Wednesday, 5 August 2026

नियंत्रित स्वभाव के बारे में -- पत्र - 114

 प्रिय लूसीलियस 


यह प्रश्न बार-बार उठाया गया है कि मनुष्य के लिए संयमित (moderate) भावनाएँ रखना अधिक अच्छा है या फिर किसी भी प्रकार की भावनाएँ न रखना। हमारे दर्शन-सम्प्रदाय (स्टोइक) के दार्शनिक भावनात्मक विकारों का पूर्णतः निषेध करते हैं। जबकि पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) उन्हें केवल संयमित रखने की बात करते हैं। परंतु मुझे यह समझ में नहीं आता कि किसी रोग की थोड़ी-सी मात्रा भी कैसे स्वास्थ्यकर या उपयोगी हो सकती है। 



    डरो मत। मैं तुमसे ऐसी कोई वस्तु छीनने नहीं जा रहा जिसे तुम छोड़ना न चाहते हो। मैं तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृत्तियों के प्रति उदार और सहमत रहूँगा। जीवन की जिन वस्तुओं को तुम आवश्यक, उपयोगी और सुखद मानते हो, उन्हें भी मैं नहीं छीनूँगा। मैं केवल उनमें जो दोषपूर्ण है, उसी को दूर करूँगा।जब मैं कामना (तृष्णा) का निषेध करूँगा, तब भी मैं तुम्हें उचित इच्छा रखने की अनुमति दूँगा ताकि तुम वही कार्य चिंता से मुक्त होकर, अधिक दृढ़ निश्चय के साथ कर सको और अपने सुखों का भी अधिक गहराई से अनुभव कर सको। यदि तुम सुखों के स्वामी रहोगे, उनके दास नहीं तो वे तुम्हें और भी सहजता से क्यों नहीं प्राप्त होंगे? 

    तुम कहोगे, “किसी मित्र के निधन पर शोक करना तो स्वाभाविक है। मेरे उचित आँसुओं को बहने का अधिकार तो रहने दो। लोगों की राय से प्रभावित होना और उनके नकारात्मक विचारों से दुखी होना भी स्वाभाविक है। यदि लोग मेरे बारे में बुरा सोचें, तो उससे भय होना भी तो सम्मानजनक है। तुम मुझे ऐसा उचित भय रखने की अनुमति क्यों नहीं देते?” किन्तु ऐसा कोई भी दोष नहीं है जिसके पक्ष में कोई न कोई तर्क देने वाला न मिल जाए। प्रारम्भ में सभी दोष संकोची और वश में प्रतीत होते हैं, परन्तु धीरे-धीरे वे बढ़ते जाते हैं और अंततः मनुष्य पर अधिकार जमा लेते हैं। यदि तुम उन्हें प्रवेश करने दोगे तो बाद में उन्हें रोक नहीं सकोगे। प्रत्येक भावनात्मक विकार आरम्भ में दुर्बल होता है। फिर वह स्वयं को उकसाता है, आगे बढ़ते-बढ़ते शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसलिए उन्हें बाहर निकालने की अपेक्षा प्रारम्भ में ही भीतर प्रवेश न करने देना कहीं अधिक सरल है। 

    कोई भी यह नहीं कहता कि सभी भावनात्मक विकारों का उद्गम किसी न किसी अर्थ में प्रकृति से नहीं होता। प्रकृति ने हमें अपने प्रति चिंता और आत्म-सुरक्षा की भावना प्रदान की है। परंतु जब हम उसी भावना को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देते हैं, तब वही दोष बन जाती है। प्रकृति ने जीवन की आवश्यक वस्तुओं के साथ सुख का अनुभव इसलिए जोड़ा है कि हम केवल सुख के पीछे न भागें बल्कि वह अतिरिक्त सुख जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं को हमारे लिए अधिक प्रिय और सहज बना दे। किन्तु यदि सुख को उसके अपने लिए ही लक्ष्य बनाकर उसका पीछा किया जाए तो वही आत्म-भोग (विलासिता) बन जाता है। इसलिए हमें चाहिए कि जैसे ही भावनात्मक विकार प्रवेश करना प्रारम्भ करें, हम उसी समय उनका प्रतिरोध करें। क्योंकि जैसा कि मैंने कहा है, उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोकना, उन्हें भीतर से निकालने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है।

