज ही लड़कियों वाला है। ट्यूशन है नहीं तो कहाँ और किस्से प्यार होगा। चान्स ही नहीं। मौका है कहाँ! फिर कॉमिक्स के हीरो से। कौन अच्छा लगता है। फिलहाल तो सुपरमैन! अरे वही जो पेंट के ऊपर चड्डी पहनता है, वो भी लाल रंग वाली। कुछ भी कहो अच्छा तो लगता ही है। क्रिप्टन से आया है। अपनी धरती का मुसाफिर नहीं है। चक्कर चला तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। हाँ, यह अच्छा वाला विकल्प है। कोई पूछेगा तो कह दूँगी कि है मेरा भी कोई। यहाँ का रहने वाला नहीं है... नहीं यह बताने की ज़रूरत नहीं है। है बस कोई, इतना काफी है। 

दूसरी तरफ उस बेचारे सुपरमैन को नहीं मालूम कि कितनी लड़कियों का वह प्रेमी है। कितने प्रेम पत्रों की वह वजह है। कितनी आँखों के गुलाबी हो जाने का वह कारण है। कितनी सारी डायरियों के पन्नो में वह चिपका हुआ उड़ रहा है, कहीं न जाने के लिए। यह डायरी वही खजाना है जिसके ऊपर सूरज की रोशनी नहीं पड़ा करती। जिसके बारे में कोई भी 'कैप्टन जैक स्पेरॉ' नहीं जानता। वह खोज नहीं सकता इस खजाने को। आज भी ऐसे खजाने रोज़ अहसासों की ज़मीन में छुपाए जा रहे हैं। अच्छा है। यह दुनिया खजाना रहित नहीं होगी। खोजने के लिए कुछ न भी रहा तो कम से कम ये अहसास तो रहेंगे ही न।




Sunday, 1 October 2017

अटेन्शन प्लीज़

जब तक बात 'अजीब' न हो वह ध्यान नहीं खींचती। अजीब का मतलब कुछ भी ऐसा जो जाना-पहचाना न हो या फिर मेरे दायरे से बाहर का हो। और भी बहुत मतलब हैं सभी को मालूम है कि अजीब होता क्या है! मुझे एक बैठक याद आ रही है। बहुत से अनुभवी लोग थे वहाँ, मेरे अलावा। उस आदमी ने कहा- "अपने कम्फर्ट ज़ोन से निकलना अपने आप को सबसे बड़ी चुनौती देने की औकात होती है। अगर आप लगातार उसी में रहते हैं तब मुमकिन है कि कुछ समय अच्छा लगे, पर बाद में खामियाज़ा भुगतना ही पड़ता है। बदलावों के लिए अपनी आराम तलबी तोड़नी ही पड़ती है। ...कैसे मुमकिन है कि सोचने भर से सब कुछ खुद से हो जाएगा! अगर आप पर वार हो रहे हैं तो हो सकता है आप कुछ न कहकर बेकार के पचड़ों में न पड़ने का रास्ता चुनें, पर अगर जवाब देंगे तो मुमकिन है सामने वाला सोचे।... कहने से पहले सोचे।... हो सकता है बोल ही न पाये। ...बच्चों और औरतों पर अपराध इसलिए नहीं बढ़ रहे कि अपराधी बढ़ रहे हैं, बल्कि उस पर प्रतिक्रियाएँ न के बराबर हैं। हमें सीखना और सिखाना होगा कि कैसे पलटवार किया जाता है। यह जरूरी है। अपराध का शिकार हो जाने पर दुबकना किस समाज का बर्ताव है? ऐसे तो घुटन हो जाएगी। कौन जिएगा ऐसे?..."

उसकी बातों में बहुत सी अच्छी बातों को समझा जा सकता है।आज उसकी बातों में से व्यवहार और आदत को ले सकते हैं। अपने व्यवहार को बर्ताव से समझा जा सकता है। यह एक मज़ेदार गतिविधि है। कई बार ऐसे ही पागलपन वाले काम कर लेने चाहिए। कुछ सीखने को मिल जाता है।

 
मुझे लगता है, मैंने बहुत सी बातें छोड़ दी हैं। बात काफी साल पहले की है सो याद रह जाने लायक ही याद आ रहा है। इस आदमी को मैं नहीं जानती थी। जानती थी तो बस इतना कि वह भी किसी संस्था में बच्चों को रेसक्यू करने का काम करता है। वह इतने सामान्य तरीके से बोल रहा था कि मुझे एक पल को अटपटा लगा। भला इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी इस तरह कोई बोलता है। बैठक खत्म हो जाने के बाद वह अपना कोना तलाश कर सिगरेट फूँक रहा था। मन में आया, ये आदमी बड़े अजीब होते हैं। पैक पर लिखे होने के बाद भी क्यों सिगरेट पीते हैं! मुझेअपनी तरफ देख वह थोड़ा सा मुस्कुराया। बैठक में जिस लड़की के जिस लड़की के साथ आया था, उसके चाय खत्म करने के बाद तुरंत निकल गया। मैं बात नहीं कर पाई। लेकिन उसकी बातें याद तो है। सही है कि हम सब का अपना अपना एक कोना है। चाहे सीलन हो या बदबू आ जाए हम नहीं निकलना चाहते उस कोने से। बात आराम की नहीं, बात आराम पसंद हो जाने की है। उस डर की है जो हममें कितनी खूबसूरती से अदृश्य रहता है। मैं भी इस डर से अभी तक मुक्त नहीं हो पाई। बहुत डर का असर यह हुआ कि लोगों की बातों के या हमलों के निशाने पर जल्दी आ जाती हूँ।

