Tuesday, 7 July 2026

समय की गति के संदर्भ में -- पत्र - 49

 प्रिय लूसीलियस 


बिलकुल सही कहा, प्रिय लूसीलियस। यदि कोई व्यक्ति किसी मित्र को केवल तब याद करे जब कोई विशेष स्थान उसे उसकी याद दिलाए तो यह उसकी उपेक्षा और लापरवाही का संकेत है। किन्तु कभी-कभी परिचित स्थान हमारे मन में छिपी हुई आकांक्षा को जगा देते हैं। वे ऐसी स्मृति को पुनर्जीवित नहीं करते जो पूरी तरह मिट चुकी हो बल्कि उस स्मृति को आंदोलित करते हैं जो केवल शांत अवस्था में पड़ी थी। यह उसी प्रकार है जैसे किसी परिवार का शोक जो समय के साथ कुछ कम हो गया हो, फिर से ताज़ा हो उठता है जब वे किसी दास-बच्चे को, किसी वस्त्र को या उस घर को देखते हैं जो उस दिवंगत व्यक्ति का प्रिय हुआ करता था।


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    यह रहा कैम्पानिया और यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि इस प्रदेश ने, विशेषकर नेपल्स और तुम्हारे प्रिय पोम्पेई ने, मुझे एक बार फिर तुम्हारी उपस्थिति की तीव्र इच्छा से भर दिया है। मुझे ऐसा लगता है मानो तुम्हारा प्रत्येक रूप मेरी आँखों के सामने उपस्थित हो। अभी भी ऐसा प्रतीत होता है कि मैं तुमसे विदा ले रहा हूँ। मैं तुम्हें आँसू रोकने का प्रयास करते हुए देख रहा हूँ। उन भावनाओं को व्यर्थ ही दबाने का प्रयास करते हुए जिन्हें दबाया नहीं जा सकता। ऐसा लगता है मानो अभी-अभी ही मैंने तुम्हें खोया हो।

    क्योंकि स्मरण हर बात को मानो 'अभी-अभी' घटित हुई बना देता है, है न? अभी-अभी तो मैं दार्शनिक सोतियोन के घर में बैठा एक बच्चा था। अभी-अभी मैंने न्यायालय में मुक़दमे लड़ना शुरू किया था। अभी-अभी मेरा उनमें रुचि लेना समाप्त हुआ। और अभी-अभी मैं उन्हें लड़ने में असमर्थ भी हो गया। समय की गति असीम है। यह बात सबसे अधिक तब स्पष्ट होती है जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं। क्योंकि यद्यपि समय अत्यन्त तीव्र वेग से भागता है फिर भी वह इतनी सहजता से बीत जाता है कि जो लोग केवल वर्तमान क्षण में ही तल्लीन रहते हैं। उन्हें उसके बीतने का आभास तक नहीं होता।

    क्या तुम इसका कारण पूछते हो? बीता हुआ समस्त समय एक ही स्थान पर स्थित है। हम उसे एक साथ देख सकते हैं। सब कुछ एक ही अथाह गर्त में गिरता चला जा रहा है। फिर, जो वस्तु समग्र रूप से ही इतनी संक्षिप्त हो, उसके भीतर बहुत लंबे अंतराल कैसे हो सकते हैं? हमारा जीवन तो एक बिंदु के समान है बल्कि बिंदु से भी छोटा। फिर भी प्रकृति ने इस अत्यल्प बिंदु को अधिक विस्तृत होने का भ्रम देकर मानो हमारा उपहास किया है। उसने इसका एक भाग शैशव बनाया, दूसरा बाल्यावस्था, तीसरा युवावस्था,। युवावस्था और वृद्धावस्था के बीच की ढलान-सी अवस्था और पाँचवाँ स्वयं वृद्धावस्था। इतने छोटे से जीवन में कितने अधिक पड़ाव बना दिए गए हैं! अभी-अभी तो मैंने तुम्हें विदा किया था। फिर भी यह 'अभी-अभी' हमारे जीवन का एक अच्छा-खासा भाग अपने भीतर समेटे हुए है। आओ, हम सदैव स्मरण रखें कि हमारा जीवन कितना छोटा है और कितनी शीघ्र समाप्त हो जाएगा। पहले समय मुझे इतना तीव्र गति से बीतता हुआ नहीं लगता था। पर अब उसकी रफ़्तार मुझे विस्मित कर देती है। चाहे इसलिए कि मुझे अपनी मंज़िल निकट आती दिखाई दे रही है या इसलिए कि मैंने अब यह ध्यान देना और हिसाब लगाना शुरू कर दिया है कि मैंने कितना समय खो दिया है।

