Thursday, 21 October 2021

गुमशुदा स्त्रियाँ

 

गुमशुदा स्त्रियाँ और उनका साहित्य: एक झलक

(17वीं शती के विशेष संदर्भ में )

किसी भी तरह की ऐतिहासिक छवियों और पाठों पर अलग अलग समय पर जो पुस्तकें या विचार पेश किए जाते रहे हैं, पर यकीन कर लेना ठीक नहीं है. फिर वे चाहे किसी भी मुल्क़ की हों या उस मुल्क़ के साहित्य से जुड़े प्रसिद्ध पाठ ही क्यों न हों. जिसके पास कलम थामने की शक्ति और साधन रहे, उन्होंने अपनी ही जैसी छवियाँ और पाठ इतिहास बनाकर पेश कर दिए. इसलिए अगर स्त्रियों, दलितों, तृतीय लिंगियों, आदिवासियों आदि समुदायों को इन इतिहासों में अपना अक्स न दिखे तो इसमें हैरान होने की कोई बात नहीं है. इन इतिहासों में शब्दों का लिंग और उनमें छुपी हुई भावना किसी राजा और उसके दौर की तो है पर उसमें रानी और उसका दौर खोया हुआ है. कुछ रानियों और शहजादियों ने साहित्य इतिहास में अपनी जगह बना भी ली है पर आम स्त्रियाँ अभी भी अपने खोजे जाने के इंतिज़ार में हैं.



    गाँव और स्त्रियों पर कवियों और शायरों ने हज़ारों हज़ारा शब्दों को कुर्बान कर उन्हनें रूहानी बनाकर पेश किया है. जबकि सभी को पता है कि गाँव की हवा में खाई की तरह भेदभाव और ग़ैर-बराबरी मौज़ूद है. यह शोषण की कहानियाँ रूमानी नहीं हो सकतीं. कई गुमशुदा हैं. कई दबा दी गई हैं. कई चीख़ बनकर हवा में टंगी हुई हैं. यही वजह है कि आज इतिहास को बार-बार देखना ज़रूरी है. हिंदी साहित्येतिहास में स्त्री साहित्य इतिहास लेखन एक अहम कड़ी है. लोक साहित्य में कुछ हद तक स्त्रियों के भावों ने अपनी जगह लोकगीतों में बनाई है. पर लिखित स्त्री साहित्य में अभी भी गहन खोज की ज़रूरत है. अपनी ज़मीन और आधार को तलाश कर अपनी ऐतिहासिक ठोस आधारशिला को खोजना किसी भी जाति और नस्ल को करने का हक़ है, जो ख़ासतौर से संघर्षशील और जिजीविषा की मिसाल हैं.

    आज 2019 का साल अपनी गति से दौड़ रहा है. तकनीक और सूचना से लैस हमारा वक़्त काफ़ी आगे है. सभी को शिक्षा का हक़ है. ‘पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया’ टायप के सरकारी नारों से विज्ञापन गूँज रहे हैं. लेकिन मसला जितना सुखद दिख रहा है उतना है नहीं. यह जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के नए हिंदी पाठ्यक्रम में ‘पुरुष कलमों’ को पूरी जगह मिली है और जबकि स्त्रियों द्वारा लिखित एक भी पाठ को पाठ्यक्रम में जगह नहीं मिली है. कुल चार खंडों में दो भाषा और हिंदी साहित्य के इतिहास जुड़े हैं जबकि बाक़ी दो खंडों में क्रमश: कबीर, भूषण, बिहारी जैसे मध्यकालीन कवि और आधुनिककाल से जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन और रघुवीर सहाय जैसे कवियों को जगह मिली है. और अंततः पाठ्यक्रम यहीं समाप्त हो जाता है. पुराने पाठ्यक्रम में भी सिर्फ महादेवी वर्मा को जगह दी गई थी. इस तरह पुरुषीय विचार और विमर्श कितनी मज़बूती से आज भी विद्यमान है, यह स्पष्ट हो जाता है. इनमें महिलाओं की कितनी भागीदारी है, वह भी स्पष्तः दिख जाता है. ऐसे ही हाल में स्त्रियों का इतिहास, साहित्येतिहास और उसके मूल चरित्र-चेहरों को जानना ज़रूरी हो जाता है. यह मुद्दा पहचान का बन जाता है.  

    हिंदी साहित्य के इतिहास पर नज़र डालकर यह आभास होता है कि साहित्य इतिहासकारों ने अपनी-अपनी पसंद का इतिहास लिखा है. यह निजी पसंद के चुनाव जैसा है. जब व्यक्ति किसी कपड़े के स्टोर में जाता है तब अपनी जेबख़र्ची, सुविधा और पसंद के अनुसार कपड़े की ख़रीदारी करता है. इसमें और भी बातें हो सकती हैं- जैसे रंग और साइज़ आदि. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि स्टोर में बाकी कपड़ों का अस्तित्व नहीं था. ठीक ऐसे ही हिंदी साहित्य का इतिहास दीखता है. स्त्रियाँ हमेशा से तमाम पढ़ने-लिखने, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक पाबंदियों के बावजूद अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार कम-ज़्यादा लिख रही थीं. पर उस कम और ज़्यादा को इतिहास की किताबों में दर्ज़ नहीं किया गया. उसका संज्ञान भी नहीं लिया गया. उनकी रचनाओं को कम कर के आँका गया. कहा गया कि उनके काव्य में वह परिपक्वता नहीं जितनी पुरुष कवियों या रचनाकारों में है. लेकिन मीराबाई के सम्बन्ध में यह अचरज भरा लगता है. क्योंकि मीराबाई को नज़रन्दाज़ करने से साहित्य इतिहासकारों पर स्त्रियों की उपेक्षा और भेदभाव के आरोप स्पष्ट उभर आते. मीराबाई का क़द भी इतना बड़ा है कि उन्हें दरकिनार नहीं किया जा सकता था. जिंदा जलने के बाद भी स्त्रियों की नस्ल में ऐसा बहुत कुछ ख़ास शामिल रहा है कि ये स्त्रियाँ अपने अस्तित्व और उसके अलग-अलग रूपों के साथ हमेशा बनी रही हैं.

    हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने का शुरूआती उद्योग गहन दृष्टि वाली आलोचना की माँग करते हैं. यह बात स्वयं हिंदी साहित्य के इतिहासकारों के संदर्भ में है. फ्रेंच विद्वान तासी द्वारा लिखित हिंदी साहित्य के पहले इतिहास में कुछ ही सही पर स्त्री कवयित्रियों को जगह मिली है. इनकी गिनती मात्र उंगली पर की जा सकती है. उसके बाद के लिखे इतिहास में भी कुछ ही सही पर स्त्री लेखिकाओं को शामिल किया गया. पर मामला तब गंभीर हो जाता है जब ‘शिवसिंह सरोज’ जैसे ग्रन्थ में कृष्णभक्ति की लेखिका ताज और श्रृंगार की लेखिका शेख1 का उल्लेख एक या दो शब्दों-पंक्तियों में निपटा दिया जाता है. यह हिंदी साहित्य की हैरान करने वाली घटना है. इतनी भी क्या जल्दी थी जो स्त्री रचनाकारों के संदर्भ आते ही छुटकारा पाने की प्रवृत्ति की झलक देती है? किसी भी इतिहासकार से यह उम्मीद लगाई जाती है कि वह इतिहास के तमाम चरित्रों को तटस्थ होकर पेश करें. तथ्य जुटाकर उनको परिभाषित करे. पर जब बात हिंदी साहित्य के इतिहास में स्त्री लेखन की आती है तब यह सब एक ओर ही झुक सा जाता है. अचानक पुरुष वाला हिस्सा बड़ा दिखाई देने लगता है.

    ‘शिवसिंह सरोज’ में शेख का ज़िक्र कुछ यूँ है- ‘पीछे धनाढ्य ब्राह्मण थे, किसी मुसलमान रंगरेजिन के इश्क़ में मुसलमान होकर मुअज्जम शाह के दरबार में बहुत दिनों तक रहे.’2 इन पंक्तियों को कई बार पढ़ने से दुःख के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता. दूसरी दुःख की वजह यह है कि शेख का एक कवयित्री के रूप में ज़िक्र ही नहीं हुआ जबकि शेख और आलम की संयुक्त लिखित पुस्तक ‘आलमकेलि’ के पुस्तक परिचय भाग में संपादक लाला भगवानदीन ने लिखा है- ‘मुझे तो आलम की प्रतिभा से सेख की प्रतिभा से कुछ ऊँची जंचती है.”3 इतना ही नहीं, संपादक महोदय आगे एक जग प्रसिद्ध क़िस्से का ज़िक्र करते हैं जिससे शेख के हाज़िर जवाब होने की बात सिद्ध होती है- “कहते हैं एक बार आलम के आश्रयदाता शाहजादा मुअज्जम ने मज़ाक में ‘शेख’ से पूछा कि “आलम की बीवी आप ही हैं?” शेख ने हंसकर जवाब दिया “हाँ हुज़ूर! जहान की माँ मैं ही हूँ.”4 (जहान उनके पुत्र का नाम था) इस प्रकार की रचनाकार को रामचंद्र शुक्ल ने भी अपनी पुस्तक हिंदी साहित्य के इतिहास5 में आलम के साथ संयुक्त रूप से पेश किया है.  (हिंदी साहित्य का इतिहास पृष्ठ 329 नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) शेख के द्वारा लिखित एक रचना का उदाहरण है-

“नेह सो निहारि नाहु नेकु आगे कीने बाहु,

छाहियों छुवत नारि नाहियो करति है.

प्रीतम के पानि पेलि आपनी भुजै सकेलि,

धरकि सकुचि हियौ गाढ़ो कै धरति है.

‘सेख’ कहि आधे बैना बोलि कर नाचे नैना,

हा हा करि मोहन के मनहिं हरति है.

