Friday, 17 May 2019

अपार ख़ुशी का घराना- एक छोटा नोट

कुछ समझ नहीं आ रहा कि कैसे शुरुआत की जाए. लेकिन कहीं न कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ती है. इसलिए इस पोस्ट की शुरुआत पढ़ी हुई किताब पर बात कर के करती हूँ. मेरे पास जितना भी वक़्त जो सिर्फ मेरा होता है, बचता है उसी वक़्त में मैंने इस किताब को पढ़कर पूरा किया. "अपार ख़ुशी का घराना" किताब अरुंधती के लिखे अंग्रेज़ी उपन्यास "द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस" का हिंदी अनुवाद है. बहुत सी जानकारी आप गूगल से ले सकते हैं. पिछले साल के अंत में मैंने अपने आप से वादा किया था कि इस किताब को इस साल पढूंगी. यह वादा मैंने पूरा किया. शायद बेहद कम वादों में से एक यह है जो पूरा हुआ. 



खैर, उपन्यास काफी अच्छा है. एक बार पढ़ा जाना चाहिए. इसकी ख़ूबी यह है कि लेखिका उन किरदारों को केंद्र में रखती है जिनको हमने सामाजिक तौर पर कभी किरदार तो क्या इन्सान भी नहीं माना. आफ़ताब उर्फ़ अंजुम से आपको प्यार हो जाएगा. इस किन्नर किरदार में पूरी इंसानियत और करुणा को भरकर डाला गया है. बहुत प्यारा और वाजिब किरदार बन पड़ा है. यह अंजुम ही है जिसकी कहानी आपको किताब वापस रखने नहीं देती और आगे पढ़े जाने की दस्तक देती है. उसका जन्म और उसका नामकरण का क़िस्सा लेखिका इत्मिनान से सुनाती है. उसका ख्वाबगाह तक में जाने को लेखिका बेहद मार्मिक अंदाज़ में पेश करती है. लेकिन अंत में कश्मीर और उसके वर्णन में अंजुम को लेखिका थोड़ा भुला देती है. मेरी यहाँ यही गुजारिश थी कि अंजुम को और उभारना चाहिए था. बहुत कुछ उसके माध्यम से और भी कहा जा सकता था. 

किताब के अन्य किरदारों में मूसा, नागा, बिप्लव और तिलोत्तमा पाठक को कश्मीर और उसकी समस्या की तरफ ले जाते हैं. यह मेरा ख़याल है कि लेखिका ने गहरे में जाकर कश्मीर का हर बारीक़ वर्णन किया है जो वह कर सकती थीं. किसी भी जगह को देखने के कई रुख या आयाम हो सकते हैं. ठीक कश्मीर के साथ भी यही है. लेखिका की आलोचना करने वालों को अपने हिस्से का कश्मीर भी दिखाना चाहिए. लेखिका ने अपने विज़न से उन तमाम दृश्यों को रखा है जो वह समझती आ  रही हैं. 
  
लेखिका कश्मीर के अलावा अंत में एक किरदार की चिट्ठी के सहारे नक्सल की समस्या को पेश करती हैं. यहाँ भी मेरा यही ख़याल था कि इस  समस्या पर और भी लम्बा लिखा जाना चाहिए था जितना कश्मीर पर लिखा गया. आम पाठकों का कश्मीर और उसकी शब्दावली से रिश्ता न होने के चलते कुछ समझ में हेर-फेर हो सकती है. लेकिन बाकी जगह वह बहुत बेहतर ढंग से सबकुछ बताती चलती हैं. 

इस किताब की महिला किरदारों की बात की जाए तो दिलचस्प यह है कि अरुंधती ने उन तमाम लकीरों पर क्रोस लगाया है जो टीवी की दुनिया में हर पल छाये रहते हैं, सुंदरता का पैमाना लिए. महिला किरदार का रंग काला है और वे सभी अपनी तरह से सुन्दर हैं. (मुख्य क़िरदार) तिलो से आपको अंत में प्यार जो जाएगा. लेकिन उसकी अंत में अक्रियाशिलता आपको चुभ भी सकती है. और बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन अच्छा यह है कि पाठक ख़ुद से पढ़कर अपनी बात रखें.अन्य बहुत से क़िरदार हैं जिन्हें जानने के लिए आप को किताब पढनी होगी. सबकुछ तो नही बताया जा सकता.

