Thursday, 6 August 2026

प्राकृतिक संपदा के बारे में -- पत्र - 117

 प्रिय लूसीलियस 


हर बार जब मुझे कोई नई बात समझ में आती है तो मैं यह प्रतीक्षा नहीं करता कि तुम कहो, “उसे साझा करो!” मैं स्वयं ही उसे तुम्हारे साथ साझा कर देता हूँ। क्या तुम जानना चाहते हो कि मैंने क्या खोज निकाली है? अपना बटुआ निकालो। यह अत्यंत लाभदायक सौदा है। मैं तुम्हें सिखाने जा रहा हूँ कि सबसे शीघ्र और सरल तरीके से धनवान कैसे बना जा सकता है। निश्चय ही अब तुम इसे सुनने के लिए उत्सुक हो। तुम्हारी उत्सुकता उचित भी है। मैं तुम्हें अपार संपत्ति प्राप्त करने का एक सीधा और छोटा मार्ग बताऊँगा। लेकिन इसके लिए तुम्हें एक वित्तीय सहायक की आवश्यकता होगी। कोई भी व्यापार आरंभ करने के लिए तुम्हें ऋण लेना पड़ता है। परंतु कृपया किसी बिचौलिए के माध्यम से नहीं। मैं नहीं चाहता कि दलाल तुम्हारे विषय में इधर-उधर बातें बनाते फिरें। मेरे पास तुम्हारे लिए एक ऐसा ऋणदाता पहले से तैयार है जिसकी अनुशंसा कैटो द एल्डर (Cato the Elder) ने अपने प्रसिद्ध वचन में की है, “तुम्हें उधार स्वयं अपने ही पास से लेना चाहिए।” 



    चाहे वह राशि कितनी ही थोड़ी क्यों न हो, यदि हमें अपनी आवश्यकता की वस्तु अपने ही भीतर से मिल जाए तो वही पर्याप्त है। प्रिय लूसीलियस, किसी वस्तु की इच्छा न करना, उसे प्राप्त कर लेने के समान ही है। दोनों का परिणाम एक ही होता है। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य चिंता से मुक्त रहता है। मैं तुम्हें यह नहीं कह रहा कि तुम अपनी प्रकृति का दमन करो क्योंकि प्रकृति अडिग है, उसे जीता नहीं जा सकता। वह अपना उचित अधिकार अवश्य माँगती है। बल्कि तुम्हें यह समझना चाहिए कि जो कुछ प्रकृति की आवश्यकताओं से अधिक है, वह केवल एक अतिरिक्त अनुग्रह है, आवश्यकता नहीं। मुझे भूख लगी है। इसलिए मुझे भोजन करना चाहिए। प्रकृति को इससे कोई सरोकार नहीं कि रोटी मोटे आटे की है या अत्यंत महीन आटे से बनी हुई है। उसका उद्देश्य पेट को स्वाद देना नहीं बल्कि उसे भरना है। मुझे प्यास लगी है, पर प्रकृति को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मैं निकटतम जलाशय का पानी पीता हूँ या बर्फ के ढेर में शीतल किया हुआ जल। प्रकृति की केवल एक ही माँग है, प्यास बुझनी चाहिए। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि मेरा पात्र सोने, क्रिस्टल या अकीक (सिलिका क्वार्ट्ज का एक प्रकार है, जिसकी पहचान इसकी रंग-बिरंगी परतों से बनी होती है) का बना है या वह केवल टाइबर (इटली के शहर का नाम) का साधारण मिट्टी का प्याला है अथवा मैं अपनी हथेली को ही पात्र बना लूँ। हर वस्तु के अंतिम उद्देश्य पर दृष्टि रखो, तब तुम उसकी अनावश्यक सजावट और अतिरिक्त बातों का मोह छोड़ दोगे। जब भूख मुझे पुकारती है तो मेरा हाथ निकट उपलब्ध भोजन की ओर बढ़ना चाहिए। भूख ऐसी अवस्था है कि जो भी भोजन मिल जाए, वही स्वीकार्य हो जाता है। भूखा व्यक्ति किसी भी खाद्य पदार्थ को अस्वीकार नहीं करता। क्या अब भी तुम यह जानने को उत्सुक हो कि मुझे किस बात पर इतना आनंद हो रहा है? मुझे यह उत्कृष्ट वचन प्राप्त हुआ है, “बुद्धिमान व्यक्ति प्राकृतिक संपदा का सबसे सूक्ष्म अन्वेषक होता है।”