केलि के आरम्भ खिन खेल के बढ़ायेब को,

प्रोढ़ा जो प्रवीन सो नवोढ़ा ह्वै ढरति है.” 6

      

    समूची साहित्य-परम्परा में स्त्री रचनाशीलता के दखल को कम करके आंकना, या उसे भावुक, अबौद्धिक साहित्य कहकर दरकिनार करने की रणनीतियों को स्त्री साहित्येतिहास लेखन ने समझा और अपने ढंग से इसे चुनौती दी है.7 वास्तव में स्त्री की साहित्य सम्बन्धित व्यक्तित्व की समझ इसी परम्परा से होकर जाती है जिसे कई साहित्य की बड़ी शख्सियतों ने नज़रन्दाज़ कर दिया है. सन् 1904 में मुंशी देवी प्रसाद मुंसिफ ने एक अनूठे ग्रन्थ का संकलन किया. इस अनूठे ग्रन्थ का नाम ‘महिला मृदुवाणी’ है. इसमें विभिन्न हिंदी स्त्री रचनाकारों का न सिर्फ़ परिचय दिया गया है बल्कि इसमें उन कई स्त्री रचनाकारों की रचनाओं को जगह दी गई है, जो अपने अपने समय में पर्याप्त शिक्षित, अल्प शिक्षित और अपढ़ होते हुए भी लिखने की दिशा में चलरही थीं. लेकिन कई वर्षों बाद लिखी गई हिंदी शब्द सागर की भूमिका, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में शुक्ल इन स्त्री रचनाकारों के बारे में बिना कुछ निकल जाते हैं.

    डॉ. रमण प्रसाद सिंहा के शब्दों में, “यह तथ्य और भी आश्चर्यजनक तब लगता है जब हम देखते हैं कि इसी नागरी प्रचारिणी सभा से जहाँ से यह इतिहास ग्रन्थ(हिंदी साहित्य का इतिहास) पहले हिंदी शब्द सागर की भूमिका के रूप में प्रकाशित हुआ और फिर स्वतंत्र पुस्तकाकार, वहीं से महिला मृदुवाणी का भी प्रकाशन हुआ था और वहीं से हस्तलिखित ग्रंथों की खोज भी हो रही थी, जिसके आधार पर मिश्रबंधु विनोद (1913) में पचास कवयित्रियों का उल्लेख हुआ.”8 स्त्रियों के सन्दर्भ में जितना भेदभाव समाज ने किया उतना ही बुद्धिजीवी जमातों ने कर के दिखाया और साहित्य इतिहास के एक ढर्रे को यूँ जमाया कि आज भी हिंदी साहित्य के अध्येता इससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. यह जमी हुई बर्फ इतनी मज़बूत है कि हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य का इतिहास सबसे पहले पढ़ने का आग्रह किया जाता है और उसे एक मूल पाठ भी माना जाता है. बिना इस बात की परवाह किए कि इस पुस्तक में ‘महिलावाणी’ पुस्तक की कई कवयित्रियाँ (मीराबाई के अलावा) नहीं आ पाई हैं.

    इसके बाद भी स्त्री साहित्य की रचनाओं के संकलन होते रहे हैं जिनमें, ज्योति प्रसाद ‘निर्मल’ का स्त्री कवि कौमुदी और स्त्री कवि संग्रह, व्यथित ह्रदय सम्पादित- हिंदी काव्य की कलामयी तारिकाएँ, सावित्री सिन्हा का शोध ग्रन्थ- मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियाँ आदि ग्रन्थ शामिल हैं. यह सूची और भी लम्बी है. जो यह यह सूचना देती है कि हिंदी भाषा में स्त्रियों ने भरपूर लिखा है. स्त्रियों ने भी भक्ति से लेकर श्रृंगार रस तक की रचनाओं में अपनी प्रतिभा दर्ज़ की है.   

    बख्तकुँवरि बाई, नाथी, शेख, ताज, बहिणाबाई, बयाबाई, छत्रकुँवरिबाई, प्रवीणराय पातुर, सुजानराय पातुर, इन्द्रामती, केशवपुत्र वधू, खगनिया आदि जैसी रचनाकार (17वीं शती की हिंदी लेखिकाएँ) शामिल हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास में रचनात्मक योगदान दिया और उसे स्त्री रचनाकार सूची में शून्य नहीं होने दिया. इनमें से शेख, ताज, बख्तकुँवरि बाई, कृष्ण काव्य से जुड़ी हैं. प्रवीणराय पातुर ने केशव जैसे महाकवि के एक प्रसिद्ध ग्रंथ में अपनी रचनाशीलता से सहयोग दिया है.  केशवदास ने प्रवीणराय पातुर की प्रशंसा में ‘कवि प्रिया’ नामक ग्रन्थ लिखा था.9 प्रवीणराय पातुर की रचना का एक नमूना पढ़ना उचित होगा-

मान कै बैठी है प्यारी ‘प्रवीण’ सो देखै बनै नहि जात बनायो

आतुर ह्वै अति कौतुक सों उत लाल चले अति मोद बढ़ायो

जोरि दोऊ कर ठाढे भये करि कातर नैन सों सैन बतायो

देखत बेदी सखी की लगी, मित हेर्यो नहीं इतयों बहरायो 10    

    सुजानराय पातुर  ने घनानंद के समान ही विरह के गीत की रचना की, इन्द्रामती ने अपने पति प्राणनाथ के पंथ धामी संप्रदाय में न सिर्फ योगदान दिया बल्कि भाईचारे के सन्देश भी फैलाए, अमीर खुसरो द्वारा रचित पहेलियों के ज़ायके को बरक़रार रखते हुए खगनिया ने भी दिलचस्प और सुन्दर पहेलियों की रचना की. खगनिया द्वारा रचित की एक पहेली का स्वाद लेना ठीक रहेगा-

 

“नारी देखी एक अनोखी, बंद न होती चलती चोखी

मरना जीना तुरत बतलाती, कभी नहीं कुछ खाना खाती

सदा हाथ में मेरे रहै, बासू केर खगनियाँ कहे” (नाड़ी) 11

 

    भक्ति के स्वरुप को और निखारते हुए बहिणाबाई और बयाबाई ने अपने अपने हिस्से की भूमिका को निभाया और मराठी के साथ-साथ हिंदी पदों की भी रचना की. बहिणाबाई द्वारा रचित एक रचना देखिए-

 

अजब बात सुनाई भाई

गरुड़ पंख हिरावे कागा लक्ष्मी चरन चुराई

ये सूरज की थींव अंधारे सोवे चंबर कू भाग जलावे

राहु के गिरहो भोगी कहा रे अमृत ले भर जावे

कुबेर सोवे धन के आस हनुमान नीर मंगावे

वैसे सबहि झूठा है निंदा की बात सुनावे

समीन्दर तान्हो चीरत कैसों साधु मांगत दान

बहिनी कहे जन निंदक है रे वाको साँच न मान1

 

    कहना न होगा कि समुचित और व्यवस्थित शिक्षा के अभाव में भी ये स्त्री रचनाकर कुछ न कुछ रच ही रही थीं. इनके विषयों में प्रेम, वियोग, वीरता, प्रकृति, मानवता, श्रृंगार वात्सल्य, ऋतु, आदि शामिल रहे जो पुरुष रचनाकारों के समान ही हैं. फिर ऐसे में वे कौन सी वजह रहीं कि इन स्त्रियों को हिंदी साहित्य इतिहास में दर्ज़ ही नहीं किया गया. अधूरा इतिहास कभी भी पूरा पूरे इतिहास की महक नहीं दे सकता. कम या ज़्यादा, अपने अपने स्तर पर सभी ने लिखा. लेकिन हैरानी इसी बात है की है कि आज भी इन्हें हिंदी साहित्य के इतिहास में ठीक प्रकार से जगह नहीं मिल रही है.        

    हिंदी साहित्य के इतिहास संबंधी कुछ पुस्तकों में स्त्रियों की रचनाओं को जब थोड़ी बहुत जगह दी गई, तब आलोचकों के निशाने पर उन रचनाकारों के काव्य सौष्ठव की बात उठाई जाती रही है. आलोचकों के मुताबिक़ उनकी रचनात्मक समझ पुरुष रचनाकारों की तुलना में बेहद कम थी. उन्हें परम्परागत काव्य शास्त्र का ज्ञान नहीं था और न ही उन्हें कोई ऐसी शिक्षा मिली थी जिससे वे उम्दा रचना कर पातीं. स्त्रियों के लिए गंभीर शिक्षा चाहे वह जानबूझकर या बगैर जाने पितृसत्ता विवाह और घरेलू व्यवस्था के लिए धमकी की तरह तो है ही साथ ही उससे बढ़कर यह पुरुष वर्चस्व, अर्थव्यवस्था, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तरों पर चुनौती भरा हो सकता है.13 इसलिए स्त्री शिक्षा का हाल वैदिक समय से लेकर उसके बाद के हजारों साल तक ऐसे फ्रेम में रखा गया कि उन्हें एक अच्छी पत्नी, सेविका, बहन, माँ, पुत्री जैसी भूमिकाएं अच्छी तरह निभानी आ जाएं.