कुछ दिनों पहले सोशल साइट्स पर माहिरा खान की खुली पीठ और हाथों की सिगरेट का ऐसा तूफान आया था कि वह सभी संस्कारी लोगों के निशाने पर आ गई थीं। पहली नज़र में जब मैंने उन तस्वीरों को देखा था तब मुझे कोई खास और बड़ी बात नहीं लगी थी।आज भी नहीं लगती। लेकिन अजीब मुझे वे लोग लगे थे जो उनको गाली दे रहे थे। जो उनको इस्लाम का हवाला देते हुए नसीहत दे रहे थे। ठीक ऐसा ही वाकया प्रियंका चोपड़ा के साथ हुआ था जब वह जर्मनी में प्रधानमंत्री से मिलने गई थीं और तस्वीरों में उनके पैर दिख रहे थे। लोगों ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री से मिलने साड़ी पहनकर जाना चाहिए था। कुछ ने यह भी कहा कि उन्हें कम से कम संस्कार तो नहीं भूलने चाहिए थे। अभी कुछ दिन पहले हादिया का भी एक मामला आया था जो मन से अखिला से हादिया हो गई हैं। लेकिन वहाँ के न्यायलाय और समाज को बहुत असर पड़ चुका है। 

जब मैं स्नातक में थी तब अंग्रेज़ी की मैम ने पूरी क्लास को एक पेपर लिखने को कहा। यह बहुत दिलचस्प काम था। उन्होने कहा कि आप अपनी आठ दिनों के बारे में रोज़ लिखें और वही आपका पेपर होगा। उसी पर नंबर मिलेंगे। मेरा रोल नंबर ओड(विषम) था इसलिए मुझे और भी खुशी होती थी क्योंकि यही टीचर हमें पढ़ाया करती थी। बहरहाल उस वक़्त तक मैं कम से कम रोज़ डायरी लिखने की अभ्यासी नहीं थी। लिखती थी पर दिनों के अन्तराल में। इसलिए जब यह काम मिला तब मैंने अपने दिन में होने वाली बातों पर गहरी निगाह रखनी शुरू कर दी। इतना ही नहीं अपनी माँ और भाई, बहन और पिता को भी इस नज़र के दायरे में लेना शुरू कर दिया। एक तरफ मुझे अच्छे नंबर की लालसा था तो दूसरी तरफ उस महत्वपूर्ण चीज को दर्ज़ कर लेने की जद्दोजहद भी थी जो बहुत खास हो...अलग हो। 



मेरे घर में मेरे होश संभालने से पहले ही चम्पक, नन्दन और अखबारों का गहरा प्रभाव था। कभी कभी किसी माह की पत्रिका रह जाती तब पढ़ी हुई पत्रिका ही दुबारा पढ़ लेती। इसलिए शब्द और खयाल वहाँ से भी मुझे अपने कॉलेज के दिये काम में मिल रहे थे। मैंने आठ दिनों में वह सब नोट किया या फिर अपने कच्ची बुद्धि के संज्ञान में ले लिया जो मैं ले सकती थी। परिणाम हैरान करने वाला था। मैंने एक बात को बार बार लिखा था। वह यह बात थी कि हम दूसरों को हर 10 या 20 मिनट में जज करते हैं। लगभग हर रोज़। किसी को कैसा बर्ताव करना चाहिए या फिर कैसा नहीं यह हममें तय करने की लगभग एक ज़िद्द है। घर और क्लास में ये बातें बड़े ही सामान्य तरीकों से होती थीं। इनका होना ऐसा है जो हमारा ध्यान भी नहीं खिंचतीं। जैसे मेरे घर में खाने में नमक की हल्की सी बात पर ही हम माँ को नसीहत थमाते चलते थे कि कम है तो कभी ज़्यादा हो गया। बहन के लिए था कि वह खाने में दिल रखकर नहीं पकाती। पकाना चाहिए। दीदी को घर जल्दी लौट आना चाहिए। भाई को पढ़कर अकाउंटैंट बन ही जाना चाहिए। मझला भाई देरी से आता है। जल्दी आना चाहिए। ज़रूर आवारागर्दी करता होगा। ठीक ऐसा ही क्लास में मेरे मन में होता था जो मस्ती करते थे आ फिर मेरे लिंक-अप्स की खबरें यहाँ वहाँ उछालते थे। मन में आता था कि एक एक को पकड़कर कूट डालूँ। कॉलेज में कुछ ऐसे लोगों को भी हल्का फुल्का सुना कि जो लड़की कम कपड़ों में हो वह जरा ऐसी वैसी होती है। 

ऊपर वाले पैरे का पूरा मतलब यह है कि हम किसी को भी एकदम से पोथी लेकर जज करने बैठ जाते हैं। यह हमारी आदतों में से एक गंदी वाली आदत है। कौन क्या पहन रहा है, कौन क्या कर रहा है, कौन क्या खा रहा है, आदि को जानने के लिए हमारी ताक झांक कुछ इस कद्र बढ़ जाती है कि यह एक बहुत बड़े ऐब में तब्दील हो जाती है। समाजों में ऐब ही अपराधों की वजह बन जाते हैं। मैंने पाया है कि हममें अपनी आदतों पर काम करने की बेतरह कमी भी है। व्यक्तिगत से लेकर सरकार तक अब आधार कार्ड के जरिये हमारे निजी जीवन में ताक झांक कर रही है। अगर आप एक औरत हो तो यह बात लोगों के लिए बहुत ही मज़ेदार और आसानी से निशाना साधने लायक बन जाती है। यह व्यक्तिगत गिरावट की निशानी है।  