    तुम इसका उत्तर यह कहकर देते हो, “यह तो बहुत निराशाजनक निकला। क्या तुम सचमुच गंभीर हो? मेरे पास तो धन तैयार रखा था। मैं सोच रहा था कि व्यापार करने के लिए किस स्थान की यात्रा करूँ, कौन-सा सार्वजनिक ठेका प्राप्त करूँ या किस प्रकार का माल खरीदकर व्यापार करूँ। यह तो छल हुआ कि अपार धन का वचन देकर तुम मुझे निर्धनता का पाठ पढ़ाने लगे।” तो क्या तुम्हारे विचार में वह व्यक्ति निर्धन है, जिसे किसी वस्तु का अभाव नहीं है? “नहीं,” तुम उत्तर देते हो, “लेकिन यह उसकी अपनी वृत्ति और अपनी स्थिति को स्वीकार कर लेने के कारण है, भाग्य के कारण नहीं।” तो क्या तुम किसी व्यक्ति को इसलिए धनवान नहीं मानोगे कि उसकी संपत्ति उससे छीनी नहीं जा सकती? बताओ, तुम क्या चाहोगे, बहुत अधिक धन, या जितना पर्याप्त हो उतना? जिसके पास बहुत अधिक धन होता है, वह और अधिक चाहता है। यही इस बात का प्रमाण है कि उसके पास अभी भी पर्याप्त नहीं है। लेकिन जिसके पास पर्याप्त है, उसने वह वस्तु प्राप्त कर ली है जिसे धनी लोग कभी प्राप्त नहीं कर सकते, एक सीमा, जहाँ पहुँचकर और अधिक पाने की इच्छा समाप्त हो जाती है। या क्या तुम इसे इसलिए धन नहीं मानते कि इसके कारण किसी व्यक्ति का कभी सर्वस्व नहीं छीना गया? केवल इसलिए कि इसके लिए किसी पुत्र ने अपने पिता को या किसी पत्नी ने अपने पति को विष नहीं दिया? केवल इसलिए कि यह युद्ध के समय भी सुरक्षित रहता है और शांति के समय भी निश्चिंत? केवल इसलिए कि इसका स्वामी होना न तो जोखिमपूर्ण है और न ही इसका प्रबंधन कष्टदायक?

    “लेकिन केवल इतना होना कि न ठंड लगे, न भूख लगे और न प्यास लगे, यह तो बहुत ही तुच्छ संपत्ति हुई।” किन्तु स्वयं जुपिटर के पास भी इससे अधिक कुछ नहीं है। जो पर्याप्त है, वह कभी बहुत थोड़ा नहीं होता। जो अपर्याप्त है, वह कभी बहुत अधिक नहीं हो सकता। डेरियस (प्राचीन फारसी सम्राट का मूल नाम) और भारत को जीत लेने के बाद भी सिकंदर निर्धन ही बना रहता है। क्या यह सत्य नहीं है? वह अभी भी अपने अधिकार में लेने के लिए नए-नए राज्यों की खोज करता फिरता है। वह अज्ञात समुद्रों का अन्वेषण करता है, महासागर में नए बेड़े भेजता है और मानो स्वयं संसार की सीमाओं को भी भेद डालना चाहता है। जिससे प्रकृति संतुष्ट हो जाती है, उससे मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। देखो, एक ऐसा व्यक्ति जिसने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, फिर भी उसे और अधिक की लालसा है। हमारा मन कितना अंधा है! जैसे ही मनुष्य आगे बढ़ने लगता है, वह भूल जाता है कि उसने आरंभ कहाँ से किया था। उसने एक छोटे-से, नगण्य प्रदेश के अधिकार के लिए संघर्ष आरंभ किया था और पृथ्वी के अंतिम छोर तक पहुँच गया। फिर भी अब वह इसलिए असंतुष्ट है कि उसे उसी संसार के भीतर लौटना पड़ रहा है, जो पूरी तरह उसी का हो चुका है। 

