Friday, 7 August 2026

दिखावा करने के बारे में -- पत्र - 121

 प्रिय लूसीलियस 


रात बहुत बीत चुकी है और मैं अपनी अल्बान हवेली पहुँच गया हूँ। यात्रा लंबी नहीं थी। लेकिन असुविधाजनक होने के कारण मैं थक गया हूँ। यहाँ मुझे कोई चीज़ तैयार नहीं मिलती, सिवाय मेरे अपने आप के। इसलिए अब मैंने अपने थके हुए शरीर को अपने अध्ययन-कक्ष में बैठा लिया है और अपने रसोइए तथा बेकर के देर से आने से मुझे इतना लाभ अवश्य हुआ है कि अब मुझे इस बात पर स्वयं से विचार करने का अवसर मिल गया है कि यदि हम किसी बात को हल्के ढंग से लें तो कोई भी चीज़ गंभीर नहीं होती। यदि हम अपनी झुंझलाहट को उसमें स्वयं न जोड़ें तो कोई भी बात परेशान करने वाली नहीं होती। मेरे बेकर के पास रोटी नहीं है। लेकिन मेरे प्रबंधक के पास कुछ है। मेरे मुख्य दास तथा मेरे किरायेदारों के पास भी है। “रोटी खराब है,” तुम कहते हो। लेकिन ठहरो! वह अच्छी हो जाएगी। भूख जल्द ही उसे उत्तम आटे से बनी मुलायम रोटी में बदल देगी। इसी कारण तब तक भोजन नहीं करना चाहिए, जब तक भूख स्वयं ऐसा करने का संकेत न दे। इसलिए मैं अपना भोजन तब तक टाल दूँगा, जब तक मुझे फिर से अच्छी रोटी नहीं मिल जाती या फिर तब तक, जब तक मुझे खराब रोटी से भी कोई आपत्ति न रह जाए।



    सादा और रूखा भोजन करने का अभ्यास डालना आवश्यक है। समय और स्थान की कठिन परिस्थितियाँ उन लोगों के सामने भी आ खड़ी होती हैं जो धनवान हैं और सुख-सुविधाओं के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं। उनकी इच्छाओं में बाधा डाल देती हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी हर इच्छा पूरी नहीं कर सकता। मनुष्य इतना अवश्य कर सकता है कि जो उसके पास नहीं है, उसे पाने की इच्छा छोड़ दे और जो उपलब्ध है, उसका प्रसन्नतापूर्वक उपयोग करे। आत्मनिर्भरता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे संयमित पेट में निहित है, जो कठिन परिस्थितियों को सहन कर सके।यह बताना भी कठिन है कि मुझे इस बात से कितना आनंद मिलता है कि मेरी थकान स्वयं अपने आप में शांत हो गई है। मुझे न मालिश की आवश्यकता है, न स्नान की। मैं केवल समय के उपचारात्मक प्रभावों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। विश्राम श्रम से आई थकान को दूर कर देता है। आने वाला भोजन, चाहे वह जो भी हो, किसी भव्य उद्घाटन-भोज से भी अधिक आनंददायक होगा। संक्षेप में, मैंने तुरंत अपने मन को एक प्रकार की परीक्षा में डाल दिया है। वह भी अत्यंत सीधी तथा सटीक परीक्षा में क्योंकि जब मन स्वयं को तैयार कर लेता है और धैर्य रखने का संकल्प कर लेता है, तब हमें उसके वास्तविक संकल्प की स्पष्ट परीक्षा नहीं मिलती। सबसे विश्वसनीय परीक्षाएँ वे होती हैं जो अचानक सामने आ जाती हैं। जब मन कठिनाइयों को केवल उदासीनता से ही नहीं बल्कि शांत भाव से भी देखता है; जब उसमें न रोष होता है, न शिकायत; जब जो चीज़ उपलब्ध नहीं है, उसकी इच्छा न करके वह उसकी कमी की भरपाई कर लेता है। जब वह यह विचार करता है कि उसकी दिनचर्या में भले ही कोई चीज़ कम हो। लेकिन अपने आप में उसमें किसी चीज़ की कमी नहीं है।

