प्रिय लूसीलियस
तुम मुझ पर यह आग्रह कर रहे हो कि मैं तुम्हें अधिक बार पत्र लिखूँ। अच्छा तो आओ हिसाब-किताब कर लें। तब तुम्हें यह नहीं लगेगा कि तुम्हारा घाटा हुआ है। हमारे बीच यह तय हुआ था कि पहले तुम पत्र लिखोगे और उसके उत्तर में मैं लिखूँगा। फिर भी, मैं तुम्हारे प्रति अधिक कठोर नहीं बनूँगा। मैं जानता हूँ कि तुम विश्वसनीय हो। इसलिए मैं तुम्हें उधार पर भी कुछ दे सकता हूँ। किन्तु मैं वैसा नहीं करूँगा जैसा भाषा के महान आचार्य सिसरो ने अपने मित्र एटिकस को करने की सलाह दी थी कि यदि कहने के लिए कुछ न भी हो, तब भी मन में जो आए, वही लिख भेजो। मेरे पास लिखने के लिए विषयों की कभी कमी नहीं हो सकती, चाहे मैं सिसरो के पत्रों में भरी उन बातों को पूरी तरह छोड़ भी दूँ, जैसे कि कौन-सा उम्मीदवार कठिनाई में है। कौन उधार के धन के सहारे चुनाव लड़ रहा है और कौन अपनी ही संपत्ति के बल पर; किसे कौंसल-पद के लिए सीज़र का समर्थन प्राप्त है, किसे पोम्पेय का और किसे केवल अपनी धन-थैली का या यह कि कैसिलियस कितना कठोर साहूकार है, जो अपने संबंधियों को भी प्रति माह एक प्रतिशत से कम ब्याज पर ऋण नहीं देता। दूसरों के झंझटों में उलझने से कहीं अधिक अच्छा है कि मनुष्य अपनी ही समस्याओं पर ध्यान दे। स्वयं का परीक्षण करे, यह देखे कि वह किन-किन वस्तुओं का अभिलाषी (उम्मीदवार) बना हुआ है और फिर उन सबके लिए प्रयास करना ही छोड़ दे।
प्रिय लूसीलियस, सबसे उत्तम मार्ग और साथ ही सुरक्षा तथा स्वतंत्रता का मार्ग यह है कि किसी भी पद की आकांक्षा ही न रखी जाए बल्कि भाग्य द्वारा आयोजित सभी चुनावों को ही छोड़ दिया जाए। जब मतदाता एकत्र होते हैं और उम्मीदवार अपने-अपने मंचों पर व्याकुल होकर परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं। कोई रिश्वत देकर समर्थन खरीद रहा होता है, कोई अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से सौदेबाज़ी कर रहा होता है तो कोई उन लोगों के हाथ चूम रहा होता है जिन्हें चुने जाने के बाद वह छूना भी पसंद नहीं करेगा। इस बीच सबकी दृष्टि उद्घोषक की उस घोषणा पर लगी रहती है जो विजेता का नाम बताएगी, तब सोचो, उस पूरे बाज़ार को केवल एक दर्शक की तरह खड़े होकर देखना कितना सुखद होगा। जबकि तुम्हारे पास न बेचने के लिए कुछ हो और न खरीदने के लिए। किन्तु इससे भी कहीं अधिक महान आनंद तब प्राप्त होता है, जब मनुष्य न केवल प्रेटर या कौंसल के चुनावों को बल्कि उन सब प्रयत्नों को भी निस्पृह होकर देखता है जो लोग प्रतिवर्ष नवीनीकृत होने वाले पदों के लिए, स्थायी सत्ता प्राप्त करने के लिए, युद्ध में विजय और विजय-उत्सव के लिए, धन-संपत्ति के लिए, विवाह और संतान के लिए अथवा अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए करते रहते हैं। मन की कितनी महान उपलब्धि है यह कि मनुष्य ऐसा बन जाए जो किसी वस्तु की कामना ही न करे, किसी से कोई अनुग्रह न माँगे और भाग्य से कह सके, “हे भाग्य! मेरा और तुम्हारा अब कोई संबंध नहीं है। मैं तुम्हें अपने ऊपर कोई अधिकार नहीं देता। मैं जानता हूँ कि तुम कैटो जैसे पुरुषों को अस्वीकार कर देती हो। जबकि वेटिनियस जैसे लोगों को ऊँचे पदों पर पहुँचा देती हो। इसलिए मैं तुमसे कुछ भी नहीं माँगता।” यही वह मार्ग है जिससे भाग्य को उसके पद से हटाया जा सकता है।