    धन ने आज तक किसी को वास्तव में धनी नहीं बनाया। वह तो केवल जिसे भी स्पर्श करता है, उसके भीतर और अधिक धन पाने की लालसा उत्पन्न कर देता है। तुम पूछते हो कि इसका कारण क्या है? कारण यह है कि जितना अधिक किसी के पास होता है, उतना ही अधिक वह और प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। संक्षेप में, तुम उन लोगों में से किसी एक को चुन लो, जिनके नाम क्रैसस (प्राचीन रोम के अत्यंत धनी और प्रभावशाली राजनेता) और लिसिनस (रोमन परंपरा में अत्यधिक धनवान व्यक्तियों में गिना जाता था।) के साथ गिने जाते हैं। उसे हमारे सामने खड़ा करो और उससे कहो कि वह अपनी सारी संपत्ति का हिसाब बताए, जो कुछ इस समय उसके पास है और जिसकी वह अभी भी आशा लगाए बैठा है, सब कुछ जोड़कर। यदि तुम मेरा मत स्वीकार करो तो मैं कहूँगा कि वह व्यक्ति निर्धन है। और यदि तुम्हारे अपने मत से भी देखा जाए तो वह किसी भी समय निर्धन हो सकता है। किन्तु जिसने अपनी आवश्यकताओं को प्रकृति की माँगों के अनुरूप बना लिया है, वह न केवल निर्धनता की अनुभूति से मुक्त हो जाता है, बल्कि निर्धन हो जाने के भय से भी परे पहुँच जाता है। फिर भी, वास्तव में अपनी संपत्ति को प्रकृति की सीमा तक सीमित रखना अत्यन्त कठिन है। यहाँ तक कि जिस व्यक्ति को हम आवश्यकताओं की सीमा तक ले आए हैं, जिसे तुम निर्धन कहते हो, उसके पास भी उसकी आवश्यकता से कुछ अधिक अवश्य होता है।

    किन्तु लोगों की आँखें धन के आकर्षण से अंधी और मोहित हो जाती हैं। जैसे जब किसी धनी व्यक्ति के घर से सिक्कों के ढेर प्रदर्शन के लिए जुलूस में ले जाए जाते हैं। जब उसके भवन की छत तक सोने से जड़ी होती है। जब उसके घरेलू सेवक या तो उनके स्वाभाविक सौंदर्य के कारण चुने जाते हैं या इस प्रकार सजाए जाते हैं कि वे देखने वालों का ध्यान आकर्षित करें। ऐसी सारी समृद्धि का उद्देश्य केवल लोगों की दृष्टि अपनी ओर खींचना होता है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति को हमने जनसमूह की दृष्टि और भाग्य के उतार-चढ़ाव से अलग कर दिया है, उसका सुख उसके भीतर निवास करता है। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जिनके मन में दयनीय निर्धनता ही धन का रूप धारण कर लेती है, तो उनके पास धन उसी प्रकार होता है, जैसे हम कहते हैं कि हमें बुखार है। जबकि वास्तव में बुखार ने ही हमें अपने वश में कर रखा होता है। हम प्रायः इसे उलटकर कहते हैं, “बुखार ने उसे जकड़ रखा है।” उसी प्रकार हमें यह भी कहना चाहिए, “धन ने उसे अपने वश में कर रखा है।”

