Sunday, 8 January 2017

ज़ोया का मातम

(इस साल की यह पहली पोस्ट उन लड़कियों के लिए है जो अपने अंदर की चाहतों को, जो उनकी ख़ालिस रूह भी है, को घर-परिवार, समाज और दुनिया के लिए न सिर्फ़ दबाती हैं बल्कि उनका क़त्ल भी करती हैं। मैं इस साल कुछ इसी तरह के अहसास को लिखने की कोशिश करूंगी जिन पर हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते। मैं उन्हें हर लड़की के चेहरे पर खोजने की तमन्ना रखती हूँ। आज पहली कोशिश की है। बताइएगा।) 



नए बरस का आज आठवाँ दिन है। घड़ी में समय की उम्र दोपहर के 3 बजकर 20 मिनट हो चली है। मैंने इतने दिनों से कुछ भी नहीं लिखा और न ही सोचा। भला बिना सोचे कैसे लिखूँ! बाहर शोर हो तो बिन शोर वाली जगह पर जाकर बचा जा सकता है। पर जब ख़ुद के अंदर शोर ही शोर हो तो कहीं भी ठिकाना नहीं होता। शोर का ऑरिजिन जानती हूँ पर वहाँ से कैसे निकलूँ यह नहीं जानती। शायद अभी मन भी नहीं निकलने का। ऐसा दर्द कभी हुआ ही नहीं। यह नहीं पता कि दर्द में भी मज़ा होता है। कितना अच्छा लग रहा है दर्द। दवा की ख़्वाहिश ही नहीं हो रही। न राहत की आरज़ू है। बस लग रहा है कि दिन ऐसे ही टिके रहें। मैं तो चुपचाप अपने में बह रही थी तभी ज़ोया ने मुझे झकझोर दिया। ऐसे लगा किसी ने ऊंचे पहाड़ से धक्का दे दिया।

मैंने अपनी नाराजगी जतला दी। वो गुस्से में बोली- 'तू सब बर्बाद कर रही है। भला यह सब भी कोई सोचता है!' मैंने कहा- 'इसमें क्या बुराई है? दर्द मेरा है। दुख है सो भी मेरा। इसमें तुझे क्या हो रहा है? मैं क्या सोचूँ और क्या नहीं, कम-से-कम इतना हक़ तो मेरे पास रहने दो। तुम मुझे अकेले क्यों नहीं छोड़ देतीं? तुम चली क्यों नहीं जातीं?'

वो बेहद गुस्सा हो गई और मुझे अपनी लाल लाल आँखों से देखने लगी। ऐसा लगा कि अगर उसके हाथों में चाकू हो तो मेरे सीने के पार करने में उसे पल भी नहीं लगेगा...हम दोनों में अभी यह बहस हो ही रही तभी दरवाजे पर दस्तक हो गई। दरवाज़ा लकड़ी के दो पालों वाला था। पुरानी वाली चटकनी लगी थी। दरवाज़े की, हालांकि कोई जरूरत नहीं थी पर फिर भी जमाने को देख कर अब्बा ने लगवा दी थी। ख़ैर मैंने तब भी कोई ऐतराज़ दर्ज़ नहीं करवाया। लगा कि मेरा ही भला इसमें छुपा है। थोड़ी कम रोशनी या हवा ही तो आएगी। जाने दो क्या फर्क पड़ता है। पर ज़ोया को दरवाज़ा लगने की बेहद खुशी थी। मुझे तो शक़ है कि यह रुकावट लगाने की उकसाहट अब्बा के दिमाग में उसने ही डाली होगी। न जाने कौन सी पढ़ाई पढ़ती है। इतनी किताबें पढ़ने के बाद भी मन से किसी सूखते हुए तालाब सी बातें करती हैं। खुद भी कशमकश में ही जीती है। खुश तो ऊपर से ही दिखती है। कहने को तो अब्बा की मैं ही इकलौती बेटी हूँ पर आजकल वो मुझमें से उभर कर आ जाती है। अब्बा को मुझमें ही दो बेटियाँ दिखने लगी हैं।



बहरहाल दस्तक की वजह कोई आदम नहीं था। न जाने कैसे दस्तक हुई थी! जैसे हवा ने ही की हो। हाँ शायद तेज़ हवा ही होगी। पर जब मैंने बाहर झाँककर देखा तब हवा तो मद्धम ही थी। रोशनी भी मीठी ही लगी। फिर ऐसा कौन था जिसने मीठी खटखटाहट की थी। ज़ोया को इस बार भी अच्छा नहीं लगा। उसने कहा कि अंदर से दरवाज़े की चटकनी ठीक से लगा कर रखूँ। इतनी मज़बूती से दरवाज़ा लगाऊँ कि बाहर से देखने वाले को लगे जैसे अंदर कोई नहीं रहता। कोई ज़रूरत नहीं दरवाज़ा खोल कर जश्ने बहारा की नुमाइश की जाये। मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा- 'अंदर ऐसा है ही क्या जो जश्ने बहारा तुम्हें दिखता है, क्या सांस भी न ली जाए? इंसान होने का मतलब है क्या तुम्हारी नज़रों में?'

हम दोनों में तूतू-मैंमैं शुरू हो गई। मैंने सोच लिया था कि ज़ोया से पीछा आज छुड़ा ही लूँगी। इसने कई बरसों से मुझे चैन से जीने नहीं दिया है। अम्मी अब्बा की ये लाड़ली बनी फिरती है। पर नक़ाब है। इसका अस्तित्व मेरे बिना नहीं है। झूठ को जीती है। अपने को भी मारती है और चाहती है कि दूसरा भी इसकी तरह मरे। ज़ोया को मेरी बातें और सवाल अंदर तक चोट दे रहे थे। वो अच्छी तरह से तिलमिलाई हुई थी। मैंने उसके चेहरे पर हिंसक होने की निशानियाँ देख ली थीं। पर न जाने वो कुछ न बोली और अपने पर क़ाबू करते हुए पल में ग़ायब हो गई। मुझे उसके जाने से राहत मिली। मैं अक्सर उसकी लाग लपेट वाली बातों का हिस्सा रही हूँ और कभी इंकार तो किया ही नहीं। मेरा ही हम साया है सो उसे नाराज़ नहीं किया कभी। पर अब वो मुझपर अपने को थोपती है। हावी होती है। मुझे कुफ़्त होती है।

दस्तक के बाद दरवाज़ा हल्का सा खुला था। रोशनी पूरे घर में छा गई थी। ऐसी महक फैली हुई थी जैसे बहुत से मोगरे के फूल एक साथ सुबह सुबह खिले हों। रोशनी में हल्की गरमाई भी थी जिससे कमरे के अंदर की शीलन और चिपचिपाहट धीरे-धीरे सूख रही थी। इस अहसास को मेरा रोम-रोम अपने अंदर सोख रहा था। मुझे मालूम चल रहा था कि इंसान बनना क्यों खुशकिस्मत वाली बात है। मैं इसी महकदार अहसास को मन में लिए न जाने कब सो गई।

दिन के बाद शाम ही आती है। यही दस्तूर है। लेकिन मैंने उल्टा देखना शुरू कर लिया था। मैं शाम के बाद दिन और सुबह को क्रम समझने लगी थी। अंधरे से भी मुझे प्यार हो चुका था। कई महीने गुज़रे चुके थे। ज़ोया का कोई आता पता नहीं था। मुझे तो खुशी ही थी कि अच्छा है उसका आना जाना बंद हो गया। उसके न रहने से हर जगह एक संतुलन ही दिखता था और है। वो जब सामने नहीं रहती तो अब्बा के कान भरने वाला भी कोई नहीं रहता। चैन ओ अमन होता है।
 
एक छुट्टी के रोज़ मैं अपने कमरे को दुरुस्त करते हुए गीत गा रही थी। तभी हाथ में कुछ महकी हुई चिट्ठियाँ आ लगीं। मेरे पूरे बदन में थरथराहट सी दौड़ गई। मैंने अपने कानों से आवाज़ों को देखा, जांचा और परखा कि कोई आसपास तो नहीं। क्योंकि मेरी नज़रें तो चिट्ठियों पर थी। मुझे वही महक आई जो कुछ महीने पहले दरवाज़े के खुलते वक़्त रोशनी के साथ कमरे में फैल गई थी। वही मोगरे वाली। मैं चिट्ठियों को एक टेबल पर रख धूल झाड़ने के काम में लग गई। काम कर के अपने लिए एक कप चाय बनाई। घर में कोई नहीं था इसलिए आज़ादी का बेहतरीन अहसास मन में घूम रहा था। चाय का कप टेबल पर रखते हुए मैंने चिट्ठियों को मीठी नज़र से मुसकुराते हुए देखा। कुछ ही पल में एक चिट्ठी मेरे हाथों में थी। न जाने कौन सा इत्र था जो मेरे रोम रोम में समा रहा था। मैंने चिट्ठी खोली और पढ़नी शुरू कर दी।...

 अभी पहली पंक्ति के रस को पीया ही था तब तक न जाने कहाँ से ज़ोया धमक पड़ी। उसने गुस्से में मेरे हाथों से चिट्ठी खींच ली। मैंने भी गुस्से में उससे कहा- 'पागल हुई जाती हो क्या? दिमाग नहीं रखती कि किसी की निज़ी चिट्ठी को नहीं लिया जाता।'

वो तो जैसे फूंफकार रही थी। डंसने के लिए तैयार थी। उसने गुस्से की नज़रों से कहा- 'तूने अब्बा की इज्जत का ख़याल नहीं रखा। बदनामी का गुल ऐसे खिला रही है कि गली मोहल्ले में तेरी ही चर्चा चल रही है। अपने दुपट्टे को ऐसा लहरा आई है कि हर कोई दूसरा लड़का इसकी छाया को बेताब है। कुछ तो ख़याल रखा होता कि तू एक लड़की है। अपना ही सोच रही है। ज़ाहिल कहीं की! पढ़ाई का असर भी नहीं तेरे पास। जाने क्या आग लगी तेरे बदन में।' ...वो बोले जा रही थी। मैंने उसे बहुत कोशिश की अनसुना कर ने की। मैंने कर भी दिया। पर वह हिंसक हो गई और अचानक मेरी बेशकीमती दौलत पर हमला बोल दिया। उसने टेबल से चिट्ठियों पर एक झपट्टा मारा और रसोई घर की तरफ़ भाग निकली। मैं ज़ोया चिल्लाते चिल्लाते उसके पीछे हो ली। मेरा पारा चढ़ चुका था। मैं अपने आपे में नहीं थी। फिर भी मैंने उसके आगे चिट्ठियों के लिए मिन्नतें कीं।

