Friday, 7 August 2026

प्रकृति के विरुद्ध जीवन-शैली के बारे में -- पत्र - 120

 प्रिय लूसीलियस 


दिन पहले ही ढलने लगा है। उसकी अवधि कुछ कम हो गई है, फिर भी जो लोग मानो सूर्य के साथ ही उठते हैं, उनके लिए अभी भी पर्याप्त समय उपलब्ध है। यदि हम उषा से पहले ही जाग जाएँ और प्रातः का आरंभिक प्रकाश प्राप्त कर लें तो हम अपने सामाजिक कर्तव्यों को निभाने के लिए अधिक सक्षम और अधिक तत्पर होंगे। जब सूर्य आकाश में काफी ऊपर चढ़ चुका हो और हम तब भी आधी नींद में पड़े रहें तो यह लज्जाजनक है कि दिन का आरंभ दोपहर के समय करें। बहुत-से लोगों के लिए तो दोपहर भी उषा से पहले का समय ही है! कुछ लोग दिन और रात के कार्यों को ही उलट देते हैं। उनकी आँखों पर अभी तक पिछली रात की मदिरापान की खुमारी छाई रहती है और वे उन्हें तब तक नहीं खोलते, जब तक संध्या निकट नहीं आ जाती। वे उन लोगों के समान हैं, जिनका वर्णन वर्जिल ने किया है और जिन्हें प्रकृति ने हमारे पैरों के ठीक नीचे छिपा रखा है:

जब उषा, हिनहिनाते घोड़ों के साथ,
हमारे पास आती है,
तब उनके लिए संध्या का तारा,
लालिमा के साथ प्रज्वलित होता है।

इस मामले में, हालाँकि, यह पृथ्वी के गोले का वह भाग नहीं है जो हमारे भाग के विपरीत है बल्कि उनके जीवन जीने का ढंग है।



    इसी नगर में भी ऐसे ‘प्रतिपाद’ लोग हैं, ऐसे लोग, जो मार्कस कैटो के अनुसार, न तो कभी सूर्योदय देखते हैं और न सूर्यास्त। क्या तुम समझते हो कि वे जीवन जीना जानते हैं? वे तो यह भी नहीं जानते कि कब जीना चाहिए! अब जब उन्होंने स्वयं को जीवित ही कब्र में दफना लिया है तो क्या उन्हें मृत्यु से भी भय लगता है? वे रात में विचरण करने वाले पक्षियों की तरह अशुभ और भयावह हैं। यद्यपि वे अपनी अँधेरी रातें शराब और सुगंधित पदार्थों के बीच बिताते हैं, यद्यपि वे अपनी इस उलटी-पुलटी जागृति का पूरा समय अनेक प्रकार के व्यंजनों वाले भोजों की एक के बाद एक श्रृंखला में लगा देते हैं, फिर भी वे उत्सव नहीं मना रहे होते बल्कि अपने ही अंतिम संस्कार का उत्सव मना रहे होते हैं। बस इतना अंतर है कि वास्तविक मृतकों का अंतिम संस्कार दिन के समय होता है! लेकिन सच तो यह है कि सक्रिय व्यक्ति के लिए कोई भी दिन पर्याप्त लंबा नहीं होता। हमें अपने जीवन का विस्तार करना चाहिए। सक्रिय रहना ही जीवन का कार्य है और यही इस बात का प्रमाण भी है कि हम जीवित हैं। रात को छोटा करना चाहिए और उसके कुछ हिस्से को दिन में स्थानांतरित कर देना चाहिए। 

    भोजों के लिए खरीदे गए मुर्गों को अँधेरी जगह में रखा जाता है ताकि वे निष्क्रिय रहें और आसानी से मोटे हो जाएँ। बिना हिले-डुले पड़े रहने से उनके आलसी शरीर फूल जाते हैं। अँधेरे में बंद रहने के कारण उनके शरीर पर अनुपयोगी चर्बी चढ़ जाती है। लेकिन जिन लोगों ने स्वयं को अँधेरे के हवाले कर दिया है, उनके शरीर वास्तव में घृणित दिखाई देते हैं। उनका रंग रोगियों के पीलापन से भी अधिक चिंताजनक है। दुर्बलता और जर्जरता ने उनके चेहरे का रंग सफेद कर दिया है और उनके शरीर का मांस, जीवित रहते हुए भी, सड़ने लगा है। फिर भी मैं इसे उनकी सबसे छोटी समस्या कहूँगा। उनके मन में इससे कहीं अधिक अँधेरा है! भीतर से ऐसे लोग स्तब्ध और पूरी तरह धुंध से घिरे हुए हैं। अंधे लोगों से भी बदतर। आखिर किसे आँखें केवल अँधेरे में देखने के लिए मिली हैं?

