Tuesday, 26 June 2018
बारिश का मौसम
Sunday, 20 May 2018
विज्ञापन और छवियाँ - स्त्री छवियाँ
जीवन एक बहुत बड़ा फ़लक है जिसमें तमाम तरह के अनुभव सांस लेते हैं। यह किसी बैंक
खाते के अंदर मौजूद दूसरा छोटा खाता होता है जिसमें हम अपनी थोड़ी थोड़ी बचत रखते
जाते हैं और जरूरत के समय उसका उम्दा इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। जब
रोज़मर्रा में कुछ अलहदा टकराता है तब एक के बाद एक अनुभव खुलने लगते हैं। ये अच्छे
और बुरे तो होते ही हैं और संख्या में भी अधिक होते हैं। हम औरतों के लंबे से अनुभव संचय होते रहे हैं। हमारे समय की
एक विशेषता यह भी है कि अनुभवों के कई तरह की सतहें जुड़ रही हैं और इनका रुख बाहर
की दुनिया की ओर भी है। अब किसी भी औरत के पास अपने दफ़्तर, स्कूल, कॉलेज, सड़क, दुकान, बाज़ार, पार्क आदि जगहों से जुड़े कई तजुर्बे बनते हुए दिखाई और
सुनाई देते हैं। निश्चित तौर पर हम एक लंबा सफर कर के आ रहे हैं और आज अपने हकों
के लिए लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। फिर भी हमें उन छवियों से सावधान रहना ही पड़ेगा
जिनमें एक ‘इंसान’ को वस्तु या एक ही फ्रेम में क़ैद करके पेश किया जा रहा है।
वास्तव
में विज्ञापन की दुनिया में या फिर डिजिटल जगत में छाई हुई कुछ छवियों पर एक
संज्ञान लेने की इस युवा महिला-पुरुष पीढ़ी को ज़रूरत है। हमारे साथी पुरुषों को यह
सोचना ही होगा कि औरत कोई बे-दिमाग प्राणी या रोबोट नहीं है जो एक अदना सा सेंट
सूंघकर उस पर फिदा हो जाएगी। जब भी इस तरह के विज्ञापन टीवी पर प्रसारित हों, तब यह जरूर सोचें कि यह अपने उत्पाद को बेचने की घटिया
रचनात्मकता भर है और उन पर तरस खाएं। महिलाओं को यह जरूर मुंह खोल कर और तेज़ आवाज़
में बताना चाहिए कि यह एक घटिया विज्ञापन है जो सरासर भ्रामकता पैदा करता है।
प्रेम और मोह जैसे भाव नितांत आत्मिक होते हैं जिनका सेंट और उसकी महक से दूर दूर
तक कोई लेना देना नहीं है।
फोन
सेवा देने वाली भारत की एक बड़ी कंपनी का विज्ञापन बेहद आराम से आधी आबादी को एक
सेविका के ही फ्रेम में फिट करने का गेम खेल रही है। विज्ञापन का सार यह है कि
पत्नी दफ़्तर में मालकिन है और पति एक कर्मचारी। वह महिला काम के प्रति प्रतिबद्ध
है। लेकिन दूसरे ही दृश्य में वह घर पर जाकर खाना बनाती है और वीडियो कॉल करके
इंतज़ार करने की बात कहती है। यह विज्ञापन पहली नज़र में बिलकुल सादा और आकर्षक है।
लोगों को प्रेम सा एहसास देने के लिए काफी है। लेकिन यह बहुत खतरनाक है कि दफ्तर
में भी काम करो और घर पर जाकर खाना बनाओ। वास्तव में जिस बात को हल्के से लिया गया
है वह महिला श्रम है। थकान दोनों को होती है।
घर
और उसके अंदर के भाग भी लंबे समय से औरतों के लिए पक्के किए जाते रहे हैं। जैसे
दहलीज़ पर नहीं खड़ा होना चाहिए, खिड़की से नहीं झांकना चाहिए आदि। जब मेहमान आए तो कोई लड़की
उनके सामने न आए, जैसी
रस्म भी आज भी हमारे कस्बों और शहरों में दिखती है। दरवाज़ों पर लगे पर्दों का पूरा
विमर्श ही हम औरतों को इंगित करता है। इन सब से अधिक रसोई के अंदर जमी हुई छवि माँ
व पत्नी के नाम ही सुपुर्द है। इसलिए कहीं न कहीं इन परंपरागत छवियों को चटकाना
जरूरी है। एक बार चटकी तो टूटेंगी जरूर।
इसी
तरह एक मोटर साईकिल का विज्ञापन टीवी पर दिखाया जाता है। विज्ञापन के नेपथ्य में
एक राजस्थानी गाना चलता है जो सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन इस विज्ञापन पर
पर्याप्त निगाह डालकर समझना जरूरी है। महिला पानी भरने दूर रेगिस्तान में गई है और
उसके पास लगभग पाँच पानी के धातु के छोटे-बड़े घड़े हैं। वह राह पर खड़ी है। तभी एक
मोटर साईकिल वाला आता है और वह पीछे बैठती है। अपने सिर पर लगातार पाँचों घड़ों को
लिए बैठी, वह यह देखती है कि घड़े गिर नहीं रहे हैं। मोटर साईकिल ऐसे
चलाई जाती है कि महिला को झटके नहीं लगते और उसका पानी नहीं गिरता। अंत में गाने
में कहते भी हैं, ‘झटका
झूठ लागे रे!’ विज्ञापन
भले ही मोटर साईकिल के पुर्जों और बनावट का है फिर भी राजस्थानी महिला की वही
पूर्ववत छवि है। अब या तो राज्य सरकारों ने अपना काम इतने सालों से ठीक नहीं किया
कि आज भी उन्हें पानी लेने जाना पड़ता है। या फिर इन कंपनियों के रचनात्मक विभाग
इतने दयनीय क्यों होते हैं कि वे किन्हीं दूसरी छवियों के बारे में सोच नहीं पाते?
एक
दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जब गूगल पर अंग्रेज़ी में विलेज़ विमीन टाइप किया जाता है
तब महिलाओं के घिसे-पिटे चित्र भी साथ में दिखाये जाते हैं। उनमें से अधिकतर गाँव
कि महिलाओं को चूल्हा-चौका, खेतों
में काम करते हुए, पनघट
में पानी भरते हुए मटकों के साथ, रोटी थापते हुए, घर की चार दीवारी में, किसी के इंतज़ार में रहते हुए दिखाया गया है। दिलचस्प यह है
कि उनके पास गाँव की महिलाओं की किसी दूसरी छवि की कल्पना ही नहीं है। यह एक
अदृश्य पर भयानक तथ्य है। जिसे हम बेहद सामान्य तौर-तरीकों से लेते हैं। इसलिए गढ़ी
गई छवियों से डर लगता है। यह ख़्वाहिश है कि ये सभी गढ़ी हुई छवियाँ टूटे और हम भी
किसी कलाकार के रूप में, यात्री
के रूप में, किसी
फोटोग्राफर के रूप में, जंगल
में सफारी करते हुए, आसमानी
राइडिंग करते हुए, समुद्री
ट्रिप का मज़ा लेते हुए आदि छवियों में दिखें और पहचानी जाएँ। ये सब छवियाँ ऐसा
नहीं है कि मौजूद नहीं हैं पर वे सिर्फ एक वर्ग तक सीमित हैं। एक आम महिला भी यह
सब कर ही सकती है तो वे क्यों न दिखे!
अंतर्राष्ट्रीय
महिला दिवस आता है तब हम महिला सशक्तिकरण की बातें करने के मोड में आ जाते हैं।
रैलियाँ निकाली जाती हैं। बैनर बड़े आकार में दिखने लगते हैं। कुछ नारे तेज़ आवाज़ों
में सुनाई देने लगते हैं। सरकारी और गैरसरकारी संगठन अपनी आवाज़ें बुलंद करने से
पीछे नहीं हटते। आधी आबादी तुरंत ब्रेकिंग न्यूज़ की तस्वीरों में तब्दील हो जाती
है। लेकिन उन मुद्दों का क्या जिनकी वास्तव में खबर लेने लायक़ हैं। देश में अब भी
उन कच्चे और पके हुए औरताना अनुभवों की सुध नहीं ली जाती जो आधी आबादी के
सशक्तिकरण के संकेतक हैं। पढ़ चुकी बिटियाओं के लिए अब भी रोजगार दूर का चाँद है जो
बस दिखता है पर कभी हासिल नहीं होता। सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। इन सब मुद्दों
के साथ बाज़ार द्वारा घटिया और परंपरागत जली-कुटी छवियों को भी महत्वपूर्ण मानना
पड़ेगा। आज हर हाथ में मोबाइल है और हर कोई वीडियो-फिल्म्स देखने का दीवाना है। ऐसे
में ये बाजारी विज्ञापन औरतों की गलत छवि पेश करते हैं जिनका हमें संज्ञान लेना ही
होगा।
(Painting by Thomas
Hammer)
Wednesday, 21 March 2018
हॅलो दिल्ली
मिथ- दिल्ली की लड़कियों की आवाज़ सुरीली नहीं होती!
जवाब सुनते जाइए... आइये!
उसने पूछा- "आप कहाँ की हैं?"
मैंने चौंकते हुए पूछा- "मतलब?"
उसने फिर पूछा- "मतलब आप कहाँ की रहने वाली हैं?"
मुझे इस सवाल से भी परेशानी हुई और फिर मैंने वही शब्द दोहराया- "मतलब?"
उसने इस बार साफ तरीके से सवाल पूछा- "मेरा मतलब दिल्ली की हैं या इससे बाहर?"