उसने पास में पड़ी माचिस से गैस चूल्हा जला लिया। मैं, 'ज़ोया मेरी चिट्ठियाँ लौटा दो कहती रही।' उसने मुझे दोनों हाथों से सामने की दीवार पर धक्का दे दिया। मैंने संभलने की कोशिश की फिर भी मैं दीवार पर जा लड़ी। मेरी दोनों कुहनियों पर ज़ोरदार चोट लगी। तब भी मैं उठी और ज़ोया की तरफ झपटी। मेरी फुर्ती तेज़ साबित नहीं हुई थी। उसने चिट्ठियों को गैस पर बेदर्दी से झोंक दिया था। मैं अम्मी अब्बा के नाम से भी चिल्लाई। सोचा क्या पता कहीं से आ जाएँ और ज़ोया को रोक दें। पर वहाँ कोई नहीं था तो आता कौन! मेरी चिट्ठियों से चमकीली आग निकली और काले धुएँ के साथ उन्हें काले पेपर-पापड़ में तब्दील कर गई। मैं अब उबल रही थी। मैंने ज़ोया को ज़ोर से धक्का दिया। उसका सिर बर्तन वाली दीवार से टकरा गया। इस बीच बर्तनों के गिरने की तेज़ आवाज़ हुई। लेकिन मुझमें सब्र नहीं था। मैं ज़ोया को यह बतला देना चाहती थी कि उसने बहुत बड़ा ज़ुर्म किया है और उसे इसकी सज़ा मिलेगी।

पर वह कम नहीं है। उसने बड़ी पक्की परवरिश का खून दौड़ता है। उसे इज्ज़त और बेइज्ज़त जैसे शब्दों का बड़ा ख़याल रहता है। उसके मुताबिक़ मैंने मुहब्बत कर के बड़ा पाप किया है। मुझे इस बात का कतई हक़ नहीं कि मैं इस तरह से परवाज़ भरूँ। उसने अपने माथे को बाएँ हाथ से छूआ तो खून लिपट आया। उससे अपना खून देखा न गया। उसका बहता खून देख कर इस बीच मेरा दिल पसीज गया। मैं उसके पास उसे देखने दौड़ी तब तक उसने चाकू से मुझपर हमला कर दिया। वो उठी और मेरे पेट पर कई चाकू से वार किए। मुझे पता था कि अब मैं मर जाऊँगी। मैं कमजोर थी। ज़ोया ख़तरनाक। उसने बचपन से कट्टर ख़याल पाये हैं और मैंने ख़यालों की कट्टरता को कभी अपनाया ही नहीं। मैंने रुई से भी हल्के अहसासों को जीना चाहा था पर ज़ोया की नज़र में यह गुनाह से कम न था। मेरा जिस्म ज़मीन पर गिर चुका था। रसोई में खून था। मैंने दर्द से जो आँखें बंद की तो वापस न खुलीं।

दूसरी तरफ़ ज़ोया खुश थी कि उसने एक बहकी हुई लड़की और तय नियमों को न मानने वाली रूह को शरीर से बाहर कर दिया था। उसने मेरी लाश को घर के पीछे खाली पड़ी ज़मीन में दफन कर दिया। ज़ोया में दिली और जिस्मानी ताक़त हद से ज़्यादा रही है। इसलिए उसको इस काम में कोई दिक्कत नहीं आई। लगभग दो घंटे में उसने मेरी सारी निशानियों को ख़त्म कर दिया था। कुछ बचा ही नहीं था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि रसोई में किसी का क़त्ल किया गया है।

अगले रोज़ अम्मी और अब्बा आए तब तक ज़ोया नॉर्मल बन गई थी। अम्मी को कुछ शक़ भी हुआ कि ज़ोया के मिजाज़ से मैं ग़ायब हूँ पर अब्बा ने कहा कि लड़की हमारी एकदम दुरुस्त है। तुम नाहक़ ही चिंता करती हो। शाम के खाने पर भी मैं ज़ोया के अंदर नहीं दिखी। अब्बा ने कहा कि पढ़ाई का असर बच्ची के दिमाग़ पर काफी हो गया है। आराम करेगी तब ठीक हो जाएगी। पर अम्मी का शक़ है कि जाता नहीं। उन्हें रसोई में खून की गंध लगी थी। सो वो रात को ज़ोया के पास आ गईं। वो अपने तई कुछ तफ़तीश करना चाह रही थीं। ज़ोया पढ़ाई के टेबल के साथ बैठी थी। अंधेरे में। अम्मी ने पास जाकर ज़ोया के सिर पर हाथ रखा और मैं फफक फफक रो पड़ी। मैंने अम्मी को बताया कि ज़ोया ने आपकी ग़ैर-हाज़िरी में मेरा क़त्ल कर दिया था। अम्मी को समझ नहीं आया कि ज़ोया को आख़िर हो क्या गया है।  


                                                            पिकासो की एक पेंटिंग

कुछ दिनों बाद अब्बा गुलाब के कुछ कलम खरीद लाये और वहीं लगा दिया जहां मैं दफ्न थी। मुझे सुकून मिला। मुझे ठंडक का अहसास हुआ। अम्मी ने बड़े जतन से उन नन्हें पौधों की देख रेख की। उनमें गुलाब की कलियाँ आने लगी थीं। सब ठीक चल रहा था। अब ज़ोया का बर्ताव भी बदल गया था। वह शांत रहती थी मानो किसी गुनाह के लिए अफ़सोस में जीती हो। अम्मी उस पर ग़ौर किया करती थीं। 

एक रात अम्मी ने अपनी डायरी में दर्ज़ किया- 'ज़ोया, पीर के रोज़ अंधेरे में उन गुलाबों को अपने आसुओं से सींच रही थी। न जाने मेरी इकलौती बच्ची को कौन से साये ने घेर लिया है! दिन भर कुढ़ती है। जैसे उसने किसी का क़त्ल कर दिया हो। गुलाब के पौधों के पास ऐसे शांत होकर बैठती है जैसे किसी अपने के मरने के ग़म का मातम मना रही हो।...मैंने ज़ोया के अब्बा से दरगाह पर चादर चढ़ाने को कह दिया है। मैं तो चाहती हूँ कि हमारी बच्ची के सिर से जो भी बला है जल्दी चली जाये...!'    

    

Thursday, 29 December 2016

दंगल का मंगल

मैं जब घर वापस आ रही थी तब मन में एक जुनून मुझे संक्रमित कर चुका था। मैं फ्लॉप फिल्म के हिट गाने जैसा महसूस का रही थी। कल दूसरी बार सिनेमा हॉल में फिल्म देखी। हम तीन दोस्त थे। हम फ़िल्म देखने के पहले खुश थे और फ़िल्म देखने के बाद ज़्यादा खुश थे। हम खुशमिजाज़ी हैं। इसलिए हज़ार बार झगड़ा होने के बाद भी कोई गिला-शिकवा नहीं करता। ख़ैर, पोस्ट दोस्ती के बारे में नहीं है। आपके भी ऐसे दोस्त होंगे ही।

आमिर खान की फिल्में देखने के बाद आप कुछ न कुछ कहने की अवस्था में आ ही जाते हो। इसलिए मैं भी कह ही रही हूँ कि फ़िल्म मुझे बेहद अच्छी लगी। हाँ, नारीवादियों को मुझपर गुस्सा आ सकता है। वे कहेंगे और कहेंगी कि-'तुम जैसे लोगों ने ही एक औरत को उसके अहसासों और तमन्नाओं को समझने में भूल की है। तुम जैसे ही औरतवाद को सपोर्ट नहीं करते...।' वैसे एक बात बोलूँ मुझे इसकी परवाह भी नहीं कि मुझे अब कोई गाली दे या धोखेबाज़ कहे। कह लो यार! मैंने आपके मुंह पर टेप नहीं लगाई। पर मुझे भी तो अपनी कह लेने दो।

सिनेमा हॉल में लगभग 12:45 पर प्रवेश शुरू हो गया था। मुझे लगा था कि बैठते ही फ़िल्म शुरू हो जाएगी। पर ऐसा हुआ नहीं दिल दिमाग को भाले की तरह चीरती हुई आवाज़ में कई फिल्मी और व्यावसायिक विज्ञापन दिखाये गए जिस पर कि मेरा मुंह तो नहीं, पर मन जरूर सूज गया था। भला फ़िल्म देखने के पैसे दे रही हूँ और ये घटिया विज्ञापन दिखा रहे हैं जिनमें मेरी तो कोई रुचि फिलहाल बिलकुल नहीं थी। मुझे कसम से वहाँ बैठे बैठे मन में एक चिट्ठी संबन्धित मिनिस्टरी (मंत्रालय) को लिखने का जुझारू खयाल आ गया था। यह क्या बात है कि आप लोग फ़िल्म के पैसों में अपनी कमाई कर रहे हो। ठीक है दिखाओ पर जो मुनाफ़ा आप कमा रहे हो उसे केशलेस ट्रान्सफर से मेरे अकाउंट में भी डालो। मैं पक्का एक लिखूँगी चिट्ठी। रुक जाइए कुछ दिन।




पोस्ट इस चिट्ठी पत्री पर भी नहीं है। मेरे दिमाग में एक ही समय में ढेरों खयाल आते और जाते हैं। उन्हें लिखने की सोची है। इसलिए पोस्ट का शीर्षक मैंने अभी भी नहीं सोचा है। फ़िल्म के पहले विज्ञापन पर गुस्सा आया। पर जैसे गुस्सा आया वैसे चला भी गया। फिर, उसके बाद राष्ट्रगान बजा। बजा और मैं किसी नक़ल करती हुई प्राणी की तरह खड़ी हो गई। उस वक़्त मेरे मन में यह खयाल आया कि जो मैं न खड़ी होऊं तब शायद पीछे से कोई मुझे धक्का देते हुए देशद्रोही कहेगा। मैं धक्के के कारण गिर जाऊँगी। मेरे चेहरे पर काफी चोट आ जाएगी। कोई मुझे उठाएगा नहीं। हाँ, मेरे दोस्त उठाएंगे पर लोग उन पर भी हल्ला बोल देंगे। उनको भी मेरी वजह से काफी चोट आ जाएगी। लोग इतने पर भी नहीं रुकेंगे। वे लोग भारत माता के नाम पर 'भारत माता की अंश' का खून भी बहा देंगे। इसी बीच राष्ट्रगान बजा। मैं खड़ी हो गई। ओह, मैंने भी गाया। मुझे अच्छा लगा। 52 सेकंड गाया। एक एक लाईन गाई। मुझे अच्छा लगा। मेरे दोस्तों को भी अच्छा लगा। बाक़ी लोगों का नहीं मालूम। उन्हें भी अच्छा लगा होगा। ऐसी मेरी उम्मीद है। कोई देशद्रोही मुझे नहीं दिखा। मैं भी नहीं हूँ। यह बात स्पष्ट है।