    क्या तुम जानना चाहते हो कि दिन से बचने और अपने पूरे जीवन को रात में स्थानांतरित कर देने की इस विचित्र आदत की उत्पत्ति कहाँ से हुई? हमारे सभी दोष प्रकृति के विरुद्ध होते हैं। वे सभी उचित व्यवस्था को छोड़ देते हैं। आत्म-लिप्सा का लक्ष्य केवल विकृत आचरण में आनंद लेना ही नहीं होता बल्कि सीधे मार्ग से हटना और उससे जितना संभव हो उतना दूर चले जाना। अंततः ठीक उसके विपरीत स्थिति अपना लेना होता है। तुम निश्चित रूप से सहमत होगे कि भोजन से पहले शराब पीना प्रकृति के विरुद्ध है। बिना भोजन के शराब को सीधे रक्त में पहुँचाना और भोजन के लिए पहले से ही नशे में पहुँचना। फिर भी यह दोष हमारे युवकों में आम है। वे व्यायाम करने केवल इसलिए जाते हैं कि स्नानागार से बाहर निकलते ही शराब पी सकें। जबकि अभी भी उनके चारों ओर नग्न लोग होते हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि वे स्नान करते समय ही शराब पीते हैं और एक के बाद एक प्याला गरम शराब पीकर अपने शरीर से निकले पसीने को बार-बार धोते रहते हैं। भोजन के बाद या रात के भोजन के बाद शराब पीना, उनके विचार से, असभ्य लोगों का काम है। ऐसे देहाती लोगों का, जो परिष्कृत सुख का कुछ भी ज्ञान नहीं रखते। उनके अनुसार शुद्ध शराब का आनंद तभी मिलता है, जब वह भोजन के साथ न मिले और सीधे मस्तिष्क तक पहुँच जाए। खाली पेट नशे में होना ही सबसे अच्छा है!

    तुम निश्चित रूप से सहमत होगे कि पुरुषों के लिए स्त्रियों के वस्त्र धारण करना प्रकृति के विरुद्ध है। जब लोग अधिक उम्र में भी जवान और सुंदर दिखने का प्रयास करते हैं तो क्या वे प्रकृति के विरुद्ध जीवन नहीं जी रहे होते? इससे अधिक क्रूर या दयनीय और क्या हो सकता है? केवल इसलिए कि वे किसी पुरुष से यौन संबंध प्राप्त करते रहें, स्वयं कभी पुरुष न बनना! यदि उनका पुरुषत्व उन्हें इस दुर्व्यवहार से नहीं बचा सकता तो क्या परिपक्वता भी उन्हें इससे नहीं बचाएगी? तुम निश्चित रूप से सहमत होगे कि सर्दियों में गुलाब पाने की लालसा करना प्रकृति के विरुद्ध है। ठंड के मौसम में गर्म पानी से सींचकर लिली को खिलने के लिए विवश करना और सही समय पर उनके गमलों को इधर-उधर करना भी प्रकृति के विरुद्ध है। फिर उन लोगों का क्या, जो घरों की छतों पर फलदार वृक्ष लगाते हैं? उनकी छतें और कंगूरे पत्तियों से ढँक जाते हैं और उनकी जड़ें उस स्थान से भी ऊँचाई पर होती हैं, जहाँ वास्तव में वृक्षों की चोटियाँ होनी चाहिए। क्या यह प्रकृति के विरुद्ध नहीं है? क्या समुद्र में गर्म स्नानागारों की नींव रखना और यह सोचना कि सुरुचिपूर्ण ढंग से तैरने का आनंद तभी लिया जा सकता है, जब गर्म पानी का कुंड लहरों और तूफानों से घिरा हो, क्या यह भी प्रकृति के विरुद्ध नहीं है? 

    जब लोगों ने हर चीज़ को प्रकृति के विरुद्ध करने को अपना नियम बना लिया तो अंततः वे प्रकृति को पूरी तरह छोड़ देते हैं। “दिन का समय है,” वे कहते हैं, “सोने का समय है। नगर शांत हो चुका है। अब हमें व्यायाम करना चाहिए, सवारी के लिए निकलना चाहिए और दोपहर का भोजन करना चाहिए। लगभग भोर हो गई है। अब रात का भोजन करने का समय है। हमें सामान्य लोगों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। सामान्य और उबाऊ ढंग से जीवन जीना हमारे लिए अपमानजनक है। सार्वजनिक दिन को दूर हटाओ। हमारे लिए एक विशेष सुबह हो, जो केवल हमारी अपनी हो!” जहाँ तक मेरा संबंध है, ऐसे लोग पहले ही मुर्दाघर में पहुँच चुके हैं। वे अंतिम संस्कार से कितनी दूर हैं और वह भी समय से पहले होने वाले अंतिम संस्कार से। जबकि वे पहले से ही मशालों और मोमबत्तियों के प्रकाश में जीवन जी रहे हैं?

