Tuesday, 7 July 2026

मन के विकार को दूर करने के संदर्भ में -- पत्र - 50

 प्रिय लूसीलियस 


चूँकि तुम्हारा पत्र मुझे उसके भेजे जाने के कई महीनों बाद प्राप्त हुआ इसलिए मैंने पत्रवाहक से यह पूछना उचित नहीं समझा कि तुम कैसे हो। इतनी लंबी अवधि के बाद वह यदि कुछ बता भी पाता तो उसके लिए असाधारण स्मरण-शक्ति की आवश्यकता होती! किन्तु मुझे आशा है कि अब तुम इस प्रकार जीवन जी रहे हो कि तुम जहाँ कहीं भी हो, मुझे यह ज्ञात रहे कि तुम कैसे हो। आख़िर तुम्हारा और कौन-सा प्रयत्न होना चाहिए, सिवाय इसके कि तुम प्रतिदिन स्वयं को पहले से बेहतर मनुष्य बनाओ। प्रतिदिन किसी-न-किसी दोष का परित्याग करो। यह समझो कि जिन बातों को तुम अपनी परिस्थितियों की कमियाँ समझते हो, वे वास्तव में तुम्हारे अपने ही दोष हैं।


Ethiopian Art  

    क्योंकि हम प्रायः उन दोषों के लिए समय और स्थान को दोषी ठहराते हैं जो वास्तव में जहाँ भी हम जाएँ, हमारे साथ ही चलते रहते हैं। तुम जानते हो कि मेरी पत्नी के पास हारपास्टे नाम की एक विदूषी स्त्री है, जो बहुत समय से हमारे घर में पैतृक आश्रिता के रूप में रह रही है। (मुझे ऐसे लोगों से, जिन्हें केवल मनोरंजन के लिए रखा जाता है, अत्यन्त अरुचि है। यदि मुझे कभी किसी मूर्ख पर हँसने की इच्छा होती है तो मुझे दूर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मैं स्वयं पर ही हँस लेता हूँ।) तो हुआ यह कि वह विदूषी स्त्री अचानक अपनी दृष्टि खो बैठी। जो बात मैं कह रहा हूँ, उस पर विश्वास करना कठिन है। किन्तु यह बिल्कुल सत्य है। उसे यह तक मालूम नहीं कि वह अंधी हो चुकी है। वह बार-बार अपनी परिचारिका से कमरा बदलने के लिए कहती रहती है और शिकायत करती है कि उसका कमरा पर्याप्त प्रकाशयुक्त नहीं है।

    तुम भली-भाँति समझ सकते हो कि जिस बात पर हम उसके प्रसंग में हँसते हैं, वही बात हम सबके साथ भी घटती है। कोई भी यह नहीं समझता कि वह लोभी है या धनलोलुप। कम-से-कम अंधे लोग तो किसी मार्गदर्शक की माँग करते हैं। पर हम बिना किसी मार्गदर्शक के भटकते रहते हैं और कहते हैं,“मैं महत्वाकांक्षी नहीं हूँ। रोम में रहने का यही ढंग है।” “मैं फिजूलखर्च नहीं हूँ। बड़े नगर में रहने के लिए कुछ विशेष खर्च तो करने ही पड़ते हैं।” “यह मेरी गलती नहीं कि मुझे शीघ्र क्रोध आ जाता है या अभी तक मैंने जीवन की कोई स्थिर दिशा नहीं बनाई। यह तो युवावस्था का स्वाभाविक व्यवहार है।” हम स्वयं को क्यों धोखा देते हैं? हमारा रोग हमारे बाहर नहीं है। वह हमारे भीतर, हमारे प्राणों की गहराई तक समाया हुआ है। हमारे स्वस्थ होने में इतनी कठिनाई इसलिए आती है कि हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हम रोगग्रस्त हैं। हमारे रोग असंख्य हैं और अत्यन्त गंभीर भी। यदि हम उनका उपचार प्रारम्भ भी कर दें, तब भी उनसे पूरी तरह मुक्त होने में कितना समय लग सकता है! परन्तु अभी तो स्थिति यह है कि हमने डॉक्टर की खोज भी आरम्भ नहीं की है।