अब फ़िल्म शुरू हुई तो मेरा ध्यान फ़िल्म पर टिकने लगा। वाज़िब था कि इतनी बड़ी स्क्रीन से और आवाज़ों के काफ़िले से मैं बच नहीं सकती थी। मैं कई दृश्यों पर बेलगाम हंसी। ऐसा आप भी हँसे होंगे। जैसे महावीर फोगट सर के जब हर नुश्खे आजमाने पर भी लड़की ही हुई। मैं हंसी क्योंकि दृश्यों का फिल्मांकन हंसने वाला था। लेकिन तभी दिमाग वर्जीनिया वुल्फ की लिखी किताब 'अपना कमरा' में ले जाकर पटक आया। मैंने यह किताब एक या दो दिन पहले ही पढ़ी थी। इसलिए मुझे उसकी कुछ बातें रह रह कर याद आ रही थीं। मैंने मन में कहा- 'मैं यहाँ फ़िल्म देखकर अपना मनोरंजन करने आई हूँ न कि नारीवाद-नारीवाद खेलने। यह ठीक बात नहीं हर बात और विषय का अपना वक़्त होता है।' मन ने कहा- 'तुम इस चकाचौंध में पागल हो गई हो। सोचो किसी के निजी जीवन और पीड़ा पर हंस रही हो। सोचो कि लड़की होने का दुख हंसी में उड़ाया जा रहा है। कितना कमतर समझती है यह दुनिया लड़कियों को'। मैंने कहा- 'यह फिल्न है। इसमें वही तो दिखाया जा रहा है जो वास्तव में हुआ है। ऐसा होता है जब लड़के के आस में लड़की पैदा हो जाती हैं। यह लिंग का मसला भारत में बड़ा है। 1000 पर बहुत कम लड़कियां हैं मुल्क में। ...अब तुम दूर हटो और मुझे फ़िल्म देखने दो। बाद में बकवास कर लेंगे।' मन डर गया या घबरा गया। मुझे नहीं पता पर उसने फौरी तौर पर मुझे फ़िल्म के साथ छोड़ दिया।


मैंने मज़े से फिल्म देखी। अच्छी फ़िल्म है। आसपास के सेट औरताना बॉक्स से बाहर झाँकने की कोशिश हमेशा दमदार लगती है। वही इस फ़िल्म में दिखा भी। फ़िल्म का पहला आधा हिस्सा दिलचस्प है। दूसरा हिस्सा बेटी और पिता के दरम्यान सम्बन्धों को अच्छी तरह से उजागर करता है। फ़िल्म में तीन बातों को मज़बूती से समझा जा सकता है। पहला उस सोशल दीवार को तोड़ा गया है जो समाज के दकियानूस अंबुजा सीमेंट वाले तौर तरीक़ों से बनी है। कई दृश्य इसकी तसदीक़ भी करते हैं। दूसरा हिस्सा कुछ पाने के लिए संघर्ष से जुड़ा है, फिर चाहे वह पिता का संघर्ष हो या बेटी का। तीसरी बात सम्बन्धों में महीन बदलावों के रूप में समझा जा सकता है। एक पिता का जब एक गुरू के रूप में अवतार होता है तब वह दूसरे चरित्र में होता है पर जब पिता, पिता बनता है तब वह अलग नज़र आता है जहां वह बेटियों के लिए हर तरह का जुगाड़ करते हुए समाज की परवाह नहीं करता। फ़िल्म के किरदरों की ख़ालिस हरियाणवी मासूम ज़ुबान फ़िल्म के हर दृश्य को रोचक तो बनती है साथ ही बैक्ग्राउण्ड में बजने वाला गाना फ़िल्म में बजने के बावजूद आपके अंदर प्रवेश कर जाता है। फ़िल्म के अंत में आप भी दंगल-दंगल गाने और करने के मूड में आ जाते हो। सिनेमा का जादू वाकई ग़ज़ब होता है।  



महावीर फोगट की तस्वीर नारीवादियों में एक बहस का मुद्दा बनी हुई है। कुछ दिनों पहले कहीं फ़िल्म की समीक्षा पढ़ी थी। समीक्षा में भी यही बात उस लेखिका ने ज़ोर दे देकर लिखी थी कि अपने सपने के लिए पिता ने अपनी बेटियों के बचपन को कुश्ती के कठिन अभ्यास में झोंक दिया। देश के लिए मेडल की चाहत ने उन्हें अपनी बेटियों को एक अलग रास्ते पर दौड़ा दिया। इस फ़िल्म से मुझे कराटे किड फ़िल्म सीरीज़ की फ़िल्में याद आ गई थीं। आप क्योंकर महावीर फोगत अंकल को पिता-पिता कहकर संबोधित कर रहे हैं और कर रही हैं। मुझे लगता है कि वह फ़िल्म में पिता कम, गुरू ज़्यादा हैं। मुझे कराटे किड फ़िल्म के गुरूओं से कोई गिला शिकवा नहीं। याद कीजिये 'मिस्टर मियागी' या 'मिस्टर हान' को। कितने कठिन मास्टर थे वे लोग फिल्म में। अनुशासन कभी सस्ता नहीं होता। आप इस बात पर भले ही मुझसे बहस कर सकते हैं तो कीजिये। लेकिन मेहनत में झोंकना ही पड़ता है ख़ुद को। अब हर चीज़ को देखते समय ज़बरन नारीवादी विचारधारा का चश्मा लगाना पड़ेगा, ऐसा मुझे ठीक जान नहीं पड़ता।

सिनेमा हॉल में बैठे बैठे मैं कुछ देर के लिए वापस अपनी माध्यमिक कक्षाओं की पढ़ाई के दिनों में पहुँच गई। फ़िल्म से मैंने कहा, तुम रूको मैं बस अभी आई। मुझे यादों में कुछ काम है। ...सर्दी के दिनों में हमारे छमाही पेपर हुआ करते थे। मैं हमेशा से सर्दियों की शिकार रही हूँ। बीमारी और ठिठुरन मुझे हमेशा घेरे रहती। ऐसे में पेपर का जुल्म कोई अच्छी बात मुझे तो नहीं लगती थी। वो भी एक नहीं 6-7 पेपर लिखना आसान मुझे कभी नहीं मालूम पड़ा। स्कूली ज़िंदगी मुझे कभी भी हसीन नहीं लगी। हर बार घर और स्कूल को मुझसे पहले नंबर पर आने की विकट आशा रहती थी। एक नंबर भी कम हुआ नहीं कि खामोश, पर गुस्से वाली नज़रें पीछा करने लगती थीं। टीचर का कहना होता था कि तुम पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहो हो। ऐसे काम नहीं चलेगा। पिता इसके उलट कुछ कहते नहीं थे। वे सिर्फ़ करते थे। जब उन्हें मालूम चलता कि पेपर हैं तब 3 या 4 बजे से ख़ुद ही अलार्म का रूप अख़्तियार कर लेते और तब तक प्यार से उठाते जब तक मैं गुस्से में उठकर बैठ न जाती। उन्हें इस बात से कभी कोई फ़र्क नहीं पढ़ा कि बेटी कमजोर है। उसकी भी एक क्षमता है। ... मुझे याद नहीं कि कब उन्होने किसी पेपर के लिए न उठाया हो। सर्दियों में सब सो रहे रहे होते और मैं उठकर पन्ने पलट रही होती थी। ऐसे में मुझे पीछे से शॉल भी वही उढ़ाते थे। माँ को इससे कुफ्त ही हुई हमेशा। उनका खयाल था कि पास ही हो जाना काफी है। ठीक रहेगी तब ही हमें अच्छा लगेगा। सबसे छोटी है सो नरमी बरतनी जरूरी है।

कॉलेज में भी यही हाल रहा। आज भी लगभग यही हाल है। पर आज मुझे यह सब बुरा सा नहीं लगता। अच्छा लगता है कि मैंने अपने समय में अव्वल दर्जे की परफ़ोर्मेंस दी है। इसके अलावा बेहतर इंसान बनने की कोशिश भी कर रही हूँ। (शायद एक दिन कुछ अच्छी बन पाऊँ) हालांकि मैं आज भी एक ख़ास तरह की फ्लॉप लड़की ही हूँ। अभी तक एक नौकरी भी हासिल नहीं कर पाई हूँ। पापा के बाल अब सफ़ेद हो चुके हैं। वे काम पर भी नहीं जाते। उन्हें आज भी मुझसे ढेरों उम्मीद है। उनका खयाल है कि उनके जीते जी मैं कहीं स्थापित हो जाऊं। उन्हें यही बात मन में रहती कि एक छोटी ही सही पर सरकारी नौकरी मेरी बेटी को मिल जाये। इसमें अब मैं नारीवाद का पुट तो नहीं खोजूंगी। यह मेरी नाचीज़ समझ ही ठहरी। आप खोजिए। 

फ़िल्म देखने के बाद मुझमें तुरंत एक आत्मिश्वास जागा और आनन-फानन में अपने औरताना बॉक्स को खोजने लगी। पूरे 325 रूपये की टिकट ली थी तब कुछ तो फ़िल्म से लेकर ही आऊँगी न! जिनको दिन रात मरने के ख़याल आते हैं उनको तो यह फ़िल्म ज़रूर देख लेनी चाहिए। मुझे पूरा यकीन है कि उनमें भी एक जज़्बा आएगा कि कोशिश करते रहिये आख़री पल तक। हो सकता है कि आपको भी गीता कुमारी फोगट की तरह लास्ट सेकंड में 5 अंक मिल जाएँ और आप गोल्ड मेडल जीत जाएँ।  

दंगल में एक समाज है और उसमें एक परिवार जो समाज का हिस्सा है। वहाँ साहित्य नाम की कोई गंभीर और पवित्र वस्तु नहीं है और न ही कोई विचार। वहाँ ठंडा तो कभी गरम जीवन है। कभी भी कुछ मिल जाने वाला अटपटा जीवन। जो लोग नारीवादी के झण्डा लेकर यह कह रहे हैं कि यह पितृसत्ता का ही एक चेहरा है जहां एक पिता शक्ति में है और लड़कियों को कठपुतली बना रहा है तो वे वास्तव में जीवन को नहीं जानते। बहनों आप वो दृश्य भी तो देखो जहां लड़कियों कि कम उम्र की दोस्त की शादी हो रही है और दुखी है। वह यह कहती है कि कम से कम तुम लोगों के पिता तो तुम्हें शादी से परे कुछ और बनाने का सोच रहे हैं। उसके बाद से वे दोनों लड़कियां कुश्ती सीखने-लड़ने का ख़ुद से मन बना लेती हैं। अब जरा दिमाग लगाईए कि यदि लड़कियों का स्वतन्त्रता आंदोलन सफल हो जाता तब वे किस स्वरूप में होतीं। तब निश्चित रूप से उनका रूप अलग होता। वह रूप कम से कम मुझे तो स्वीकार्य नहीं होता। न मैं फ़िल्म देखने जाती।

हम अपनी ज़िंदगी में कितने फ्लॉप और हिट हैं यह ख़ुद देखते हैं और लोगों की नज़रों से भी समझते हैं। लोग किसी व्यक्ति के 'एक्शन' से उसे जानते हैं। यह कई तरीकों में से एक बढ़िया तरीका है किसी व्यक्तित्व और वस्तु को जानने का। गीता, बबीता और महावीर फोगट कुछ ऐसे ही व्यक्तित्व हैं जिन्हें उनके 'एक्शन' से आज मैं और आप जान रहे हैं। शून्य व्यक्तित्व से 10 नंबरी व्यक्तित्त्व में बदलने की बीच की प्रक्रिया ही मुझे दंगल का केन्द्रीय विचार लगा। इसमें अब यदि नारीवादी या पितृसत्ता का छोंक कोई लगाता है तब हो सकता है कि यह किसी भी वस्तु या फ़िल्म से जुडने का उसका अपना माध्यम है। इसमें कोई बुराई भी नहीं। मैं विचारधारा को न तो सोख सकती हूँ न उसे लिबास की तरह पहन नहीं सकती हूँ। मैं अपने जीवन से ही इस तरह की बातों और कहानियों को बेहतर समझने का आधार बनाती हूँ।
 