इसका मैं एक ऐसा उदाहरण देती हूँ जिससे हम अपने व्यवहार को आदत बनते देख और समझ सकते हैं। आजकल मेट्रो का सफर अधिक होता है इसलिए वहाँ से उदाहरण लेना ठीक रहेगा। जब मैं महिलाओं के डिब्बे में जाकर सफर करती हूँ तब ऐसे हर उम्र की औरतों लड़कियों को एक दूसरे को घूरते और कानों में फुसफुसाते हुए पाती हूँ। हमें हंसी भी आ जाती है। उस दिन एक लड़की खूबसूरत सी स्कर्ट पहनकर खड़ी थी तभी कुछ लड़कियां उसकी स्कर्ट को देखकर हंसी और फुसफुसाई। जब मैंने उस स्कर्ट वाली लड़की को ठीक से देखा तो पता चला कि स्कर्ट में एक लंबा कट था जिससे उसके पैर दिख रहे थे। लेकिन फिर भी मुझे यह बात कोई विषय नहीं लगी। ऐसा पढ़ी लिखी लड़कियां बहुत करती हैं। मैंने देखा है कि मज़दूरीनें तो आराम से बैठकर सफर को सफर की तरह कर रही होती हैं। 

ठीक कोई शॉर्ट ड्रेस में लड़की मेट्रो के जनरल डिब्बे में आ जाये तब तो हाहाकार ही मच जाता है। जो लोग मोबाइल में सफ़ेद कमीज पहने हुए हनुमान चालीसा पढ़ रहे होते हैं या फिर टोपी लगाकर दीन के बारे में सोच रहे होते हैं, वे सभी नज़र उठा उठाकर उसे देखते भी हैं और लड़की के स्टेशन पर उतर जाने पर कहते हैं अब तो जमाना ही खराब हो गया है। कोई शरमों हया नहीं बची। वास्तव में जमाना अपने मुताबिक ठीक ही है, दोष तो नज़रों का ही है। खैर मैंने अपने पर बहुत काम किया है कि किसी के जीवन में अपनी नाक न अड़ाऊँ। मैं चाहती हूँ कि यह जज न करने की शैली ताउम्र बनी रहे। 

टिप्पणी के तौर पर यह भी कहूँगी कि बहुत से मसलों पर हमें अच्छा बुरा जज करना ही पड़ता है। इसलिए उन जगहों पर यह शैली भी खुद से विकसित करनी चाहिए। पढ़ने वाले लोग इतने दिमागदार तो होंगे ही कि वे समझेंगे कि मेरा मतलब और मकसद कौन सी बातों के लिए है। 



Sunday, 24 September 2017

दमदार औरतें: अपने स्पेस पर दावा

ज़ोर-जुल्म-जबर्दस्ती के खिलाफ़ सिर मुंडा लेने वाली वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्रा इस समय की सबसे बेहतर प्रेरणास्रोत है। कम से कम मेरे लिए तो है ही। विरोध जताने का नया हथियार ही बता दिया। अब हमारा सिर मुंडवाना ही हमारे विरोधों के तरीकों में से एक होगा। विधवा हो जाने पर सिर के बाल हटा देने वाली परंपरा को जबरन थोपने वाले इस अजीब तरह के लोगों के कबीले के मुंह पर बीएचयू की उस लड़की ने झापड़ रशीद कर उन्हें अपनी जगह दिखला दी है। जैसे बंदूक की नली घुमाकर शिकार करने वालों के आगे ही रख दी है। लो जी चला लो अब गोली! जिल्लत को हथियार में भी तब्दील किया जा सकता है। 

कवि और शायरों ने जिनकी ज़ुल्फों पर किताबें लिखी हों, जिनकी चोटियों को साँप सी लहराती हुई बताया गया हो, जिनके जुड़ों में फूलों को दिखाया गया हो, जिनके लिए बालों को उनकी सुंदरता का अहम हिस्सा बताया जाता हो, जहां बाल धोने के घोल से लेकर बढ़ाने तक के सूत्र बाज़ार में बिकते हों, जो लंबे बालों को शान समझते हैं, वहाँ उसी देश में एक लड़की ने अपने विरोध में उन्हें त्याग दिया और या जतलाया कि गलत के खिलाफ कैसे आवाज़ बुलंद की जाती हो। जिनको यह बात मामूली लगती है लगे, मुझे नहीं लगती।

महिलाओं के विरोधों पर नज़र डाली जाये तो उनके विरोध एक निश्चित खाँचें में दिखते हैं। विरोधों में खामोशी, झगड़े, कहासुनी, बात न करना, खाना छोड़ देना, शादी ब्याह में या किसी भी रस्म पर गीतों के माध्यम से गुबार निकाल लेना शामिल हैं। हो सकता है और भी ऐसे निजी व घरेलू तरीकें हों और अपने अपने अवसर पर वे करगार भी रहे हैं।  पर घर की चौहद्दी से बाहर के विरोधों में नारे लगाने, रैली निकालने और अनशन कर लेने में अब बराबर दिखाई देती हैं। मेधा पाटकर द्वारा नर्मदा बांध के खिलाफ़ किए गए अनशन अति प्रभावी और सम्मानीय रहे। ठीक इसी तरह इतिहास में चिपको आंदोलन में महिलाओं का पेड़ों से चिपक जाना और उन्हें कटने से बचाना भी महिला द्वारा विरोध जतलाने का नायाब उदाहरण हैं। स्वतन्त्रता संग्राम में कविता से लेकर कदम ताल-करने तक वे बहुत आगे थीं।  