इस सवाल से हर बार बहुत कुफ़्त होती है। जहां बैठी हूँ वहीं की हूँ। जहां मैं नहीं हूँ, वहाँ की मैं हो ही नहीं सकती। न मैं होना चाहती हूँ। मैंने उसे थोड़ा इंतज़ार करवाते हुए जवाब दिया- "अम्म...दिल्ली की हूँ...यहीं जन्म लिया, यहीं पढ़ाई की और यहीं आगे की पढ़ाई भी जारी है।"
जवाब सुनकर उसने थोड़ा संभलते कहा- "दिल्ली की लड़कियां आपकी तरह बहुत धीमे धीमे नहीं बोलती। उनकी आवाज़ सुरीली नहीं होती जैसी आपकी है। मुझे लगा आप कहीं और की रहने वाली हैं।"
मुझे उसकी यह बात सुनकर एक पल को लगा कि कोई कड़वाहट मुंह में जबरन घुल गई है। मन में एक लहर उठने लगी कि लोगों ने ऐसे विचार आखिर कहाँ से अपने मन में ट्यूनिंग के साथ जमा लिए हैं कि फलां लोग यहाँ के ऐसे होते हैं तो फलां लोग वैसे होते हैं। लोग, लोग जैसे क्यों नहीं होते। पिछले दिनों मार्केज़ के लिखे उपन्यास को पढ़ते हुए उस पंक्ति पर रुक गई जिसमें लिखा था कि व्यक्ति जहां मरता है वही जगह उसकी हो जाती है। घर आकार मैं देर तक यही सोचती रही कि मैं कहाँ मरूँगी? क्या यहीं इसी शहर में? या फिर तक़दीर कहीं और ले जाएगी?...ऐसे सवाल मन में चल ही रहे थे तब मन में सुरीली आवाज़ का ज़िक्र आया।
मुझे यह तारीफ़ कतई नहीं लगी। लगी तो बेइज्जती ही। हर जगह हर तरह के लोग होते हैं। जैसी जलवायु-जमीन वैसी ही उनकी बनावट। लेकिन क्योंकि इंसान पेड़ नहीं है तो वह एक जगह नहीं रहता अपनी जिंदगी के चक्र में उसने हर तरह के रिश्ते क़ायम किए हैं। इसलिए शरीर की बनावट में फर्क आ ही जाते हैं। और ये अंतर स्वाभाविक ही हैं। ये हर तरह के भी है।अब दिल्ली विषय पर आते हैं। यहा...देश की राजधानी में हर तरह के लोग रहते हैं और यह सिलसिला अभी भी चल रहा है और मुझे हाल के वर्षों में ऐसा नहीं लगता कि थमेगा भी। हर रोज़ बहुत से लोग आते हैं और यहीं के हो जाते हैं।
Robert Farquhar- The Bohemian Village Voice
जिसकी जहां मर्ज़ी वहीं घर बसाये। सबको हक़ है। रोटी की तलाश मेरे पिताजी को दिल्ली के आपातकालीन वर्षों में ले आई थी और तब से उन्हों ने और दिल्ली से जितना लिया उतना ही लौटाया भी। बहुत सालों से सभ्य नागरिक बने हुए हैं यही क्या कम बात है! इसके बाद मेरी बारी आई। मैंने जब से अपना होश संभाला यहीं की गलियों में खुद को पाया। मुझे यह नहीं बताया गया कि तुम फलां राज्य की हो, न मेरे टीचर ने कभी मुझे यह कहकर पढ़ाया कि तुम फलां राज्य से ताल्लुक रखती हो...और न ही उन्हों ने यह बताया कि आप दिल्ली की हो तो कैसा बर्ताव करोगी...उन्हों ने यही कहा कि हम जिस देश में रहते हैं वह भारत है और तुम भारतीय हो। बस्स! किसी ने भी यह नहीं सिखाया की दिल्ली के लोग सुरीले नहीं होते तो दिल्ली के लोग ऐसे नहीं वैसे होते हैं.. !
इतने साल हो गए हैं मुझे इस शहर में सांस लेते लेते कि अब कहीं और के शहर की शुद्ध हवा में भी मुझे दमे जैसी फीलिंग आने लगती है। मेरा मन एक या दो दिन के बाद अपने ही घर और शहर में लौट आने का करता है। हाँ घंटों सड़कों में बस में बैठी रह जाती हूँ। जी भर के इस शहर को खरी खोटी भी सुनाती हूँ...फिर भी अगले दिन तैयार हो जाती हूँ कि मुझे जाना है।
इसलिए लोगों के मासूम सवाल भी मुझे कभी कभी चुभ जाते हैं। उनको मेरी आवाज़ से प्यार नहीं बल्कि यह सवाल है कि यह इतनी उत्तेजित क्यों नहीं है? क्यों वॉल्यूम इतना नीचे हैं? बोलने में मैं इतना समय क्यों ले लेती? ऐसे दिल्ली वाले नहीं बात करते...उनके लिए यह जवाब है कि जनाबे आली ...दिल्ली की लड़कियों की आवाज़ हर तरह की है। वक़्त पर मद्धम, कभी तेज़, कभी खामोशी, कभी गीत, कभी ग़ज़ल, कभी चिल्लाहट, कभी बेलगाम हंसी, कभी फूहड़-भौंडी, कभी खिलंदड़, कभी शोर और कभी सिसकी...हर तरह की है। क्यों एक एक फ्रेम वाला कैमरा लेकर फिरती/फिरते हो?
Saturday, 10 March 2018
मैं छोड़कर भाग रही हूँ (कहानी)
घड़ी में दो बज गए हैं। घर के काम अभी अभी ख़त्म हुए हैं, पर पूरे कभी नहीं होते। रोज़ रोज़ करती हूँ, पर पूरे कभी नहीं कर पाती। दो बज गए हैं पर मैं अभी नहाई भी नहीं हूँ। दोपहर का खाना भी नहीं खाया है। आज उकता गई हूँ। आज मैं घर छोड़ कर चली ही जाऊँगी। मैंने मन बना लिया है। अब नहीं रूक सकती। मैंने हल्की गुलाबी रंग वाली साड़ी पहनी है। इसके नीचे आसमानी बार्डर है। इसी बार्डर से यह साड़ी अच्छी लगती है। मैंने खुद से ही खरीदी थी इसे। हाथ में छ-छ चुड़ियाँ हैं काँच की। रंग लाल है। एक बिंदी है माथे पर। और बालों के बीच की लकीर पर सिंदूर। पैरों में दो दो बिछियां हैं। पतली सी पायल है जो भारी कतई नहीं है। पर हर रोज़ मुझे भारीपन का अहसास दिलाती है। घुँघरू न जाने कब के टूट के गिर गए हैं। घर में ही गिरे हैं। बाहर आना जाना होता ही नहीं अब। देखो न, घर में ही गिरे हैं पर मिले कभी नहीं। जाने दो रहते तो शोर ही मचाते। मुझे न शोर अच्छा नहीं लगता। हल्की सी आवाज़ से भी सिर में भयानक दर्द होता है। सहा नहीं जाता शोर।
मुद्दे की बात पर आते हैं।
मुझे पता है कि जब तुम काम से लौटकर आओगे और मेरे पीछे यह पत्र-पाती पाओगे तो बेहद
नाराज़ हो जाओगे। तुम शादी के बाद से जल्दी नाराज़ होने लगे हो। हमेशा खराब के मूड
में रहते हो। लोग समय को बदनाम करते हैं कि वह रुकता नहीं। पर समर, सच कहती हूँ। समय हमेशा रहता है। उसकी यही ख़ासियत होती है। बस तुम और मैं
ही नहीं रहते। गुज़र जाते हैं, बिना एक दूसरे को चौंकाए हुए।
तुम्हें पता है कि हम एक दूसरे को इतना जान गए हैं कि हम एक दूसरे में नया कुछ भी
नहीं खोज पाते। कितनी ऊब बैठती है हम दोनों के बीच में। मुझे इस ऊब से ऊब हो गई है
इसलिए मैंने रोज़ की तरह आज भी यही फैसला लिया है कि मैं जा रही हूँ।
आज सुनो, मेरे जाने को लोग जब जानेंगे तब मेरे भाग जाने से ही जोड़ेंगे। पर क्या
किया जा सकता है! मेरा किसी से कोई चक्कर नहीं है। कोई रिश्तेदार भी नहीं है जिसके
यहाँ जाकर में रहने लग जाऊँगी। अकेले जाने में जोखिम है, पर
मैं यह जोखिम उठाना चाहती हूँ। मैंने कुछ सालों से हर दिन यह भागने की हिम्मत
जुटाई है। पर मैं इतनी कमजोर हो जाती हूँ कि कभी मिसेज़ समर तो कभी बच्चों की माँ
बन जाती हूँ। हमारे बड़े हो रहे बच्चों को लोग देखेंगे तो कहेंगे- ‘देखो वे जो जा रहे हैं,
उन्हीं का माँ इस उम्र में भाग गई है। कैसी माँ है? माँ तो
भगवान होती है। कैसा जिगर था जो छोड़ के भाग गई! हिम्मत न जाने कहाँ से आई।’ और भी बहुत कुछ कहेंगे। पर मुझे आशा है कि हमारे बच्चे नए जमाने के हैं
और मुझे समझ सकेंगे। ऐसे ही तुम्हारे दफ़्तर में जब पता चलेगा तो तुम्हारे आगे सब
हमदर्दी जताएँगे, पर पीठ पीछे ताली मार कर हसेंगे। पर मैं
क्या कर सकती हूँ?
मेरा मन अब कहीं टिक नहीं पा रहा। मुझे रह रहकर समुद्र देखने की तलब होती है। उसकी लहरों के साथ बह जाने का भी दिल कर ही जाता है। किनारे पर जब लहरें आती हैं और पैरों के नीचे से रेत बहा ले जाती हैं, वह अहसास मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैं कैसे बताऊँ कि जब बारिश होती है तब अपने कमरे की शीशे वाली खिड़की पर पानी बहकर गिरता है, तब मुझे बहुत अच्छा लगता है। बारिश की बूंदों को हाथ में, आँखों में ...पूरे शरीर पर पड़ने देने से ऐसा लगता है, यही जीवन है। सर्दियों में जब बच्चे और तुम चले जाते हो तब, धूप में बैठना मुझे बहुत अच्छा लगता है। चटाई पर लेटकर धूप में सींचते जाने का मज़ा मुझसे पूछे कोई तो मैं बताऊँ।
तुम कहोगे मैं पागल हूँ। मेरा मनोविज्ञान बिगड़ गया है। अच्छी ख़ासी शादीशुदा ज़िंदगी बिता रही हो। कोई कमी नहीं फिर यह हरकत। उफ़्फ़! शायद सच में मेरा मनोविज्ञान सड़ गया है। लेकिन मुझमें यह घर छोड़ने की बात आज अचानक तो आई नहीं है। मैंने बरसों की तैयारी से इसे अपने अंदर पाया है। जब मैं शादीशुदा नहीं थी। जब कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठे बैठे कई घंटें गुज़ार दिया करती थी। जींस में जकड़ी मेरी टांगें किसी संगीत के साथ हिला करती थीं, मानो गाना गा रही हों। पर देखो न आज साड़ी के अंदर वे दोनों आज़ाद हैं फिर भी ऐसा लगता है कि बंधी हुई हैं। हाँ, तुम सही कहते कि मैं ज़रा पागल हूँ। खैर अब इस पागल से छुटकारा मिल जाएगा। मैं जा रही हूँ। ...और आखिर में मैं जा रही हूँ।
बीते दिनों से अपने अंदर के एक एक टुकड़े को हर रोज़ भगा रही थी। आज आखिरी टुकड़ा है जिसे लेकर मैं पूरी तरह से भाग रही हूँ। घबराहट हो रही है कदम बाहर रखने में। लेकिन अगर आज इस घबराहट से रूक गई तो कभी खुद को नहीं पा सकूँगी।
( उसने इस चिट्ठी को लिख
लेने के बाद बार बार पढ़ा और तय कर के अपने गहने रखने की जगह के साथ लॉकर में रख
दिया। वहाँ ऐसी ही बहुत सारी चिट्ठियाँ सांस ले रही थीं। हर चिट्ठी का विषय भागने
पर ही था। उसने घड़ी पर नज़र टिकाई। तीन बजने को थे। बच्चे आ रहे होंगे। उसने लॉकर
की चाभी लगा देने के बाद लंबी सांस ली और रसोई की ओर चल पड़ी। )
-ज्योति आयरे
Wednesday, 7 March 2018
ऐ लड़की
एक कहानी लिख रही हूँ। अभी अधूरी है। एक किताब पढ़ रही हूँ पर आधे से भी कम पर अटकी हूँ। कई लोगों के मैसेज आए हैं उन्हें जवाब भी देने हैं। कमरे को ध्यान से देखने पर धूल की भी शिकायत नज़र आ रही है। कल भी कहीं जाना है, इसलिए रह रहकर कपड़े प्रैस करने का भी खयाल आ रहा है। बहुत व्यस्तता है। मुझे इन कामों से अक्सर ऊब नहीं होती। अच्छा लगता है कि कुछ न कुछ हमेशा बाक़ी रहता है करने के लिए। पर यह बात भी है कि इन कामों में मेरी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बह जाता है। थकावट होती है तब रात में नींद भी बेहतर आती है। यही टूटा-फूटा रूटीन है मेरा। हाँ, इस रूटीन में बहुत कुछ नया जुड़ता है और पुराना हटता भी है। इसमें कुछ भी खास नहीं है। इस रूटीन की ख़ासियत भी यही है कि यह ख़ास नहीं।