    मुझे याद है कि एक समय में बहुत-से लोग इसी तरह जीवन जीते थे, जिनमें एक पूर्व प्रेटर, अकीलियस बुता (उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी और न्यायिक अधिकारी एवं अभिजात्य वर्ग से संबंधित), भी शामिल था। उसने अपनी बहुत बड़ी विरासत पूरी तरह उड़ा दी। जब उसने सम्राट टिबेरियस के सामने अपनी आर्थिक हानि स्वीकार की तो सम्राट ने कहा, “तुम्हें जागने में कुछ देर हो गई।” जूलियस मोंटानस एक ठीक-ठाक कवि था, जो टिबेरियस से अपनी मित्रता और फिर उनके बीच हुए मतभेद, दोनों के लिए जाना जाता था। एक दिन वह अपनी रचना का पाठ कर रहा था। मोंटानस को अपनी कविताओं में सूर्योदय और सूर्यास्त का वर्णन भरना बहुत पसंद था। किसी व्यक्ति को दिन-भर उसका पाठ सुनना खल रहा था। उसने टिप्पणी की कि किसी को भी उसके काव्य-पाठ में शामिल नहीं होना चाहिए। इस पर पिनारियस नाटा ने कहा, “क्या मैं इससे अधिक उदार नहीं हो सकता? मैं तो सूर्योदय से सूर्यास्त तक उसे सुनने के लिए तैयार हूँ।” इसके बाद जब मोंटानस ने ये पंक्तियाँ पढ़ीं—

“फीबस अपनी प्रज्वलित अग्नि फैलाना आरंभ करता है,
गुलाबी आभा से दिन चमक उठता है, शोकाकुल अबाबील
अपने बच्चों को धैर्यपूर्वक भोजन कराना शुरू करती है,
उसकी कोमल चोंच हर चीखती हुई चोंच की ओर ध्यान देती है... ”

तो वारुस चिल्लाकर बोला, “बुता के सोने का समय हो गया है।” (यह वारुस रोमन अश्वारोही वर्ग का व्यक्ति था, मार्कस विनिसियस का मित्र और उच्च वर्ग के भोजों में नियमित रूप से उपस्थित रहने वाला व्यक्ति था। वह ऐसे भोजों का खर्च अपने चुटीले और विनोदी कथनों से चुकाता था।) इसके बाद, जब मोंटानस ने ये पंक्तियाँ पढ़ीं—

“अब चरवाहे अपने झुंडों को बाड़ों के भीतर बंद कर देते हैं,
अब शांतिदायक रात धरती को शांति देने लगती है...”

तो वारुस ने कहा, “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या रात पहले ही हो गई? मैं बुता के यहाँ जाकर सुबह का अभिवादन कर आता हूँ।” इस व्यक्ति की दिनचर्या का इस तरह उलट-पुलट होना जितना प्रसिद्ध था, उतना शायद ही किसी और का रहा हो। हालाँकि, जैसा कि मैंने कहा, उस समय ऐसी जीवन-शैली फैशन में थी।

    कुछ लोग इस तरह जीवन इसलिए नहीं जीते कि उन्हें रात में कोई विशेष आनंद मिलता है बल्कि इसलिए कि उन्हें कोई भी सामान्य चीज़ पसंद नहीं होती। अपराध-बोध से ग्रस्त मन के लिए प्रकाश एक बोझ होता है। जिन लोगों के लिए किसी वस्तु को चाहने या तुच्छ समझने का एकमात्र आधार यह है कि उसकी कीमत कितनी है, उनके लिए जो चीज़ निशुल्क मिलती है, उसका कोई मूल्य नहीं होता। इसके अतिरिक्त, ऐश्वर्य में डूबे लोग चाहते हैं कि जब तक वे जीवित रहें, उनके जीवन की चर्चा होती रहे क्योंकि जब उनके बारे में बातें होना बंद हो जाती हैं तो उन्हें लगता है कि उनकी सारी कोशिशें व्यर्थ जा रही हैं। इसलिए वे लगातार कुछ न कुछ ऐसा करते रहते हैं जिससे लोगों में उनके बारे में चर्चा शुरू हो जाए। बहुत-से लोग अत्यधिक धन खर्च करते हैं और बहुत-से लोग रखैलें रखते हैं। इस वर्ग के लोगों के बीच अपना नाम बनाने के लिए तुम्हें विलासिता के साथ-साथ कुख्याति को भी अपनाना पड़ता है। यह एक व्यस्त नगर है। सामान्य दुर्गुणों पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।