आदिवासी आंदोलनों में भी महिलाओं की समान भागीदारी दिखती है। अगर ऐसा नहीं होता था दक्षिण कोरिया की विश्व की सबसे बड़ी स्टील कंपनियों में से एक कंपनी पॉस्को उड़ीसा में अभी तक अपना कारख़ाना लगा चुकी होती। इसके पीछे वहाँ के लोगों का वाजिब मजबूत विरोध रहा, जिसमें औरत मर्द और बच्चों ने पूरा पूरा हिस्सा लिया। एक ब्लॉग के अनुसार जब पुलिस गाँव में जाती थी तब वहाँ की स्थानीय औरतें उनके विरोध में अपने कपड़े उतार देतीं और तेज़ चिल्लाकर कहतीं- 'तुम यहाँ क्यों आए हो? क्या देखना चाहते हो?' ऐसा ही हाल मणिपुर में औरतों के विरोध में दिखा। 

पर मणिपुर को शर्मिला इरोम के कारण लोग जान पाये। सोलह वर्षों का उपवास रखकर प्रशासन को उसके अत्याचार के बदले रचनात्मक और बिना बंदूकों का विरोध बहुत महंगा पड़ा। उनके इतने लंबे अंतराल का विरोध ही था जो देश में एक लहर की तरह दौड़ा और बहुत से सोते हुए लोगों को जगाया। लोकतंत्र में विरोधों की क्या अहमियत होती है यह शर्मिला इरोम से सीखा जा सकता है। ज़रा फर्ज़ कीजिये, एक तरफ आपके पास सारे हथियार व साधन हैं और दूसरी तरह एक औरत का अनशन जैसा हथियार कि तुम गलत हो। गलत को गलत कहना और उसकी सही समय पर पहचान कर लेना बहदुरी के उदारणों में गिना जाता है। मणिपुर में हुए हालिया चुनाव में उन्हें महज़ 90 वोट मिले। लेकिन क्या यह सही नहीं कि कम से कम 90 लोगों में शर्मिला के प्रति एक भाव था। उनके विरोध की क़द्र थी। ऐसे ही शायद देश के बहुत से लोगों में उनके इस जज़्बे को लेकर सम्मान है। 

मेधा पाटकर को तो मैंने जब से होश संभाला है एक मजबूत विरोध करते हुए देखा है। मैंने बांध की खासियत और लाभ जरूर किताबों से जाने पर बांध के पीछे की तस्वीर मेधा पाटकर और उन तमाम लोगों से समझे कि बांध बेघर किए जाने की लंबी दास्तान अपने पीछे छोड़ जाते हैं। बहुत कुछ खत्म हो जाता है बांध के निर्माण में। ऐसे कई और विरोधों में भी उनकी अहम भूमिका होती है। ऐसे ही दिल्ली विश्वविद्यालय का एक आंदोलन है जिसका नाम-'पिजड़ा तोड़' है। मुझे यह आंदोलन भी बेहद रचनात्मक लगता है। वजह, छात्राएँ वे तमाम तरह के कदम उठाती हैं जिनमें वे अपने गुस्से और असहमति को मजबूती से दर्ज़ करवा पाएँ। पोस्टर्स से लेकर गीत संगीत और रैलियों के जरिये प्रशासन की नींद उड़ा देती हैं। लड़की हो तो घड़ी की सुइयों के मुताबिक चलने की हिदायत देने वाले कॉलेज के प्रशासन को वे जतला देती हैं कि अब और नहीं चलेगा! ठीक इसी तरह हमारा दिन और हमारी रात वाले अभियान में भी लड़कियों का रात पर सड़कों पर उतरना और यह कहना कि रात में भी हमारा समय है और दिन में भी जैसे अभियान, औरतों के अपने अभियानों और आंदोलनों को पुख्ता करते हैं। फेसबुक से लेकर ट्विटर तक पर गलत के खिलाफ, आज़ादी की सांस के लिए दमदार महिला दस्तक नज़र आ जाती है।

अहिंसक विरोधों की भारत में लंबी परंपरा रही है। इसलिए बीएचयू के गेट पर धरने पर बैठी उन छात्राओं के विरोध को आधी आबादी के जागरण अभियानों में से एक अभियान समझा जाये तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा। ठीक इसी तरह और भी मजबूत दस्तक हो रही हैं। मैं अपनी बात रखने की कोशिश में हूँ कि आधी आबादी बोलना भी खूब जान चुकी है। नहीं दोगे हक़ तो छिन कर लेंगी। हलक से भी निकाल लेंगी, वो भी सलीके से! महाभारत के बाद अब बारी महाभारती लिखने की है।