लेकिन यह पोस्ट इस सिलसिले पर भी नहीं है। वास्तव में इस पोस्ट को लिखने की वजह बहुत पहले बन गई थी पर आज एक दोस्त के फोन ने ट्रिगर कर दिया कि लिख ही डालूँ। बहुत दिनों से अपने बीते जन्मदिन पर कुछ लिखना भी चाह रही थी कि हर जन्मदिन एक होते हुए भी एक सा नहीं होता, इसकी वजह क्या है? बात जब लड़कियों के जन्मदिन की आती है तब बहुत सारी चीजें बदलती और बढ़ती रहती हैं।
लड़कियों के जन्मदिन तब तक बहुत ख़ास रहते हैं जब तक उनको पीरियड आने शुरू नहीं हो जाते। घर में इससे पहले चंकी-पंकी माहौल रहता है। घर के और बाहर के लोगों के दिमाग में बच्ची की छवि बनी रहती है। लेकिन जैसे ही माहवारी शुरू होती है। माँ समेत पिता भी सावधान की अवस्था में आ जाते हैं। इसके बाद अगर एक चार्ट पेपर भी लेने जाना हो तब छोटा भाई साथ भेजा जाता है। मुझे तो लगता है हालात अभी तक या इस पड़ाव तक नियंत्रित होते हैं।
स्कूल में भी कमोबेश लड़कियों की यही दशा दिशा होती है। क्लास रूम में पढ़ने वाली छोटी लड़कियां जल्दी टीचर के नियंत्रण में आ जाती हैं। इसके लिए टीचर के लोहे का स्केल अगर टेबल पर सटाक से पड़ जाये तो वे सब शांत हो जाती हैं, अपनी झुकी कमर के साथ। उनके जवाबों के अंतराल भी थोड़े होते हैं, क्योंकि उनको जबरन चुप करवा दिया जाता है। घरों में भी सुनने वाले लोग उन्हें पूरा नहीं सुनते, इसलिए बहुत सी लड़कियों के वाक्य टूटे या फिर मरम्मत किए हुए महसूस होते हैं। यही वजह भी है कि लड़कियां ख़मोश या निजता की शिकार होती हैं। कई बार लंबी चुप्पियों की भी यही वजह होती है। लड़कियां भावों से अपनी बात अधिकतर कहने की कोशिश करती हैं। ख़ैर यह मेरा ख़याल है। मैं गलत भी हो सकती हूँ।
क्लास रूम में यह भी देखा गया है कि छोटी बच्चियों को हर तरह की बातें सुनने को अधिक मिलती हैं। मसलन आपसी किस्सों के अलावा बढ़ते जिस्म की ऐहतियात वाली बातें जो महिला टीचर के मुंह से निकलती रहती हैं। आप कभी गौर करें तो यह भी पाएंगे कि लड़कियों की कक्षाओं में निजता का तत्व बहुत बड़ी मात्रा में पाया जाता है। दो दोस्तों की बातों के अलावा समूह की और भावी लड़की संबंधी निजता वाली बातें। जिसे लड़कियों को खूबसूरत डायरी लिखने और उसे बनाए रखने में ताउम्र देखा जा सकता है। इसके अलावा लड़कियों में वे सब लक्षण पनपते हुए देखे जा सकते हैं जो भावी औरत बनने के लिए उनमें रोपे जाते हैं।
इसके विपरीत अगर छोटे लड़कों की क्लास में आप दाखिल होंगे तब एक अल्हड़, मस्त, शोर भरा कमरा आपको दिखेगा और महसूस भी होगा। एक बार पाँचवी क्लास के एक पुरुष टीचर लड़कों को पढ़ा रहे थे और कई बच्चे उनसे बीच बीच में मज़ाक भी कर रहे थे। इन मज़ाक़ों की आवृति काफी अधिक थी। दिलचस्प था कि पुरुष टीचर भी इन मज़ाक़ों में बराबर उत्साह दिखा रहे थे। ऐसे मज़ाक किसी भी महिला टीचर को अपनी क्लास में करते हुए नहीं पाया जा सकता अक्सर। अगर कोई बच्ची कुछ कह भी दे तो टीचर उसे मॉरल सफर पर ले जाती हुई पाई जाती है।
जिन कक्षाओं में लड़की और लड़के दोनों पढ़ते हैं वहाँ एक संतुलन जरूर रहता है और लड़कियों कुछ हद तक बढ़िया माहौल मिलता है जहां वे अपने से उलट लड़कों के बारे में बेहतर जान पाती हैं। और लड़कों में लड़कियों के प्रति एक नम्र भावना को भी भाँपा जा सकता है। बहुत सी बातें इसमें जोड़ी जा सकती है। कभी शोध करने के लिए किसी ने बुलाया तो जरूर जाऊँगी फिलहाल यह तो स्कूल का छोटा सा चित्र है।
अब आते हैं कॉलेज में। दिल्ली शहर में बहुत से कॉलेज हैं। लेकिन यह भी है कि कुछ कॉलेज लड़कियों के लिए ही हैं। मुझे नहीं मालूम इन कॉलेजों का क्या स्वाद है क्योंकि मैंने लड़कियों के कॉलेज में जाने से परहेज़ कर लिया था। जहां तक बात है सह शिक्षा की तो आज भी यहाँ एक तरह संतुलन दिख ही जाता है। जो मुझे तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यहाँ भी लड़कियों में स्कूल में डाला गया लड़कीपन दिख ही जाता है। बहुत सी लड़कियां जवाब देने का मन में ही सोच कर बैठी रह जाती हैं। बोल ही नहीं पाती।
कॉलेज खत्म करते करते बहुत सी लड़कियां एक से दुकेली हो जाती हैं। लड़के भी, पर उनका अनुपात कम होता है। लेकिन मास्टर करते करते बची हुई लड़कियां जिनकी शादी ग्रेजुएशन में नहीं होती, वे शादीशुदा हो जाती हैं। जब वे क्लास लेने कॉलेज आती हैं तब बालों में छुपाकर सिंदूर का बेहद हल्का टीका लगाती हैं। दिलचस्प तो यह होता है कि वे बहुत से मौकों पर इस सिंदूर को दिखाना भी चाहती हैं और बहुत से मौकों पर चाहती हैं कि किसी को पता न चले। जब ये शादीशुदा लड़कियां अपनी पुरानी दोस्तों से मिलती हैं जिनकी शादी किसी वजह से नहीं हो पाई है, को सलाह देती हैं- "सही उम्र में शादी कर लेनी चाहिए। पता है बाद में बहुत तकलीफ़ होती हैं!" भारत के कॉलेजों में दी जाने वाली शिक्षा का अंदाज़ा इसी तरह के उदाहरणों से लगाया जा सकता है। हालांकि यह सभी लड़कियों पर लागू नहीं होता। कुछ तो बदलाव है ही पर बहुत बड़ा भी नहीं है।
फजीहत यहाँ भी नहीं है। यह एक सेट पैटर्न है और बहुत से लोगों को यह सामान्य लगता है। उन लोगों से इसे कुबूल कर लिया है और वे इससे खुश भी हैं। फजीहत किसी लड़की के उम्र के बढ़ने के साथ जुड़ी है। यह आधी आबादी की त्रासदी में से बड़ी और दुखद त्रासदी है। जैसे ही उम्र छब्बीस या सताईस पार होती है, एक भयानक दबाव लड़की और उसके घर के लोगों पर आना शुरू हो जाता है। लड़की अगर तीस को हो जाये तो यह विपदा ही है, समझो। उसके दोस्त, जो पक्के होने का दावा करते हैं, उसके टीचर(बहुत से) उसके घर के अपने लोग उसे धिक्कार की नज़र से भी देखना शुरू कर देते हैं। लड़की में जरूर कोई ऐब होगा, इसलिए तो शादी नहीं हो रही, रंग काला है, सुंदर नहीं है, कुछ आता भी तो नहीं, बिगड़ी हुई है तो कौन करेगा...ऐसे कितने ही जुमले सुनने को मिलते हैं।
उपर्युक्त से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह न दिखने वाली विपदा इतनी बड़ी है कि मैं लेनिन, पेरियार, बाबासाहेब की मूर्ति टूटने जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं को, किताब को न पढ़कर, अपनी अधूरी कहानी को पूरा किए बिना इस पोस्ट को रात ग्यारह बजे तक लिख रही हूँ।
फिर भी मैं यह कहूँगी या फिर यह पाया है कि अगर तीस पार करके भी आपकी शादी नहीं हुई तो यह बहुत सामान्य बात है। नहीं हुई तो नहीं हुई। इस बात को बस हल्के में ही लें। एक बार करियर बन जाएगा तो ज़िंदगी आपको उन मौकों के रास्ते भी दिखाएगी जो शादी से अधिक महत्वपूर्ण हैं शायद। शादी के पड़ाव है। लक्ष्य नहीं। जब कोई मिल जाएगा तो शादी भी हो जाएगी। लेकिन खामखाँ के दबाव में लड़कियों तनाव न लो। अपने कुछ शौक विकसित करो। घूमो, फिरो, योजना बनाओ, पेंटिंग करो, लिखने का चस्का पालों, अपना एक छोटा मोटा व्यवसाय शुरू करो, ड्रेस डिज़ाइन करो...ऐसे बहुत से काम हैं जिन्हें किया जा सकता है और खुश रहा जा सकता है। एक बार अपने अंदर की रोशनी में डुबकी लगा लो। तुम्हें सब समझ आ जाएगा।
बहुत सी बातें छूट रही हैं। विज्ञान का या गणित का सूत्र-सवाल होता तो एक समाप्ती तक पहुंचा जा सकता। लेकिन यह विषय कुछ ऐसा है कि हर बार सोचने पर कुछ अलग पहलू निकल आएंगे। मैं और सोचूँगी और लिखूँगी। फिलहाल अभी इतना ही। कुछ दिनों पहले कृष्णा सोबती द्वारा लिखी लंबी कहानी पढ़ी थी 'ऐ लड़की।' इसलिए इस पोस्ट का नाम भी यही ठीक लग रहा है।
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फ़ोटो गूगल से साभार
Saturday, 3 March 2018
फिलॉसफ़ी
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फोटो सौजन्य गूगल
Thursday, 22 February 2018
गुमशुदा (कहानी)
एक लंबी सुबह वाली उबासी
लेते हुए... टाइम तो देखूँ! ...हे भगवान! दस बज गए। छुट्टी
के दिन टाइम बहुत भागता है। कमबख़्त कहीं का! एक दिन तो मिलता है कमर सीधी करने
का...आराम करने का...तय समय से थोड़ा आधिक सोने का...अपने हाथ की एक गरम चाय बनाकर
एक प्याली सुरूर से पीने का...! शर्मिला के मन में यही वाक्य आ जा रहे थे।
सुबह के दस बज चुके थे।
शर्मिला अब पूरी तरह से जाग चुकी थी। बिस्तर में बगल पर कोई नहीं था। इसका साफ
मतलब था कि मानव अपने काम पर जा चुका था। उसकी रविवार को छुट्टी नहीं होती। उसने
बिस्तर पर बैठे बैठे बगल में हाथ फेरा। उसने शायद मानव को महसूस करने की कोशिश की।
उसने एक लंबी सांस भरी। तभी दरवाजे पर घंटी बजी।
उसने अपनी अस्त व्यस्त
मैक्सी को दुरुस्त किया। बालों को दोनों हाथों से संभालते हुए जुड़ा कसा। लेकिन
उनमें तैल न लगा होने के कारण जुड़ा ढीला बंधा। इस बात पर ध्यान दिये बिना वह उठी
और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। दरवाजे पर दो कुंडियाँ लगी थीं। उसने अपना दम लगाते हुए
जैसे तैसे उन्हें खोला और अपने सामने अक्षर को पाया। वह शर्मिला को देखते ही बोला-
“शर्मिला दीदी... मैं कितनी बार आ चुका हूँ। और आप हैं कि दरवाजा खोल ही नहीं रही
हैं। ...लाइये जल्दी से कूड़ा दीजिये...नीचे बड़ा भाई खड़ा रिक्शा लेकर..!” शर्मिला
जो थकावट महसूस कर रही थी, ने अनमना चेहरा बनाते हुए कहा- “अक्षर
अब तू भी डाँटेगा क्या? पता नहीं सनडे है। थकावट से नींद आ
जाती है। सर्दियों में तो और। ...आजा(पीछे हटते हुए) घर में बैठ कुछ देर। चाय
पिएगा। तू भी कितना मेहनती है। जब नया नया आया था तब कितना छुटकू सा था। आज तेरी
लंबाई मेरी लंबाई से भी ऊपर जा रही है।” पीछे मुड़कर देखते हुए शर्मिला ने थोड़ा
ज़िद्द करते हुए कहा- “आ भी जा। कार्ड भेजूँ!”