    मैंने एक बार एल्बिनोवानस पेडो को, जो बहुत ही मनोरंजक ढंग से किस्से सुनाने वाला व्यक्ति था, यह बताते हुए सुना था कि वह सेक्स्टस पापिनियस के घर के ऊपर रहता था। सेक्स्टस पापिनियस भी उन लोगों में से था जो दिन के प्रकाश से बचते थे। “रात के लगभग तीसरे पहर,” उसने कहा, “मुझे कोड़ों की आवाज़ सुनाई देती है। मैं पूछता हूँ कि स्वामी क्या कर रहे हैं? उत्तर मिलता है कि वे हिसाब-किताब कर रहे हैं। रात के लगभग छठे पहर मुझे जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ सुनाई देती है। मैं पूछता हूँ कि क्या हो रहा है? मुझे बताया जाता है कि वे अपनी आवाज़ का अभ्यास कर रहे हैं। रात के लगभग आठवें पहर मैं पूछता हूँ कि पहियों की यह आवाज़ किस बात की है? मुझे बताया जाता है कि वे सवारी के लिए बाहर गए हैं। भोर होते-होते लोग इधर-उधर भाग-दौड़ करने लगते हैं, दासों को बुलाया जा रहा है, प्रबंधक और रसोइए हंगामा मचा रहे हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या बात है? उत्तर मिलता है कि स्नान करके निकलने के बाद उन्होंने मधु-मिश्रित मदिरा और दलिया माँगा है।” किसी ने कहा, “लगता है उनका रात का भोजन पूरे दिन चलता रहा होगा।” “बिल्कुल नहीं,” पेडो ने कहा। “वह बहुत मितव्ययी जीवन जीते थे। रात के अलावा कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे।” इसलिए जब कुछ लोग सेक्स्टस को कंजूस कहते थे तो पेडो ने कहा, “तुम यह भी कह सकते हो कि वह दीपक की रोशनी पर जीवन बिताता है।” 

    तुम्हें दुर्गुणों के इतने अलग-अलग रूप देखकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। दुर्गुण अनेक प्रकार के होते हैं। उनके रूपों को गिनना या उनके सभी प्रकारों को समझ पाना बहुत कठिन है। उचित और सदाचारी जीवन की केवल एक ही दिशा होती है। लेकिन दुराचार अनेक रूप धारण करता है और हर बार किसी नई दिशा में मुड़ जाता है। चरित्र के साथ भी यही बात है। जब लोग प्रकृति का अनुसरण करते हैं तो वे सरल, सहज और अधिकांशतः एक-दूसरे के समान होते हैं। जो लोग विकृत मार्ग अपना लेते हैं, वे दूसरों से भी बहुत भिन्न हो जाते हैं और स्वयं अपने भीतर भी विरोधाभास से भर जाते हैं। 

    लेकिन मेरी राय में इस बीमारी का मुख्य कारण सामान्य जीवन के प्रति घृणा है। जिस प्रकार ऐसे लोग अपने पहनावे, अपने भोजों की भव्यता और अपनी सजी-धजी गाड़ियों के द्वारा स्वयं को दूसरों से अलग दिखाते हैं, उसी प्रकार वे अपने समय को व्यवस्थित करने के तरीके में भी स्वयं को एक अलग वर्ग का बनाना चाहते हैं। जिन लोगों को अपने गलत कामों का पुरस्कार कुख्याति के रूप में मिलता है, वे सामान्य अपराध करना नहीं चाहते। यही, यदि ऐसा कहा जाए तो उलटे ढंग से जीवन जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति का उद्देश्य है। इसलिए, प्रिय लूसीलियस, हमें उस मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए जिसे प्रकृति ने हमारे लिए निर्धारित किया है और उससे विचलित नहीं होना चाहिए। प्रकृति का अनुसरण करो। सब कुछ सरल तथा सहज हो जाता है। उसके विरुद्ध संघर्ष करो। तुम उस नाविक की तरह जीवन बिताओगे जो धारा के विपरीत नाव खेने का प्रयास करता है।


अभी के लिए विदा 

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