अभिवादन
प्रिय लूसीलियस, मैं चाहता हूँ कि तुम शब्दों और वाक्य-रचना को लेकर अत्यधिक चिंतित न रहो। तुम्हारे लिए चिंता करने योग्य इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बातें हैं। अपने आप से यह पूछो कि तुम क्या लिख रहे हो, यह नहीं कि कैसे लिख रहे हो। जहाँ तक विषय-वस्तु का संबंध है, तुम्हारा उद्देश्य केवल उसे लिख देना नहीं होना चाहिए बल्कि उसे अपने अंतर्मन में अनुभव करना चाहिए, उन विचारों को आत्मसात करना चाहिए। उन्हें अपनी आत्मा पर इस प्रकार अंकित कर लेना चाहिए जैसे कोई मुहर मोम पर अपनी छाप छोड़ देती है।
जब किसी व्यक्ति की वाक्-शैली में अत्यधिक सावधानी, परिष्कार और बनावट दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि उसका मन भी छोटी बातों में ही उलझा हुआ है। महान व्यक्ति की वाणी इतनी बनावटी नहीं होती। उसके शब्द दिल से निकलते हैं, न कि कृत्रिम रूप से सजाए-सँवारे जाते हैं। तुम उन सजे-धजे युवकों को जानते हो जिनके केश-विन्यास और दाढ़ी की शैली अभी-अभी प्रसाधन-गृह से सँवारकर निकली हुई प्रतीत होती है। उनसे तुम किसी साहसपूर्ण या दृढ़ चरित्र वाले आचरण की अपेक्षा नहीं करते। उसी प्रकार वाणी भी मन का वस्त्र और उसका श्रृंगार है। यदि हमारी भाषा अत्यधिक कतर-ब्योंत की हुई, सजी-सँवरी और बनावटी हो तो वह इस बात का संकेत है कि मन भी निष्कपट नहीं है। उसके भीतर कहीं न कहीं कुछ विकृति या असंतुलन अवश्य है। अत्यधिक मधुर और ललित वाणी पुरुषार्थ का आभूषण नहीं है।
यदि हमें किसी सज्जन पुरुष के मन का दर्शन करने का अवसर मिले तो हम कितना सुंदर और कितना पवित्र दृश्य देखेंगे! उसमें कैसी महानता और कैसी शांति प्रकाशित होगी! वहाँ सद्गुणों के नक्षत्र किस प्रकार आलोक बिखेरते हुए दिखाई देंगे। एक ओर न्याय, दूसरी ओर साहस। कहीं संयम और विवेक। इनके साथ-साथ मितव्ययिता, आत्मसंयम, धैर्य, उदारता और प्रसन्नचित्तता भी अपना प्रकाश फैलाएँगे। मानव-प्रेम भी, जो विश्वास करना कठिन है, पर वास्तव में मनुष्यों के बीच अत्यंत दुर्लभ है। दूरदर्शिता, सुसंस्कृतता और इन सबमें सबसे बढ़कर महान आत्मा का वैभव, ये सब मिलकर उस मन को कैसी शोभा और देवताओं की शपथ, कैसी गरिमा प्रदान करेंगे! उसका प्रभाव कितना महान होगा और वह कितना आदरणीय होगा! लोग उससे प्रेम भी करेंगे और साथ ही उसका सम्मान और श्रद्धा भी करेंगे।
यदि कोई उस मुखमंडल का दर्शन कर सके, जो सामान्य मानवीय जीवन में दिखाई देने वाली हर वस्तु से अधिक उदात्त और अधिक तेजस्वी हो तो क्या वह किसी देवता के प्रकट होने के समान विस्मय से ठिठक न जाएगा? क्या वह उस दिव्य दर्शन के लिए मौन प्रार्थना करते हुए, उस मुखमंडल की कृपा से प्रेरित होकर श्रद्धापूर्वक उसके समीप न बढ़ेगा और उसकी आराधना न करेगा? फिर जब वह उस स्वरूप को लंबे समय तक निहार चुका होगा, जो हमारे समस्त अनुभवों से कहीं अधिक ऊँचा और उत्कृष्ट है। उन नेत्रों को देखेगा जो कोमल प्रकाश के साथ-साथ सजीव अग्नि की ज्योति से भी दमक रहे हैं, तब अंततः भय और विस्मय से भरकर वह हमारे कवि वर्जिल के शब्दों में कह उठेगा—
हे देवी, मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ?