अक्षर ने बड़ा सा थैला बाहर
रखते हुए रसोई की ओर रुख किया और फटाफट कूड़े की पोलिथीन उठाकर दरवाज़े की ओर लपका।
शर्मिला ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। अक्षर बाहर जाते हुए बोला- “दीदी मार्च
में पेपर शुरू होंगे। इसलिए जल्दी जल्दी काम कर के मुझे पढ़ाई करनी होती है। जब
आपकी लगातार छुट्टी होगी तब आऊँगा। आप चाय अच्छा बनाते हो।” ऐसा कहते हुए वह फटाफट
सीढ़ियाँ उतरने लगा। शर्मिला दरवाज़े तक आई और अक्षर के कदमों की आवाज को सुनती रही।
जब आवाज़ गायब हो गई तब वह दरवाजे की सिर्फ एक कुंडी लगाकर वापस अपने घर के बीच
वाले हिस्से में खड़ी हो गई। उसने चारों तरफ नज़रें दौड़ाई। उसे लगा कि यह किसी अजनबी
का घर है। फिर वह अपने सोने के कमरे में गई। बिस्तर की मुड़ी-तुड़ी बेतरतीब चादर और
कंबल को देखकर उसे अजीब लगा। उसने सिर्फ कंबल ठीक किया और धड़ाम से सर्दी को महसूस
करते हुए कंबल में घुस गई। बालों का ढीला जुड़ा खुल गया और वह आँखें बंद कर लेट गई।
उसे याद आया कि इतनी अधिक सर्दी में वह मैक्सी में कैसे अभी तक रह गई थी। उसे अपने
पर खिन्न आई। उसने अपनी करवट बदली और मानव के हिस्से पर अपना हाथ कंबल से निकालकर
उसे सहलाने लगी। उसने अपनी करवट को फिर सीधा किया और आँखें बंद ही करे रही। चार
साल पहले का एक दृश्य दिखा जिसमें वह मानव के साथ कोर्ट में शादी कर रही है। घर
वालों में कोई नहीं है। महज कुछ दोस्त हैं। वह रजिस्टर पर दस्तख़त कर रही है। उसने
नीली साड़ी पहनी है। मानव ने सफ़ेद कमीज़। दोनों गंभीर दिख रहे हैं। उसके चेहरे पर इस
दृश्य को देखकर भी कोई भाव नहीं आया।
सिरहाने के पास पड़ी छोटी
मेज पर अपनी और मानव की शादी का फोटो फ्रेम रखा हुआ था। उसने चुपके से उस फोटो को
निहारा। चार साल हो गए। वह हैरान हो गई। वह धप से अचानक उठकर बैठ गई। उसके बाल फिर
से चेहरे के ऊपर आ गए। उसने गुस्से से उन्हें पीछे किया। वह बड़बड़ाई। अजीब मुसीबत
हैं ये बाल। इनसे तो आज छुटकारा पाकर ही रहूँगी चाहे मानव कुछ भी कहता रहे। मैंने
क्या उसकी पसंद की चीजों को ढोने का ठेका लिया हुआ है। वह लड़खड़ाती हुई कंबल से
फुर्र से उठ खड़ी हुई। गुसलखाने की तरफ लपकी। न जाने उसे क्या याद आया और अलमारी की
ओर मुड़ी। चर्र की आवाज़ हुई और हाथ में उसके एक कैंची नज़र आई। वह घुसी तो कैंची से
कुछ खर्र खर्र काटने की आवाज़ आई और उसके बाद नल से गिरते हुए पानी का बाल्टी में
अपना आयतन बनाना ही समझ आया।
शर्मिला नहाकर जब बाहर निकली
तब वह अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी। वह सीधे आईने के सामने गई। उसने
तौलिये से फिर से बालों का टपकता हुआ पानी पोंछा। वह पहली बार आज मुसकुराई। वह बहुत
खुश हुई। उसने खुशी से एक उछाल लगाई और बोली- येएएए..! उसे सर्दी का अहसास हुआ।
उसने अलमारी के चरमराते हुए दरवाजे को फिर खोला और मरून शाल निकाल कर जल्दी से
अपने चारों ओर लपेट ली। इसके बाद गुसलखाने की तरफ जल्दी जल्दी गई। लंबे लबे कटे
हुए बेजान बालों को रसोई में रखे कूड़े के बड़े डिब्बे में ऐसा पटका जैसे कोई बेहद
घिन्न की वस्तु हो। उसे इस काम से फिर राहत महसूस हुई।
वह सोने के कमरे में वापस
लौटी। कंबल तय कर बिस्तर ठीक किया। वह कमरे से बाहर निकल ही रही थी तभी उसने शादी
की फोटो को औंधे मुंह रख दिया। वह बड़बड़ाई- “चौबीस घंटे एक ही फ्रेम को देखकर कितनी
अजब सा अनुभव होता है। ज़िंदगी भी बड़ी चिपचिपी हो जाती है। मानव को आने दो। रात को
कहूँगी कोई नई फोटो फ्रेम करवा ले। बदलाव भी तो जरूरी है।” फिर कमरे की दीवारों पर
नज़र फेरते हुए बोली- “इसका रंग भी बदलवा लेंगे। थोड़ी सर्दी कम हो जाये। बिस्तर के
सामने वाली दीवार पर वॉन गॉग की सूरजमुखी वाली पेंटिंग लगाएंगे... बड़ी सी। क्या
शानदार लगेगा कमरा फिर।” वह थोड़ा उत्साहित हो गई थी। उसे सर्दी महसूस हुई और उसने
दीवार घड़ी पर नज़र दौड़ाई। अब तक बारह बजने में दस मिनट शेष थे। वह जल्दी जल्दी कमरे
निकल कर रसोई की तरफ बढ़ी। अपने लिए चाय का पानी गैस जलाकर रखा। सब्ज़ी की छोटी से
प्लास्टिक की टोकरी में से अदरक खोजकर बेलन से कपड़े पर रख कूट-कूट कर चाय के बरतन
में डाल दी। उसने इसके बाद चीनी और चायपत्ती डाली। चाय थोड़ी देर में खोलने लगी।
शर्मिला ने चाय के निखार को देखा। भूरी भूरी। दमकती। उसे खाना पकाना नहीं सुहाता
पर चाय की तो उसे नशेबाजी है। उसने बड़ा सा चाय का मग लिया। उसमें सारी चाय उड़ेलकर
वह सोने के कमरे के बाहर वाले बैठक में पहुँच गई। वहाँ सोफ़े पर वह आहिस्ता से
बैठी। चाय को सामने ही रखी छोटी टेबल पर रखकर उसने दोनों पैर ऊपर कर पालथी बनाई। बाल
अभी भी नम थे। शाल को कसकर ठीक से लपेटा। फिर मग उठाकर चाय की एक घूंट को अपने
अंदर लिया। उसे बेहद अच्छा लगा। उसे लगा कि उसे कितने बरस हो गए हैं कहीं लौटे
हुए। वह कहाँ से लौट रही है उसे मालूम नहीं चला।
उसे हफ्ते के छह दिन तो गुम
रहने का अहसास होता है। दिन दफ्तर में कट जाता है। कंप्यूटर की स्क्रीन कितनी
उकताहट दे देती है। लेकिन जब महीने में बैंक में सैलरी का मैसेज आता है तब उसे
अपनी मेहनत के ऊपर नाज होता है। ख़र्चे का दोनों बंटवारा करते हैं। ताकि दोनों एक
दूसरे पर बोझ जैसे अहसास न छोड़ें। उसे अहसास हुआ कि घुटने मोड़े हुए उसे काफी देर
हो गई है और दर्द हो रहा है। उसने पैर पसार दिये। चाय पीने के बाद उसे क़रार मिला।
उसे कुछ खयाल आया कि वह कुछ करे। उसे लगा कि वह चिट्ठियाँ लिखना चाहती है। पर किसे? वह यह नहीं जानती। वह फटाफट उठी और अलमारी के नीचे दराज़ में खोजबीन करने
लगी।
नीचे के दराज़ में इस
खोजबीन के दौरान उसने सोचा- “मैंने अपनी रचनात्मकता को कितनी तहों में दबा दिया
है। भूल गई हूँ कितना कुछ! उसके हाथ में धूल चढ़ीं कुछ किताबें
आ गईं। कुछ उपन्यास। कुछ कहानियों की किताबें। उसके चेहरे पर दूसरी बार ख़ालिस
मुस्कान उतर आई। उसे फिर से बेहद अच्छा लगा। बहुत अच्छा। शाल के एक किनारे से ही
उसने उन किताबों की धूल हटाई। उसकी पसंद की सारी किताबें थीं। उसने कई पढ़ी भी थीं।
पर उससे कोई गर कोई पूछे की कौन सी किताब में लिखा हुआ है तो उसकी ज़ुबान लड़खड़ा
जाएगी। सुबह से दूसरी बार था जो उसने अपने आप को खोजा था। पहली दफा बाल काटने में
दूसरी दफा धूल से सनी किताबों में।
उसे तलब हुई कि वह फिर कुछ
लिखे। पर किसे? उसे इस बार भी अहसास नहीं हुआ। उसने सारी
किताबों को ठीक से साफ किया और सोने के कमरे में रखी कपड़ों की अलमारी में ऐसी जगह
सजा आई कि जब भी वह अलमारी खोले उसे कपड़ों से पहले ये किताबें पहले दिखें। उसे खयाल
आया कि मानव गुस्सा करेगा। उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। सोचा- “जाने दो, वह कब मेरी बातों पर खुश होता है! जब देखो उसे कुछ कुछ न परेशानी सालती
रहती है। वह हमेशा बाहर खुशी को खोजता है। खुशी को मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट में
खोजता है। महंगे कपड़ों पर टिकी दूसरों की भौंचक नज़रों में वह अपने को तलाशता है।
कभी कभी मानव मुझे मेरा हमसाया नहीं लगता। बल्कि वह, वह साया
बन रहा है जिससे कि पीछा छूटे।” उसने कमरे को फिर से चारों तरफ से देखा और मायूस
होकर वापस सोफ़े के पास लौट आई। वह धड़ाम से सोफ़े पर बैठी न हो जैसे गिर पड़ी हो।
थोड़ी देर बाद वह सोफ़े पर ही लेट गई।
लेटे-लेटे उसने छत के
पंखें को कुछ मिनट तक घूरा। इस बीच वह कुछ सोच नहीं पाई। उसने पंखे की पंखुड़ियों