Saturday, 23 September 2017

कुछ छवियों से परहेज़ करना चाहिए


इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर जमकर औरत और मर्द दोनों ही नवरात्र के इन दिनों में एक दूसरे से बाँट रहे हैं और प्रोफ़ाइल भी अपडेट कर रहे हैं। भारत में तस्वीरों का एक बहुत बड़ा बाज़ार है जिनके पीछे की वजह यह है कि यहाँ के अधिकांश देवी देवता चित्र में मौजूद हैं। सभी देवी देवताओं की कल्पना कर के उनको एक प्रभावी और खूबसूरत रूप दिया गया है।  इसके अलावा दिल्ली की परिवहन सेवा में हिन्दी सिनेमा से लेकर दूसरी भाषाओं के सिनेमा के कलाकारों ने भी तस्वीरों में एक बड़ी जगह बनाई है। फेसबुक के आ जाने से सोशल मीडिया का रंग कुछ इस तरह बदला कि नए तकनीकी कैमरों से हर कोई अपनी तस्वीर साझा का सकता है। मैं कभी किसी दूसरे देश नहीं गई इस लिए मुझे नहीं पता कि वहाँ का रंग तस्वीरों के मामले में कैसा है? लेकिन अपने देश के भी बहुत छोटे से हिस्से को ही जिया है। अधिकतर घर से। लड़की होने की बहुत क़ीमत तो चुकानी ही पड़ती है। इसलिए गर लोग यह समझे कि भारत के 29 राज्यों के आधार पर तस्वीर वाली बात कह रही हूँ तो वे सबसे पहले खुद की राय दिमाग में उगा लें। 


हमारे यहाँ बचपन से ही तस्वीरों से मुलाक़ात शुरू हो जाती है। अगर आप स्कूल में दाखिल होने जा रहे हैं तब यह निश्चित है कि आपका फोटो पासपोर्ट साइज़ में आना तय है। इसके अलावा स्कूल के ढेर सारे समारोह में भी आपकी तस्वीरों में ख़ास जगह तय ही होती है। लेकिन स्कूल से पहले आपको अपने पारिवारिक फोटो का हिस्सा होना ही होता है। सवाल यादों का होता है। छुटकी कैसी लगती है या फिर छोटू बचपन में कितना ताज़ा मोटा था, यह बात आगे चलकर तस्वीरें ही बताती हैं। इसलिए तस्वीरआपकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है।इससे पहले और कहाँ तस्वीर देखने को मिलती है? घर की दीवारों ने परिवार को कभी दगा दाग नहीं दिया। हिन्दू हूँ इसलिए कह सकती हूँ कि दीवारों पर मुख्य धारा के देवताओं और देवियों का श्रद्धा से कब्जा हुआ होता था। आज भी है पर अब जरूरत तारीख़ और त्योहारों तक सिमटी है। 

अब सोचती हूँ तब पाती हूँ कि मैं कितने प्रभावपूर्ण नज़रिये से सरस्वती माँ के कपड़ों, गहनों, गोरे रंग को, वीणा को और मोर को ताका करती थी। इससे अधिक लक्ष्मी और शेरवाली माता की तस्वीरें अव्वल दर्ज़े की प्रभाव छोड़ने वाली होती थीं। ज़रा सोचिए, जिन शेरों को देखने से ही सिहरन हो जाए भला उस पर कोई देवी सवार हो जाये तो बच्चा दिमाग भगवान जैसे तत्व को न माने तो क्या करे। इस सारी कहानी को कहने का यही मकसद है कि तस्वीरें बहुत ही प्रभावित करती हैं। और इसे मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर देना ठीक बात नहीं। इसलिए जब एक औरत की बहु भुजाओं वाली तस्वीर देखी तो मेरा माथा ठनका, भला औरत को यह क्योंकर देवी बनाने पर तुले हैं?

एक ही  व्यक्ति का बहुत से काम कर देना पहली नज़र में उसका गुण हो सकता है पर उसके ऊपर आरोपित छवियों का एक हिस्सा भी समझा जा सकता है। औरत के बहुत से हाथ बनाकर उसमें काम और व्यस्तता के सभी उपकरण जबरन रचकर क्या  साबित होता है? यही कि वह आला दर्ज़े की नौकरानी है। मुफ्त का श्रम किया करती है। उसके पास पढ़ने का या कुछ भी रचनात्मक करने का समय नहीं है। वह इतनी अव्वल है कि सभी काम करने के चक्कर में अपने को आईने में देखना भी भूल जाती है। उफ़्फ़ ! गजब है! यह औरत है या गधी?

लोग तारीफ़ करें तो करें इस छवि की, मुझसे न हो पाएगी। भला क्योंकर मैं अपने को इस छवि में देखूँ? या भला कोई क्यों मुझे इस छवि में उभारे? हो सकता है जब इस छवि की रचना हुई हो तब इसके पीछे अच्छी मंशा हो। लेकिन अब तो यह मुझे छुपा हुआ चाकू-मार क़त्ल लगता है। टीवी पर आने वाला एक विज्ञापन तो इतने भयानक है कि कई दिन मैं उसके बारे में सोचती ही रही। पति, पत्नी से दफ़्तर में नीचे के पद पर है और पत्नी किसी भी हाल में उसे जरूरी काम निपटाने को कहती है। घर जाती है और फोन कर कहती है कि खाना क्या खाना पसंद करोगे?...बस यहीं वह निहायती बेवकूफ लगती है। मैडम, आप दफ़्तर में तो खट कर आई हैं और अब घर में भी कीचन की रौनक बनेंगी।  

यह बात कौन नहीं जानता कि औरतें बहुगुणी होती हैं और कलाकार भी। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि वे इस लिबास को मनपसन्दगी से औढ़ती हैं। तीन चार स्केच पेन उठाए और लग गए कलाकारी में कि देखिये औरतें तो बहुभुज हैं। जो काम कोई न कर पाये वह काम ये कर लेती हैं। बात को ठहर कर सोचिए। 'सेल्फी विद डॉटर' जैसा काम नहीं कि मोबाइल आगे किया और फोटो खींचकर एफ़बी पर पोस्ट कर दी और महिला जागृति और सशक्तिकरण कर दिया। फोटो खींचने से मजबूती आती तो लोग अंबुजा सीमेंट का काम सेल्फी खींचकर कर लेते और रुपया बचाते। लड़कियों अपना दिमाग दौड़ाओ। ऐसी तस्वीरों के पीछे अपने गधी होने की बात को समझो जो दिन रात मशीन की तरह काम करती है। जिसका रूटीन और समय काम के नाम है। यार, तुम्हें क्या अपने लिए एक कप चाय बनाकर खिड़की से बाहर गली को देखने का मन नहीं करता? या फिर कोई अपना मनपसंद गाना सुनने का मन नहीं होता? कभी दिन में थकावट से दस्तक दे गई झपकी लेने का मन नहीं करता? करता तो होगा। तुम इंसान ही तो हो!  