क्योंकि तुम्हारा मुख किसी नश्वर का नहीं है,
और तुम्हारी वाणी भी मानवीय नहीं लगती।
अतः मुझ पर कृपा करो
और मेरे समस्त श्रमों का भार हल्का कर दो।
यह दिव्य सत्ता हमारे सामने प्रकट होगी। यदि हम उसकी उपासना करना चुनें तो वही हमारे श्रमों को हल्का कर देगी। परंतु उसकी उपासना का अर्थ मोटे-ताज़े बैलों की बलि चढ़ाना, स्वर्ण और रजत की भेंट अर्पित करना अथवा किसी कोषागार में धन का अंबार लगाना नहीं है। उसकी सच्ची आराधना केवल निर्मल और धर्मनिष्ठ संकल्प से होती है। मैं फिर कहता हूँ, यदि हम उस दिव्य स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन कर पाते तो हममें ऐसा कोई भी न होता जो उसके प्रति प्रेम से अभिभूत न हो जाता। किंतु अभी अनेक बाधाएँ हैं जो या तो अपनी अत्यधिक चकाचौंध से हमारी दृष्टि को भ्रमित कर देती हैं अथवा हमें अज्ञान के अंधकार में डुबो देती हैं। जैसे औषधियाँ हमारी आँखों को स्वच्छ कर उनकी दृष्टि को तीक्ष्ण बना देती हैं, वैसे ही यदि हम सचमुच इच्छुक हों तो अपने मन को भी उन सभी अवरोधों से मुक्त कर सकते हैं जो सत्य को देखने से उसे रोकते हैं। तब सद्गुण हमें स्पष्ट दिखाई देगा, चाहे वह शरीर के भीतर ही क्यों न हो, चाहे उसके मार्ग में निर्धनता खड़ी हो, चाहे निम्न सामाजिक स्थिति और अपकीर्ति उसे चारों ओर से घेरे हुए हों। मैं फिर कहता हूँ, हम उस सुंदर स्वरूप का दर्शन कर सकेंगे, भले ही वह धूल और मलिनता से ढका हुआ प्रतीत हो। उसी प्रकार हम उस मन की कुरूपता और मलिनता को भी पहचान लेंगे जो क्लेशों और विकारों से भरा हुआ है, चाहे उसके चारों ओर धन-वैभव की चमक बिखरी हो, चाहे ऊँची प्रतिष्ठा और महान सत्ता का मिथ्या तेज हर ओर से हमारी आँखों को चकाचौंध कर रहा हो।
तभी हम यह समझने की स्थिति में होंगे कि जिन वस्तुओं की हम प्रशंसा करते हैं, वे वास्तव में कितनी तुच्छ हैं। हमारी दशा उन बच्चों के समान है, जो अपने खिलौनों को अत्यधिक महत्त्व देते हैं और किसी सस्ते-से चमकीले खिलौने को अपने भाई-बहन या यहाँ तक कि माता-पिता से भी अधिक प्रिय समझते हैं। जैसा कि अरिस्टो कहते हैं, उनमें और हममें अंतर ही क्या है? केवल इतना कि हमारी मूर्खता अधिक महँगे रूप में प्रकट होती है। वे समुद्र-तट पर मिले रंग-बिरंगे चिकने कंकड़ों से प्रसन्न होते हैं। हम मिस्र के मरुस्थलों या अफ्रीका के निर्जन प्रदेशों से मँगाए गए रंगीन संगमरमर तथा उन विशाल स्तंभों से मोहित होते हैं जो ऐसे सभागारों या भोज-कक्षों को सहारा देते हैं जिनमें मानो पूरा का पूरा नगर समा जाए।
हम संगमरमर से मढ़ी हुई दीवारों वाले कक्षों पर आश्चर्य करते हैं। जबकि हम जानते हैं कि वह केवल ऊपर चढ़ाई गई एक पतली परत है। जब हम किसी छत पर सोने का पानी चढ़ाते हैं तो क्या हम स्वयं को धोखा नहीं दे रहे होते? क्योंकि हम जानते हैं कि उस स्वर्णिम परत के नीचे साधारण और आकर्षणहीन लकड़ी छिपी हुई है। और यह दिखावटी सजावट केवल दीवारों और छतों तक ही सीमित नहीं है। उन लोगों को देखो जो ऊँचे पदों पर इतराते हुए चलते हैं। उनका वैभव भी केवल सोने की परत के समान है। यदि तुम उसे ध्यान से परखो तो उस प्रतिष्ठा की पतली परत के नीचे कितनी सड़न और भ्रष्टता छिपी हुई है, यह स्पष्ट दिखाई देगा। एक ही वस्तु है जो प्रत्येक उच्च पद, प्रत्येक न्यायाधीश का आसन और प्रत्येक अधिकार का निर्धारण करती है— धन। जिस क्षण से धन को सम्मान मिलने लगा, उसी क्षण से सच्चा सम्मान तिरस्कृत होने लगा। हम सब व्यापारी बन गए हैं और हर वस्तु भी व्यापार की वस्तु बन गई है। हम यह नहीं पूछते कि कोई वस्तु वास्तव में क्या है। हम केवल यह पूछते हैं कि उसकी कीमत कितनी है। हम मूल्य लेकर निष्ठावान बनते हैं और मूल्य लेकर विश्वासघात भी करते हैं। जब तक हमें सदाचार से कोई लाभ मिलने की आशा रहती है, तब तक हम ईमानदारी का आचरण करते हैं। पर यदि अपराध हमें उससे अधिक लाभ देने लगे तो हम उसी का मार्ग अपना लेते हैं।