    मैं तुम्हें इससे बढ़कर कोई और उपदेश देना नहीं चाहता और न ही ऐसा कोई उपदेश है जिसे बार-बार सुनने की आवश्यकता इससे अधिक हो। हर वस्तु का मूल्यांकन अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं के आधार पर करो। ये आवश्यकताएँ या तो बिना किसी खर्च के पूरी हो जाती हैं, या बहुत थोड़े खर्च में। केवल इतना ध्यान रखो कि इन प्राकृतिक आवश्यकताओं को अपने दुर्गुणों के साथ मत मिला देना। क्या तुम यह पूछते हो कि जिस मेज़ पर तुम्हारा भोजन परोसा जा रहा है, वह कैसी होनी चाहिए या चाँदी के बर्तनों की गुणवत्ता कैसी हो या क्या तुम्हारे सेवक रूपवान और जोड़े के रूप में चुने गए हों, जिनकी कोमल त्वचा लोगों का ध्यान आकर्षित करे? प्रकृति को भोजन के अतिरिक्त और किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती। यदि तुम्हारा कंठ प्यास से सूख रहा हो तो क्या तुम स्वर्ण-पात्र की माँग करोगे? यदि तुम भूख से व्याकुल हो तो क्या तुम मोर और टर्बट (एक उत्कृष्ट समुद्री मछली) के अतिरिक्त हर प्रकार के भोजन को तुच्छ समझोगे? 

    भूख महत्त्वाकांक्षी नहीं होती। उसका उद्देश्य केवल इतना होता है कि वह शांत हो जाए। उसे इससे कोई विशेष सरोकार नहीं कि वह किस वस्तु से शांत होती है। इसके बाद जो कुछ आता है, वह केवल उस दयनीय विलासप्रियता की यातना है, जो तृप्त हो जाने के बाद भी भूख को फिर से उकसाने के उपाय खोजती है। जो पेट को भरने के बजाय उसे ठूँसने का प्रयत्न करती है; जो पहली बार पीने से शांत हो चुकी प्यास को फिर से जगाना चाहती है। 

    इसीलिए होरेस (प्राचीन रोम के महानतम गीतिकवियों में से एक थे) ने बिल्कुल ठीक कहा है कि प्यास को न तो पात्र की चिंता होती है और न ही उसे परोसने वाले की सुघड़ता की। यदि तुम्हें यह महत्वपूर्ण लगता है कि तुम्हें पानी परोसने वाले दास-बालक के बाल घुँघराले हों और जिस पात्र से तुम पी रहे हो वह किसी पारदर्शी बहुमूल्य पदार्थ का बना हो तो समझ लो कि तुम्हें वास्तव में प्यास नहीं लगी है। प्रकृति ने हमें जो अनेक वरदान दिए हैं, उनमें यह सबसे श्रेष्ठ है कि वास्तविक आवश्यकता कभी नखरे नहीं करती। केवल अनावश्यक वस्तुएँ ही चुनाव की माँग करती हैं, “यह पर्याप्त अच्छा नहीं है, वह बहुत साधारण है, यह मेरी आँखों को अच्छा नहीं लगता।” इस संसार के सृष्टिकर्ता और हमारे जीवन के नियमों के विधानकर्ता ने हमारी व्यवस्था इस प्रकार की है कि हमारा भली-भाँति पालन-पोषण हो, किन्तु हमें विलासिता का अभ्यस्त न बनाया जाए। हमारे कल्याण के लिए जो कुछ आवश्यक है, वह सब सहज ही उपलब्ध है किन्तु विलासिता की वस्तुएँ केवल कष्ट, परिश्रम और दुःख के मूल्य पर ही प्राप्त होती हैं। 

    अतः आओ, हम प्रकृति के इस वरदान का लाभ उठाएँ और इसे उसके श्रेष्ठतम उपहारों में से एक मानें। हम यह स्वीकार करें कि प्रकृति विशेष रूप से इस कारण हमारी कृतज्ञता की अधिकारी है कि जब हम आवश्यकता के कारण किसी वस्तु की इच्छा करते हैं, तब उसके चयन को लेकर हम नखरे नहीं करते।


अभी के लिए विदा 

   

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