    बहुत-सी चीज़ों के बारे में हमें उनकी अनावश्यकता का पता तभी चलता है, जब वे कम पड़ने लगती हैं। हम उनका उपयोग इसलिए नहीं कर रहे थे कि उनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता था बल्कि इसलिए कर रहे थे क्योंकि वे हमारे पास उपलब्ध थीं। हम ऐसी कितनी ही चीज़ें केवल इसलिए खरीद लेते हैं क्योंकि दूसरे लोगों ने उन्हें खरीदा है या वे दूसरे लोगों के घरों में मौजूद हैं! हमारी बहुत-सी समस्याएँ इस तथ्य से उत्पन्न होती हैं कि हम दूसरे लोगों के मानदंडों के अनुसार जीवन जीते हैं और विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाने के बजाय फैशन का अनुसरण करते हैं। यदि केवल कुछ ही लोग कोई काम करते तो हम उनकी नकल करने से इनकार कर देते। लेकिन जैसे ही अधिक लोग वही काम करने लगते हैं, हम भी उसे अपना लेते हैं, मानो केवल अधिक लोगों द्वारा किया जाना ही उसे अधिक सम्माननीय बना देता हो। जब कोई गलत धारणा व्यापक रूप से फैल जाती है, तो हम उसे ही सदाचार का स्थान दे देते हैं। 

    आजकल हर व्यक्ति नुमिडियाई घुड़सवारों के एक दल और आगे-आगे चलने वाले धावकों की एक टुकड़ी के साथ यात्रा करता है। ऐसा दिखाई देना अपमानजनक माना जाता है कि तुम्हारे पास रास्ते में आने वाले यात्रियों को हटाने के लिए कोई सेवक न हो और किसी बड़े अधिकारी के आने की सूचना देने के लिए धूल का कोई विशाल बादल न उठ रहा हो। आजकल हर व्यक्ति के पास खच्चरों का एक काफिला होता है, जो उसके क्रिस्टल और गोमेद के प्यालों तथा बारीकी से बनाए गए चाँदी के पात्रों का संग्रह ढोता है। यह भी अपमानजनक माना जाता है कि ऐसा लगे कि तुम्हारा पूरा सामान ऐसी वस्तुओं का है जिन्हें बिना टूटे आसानी से इधर-उधर ले जाया जा सकता है। हर व्यक्ति के साथ सेवकों का एक दल होता है, जो यात्रा के समय अपने चेहरे पर लोशन मलते रहते हैं ताकि सूर्य या ठंड उनकी कोमल त्वचा को नुकसान न पहुँचा सके। स्वस्थ त्वचा वाले युवा सेवक होना, जिन्हें किसी औषधीय प्रसाधन की आवश्यकता ही न हो। यह भी आजकल अपमानजनक माना जाता है!

    हमें इन सभी लोगों से बातचीत करने से बचना चाहिए। ये ऐसे लोग हैं जो अपने दुर्गुण एक-दूसरे तक पहुँचाते हैं और उन्हें आपस में बाँटते रहते हैं। पहले हम तब इसे भयानक मानते थे, जब लोग शब्दों के माध्यम से अपनी शेखी बघारते थे। लेकिन आज ऐसे लोग हैं जो अपने दुर्गुणों का भी प्रदर्शन करते हैं। इन लोगों से बातचीत करना बहुत हानिकारक होता है। भले ही उसका तत्काल कोई प्रभाव दिखाई न दे, फिर भी वह मन में बीज बो देती है। उनके साथ से अलग हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव हमारे भीतर बना रहता है और बाद में फिर उभर आता है। संगीत का कोई कार्यक्रम सुनने के बाद भी लोगों के कानों में उसकी धुन और मधुर गायन गूँजता रहता है, जो उनकी सोचने की क्षमता को सीमित कर देता है और उन्हें गंभीर विषयों पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ बना देता है। उसी प्रकार चापलूसों और दुर्गुणों को बढ़ावा देने वाले लोगों की बातें सुन लेने के बहुत देर बाद तक मन में बनी रहती हैं। मन को किसी मधुर ध्वनि से मुक्त कर पाना आसान नहीं होता। वह बनी रहती है। उसका प्रभाव चलता रहता है। कुछ अंतराल के बाद फिर लौट आती है। इसलिए आरंभ से ही हमें अपने कानों को हानिकारक आवाज़ों के लिए बंद रखना चाहिए। एक बार उन आवाज़ों को प्रवेश मिल जाए और वे अपना प्रभाव डालना शुरू कर दें तो वे और भी अधिक दुस्साहसी हो जाती हैं।