    विद्वान ऋग्वेद की स्त्री रचनाकारों की दुहाई देकर स्त्री शिक्षा और स्त्री स्थिति को वैदिक युग में बेहतर बताते हैं. जबकि नजदीक से विश्लेषण कर यह अलग दीखता है. ऋग्वेद के प्रथम मंडल में 2006 में से तीन मन्त्र स्त्रियों द्वारा लिखे गए हैं. लोपामुद्रा द्वारा दो और रोमशा द्वारा एक.14 ऋषिका लोपामुद्रा कहती हैं- अनेक वर्षों तक दिन-रात और उषाओं में करती हुई अब मैं बूढ़ी हो जाने के कारण में थक गई हूँ. अब बुढ़ापा मेरे अंगों की शोभा को नष्ट कर रहा है इसलिए तरुण और वीर्यवान व्यक्ति अपनी पत्नियों के साथ सहवास करें. अन्यथा उनको मेरी तरह कष्ट उठाना पड़ेगा. ठीक इसी तरह रोमशा भी यही कुछ कहती हैं.15 आत्रेयी, घोषा, उर्वशी, इन्द्राणी, आदि इसी तरह की बातें करती दिखाई देती हैं. इसलिए ऋग्वेद में आईं इन ऋषिकाओं के आधार पर यह मान लेना कि ऋग्वेद कालीन स्त्रियों में शिक्षा का उच्चतम स्तर था, थोड़ी जल्दबाज़ी ही होगी. ऋचाओं को पढ़कर लगता है कि वह पुरुष की भोग्या ही बनी हुई थीं. हालाँकि काम पर इस तरह की रचनाओं के अनुसार यह भी समझा जा सकता है कि उस दौर में स्त्रियाँ ये भाव भी जाहिर करने के लिए आज़ाद थीं जिसको आज के समय में जाहिर करने पर उन्हें गालियाँ तक सुननी पड़ती है. स्त्री शिक्षा की समुचित व्यवस्था के प्रमाण इतिहास में बार बार खोजने पर भी ठीक से नहीं मिलते. हालाँकि मुग़लकालीन भारत में शहजादियों और अन्य राजशाही स्त्रियों को शिक्षा मिलने के प्रमाण मिलते हैं पर वे भी क़ुरान और उसके इर्दगिर्द घूमते हुए दिखाई देते हैं.   

जितना साहित्य का इतिहास पुराना है उतना ही स्त्रियों द्वारा रचित साहित्य इतिहास भी पुराना है. कई मर्तबा यह सवाल गूंजा करता है कि अतीत में जाकर क्या हासिल होगा या गढ़े मुर्दे खोदकर क्या मिलेगा? इन सवालों की फ़ितरत पर शक़ करना आना चाहिए. गढ़े हुए मुर्दे अतीत में अदृश्य ज़िंदगी जी रहे हैं. इसलिए उनको किसी भी प्रकार से एक व्यक्तित्व देते हुए उनके द्वारा किए गए काम को सबकी नज़र में लाना उचित है. तभी इतिहास में सबका स्वर समझ आ पाएगा.     

 

  1.        शिवसिंह सरोज, पृष्ठ शेख के लिए- 380 और ताज के लिए 430
  2.        वही, पृष्ठ सं 380
  3.        आलमकेलि, शेख और आलम, सं लाला भगवानदीन, प्र.-उमाशंकर मेहता, पृष्ठ सं. 3
  4.        वही, जीवन वृत्त, पृष्ठ सं.5
  5.        हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, कशी, पृष्ठ 329
  6.        हिंदी काव्य की कलामयी तारिकाएँ, सं. श्री व्यथित ह्रदय, भूमिका एवं प्रस्तुति- गरिमा श्रीवास्तव, अनन्य प्रकाशन, 2018 दिल्ली       
  7.        वही, प्रस्तावना, पृष्ठ 21
  8.        वही, पृष्ठ सं. 34
  9.        वही, पृष्ठ सं. 35
  10.      हिंदी काव्य की कलामयी तारिकाएँ, सं. श्री व्यथित ह्रदय, भूमिका एवं प्रस्तुति-गरिमा श्रीवास्तव, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली 2018, पृष्ठ सं. 35
  11.    स्त्री कवि संग्रह, ज्योतिप्रसाद ‘निर्मल’ भूमिका एवं प्रस्तुति-गरिमा श्रीवास्तव, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली 2018, पृष्ठ सं. 83
  12.    हिंदी साहित्य को मराठी संतों की देन, आ. विनय मोहन वर्मा, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, प्रथम संस्करण 1957
  13.   Sexual Politics, Kate Millett, University of Illinois Press, 1970, Page no. 127 
  14.   नारी का मुक्ति-संघर्ष, डॉ. अमरनाथ, रेमाधव पब्लिकेशन्स, 2007, पृष्ठ सं. 50
  15.  वही, पृष्ठ सं. 50    

कोविड-19 और (हमारा?) मीडिया

  

मार्च 2020 के बाद से हममें और हमारी भाषा में बुनियादी भाषा परिवर्तन हुए हैं. ये परिवर्तन अब कुछ इस तरह से घुल गए हैं जिसे लेकर हमें कोई हैरानी नहीं हो रही. कोरोना महामारी के साथ ढेरों शब्द बनाकर तैयार किये गए हैं अथवा जो परिस्थिति वश जन्म ले चुके हैं वे कुछ दुखद और जटिल घटनाएँ लेकर हमारे समक्ष मौज़ूद हैं. सवाल यह भी है कि ये घटनाएँ क्या आने वाले वक़्त में समाज का महज दस्तावेज़ बनकर रह जाएँगी? क्या मीडिया और राजनितिक चरित्र भविष्य में सवालों के घेरे में आ जाएगा? क्या हमारी भाषा में सामूहिकता का एक दर्द चुपके से आकर बैठ जाएगा क्योंकि हम इस महामारी में अपने लोगों को को खो रहे हैं? इसके अलावा हम मनुष्यता यह कितना प्रभावित करेगा? 

                                           

    आगे आने वाले वर्षों में इनके बने रहने की सम्भावना भी है. इस बात को यूं भी कहा जा सकता है कि जब तक यह संक्रमण और संक्रमण के समय के अनुभव रहेंगे तब तक नए भाषाई शब्द भाषा में रमे रहेंगे. सामान्य जीवन शैली में जो भारी बदलाव हुए हैं वे शुरू में परेशानी का सबब लेकर आये पर धीरे धीरे वक़्त के साथ लोगों में उनकी आदतें बनने की प्रक्रिया चल रही है. इसका यह मतलब न निकाला जाए कि सब कुछ नियंत्रण में है अथवा लोग ठीक ठाक गुज़र बसर कर रहे हैं. यह फ़िलहाल ख़्वाब होगा जो दिन में खुली आँखों से देखने की कोशिश की जा रही है. यर्थाथ में स्थिति अनियंत्रित, दयनीय, भीषण, रोगग्रस्त और चुनौतियों से भरी हुई है. पाठकों को इस बात की खुली छूट है कि वे अपने तई इसमें और भी शब्द जोड़ लें.

    कोरोना महामारी में जिस तरह की शब्दावली बनकर तैयार हुई और जो आजकल लगभग पढ़े लिखे और ग़ैर पढ़े लिखे लोगों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है, वह बेहद पुरानी नहीं है और अचानक से दिनचर्या में शामिल हो गई है. इसमें एक बाहरी दबाव काम कर रहा है जिसने व्यक्ति के निजी क्षेत्र (स्पेस) में जगह बनाने के अच्छे प्रयास किये हैं. इन शब्दाव्लियों को कुछ वर्गों में बांटा जा सकता है. सरकारी, मेडिकल, समाचारों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली, संस्थाओं द्वारा, आम लोगों द्वारा इजाद की गई. इसमें और भी वर्ग शामिल किये जा सकते हैं. मिसाल के तौर पर लिंग आधारित शब्द.

    बीमारी चूँकि इंसानी शरीर और स्वास्थ्य से जुड़ी हुई होती है इसलिए विज्ञान और मेडिकल की दुनिया में कोरोना को लेकर ऐसी शब्दावली बनी जो अब न सिर्फ प्रचलन में है बल्कि उसके आधार पर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं और लोगों की सामान्य बैठकों में वे विषय बन रही हैं. जैसे कोरोना का नाम कोविड-19 रखा गया है पर आम लोग इसे कोरोना ही कहते हैं. ख़बरों में कोविड-19 ही छापा जाता है. जाँच हिंदी का शब्द है. अंग्रेज़ी में इसके लिए टेस्ट शब्द है. जाँच रिपोर्ट युगल शब्द के साथ जो डॉ और शब्द जुडें हैं वे- पॉजिटिव और नेगेटिव हैं. इससे पहले की ये दोनों शब्द सोच अथवा विचार के स्तर तक ख़ूब इस्तेमाल होते थे और जीवन प्रेरणादायक संगोष्ठियों में इन दोनों शब्दों को मुख्य धुरु बनाकर ख़ूब चर्चा होता था. लेकिन कोरोना वायरस ने इन दोनों शब्दों को हाईजैक कर अपने संदर्भ से मिला लिया है. पॉजिटिव शब्द को इसमें भारी तबाही मिल रही है. मिसाल के तौर पर कितने पॉजिटिव केस अभी भी बचे हैं, जैसे सवाल हर रोज़ मीडिया घरानों और अख़बारों द्वारा ऑनलाइन/ऑफलाइन पोस्ट किये जाते हैं अथवा छपे जाते हैं.

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिन शब्द को विश्वव्यापी बनाया है उनमें ‘टेस्ट’ शब्द अब हिंदी में बैगाना नहीं रहा है. लोग जाँच शब्द का कम इस्तेमाल कर रहे हैं. यह शब्द उन लोगों द्वारा अधिक इस्तेमाल हो रहा है जो कि अपने लेख और विचार प्रकाशित कर रहे हैं. वरना आम लोगों में टेस्ट ही शब्द छाया हुआ है. हाँ, कस्बों गांवों ज़रुर जाँच शब्द इस्तेमाल में होगा पर कितना प्रचलित होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. इसके अलावा सैंपल रिजल्ट, कोरोना वैक्सीन, क्वारान्टाइन शब्द को भी मेडिकल शब्दावली में लिया जाना चाहिए.  