Monday, 26 December 2016

डिजिटल बनने और न बनने के बीच का स्पेस

 ...मेरा मन किया कि अपना काला छोटा असुस स्मार्ट फोन उसके थाली जैसे चेहरे पर दे मारूँ। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था। मैं स्वभाव से हिंसक नहीं हूँ। बहुत शांत रहने की आदत है। लेकिन अपनी बीमारी के साथ में लगभग 4 घंटे से ज़्यादा पंक्ति में खड़ी थी और थक चुकी थी। जब उसने लैक्चर देना शुरू किया तब मुझमें गुस्सा यकायक भर आया। उसने बस यही कहा था कि आपके पास तो स्मार्ट फोन है और प्ले स्टोर से जाकर यह एप डाऊनलॉड कर लीजिये।... फिर अप्लाई पासबुक के ऑप्शन पर जाकर क्लिक कर दीजिये। बहुत आसान है। मैंने मरते हुए आम आदमी का चेहरा चुराते हुए कहा- 'सर, मुझे यह सब नहीं आता। इतना नहीं जानती इस फोन के बारे में। क्या मैं एक अप्लीकेशन लिख दूँ?' उसने भयानक बाबू साहब बनते हुए कहा- 'च्च, आप लोग भी पढ़ लिख कर जाने क्या करेंगे। जब आप इस स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर ही रही हैं तब जरूरी चीज़ें भी तो सीखिये। ...ख़ैर अभी आप पर्ची से निकाल लीजिये रुपये।'

मुझे यह बहुत अटपटा लगा। सिर्फ़ इसलिए कि मैं हाथ में एक स्मार्ट फोन रखती हूँ, फेसबुक इस्तेमाल करती हूँ, जी-मेल से ईमेल करती हूँ... इसी वजह से मुझे अपने 'अ' से 'ज्ञ' तक के काम फोन से करने होंगे, वे भी जबरन। जो मैं नहीं करना चाहूं तब क्या होगा? मुझे निकाल देंगे?...क्या मैं अभी बैल-गाड़ी हांक रही हूँ या फिर उस पर बैठकर अपनी धीमी चाल से चल रही हूँ? जो मैं जमाने के साथ न चलना चाहूं तब क्या है मेरा चेहरा 'स्टेट' के लिए?...कुछ इन्हीं सवालों की लिस्ट दिमाग में काफी दिनों से चल रही है।



इन सब के साथ मैं वापस घर आई और सिरदर्द की एक दवा लेकर कुछ देर सो गई। फिर भी मुझे संतोष था कि मैंने जैसे-तैसे अपने रुपये हासिल कर लिए थे। पिछले कुछ दिनों से एक किताब के पन्ने पलट रही थी। सो मुझे चार्ली चैप्लिन की एक फिल्म का पता चला। फुर्सत निकाल कर मैंने वह फिल्म देख ली। फिल्म का नाम 'मॉडर्न टाइम्स' है। फिर से कहूँगी फिल्म बहुत बेहतरीन है।

आप मेरी बातों पर न जाएँ। ख़ुद इस फिल्म को पहले देखें। यदि अच्छी लगी तब अच्छी बात है। अगर नहीं लगी तो इसमें मैं क्या कर सकती हूँ। फिल्म की भव्यता वक़्त के साथ हमारे परिचय में आई बड़ी बड़ी मशीनों से है। ऐसा बताया जाता है कि चार्ली सर को किसी रिपोर्टर ने किसी कंपनी के बारे में बताया कि वहाँ काम इतने घातक तरीके से किया जाता है कि वहाँ के काम करने वाले लोगों के दिमागी संतुलन पर ख़ासा असर पड़ता है। इसी बात से उनके दिमाग में इस फिल्म का आइडिया आया। लेकिन आपको पता ही होगा कि कोई भी उत्पाद या स्वरूप यकायक नहीं उभर कर आता। उसके पीछे लंबी और चौड़ी वजहें होती हैं। चार्ली चैप्लिन ने गांधीजी के इंग्लैंड दौरे पर मुलाक़ात की थी और उनसे मशीनों को नापसंद करने की वजह पूछी थी। जो जवाब उन्हें गांधीजी से मिला था उसने भी इस फिल्म में एक अहम योगदान दिया। कहना न होगा कि फिल्म उन विचारों से प्रभावित हुई होगी।

जाना-पहचाना किरदार 'ट्रैम्प' किसी फ़ैक्टरी में काम करता है जहां उसका काम स्क्रू टाइट करना है। उसमें ग़ज़ब की फुर्ती है। वह अपने काम को एक रफ़्तार के साथ अंजाम देता है। जरा सा सांस लेने जाता है तब उसके मालिक की नज़र उस पर पड़ती है और उसे वह डांट-डपट कर वापस काम पर भगा देता है। कंपनी में तभी कुछ व्यक्ति आते हैं जिन्होंने ऐसी मशीन तैयार की है जो व्यक्ति को खाना खिला सकती है। गौर करने वाली बात यह है कि यहाँ एक आदमी कोई इंसान न होकर काम करने वाला एक वर्कर है। उससे जितना ज़्यादा काम लिया जा सकता है उतना फ़ायदा कमाया जा सकता है। वर्कर को अपना हाथ पाँव हिलाने की भी जरूरत नहीं। मशीन उसके मुँह में ही खाना ठूस देगी। ऐसे में कामगार का समय और भी काम में लगाया जा सकता है।



मुझे इस दृश्य और इस बात से अचानक एक लड़की याद आ गई जो मुझे नेहरू प्लेस के बस स्टॉपेज़ पर मिली थी। बात दो साल पुरानी है। बस न आने की वजह से वह मुझसे भी अधिक गुस्से में थी। बहुत देर तक इंतज़ार के बाद हम दोनों ने पैदल ही घर आने का फैसला किया। मुझे सुकून था कि इस अंधेरे में मेरे साथ कोई है। उसे था या नहीं, मैं नहीं जानती। उसने बातों-बातों में मुझे बताया कि वह नेहरू प्लेस मेट्रो स्टेशन के नीचे बने ढेर सारी कंपनियों की दुकानों में से किसी एक में काम करती है। सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक वह खड़ी ही रहती है। मैंने कहा- 'लंच का समय तो होगा ही आप लोगों के पास।' उसने मायूसी से कहा- 'कहाँ टाइम देते हैं! सीने पर सवार रहते हैं। यहाँ तक की टॉयलेट जाने के टाइम का हिसाब किताब भी रखते हैं …कमीने!...सैलरी भी ख़ास नहीं देते। न करो तो इस दिल्ली में क्या खाओगे और कहाँ रहोगे…!' जब उसने बेधड़क मुझसे ऐसा कहा तब न जाने क्यों मेरे मुँह में कड़वापन घुल गया। आज भी रंगारंग मॉल्स में जाने से मुझे परहेज़-सा रहता है। जब कभी चली भी जाती हूँ तब नौजवान लड़के लड़कियों देखकर अच्छा नहीं लगता। सभी जी हुज़ूरी में मशरूफ़ होते हैं। बदन को थका देने वाली मेहनत की एवज़ में उनको कुछ भी नहीं मिलता।

फिल्म में आगे.., अत्यधिक काम करने की वजह और मशीन द्वारा नट-बॉल्ट ट्रैम्प को खिला दिए जाने के कारण वह मानसिक संतुलन खो देता है। उसे अस्पताल में दाखिल करवाया जाता है। इतना ही नहीं उसे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ता है। अस्पताल में ठीक होकर आने के बाद वह कई काम करता है। कहीं चौकीदारी तो कहीं किसी रेस्त्रां में खाना परोसने का काम भी। इसी बीच एक लड़की से भी प्यार होता है। फिल्म के अंत में दोनों किरदार एक साथ ज़िंदगी से जूझने के फैसले के साथ खड़े दिखाई देते हैं। यहाँ मैं एक बात और रखना चाहूंगी। फिल्म की नायिका के बारे में। उसके पिता बेरोज़गार हैं। घर में कुछ नहीं है खाने के लिए। इसलिए वह केले चुराकर अपनी बहनों और पिता को देती है। इसी बीच किसी अफरा-तफरी में पिता को गोली लग जाती है। वे मर जाते हैं। बहनों को बालघर भेज दिया जाता है। नायिका आज़ादी चुनती है और बालघर जाने की बजाय भाग जाती है। वह तेज़ और चतुर है। वह इन हालातों में भी सपने देखना नहीं छोड़ती। वह जुझारू है। वह अपने दम पर लकड़ी का घर बनाती है। वह अपने प्रेमी पर आश्रित नहीं। वह रेस्त्रां में नाचती है और अपना जीवन जीती है। वह अपने प्रेमी का साथ देती है चाहे फैसला कैसा भी हो। इस मायने में मुझे नायिका का चरित्र बेहद अच्छा लगा। हालांकि वह भी मशीनों की छाया में बेरोज़गारी का एक जीता जागता सबूत है। मानवीयता का तत्व दोनों ही चरित्रों में है। यह इस फिल्म की एक और विशेषता है।



हालांकि मशीनों का विरोध इस फिल्म में नहीं दिखता बल्कि मशीनों के आ जाने से उनके क्या प्रभाव किसी समाज, परिवार और एक व्यक्ति पर पड़ता है, उसको बखूबी दिखाया गया है। एक व्यक्ति जहां पागल हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ परिवार टूट रहे हैं। वे बिखर रहे हैं। समाज में असहजता है। असंतुलन है। लोगों के पास काम नहीं है। स्टेट अपने पुलिसिया रूप में और भी प्रखर होकर आता है जहां उसका काम हड़ताल कर रहे लोगों को जेल में डालने का एक्शन है। वह सुरक्षा जैसे तत्व के लिबास में नहीं है।  

अब इस फिल्म की एक समझ के साथ आप खुद सोचिए कि हमें क्यों, कब, कहाँ और कितनी मात्रा में मशीनों की ज़रूरत है? ठीक है बहुत हद तक मशीनों ने करिश्में कर के दिखाए हैं। ज़िंदगी और उसकी रोज़मर्रा को आसान और जीने लायक़ बनाया है। लेकिन किसी भी सिक्के के दो पहलू होते हैं। अच्छा तो कुछ भी नहीं होता। देखिए न मेरे हाथ में कलम नहीं है। उसकी जगह मेरी ऊंगलियाँ लैपटाप के कुंजीपटल पटल पर थिरक कर जुमलेदार भाषण दे रही हैं। मशीनें जो करती हैं वह लगभग अदृश्य ही मालूम देता है मुझे। मशीनों ने जहां मनोरंजन के साधनों के रूप में अभूतपूर्व प्रगति की है तो वहीं उसका खामियाज़ा यह भी देखा जा सकता है कि उसने मनुष्य को 'कविता की रचना' से बहुत दूर कर दिया है। पहले के समय की अगर कुछ कहानियाँ सुने अथवा पढ़ें तब पाएंगे कि समूहों के बीच का रिश्ता गर्माहट वाला होता था। एक और महत्वपूर्ण बात जो हम भूलते जा रहे हैं वह 'स्पर्श' है। अब ज़रा ठहर कर सोचिए इन तत्वों के बारे में। यकीन मानिए हम कंगाली की कगार पर हैं।