    इसी कारण मुझे और भी अधिक आक्रोश होता है कि जहाँ समय का अत्यन्त सावधानी से किया गया प्रबन्ध भी हमारी आवश्यकताओं के लिए उसे पर्याप्त लंबा नहीं बना सकता, वहीं कुछ लोग अपने जीवन का अधिकांश भाग तुच्छ और अनावश्यक बातों में नष्ट कर देते हैं। सिसेरो का कहना था कि यदि उन्हें अपने जीवन का दुगुना समय भी मिल जाए, तब भी वह गीतिकाव्य के कवियों को पढ़ने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। मैं तर्कशास्त्रियों को भी उसी श्रेणी में रखता हूँ। बल्कि वे तो अपनी मूर्खता में और भी अधिक गंभीर हैं। कवि तो जान-बूझकर मनोरंजन और हल्केपन के लिए लिखते हैं परन्तु ये तर्कशास्त्री यह समझते हैं कि वे कोई बहुत महान कार्य कर रहे हैं। मैं यह नहीं कहता कि ऐसी बातों पर बिल्कुल दृष्टि ही न डाली जाए। किन्तु उन्हें केवल एक सरसरी निगाह से देखना चाहिए, मानो द्वार पर खड़े होकर किसी का अभिवादन कर लिया जाए। बस इतना ही कि हम उनके छलावे में न आ जाएँ और यह न मान बैठें कि उनके कार्यों में कोई गहरा या रहस्यमय महत्व छिपा हुआ है।

    तुम उस प्रश्न के कारण अपने आपको क्यों कष्ट और विनाश की ओर ले जा रहे हो? उस प्रश्न का समाधान करने की अपेक्षा उसका उपहास करना ही अधिक बुद्धिमानी होगी। सूक्ष्म और तुच्छ बातों में गहराई तक उतरना उसी व्यक्ति का काम है जिसे किसी बात की चिंता न हो और जो अपनी ही सुविधा के अनुसार जीवन व्यतीत करता हो। लेकिन जब शत्रु तुम्हें पीछे हटने पर विवश कर रहा हो, जब सेना को आगे बढ़ने का आदेश मिल चुका हो, तब आवश्यकता उन सब वस्तुओं को छोड़ देती है जिन्हें शांति और अवकाश ने बड़े परिश्रम से एकत्र किया था। मेरे पास इतना भी समय नहीं है कि मैं शब्दों के दोहरे अर्थों के पीछे भागूँ और उन पर अपनी बुद्धि का कौशल दिखाने में उसे व्यर्थ नष्ट करूँ।

    “देखो, समस्त जनसमुदाय एकत्र हो चुका है, ऊँची प्राचीरों पर लोग अपने शस्त्रों की धार तेज कर रहे हैं और नगर के द्वार बंद कर दिए गए हैं।”

    चारों ओर युद्ध का शोर और हथियारों की टकराहट गूँज रही है। ऐसे समय मुझे अपना ध्यान साहस पर केंद्रित करना चाहिए। यदि घेराबंदी के बीच, जब स्त्रियाँ और वृद्ध दुर्ग की प्राचीरों पर पत्थर पहुँचा रहे हों, जब युवा सैनिक फाटकों के भीतर एकत्र खड़े हों और बाहर निकलकर युद्ध करने के संकेत की प्रतीक्षा ही नहीं, बल्कि उसकी उत्कंठा से याचना भी कर रहे हों, जब शत्रु के भाले नगर के द्वारों के भीतर तक आकर गिर रहे हों और हमारे पैरों के नीचे की धरती सुरंगें खोदने और किले की नींव कमजोर करने के कारण काँप रही हो... ऐसे समय मैं बैठा-बैठा इस प्रकार की छोटी-छोटी पहेलियाँ बुझाने लगूँ तो हर कोई मुझे पागल समझेगा। वे बिल्कुल सही होंगे।

“जो तुमने नहीं खोया है, वह तुम्हारे पास है।
तुमने अपने सींग नहीं खोए हैं।
अतः तुम्हारे सींग हैं।”

या फिर इसी प्रकार की कोई और बौद्धिक विक्षिप्तता!