    इसके बाद हम ऐसे लोगों के बीच जा पहुँचते हैं, जो इस तरह की बातें करते हैं “सद्गुण, दर्शन और न्याय, ये सब निरर्थक शब्दों का शोर मात्र हैं! जीवन में सुखपूर्वक रहना ही एकमात्र सुख है। खाना, पीना और अपनी संपत्ति खर्च करना, यही जीवन जीना है। यही इस बात को याद रखना है कि हम नश्वर हैं। दिन बीतते जा रहे हैं। जीवन वापस न लौटने वाले ढंग से आगे बढ़ रहा है। हम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं? दर्शन का अभ्यास करने से क्या लाभ है? जब हम बूढ़े हो जाएँगे, तब हम सुख का आनंद नहीं ले सकेंगे तो अभी, जब हम सक्षम हैं और अभी भी इच्छाएँ रखते हैं, अपने जीवन पर संयम क्यों थोपें? इसलिए मृत्यु से पहले ही उससे आगे निकल जाओ और जो कुछ वह तुमसे छीनने वाली है, उसे अभी अपने ऊपर खर्च कर डालो। तुम्हारी कोई प्रेमिका नहीं है। न ही तुम्हारे पास ऐसा कोई पुरुष-प्रेमी है, जिसे देखकर तुम्हारी प्रेमिका ईर्ष्या करे। तुम कभी नशे में धुत्त नहीं होते। तुम्हारे भोजों को देखकर ऐसा लगता है मानो तुम अपने पिता से अपने रोज़मर्रा के खर्च की अनुमति मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हो। यह जीवन जीना नहीं है बल्कि किसी दूसरे के जीवन की देखभाल करना है! अपने आपको हर चीज़ से वंचित रखना और अपना ध्यान ऐसी संपत्ति पर लगाए रखना, जो अंततः तुम्हारे उत्तराधिकारी को ही मिलने वाली है। यह पूरी तरह पागलपन है। इस तरह तुम्हारी संपत्ति का आकार ही तुम्हारे मित्र को तुम्हारा शत्रु बना देगा। जितनी बड़ी उसकी विरासत होगी, तुम्हारी मृत्यु पर वह उतना ही अधिक प्रसन्न होगा। जहाँ तक उन ढोंगी लोगों का सवाल है।दूसरों के जीवन के कठोर आलोचक और अपने ही जीवन के शत्रु, जो जनता को उपदेश देना पसंद करते हैं। उन पर बिल्कुल ध्यान मत दो। अच्छे नाम की अपेक्षा अच्छा जीवन चुनने में तनिक भी संकोच मत करो।”

    ऐसी आवाज़ों से भी उतना ही बचना चाहिए, जितना उन आवाज़ों से जिनके पास से यूलिसीस तब तक आगे नहीं बढ़ना चाहता था, जब तक उसे मस्तूल से बाँध नहीं दिया गया था। इन दोनों में समान शक्ति है। ये तुम्हें तुम्हारे देश, माता-पिता, मित्रों और सद्गुणों से दूर कर देती हैं और तुम्हें लज्जाजनक जीवन की ओर इस प्रकार आकर्षित करती हैं कि ऐसे सुखों का वादा करती हैं, जो तुम्हें दुखी कर देंगे, भले ही उनमें अपने आप में कोई लज्जाजनक बात न हो।कितना बेहतर है कि सीधे मार्ग का अनुसरण किया जाए और अंततः वह तुम्हें उस बिंदु तक पहुँचा दे, जहाँ केवल वही चीज़ें तुम्हें आनंद देती हैं जो सम्माननीय हैं! 