इसलिए हमें एक-दूसरे को इन्हीं विषयों पर पत्र लिखने चाहिए और ऐसे विचारों का आदान-प्रदान करना चाहिए जिनकी कभी कमी न हो। क्योंकि हमारे सामने ऐसे असंख्य व्याकुल मनुष्य हैं, जो किसी विनाशकारी वस्तु की प्राप्ति के लिए निरंतर एक बुराई से दूसरी और उससे भी बड़ी बुराई की ओर बढ़ते जाते हैं। वे जिन वस्तुओं के पीछे भाग रहे हैं, शीघ्र ही उन्हीं से उन्हें या तो बचना पड़ेगा या उन्हें तुच्छ समझना पड़ेगा। आख़िर ऐसा कौन है जो उस वस्तु को प्राप्त कर लेने के बाद भी संतुष्ट हो गया हो, जिसे पहले वह अपनी पहुँच से बाहर समझता था? लोग समझते हैं कि समृद्धि कोई महान पुरस्कार है, जिसके लिए लालच करना उचित है। परन्तु वास्तव में वह अत्यन्त तुच्छ वस्तु है। इसी कारण वह किसी को भी संतुष्ट नहीं कर पाती। तुम्हें अपनी इच्छाएँ बहुत ऊँची प्रतीत होती हैं क्योंकि तुम अभी उनसे दूर हो। किन्तु जो व्यक्ति उन्हें प्राप्त कर लेता है, उसे वे नगण्य लगने लगती हैं। यदि मैं भूल नहीं कर रहा तो वह उसी क्षण किसी और ऊँचाई पर चढ़ने की इच्छा करने लगता है। जिसे तुम अपनी यात्रा का शिखर समझते हो, वही उसके लिए केवल अगली सीढ़ी बन जाता है। इस प्रकार सभी लोग सत्य के अज्ञान के कारण दुख उठाते हैं। दूसरों की बातों से भ्रमित होकर वे उन वस्तुओं की ओर आकर्षित होते हैं जिन्हें वे शुभ समझते हैं। पर जब अत्यधिक परिश्रम और कष्ट सहकर उन्हें प्राप्त कर लेते हैं, तब उन्हें ज्ञात होता है कि वे या तो बुरी हैं या तुच्छ हैं अथवा उनकी अपेक्षा से कहीं कम मूल्यवान हैं। अधिकांश लोग उन वस्तुओं से प्रभावित हो जाते हैं जो दूर से आकर्षक दिखाई देती हैं। सामान्यतः लोग ‘बड़ा’ और ‘अच्छा’, इन दोनों को एक ही समझ बैठते हैं।
ऐसा हमारे साथ भी न हो इसलिए हमें यह जाँच करनी चाहिए कि वास्तव में ‘शुभ’ (Good) क्या है। इस विषय में अनेक प्रकार की व्याख्याएँ और परिभाषाएँ दी गई हैं। एक परिभाषा यह है, “शुभ वह है जो मन को अपनी ओर आकर्षित करे और उसे अपनी ओर खींच ले।” किन्तु इसका तुरंत उत्तर दिया जा सकता है। यदि कोई वस्तु हमें अपनी ओर आकर्षित तो करे। पर हमारे लिए हानिकारक सिद्ध हो, तब क्या होगा? तुम जानते ही हो कि कितनी बुरी वस्तुएँ भी अत्यन्त आकर्षक होती हैं। जो वास्तव में सत्य है और जो केवल सत्य प्रतीत होता है, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। इसी कारण ‘शुभ’ का संबंध ‘सत्य’ से होना चाहिए क्योंकि जो वास्तव में शुभ नहीं है, उसे शुभ नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो वस्तु हमें अपनी ओर खींचती और लुभाती है, वह केवल शुभ प्रतीत होती है। वह धीरे-धीरे हमारे मन में प्रवेश करती है, हमें आकर्षित करती है और अंततः हमें मोहित कर लेती है। दूसरी परिभाषा इस प्रकार है, “शुभ वह है जो अपने प्रति इच्छा उत्पन्न करे अथवा जो मन में अपनी ओर बढ़ने की प्रेरणा जगाए।” किन्तु इस पर भी वही आपत्ति लागू होती है। बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ हैं जो मनुष्य को अपनी ओर प्रेरित करती हैं। जबकि