पर नज़र दौड़ाई। कितनी धूल जमा थी। उसे घिन्न आई। उसे लगा कि वह अपने घर को कभी ठीक
से जान समझ नहीं पाई। जिस बिल्डिंग में उनका यह फ्लैट है उसका नाम चाँद बिल्डिंग
है। उसे तुरंत बिल्डिंग का नाम सोचकर हंसी आई। उसका यह फ्लैट उर्फ घर पांचवें माले
पर है। शादी के अगले साल वह यहाँ रहने आई थी। तब वह काम नहीं करती थी। तब मानव पर
ही सारी ज़िम्मेदारी थी। किस्तों को भरने के लिए और बेहतर ज़िंदगी के लिए उसने काम
करना शुरू किया।
वह उस समय ऐसी नहीं थी। वह
गाती थी। झूमती थी। घूमने की लालच लिए वह अपने कुँवारेपन में कहाँ कहाँ नहीं भटक
आई थी। उसे बाहर जाने के लिए किसी के साथ की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। लोगों के बीच
उसका दम घुट जाता था। उसे यह मालूम था कि खुद को कैसे चाहा जाता है। वह जानती थी
कि वह किस क़िस्म की इंसान है।
उसे मानव से प्यार था
क्योंकि मानव भी उसे चाहता था। उसे लगा मानव भी एक इंसान ही है। सो उसने शादी के
लिए हाँ कर दी। पर कहीं दिल में एक धुकधुकी बाक़ी रह गई कि क्या मानव सच में मुझे
भी मानव समझेगा। पता नहीं शहर में रहने का श्राप है या फिर कर्मों का दोष कि वह चार
साल के अंदर गुम हो चुकी है। वह धीरे-धीरे गुमशुदा हो रही है। उसे लेटे लेटे याद आया
कि उसे खुद को खोजने की एक रिपोर्ट दर्ज़ करनी होगी, वह भी खुद
के अन्तर्मन में। यही अलख उसे मानव के अन्तर्मन में भी जगानी होगी।
उसे तीव्र तलब हुई कि वह
एक चिट्ठी लिखे। इस बार उसे पता है कि उसे चिट्ठी किसे लिखनी होगी। वह तपाक से उठी
और अलमारी के दराज से कॉपी निकाल लाई। उसने लिखा- “मैं भी कमबख़्त हूँ। कितना सोती
हूँ! ज़िंदगी की नींद अब खुली है। लग रहा था कि मैं कितना सो गई हूँ कि अब उठना
नामुमकिन है। पर नहीं कुछ मानसिक धक्के लगने ज़रूरी होते हैं। हमारा मन, हमारा तन और हमारी इंद्रिया कितना जगाती हैं पर हम... कान होते हुए भी
बहरे हो चुके हैं। मुझे मानव के कंधे पर सिर रख आँखें बंद कर बैठे हुए कितना समय
गुज़र गया है। न उसे होश रहता है और न मैं उसे तलाशती हूँ। मुझे होश ही नहीं होता कि उस ‘आदिम’ के तन मन में झांक आने का मौका खोजूँ। उसकी तरल कल्पना तक में मैं अब
गायब हो चुकी हूँ। ...एक दूसरे में दिलचस्पियों का मर जाना ज़िंदगी में ऊब मन की
पैदाइश करना होता है। एक ही जगह गर्दन टिकाये बैठे हैं। दफ़्तर की मुश्किलों को हम
दोनों ख़ूबी के साथ हल कर लेते हैं पर अपनी ज़िंदगियों को हम कठिन सवाल में तब्दील
कर रहे हैं।...।”
शर्मिला अपने लिए लिखने
वाली चिट्ठी को तीन घंटे तक लगातार लिखती रही। बदहवाश सी वह पेन को कागज पर चलाती
रही। जब उसने दीवार पर टंगी घड़ी पर नज़र दौड़ाई तो वक़्त शाम के पाँच बजने की ओर जा
रहा था। उसे ज़ोरों की भूख लगी। उसे याद आया कि उसने सुबह से सिर्फ एक प्याला चाय
को ही गले से नीचे उतारा है। वह कॉपी और पेन को टेबल पर आराम से रखकर उठी और रसोई
की तरफ बढ़ी। उसे पहली बार रसोई में बिखरे हुए सामान से और गंदगी से तेज़ बदबू का
अहसास हुआ। उसने जल्दी से उस सर्दी वाले दिन में खिड़की खोली और साफ सफाई में
तल्लीन हो गई। उसे लगभग 2 घंटे लगे इस काम में। उसे अपनी छोटी सी रसोई को साफ करके
फिर से बहुत खुशी का अहसास हुआ। सुबह से तीसरी बार। अब उसने अपने लिए एक प्याली
चावल लेकर ज़ायकेदार खिचड़ी बनाने की तैयारी की। इस दौरान उसने मोबाइल में आशिक़ी
फिल्म के गाने डाउनलोड किए। उसने ‘बस एक सनम चाहिए
आशिक़ी के लिए’ गाने को बार बार सुना। खिचड़ी के पक जाने पर उसे
एक प्लेट में रखकर वह वापस पेन और कॉपी के पास आ गई। उसने जब चम्मच से पहला खिचड़ी
का कौर मुंह में लिया तब उसे अपने पर हैरानी हुई कि वह भी अच्छा खाना पका लेती है।
वह फिर से बेहद खुश हुई। उसे लगा कि छुट्टी के दिन उसने अपने को पा लिया है। वह
अपने को प्रेम करना फिर से जान गई है।
इसी बीच पलंग के सिरहाने
के पास छोटी मेज पर रखी अलार्म खड़ी तेज़ी से बज उठी। शर्मिला को अपने कंधे पर किसी
के हाथ रखे जाने का अहसास हुआ। जाना पहचाना स्पर्श। “शर्मिला उठो...जाना नहीं है
क्या...पाँच बज रहे हैं...फिर कहोगी देरी हो गई। मानव तुमने उठाया नहीं..!” वह
झटके से उठ बैठी। मानव को लगा कोई डरावना सपना देखा है उसने। उसने शर्मिला को गले
से लगाते हुए कहा- “कुछ नहीं हुआ। सपना देख रही थीं तुम शायद।” उसके माथे को चूमा।
उसके माथे पर आए बालों को ठीक करते हुए बोला- “तुम्हारे बाल बेजान से हो गए हैं।
कटवा क्यों नहीं लेतीं। ढोती रहती हो।” ...मानव कुछ बोलता जा रहा था। इधर शर्मिला
अपने सपने के बारे में सोच सोच कर अपने पर हैरान हो रही थी। उसने मानव को और कसते
हुए कहा- “हाँ अब बोझ नहीं ढोऊँगी!” वह कुछ देर मानव
में खोई रही। उसे लगा जैसे उस के अंदर सीने में एक रोशनी का गोला फूट रहा है। वह
गुमशुदा होते होते बच गई।
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चित्र गूगल से साभार
रसना (कहानी)
"पापा देखो! धूप घर में घुस गई...देखो न...चलो तो सही..!
"
राघव
जो जल्दी ही बुढ़ापे की मार झेलता हुआ दिखाई देता है। तनाव और दुख के कारण उसके बाल
तेज़ी से सफ़ेद हो रहे हैं। चेहरे पर चमक कम है। त्वचा ढीली हो गई है। आँखें अपने
गड्डों में बसने को बेताब होने लगी हैं। इस बच्ची को देखकर ही वह ज़िंदा है। वह तो
खुद डायरी में लिखता है —
“कभी कभी लगता है मेरे अंदर इस अंधेरे की तरह एक खाई है जो
मेरे पैरों को पकड़ कर खींच रही है। आखिर मैं कब तक ज़िंदा रहूँगा ! लगता है मेरे
अंदर कई कुएं खुद गए हैं। पर इनमें जीवन जल नहीं है। है तो काला, वह काला रस जिसमें मैं धीरे धीरे डूब रहा हूँ। ...क्या मैं
जीवित हूँ ?...क्या मैं
जीवित होने की शर्तें पूरी कर पा रहा हूँ ?...नहीं पता।”
वह
कुछ नहीं भूलता, यही उसकी खास बात भी
है और बुरी बात भी। हाल के वर्षों में उसने डायरी लेखन भी शुरू कर दिया था। यह बात
उसकी गोद ली हुई बेटी ही जानती थी। वह रात को जब अपने पिता के कमरे में झाँकती थी
तब पाती थी कि मेज़ पर मेज़-लाइट की रोशनी में उसका पिता न जाने क्या देर तक लिखता
रहता है। क्योंकि डायरी नितांत निजी वस्तु है इसलिए न तो उसने कभी पिता की गैर -
हाज़िरी में पढ़ा और न ही कभी उसके बारे में पूछा।
हालांकि
राघव पिता बहुत अच्छा था और इस बात की पुष्टि यह बच्ची अपने चेहरे की हमेशा बनी
रहने वाली मुस्कान से करती थी। राघव का घर गली में तीसरा मकान था जहां उसका परिवार
कई बरस पहले आया था। राघव की उम्र उस समय सोलह बताई जाती है। वह घर का दूसरा बेटा
था और उसके पिता किसी ब्लेड बनाने वाली कंपनी में अच्छी पगार पाया करते थे। पिता
रविवार के दिन घर में अपनी पत्नी का सहयोग रसोई से लेकर कपड़े धोने तक में दिया
करते थे।
यह
दशक अस्सी के आसपास था इसलिए मोहल्ले में उनका भरपूर मज़ाक बना करता था। उनके लिए
जोरू का गुलाम जुमला गढ़ लिया गया था। राघव के ठीक सामने वाले घर में चटाई बुनने का
काम करने वाला एक परिवार रहता था। घर में माता-पिता और एक लड़की थी जिसकी क़द की
लंबाई की परेशानी को उसके माता पिता के चेहरे पर साफ देखा जा सकता था। माता-पिता
सर्दी हो या बरसात, किसी भी
मौसम में सुबह छ: बजे उठकर बुनाई के काम में लग जाते थे। पर इस काम से वे अपनी
लड़की को दूर रखा करते थे। उनका कहना था कि हम अधिक पढ़ - लिख नहीं पाये। अब अगर
अपनी लड़की को पढ़ा पाए तो इससे बेहतर और क्या बात होगी !