Sunday, 17 September 2017

सपने

एक भरी पूरी नींद अगर किसी भी व्यक्ति को हर दिन नसीब होती है तब उस व्यक्ति को यह मान लेना चाहिए कि वह बहुत अच्छी किस्मत की मालकिन या मालिक है। मेरी यह बात शायद मतिभ्रम मालूम हो पर जिसके पास यह नहीं है उससे बेहतर कौन समझेगा! एक सेहतमंद नींद से जागना बहुत ही खुशनुमा अहसास होता है। शरीर और दिमाग दोनों के लिए।

मुझे रोज़ तो अच्छी नींद नहीं मिलती पर जब मेरी आँखें खुद से ही झपकती हुईं सोने की मांग करती है तब मैं नहीं रोकती। कुछ रोज़ पहले शाम को थकावट ने अच्छी नींद का तोहफा दिया। मुझे लेटते ही नींद आ गई। लेकिन सपने! हम्म...वे भी तो नींद का एक हिस्सा हैं। झपकी में तो उनकी जगह नहीं होती पर...एक मुकम्मल नींद में उनकी बेहतर गुंजाइश रहती है। कभी कभी इन ख्वाबों को सोचते हुए यह सोचती हूँ कि आखिरी बार कब घर से बाहर गहरी नींद में ये आँखों में उतरे थे। उतरे भी थे या नहीं। नींद आई थी भी या नहीं। एक लड़की की नींद कैसी तरल और नाजुक होती है। किसी के छिंकते ही चट से टूट जाती है।  कोई गैर हाथ अगर उठाने को आगे बढ़े तो शरीर कितना छटक और घबरा जाता है।



नौकरी के दिनों में जब कहीं जाना होता था तब घर से बाहर होने पर घर दिमाग में ही रहता था। और जब रात को बिस्तर पर 'कुछ सो लेने' का मन होता तो आँखें चिटकनी से लगे दरवाज़े पर ही टिकी रहतीं। ऐसा मन में डर आता कि अभी कोई दरवाज़े पर जोरदार लात मारकर घुस आएगा। मैं चिल्ला पड़ूँगी। ...मैं कितनी डरपोक हो जाती हूँ। क्या बाकी लोग भी ऐसे ही हैं? क्या जाने न भी हों? कहने का यही मतलब है कि मेरी जगह अगर बादल जाती है तब सपने का नामोनिशान नहीं होता। ऐसा लगता है कि अपनी ही बैगानियत लिए कहीं पैराशूट से गिर पड़ी हूँ। पर घर...हाँ घर! वहाँ सपने बहुत आते हैं। हर तरह के। बहुत से याद रहते हैं। बहुत से नहीं और बहुत से 50-50 याद रह जाते हैं।...ओह! पैराशूट...इसका भी तो सपना देखा है। कितना अच्छा!

उस रोज़ जो सोई तो उठते ही खुद पर चौंक गई। मैंने देखा कि कोई बड़ा सा खेत था। कोई फसल  उगी हुई थी उसी खेत के एक कोने पर मैं अपना बड़ा सा मुंह खोलकर हैरानी से अपनी आँखें फैलाये खड़ी थी। फसल के बीचों-बीच दो पतले पीले तनों में दो सितारे फूल की तरह चमक रहे थे। मैं खड़ी रही उसी तरह। रात हो गई। मैं फिर भी खड़ी रही, ठीक उसी तरह। ...कहा- "भला सितारे भी कभी उगा करते हैं।"

आँखें खुली तब हैरानी को छिपा नहीं पाई। खुद से कहा- "सितारे जमीन पर कब से उगने लगे!" मैंने ऊपर देखा और कहा- "मुझे ही क्यों सपने आते हैं। मैं तो सो रही थी। जो काम मुझे सबसे अच्छा लगता है!" सपने मुझे पैराशूट भी लगते हैं। कैसे दिमाग में घूमते रहते हैं। किसी अडवेंचर पर ले जाने वाले होते हैं। जिनकी जिंदगी में रोमांच कम होता जाता है उन्हें शायद ये इशारा देते हुए भी लगते हैं। हर चीज की वजह और मतलब होता है। इन सपनों का भी होता है। इसलिए जब भी फुर्सत मिले इन्हें नोट कर के रख लेना चाहिए। कुछ अरसे बाद पढ़ने पर लगता है कि हमारी ज़िंदगी में रचनात्मकता इन सपनों में से होकर भी समझी जा सकती है। वरना जीते तो सभी हैं।