    फिर भी, यदि मैं ऐसी बातों में अपना समय नष्ट करूँ तो तुम्हें मुझे उतना ही पागल समझने की अनुमति है जितना वे लोग उस व्यक्ति को समझते। क्योंकि वास्तव में इस समय मैं भी घिरा हुआ हूँ। उस दूसरे प्रसंग में तो बाहरी शत्रु से ही खतरा था। मेरे और शत्रु के बीच एक दीवार थी। परन्तु मेरी स्थिति में प्राणघातक संकट तो यहीं मेरे साथ उपस्थित हैं। मेरे पास ऐसी मूर्खताओं में समय गँवाने का अवसर नहीं है। मेरे सामने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य उपस्थित है।

    मैं किस काम में लगा हूँ? मृत्यु मेरा पीछा कर रही है और जीवन पीछे हटता जा रहा है। मुझे वह शिक्षा दो जो इसके विरुद्ध मेरे काम आ सके! मुझे ऐसा बनाओ कि मैं अब मृत्यु से भागता न फिरूँ। जीवन भी मुझसे यूँ ही फिसलकर न निकल जाए। जो कठिन है उसका सामना करने का साहस दो और जिसे टाला नहीं जा सकता उसे शांतचित्त होकर स्वीकार करने की धैर्यपूर्ण स्थिरता प्रदान करो। मेरे शेष जीवन की संकीर्ण सीमाओं को विस्तृत कर दो। मुझे यह सिखाओ कि जीवन की श्रेष्ठता उसकी लंबाई पर नहीं बल्कि उसके सदुपयोग पर निर्भर करती है। यह भी कि किसी व्यक्ति का जीवन बहुत लंबा होकर भी वस्तुतः जीवन न के बराबर हो सकता है। जब मैं सोने जाऊँ, तब मुझसे कहो, “संभव है, तुम फिर कभी न जागो।” और जब मैं जागूँ, तब कहो, “संभव है, अब तुम फिर कभी न सोओ।” जब मैं घर से बाहर निकलूँ, तब कहो, “संभव है, तुम लौटकर न आओ।” और जब मैं लौट आऊँ, तब कहो, “संभव है, अब तुम फिर कभी बाहर न निकलो।” यदि तुम यह सोचते हो कि केवल जहाज़ पर ही “जीवन और मृत्यु के बीच मात्र एक इंच का अंतर होता है”, तो तुम भूल करते हो। यह दूरी हर स्थान पर समान है। जहाज़ पर मृत्यु हमारी आँखों के सामने दिखाई देती है, पर वास्तव में वह हर जगह उतनी ही निकट रहती है।

    इन भ्रमों के अंधकार को मेरे लिए दूर कर दो, तब तुम मुझे वे शिक्षाएँ कहीं अधिक सरलता से दे सकोगे जिन्हें ग्रहण करने के लिए मैं स्वयं को तैयार कर रहा हूँ। प्रकृति ने हमें शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता के साथ उत्पन्न किया है। उसने हमें बुद्धि प्रदान की है जो यद्यपि पूर्ण नहीं है, फिर भी उसे पूर्णता की ओर विकसित किया जा सकता है। मुझे न्याय का उपदेश दो, कर्तव्यपरायणता का, मितव्ययिता का और संयम का। संयम के दोनों रूपों का, एक वह, जो दूसरे के शरीर से दूर रहने की मर्यादा सिखाता है और दूसरा वह, जो अपने ही शरीर की पवित्रता और मर्यादा की रक्षा करना सिखाता है। बस मुझे मेरे मार्ग से मत भटकाओ। तब मैं अपने लक्ष्य तक कहीं अधिक सरलता से पहुँच जाऊँगा। क्योंकि, जैसा कि एक त्रासदी-कवि ने कहा है, “सत्य की वाणी सरल होती है।”

और इसी कारण हमें बातों को अनावश्यक रूप से जटिल नहीं बनाना चाहिए। ऐसी कुतर्कपूर्ण पहेलियाँ तो केवल शब्दों के जाल हैं। महान उद्देश्यों में लगे हुए मन के लिए उनसे अधिक अनुपयुक्त और कुछ नहीं हो सकता।


अभी के लिए विराम 

विदा 

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