उनका पीछा करने वालों के लिए वे अंततः हानिकारक सिद्ध होती हैं। एक और अधिक उपयुक्त परिभाषा इस प्रकार है, “शुभ वह है जो प्रकृति के अनुरूप मन में अपनी ओर बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न करे और जिसकी खोज तभी की जानी चाहिए जब वह वास्तव में वरणीय (चुनने योग्य) सिद्ध हो जाए।” ऐसी वस्तु उसी समय ‘सम्माननीय’ (Honorable) भी होती है अर्थात वह ऐसी होती है जो हर प्रकार से अपनाए जाने और प्राप्त किए जाने के योग्य हो।
यह विषय मुझे ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ के बीच का अंतर स्पष्ट करने के लिए प्रेरित करता है। इन दोनों में एक ऐसा संबंध है जो अभिन्न और अविभाज्य है। कोई भी वस्तु तब तक शुभ नहीं हो सकती जब तक उसमें कुछ सम्माननीय न हो और जो वास्तव में सम्माननीय है, वह निश्चय ही शुभ भी है। तो फिर इन दोनों में अंतर क्या है? सम्माननीय वह है जो पूर्णतः शुभ हो अर्थात वही जिसके द्वारा सुखमय जीवन अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है और जिसके साथ संबंध स्थापित होने पर अन्य वस्तुएँ भी शुभ बन जाती हैं। मेरा अभिप्राय यह है, कुछ वस्तुएँ अपने-आप में न तो शुभ होती हैं और न अशुभ जैसे, सैनिक सेवा, राजनयिक सेवा या न्यायिक पद। जब इन कार्यों का निर्वाह सम्मानपूर्वक और सदाचार के साथ किया जाता है, तभी वे शुभ बन जाते हैं और अपनी पहले की उदासीन (न शुभ, न अशुभ) स्थिति से निकलकर शुभ की श्रेणी में आ जाते हैं। ऐसी वस्तुएँ सम्माननीयता के संसर्ग से शुभ बनती हैं; परन्तु सम्माननीयता स्वयं अपने-आप में शुभ है। शुभता का मूल्य सम्माननीयता से प्राप्त होता है। जबकि सम्माननीयता किसी अन्य वस्तु पर निर्भर नहीं करती। उसका आधार वह स्वयं है। जो वस्तु शुभ है, वह किसी परिस्थिति में अशुभ भी हो सकती थी। किन्तु जो वास्तव में सम्माननीय है, वह शुभ के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकती।
एक परिभाषा इस प्रकार भी दी जाती है, “शुभ वह है जो प्रकृति के अनुरूप हो।” अब मेरी बात ध्यान से सुनो। जो वास्तव में शुभ है, वह निश्चय ही प्रकृति के अनुरूप होता है; किन्तु जो कुछ भी प्रकृति के अनुरूप है, वह तत्काल शुभ नहीं हो जाता। वास्तव में अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो प्रकृति के अनुरूप तो हैं। पर इतनी तुच्छ हैं कि उन्हें ‘शुभ’ कहना उचित नहीं होगा। वे नगण्य और महत्वहीन हैं। कोई भी शुभ वस्तु तुच्छ या महत्वहीन नहीं हो सकती। जब तक कोई वस्तु नगण्य है, तब तक वह शुभ नहीं है। जब वह वास्तव में शुभ बन जाती है, तब वह नगण्य नहीं रहती। तो किसी वस्तु को शुभ कैसे पहचाना जाए? जब वह पूर्णतः प्रकृति के अनुरूप हो, तभी उसे वास्तव में शुभ कहा जा सकता है।