Tuesday, 5 September 2017

अफगानिस्तानी काईट रनर

उस दिन की पिछली रात को ही एकांत के सौ वर्ष पढ़कर पूरा किया था और मैं लगातार उपन्यास के किरदारों के बारे में सोच रही थी। उसके लेखक (मार्केज़) के दिमाग के फैलाव और रचनात्मकता के बारे में सोच रही थी। कितना अलहदा लिखा है। इन दो बातों के बारे में सोच लेने के बाद उपन्यास में लेखक किस चरित्र के पीछे छिपा है यह भी सोचा। इसके बाद उर्सुला, अमारान्ता, रेबेका, रेमेदियोस, मेमे, सांता सोफिया, फेर्नांदा, पेत्रा कोतेस, पिलार तेर्नेरा जैसी औरतों के चरित्रों के बारे में सोचा। मुझे लगा कि मेरे दिमाग में एक खिड़की खुल गई हो। पुरुषों, खोसे आर्कादियो, ओरेलियानो, मेल्कियादस, पियत्रो क्रेस्पी, कर्नल ओरेलियानो, आदि एक जैसे नामों की पीढ़ी दर पीढ़ी उनके चरित्रों के एक जैसी विशेषताओं और विभिन्नताओं के बारे में सोचा। सबसे आखिर में यह सोचा कि लेखक को जरूर दिव्य पागलपन हुआ होगा। मुझे कब ऐसा पागलपन आएगा? यह बहुत अच्छा उपन्यास है और सभी को धरती को अलविदा कहने से पहले एक बार पढ़ना चाहिए।   

इसके बाद मेरी एक दोस्त ने मुझे कैंटीन में एक और किताब दी। द काईट रनर। मैंने यह नाम पहले कहीं सुना था और तुरंत ही एक जुड़ाव का आभास हुआ। रात में जब किताब के कुछ पन्ने पलटे तब एक ही सांस में 25 पन्ने पी गई। किताब पूरी पढ़ ली है। और बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर भी करती है। एक रिफ्यूजी की ज़िंदगी आखिर होती कैसी है? उसके दिमाग में 24 घंटें कितना कुछ तूफान उठा रहता है। भावनाओं का कटना सबसे भयानक होता है। यही भावना जब वतन से जुड़ी हो तो दर्द कुछ और बढ़ जाता है। 

किताब अफगानिस्तान के बारे में है, हज़ारा मुसलमान के बारे में है, अपने देश से बाहर जान और जीवन के पीछे भागने के बारे में है, रूस के शीत युद्ध के दौरान अफगानिस्तान में किए गए अतिक्रमण के बारे में है, दो बच्चों की दोस्ती के बारे में है, एक पिता के अपने बेटे को बेटे के रूप में प्यार न कर पाने के बारे में है, कठिनाई के जीवन में भी अपने मेहमान को खाना खिलाने के बारे में है, तालिबान के क्रूरतम कृत्यों के बारे में है, लेखक की अपनी कमजोरी और उससे लड़ने के बारे में है, एक ईमानदार दोस्त के बारे में है.., सब कुछ है इसमें अफगानिस्तान का। प्यार, जीवन, शहर, गीत, मूल्य...सब कुछ तो है। मैं क्या क्या लिखूँ। आप अगर पढ़ चुके हैं तो बहुत अच्छी बात है। अभी तक नहीं पढ़ा है तो जरूर पढ़ें। मैं यहाँ बस थोड़ी झलक ही दूँगी।

सन् 1961 में एक फिल्म आई थी जो रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कहानी काबुलीवाला की कहानी पर आधारित थी। फिल्म का नाम भी यही रखा गया था। फिल्म वास्तव में एक संवेदनशील चित्र ही है। सबका ध्यान रहमत खान पर जरूर जाता है। रहमत अफगानिस्तान से है। रहमत इतना तो भारत के लोगों को बता ही देता है कि उसके देश के लोग कितने ईमानदार और अपनी मिट्टी से जुड़े हुए हैं। वहाँ की ज़मीन के लोगों में भी उसी तरह के भाव हैं जो भारत में है। रहमत अफगानिस्तान का एक ब्लैक एन्ड व्हाइट चेहरा है जो फिल्म के कई दृश्यों में रूला देता है।

भारत के एक हवाई जहाज का अपहरण कर कंधार में उतारा गया था। तब भारत के लोगों ने फिर से अफगानिस्तान को जाना था। अगर महाभारत में झाँकें तब गांधारी को उसी देश से पाते हैं। और भी कारण है कि अफगानिस्तान बहुत पराया देश नहीं हैं। उसी देश के तय अंतराल की कहानी यह उपन्यास कहता है। पहले हिस्से में 1979 से पहले के अफगानिस्तान की एक मनोरम छवि बच्चे की नज़र से पता चलती है। उसके बाद 1979 में रूस के अतिक्रमण और तालिबान के जुल्मों के सिलसिले आते हैं। इसके बाद उस अंतहीन दर्द का खुद में अनुभव होने लगता है कि इंसान कैसा बनता जा रहा है।

फिल्म के मुख्य किरदार आमिर और हसन है। हसन एक हज़ारा मुसलमान है जिनकी इज्जत बेहद कम हैं। हज़ारा मुसलमान शिया हैं इसलिए वे सुन्नियों की नफरत का शिकार हैं। हसन का बचपन में आमिर के सामने ही बलात्कार होता है और वह अपने डर के चलते उसे बचा नहीं पाता। उसे यह बात उम्र भर कचोटती है। उसे ताउम्र उन सब कमजोरियों का सामना करना पड़ता है जिन्हें उसने अपने पर क़ाबू होने दिया। 