    इतिहास गवाह है कि महामारियां इंसानी जगत में कुछ लोगों के लिए फ़ायदेमंद होती है. शुरुआती दौर में सेनेटाइज़र के दामों में जिस तरह से बढ़ोतरी हुई उसके चलते सरकार को इसके दामों पर लगाम लगाने के लिए मूल्य तय करना पड़ा. फिर भी आम घरों में अब यह मेडिकल उत्पाद आम बन चुका है. इससे पहले शहरी की भी बड़ी आबादी इससे अनभिज्ञ ही थी. कोरोना जो डर लाया है उसके एवज में मास्क के इस्तेमाल को खड़ा किया. मास्क, इससे पहले दिल्ली के प्रदूषण से जुड़ा हुआ था. लेकिन बहुत प्रचलित नहीं था. अब बाज़ार ने इसे भी स्टाइल से जोड़ते हुए इसकी कई प्रकार के रूप में बेचना शुरू कर दिया है.

    एक आवश्यक सामान जो कोरोना से पूर्व और बाद में महत्वपूर्ण रहा है, वह किट और स्कैनर शब्द हैं. मार्च के महीने में थर्मल स्कैनर जैसे शब्दों को हिंदी में में कैसे कहा जाए कोई नहीं जानता था. आज भी यही शब्द चलन में है. आम लोग इस बात को कुछ इस तरह बयां कर रहे हैं- अगर शुरू में ही सरकार ने स्कैन कर लिया होता तो आज यह नहीं होता. फ़िलहाल स्कैनर अभी तक कंप्यूटर से ही जुड़ा था जिसका इस्तेमाल दस्तावेज़ों को स्कैन करने में किया जाता था. लेकिन अब स्कैनर थर्मल से जुड़ा है जो वह उपकरण है जिससे व्यक्ति का तापमान जांचा जाता है. इसके अतिरिक्त मेडिकल की दुनिया से ही कोरोना वारियर्स शब्द आ चुका है जो मानसिक रूप से ग़ुस्से को शांत कर रहा है. पीपीइ किट को इसी में जोड़ सकते हैं.

    कोरोना वैक्सीन शब्द को कैसे भूल सकते हैं. वैक्सीन के लिए अभी तक टीका शब्द हमारे पास मौज़ूद था और वह भी पोलियो और बच्चों के टीकाकरण के तौर पर सामने आता था. उसका इस्तेमाल रोज़मर्रा की बातचीत में नहीं था. अब घरों में मीडिया ने वैक्सीन शब्द को आम बना दिया है इसके अलावा यह रोज़मर्रा प्रतियोगितानुमा संवादों में वैक्सीन शब्द ज़रुर व्यक्ति के बगल में बैठा हुआ मिलता है. इस वक़्त जिस शब्द को लोग प्रेम की नज़र से देख रहे हैं वह वैक्सीन ही है. इससे उम्मीद का पूरा एक जखीरा बंधा हुआ है. वैक्सीन के कंधे शायद दर्द हो रहे हों. रूस द्वारा वैक्सीन बना लेने के बाद भी देसी विदेशी वैक्सीन के इंतजार में सभी लोग हैं.

    मेडिकल के बाद कुछ सरकारी शब्दावलियों ने भी जनता के जीवन में अपनी जगह बनाई है. इसमें जाहिर सी बात है आदेश का भाव बहुत अधिक समाया हुआ है. कुछ लोग इन्हें थोपे हुए शब्द कह सकते हैं. लेकिन सरकार ने समय समय पर कोरोना संक्रमण से जुड़ी एडवाईजरी और गाइडलाइन्स जारी की है. एडवाईजरी और गाइडलाइन्स जैसे शब्दों को हिंदी अख़बारों और हिंदी खबरिया चैनलों ने हाथो हाथ लिया है. इसके अतिरिक्त सरकार ने हेल्पलाइन नंबर, सोशल डिस्टेंसिंग, जनता कर्फ्यू, लॉकडाउन, अनलॉकडाउन, ऑनलाइन मीटिंग, ब्लॉक्ड, सील्ड, कन्टेनमेंट ज़ोन, शटडाउन, सरकारी पैकेज, कोरोना चैन, एअरपोर्ट स्क्रीनिंग आदि शब्दों को बिना सोचे संभले इस्तेमाल किया गया और किया जा रहा है. कोरोना को जब नियंत्रित किया जाएगा तब इन शब्दों से होकर भाषा विज्ञानी सरकारे द्वारा किये जा रहे कार्यों की आलोचना और विश्लेषण करेंगे. इनमें से अधिकांश शब्द अंग्रेज़ी से लिए गए हैं और सरकार ने उनको सरकारी शब्दावली में पचा लिया है. लोगों ने भी इसमें ख़ूब थाली और मोमबत्ती का साउंड और रौशनी मुहैया करवाई है. इसके अलावा शिक्षा जगत ने भी नए शब्दों को अपनाया है. सबसे प्रचलित शब्द वेबिनार बना हुआ है. फेसबुक लाइव हो या वीडियो चर्चा सबके बीच वॉच पार्टी ने भी जगह बनाई है.

    लेकिन इन शब्दों के प्रवाह के बीच जिस बात पर गौर करना चाहिए वह यह है कि इन शब्दों में साधारण जनता के अनुभव और दर्द की झलक नहीं मिलती. हजारों की तादाद में मजदूरों का पलायन हुआ और उस पलायन की यात्रा के दौरान उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था. मीडिया में उनकी छवि को बेहद असंवेदनशील तरीके से पेश किया गया. जो लोग मदद कर रहे थे उनको मीडिया ने केन्द्रित कर ख़बरों को फ्रेम किया जबकि मजदूरों का इतनी बड़ी तादाद में पलायन इंसानियत से अलग देश की राजनितिक, आर्थिक, सामाजिक और बेहद ख़राब नौकरशाही और योजनाओं से जुड़ी थी. इन्सानियत बेहद अलग मसला है. उस पर ख़बरें बनी ठीक है पर वे ख़बर के केंद्र में रहीं, ये दुर्भाग्यपूर्ण था. अगर मजदूरों की संख्या कम होती तो यह मीडिया के लिए कोई ख़बर नहीं हो सकती थी लेकिन, मजदूरों की संख्या इतनी अधिक थी कि वे उस भयानक गर्मी में अपने घरों की तरफ़ चल पड़े थे. महामारी में मजूदरों के साथ जो शब्द जुड़ा और जिसने भारत के विकास के काग़ज़ी महल को उड़ा दिया वह ‘पलायन’ था. एक विशाल जनता जो आंबेडकर और गाँधी के साथ कदम से कदम मिलाकर चली थी लगभग वैसी ही विशाल जनता अपने बच्चों को गोद और कन्धों पर बिठाए निकल पड़ी थी. इस बीच सरकारी तंत्र की भयानक नाकामयाबी को गिनने में सभ्य समाज को शर्म आनी चाहिए.

    देश की संघर्षशील और कर्मठ जनता के साथ एक शब्द और जुड़ा और वह ‘भयंकर भूख’ का मसला था. सरकारों द्वारा हवाई इंतज़ाम नाकाफ़ी साबित हुए और लोग भूख के कारण बेहद परेशान हुए. भारत में अनाज के भंडारों की कोई कमी नहीं थी लेकिन वह महामारी में अंतिम व्यक्ति तक सुचारू रूप से नहीं पहुँच पाया. टेलीविज़न पर कई लोग यह कहते हुए पाए गए कि अगर घर में रहे थे भूख से मर जाएंगे औरबाहर गए थे कोरोना मार देगा. भूख ने उन्हें महामारी में बाहर कर दिया. यह अचरज का ही विषय है कि पलायन पर अभी तक कोई शोध और चर्चा क्यों नहीं हुई. किसी तरह का आँकड़ा भी शोध कर के नहीं निकाला गया.              

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तस्वीर गूगल से 

Friday, 17 September 2021

क्या भारत की बढ़ती जनसंख्या एक बोझ है?

 

बहुत-सी कहानियों में कुछ दिलचस्प तथ्य मिल ही जाते हैं. इस लेख की शुरुआत एक अजीबोगरीब कहानी से करना ठीक होगा. गाँवों में यह कहानी कही जाती है, “पहले के जुग (युग) में हैजा-प्लेट(प्लेग) फैलता था तो बहुत लोग मर जाते थे. गाँव के गाँव ख़त्म हो जाते थे. लोग अपना घरबार सब छोड़कर बचने की खातिर दूर चले जाते थे...एक राजा था जो शान-ओ-शौकत से जीता था. उसके महल में एक चिड़िया भी पर नहीं मार सकती थी. एक दिन किसी सुबह राजा के महल के भीतर एक विचित्र चिड़िया घुस आई. राजा ने उससे पूछा, “तुम कौन हो?” वह बोली, “मैं हैजा-प्लेट हूँ.” राजा ने कहा, “मुझे यकीन नहीं हो रहा. ज़रा मेरी हथेली पर बैठो तब तुम्हें पास से देखूं तो यकीन करूँ.” चिड़िया चालाक राजा के झांसे में आ गई. वह जैसे ही राजा की हथेली पर बैठी राजा ने उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया और अपना हाथ कटवा कर लोहे के बक्से में बंद कर दिया. तब से उसके राज्य में ये बीमारियाँ नहीं फैलीं. लेकिन जब हमारे देश में अंग्रेज़ आए तो रेलवे का काम शुरू हुआ और उसी दौरान किसी लालची आदमी ने ख़जाना समझकर उस बक्से को खोल दिया और ये बीमारियाँ फिर से फ़ैल गईं.” इस कथा में जीवन की चाह और उसे बनाए रखने के संकेत मिलते हैं.  