तुम कहते हो, “तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि जो शुभ है, वह प्रकृति के अनुरूप होता है। यही उसका विशिष्ट लक्षण है। तुम यह भी स्वीकार करते हो कि कुछ ऐसी वस्तुएँ भी हैं जो शुभ तो नहीं हैं, फिर भी प्रकृति के अनुरूप हैं। तब ऐसा कैसे हो सकता है कि पहली वस्तुएँ शुभ कहलाएँ और दूसरी नहीं? जब दोनों में प्रकृति के अनुरूप होने का एक ही विशेष गुण है तो फिर उनके विशिष्ट स्वरूप में यह अंतर कैसे उत्पन्न होता है?” मेरा उत्तर है, उनकी परिपूर्णता और विकास के कारण। इसमें कोई नई या आश्चर्यजनक बात नहीं है कि कुछ वस्तुएँ अपने विकास के साथ अपना स्वरूप भी बदल लेती हैं। उदाहरण के लिए, एक बालक बड़ा होकर युवक बन जाता है। उसके साथ उसका विशिष्ट गुण भी बदल जाता है। बालक में तर्क-बुद्धि का पूर्ण विकास नहीं होता, जबकि युवक तर्क करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। कुछ वस्तुएँ जब विकसित होती हैं तो वे केवल आकार में ही बड़ी नहीं होतीं बल्कि अपने स्वरूप और गुण में भी भिन्न हो जाती हैं।
कोई यह कह सकता है, “केवल आकार में बड़ा हो जाना किसी वस्तु का भिन्न स्वरूप धारण कर लेना नहीं है। चाहे तुम एक छोटी सुराही में शराब भरो या एक बड़े पात्र में, शराब का गुण दोनों में समान रहता है। उसी प्रकार, थोड़ी-सी मधु और बहुत-सी मधु, दोनों के स्वाद में कोई अंतर नहीं होता।” किन्तु तुम्हारे ये उदाहरण भिन्न प्रकार के हैं। इनमें वस्तु चाहे जितनी बढ़ जाए, उसका मूल गुण अपरिवर्तित रहता है। निस्संदेह, कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो आकार में बड़ी होने पर भी अपनी जाति और अपने विशिष्ट गुण को बनाए रखती हैं।परन्तु कुछ दूसरी वस्तुएँ ऐसी भी होती हैं जिनमें आकार की अनेक क्रमिक वृद्धियों के बाद अन्तिम वृद्धि एक निर्णायक परिवर्तन ला देती है। वह उन्हें एक ऐसी नई अवस्था प्रदान करती है जो पहले की अवस्था से भिन्न होती है। एक-एक पत्थर जोड़ने से मेहराब नहीं बनती। उसे पूर्ण करने वाला वह अंतिम शिलाखंड होता है, शीर्ष-पत्थर (की-स्टोन), जो दोनों ओर झुके हुए पत्थरों के बीच जड़ दिया जाता है और अपने स्थान पर आकर पूरी मेहराब को एक साथ बाँध देता है। वह अंतिम पत्थर स्वयं आकार में छोटा होते हुए भी इतना महत्त्वपूर्ण कार्य क्यों कर देता है?
क्योंकि वह केवल एक और पत्थर जोड़ता ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण संरचना को पूर्णता भी प्रदान करता है। इसी प्रकार कुछ वस्तुएँ अपने विकास के क्रम में अपना पूर्व स्वरूप छोड़ देती हैं और एक नए स्वरूप को धारण कर लेती हैं। जब मन किसी वस्तु के विस्तार का बहुत देर तक विचार करता रहता है और उसकी विशालता का अनुमान लगाते-लगाते थक जाता है, तब वह उसे ‘अनन्त’ कहने लगता है। उस समय वह वस्तु पहले जैसी नहीं रह जाती। वह उस अवस्था से भिन्न हो जाती है जब वह केवल बड़ी किन्तु सीमित प्रतीत होती थी। उसी प्रकार, हम पहले किसी वस्तु को केवल कठिनाई से विभाजित होने योग्य समझते थे; परन्तु जब वह कठिनाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई, तब हमने उसे ‘अविभाज्य’ मान लिया। इसी प्रकार, जो वस्तु पहले केवल बड़ी कठिनाई से या लगभग न चलने योग्य थी, वही अंततः ‘अचल’ कही जाने लगी। ठीक इसी तर्क के अनुसार, कोई वस्तु पहले केवल प्रकृति के अनुरूप होती है; किन्तु जब उसका विकास अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, तब वह एक नए विशिष्ट स्वरूप में प्रवेश करती है और वास्तव में ‘शुभ’ बन जाती है।
अभी के लिए विदा
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