गौर से देखने पर आपको और मुझको एक ऐसे मकड़ी के जाले जैसी दृश्य प्रणाली दिखेगी जो अब मनुष्य की पहुँच से भी कहीं दूर जा चुकी है। इस प्रणाली में ऐसे रेशे हैं जो एक दूसरे में गुंथे हुए हैं। हाँ, आप इसे जटिल कह सकते हैं। लेकिन यह गुंथन इतनी सरल और स्वाभाविक भी है कि आपकी सोच में आए भी नहीं। उदाहरण के लिए जिस माईक के आगे खड़े होकर लीडरान भाषण देते हैं वहाँ मशीन का सबसे सरलतम इस्तेमाल देखा जा सकता है जो बहुत प्रभावी होता है। भाषण एक तरफ़ा संवाद है या एक निबंध। यह निबंध मनमोहक भी है। यहाँ सुनने वाले के पास अपनी बात रखने का हक़ नहीं है। सोचिए यदि 8 नवंबर को सुनने वालों के पास भी 'रिप्लाय' का विकल्प होता तो 'डमोक्रेसी' का सबसे बड़ा घोटाला नहीं होता। मशीन एक फासला तैयार करने का काम बहुत ही शातिर तरीके से करती हैं। इस बात को भी मत भूलिएगा कि मशीन और विचारधारा का एक मज़बूत याराना है। ज़रूरतों के अलावा विचारधाराओं ने ही मशीनों को बहुत हद तक एक ख़ास मुक़ाम पर पहुंचा दिया है।



आप पहचानिए कि जो हम सभी पर डिजिटल बनने का जबरन दबाव डाला जा रहा है। वास्तव में आपसे इंसान बने रहने के हक़ को छिनने की शुरुआत है। आप सोचिए मत। लोगों से मिलिए मत। घर बैठकर ख़रीदारी कीजिए। जांचिए मत, बस एक कार्ड के आसपास सिमट कर रह जाइए। याद कीजिये सभ्यताओं के पड़ाव। सभ्यताओं में विकास डेबिट या क्रेडिट कार्ड से नहीं जांचा जाता। बल्कि समाज और उसकी गुणवत्ता की नाप यह रही कि आप प्रकृति के साथ कितने महीन तरीके से जुड़े रहे और कितने हद तक मानवता की डोर से बंधे रहे। समाजों ने कितने बेहतर तरीके से संसाधनों का बंटवारा किया। औरतों को उनके अधिकारों के साथ कैसे रहने दिया गया। शक्ति का विकेन्द्रीकरण कितना किया गया... यही कुछ आधार हैं जिससे किसी सभ्यता के विकास को समझा जा सकता है। मशीनों में जीवन की आसानी खोजना एक बेईमानी है। कम से कम मैं तो ऐसा ही मानती हूँ। आप क्या सोचते और मानते हैं, आप ही अपने तई तय करें।   




Wednesday, 21 December 2016

द सिटी लाइट्स मुहब्बत...प्यार ऐसा भी होता है

चार्ली की फिल्में तमाम दुखों के बाद भी जीने की एक वजह के साथ हमारे सामने उपस्थित होती हैं. उनके यहाँ जीवन के कटु सत्य हैं उसके बाद भी जीवन में हास्य और प्रेम के सहारे बने रहने का भाव सुंदरतम है.  

                                         दुनिया की पहली बोलती फिल्म 'द जैज़ सिंगर' का पोस्टर 

फिल्में जब बनना शुरू हुई होंगी तो उनका जादू सिर चढ़कर बोला होगा. ऐसे में जब चैप्लिन ने पर्दे पर ख़ुद को पेश किया तो वह अद्भुत मिलन गज़ब हुआ होगा. 

                                         पहली हिन्दी सवाक् फिल्म 'आलमआरा' का पोस्टर
                                              
मैंने मन से चार्ली चैप्लिन की मशहूर फिल्म 'सिटी लाइट्स' देख ली। गज़ब फिल्म है। हर किसी को एक बार ज़रूर देखनी चाहिए। देखकर ठंडा ठंडा-कूल कूल लगा। फिल्म के अंत के दृश्य में आंखों में भी पानी भी आ गया। जब फिल्म के बारे में और जानकारी इकट्ठा की तब पाया कि आंखों में पानी महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के भी आया था। वे भी इसी अंत के दृश्य में अपनी आंखों का पानी पोंछ रहे थे। ऐसा करते हुए उन्हें खुद चार्ली चैप्लिन ने देखा था।

सिटी लाइट्स को बेमिसाल फिल्मों की सूची में भी जगह दी गई है। इस फिल्म ने उस समय कमाई भी बहुत ज़्यादा की थी। 'द जैज़ सिंगर' पहली अंग्रेज़ी बोलती हुई फिल्म थी। हमारे यहाँ यानि हिन्दी में यही जगह 1931 में आई फिल्म 'आलम आरा' को प्राप्त है। दोनों फिल्मों के बारे में आगे कभी जानकारी दूँगी। फ़िलहाल अभी विषय कुछ और है। ऐसा मैंने पढ़ा है कि सिटी लाइट्स' का 'सेंट्रल आइडिया' चेतना का अस्थाई होना है। आप फिल्म देखिये। ऐसा हो सकता है। आप भी सहमत होंगे। पर मुझे इस फिल्म के उस अंत के दृश्य ने ही चैन नहीं लेने दिया जिसमें मुहब्बत का चेहरा मौजूद था। मुझे सच में नहीं मालूम कि आखिर प्यार, इश्क़, प्रेम, लव, मुहब्बत किसे कहते हैं! मेरे लिए अजनबी शब्द हैं क्योंकि मैंने इनके अंदर मौजूद अहसास को नहीं जीया। पर जब इस फिल्म को देखा तो मूक अभिनय से ही जान लिया कि प्यार क्या होता है!


                                                    ट्रैम्प की लड़की से पहली मुलाक़ात का दृश्य

जब चार्ली चैप्लिन यह फिल्म  बना रहे थे तब सवाक् (वाणी सहित) फिल्में बनने का दौर शुरू हो गया था और निर्वाक् यानि मूक फिल्मों की तरफ लोगों का रूझान कम होना शुरू हो गया था। इसलिए चार्ली चैप्लिन के लिए यह एक चुनौती थी कि मूक फिल्में आखिरकार क्यों अलग और उम्दा होती है, साबित किया जाये। उन्होंने इसे बनाने और लिखने में लगभग ढाई बरस का समय लिया था। इसी फिल्म में पहली बार उन्होंने ध्वनि का इस्तेमाल भी किया था। यह फिल्म सन् 1931 में आई थी। जब अमरीका में महामंदी ने दस्तक भी दे दी थी। इसी हालात में ट्रैम्प आता है और छा जाता है। फिल्म का एक एक दृश्य करोड़ का है। इससे से भी अनमोल चार्ली चैप्लिन के चेहरे के भाव।

फिल्म की कहानी में आवारा ट्रैम्प और न देख पाने वाली एक फूल बेचने वाली लड़की की कहानी है। एक और अमीर चरित्र है जिसके पास पैसा, घर और नौकर चाकर सब कुछ हैं। जब यह अमीर आदमी नशे में डूबा हुआ आत्महत्या करने जा रहा होता है तब ट्रैम्प उसे बचाता है। इस काम से खुश होकर एक आवारा को अमीर व्यक्ति दोस्त बनाकर अपने घर लेकर जाता है और उसकी खूब सेवा करता है। पर जैसे ही उसे होश आता है वह अपने नौकरों से उसे धक्केमार कर बाहर फिकवाने से भी परहेज़ नहीं करता। यही सिलसिला चलता है फिल्म में। ट्रैम्प की मुलाक़ात उस न देख सकने वाली लड़की से होती है और वह उसे धीरे धीरे पसंद करने लगता है। लड़की को यह ग़लतफ़हमी होती है कि ट्रैम्प अमीर है। वह अपने दोस्त से मिले पैसों से लड़की की मदद करता है। इतने में पुलिस ट्रैम्प को लूटमार का आरोपी समझकर जेल में बंद कर देती है। दूसरी तरफ लड़की ने ट्रैम्प के रुपयों की मदद से आँखें ठीक करवा कर एक फूल की बड़ी दुकान खोल ली है। कई सालों बाद जब ट्रैम्प जेल से बाहर आता है तब उसकी दशा पहले से भी अधिक खराब है। लड़की उसे जब फूल देती है तब उसका हाथ पकड़ लेती है। छूने के अहसास से वह उसे पहचान लेती है। फिल्म इसी दृश्य पर खत्म होती है।


                                                    सिटी लाइट्स फिल्म का अंत का दृश्य

इस फिल्म में लड़की भूमिका बेहद मज़बूत है। उसकी आँखें नहीं है फिर भी वह फूल बेचती है। वह किसी पर आश्रित नहीं है। उसे ज़रूर यह ग़लतफ़हमी है कि ट्रैम्प अमीर है पर अंत में वह उसे छूकर पहचान लेती है और साबित करती है कि प्यार में स्तर मायने नहीं रखता। दोनों किरदारों की तरफ से प्रेम के महान होने का बहाव दिखता है। बिना रंग और चमक दमक की ऐसी मुहब्बत मैंने पहले नहीं देखी और न समझी थी। चार्ली चैप्लिन का मानना था कि मूक सिनेमा अपने आप में एक मुकम्मल सिनेमा है। यहाँ भाषा की दीवार नहीं है। कोई भी, कैसा भी औरत, आदमी, बच्चे, युवा आदि इनसे से जुड़ सकते हैं। शायद यही वजह है कि फिल्म चित्रित इस प्रेम को मैं समझ पाई हूँ। दुनिया की महान भावना शब्दरहित होती है। मुझे यह अब पता चल चुका है। ठीक ऐसे ही अपनी हिन्दी मूक फिल्में भी ऐसी होंगी। मुझे इस बात से इंकार नहीं पर बदकिस्मती से कूल 1288 मूक फिल्मों में से केवल चार फिल्मों के हो फूटेज़्स हमारे पास मौजूद हैं।


आगे जब कभी फिर वापस आऊँगी तब ढेर सारी जानकारी लेकर आने की कोशिश करूंगी। फ़िलहाल तो ग़र मेरी यह पोस्ट पढ़कर आपको भी 'सिटी लाइट्स' देखने की इच्छा उभर आई है तब ज़रूर देखिये और बाँटिए कि फिल्म आपको कैसी लगी। किस बात ने आपको छूआ। यदि आप किसी की मुहब्बत में गिरफ़्तार हैं तब तो यह फिल्म आपको बताएगी कि आप कितने खुशकिस्मत हैं। प्यार के एक अलग रंग से मुलाक़ात करने का मन है तो यह फिल्म आपके लिए ही है।  



Wednesday, 14 December 2016

इनार

 मुझे सर्दियों में भी मीठी प्यास लगती है। जब गले के नीचे पानी जाता है तब कितना सुकून सा मिलता है। पानी से पुराना यारा मानव सभ्यता का है। इसमें किसी को कोई भी शक़ नहीं है। जल ही जीवन है, पंक्ति स्कूल ने ऐसे दिमाग में सटाई (चिपकाई) है कि अभी तक आदर्श पंक्तियों में वही पहली बनी हुई है। इसके बाद एक नन्ही कविता भी याद है। सुनाऊँ?...मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है, हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी...इस डर से मैंने जब से होश संभाला है मछली खाई ही नहीं। इतनी भयंकर छाप है। मानते हो न स्कूल में कुछ तो पढ़ाई की है मैंने!