    हम उस बिंदु तक पहुँच सकेंगे, यदि हम यह समझ लें कि ऐसी दो प्रकार की वस्तुएँ हैं जो हमें या तो आकर्षित करती हैं या हममें विरक्ति उत्पन्न करती हैं। आकर्षित करने वाली वस्तुओं में धन, सुख, सौंदर्य, महत्वाकांक्षा और ऐसी ही अन्य सभी मोहक तथा आनंददायक चीज़ें हैं। कठिन शारीरिक श्रम, मृत्यु, पीड़ा, लोगों की निंदा और सादा भोजन हमें अप्रिय लगते हैं। इसलिए हमें स्वयं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि न तो हम बाद वाली चीज़ों से भयभीत हों और न पहली वाली चीज़ों की इच्छा करें। हमें अपनी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए, जो चीज़ें हमें आकर्षित करती हैं, उनका प्रतिरोध करते हुए और जो कठिनाइयाँ हम पर आक्रमण करती हैं, उनकी ओर आगे बढ़ते हुए। 

    क्या तुम ध्यान नहीं देते कि जब लोग पहाड़ी पर चढ़ रहे होते हैं और जब नीचे उतर रहे होते हैं, तब उनके शरीर की मुद्रा कितनी अलग होती है? नीचे उतरते समय वे अपने शरीर को पीछे की ओर झुका लेते हैं। जबकि चढ़ते समय आगे की ओर झुकाते हैं। नीचे उतरते समय अपने शरीर का भार आगे की ओर डालना उतना ही जानबूझकर की गई भूल है, जितना ऊपर चढ़ते समय उसे पीछे की ओर डालना। लूसीलियस, हम सुखों की ओर नीचे उतरते हैं। लेकिन कठिनाइयों और कष्टों का सामना करने के लिए हमें ऊपर चढ़ना पड़ता है। बाद वाली स्थिति में हमें अपने शरीर को आगे की ओर धकेलना चाहिए। जबकि पहली स्थिति में हमें उसे पीछे की ओर रोककर रखना चाहिए।

    क्या तुम यह समझते हो कि मैं इस समय केवल यह कहना चाहता हूँ कि हमारे कानों के लिए केवल वही लोग खतरनाक हैं, जो सुख की प्रशंसा करते हैं और पीड़ा के विचार से हमें भयभीत करते हैं। जबकि पीड़ा अपने आप में ही पर्याप्त रूप से भयावह है? नहीं, मेरा मानना है कि हमें उन लोगों से भी नुकसान पहुँचता है, जो स्टोइक मत का आवरण ओढ़कर हमें दुर्गुणों की ओर प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए, वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि केवल वही व्यक्ति प्रेमी होता है जो बुद्धिमान और अत्यधिक शिक्षित हो। “इस विषय में केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही विशेषज्ञ होता है। इसी प्रकार, वही व्यक्ति प्रेम-समारोहों और भोजों में भाग लेने की कला में भी सबसे अधिक निपुण होता है। आइए, इस प्रश्न पर विचार करें। युवकों को किस आयु तक प्रेम का विषय बनाया जाना चाहिए?”

    इन बातों को यूनानियों की परंपरा के हवाले कर देने के बाद, हमें इसके बजाय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

“कोई भी व्यक्ति संयोगवश अच्छा नहीं बनता। सद्गुण को सीखना पड़ता है। सुख एक तुच्छ और दयनीय वस्तु है, जिसका कोई वास्तविक मूल्य नहीं है। यहाँ तक कि अवाक् प्राणियों को भी सुख का कुछ अंश प्राप्त होता है। सबसे छोटे और तुच्छ प्राणी भी उसके पीछे दौड़ते हैं। यश एक खोखली वस्तु है, जो हवा से भी अधिक क्षणभंगुर और चंचल है। गरीबी केवल उनके लिए समस्या है जो उसे स्वीकार नहीं करते। मृत्यु कोई बुराई नहीं है। फिर, तुम पूछते हो, वह क्या है? वह वह एक अधिकार है जो समस्त मानवजाति को समान रूप से प्राप्त है। अंधविश्वास एक मूर्खतापूर्ण भूल है। वह उनसे डरता है, जिनसे प्रेम किया जाना चाहिए। जिनकी पूजा करता है, उन्हीं के प्रति अपराध करता है। यदि तुम देवताओं की निंदा ही करने वाले हो तो यह मान लेना भी बेहतर है कि उनका अस्तित्व ही नहीं है।”

    तुम्हें इन्हीं शिक्षाओं को सीखना चाहिए या बल्कि, इन्हें अपने हृदय में उतार लेना चाहिए। दर्शन को दुर्गुणों के लिए बहाने उपलब्ध नहीं कराने चाहिए। जब चिकित्सक रोगी को असंयम बरतने की सलाह देता है, तब रोगी के स्वस्थ होने की कोई आशा नहीं रहती।


अभी के लिए विदा 

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