हमने अपने माता-पिता से ही स्वर्ण और रजत को विस्मय और श्रद्धा की दृष्टि से देखना सीखा। बचपन में ही लोभ का बीज हमारे भीतर बो दिया गया। वह हमारे मन में गहराई तक जड़ें जमाकर हमारे साथ-साथ बढ़ता गया। फिर समाज का प्रभाव आता है। अन्य सभी बातों में लोग चाहे एक-दूसरे से असहमत हों। पर इस विषय में सबकी एक ही राय होती है। वे इसी की प्रशंसा करते हैं, इसी की कामना अपने लिए और अपने परिवार के लिए करते हैं। जब वे देवताओं के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहते हैं, तब भी इसी धन को अर्पित करते हैं, मानो यही मनुष्य का सबसे महान और सर्वोच्च धन हो। फलस्वरूप हमारा चरित्र इतना पतित हो जाता है कि निर्धनता को अभिशाप समझा जाने लगता है। धनी लोग उसका तिरस्कार करते हैं और निर्धन स्वयं भी उससे घृणा करने लगते हैं। फिर कवियों की रचनाएँ भी हमारे मोह को और भड़काती हैं। वे धन की ऐसी प्रशंसा करते हैं, मानो वही जीवन की एकमात्र शोभा और गौरव हो। उनके वर्णनों में तो ऐसा प्रतीत होता है कि अमर देवताओं के पास भी धन-संपदा से बढ़कर न तो कोई वरदान है और न ही कोई ऐसी वस्तु जिसे वे स्वयं अपने लिए रखना चाहें।
सूर्य का महल ऊँचे-ऊँचे स्तंभों पर खड़ा था,
दमकते हुए स्वर्ण की आभा से आलोकित और भव्य।
और उसके रथ का वर्णन देखिए—
उसका धुरा स्वर्ण का था, उसका दंड भी स्वर्ण का,
उसके घूमते हुए पहियों के घेरे स्वर्ण से मढ़े थे,
और उनसे निकलने वाली तीलियाँ रजत की बनी थीं।
इसी प्रकार वे 'स्वर्णयुग' का भी वर्णन करते हैं और उसे मानव इतिहास का सर्वोत्तम युग सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार काव्य भी हमारे मन में यह धारणा दृढ़ करता है कि स्वर्ण और वैभव ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हैं। यूनानी त्रासदियों में भी ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ लोग धन के लिए अपनी निष्कपटता, अपना स्वास्थ्य और यहाँ तक कि अपनी कीर्ति तक का त्याग करने को तैयार हो जाते हैं।
लोग मुझे दुष्ट कहें, पर धनी दुष्ट कहें।
हर कोई यह पूछता है कि वह धनी है या नहीं,
यह नहीं कि वह सज्जन है या नहीं।
यह कोई नहीं पूछता कि धन तुम्हें कैसे मिला
या किस मार्ग से प्राप्त हुआ,
वे केवल इतना जानना चाहते हैं कि तुम्हारे पास कितना धन है।
आज संसार में मनुष्य का मूल्य उसकी संपत्ति से आँका जाता है।
लज्जा की बात क्या है? — निर्धन होना।
या तो मैं धनवान होकर जीऊँ,
या निर्धन होकर मर जाऊँ।
धन कमाते-कमाते मर जाना भी सौभाग्य माना जाता है।
धन ही मानव जाति का सर्वोच्च कल्याण है।
वह माँ के प्रेम से भी अधिक प्रिय है,
शिशु के स्नेहिल स्पर्श से भी अधिक मधुर है,
और पिता के प्रति जो श्रद्धा होनी चाहिए, उससे भी अधिक मूल्यवान समझा जाता है।
यदि स्वयं वीनस (प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और उर्वरता की देवी) का मुख भी इस स्वर्ण की आभा की बराबरी कर सके,
तो वह सचमुच देवताओं और मनुष्यों, दोनों के प्रेम की अधिकारी है।