                                        

    इस रोचक कथा का एक तार जनसंख्या से भी जुड़ा है. बीमारियाँ और आपदाएँ मनुष्य के अस्तित्व के लिए हमेशा ही चुनौतीपूर्ण रही हैं अतः उनसे बचे रहने के उपाय निरंतर किए गए. इंसान अपनी एक नक़ल इस पृथ्वी पर छोड़ कर जाना चाहता है. इसलिए वह अपने वंश को बढ़ाने में सम्मोहित रहता है. पुराने ज़माने की कहानियाँ उन साहसों को बटोर कर कथा में पेश कर देती है जिनके सहारे इंसान बचा रहा. जिस बुज़ुर्ग ने मेरी माँ को यह कथा सुनाई थी वह स्वयं कई भाई-बहन थे और उनमें कईयों की मृत्यु तरह-तरह की बीमारियों और कुपोषण के चलते हुई. लेकिन आधुनिक समय जब औद्योगिक क्रांति हुई और नए निर्माण हुए उससे रहन-सहन बदला और बीमारियों को काबू कर लेने की क्षमता से जनसंख्या में ख़ासी वृद्धि हुई. इसके अलावा चिकित्सीय सुविधाओं ने भी इंसानों को अच्छी उम्र का तोहफा दिया. भारत की आबादी अब तक एक अरब से बहुत अधिक बढ़ गई है. चीन और भारत पृथ्वी की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने क्षेत्रफलों में बसाए हुए हैं. आज आधुनिक समय में पूरा विश्व कोरोना संक्रमण की महामारी की चपेट में और इसका सीधा असर जनसंख्या पर है. बड़ी मात्रा में मानव समाज कई विकराल परिस्थितियों में उलझा हुआ है और लगातर जूझ रहा है. इसके पीछे की एक बड़ी वजह विशाल और बढ़ती जनसंख्या को बताया जाता है. पर क्या वास्तव में जनसंख्या एक बहुत बड़ी वजह है और अब क्या इससे जुड़ा कानून बना लेना ही चाहिए?  

    जनसंख्या का पेंच इतना जटिल है कि उससे समझने के लिए विस्तृत अध्ययन की ज़रूरत होती है. पर दुर्भाग्य यह है कि बिना विस्तृत अध्ययन के प्रचलित बातों की पूछ पकड़कर हम सब जनसंख्या की रेलगाड़ी में बैठकर छुक-छुक करना चाहते हैं. एक प्रतिष्ठित जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक अभी पूरे विश्व की जनसंख्या 7.8 अरब है जो वर्ष 2100 में 8.8 हो जाएगी.[1] इस बढ़ती हुई जनसंख्या को बहुत सारी मुश्किलों का कारण माना जाता रहा है. शायद ही भारत में कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने ‘हम दो, हमारे दो’ या ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार’ का नारा न सुना होगा. अतः आती-जाती सरकारों में जनसंख्या को लेकर एक संज्ञान तो ज़रूर रहा है. लेकिन कुछ वर्षों में सरकार ने जनसंख्या से जुड़े अभियानों में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई. या कम से कम उसे एक मुख्य मुद्दे की तरह नहीं लिया. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि जनता ने जनसंख्या को अपने दिल-दिमाग से हटाया हो. छोटे परिवार की अहमियत लोगों के संज्ञान में है. वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं इसलिए वे बड़े परिवार की कामना नहीं कर रहे. इसकी पुष्टि स्वयं सरकार द्वारा जारी आंकड़ें कर रहे हैं. गत वर्ष दिसंबर 2020 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों को जारी किया गया. पी.आई.बी. (Press Information Bureau/ Government of India) के प्रेस नोट के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के तहत पहले चरण में जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का सर्वे हुए किया गया उनमें करीब-करीब सभी में कुल प्रजनन दर में कमी आई है. कुल 22 राज्यों में से 19 में यह घटकर 2.1 पर आ गई है.”[2]    

    हाल ही में एक प्रदेश की सरकार द्वारा जनसंख्या स्थिरीकरण और कल्याण विधेयक 2021, बिल को पेश किया है. इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कानून पर बहस सियासी गलियारों में तेज़ हुई है. सत्तारूढ़ सरकारें और विपक्ष, दोनों असली मुद्दे पर बहस और समाधान के बजाय दूसरे मुद्दों में उलझी हुई दिखाई दे रही हैं. उत्तर प्रदेश के इस जनसंख्या संबंधी बिल पर राय बंट गई है. ‘पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया’ की निदेशिका पूनम मुत्तरेजा, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’ में छपे अपने लेख में कहती हैं, “2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या विकास दर में कमी आई है. 1991 से लेकर 2001 तक यह दर 21.5 थी तो वहीं 2001 से लेकर 2011 के बीच यह दर घटकर 17.7 हो गई. यह सभी धर्मों के लोगों के साथ है.” [3] अतः किसी एक मजहब के लोगों को निशाने पर लेना ग़लत होगा इसके साथ ही यह समझ आता है कि जनसंख्या अपनी गति से घट भी रही है.

    इसके अलावा पड़ोसी मुल्क चीन की जनसंख्या नीति का भी विश्लेष्ण कर लेना चाहिए. चीन ने अपने देश में बढ़ती जनसंख्या पर लगाम लगाने के लिए सन् 1979 में ‘एक संतान नीति’ लागू की. इसके परिणाम अलग आए. बी.बी.सी. की एक खबर में कहा गया है कि इस नीति को लाने के बाद चीन में लिंग अनुपात बिगड़ा और बेटे की चाह में कन्या भ्रूण हत्याएँ भी अधिक की गईं.[4] भारत में इस बात की कल्पना आसानी से की जा सकती है कि अगर जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू किया जाता है तो लिंगानुपात कितना बिगड़ सकता है! बेटे की चाह में बेटियों की जन्म से पहले हत्या बड़ी मात्रा में होने लगेगी. सरकार ने तो ख़ुद जागरूकता के लिए नारा भी लगवाया है, “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ!”

    जनसंख्या नियंत्रण कानून के पक्ष में कई अन्य दलीलें दी जाती हैं. प्राकृतिक संसाधनों का लगातार कम होना, जलवायु परिवर्तन, कार्बनडाइ ऑक्साइड गैस की अधिकता और अमीरी-ग़रीबी में घोर असमानता के पीछे बड़ी जनसंख्या को एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है. पर क्या वास्तव में ये सभी खतरनाक स्थितियाँ जनसंख्या के बढ़ने से जुड़ी हैं? सवाल का जवाब हाँ अथवा न की बजाय समझने की कोशिश होनी चाहिए. पूंजीवाद समाज में हमारा रहन-सहन तीव्रता से बदला है. उपभोग की बुनियादी शर्तें और नियम बदल गए हैं. यह समझना बहुत जटिल नहीं है कि किस तरह से विज्ञापन की जरिए पानी की प्यास अन्य पेय पदार्थों से बुझाई जा रही है. यदि किसी के पास कोई स्मार्टफोन न हो तो वह कितने सरकारी कामों और लाभों से मरहूम रह जाएगा. संसाधन अंधाधुंध उपभोग के चलते भी कम हो रहे हैं.  

    ऑनलाइन दुनिया में चुपचाप बैठे हुए आंकड़ों से बातें करें तो पता चलता है कि चीन, अमेरिका, भारत, रूस और जापान क्रमशः पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवे स्थान पर कार्बनडाइ ऑक्साइड उत्सर्जित करने वाले देश हैं. यह आंकड़ा ‘ग्लोबल कार्बन एटलस’ की वेबसाइट पर वर्ष 2019 के हवाले से पता चलता है. निश्चित रूप से चीन और भारत इस सूची में हैं पर आंकड़ों को सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर पता चलता है कि इस गैस के एमिशन में कंपनियों का बड़ा हाथ है. एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल सौ कंपनियाँ 70% से ज़्यादा ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ा रही हैं. यह सिलसिला सन् 1988 से है.[5] इसके अलावा अमीरों की जीवन शैली ने भी पृथ्वी को प्रभावित किया है. ऑक्सफेम की न्यूज़ रिपोर्ट बताती है कि ये ग़रीब नहीं हैं जो जलवायु को नुक्सान पहुंचा रहे हैं, बल्कि ये मुट्ठीभर धनवान लोग हैं जो कार्बन उत्सर्जन को बढ़ा रहे हैं.[6] इसलिए बढ़ती आबादी की बजाय उन मुख्य कारकों भी समझने की ज़रूरत है जिनके कारण जलवायु असंतुलन बढ़ रहा है. हाल ही में प्रकाशित ढेरों रिपोर्ट बताती हैं कि किस तरह इस कोरोना महामारी में गरीब और गरीब हुआ है और अमीर उम्मीद से भी ज़्यादा अमीर.

    अंत में यह सवाल पूछा जा सकता है, तो क्या बढ़ती जनसंख्या की भूमिका को छोड़ दिया जाए? जवाब है, नहीं. जनसंख्या को नियंत्रित करने के दूसरे ऐसे क़दम और उपाय आजमाए जा सकते हैं जिनसे देश की एक बड़ी और निर्धन जनता को नकारात्मकता का सामना न करना पड़े. सरकार को ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम लाने होंगे जिनमें ग़रीब तबके को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार के उचित अवसर मिलें. हम स्वयं अपने अनुभवों से जानते हैं कि आज की पीढ़ी किस कद्र अलग है! युवाओं का एक बड़ा हिस्सा देर से शादी करने की चाहत रखता है इतना ही नहीं वे अपना परिवार बनाने में भी वक़्त ले रहे हैं.  