रसना, जो उनकी बेटी का नाम था, वह पढ़ने-लिखने में बहुत बेहतर थी। क्योंकि दोनों परिवारों
का घर आमने-सामने था इसलिए संवाद होना मुनासिब था। धीरे-धीरे दोनों परिवारों में
रिश्ते गाढ़े होने लगे और परिवारों की दोस्ती के चलते रसना और राघव में भी काफी
बढ़िया दोस्ती हो गई। गली में बाकी लोग भी छोटे - मोटे काम - धंधों या फिर नौकरी
करने वाले लोग थे। यह मोहल्ला आम लोगों से जीवंत था।
रसना
की सुंदरता में कोई कमी नहीं थी। उसका रंग धूप में सूखे हुए गेंहू की तरह चमकदार
था और चेहरे की सुंदरता में होंठों के पास का तिल चार चंद लगा देता था। बाल उसके
लंबे थे और वह अपना बहुत समय इन्हें दिया करती थी। रसना के घर में चटाई के शानदार
छोटे-छोटे नमूने सजाये गए थे।
इकलौती
संतान होने के चलते उसे अलग से एक छोटा कमरा हासिल था। उसकी मुस्कुराहट उसकी बातों
से ज़्यादा अच्छी लगा करती थी। उसका धीर पसंद स्वभाव मोहल्ले में सराहनीय था। लेकिन
कुछ ऐसा लोग ज़रूर अपनी नज़रों में उतार लाते हैं जिससे सामने वाले पर निशाना लगाया
जाए।
रसना
का क़द उसके व्यक्तित्व में एब की तरह कुरेदा गया। उसकी बाकी सारी खासियतों को धूल
में मिला दिया गया। और उम्र के बढ़ते और शादी न होने के चलते उसे उसके बेहद कम क़द
के लिए ताने दिये गए। रसना को घर में कभी इस बात का अहसास नहीं था कि उसका क़द बेहद
कम था। लेकिन स्कूल और कॉलेज या फिर आस-पास मानो उसे कुरेद-कुरेदकर लोग कहते, “बौनी रसना, नाटी
रसना,
बित्ता भर की रसना, छुटकी रसना, बेचारी रसना, अजीब-सी लगती है रसना, क्या होगा रसना का..!”
कितना
कुछ सुनती थी रसना!
एक
वक्त ऐसा आया कि उसे आदत लग गई इन सब बातों को सुनने की। पहले वह रो भी जाया करती
थी पर कुछ अरसा हुआ कि उसने रोना भी बंद कर दिया है। ऐसे में राघव ही था जो उसे
कहता था, “तू मेरी दोस्त है।
मजबूत रह। नौकरी के पेपर दे। अपने पैरों पर खड़ी हो। तुझे क्या करना है इन सब बातों
से।” पर रसना जानती थी कि वह भी उसका मन रखने के लिए सब बातें करता है। कॉलेज में
भी वह रसना को दूर से देख ले तो कन्नी काट लेता है। जानकर भी अनजान बन जाता है। घर
का रास्ता एक है पर वह अलग ही आता है। क्या रसना नहीं जानती कि वह ऐसा क्यों करता
है ?
रसना उम्मीद से अधिक समझदार है। वह सब जानती है इसलिए अब वह
खुद ही उसे देखकर अनजान बन जाती है। रसना उसे कब से चाहती थी। इस बात को राघव बहुत
अच्छी तरह से जानता था। लेकिन वह तो अपने को स्मार्ट समझता है इसलिए वह कम से कम
एक बौनी लड़की से तो प्यार नहीं कर सकता। लोग क्या कहेंगे !
रसना
ने अपनी डायरियों में तमाम तरह के जज़्बात लिखे थे। कई तो उसे खुद ही समझ नहीं आते
या अजीब लगते थे। उसने एक रोज़ लिखा, “राघव से उम्मीद नहीं है पर प्रेम से थी। सुना है प्रेम अंधा
होता है। उसे क़द की ज़रूरत नहीं होती। फिर क्या राघव को समझ नहीं आता?”
उसने
एक रोज़ कैथरीन कुकसन का लिखा उपन्यास ‘कलर ब्लाइंड’ पढ़ा और वह बहुत प्रभावित हुई।
उस एक संवाद से सबसे ज़्यादा, “ईश्वर
तो रंग ही नहीं देख सकता। ईश्वर रंग के मामले में अंधा होता है।”
उसने
कुछ देर सोचा और मद्धिम रोशनी में डायरी में दर्ज़ किया —
“क्या ईश्वर क़द के मामले में भी अंधा होता है? हाँ... होता तो ज़रूर होगा। वामन अवतार में जब वह आया तो
क्या उसका भी ऐसा मज़ाक उड़ा था। खैर भगवान अजीब है। क्या वह आसमान में सच में रहता
है जो हमारी सुनता होगा। ऊपर से तो उसे सब कुछ बराबर ही दिखता होगा। क्या मैं भी
दिखती हूँ ? इतनी छोटी हूँ, क्या मैं दिखती होउँगी?”
इस
बीच राघव के परिवार और रसना के परिवार ने दोनों की शादी की बात सोची जिसमें रसना
की माँ ने कहा कि एक बार राघव और रसना की रज़ामंदी भी जाननी चाहिए। पर राघव से पहले
रसना ने मना कर दिया। वह राघव का इंकार नहीं सह सकती थी। राघव ने इस सब के चलते
चैन की सांस ली।
रसना
ने इसके बाद राघव से लगभग दूर रहना शुरू कर दिया था। एक डायरी लेखन ही ऐसी जगह थी
जहां वह उससे मिल लेती थी। बात कर लेती थी। इंसान की समानता की तमन्ना लेखन में
कितनी समान हो जाती है। सभी लोगों के लिए लेखन सच्ची और वास्तविक डेमोक्रेसी जैसा
स्पेस है। कम से कम रसना को तो यही लगता है। क्योंकि जब वह लिखती है तब वह बस एक
लिखने वाली ही रहती है। जो भी शब्द दिलोदिमाग में तैरते हैं वह उन सब से घिर जाती
है। कितना सुखकारी है लिखना !
बंद
कमरे में वह अपने दिन डायरी लेखन और पढ़ने में गुजारती थी। कुछ दिनों से उसे
अजीबोगरीब अहसास और सपने आते थे। इसका ज़िक्र उसने किसी से नहीं किया। रात को सोने
के समय उसने अपने आप को देखा की छाती और गले के हिस्से में बॉल के समान एक गोला
घूम रहा है। वह लगातार घूम रहा गोला सूरज के नवजात बच्चे सरीखा है। उसे लगा कि यह
उसके अधिक सोचने और तनाव का नतीजा है। पर यह गोला लगातार घूमता रहा और घूमता रहा।
उसने एक रोज़ हिम्मत कर के अपनी माँ को यह बात बताई। पर माँ के लिए अब वह छाती के
बोझ में तब्दील हो चुकी थी सो माँ ने उसकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया।
अगले
दिन रात में उसने लेखन से जुड़े कुछ ख़यालों को डायरी में उतारने के लिए कलम थामी। उसने
लिखा, “अधूरे प्रेम और टूटते तारे, लेखन के लिए बहुत बढ़िया विषय हैं। कम से कम मेरे लिए तो हैं
ही।” पर जैसे ही उसने तारे के बारे में सोचा वह रोशनी का गोला उसकी छाती में चक्कर
काटने लगा। उसका गला सूख गया और वह पानी पीने दौड़ पड़ी। पर उसे राहत नहीं मिली। वह
अधूरी चाहत और रोशनी के गोले में तड़पने लगी और सुबह कब हुई उसे मालूम नहीं चला।
इस
बीच राघव अपनी ज़िंदगी के जश्न में खो गया। उसने रसना से उसके कद से भी बड़ा फासला
अख़्तियार कर लिया। वह बेहद कम मिलता और रसना की आँखों से आँखें भी नहीं मिला पाता।
उसके दोस्तों में जो कभी रसना का नाम भी आता तो वह गुस्से से उबल पड़ता। वह दिन - ब
- दिन रसना के नाम से भी चिढ़ने लगा था। यहाँ तक कि उसने घर में घर बेचने की बात भी
कह दी थी कि यह गली मोहल्ला उसके मानक पर उतर नहीं पाता। इसलिए उन्हें घर बेचकर
कहीं ओर अच्छी कॉलोनी में चलना चाहिए।
पिता
खासे नाराज़ हुए और बोले, “अपनी
कमाई करो और जहां चाहे बस जाओ।”
माँ
ने खांसी से ज़रा आराम पाते हुए कहा, “ज़िंदगी भर घर बदलेंगे या कभी टिककर जिएंगे।”
थोड़ा
थमकर वे फिर बोलीं, “अभी भी
वक़्त नहीं गुज़रा है। रसना के बारे में सोचो। ज़िंदगी नेकी और क़ाबिलियत से अच्छी
चलती है। रंगरूप की शाम ढल जाती है।” उस रात वह गुस्से के मारे घर देर से आया और
बिना खाये बिस्तर में चला गया।
मेहनत
के फल बड़े रसीले हुआ करते हैं। रसना की मेहनत रंग लाई थी। उसका किसी बैंक में
क्लर्क के पद पर चुनाव हो गया था। वह इन मायूसियों में रोशनमान हो गई और उसके माँ-पिता
भी खुशी से झूम उठे। रसना ने अपनी खुशी को खुले दरवाज़े से आई हुई रोशनी के समान
लिया। पिता से बोली, “आप दोनों
को अब आराम करने की ज़रूरत है। चटाई बुनने में आप लोग थक जाते हैं। इसलिए आराम
कीजिये। इतनी पगार तो है ही कि हम आराम से खा सकें।”
इसके
दो महीने बाद ही रसना ने घर में रंग रोगन करवाया। अपने कमरे को खासतौर से सजाया और
उसे किताबघर में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं बाद के महीनों में उसने तमाम रुचिकर
किताबें खरीदीं और बाकायदा नियम से पढ़ने भी लगी। इस बीच उसके माँ-पिता ने उन
किताबों से भरपूर नाता जोड़ लिया। पिता भी कुछ ही समय में एक अच्छे पाठक में तब्दील
हो गए और बेहद कम पढ़ी - लिखी माँ को भी हल्की भाषा पढ़ना सिखाने में कामयाब हो गए।
उसके
माँ-पिता ने यह पहली बार अनुभव किया कि किताबों की दुनिया में कितनी रचनात्मकता
है। हर तरह के अनुभव हैं। जगहें हैं। कहानियाँ हैं। किरदार हैं। परिस्थितियाँ हैं।
वह सब है जो ज़िंदगी के साथ मिलता है। किताबों की दुनिया में जाकर उन्हें अपने उस
बर्ताव से घिन आई जो कभी वे रसना के क़द के चलते कर बैठे थे।
पर
आसपड़ोस में लोग उन्हें हिकारत की नज़र से देखते थे जो बेटी के पैसों पर ज़िंदा थे।
लेकिन रसना ने यह साफ कर दिया कि वह इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं देती और घर में
इसका ज़िक्र भी नहीं चाहती। उसने आगे भविष्य में अपनी योजनाओं पर ध्यान लगा लिया
था। वह आत्मविश्वासी बन गई थी। यदि कोई उसे उसके क़द से कम भी समझता तो वह माकूल
जवाब देती और परवाह नहीं करती।
रसना
ने एक बहस यह भी खड़ी कि बौने लोग और बाकी लोग, लोग ही हैं। ‘स्नॉ व्हाइट’ के कहानी या फिर ‘गुलिवर
ट्रेवल्स’ में आए बौने किरदार सिर्फ बौने ही नहीं बल्कि वे इनसे और भी आगे की
खासियत रखते हैं। इस बीच एक पल को भी वह राघव को नहीं भूलती थी। रोशनी का गोला साथ
- साथ चलता था। या यूं कहें कि रसना को उसकी आदत लग गई थी।
रसना
की मुहब्बत डायरी में चाहे जितनी फलफूल रही थी पर उसके व्यावहारिक जीवन में एक
रिश्ता आया और उसने अपने माँ - पिता के घोर आग्रह के चलते मान लिया। सब ठीक था।
उसे इस अचानक आई खुशी पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि“गौरव का
मेरी ज़िंदगी में आना मुझे हैरानी में डाल देता है। मुझे अपने श्रीमती रसना और
कुमारी रसना के दो रूपों को देखकर कुछ समझ नहीं आता कि क्या आकलन किया जाये। यहाँ
भरपूर सम्मान मिलता है जिसकी आदत नहीं रही कभी। अच्छा ...खुशियाँ क्या ऐसी ही होती
हैं ?