'इनार' शब्द सुना होगा आपने। पानी के पुराने स्रोतों में से एक महत्वपूर्ण स्रोत यह भी रहा है। आज महरौली स्थित राजों की बावली या बावड़ी की कुछ तस्वीरें देख कर रही थी तब दिमाग में कुछ चित्र खुद ब खुद खिंचने लगे। इसलिए एक पोस्ट लिखने का खयाल आ गया। गाँव में आज भी कुएं को इनार कहकर पुकारा जाता है। पर हैंडपंप के चलन में आ जाने से अब कुएं, कहानियों का या कही-सुनी का हिस्सा बन रहे हैं।

                                                           न तेरा न मेरा -हम सबका


एक समय था जब इनका बहुत रुआब हुआ करता था। (आज भी होगा-जरूर) ये किसी भी ग्राम की लाइफलाईन होते थे। उत्तर प्रदेश के किसी गाँव में एक दफ़ा जाना हुआ था। तब वहाँ के लोगों ने मुझे कुएं-खुदाई की अद्भुत प्रक्रिया बताई थी। एक बुजुर्ग महिला थीं। वह काफी उम्दा स्टॉरी-टेलर थीं। उनके मुंह से सुनकर मजा आया। उन्होंने बताया कि जब वे बेहद छोटी थीं तब उन्हें कुछ कुओं की खुदाई की याद है। उनके मुताबिक इनार खोदने में किसी भी तरह की व्यापार की बू नहीं थी। कोई नफा या नुक्सान की चिंता नहीं थी। सबसे बड़ी बात कि कुओं की खुदाई में गाँव के सभी लोग शामिल होते थे। ऐसा तो मुमकिन नहीं होता था कि एक या दो रोज़ में कुआ खुद कर तैयार हो जाये। यह मेहनत का काम था।

जहां कुंआ खोदना होता था उस ज़मीन को पहले तय किया जाता था। यदि किसी का निजी कुंआ होता था तो उसी व्यक्ति के नाम से ही कुएं को पहचान दी जाती थी। लेकिन जब कुंआ पूरे समुदाय के लिए खोदने की बात होती तब इस मामले में ज़मीन को ऐसे तय किया जाता कि उसमें किसी एक का हक़ न हो। इसके अलावा कुएँ के लिए अपनी ज़मीन देना भी एक महान कार्य समझा जाता था।

कुएं की खुदाई के लिए गाँव के सभी पुरूष लोग अपना श्रम देते थे। मुझे उन्होने बताया कि हर घर की बारी आती थी। मान लीजिये एक दिन एक परिवार के एक सदस्य की बारी आती तो दूसरे दिन दूसरे परिवार के सदस्य की। इस तरह के श्रम के लिए कोई मजदूरी नहीं थी। क्योंकि फल तो कुएं का पानी था। एक बात इसमें साफ थी कि इस काम में पूरी कम्यूनिटी का मिला-जुला श्रम लगता था। इसलिए एक सामुदायिक भावना दिखाई देती थी। जब तक काम चलता उसके आसपास ही बच्चों का बड़ा जमावड़ा लगा रहता। वे भी कुछ छोटे-मोटे काम में हाथ बंटा देते जो बाल श्रम नहीं था।



कुएं की अंतिम दिनों की खुदाई में कई बातों का खास खयाल रखा जाता था। वह यह कि उसकी तलहटी पर लकड़ी के चाक की सेटिंग करने के लिए और उसकी अंदरूनी मजबूती को बनाने के लिए हुनरमंद लोगों को ही भेजा जाता। यह हर किसी की बात नहीं थी। किसी को गहराई में जाने से डर लगता तो उसे नहीं जाने दिया जाता। बच्चों को थोड़ा दूर रखते बाद के दिनों में कि कोई घटना न हो। इसके अलावा इस बात पर ध्यान लगाया जाता कि उसके तल से जुड़े काम में वे लोग रहें जो पानी में थोड़ा अधिक देर तक सांस ले सके। मिट्टी फेंकने के काम को 'मानव जंजीर' बना कर पूरा किया जाता।

जब कुएं का काम लगभग खत्म हो जाता या वह पूरा तैयार हो जाता तब पूरे गाँव के घरों में से दालें, चावल, आटा और तमाम तरह की सब्जियों को इकट्ठा कर कुएं के पास पकाया जाता और भोज चलता। इस काम में महिलाओं की भागीदारी की जरूरत नहीं थी सिवाय भोज खाने के। एक तर्क उन्होने यह भी दिया कि महिलाओं के पास तो वैसे ही बहुत सा घरेलू काम होता था सो यहाँ पुरूष ही खुद से मिलकर भोज तैयार करते थे। पूजा पाठ में किसी भी पंडित की भी जरूरत नहीं होती थी। ईश्वर के नाम का टीका लगाया और भोज बिठा दिया।

लेकिन अब कुएं का चलन हट रहा है। कई जगह पूरी तरह से जा चुका है। उसके पीछे की अपनी वजहें भी हैं। मेरी दिलचस्पी उसमें नहीं थी। सो मैंने कहा मेरे लिए यही काफी है। मेरे लिए इस तरह की कथाएँ एक अद्भुत चित्रकथा हैं। रोचक इसलिए कि जिस कम्यूनिटी की आज बात की जाती है समुदाय का 'सेल्फ एक्शन' गायब है। पहली बात तो आज समुदाय विकास के काम के लिए कॉलेजों तक में एक अलग से पाठ्यक्रम चल रहे हैं। शायद ये सब कार्यक्रम किसी समुदाय की सेहत के लिए अच्छे होंगे। ऐसा हो सकता है। लेकिन इन्हें देखने पर लगता है कि समुदाय की खुद की कोई क्षमता नहीं, कोई दिमाग नहीं, कोई सहयोग नहीं। एक ऐसे समुदाय का चित्र दिखता है जो अपनी हर बात के लिए सरकार की तरफ देख रहा है। समुदाय की इस तरह की शक्ल और दशा के लिए निश्चित रूप से कुछ कारक हैं। पकड़ के जांच करनी चाहिए।



फिलहाल ब्लेम-गेम  नहीं करना। 'इनार' से जुड़ी बहुत सी बातें हैं जो गाँव और क़स्बों में मिल जाती हैं। नायक और नायिका फ्री इन कहानियों में तिलिस्म का भी कोई काम नहीं। एक सिम्पल कथा है। सुनेंगे तो आसपास और बेहतर मन में उतरता जाएगा। आज जहां कुएं होंगे वहाँ जरूर दूसरी क़िस्म की कहानियाँ चल रही होंगी। आप खोज चुके हैं तो अच्छा है। नहीं खोज पाये हैं तब तो पक्का आपको भी कहानी खोजी बनना चाहिए। डिस्कवरी चैनल वाले हमारे माल-मटीरियल से खेल जाते हैं और हम दर्शक बनकर देखते रहते हैं। अब कहीं जाना हुआ तो ज़्यादा क़िस्से बटोरकर लाऊँगी।   


कुएं से जुड़ा एक तजुर्बा मेरी दादी बताया करती थीं। यक़ीन मानिए उसमें पनघट की गोरी टाइप का कोई भी फेंसीपन नहीं था। बताती थीं-

"सर्दी में कुएं से पानी लाना मेरे लिए बहुत मुश्किल कामों में से एक था। सुबह सुबह गाँव की पतोह उठे तो कोई कमबख़्त देख न ले। कोई टोक न दें। इसलिए अंधेरे में ही जाती थी। एक रोज़ नींद में ही भोरे भोरे मटकिया उठा कर चल दी। टॉर्च भी साथ ही रख ली। जब वहाँ पहुंची तो न जाने पैर से क्या सरकता हुआ गुज़र गया। मुझे लगा कोई खर-पतवार होगा। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर कुछ लगा। टॉर्च से देखा तो काला कलमुंहा साँप था। मटकी वहीं झटकी और भाग आई। फिर तो कान पकड़ लिए। हमने कहा हम नहीं जाएंगे। नल लगवाओ आँगन में।"

हम तो खूब हँसते थे इस किस्से पर। अब पास में किस्सा ही है बस! 

Monday, 12 December 2016

दिल पे मत ले यार

पता है, मुझे बहुत अजीब लग रहा है। कल FB पर किसी लड़के की एक पोस्ट पढ़ी। उसने बहुत उम्दा बात लिखी थी। काफी खोजबीन करके। पढ़कर। कश्मीर और देशभक्ति से जुड़ी हुई। मुझे पोस्ट बेहद अच्छी लगी पर मैंने 'like' नहीं की। कारण था। वजह यह थी कि उसमें एक बेहद भयानक गाली थी। हद है साहब, आप अपनी बातों पर वज़न तब तक नहीं रख पाते जब तक आप अपने 'मेल-मन' को तुष्ट करने के लिए औरत से जुड़ी तीखी गाली बोल या न लिख लें। फेसबुक का ज़माना है तो लिखने को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

गालियों से मुझे फिक्र नहीं लेकिन बहुत सी गालियों को सुनकर और पढ़कर फिक्र हो जाती है। 'मेल खून' तब तक महान नहीं हो पाता जब तक 6 या 7 गालियां औरतों और उनके अंगों से जोड़कर न थूक दे। मैंने हर व्यक्ति में इस आदत को करीब से देखा है। बाहर जाओ तब सफ़ेद कॉलर वाले जो नफ़ासत की पढ़ाई कर चुके होते हैं वे भी बेहद लिजलिजी मानसिकता रखते हैं और वक़्त वक़्त पर गाली देकर हल्के हो ही जाते हैं। एक पल यह समझे बिना कि वे भी आखिरकार किसी न किसी तरह किसी स्त्री चरित्र से जुड़े हुए हैं। क्या वे यह भूल सकते हैं कि वे कहाँ से पैदाइश लेते हैं?