    मैं सुन रहा हूँ कि तुम कह रहे हो, “मुझे कुछ सीमा तक शोक करने दो और कुछ सीमा तक भय या चिंता का अनुभव करने दो।” लेकिन तुम्हारी यह 'कुछ सीमा' निरंतर बढ़ती ही चली जाती है और जब तुम उसे रोकना चाहते हो, तब वह रुकने से इनकार कर देती है। बुद्धिमान व्यक्ति बिना विचलित हुए स्वयं पर नियंत्रण रख सकता है। वह जब चाहे अपने आँसुओं को रोक सकता है और अपने सुखों पर भी विराम लगा सकता है। परंतु हम जैसे लोगों के लिए पीछे हटना ही कठिन होता है। इसलिए हमारे लिए यही अधिक अच्छा है कि हम आरम्भ ही न करें। 

    मुझे लगता है कि पनैटियस (प्राचीन यूनान के एक प्रसिद्ध स्टोइक दार्शनिक थे) ने उस युवक को बहुत उपयुक्त उत्तर दिया था जिसने उनसे पूछा था कि क्या बुद्धिमान व्यक्ति प्रेम में पड़ता है।उन्होंने कहा, “जहाँ तक बुद्धिमान व्यक्ति का प्रश्न है, उस पर हम बाद में विचार करेंगे। परन्तु तुम और मैं, जो अभी बुद्धिमत्ता से बहुत दूर हैं, हमारे लिए तो प्रेम में पड़ने से बचना ही उचित है। क्योंकि प्रेम ऐसी अवस्था है जिसमें मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, अपने ऊपर से नियंत्रण खो बैठता है, दूसरे का दास बन जाता है और अपने आत्मसम्मान तक को भूल जाता है। यदि हमारा प्रेम स्वीकार कर लिया जाता है तो हम दूसरे के अनुग्रह से उन्मत्त हो उठते हैं। और यदि अस्वीकार कर दिया जाता है, तो उसके तिरस्कार की अग्नि में जलने लगते हैं। सहज और सफल प्रेम भी उतना ही हानिकारक है जितना कठिन और असफल प्रेम। सफलता हमें अपने आकर्षण में बाँध लेती है और असफलता हमें संघर्ष और व्याकुलता में डाल देती है। अतः अपनी दुर्बलता को पहचानते हुए हमारे लिए यही श्रेयस्कर है कि हम मन की शांति बनाए रखें। हमें अपने दुर्बल स्वभाव को न शराब के हवाले करना चाहिए, न रूप-सौंदर्य के, न चापलूसी के और न ही किसी अन्य प्रकार के प्रलोभन के।”

    मेरा कहना यह है कि प्रेम के विषय में पनैटियस ने जो उत्तर दिया था, वही सभी भावनात्मक विकारों पर समान रूप से लागू होता है। जहाँ तक संभव हो, हमें फिसलन भरी भूमि से दूर ही रहना चाहिए क्योंकि हमारे लिए तो सूखी भूमि पर भी दृढ़ता से खड़े रहना कठिन है। तुम इस विषय में स्टोइकों पर प्रायः लगाया जाने वाला वही पुराना आक्षेप करोगे, “तुम लोगों के वचन बहुत बड़े हैं और तुम्हारी अपेक्षाएँ अत्यधिक कठोर हैं। हम तो साधारण मनुष्य हैं। हम अपने आप को हर बात से पूरी तरह वंचित नहीं कर सकते। हम शोक करेंगे, पर थोड़ा-सा। हम इच्छाएँ रखेंगे, पर संयम के साथ। हम क्रोधित भी होंगे, पर इतना नहीं कि क्षमा करना ही भूल जाएँ।” क्या तुम जानते हो कि हम ऐसा क्यों नहीं कर पाते? क्योंकि हमें स्वयं इस बात पर विश्वास ही नहीं है कि हम ऐसा कर सकते हैं। 

    वास्तव में, इसके पीछे एक और कारण भी है। हमें अपने दोषों से प्रेम होता है। हम उनका त्याग करने के बजाय उनका बचाव करते हैं और उन्हें छोड़ने के स्थान पर उनके पक्ष में बहाने ढूँढ़ते हैं। मानव-स्वभाव को प्रकृति ने पर्याप्त शक्ति प्रदान की है, यदि हम उसका उपयोग करना चाहें। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी समस्त शक्तियों को एकत्रित करें और उन्हें अपने पक्ष में कार्य करने दें, अपने विरुद्ध नहीं।असमर्थता तो केवल एक बहाना है; वास्तविक कारण हमारी अनिच्छा है।

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