    जनसंख्या का कानून यदि बनता है तो स्त्रियों पर इसका अधिक असर पड़ेगा. यदि स्त्री की राजनीतिक भागीदारी अथवा सरकारी नौकरी में उनका आना, उनके द्वारा जन्में गए बच्चों की संख्या से जोड़ा जाएगा तब निश्चित रूप से बहुत-सी महिलाएँ देश की तरक्की में योगदान नहीं दे पाएंगी. यही नहीं गर्भ में ही लिंग परिक्षण कर लड़कियों को मारने की घटनाएं बढ़ेंगी. महिलाओं पर ही चूँकि परिवार नियोजन की जिम्मेदारी पितृसत्तात्मक समाज में अधिक है अतः, शहरी और ग्रामीण स्त्रियों के लिए गर्भ निरोधक दवाएँ और अन्य तरीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा. इसके अलावा जनसंख्या संबंधी जागरूक अभियानों की ज़रूरत पर बल दिया जा सकता है. बच्चों को पाठ्यक्रम में शुरू से ही इसके प्रभावों को पढ़ाना होगा. शारीरिक संबंधों पर खुलकर बातें करने की ज़रूरत है. अपनी परंपराओं और रीतियों को स्त्री के शरीर और मानिसक स्वास्थ्य से बड़ा नहीं माना जा सकता. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 2015-16 के मुताबिक 40% पुरुषों का मानना है कि गर्भ-निरोध सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है. साथ में 20% पुरुष यह मानते हैं कि जो स्त्री गर्भ-निरोध का इस्तेमाल करती है वह कई पुरुषों से संबंध बनाने वाली स्त्री होती है.[7] यह दोहरापन समाज की सच्चाई है. सरकार को सभी महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर सोचकर ही किसी कानून का निर्माण करना चाहिए. जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ा कानून प्रत्येक नागरिक को प्रभावित करेगा अतः इस पर पर्याप्त सोच व शोध करने की ज़रूरत है. कानून बनाने में पर्याप्त संवेदनशील होने के साथ-साथ वैज्ञानिक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यावहारिकता की ज़रूरत होती है. यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि कोई कानून ऐसा न बना दिया जाए जो मौलिक अधिकारों और राज्य के कल्याणकारी रूप में दख़ल करे.      

 

कोरोना महामारी और पर्यावरण विमर्श

सन् २०२० किसी भी देश और मनुष्य जाति के लिए अभी तक बेहद दुखद और चुनौतियों से भरा हुआ साल है. कोरोना संक्रमण और चौपट होती अर्थव्यवस्था से जुड़ी ख़बरों ने अख़बार के हर ख़ाने को अपनी आगोश में ले लिया है. भारत में हर रोज़ कोरोना संक्रमण के मामले तेज़ी से रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं. देश में मरने वाले लोगों की संख्या एक लाख होने की ओर जल्दी से बढ़ रही है. इस लेख को लिखे जाने तक कोविड-१९ से मरने वालों की संख्या ८३ हज़ार के पार हो गई है और संक्रमण के कुल मामले ५१ लाख के पार हो चुके हैं. वर्ल्डओमीटर वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक़ पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या ३ करोड़ से अधिक है. भारत संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर मौज़ूद है. इसी वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के अनुसार १७ सितम्बर तक विश्वशक्ति अमेरिका में कोरोना संक्रमण के ६८ लाख से अधिक मामले हैं और मरने वाले लोगों की संख्या २ लाख से अधिक है. दुखद यह है कि यह अंतिम आँकड़े नहीं हैं. इनमें प्रतिदिन तीव्र बढ़ोतरी हो रही है. इंसान, जो अपने को शक्तिशाली मान कर कुदरत को मुट्ठी में करने की ज़िद्द के साथ बढ़ रहा था, आज घुटनों के बल बैठा दिया गया. इंसान को घुटने के बल बैठाने वाला यह अदृश्य वायरस, नंगी आँखों से दिख भी नहीं रहा. क्या यह कुदरत की शक्ति का उदाहरण नहीं है?   



    इस महामारी के कारण इंसान को यह महसूस होना शुरू हो गया है कि वह कुदरत से बढ़कर नहीं है बल्कि उसके द्वारा की गई संरचनाओं में से एक है. हर व्यक्ति इस महामारी का गवाह बन रहा है. आगे आने वाले समय में कोरोना महामारी के दूरगामी प्रभाव मनुष्य जाति पर पड़ेंगे और साथ ही साथ ये प्रभाव एक राष्ट्र और समाज के रूप में पर्यावरण के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर करेंगे. हमें अब यह सोचना ही होगा कि क्या यह महामारी कुदरत का एक संकेत है, “अभी भी वक़्त है संभल जाने का?”

    कोरोना महामारी के मामले में अख़बारों और तमाम इलेक्ट्रोनिक मीडिया घरानों की रिपोर्टिंग में केवल कुछ ही जगहों पर पर्यावरण और कोरोना महामारी को जोड़कर देखा गया है.जबकि अधिकतर मीडिया स्रोतों को इस पर सोचने की फुर्सत भी नहीं है. एक समझदार नागरिक और मनुष्य को यह सोचना ही चाहिए कि ख़बरों में गैप कहाँ-कहाँ हैं और क्या छोड़ा जा रहा है. इस साल मार्च के महीने से सरकार हरक़त में आई. कोरोना संक्रमण ने देश में पहले से चल रहे हलचल के माहौल में दस्तक दी. इससे पहले अमरीकी राष्ट्रपति का भारत दौरा, दिल्ली में दंगे और सी. ए. ए. एक्ट के खिलाफ़ बड़े पैमाने पर जगह-जगह विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी था. इस बीच बीती सर्दियों में दिल्ली के प्रदूषण को कोई नहीं भूल सकता जो लोगों की साँसों में जहर की तरह घुल रहा था. इन सब भयावह परिस्थितियों के बाद भी पर्यावरण अभी तक माध्यमिक कक्षाओं में निबंध की शक्ल में दबा पड़ा हुआ है. सरकारों ने इसे एक पाठ्यक्रम के रूप में तब्दील कर दिया है. विद्यार्थियों ने भी इसे रट्टा लगाकर याद कर लिया है. यह अभी तक गंभीर चर्चा का विषय भी नहीं बना है. वर्तमान में जब कई करोड़ लोगों की नौकरियाँ छुट रही हैं तब वाजिब है कोरोना और अर्थव्यवस्था के बीच पर्यावरण के साथ जुड़ी मानुष हरक़त की समस्याओं पर कौन ही सोचे और चर्चा करे?

    इस वर्ष २३ मार्च को देशव्यापी लॉक डाउन का ऐलान हुआ और तमाम जन गतिविधियाँ एक झटके में ही ‘पॉज़’ की स्थिति में आ गईं. राजधानी दिल्ली की हवा बीते कई सालों से जहर में तब्दील हो चुकी थी. इस ‘पॉज़’ की स्थिति के चलते हवा और वातावरण बिलकुल साफ़ हो गए. वातावरण में सौम्य पारदर्शिता को लोगों ने महसूस किया. काला आसमान नीला दिखाई देने लगा. छोटे बच्चों को बादलों के अठखेलियों में तरह-तरह की शक्लें दिखाई दीं. घरों में क़ैद लोगों को गहराई से यह आभास हुआ कि प्रकृति बहुत अद्भुत और सुखमय है. लॉकडाउन के अन्तराल में पर्यावरण की स्थिति में बेहद अच्छे बदलाव देखे गए. इसी वजह से पर्यावरणीय चर्चाओं और चिंताओं की समाज के हर वर्ग तक लहर पहुंची. यह सच है कि कोरोना महामारी हमसे बहुत कुछ छीन रही है पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि इसने कहीं भीतर जाकर यह समझने की स्थिति और स्पेस बनाया है कि मनुष्य को प्रकृति पर विजय के बजाय उसके संग अपने अस्तित्व को देखना चाहिए. प्रकृति इस्तेमाल कर फेंकने से नहीं जुड़ी है.  

    दीवाली जैसे त्यौहार पर बम पटाखे फोड़े जाने पर लोगों में बहस कितने ही सालों से चल रही है. एक बहस दिल्ली की सड़कों पर चलने वाले वाहनों को लेकर भी है जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि वायु और ध्वनि प्रदूषण का मुख्य स्रोत ये वाहन ही हैं. कोरोना महामारी के चलते किये गए लॉकडाउन के कारण यह बहस अब पुष्ट हो चुकी है कि भारी संख्या में सड़कों पर दौड़ती इंसानी जगत द्वारा ईजाद की गई मशीनें प्राण वायु को नष्ट कर रही हैं. जैसे ही सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के पहियों पर लगाम लगी वैसे ही हवा साफ़ होना शुरू हुई और ध्वनि प्रदूषण में गिरावट आई. आसमान का रंग जो आसमानी था वह भुलाया जा चुका था. अब हर आँख और ज़ेहन में वह आसमानी रंग उभरा जो आसमान की सच्चाई है. इसके साथ ही एयर क्वालिटी इंडेक्स में भारी बदलाव दर्ज़ किया जा रहा है. पर्टिकुलेट मैटर २.५ और १० जैसे कण जो दिखाई नहीं देते, परन्तु उनमें धूल और धातु के बेहद महीन कण शामिल होते हैं, साँसों में घुसकर हमारी ज़िंदगी की उम्र घटा देते हैं. लॉकडाउन में पर्टिकुलेट मैटर में भारी गिरावट दर्ज़ की गई.

     अप्रैल २०१९ को ‘बिज़नस स्टैण्डर्ड’ अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार, साल २०१७ में एक मिलियन से भी अधिक लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण हुई. इसी ख़बर में एक बात यह भी कही गई है कि वायु प्रदूषण साइलेंट किलर होता है और यूनाइटेड नेशन विशेषज्ञों के अनुसार हर वर्ष ७ मिलियन लोगों की जान ले लेता है. बीबीसी समाचार वेबसाइट ने इसी संख्या को अपने एक लेख में ४ मिलियन बताया है. इसके अलावा इंटरनेट पर मौज़ूद अन्य प्रकार की दिल दहला देने वाली जानकारी मौज़ूद है जिसे पढ़कर पता चलता है कि प्रकृति का संतुलन किस हद तक इंसानों ने अपनी गतिविधियों से बिगाड़ दिया है. लेकिन क्या बात यहीं ख़त्म होती है? जवाब है नहीं. पर्यावरण की क्षति का विवरण हमारी आधुनिक जीवन शैली में छुपा हुआ है. ‘विकास’ शब्द के इर्द-गिर्द दौड़ती जीवन शैली और विलासी समाज की सनक ने मनुष्य जगत को तो मौत के क़रीब पहुँचाया ही है साथ ही सम्पूर्ण प्रकृति के जीव-जंतु और वनस्पति संसार को भी भयानक हानि पहुंचाई है. इसका उदहारण बाढ़ की घटनाओं में बढ़ोतरी, भूकंप, बादल फटने की घटनाएँ, जंगलों में लगने वाली आग, ग्लेशियरों का पिघलना, पृथ्वी के तापमान में वृद्धि जैसे कारकों में देखा और अनुभव किया जा सकता है. 