                                                    जिराडो सेकोटो- अफ्रीकी कला

ऐसा नहीं है कि यह बुरी लत सिर्फ कुछ तरह के पुरूषों की जागीर है बल्कि हर किसी में क्रोध या उत्तेजना के क्षण में वे अपने कलर में आ जाते हैं। हर घर में यह बीमारी मौजूद है। मैं कई बार अपनों की भी खबर ले लेती हूँ। बल्कि मेरे लिए यह पैमाना मायने रखता है कि जिस माहौल में बातचीत हो रही है उसकी ज़ुबान कैसी है। एक स्वस्थ बातचीत में उन शब्दों को जगह मिलनी चाहिए जिनमें किसी को भी ठेस न पहुंचे। घर में हम बेहद अनौपचारिक रहते हैं। उनमें हल्की फुली बातें होती हैं। अक्सर मैंने  गौर किया है कि जैसे हम घर में पलते हैं, बड़े होते हैं, परवरिश होती है ठीक वैसे भी हमारे आपसी संवादों की भी परवरिश होती है। शब्दों में गरिमा रहती है और उससे से भी ज्यादा मुहब्बत, करूणा और थोड़ा बहुत गुस्सा पाया जाता है। वह माहौल ऐसा है जहां पर एक बातचीत स्थापित करने लायक स्तर बना रहता है। घरेलू बातचीत में कुछ आदर्श मानक तय किए जाते हैं और आशा की जाती है कि सब उस मानक का पालन करें।

लेकिन ऐसा भी होता है किसी परिवार में आपसी दिक्कतें हद तक बढ़ जाती हैं और रंजिशों के चलते संवादों में भी हिंसा आ जाती है। कई बार परिवारों में घरेलू हिंसा की मात्रा ज़्यादा होती है और बात गालियों से आगे बढ़कर हाथापाई तक पहुँच जाती है। उदाहरण के लिए शादी जैसे अवसरों पर झगड़े होना सुनाई पड़ ही जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि मैं भाषाओं पर इल्ज़ाम नहीं लगा रही बल्कि भाषा के अंतर्गत रहने वाले उन शब्दों को ध्यान में लाने की कोशिश कर रही जिनसे किसी की भी गरिमा कम होती है या अथवा ठेस पहुँचती है। आप खुद अपने आसपास रहने वाले लोगों को अब्ज़र्व कर सकते हैं।



आप मुझसे सवाल कर सकते हैं कि क्या सिर्फ पुरुष ही गाली देते हैं, ऐसा तो कई औरतें भी करती हैं, उसका क्या? जी। बात बिलकुल ठीक है। मैंने भी कई महिलाओं को गालियों का इस्तेमाल करते हुए देखा और सुना है। लेकिन इस बात से यह साफ है कि गाली नई नई कोई कला नहीं है जो आज हमें आविष्कार में मिली है, बल्कि यह इंसानी बर्ताव का लंबे समय से हिस्सा रही है। आसपड़ोस में जब झगड़े होते हैं तब दोनों पक्षों में धमाकेदार गाली देने के दृश्य चलते हैं।

मेरे यहाँ एक महिला रहती है। उसके 4 छोटे छोटे बच्चे हैं। उसका पति दिन में काम पर ही होता है और देर रात तक आता है। कुछ वक़्त पहले उसकी ज़मीन पर कुछ लोग उससे बिना पूछे अपने वाहन खड़े करने लगे। जब उसने अपना ऐतराज दर्ज़ किया तब वे लोग उससे लड़ने के लिए हाजिर हो गए। इस बात पर उसने ऐसी ऐसी गालियां दीं जिसे सुनकर वे लोग भाग खड़े हुए। इसी तरह उसे अकेली औरत सोचकर जब कोई छेड़ता है तब वह अपने तरकश से बस गालियों के तीर ही निकालती है। यह उसके लिए बचाव करने और हमले के भी काम आती है। मैं फिर भी उसकी गालियों को जायज नहीं ठहरा रही। यदि किसी पुरुष पर नज़र डालें तब आप खुद गौर कीजिएगा कि वह कब इन शब्दों का इस्तेमाल करता है। कुछ लोग सभी तरह के मूड में तो नहीं लेकिन हंसी मज़ाक में भी गालियों का इस्तेमाल करते हैं जिसे दिल पर नहीं लिया जाता। 

पिछले साल 'काशी का अस्सी' फिल्म पर घोर विवाद हुआ और लोगों की भावनाएँ आहत हो गईं क्योंकि फिल्म के ट्रेलर में शिवजी के वेश में एक लड़का गाली देता हुआ दिखा। फिर क्या था, बवाल मचा। ऐसी भी खबरें हैं कि कई FIR दर्ज़ की गईं। इसमें दिलचस्प बात है कि यही FIR किसी भी औरत या औरतों के गुट द्वारा नहीं दायर की गईं। फिर भी आप इस बात पर तो सहमत होंगे कि ईश्वर भले इन शब्दों का इस्तेमाल न करते हों पर क्रोधित तो जरूर होते होंगे। 

गालियों के संदर्भ में एक बात और अजीब है पर उत्तर भारतीय लोग हैरान नहीं होते। (दक्षिण के लोगों का अंदाज़ नहीं) शादी-ब्याह, शगुन, आदि अवसरों पर औरतों द्वारा गाये जाने वाले गीतों में शब्द कम और गालियां अधिक होती हैं। मुझे एक बार ऐसी ही गालियां पड़ी थीं।  तब मेरा गुस्से के मारे दिमाग खराब था- 'यह क्या बकवास गा रही हैं आप लोग?' मुझे कहा गया- 'गाँव है। ऐसा ही होता है, ऐसे मौके पर।' लेकिन मेरा दिमाग जैसे कहीं उड़कर बिखर गया था। मैंने इतनी गालियां पहली दफा सुनी या फिर कहूँ मेरा गालियों से एंकाउंटर किया गया। मुझे शादी पर आने का खूब पछतावा हुआ और उसके बाद से मैं किसी भी शादी में शरीक होने से कतराने लगी। लोगों ने मुझे बताया कि यह परंपरा है और इस तरह के गीत वर पक्ष अथवा दुल्हन पक्ष के लोगों को मज़ाक में गाते हुए दिये जाते हैं। ध्यान से सुनो तो इनमें ताना, बेटी के घर छोड़ कर चले जाने का दुख, घरेलू स्थिति भी दिखाई देगी। ख़ैर मेरे पास अभी इस बात में अपनी बात मिलाने की बुद्धि नहीं आई। है।

गालियों के शब्दों या गुच्छों पर ध्यान दें तब मालूम देगा कि पहली नज़र में ये किसी औरत, रिश्ते, और उसके अंगों की तरफ संकेत करती हैं पर इसका दूसरा पहलू सामने वाले को अपनी क्षमता भर ठेस पहुंचाना या फिर बेजोड़ तरीके से शब्दों से वार करना जिसके चलते सुनने वाले को ठेस लगे है। वह बौखला जाये। वह दुखी से ज्यादा हर्ट हो। यहाँ बात उस तरीके के झगड़े या बहस की कर रही हूँ जहां बहुत गंभीरता होती है और नौबत मार-कुटाई तक आ जाती है।



एक मासूम तर्क यह भी है कि हमारी उस क्षमता का विकसित न हो पाना जिसमें हम यह जानते हों कि अपने को कब कब कैसे कैसे अभियाक्त करना चाहिए। मुझे इस बात में वज़न लगता है। वास्तव में हम कितना विकसित हो पाये हैं या फिर हो पाते हैं। हमारे एक्शन को हम खुद नहीं समझ पाते। हमारी दिनचर्या भी तो पालतू है जिसे हमने बड़ी मेहनत से पाला है। क्षमता को मैं किसी भी कला रूप से जोड़ना चाहूंगी। हम कला से कितने परिचित हो पाये हैं यह भी मायने रखता है। इसमें कार्पेंटरी से लेकर चित्रकारी तक शामिल है। हो सकता है मैं बिलकुल गलत हूँ, पर मैंने देखा है जो लोग किसी भी तरह की कलात्मकता से जुडते हैं उनके पास गालियां जैसे स्पेस खाली रहता है।

गालियों की बात चली है तब मुझे रवीश कुमार का चौड़ा चेहरा, जस्टिस काटजू की तोते वाली नाक और दिलीप सी मण्डल की आत्मविश्वास से भरी तीन छवियाँ तुरंत याद आ जाती हैं। मैंने कई बार रवीश कुमार को Prime Time पर तिलमिलाए हुए दिमाग के साथ देखा है। काटजू अलहदा हैं वे FB पर ब्लॉक कर देते हैं और दिलीप मण्डल FB पर एक बार पोस्ट कर देने के बाद दुबारा उस तरफ देखते तक नहीं। पर यकीन मानिए, उन्हें गाली देने वालों का पूरा समुदाय है जो काफिले की तरह उनकी पोस्ट पर आता है और गालियां बकते हुए गुज़रता है। मैंने एक बार उनकी किसी पोस्ट के कमेंट्स पढ़ें तब मन खून की उल्टी करने को हुआ जा रहा था। कई बार उनकी पोस्ट किसी नेता या पार्टी विशेष की आलोचना भी नहीं होती पर फिर भी लोग उनको झोला भर-भर गाली देत हैं। लगता है कि गाली देने वालों के दिमाग की सेटिंग की गई हो कि जैसे ही मण्डल जी पोस्ट डालें आप टूट पड़ो। कभी मिल पाई तो उनसे उस संजीवनी का पूछूंगी कि कहाँ से वह उगाते हैं और लाते हैं। बेहद भयानक गालियों के बाद भी लिखना उनका जारी है। मुझे नहीं लगता कि उनकी पोस्ट्स खराब होती हैं। आलोचना वह अच्छी करते हैं।

मण्डल जी के संदर्भ में यह बात भी है कि उन्हें गाली देने वाले लोग अधिकतर जातिवादी होते हैं। मसलन जिन्हें मनु स्मृति पर कट्टर विश्वास है। मुझे याद है मण्डल जी ने एक पोस्ट अंबेडकर जी से जुड़ी हुई डाली थी। उस पोस्ट पर अंबेडकर के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक कमेंट्स थे। इसी में एक लहर देशभक्ति का चूना लगाने वालों की भी बहुत है। देशभक्ति और देशद्रोही के बीच के फर्क को वे लोग गालियों से साफ बांटते हैं। लेकिन मुद्दा वही है कि ये आधुनिक गालियां देने वाले सीधे सीधे भारत माँ से भी खुद को जोड़ते हैं और और दूसरों की माँ और बहन को शब्दों में बेज्जत कर देते हैं।        