मैं खुश हूँ। गौरव जब आसपास रहते हैं तब मुझे बहुत अच्छा
लगता है। छुट्टी का दिन घर में छोटा लगता है। मन में सवाल आता है कि रविवार इतना
छोटा क्यों होता है ? धत् !
मैं पागल हो गई हूँ। दजीवन समय से बुना जाता है। बुनने के साथ साथ व्यक्ति अपने आप
को भी बुनना जान जाता है। रसना अपने को जान रही थी पर दूसरी तरफ राघव अपने भटकाव
को जीने की ललक में ही रह गया था। पर उसे एक बहुत बड़ा आघात लगा। इस बात का पता
रसना को तब लगा जब वह अपने माँ-पिता से मिलने आई। उसे बताया गया कि राघव किसी काम
से कहीं बाहर गया था। घर में उसका बड़ा भाई और माँ पिता ही थे। जाने क्या हुआ कि
रात को आग की लपटों में कोई बच न सका। सब जन जलकर खाक हो गए। राघव जब आया तो रसना, जिसने अपने लिखने की आदत को अभी भी बरक़रार रखा था ने डायरी
में लिखा -
“मुझे राघव के लिए अच्छा नहीं लग रहा। ईश्वर को इंसान की
ज़िंदगी में इस तरह की घटना को नहीं रचना चाहिए। वो जहां भी हो बस जल्दी से
ज़िंदगी की तरफ मुड़े। हमें फिर से वापस आना होता है। कैसी भी बुरी घटना हो या
सदमे लग जाएँ, तब भी हमें ज़िंदगी
की तरफ वापस आना चाहिए। जीने से बेहतर कुछ नहीं।"
कुछ
समय बाद राघव वापस मोहल्ले में आया और साथ में एक बच्ची लाया। पड़ोस के लोगों से
उसने अपनी बातचीत लगभग समाप्त कर दी थी। लोगों ने उस बच्ची के बारे में खुद से कई
क़यास लगाए और कुछ समय बाद चुप हो गए। अब कभी - कभी सामने के घर में आने वाली रसना
को चोरी चुपके देखता है। कुछ दिनों से रात में उसके गले और छाती के नजदीक एक रोशनी
का गोला घूमता है। जब जब वह घूमता है उसे रसना बहुत याद आती है। कई घंटों वह तड़पता
है और उठ नहीं पाता। कभी - कभी उसे लगता है कि उसके बिस्तर के नीचे पानी इकट्ठा
हुआ है और बहुत से तारे उस पानी में घुल रहे हैं।
"जीना तो उतना ही लंबा होता है जितना होता है और मरने के
बारे में सोचने से बुरा कुछ नहीं होता।”
वह
होश खो बैठा। जाने कहाँ चला गया कोई नहीं जानता !
"पापा देखो! धूप घर में घुस गई...देखो न...चलो तो सही..!
"
राघव
जो जल्दी ही बुढ़ापे की मार झेलता हुआ दिखाई देता है। तनाव और दुख के कारण उसके बाल
तेज़ी से सफ़ेद हो रहे हैं। चेहरे पर चमक कम है। त्वचा ढीली हो गई है। आँखें अपने
गड्डों में बसने को बेताब होने लगी हैं। इस बच्ची को देखकर ही वह ज़िंदा है। वह तो
खुद डायरी में लिखता है —
“कभी कभी लगता है मेरे अंदर इस अंधेरे की तरह एक खाई है जो
मेरे पैरों को पकड़ कर खींच रही है। आखिर मैं कब तक ज़िंदा रहूँगा ! लगता है मेरे
अंदर कई कुएं खुद गए हैं। पर इनमें जीवन जल नहीं है। है तो काला, वह काला रस जिसमें मैं धीरे धीरे डूब रहा हूँ। ...क्या मैं
जीवित हूँ ?...क्या मैं
जीवित होने की शर्तें पूरी कर पा रहा हूँ ?...नहीं पता।”
वह
कुछ नहीं भूलता, यही उसकी खास बात भी
है और बुरी बात भी। हाल के वर्षों में उसने डायरी लेखन भी शुरू कर दिया था। यह बात
उसकी गोद ली हुई बेटी ही जानती थी। वह रात को जब अपने पिता के कमरे में झाँकती थी
तब पाती थी कि मेज़ पर मेज़-लाइट की रोशनी में उसका पिता न जाने क्या देर तक लिखता
रहता है। क्योंकि डायरी नितांत निजी वस्तु है इसलिए न तो उसने कभी पिता की गैर -
हाज़िरी में पढ़ा और न ही कभी उसके बारे में पूछा।
हालांकि
राघव पिता बहुत अच्छा था और इस बात की पुष्टि यह बच्ची अपने चेहरे की हमेशा बनी
रहने वाली मुस्कान से करती थी। राघव का घर गली में तीसरा मकान था जहां उसका परिवार
कई बरस पहले आया था। राघव की उम्र उस समय सोलह बताई जाती है। वह घर का दूसरा बेटा
था और उसके पिता किसी ब्लेड बनाने वाली कंपनी में अच्छी पगार पाया करते थे। पिता
रविवार के दिन घर में अपनी पत्नी का सहयोग रसोई से लेकर कपड़े धोने तक में दिया
करते थे।
यह
दशक अस्सी के आसपास था इसलिए मोहल्ले में उनका भरपूर मज़ाक बना करता था। उनके लिए
जोरू का गुलाम जुमला गढ़ लिया गया था। राघव के ठीक सामने वाले घर में चटाई बुनने का
काम करने वाला एक परिवार रहता था। घर में माता-पिता और एक लड़की थी जिसकी क़द की
लंबाई की परेशानी को उसके माता पिता के चेहरे पर साफ देखा जा सकता था। माता-पिता
सर्दी हो या बरसात, किसी भी
मौसम में सुबह छ: बजे उठकर बुनाई के काम में लग जाते थे। पर इस काम से वे अपनी
लड़की को दूर रखा करते थे। उनका कहना था कि हम अधिक पढ़ - लिख नहीं पाये। अब अगर
अपनी लड़की को पढ़ा पाए तो इससे बेहतर और क्या बात होगी !
रसना, जो उनकी बेटी का नाम था, वह पढ़ने-लिखने में बहुत बेहतर थी। क्योंकि दोनों परिवारों
का घर आमने-सामने था इसलिए संवाद होना मुनासिब था। धीरे-धीरे दोनों परिवारों में
रिश्ते गाढ़े होने लगे और परिवारों की दोस्ती के चलते रसना और राघव में भी काफी
बढ़िया दोस्ती हो गई। गली में बाकी लोग भी छोटे - मोटे काम - धंधों या फिर नौकरी
करने वाले लोग थे। यह मोहल्ला आम लोगों से जीवंत था।
रसना
की सुंदरता में कोई कमी नहीं थी। उसका रंग धूप में सूखे हुए गेंहू की तरह चमकदार
था और चेहरे की सुंदरता में होंठों के पास का तिल चार चंद लगा देता था। बाल उसके
लंबे थे और वह अपना बहुत समय इन्हें दिया करती थी। रसना के घर में चटाई के शानदार
छोटे-छोटे नमूने सजाये गए थे।
इकलौती
संतान होने के चलते उसे अलग से एक छोटा कमरा हासिल था। उसकी मुस्कुराहट उसकी बातों
से ज़्यादा अच्छी लगा करती थी। उसका धीर पसंद स्वभाव मोहल्ले में सराहनीय था। लेकिन
कुछ ऐसा लोग ज़रूर अपनी नज़रों में उतार लाते हैं जिससे सामने वाले पर निशाना लगाया
जाए।
रसना
का क़द उसके व्यक्तित्व में एब की तरह कुरेदा गया। उसकी बाकी सारी खासियतों को धूल
में मिला दिया गया। और उम्र के बढ़ते और शादी न होने के चलते उसे उसके बेहद कम क़द
के लिए ताने दिये गए। रसना को घर में कभी इस बात का अहसास नहीं था कि उसका क़द बेहद
कम था। लेकिन स्कूल और कॉलेज या फिर आस-पास मानो उसे कुरेद-कुरेदकर लोग कहते, “बौनी रसना, नाटी
रसना,
बित्ता भर की रसना, छुटकी रसना, बेचारी रसना, अजीब-सी लगती है रसना, क्या होगा रसना का..!”
कितना
कुछ सुनती थी रसना!
एक
वक्त ऐसा आया कि उसे आदत लग गई इन सब बातों को सुनने की। पहले वह रो भी जाया करती
थी पर कुछ अरसा हुआ कि उसने रोना भी बंद कर दिया है। ऐसे में राघव ही था जो उसे
कहता था, “तू मेरी दोस्त है।
मजबूत रह। नौकरी के पेपर दे। अपने पैरों पर खड़ी हो। तुझे क्या करना है इन सब बातों
से।” पर रसना जानती थी कि वह भी उसका मन रखने के लिए सब बातें करता है। कॉलेज में
भी वह रसना को दूर से देख ले तो कन्नी काट लेता है। जानकर भी अनजान बन जाता है। घर
का रास्ता एक है पर वह अलग ही आता है। क्या रसना नहीं जानती कि वह ऐसा क्यों करता
है ?
रसना उम्मीद से अधिक समझदार है। वह सब जानती है इसलिए अब वह
खुद ही उसे देखकर अनजान बन जाती है। रसना उसे कब से चाहती थी। इस बात को राघव बहुत
अच्छी तरह से जानता था। लेकिन वह तो अपने को स्मार्ट समझता है इसलिए वह कम से कम
एक बौनी लड़की से तो प्यार नहीं कर सकता। लोग क्या कहेंगे !
रसना
ने अपनी डायरियों में तमाम तरह के जज़्बात लिखे थे। कई तो उसे खुद ही समझ नहीं आते
या अजीब लगते थे। उसने एक रोज़ लिखा, “राघव से उम्मीद नहीं है पर प्रेम से थी। सुना है प्रेम अंधा
होता है। उसे क़द की ज़रूरत नहीं होती। फिर क्या राघव को समझ नहीं आता?”