    ख़बरों के मुताबिक़ कोरोना वायरस संक्रमण का पहले केस पिछले साल नवम्बर में ही आ गया था. पहला केस चीन में हुआ. इसके बाद चर्चाओं और अफ़वाहों का जो दौर शुरू हुआ वह अभी तक समाप्त नहीं हुआ है. ‘न्यूज़ 18’ की वेबसाइट पर, ९ मार्च तारीख में लिखे लेख में १ दिसंबर २०१९ में चीनी शहर वुहान में कोविड-१९ के पहले केस की बात लिखी गई है. यह बात ‘लैंसेट जर्नल’ में छपी एक रिपोर्ट के हवाले से लिखी गई है. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि कोरोना संक्रमण नवम्बर में ही फैलना शुरू हो गया था. इस वायरस का स्रोत क्या है और यह कैसे इंसानों तक पहुँचा, इसे लेकर भी कई तरह की बातें सामने आ रही हैं. सोशल मीडिया पर वुहान शहर के जानवरों के बाज़ारों की तस्वीरों को यह कह कर जम कर साझा किया गया कि इसी बाज़ार से वायरस इंसान तक पहुँचा और दुनिया को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया. सोशल मीडिया में साझा की जाने वाली हर तस्वीर का सत्यापन करना मुश्किल है. महामारी में अफ़वाहों का बाज़ार गरम रहा है. इसके अलावा लोगों पर नस्लीय हमले भी हुए. कुल मिलाकर आम समझ में यह बात तय है कि यह महामारी प्रकृति की उस सीमा रेखा को लांघने का नतीजा है जो संतुलन बनाए रखता है. मौज़ूद संतुलन को इंसानी गतिविधियों ने हानी पहुंचाई है. इंसान की शक्तिशाली बनने की सनक ने अवश्य ही कुदरत के कुछ अटल नियम तोड़े हैं.

    इस बात पर लगभग सभी का एक मत है कि कोरोना वायरस चीन से ही निकला है. चर्चाओं के गुब्बारे में बहुत सारी बातें गैस बनकर यहाँ वहाँ घूम रही हैं. एक कहानी यह है कि वुहान में स्थित वायरोलोजी केंद्र से यह वायरस किसी प्रयोग के दौरान निकला और तबाही ले आया. दूसरी थ्योरी यह दी जा रही है कि यह वायरस किसी तरह वुहान के जानवरों के मांस के बाज़ार से इंसानों में आया जिससे लोग संक्रमित होना शुरू हो गए. इसके अलावा इस वायरस की कहानी में सियासत के दांव पेंच और कई अमीर व्यक्तियों के नाम भी शामिल हैं. लेकिन इन सभी बातों का दूसरा पहलू पर्यावरण से ही जुड़ा हुआ है. अगर यह वायरस लैब में बनाया जा रहा था तब इसके पीछे क्या मंशा थी? आखिर इसके बनने के ख़तरे को जानते हुए भी ज़ोखिम क्यों उठाया गया? किन वजहों से ऐसा हुआ? कुछ अमीर व्यक्तियों द्वारा टीका बनाकर करोड़ों रुपए कमाने की कहानियाँ भी सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिलीं.   

    इन उपर्युक्त बातों से अलग कोरोना संक्रमण महामारी के बीच प्रकृति से जुड़ी हुई जिन बातों को हर व्यक्ति ने अनुभव किया वे ही हमारी इंसानी जाति के लिए एक बहुत बड़ा सबक़ हैं. हम सब अब अपने अनुभवों से कह सकते हैं नीला आसमान देखने में कितना अच्छा लगता है. दिल्ली के लोगों ने साफ़ यमुना नदी को देखा जो कई अरसे से करोड़ों रूपयों के प्रोजेक्ट के चलते भी साफ़ नहीं हो पा रहा थी. कुछ शहरों से तो पहाड़ों की चोटियों के साफ़ दिखने की तस्वीरें भी इंटरनेट पर वायरल हुईं. विजिबिलिटी के चलते नज़रों ने स्पष्ट देखना जाना. जब लोग अपने-अपने घरों में क़ैद थे तब सड़कों पर जंगली जानवरों को घूमते देखा गया. कुछ जानवरों के बारे में कहा गया कि वे लुप्त प्राणी की श्रेणी में हैं. घरों के आँगन और छतों पर गोरैया को भी देखने का मौका मिला जो गुमशुदा थीं. ओडिशा में मिले पीले कछुए की तस्वीरें कई दिनों तक सोशल मीडिया में साझा की जाती रहीं जिसके बारे में बताया गया कि यह दुर्लभ प्रजाति से है.      

    कोरोना महामारी के बीच बुरी घटनाओं ने झकझोरा है. देश के पूर्वी हिस्से में विशेषरूप से पश्चिम बंगाल में अम्फन तूफ़ान ने भी देश की सरकार और जनता को पर्यावरण के मुद्दों को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर किया. उम्मीद से भी तेज़ हवाओं ने लोगों के घरों को एक झटके में उड़ा दिया साथ ही शीशे के घरों में रहने वाले रईस लोगों को इशारा दिया कि पर्यावरण में होने वाले बदलावों से अमीर या ग़रीब, कोई भी नहीं बच सकता. सब पर बदलती जलवायु के मिज़ाज का असर होगा. हो सकता है असर की मात्रा कम या ज़्यादा हो, पर कोई भी कुदरत के बदलते मिज़ाज से बच नहीं सकेगा. इसी साल असम और बिहार में आई बाढ़ को भले ही समाचार पत्रों और चैनलों में जगह नहीं दी गई पर इसका मतलब यह नहीं है कि इस पर लोगों को ध्यान नहीं गया. लाखों लोगो कोरोना महामारी में आई इस आपदा के कारण बुरी तरह प्रभावित हुए. बीबीसी की वेबसाइट पर छपी २८ मई की रिपोर्ट के अनुसार अम्फन तूफान का विश्व धरोहर सुंदरबन में जैव विविधता पर असर पड़ा और मेंग्रोव के जंगलों को भी भारी नुकसान हुआ. इलाक़े में अब पलायन की दर के बढ़ने की आशंका भी जताई गई है. जून माह में भारतीय तट सीमा पर निसर्ग तूफान ने दस्तक दी जिसके चलते भारी अव्यवस्था देखने में आई. तूफान का असर रायगढ़ में अधिक देखने को मिला जिसमें धरती की गोद में सोई पेड़ों की मजबूत जडें भी उखड़ गईं.

    हमारी पर्यावरण संबंधी समझ का दायरा सिमटा हुआ है. सक्रिय गतिविधि से दूर जनता सोशल मीडिया में उन बेवजह की चर्चाओं में लिप्त हैं, जो महत्त्व नहीं रखतीं. चालाक व्यवसायी और सरकारें इस असक्रियता का भरपूर फ़ायदा उठा रही हैं. जिन विरोध प्रदर्शनों में जनता पर्यावरण के समर्थन में आई वहाँ बेहतर परिणाम मिले हैं . लेकिन इतना काफी नहीं है. कोरोना वायरस ने यह तो समझा ही दिया है कि कुदरत के बगैर इंसान का अस्तित्व न के बराबर है. कुदरत वह नहीं है जो मान पर चोट लगने पर मानहानि का मुकद्दमा दायर करती है, बल्कि वह जब ग़ुस्सा होती है तब अपना बहुत कुछ छीन लेती है. हमें अपनी प्रकृति संबंधी समझ-संग-सहयोग को विद्यालय में निबंध लिखने से आगे बढ़ाना होगा. कड़वी ही सही सच्चाई यह है कि हम मानसिक रूप से बेकार समझ से संक्रमित समाज बन गए थे. कोरोना महामारी ने केवल हमारे शरीर को संक्रमित किया है और यह बताने का प्रयास किया है कि एक बेहतर दुनिया संभव है, बशर्तें इंसान अपनी गतिविधि और भूमिका में बदलाव करे.   

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चित्र: एम. एफ. हुसैन 

Friday, 19 March 2021

 

मुझे अभी क्या याद रह गया है? मेरी समस्या और सुविधा यही है कि मुझे सब कुछ याद नहीं रहता. सामान्य इंसानी दिमाग है. दिमाग को स्टोर हाउस नहीं बनाना चाहती. कई बार सोचती हूँ कि दिमाग को यादख़ाना बना लिया जाए तो क्या हश्र हो. अक्सर होता भी है, ‘हश्र’, जो मानसिक तौर पर परेशान करता है. दो दिन पहले छत्तीसगढ़ से होकर आई हूँ. जिस जगह गई थी उसका नाम सिरपुर है. वहाँ अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी थी. बहुत सारे लोग, बहुत सारी बातें कर रहे थे. कुछ को ध्यान से सुना कईयों को ध्यान से सुनने की कोशिश की!