उपन्यास की कहानी में फिर रूस और उसके सैनिक दाखिल होते हैं। आपको इस हिस्से को पढ़कर गुस्सा आएगा। बहुत गुस्सा। कैसे आप किसी के देश में घुसकर वहाँ के लोगों पर कब्ज़ा कर सकते हो? यह कौन सी शक्ति है? आप क्यों लेनिनवाद, लालवाद, स्तालिनवाद और पता नहीं क्या क्या समझते हुए भी किसी दूसरे देश को अपने हजारों सैनिकों के चलते उजाड़ने चलते हो? सभी को शीत युद्ध के बारे में पता है। दुनिया के दो ध्रुवों में बंटने का खामियाजा हजारों निर्दोष लोगों ने उठाया है। 

अव्यवस्था के माहौल में लाखों लोग बेवतन हो जाते हैं और अपनी पड़ोसी मुल्कों में शरण पाते हैं। किताब का लेखक बहुत ही सलीके से आपकी उंगली थामकर साथ ले जाकर हर दृश्य दिखाता है। यह भी इस किताब की खासियत है। तालिबान के सन् 1996 में अफगानिस्तान में प्रकट होने के बाद वे इतने कट्टर बन गए कि पतंग उड़ाने पर भी उन्हों ने रोक लगा दी। इसके अलावा हज़ारा मुसलमानों पर फिर से अत्याचार बढ़ा ही साथ ही साथ औरतों पर भी बहुत कट्टर कानून लागू किए गए। इसके अलावा लोगों को पत्थर मार मार कर मारने से भयावह कृत्य भी सामने आए। इसके अलावा भयावह यह भी कि यतीमों की संख्या में इजाफा हुआ। युद्ध में पिताओं के मरने के बाद बच्चों की माएँ उन्हें यतीमख़ानों में छोड़ने के लिए मज़बूर हो गईं। 



मानव समाज की इससे बड़ी क्या तरसादी होगी कि एक नस्ल इंसान होते हुए भी वे एक दूसरे को मार रहे हैं। इनमें बच्चों का क़त्ल भी शामिल है। चैन की ज़िंदगी का हक़ एक सपना बनकर रह गया है। अमीर लोग शरणार्थियों में बदलने के लिए अनुकूल होते हैं, ऐसा इस उपन्यास को पढ़ते हुए पता चला। जिनके पास साधन हैं वे भयानक परिस्थितियों से बचने की योग्यता रखते हैं। उपन्यास का नायक और उसके पिता अमरीका पहुँच गए पर हसन नहीं जा पाता क्योंकि उसके पास कुछ ऐसा नहीं है जो उसमें अफगानिस्तान के बॉर्डर को पार करने की शक्ति भर दे या फिर उसके पास अधिकारियों को खिलाने के लिए रुपये होते। गरीब वहाँ या तो भिखारी बनेगा या फिर मौत का स्वाद चखेगा। 

अंत में उपन्यास हसन के मारे जाने पर आमिर द्वारा उसके बेटे सोहराब को तालिबान से छुड़ा कर अमरीका ले जाने पर समाप्त होता है। इस उपन्यास में एक अनाथ बच्चा किस तरह से अपनी ज़िंदगी से प्रताड़ित होता है यह पता चलता है। उसका बलात्कार होना और फिर अनाथालय में जाने के भय से आत्महत्या की कोशिश पाठकों को उस सच्चाई की धरती पर पटक  देती है जहां पाठक भी सोहराब के दर्द को जीता है और उसके बचने की दुआ करता है। ज़रा फर्ज़ कीजिये उन बच्चों के जीवन के बारे में जिनके माँ बाप युद्ध या आतंक के शिकार हो गए हैं और वे अनाथालय में बस अपनी जिंदगी को रगड़ रहे हैं। मौत से भी बदतर हालात हैं। खाने को खाना नहीं ऊपर से उनका शोषण...यही है बचपन। नायक, आमिर एक जगह कहता भी है- "अफगानिस्तान में बच्चे तो हैं पर बचपन नहीं है।"

उपन्यास में सबसे आखिर में बहुत महत्वपूर्ण औपचारिक नोट है। पलायन के दिनों में लगभग 80 लाख लोग विदेशों में शरणार्थियों के रूप में रह रहे हैं। 20 लाख से अधिक अफगानी पाकिस्तान में पनाह लिए हुए हैं। 2002 में संयुक्त राष्ट्र मदद से करीब 50 लाख लौटे हैं। फिर भी लेखक खालिद हुसैनी के मुताबिक हालात बेहतर नहीं है। और भी जानकारी है जो किताब में मौजूद हैं। खुद पढ़ेंगे तो बेहतर जान पाएंगे। किताब पर फिल्म भी बनी है। वह भी देखि जा सकती है। 

मेरे एक दो दोस्त ऐसे हैं जो दिल्ली शहर में रहने वाले अफगानी बच्चों को संस्था खोल कर पढ़ा रहे हैं। मैं अभी तक उन बच्चों से मुलाकात नहीं कर पाई हूँ। वहाँ भारत के गरीब बच्चे और अफगानी बच्चे दोनों ही आते हैं। मेरे एक दोस्त के मुताबिक बच्चों की नस्ल एक ही होती है और वह है- बचपन। इसलिए उनमें क्लास रूम में वैसे ही लक्षण दिखाई देते हैं जैसे कि बच्चों में होते हैं। माँ बाप गरीब हैं। इसके अलावा रहने खाने में छोटी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा चला जाता है और बचा हुआ हिस्सा बीमारी में दवा आदि में जाता है। पर कुल मिलाकर वे सुरक्षित हैं और खुश भी रहते हैं। हालांकि उन्हें उन तमाम तरह की परेशानियों से दो चार तो होना ही पड़ता है जो दूसरे मुल्कों में रहने के दौरान आती हैं। 



The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...