उसने
एक रोज़ कैथरीन कुकसन का लिखा उपन्यास ‘कलर ब्लाइंड’ पढ़ा और वह बहुत प्रभावित हुई।
उस एक संवाद से सबसे ज़्यादा, “ईश्वर
तो रंग ही नहीं देख सकता। ईश्वर रंग के मामले में अंधा होता है।”
उसने
कुछ देर सोचा और मद्धिम रोशनी में डायरी में दर्ज़ किया —
“क्या ईश्वर क़द के मामले में भी अंधा होता है? हाँ... होता तो ज़रूर होगा। वामन अवतार में जब वह आया तो
क्या उसका भी ऐसा मज़ाक उड़ा था। खैर भगवान अजीब है। क्या वह आसमान में सच में रहता
है जो हमारी सुनता होगा। ऊपर से तो उसे सब कुछ बराबर ही दिखता होगा। क्या मैं भी
दिखती हूँ ? इतनी छोटी हूँ, क्या मैं दिखती होउँगी?”
इस
बीच राघव के परिवार और रसना के परिवार ने दोनों की शादी की बात सोची जिसमें रसना
की माँ ने कहा कि एक बार राघव और रसना की रज़ामंदी भी जाननी चाहिए। पर राघव से पहले
रसना ने मना कर दिया। वह राघव का इंकार नहीं सह सकती थी। राघव ने इस सब के चलते
चैन की सांस ली।
रसना
ने इसके बाद राघव से लगभग दूर रहना शुरू कर दिया था। एक डायरी लेखन ही ऐसी जगह थी
जहां वह उससे मिल लेती थी। बात कर लेती थी। इंसान की समानता की तमन्ना लेखन में
कितनी समान हो जाती है। सभी लोगों के लिए लेखन सच्ची और वास्तविक डेमोक्रेसी जैसा
स्पेस है। कम से कम रसना को तो यही लगता है। क्योंकि जब वह लिखती है तब वह बस एक
लिखने वाली ही रहती है। जो भी शब्द दिलोदिमाग में तैरते हैं वह उन सब से घिर जाती
है। कितना सुखकारी है लिखना !
बंद
कमरे में वह अपने दिन डायरी लेखन और पढ़ने में गुजारती थी। कुछ दिनों से उसे
अजीबोगरीब अहसास और सपने आते थे। इसका ज़िक्र उसने किसी से नहीं किया। रात को सोने
के समय उसने अपने आप को देखा की छाती और गले के हिस्से में बॉल के समान एक गोला
घूम रहा है। वह लगातार घूम रहा गोला सूरज के नवजात बच्चे सरीखा है। उसे लगा कि यह
उसके अधिक सोचने और तनाव का नतीजा है। पर यह गोला लगातार घूमता रहा और घूमता रहा।
उसने एक रोज़ हिम्मत कर के अपनी माँ को यह बात बताई। पर माँ के लिए अब वह छाती के
बोझ में तब्दील हो चुकी थी सो माँ ने उसकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया।
अगले
दिन रात में उसने लेखन से जुड़े कुछ ख़यालों को डायरी में उतारने के लिए कलम थामी। उसने
लिखा, “अधूरे प्रेम और टूटते तारे, लेखन के लिए बहुत बढ़िया विषय हैं। कम से कम मेरे लिए तो हैं
ही।” पर जैसे ही उसने तारे के बारे में सोचा वह रोशनी का गोला उसकी छाती में चक्कर
काटने लगा। उसका गला सूख गया और वह पानी पीने दौड़ पड़ी। पर उसे राहत नहीं मिली। वह
अधूरी चाहत और रोशनी के गोले में तड़पने लगी और सुबह कब हुई उसे मालूम नहीं चला।
इस
बीच राघव अपनी ज़िंदगी के जश्न में खो गया। उसने रसना से उसके कद से भी बड़ा फासला
अख़्तियार कर लिया। वह बेहद कम मिलता और रसना की आँखों से आँखें भी नहीं मिला पाता।
उसके दोस्तों में जो कभी रसना का नाम भी आता तो वह गुस्से से उबल पड़ता। वह दिन - ब
- दिन रसना के नाम से भी चिढ़ने लगा था। यहाँ तक कि उसने घर में घर बेचने की बात भी
कह दी थी कि यह गली मोहल्ला उसके मानक पर उतर नहीं पाता। इसलिए उन्हें घर बेचकर
कहीं ओर अच्छी कॉलोनी में चलना चाहिए।
पिता
खासे नाराज़ हुए और बोले, “अपनी
कमाई करो और जहां चाहे बस जाओ।”
माँ
ने खांसी से ज़रा आराम पाते हुए कहा, “ज़िंदगी भर घर बदलेंगे या कभी टिककर जिएंगे।”
थोड़ा
थमकर वे फिर बोलीं, “अभी भी
वक़्त नहीं गुज़रा है। रसना के बारे में सोचो। ज़िंदगी नेकी और क़ाबिलियत से अच्छी
चलती है। रंगरूप की शाम ढल जाती है।” उस रात वह गुस्से के मारे घर देर से आया और
बिना खाये बिस्तर में चला गया।
मेहनत
के फल बड़े रसीले हुआ करते हैं। रसना की मेहनत रंग लाई थी। उसका किसी बैंक में
क्लर्क के पद पर चुनाव हो गया था। वह इन मायूसियों में रोशनमान हो गई और उसके माँ-पिता
भी खुशी से झूम उठे। रसना ने अपनी खुशी को खुले दरवाज़े से आई हुई रोशनी के समान
लिया। पिता से बोली, “आप दोनों
को अब आराम करने की ज़रूरत है। चटाई बुनने में आप लोग थक जाते हैं। इसलिए आराम
कीजिये। इतनी पगार तो है ही कि हम आराम से खा सकें।”
इसके
दो महीने बाद ही रसना ने घर में रंग रोगन करवाया। अपने कमरे को खासतौर से सजाया और
उसे किताबघर में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं बाद के महीनों में उसने तमाम रुचिकर
किताबें खरीदीं और बाकायदा नियम से पढ़ने भी लगी। इस बीच उसके माँ-पिता ने उन
किताबों से भरपूर नाता जोड़ लिया। पिता भी कुछ ही समय में एक अच्छे पाठक में तब्दील
हो गए और बेहद कम पढ़ी - लिखी माँ को भी हल्की भाषा पढ़ना सिखाने में कामयाब हो गए।
उसके
माँ-पिता ने यह पहली बार अनुभव किया कि किताबों की दुनिया में कितनी रचनात्मकता
है। हर तरह के अनुभव हैं। जगहें हैं। कहानियाँ हैं। किरदार हैं। परिस्थितियाँ हैं।
वह सब है जो ज़िंदगी के साथ मिलता है। किताबों की दुनिया में जाकर उन्हें अपने उस
बर्ताव से घिन आई जो कभी वे रसना के क़द के चलते कर बैठे थे।
पर
आसपड़ोस में लोग उन्हें हिकारत की नज़र से देखते थे जो बेटी के पैसों पर ज़िंदा थे।
लेकिन रसना ने यह साफ कर दिया कि वह इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं देती और घर में
इसका ज़िक्र भी नहीं चाहती। उसने आगे भविष्य में अपनी योजनाओं पर ध्यान लगा लिया
था। वह आत्मविश्वासी बन गई थी। यदि कोई उसे उसके क़द से कम भी समझता तो वह माकूल
जवाब देती और परवाह नहीं करती।
रसना
ने एक बहस यह भी खड़ी कि बौने लोग और बाकी लोग, लोग ही हैं। ‘स्नॉ व्हाइट’ के कहानी या फिर ‘गुलिवर
ट्रेवल्स’ में आए बौने किरदार सिर्फ बौने ही नहीं बल्कि वे इनसे और भी आगे की
खासियत रखते हैं। इस बीच एक पल को भी वह राघव को नहीं भूलती थी। रोशनी का गोला साथ
- साथ चलता था। या यूं कहें कि रसना को उसकी आदत लग गई थी।
रसना
की मुहब्बत डायरी में चाहे जितनी फलफूल रही थी पर उसके व्यावहारिक जीवन में एक
रिश्ता आया और उसने अपने माँ - पिता के घोर आग्रह के चलते मान लिया। सब ठीक था।
उसे इस अचानक आई खुशी पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि“गौरव का
मेरी ज़िंदगी में आना मुझे हैरानी में डाल देता है। मुझे अपने श्रीमती रसना और
कुमारी रसना के दो रूपों को देखकर कुछ समझ नहीं आता कि क्या आकलन किया जाये। यहाँ
भरपूर सम्मान मिलता है जिसकी आदत नहीं रही कभी। अच्छा ...खुशियाँ क्या ऐसी ही होती
हैं ?
मैं खुश हूँ। गौरव जब आसपास रहते हैं तब मुझे बहुत अच्छा
लगता है। छुट्टी का दिन घर में छोटा लगता है। मन में सवाल आता है कि रविवार इतना
छोटा क्यों होता है ? धत् !
मैं पागल हो गई हूँ। दजीवन समय से बुना जाता है। बुनने के साथ साथ व्यक्ति अपने आप
को भी बुनना जान जाता है। रसना अपने को जान रही थी पर दूसरी तरफ राघव अपने भटकाव
को जीने की ललक में ही रह गया था। पर उसे एक बहुत बड़ा आघात लगा। इस बात का पता
रसना को तब लगा जब वह अपने माँ-पिता से मिलने आई। उसे बताया गया कि राघव किसी काम
से कहीं बाहर गया था। घर में उसका बड़ा भाई और माँ पिता ही थे। जाने क्या हुआ कि
रात को आग की लपटों में कोई बच न सका। सब जन जलकर खाक हो गए। राघव जब आया तो रसना, जिसने अपने लिखने की आदत को अभी भी बरक़रार रखा था ने डायरी
में लिखा -
“मुझे राघव के लिए अच्छा नहीं लग रहा। ईश्वर को इंसान की
ज़िंदगी में इस तरह की घटना को नहीं रचना चाहिए। वो जहां भी हो बस जल्दी से
ज़िंदगी की तरफ मुड़े। हमें फिर से वापस आना होता है। कैसी भी बुरी घटना हो या
सदमे लग जाएँ, तब भी हमें ज़िंदगी
की तरफ वापस आना चाहिए। जीने से बेहतर कुछ नहीं।"
कुछ
समय बाद राघव वापस मोहल्ले में आया और साथ में एक बच्ची लाया। पड़ोस के लोगों से
उसने अपनी बातचीत लगभग समाप्त कर दी थी। लोगों ने उस बच्ची के बारे में खुद से कई
क़यास लगाए और कुछ समय बाद चुप हो गए। अब कभी - कभी सामने के घर में आने वाली रसना
को चोरी चुपके देखता है। कुछ दिनों से रात में उसके गले और छाती के नजदीक एक रोशनी
का गोला घूमता है। जब जब वह घूमता है उसे रसना बहुत याद आती है। कई घंटों वह तड़पता
है और उठ नहीं पाता। कभी - कभी उसे लगता है कि उसके बिस्तर के नीचे पानी इकट्ठा
हुआ है और बहुत से तारे उस पानी में घुल रहे हैं।
"जीना तो उतना ही लंबा होता है जितना होता है और मरने के
बारे में सोचने से बुरा कुछ नहीं होता।”
वह
होश खो बैठा। जाने कहाँ चला गया कोई नहीं जानता !
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