जब यूरिपिदेस (Euripides- यूनानी सर्वश्रेष्ठ नाटककारों में से एक) की एक त्रासदी में यह अंतिम संवाद बोला गया तो समस्त दर्शक-समूह एक साथ खड़ा हो गया। उनका उद्देश्य अभिनेता और नाटक, दोनों को रंगमंच से बाहर निकाल देना था। तब स्वयं यूरिपिदेस मंच पर आए और दर्शकों से विनती की कि वे अंत तक प्रतीक्षा करें और देखें कि स्वर्ण-लोभ का वह उपासक अंततः किस परिणाम को प्राप्त होता है। उस कथा में बेलेरोफोन (Bellerophon-प्राचीन यूनानी पौराणिक कथाओं का एक प्रसिद्ध वीर नायक) को उसके कर्मों का उचित दंड मिलता है। वास्तविक जीवन में भी प्रत्येक लोभी व्यक्ति का अंततः यही भाग्य होता है। लोभ कभी दंड से बच नहीं पाता बल्कि सत्य तो यह है कि लोभ स्वयं ही अपना सबसे बड़ा दंड है। वह मनुष्य से कितने आँसू बहवाता है, कितना दुःख सहने पर विवश करता है! जो वस्तु उसके पास नहीं है, उसके लिए वह व्याकुल रहता है। जो कुछ उसने प्राप्त कर लिया है, उसके कारण भी उसे चैन नहीं मिलता। फिर प्रतिदिन की चिंताएँ अलग हैं। मनुष्य के पास जितना अधिक धन होता है, उतनी ही अधिक उसकी चिंता बढ़ती जाती है। वास्तव में, धन उन लोगों को उससे कहीं अधिक कष्ट देता है जिनके पास वह है, बनिस्बत उनके जो उसे प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।
जब उन्हें थोड़ी-सी भी हानि होती है तो वे विलाप करने लगते हैं। वे बड़ी-बड़ी धनराशियाँ खोते हैं और उन्हें उनकी वास्तविक मात्रा से भी अधिक बड़ी हानि प्रतीत होती है। यहाँ तक कि यदि भाग्य उनसे कुछ भी न छीने तो जो धन वे प्राप्त नहीं कर सके, उसी को वे अपनी हानि मानकर दुखी होते रहते हैं।
“लेकिन लोग तो उसे भाग्यशाली और धनी कहते हैं तथा स्वयं भी उसकी जितनी संपत्ति है, उतनी पाने की कामना करते हैं।” मैं यह मान लेता हूँ। पर उससे क्या सिद्ध होता है? इसके साथ वे दुख भी पाते हैं और ईर्ष्या का लक्ष्य भी बनते हैं। क्या तुम इससे अधिक दयनीय अवस्था की कल्पना कर सकते हो? काश, जो लोग दूसरों की संपत्ति पाने की इच्छा करते हैं, वे पहले उन्हीं धनी लोगों से पूछ लेते! जो लोग उच्च पद प्राप्त करने की दौड़ में लगे रहते हैं, वे पहले उन लोगों से परामर्श कर लेते जो राज्य के सबसे प्रतिष्ठित पदों पर पहुँच चुके हैं! तब वे शीघ्र ही अपनी इच्छाएँ बदल देते। किन्तु स्थिति यह है कि जो लोग अपनी ही सफलता की शिकायत करते हैं, वे भी और अधिक सफलता पाने के लिए उतने ही उत्सुक रहते हैं। मनुष्य अपनी समृद्धि से कभी संतुष्ट नहीं होता, चाहे वह उसे एक साथ ही क्यों न प्राप्त हो जाए। वह अपनी ही योजनाओं और अपनी ही उन्नति पर असंतोष व्यक्त करता है और सदैव यही कहता रहता है कि जो कुछ वह पीछे छोड़ आया, वही अधिक अच्छा था।
यही वह कार्य है जो दर्शन तुम्हारे लिए करेगा और मेरे विचार में यही उसका सबसे महान उपहार है तुम अपने किसी भी कर्म पर कभी पछतावा नहीं करोगे। यही सुख का वह दृढ़ आधार है जिसे कोई भी तूफ़ान डिगा नहीं सकता। किन्तु तुम इस अवस्था तक वाक्पटुता के सहारे या शब्दों के सहज प्रवाह के बल पर नहीं पहुँच सकते। उन्हें अपने मार्ग पर चलने दो। पर तुम्हारा मन स्वयं में स्थिर, संतुलित और सुसंगत होना चाहिए। तुम्हारा मन महान हो, अपने सिद्धांतों में अडिग और आत्मविश्वासी हो तथा जहाँ दूसरे लोग असंतोष से भरे रहते हैं, वहाँ वह संतोष का अनुभव करे। वह अपनी प्रगति का आकलन अपने जीवन-आचरण से करे और यह समझे कि उसके पास उतना ही सच्चा ज्ञान है, जितना वह इच्छाओं और भय से मुक्त हो चुका है।
अभी के लिए विदा
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