अब बात आई गालियों के संदर्भ में लिंग पर हमले की। औरतों को गाली देना जिनमें उनके चरित्र को जोड़ा जाता है वे शब्द नुकीले तीर के समान होते हैं। मुझे एक पोस्ट और याद आ रही है जो निर्भया के माता-पिता द्वारा पीएम मोदी जी से गुनहगारों को फांसी देने की मांग को लेकर थी। जिस घटना से देश हिल गया और शर्मसार हुआ था, मालूम चला कि उस लड़की के लिए कोई हमदर्दी नहीं थी। लोगों ने उस पोस्ट के नीचे खोज खोज कर दिल दहला देने वाली गालियां उसके पिता को दी थीं। और तो और बहुत से अपशब्द निर्भया के लिए भी थे। तब मुझे यह यकीन हुआ कि हमारे समाज में एक धड़ा निश्चित ही मानसिक विकलांग है। यह धड़ा ठीक से सोच भी नहीं पाता। तीसरे लिंग को नहीं भूल सकती। जब दिल्ली शहर कि सड़कों की लाल बत्तियों पर बस रूकती है तब इस थर्ड जेंडर के लोग बसों में कुछ मांगने के लिए घुस आते हैं। ऐसा ही एक दिन था, दो लोग आए। पूरी बस में मांगा। जो मिला लेकर चले गए। उनके जाने के बाद बस में मौजूद पुरूषों ने जी भर भर कर गालियां दीं, बिना यह देखे कि बस में बहुत सी मुसाफिर महिलाएं हैं। हाँ, उनमें कुछ ऐसे भी लोग थे जो खूब रस ले रहे थे।


----------------------------------------------------------------------

मैं इस पोस्ट को दो दिन से लिख रही हूँ और अभी भी पूरे पक्ष नहीं रख पाई हूँ। कुछ लोगों से बातें कीं तो कुछ बिन्दु समझ पाई। उन्हें भी डाला है। शुक्रिया के साथ। अभी बहुत कुछ बाकी है जो कभी और जानकारी और अनुभवों से बटोर कर लिखूंगी। फिर भी मैं हमेशा उस स्पेस और अंतराल को बेहतर मानती हूँ जिनमें गालियां और हिंसक संवाद न हो। खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के लिए ऐसे स्पेस की कामना करती हूँ जहां वे बेहतर सम्प्रेषण कर सकें। अगर किसी शब्द से किसी की भी गरिमा को ठेस पहुँचती हो, मैं वहाँ रहना ठीक नहीं समझती। खराब शब्द संवाद को नष्ट करते हैं या उनकी उम्र को कम करते हैं।

(दिमाग में बहुत से और खयाल दस्तक दे रहे हैं। एक मुकम्मल पोस्ट बाकी है अभी।)


Friday, 9 December 2016

काला

'सत्यम शिवम सुंदरम' फिल्म का कर्णप्रिय गीत याद है? ...'यशोमती मैया से बोले नन्द लाला राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला...बोली मुसकाती मैया ललन को बताया...' मालूम होता है कि कृष्ण को भी अपने रंग से इंफीरियरटी  हो गई हो। अफसोस कि उनके समय में गोरा बनाने वाली क्रीम नहीं थी,  वरना उनको कोई तकलीफ नहीं होती।

हर दौर के अपने शब्द होते हैं। हमारे दौर के शब्दों को मैं 'काली' डायरी में लिखकर नोट कर रही हूँ। यह जरूरी है। मैं मरने के बाद अपना ब्लॉग और वो डायरी छोड़ कर जाना चाहती हूँ। संपत्ति, सोना और रुपया छोड़कर जाने की हैसियत नहीं है। शब्द, घटनायें, शख्सियतें और कहानियाँ तो अपनी छाप समय पर छोड़ कर जाती ही हैं पर मैं कुछ दिनों से लगातार एक रंग को सोच रही हूँ। जी हाँ, जानती हूँ आप कहेंगे भला रंग भी सोचने के टॉपिक होते हैं? क्यों नहीं ! मेरे लिए तो हो ही सकते हैं। 



नोटबंदी के साथ या उसके पीछे एक शब्द चिपका हुआ है जिसका निरंतर इस्तेमाल हो रहा है। मैंने भी खुद कई बार उस शब्द का प्रयोग किया। मुझे एक दिन खयाल आया कि उस रंग का इस्तेमाल अपनी प्रतिक्रिया दिखाने के लिए करना ठीक नहीं है। वह है 'काला धन' में चिपका हुआ शब्द 'काला'। हालांकि शुद्ध हिन्दी में काले रंग को 'श्याम' कहने की एक सांस्कृतिक परंपरा है जो सीधे कृष्ण से जुड़ती है। मुझे इसमें कोई बुराई नहीं दिखाई देती। रोज़मर्रा में श्याम कोई इस्तेमाल नहीं करता। सभी काला शब्द को इस्तेमाल करते हैं।

काले रंग को लेकर 'इर्द गिर्द' एक व्यवस्थित और जमी हुई सोच समझ आती है। व्यवहार में काले रंग के संदर्भ में सेट पैटर्न दिखाई दे जाएंगे। उदाहरण के लिए भारतीय (विशेष रूप से उत्तर) मानसिकता में लड़की का गोरा रंग अच्छा माना जाता है। ऐसा हजारों साल से है। आज के समय में यदि मुझपर यक़ीन न हो तो अखबारों में शादी-ब्याह के विज्ञापनों में लड़की के संदर्भ में 'गोरा रंग' की मांग पर नज़र डाल लें। दक्षिण भारत के बारे में मेरे पास अनुभव नहीं हैं। जो कभी मिला तो काला रंग पार्ट 2 से एक और ब्लॉग एंट्री करूंगी। लेकिन आजकल टीवी पर आने वाली दक्षिण भारत की फिल्मों में कुछ खास बात है जो आप लोगों ने भी गौर की होगी। फिल्म के नायक तो गहरे रंग में दिखाई दे जाते हैं पर नायिकाओं का रंग सफ़ेद ही दिखता है। जो मैं गलत हूँ तो 'बाहुबली' एक बार फिर से देख लें।



हिन्दी फिल्मों ने तो जमकर इस पैटर्न को आगे फैलाया ही नहीं बल्कि लक्ष्मण रेखा की तरह सेट कर डाला है। जो मुझ पर यक़ीन न हो तो विभिन्न नायिकाओं और नायकों को गोरा बनाने वाली क्रीम का विज्ञापन करते हुए देख लें। क्या आपको वो गाना याद नहीं- 'गोरे गोरे मुखड़े पर काला-काला चश्मा....याद आ गया न! ऐसे ही बहुत से बॉलीवुडिया गीत हैं जिनमें साफ तौर पर गोरे शब्द को लड़की से चिपका दिया गया। आजकल तो मानो एक अनिवार्यता बना दी गई है। जिस रफ्तार से 'फेयर एंड लवली' ब्रांड बिक रहा है उससे तो यही लगता है कि एक रोज़ सभी भारतीय सफ़ेद हो जाएंगे। मुझे छोड़कर और उन्हें भी जो इस ब्रांड का इस्तेमाल नहीं करते।   

ख़ैर, आगे अपनी बात जारी रखते हैं। जिसे हम काली कमाई कहकर पुकार रहे हैं और गला खराब कर रहे हैं वास्तव में वह कमाई तो है पर काली नहीं बल्कि अवैध या गैर कानूनी आय या फिर कमाई है। कई दफा आपने एक शब्दावली सुनी होगी- 'आय से अधिक संपत्ति।'  वास्तव में यही सही शब्दावली है। लेकिन हमने काले शब्द को जबरन इस्तेमाल करना शुरू कर दिया क्योंकि हमारे देश के पॉपुलर मंत्री इस शब्द का बिना सोचे समझे इस्तेमाल करते हैं। असल में उन लोगों द्वारा अवैधानिक आय कहकर पुकारा जाना चाहिए।  इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि हम कितनी अपनी भाषा बोलते हैं और कितनी दूसरों की नक़ल करते हैं। अपनी भाषा से मतलब अपनी मातृभाषा नहीं बल्कि वह भाषा जो हम खुद अपने कहने के लिए रचते हैं।

भाषा आज के दौर में परोसी जाती है। घर में दरवाजे के नीचे से सुबह सुबह 16 से 17 पन्नों वाला अखबार हो या फिर टीवी में चलते कार्यक्रम, दफ्तर की धूल खाती फाइले हों या फिर सब्जी तरकारी खरीदने तक की प्रक्रिया में एक ज़ुबान चुपके से बैठी होती है। कहीं फुर्सत नहीं है दिमाग को खुद की भाषा के वाक्य रचने की। जो ज़्यादा देखा वही कई बार जीभ से संचालित होने लगता है। बनाई जा रही व्यस्त दिनचर्या सोचने की प्रक्रिया को रोक रही है और हम दिन पर दिन नक़ली होते जा रहे हैं।



अब आते हैं काले रंग पर। सभी रंग को सोखने के बाद ही काला रंग पनपता है वह भी बिना रोशनी के। काला रंग विपरीत है सफ़ेद रंग का। ऐसा माना जाता है और स्कूलों में पढ़ाया भी यही जाता है। लेकिन आप सोचिए कि क्या यह सही है? मुझे नहीं लगता। वास्तव में यह रंग बाकी रंगों की तरह ही एक रंग है। बाज़ार और महान संस्कृति के पोषकों ने इसे एक हद तक नकारात्मक चोला पहनाया है। इसे अंधेरे से जोड़ा जाता है। अपशगुन का तमगा पहनाया जाता है। सामाजिक धब्बा कहा जाता है। इतना ही नहीं काली शक्ति जैसे शब्द से उन नकारात्मक रूहानी ताक़तों से जोड़ा जाता है जो हमारी दुनिया से परे हैं। अमावस की रात का ज़िक्र भी लगभग कुछ ऐसा ही है। रहस्य का रंग भी यही है। मैंने कई लोगों को देखा है कि वे पैरों में काला धागा बांधकर रखते हैं या फिर गले में काली माला पहनते हैं कि किसी की नज़र नहीं लगे। नज़र क्या है-काली और बचाव भी काले रंग के धागे से किया जा रहा है।

बहुत हद तक इस रंग के आसपास घूमती यह बिल्कुल नयी विचारधारा नहीं है। लंबे समय से इसकी बुनाई होती रही है। यही वजह कि अब हमारे दिमाग में काले रंग से जुड़ी छवियाँ अलग थलग हैं। धर्म से लिपे-पुते इस देश में हर रंग का अपना मजहब है। हिन्दू या मुस्लिम, सभी के अपने खास रंग हैं और उनका महत्व है। लेकिन ऊपरी नज़र डालने पर काला रंग फिर से बिना कुर्सी के रह जाता है। अब कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। इस रंग का अपना एक मुकाम विकसित हो चुका है। अपने पहनावे में लोग इस रंग को जगह तो ही रहे हैं साथ ही साथ इस रंग से जुड़े झूठी कहानियों से बाहर आ रहे हैं। संजय लीला भंसाली द्वारा बनाई गई फिल्म 'ब्लैक' इसका एक अच्छा उदाहरण है। काले रंग की परिभाषा वहाँ बेहतरीन ढंग से दिखाई देती है। एक ताक़त की तरह। ऐसे ही बहुत से उदाहरण होंगे आप लोगों के पास। आप उनके बारे में सोचिए। 

फिर भी राजनीतिक महान नोटबंदी की घटना ने फिर से इस रंग के आगे एक गतिरोधक बना दिया है। हर ज़ुबान पर काला धन या काली कमाई जैसा शब्द फेविकोल से चिपका दिया है। इसने अंबुजा सीमेंट सी मजबूती दिखाई दे रही है। पर आप तो समझदार हैं। वास्तव में यह रंग उतना अनलकी नहीं जितना सोचा जाता है।




The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...