मैं अब बहुत सामाजिक नहीं रह गई हूँ. पब्लिक स्पेस में जाते ही एक बिखराव शुरू हो जाता है और भीतर एक कुंआ तैयार होता है. पहले बाह्यमुखी थी पर वो सब नकली था जिसमें मुझे इत्मिनान नहीं मिलता था. पहले के मुकाबले बहुत अधिक अन्तर्मुखी हो चुकी हूँ. हालाँकि इसमें भी अपनी तरह की दिक्कतें हैं फिर भी यह दायरा मुझे पसंद है. जब कोई अपनी जगह को बदलता है तब शायद वह बाह्यमुखी होने की स्थितियों से टकराता है. यह बुरा नहीं है. भीतर की दुनिया का बड़ा हिस्सा बाहर की दुनिया से निर्मित होता है पर बाद में वो सब अपनी तरह से परिष्कृत होता है. इसकी बड़ी दिलचस्प प्रक्रिया होती है. लेकिन बात इस पर नहीं करनी है.

मुझे अपनी सिरपुर की यात्रा में जो याद रह गया है उसमें जंगल सबसे पहले है. कमल है कि मुझे बुद्ध, बौद्ध विहार, मूर्तियाँ, खाना, भाषा, सेमिनार, विषय और लोगों से अधिक जंगल ज्यादा याद है. यात्रा के आखिरी दिन हमें जंगल घुमाया गया. बहुत बड़ा जंगल. मुझे जो जानकारी मिली, उससे यह पता चलता है कि यह जंगल तीन सौ किलोमीटर में फैला हुआ है. अभी भी सोच रही हूँ कि रंगों की दुनिया को करीब से प्यार करने वाली मैं जंगल को ही क्यों याद कर रही हूँ?

जंगल मेरे पूर्वज हैं. जंगल में कितनी कहानियाँ घूमती होंगी. कार के भीतर से एक फ्रेम बनता है और उसी फ्रेम में आपको जो दीखता है उसे हम देखना मान लेते हैं. मैंने भी यही माना. घर पर बैठकर सोच रही हूँ अगर कार की खिड़की वाला फ्रेम नहीं होता तो मैं क्या क्या देख पाती? कितना बड़ा फ्रेम मेरी दोनों आँखें बनाती? मिट्टी जो उड़कर मेरे चेहरे पर आती तब क्या होता? खिड़की से जो दिखे वो पेड़ थे. बुलंद पेड़. जिनकी पत्तियाँ तलाक के मूड में थीं और बिना कुछ कहे नीचे गिरने को बेताब दिख रही थी. बादल से जैसे बूँदें उसकी इजाजत के बगैर गिर जाती हैं ठीक उसी तरह पत्तियाँ पेड़ों से गिर रही थीं. पेड़ों की लंबाई काफी थी. इतनी कि उनका तना ही दिखाई दे रहा था. लंबा और पतला होता हुआ. जाने वे पेड़ किसे चूमना चाह रहे हों.

कुछ छोटे छोटे पेड़ भी थे. पेड़ मुझे इतनी मात्रा में दिखे कि मैंने उनमें कुछ और देखना शुरू कर दिया. मिसाल के तौर पर एक जगह छोटे बड़े पेड़ दिखाई दिए. उनकी टहनियाँ कुछ इस तरह थीं कि मुझे लगा कि छोटा पेड़ उछल रहा है और बड़ा पेड़ उसका पिता है. उछलते हुए बच्चे को गिरने से बचाने के लिए बड़े पिता-पेड़ ने अपनी टहनियां यानी बाहें फैला ली हैं.

हाँ, हमने पेड़ों से बहुत कुछ सिखा है. पेड़ों ने हमसे क्या सिखा है, ये मुझे नहीं मालूम. पेड़ों के पास बैठकर हम उस पुराने रिश्तों को महसूस करते हैं जब हम दोनों आदिम अवस्था में रहे होंगे. फेलिनी की एक और खुबसूरत फिल्म ‘द नाईट ऑफ़ किबैरिया’ में जंगल और सड़क एक मुख्य स्पेस की तरह उभरते हैं. जंगल में उसका होने वाला पति उसे लूट लेता है. लेकिन इस लूट के दृश्य से पहले वही लड़की उसमें छोटे छोटे फूल इकठ्ठा करती है और बहार की तरह इठलाती है. इन दोनों दृश्यों के बाद वो सबसे बड़ा आइकोनिक दृश्य आता है जब अदाकारा/किरदार, सड़क पर चले जा रहे बैंड के साथ जाती है और आँखों में पानी होठों पर मुस्कराहट आती है.

लेकिन में तो छत्तीसगढ़ के जंगल में थी फिर फिल्म पर कैसे आ गई?

छत्तीसगढ़ की इस बेहद कम दिन की यात्रा में मैंने आवाजों को सुनने में भी ध्यान दिया. सेमिनार और कार्यक्रम में तो ‘हेलो टेस्टिंग टेस्टिंग’ ज़्यादा चलता है और फिर माइक की वही लम्बी बहती हुई ख़राब आवाज़ जिसे कोई नहीं सुनना चाहता. गाँवों में एक खास आवाजों की क़िस्में होती हैं. मिसाल के तौर पर सुबह के वक़्त. अगर आपको थोड़ी हरियाली के आसपास कमरा नसीब हुआ है तो जंगली जानवरों और तरह तरह की चिड़ियों की आवाज़ आपके कानों में आ जाएगी. ऐसा यहाँ भी था. जो आवाजें प्रकृति से आती हैं उन पर हम इंसानों ने कम ध्यान दिया है. वो आवाजें हमारे व्यक्तित्व में या तो घुल गई हैं या फिर उन्हें हमने सुनना छोड़ दिया है. मैंने अभी सुनना शुरू किया है.

Monday, 12 October 2020

क्योंकि हम जानते हुए भी नहीं जानना चाहते


 मुझसे ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते. लेकिन आज पूछा गया-

"हम अपने आख़िरी वक़्त में अपनी ख्वाहिशों को छोटा क्यों कर लेते हैं? ताउम्र बड़ी-बड़ी ख्वाहिशों को पूरा करने में अपना जीवन गुज़ार देते हैं और अंत में जब मौत बेहद नज़दीक होती है तब एक चॉकलेट का टुकड़ा माँगते हैं या फिर पार्क में बैठना चाहते हैं या फिर अम्मी की गोद में सिर रखना चाहते हैं. ऐसा क्यों है?"

ये सवाल एक बड़ा होता हुआ बच्चा मुझसे पूछ रहा है. मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह का सवाल मुझसे पूछ लेगा. 

मेरे पास वास्तव में जवाब नहीं था. लेकिन बैठे बैठे मैं उस पूरी उम्र में तैरने लगी जो मुझे बचपन से याद है. स्कूल जाना,लड़की होना, ये नहीं करना और सिर्फ वही करना, नौकरी करना, फिर छोड़ देना, कई बार हार जाना और कुछ बार जीत जाना. अंत में सब बराबर हो रहा है. और एक दिन मेरा इस शहर से और इस जगह से द्रव्यमान भी ग़ायब हो जाएगा. छू मंतर!

मैंने जवाब देने की कोशिश की. मुझे नहीं पता वो बच्चा मेरे जवाब से कितना संतुष्ट हुआ. लेकिन मैंने उसे बताया-

"मुझे लगता है जन्म से जिस दुनिया में हम दाख़िल होते हैं, उस दुनिया के हम निर्माता नहीं होते. वो एक बना बनाया पैकेज होता है. उसमें न हमारी पसंद होती है और न ही हमारी नापसंद शामिल होती है. कई बार यह लगता है कि ये हमें पसंद है या फिर वो हमें नापसंद है, लेकिन आख़िर में वो सब कुछ हमसे कृत्रिम रूप से जुड़ा हुआ है. हमारे इस दुनिया में आने के साथ ही बनने की प्रक्रिया शुरू होती है. यह तय होने लगता है कि हमें क्या और कैसा बनना है जबकि इस बात पर हम बात नहीं करते कि जिस जगह हम कुछ बनने की तैयारी ले रहे हैं उस जगह की भूमिका आख़िर किसने तय की और वही क्यों हमारे लिए तय की गई है. 

 


 इस पूरी प्रक्रिया के दौरान क़ुदरत अपना हस्तक्षेप करती रहती है. उदाहरण के लिए चीज़ों के जन्म के बाद उसके खात्मे तक या फिर किसी फल को खाने के बाद उसका स्वाद या फिर समुद्र को देखने के बाद एक उचाट/खुशनुमा एहसास...यह दृश्य भी हो सकता है या फिर न दिखने वाला भी. मुझे यह बिलकुल नहीं पता कि हम अपने आसपास के भीतर ही सोचते रह जाते हैं या फिर उससे बाहर भी. कुछ लोगों ने मुझे बताया कि हिमालय में  जोगी रहते हैं. मेरे लिंग की वजह से मेरे भीतर यह पहला सवाल आता है कि जोगिनें क्यों नहीं? खैर, उन जोगियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संसार को त्याग दिया है. इसलिए वह स्व या फिर उस शक्ति की खोज में तप में ध्यान लगा देते हैं. लेकिन दो मिनट को रूककर मैं यह सवाल फिर से सोचती हूँ कि जोगी को भी तो एक बनाई हुई दुनिया मिली है. हाँ, दोनों में फ़र्क होगा. जोगी भी कोई नयी दुनिया नहीं रचते, वे उसी दुनिया में जा रहे हैं, जिसकी संकल्पना अतीत के किन्हीं टुकड़ों में हुई है. 

फ़र्ज़ कीजिए जब हम जन्म लेते तब अमीर और ग़रीब के कांसेप्ट की बजाय कुछ और होता तब हम क्या एयर कैसे बनते? 

इस बनने के अभियान में हम ख़ुद को खो देते हैं. जीना भूल जाते हैं. इसलिए जब ज़िंदगी हाथ से फिसलने लगती है तब क़ुदरत के मैसेज को समझने लगते हैं. हमको मालूम चलता है कि किसी बगीचे में बैठना कहीं बेहतर और मूल ख़ुशनुमा एहसास है बजाय किसी ऊँची इमारत के किसी एसी घर में बैठना..."


मैं और जवाब खोज रही हूँ. आप को क्या लगता है मैं ठीक बोल रही हूँ?

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...