    और हमारा यह रोग अभी-अभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यदि ऐसा होता तो इसका उपचार अपेक्षाकृत सरल होता। डॉक्टर हमें सही मार्ग दिखा देता। हमारे मन, जो अभी युवा और ग्रहणशील होते, उसका अनुसरण कर लेते। यदि आज हमें अपने स्वाभाविक मार्ग पर लौटाना कठिन हो गया है तो उसका कारण केवल यह है कि हम स्वयं उस मार्ग को छोड़ चुके हैं। मानसिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए शिक्षा ग्रहण करने में हमें लज्जा आती है। परन्तु, ईश्वर के लिए बताओ, इतने महान गुण की प्राप्ति के लिए शिक्षा लेना भला कैसी लज्जा की बात है? क्योंकि यह आशा करना व्यर्थ है कि ऐसा गुण संयोगवश स्वयं हमारे भीतर उत्पन्न हो जाएगा। इसके लिए परिश्रम करना ही पड़ता है। किन्तु यह परिश्रम कठिन नहीं होता, बशर्ते कि हम समय रहते आरम्भ कर दें। जैसा कि मैंने कहा है, अपने मन को उसके विकार गहरे जड़ पकड़ने से पहले ही गढ़ना और सीधा करना शुरू कर दें।

    फिर भी, जब ये विकार गहराई तक जड़ जमा चुके हों, तब भी मैं निराश नहीं होता। निरंतर और एकाग्र प्रयास किसी भी प्रतिरोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। बलूत की लकड़ियों को चाहे वे कितनी ही टेढ़ी-मेढ़ी क्यों न हो गई हों, सीधा किया जा सकता है। टेढ़े वृक्ष-तनों को गर्मी देकर मोड़ा जाता है और उनके स्वाभाविक आकार को बदलकर उन्हें वैसा रूप दिया जाता है जैसा हम चाहते हैं। तो फिर मन के लिए अपने को नया रूप देना कितना अधिक सरल है! मन तो किसी भी द्रव से अधिक लचीला और अधिक सहजता से ढलने वाला है। आख़िर मन है ही क्या? वह तो एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित प्राणवायु (श्वास) मात्र है। तुम देखते ही हो कि वायु, अन्य किसी भी पदार्थ से अधिक हल्की होने के कारण, उसी अनुपात में सबसे अधिक परिवर्तनशील और अनुकूलनशील भी होती है।

    यह सत्य है कि इस समय हमारे भीतर दोषों का निवास है। वे बहुत लंबे समय से हमारे भीतर बसे हुए हैं। फिर भी, प्रिय लूसीलियस, इसका यह अर्थ नहीं कि तुम्हें आशा छोड़ देनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति पहले दोषपूर्ण हुए बिना उत्कृष्ट चरित्र का स्वामी नहीं बनता। हम सब पहले ही दोषों के वश में आ चुके हैं और सद्गुण सीखने का अर्थ है— अपने दोषों को भूलना और उनसे मुक्त होना। फिर भी, जब हम अपने आत्म-संशोधन के कार्य में लगते हैं तो हमें उत्साह बनाए रखना चाहिए। क्योंकि एक बार जब सद्गुण वास्तव में हमारे अधिकार में आ जाता है तब वह सदा के लिए हमारा हो जाता है। सद्गुण को फिर भुलाया नहीं जाता। इसका कारण यह है कि जो गुण किसी वस्तु के स्वभाव के अनुरूप नहीं होते, वे वहाँ स्थिर नहीं रह पाते। इसलिए उन्हें हटाया और त्यागा जा सकता है। परन्तु जो वस्तु अपने स्वाभाविक स्थान पर आ जाती है, वह वहीं दृढ़तापूर्वक स्थिर रहती है। सद्गुण हमारे स्वभाव के अनुरूप है जबकि दोष हमारे स्वभाव के प्रतिकूल हैं।

    किन्तु जैसे एक बार प्राप्त हो जाने पर सद्गुण हमें छोड़कर नहीं जाते और उन्हें बनाए रखना सरल हो जाता है, वैसे ही उन्हें प्राप्त करने की शुरुआत करना कठिन होता है। क्योंकि दुर्बल और रोगग्रस्त मन की यह विशेषता होती है कि वह उस वस्तु से भयभीत रहता है जिसका उसने अभी तक अनुभव नहीं किया है। इसलिए उसे प्रारम्भ करने के लिए मानो बाध्य करना पड़ता है। परन्तु एक बार आरम्भ हो जाने पर यह औषधि कड़वी नहीं लगती बल्कि जैसे-जैसे वह रोग का उपचार करती है, वैसे-वैसे आनंद भी प्रदान करती है। अन्य प्रकार की चिकित्सा में सुख उपचार के बाद प्राप्त होता है। किन्तु दर्शन का उपचार एक साथ ही औषधि भी है और आनंद भी।


अभी के लिए विदा 

No comments:

Post a Comment

मन के विकार को दूर करने के संदर्भ में -- पत्र - 50

 प्रिय लूसीलियस  चूँकि तुम्हारा पत्र मुझे उसके भेजे जाने के कई महीनों बाद प्राप्त हुआ इसलिए मैंने पत्रवाहक से यह पूछना उचित नहीं समझा कि तुम...