चलते चलते इतना है कि इतने बड़े उपन्यास का फलक तैयार करना और अंत तक उसे बनाए रखते हुए निभाना कोई मामूली बात नहीं. जगह जगह लेखिका तथ्य भी रखती है जो एक अच्छी बात है. लेखिका के पास एक अपनी शब्दावली है जो वह कहीं सी नक़ल नहीं करती.  एक महीन चलती हुईप्रेमकथा भी है जोतड़प सी पैदा करती है और हमदर्दी भी. मैं पढ़ते वक़्त यही सवाल कर रही थी क्या सब कुछ ठीक नहीं हो सकता? कब होगा सब ठीक?

एक अंतिम बात अनुवाद उम्मीद से बेहतर है. पढ़िए कि दुनिया आपके ग़म और दुःख से परे भरी हुई है. जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूँ तो दूर कहीं सर्दी की वादियों में बंदूकें अपना निशाना साध रही होंगी. कर्फ्यू एक ज़िद्दी धब्बा बना हुआ होगा. सेना और आम लोगों के बीच तनाव बरक़रार होगा. त्रासदी यह है कि दोनों पक्ष अपने लोगों की सलामती की दुआ मांग रहे होंगे. हम जैसे रातजग्गी इस पोस्ट में उस दर्द को समेटने की कोशिश में भी होंगे.

फिर भी कहूँगी, दुनिया को जिंदगी के नाम होना चाहिए.  




 

Sunday, 5 May 2019

ओझल कविताएं

कभी कभी यह सोचती हूँ रूक कर
माँ ने अगर कोई कविता रसोई में गाई होगी 
तो उसका रंग कैसा होगा?
उसकी बनावट क्या रोटी और चाँद की तरह गोल होगी? 

क्या वह हल्दी की तरह पीली होगी?
क्या वह कविता
प्याज़ की तीखी गमक से सनी होगी?
या फिर प्याजी आंसुओं से तर होगी?

दाल की छौंक में कहीं माँ ने एक कविता
गुनगुनाई तो ज़रूर होगी.
इसका मुझे सौ प्रतिशत यकीं है
क्योंकि माँ का खाना एक-दो रोज ख़राब भी होता था

पिता के गुस्से के बावजूद
माँ स्थिर रहती थी  कई बार
यह स्थिरता माँ में ज़रूर कविता ने पैदा की होगी
दोनों ने एक-दूसरे को पूरक किया होगा



(जिस कविता ने माँ के अंदर कवयित्री पैदा की होगी)

उसका विरोध ज़रूर आटे के डिब्बे में बंद हुआ होगा
या फिर चाकू से सब्ज़ियों की तरह उसने
अपने कविता गीत को सम्पादित किया होगा
मुझे यकीं है कि उसकी रचनाएं

भोजन के रूप में रही होंगी
जिसे हम सब ने ख़ूबी से पचाया
हमने उसके हाथ के बने खाने को नहीं
उसकी रचनाओं को खाया...

मुझे यकीं है कि मेरी माँ
अच्छी कविता लिखती होगी
अदृश्य कविता जो बर्तन वाले ख़ाने
पर लटका करती होंगी

आज भी वे कविताएं
अपनी गूँज लिए
रसोई में रहती हैं
जहाँ माँ कविता बनाया करती थी

Thursday, 24 January 2019

एकालाप (कहानी)

"उमस...! सच कहूँ, मौसम का यह मिज़ाज़ मुझे कभी पसंद नहीं आया। सारा दिन मैं गर्मी में घुटकर पड़ी रह जाती हूँ। यह कमरा भी तो देखो, यहाँ एक रोशनदान तक नहीं है जहाँ से हवा, रोशनी या कुछ भी अंदर आ सके। इतनी भी गर्मी कहीं पड़ती है भला ! बिजली के क्या कहने ! आती है, जाती है। बस यही लगा रहता है। हाथ का पंखा एक पल भी हाथ से छूटता नहीं। छोड़ो तो मक्खियाँ मुझे खा जाने को आ जाती हैं। हिकारत - सी होती है मुझे कभी - कभी। ज़िंदगी में बहुत गड़बड़ है। आजकल तो मुझे लगता है, ज़्यादा ही झोल - मोल रहती है। तुम भी तो जब देखो पेट में इधर - उधर चैन से नहीं बैठती। कभी यहाँ घूम जाती हो तो कभी वहाँ। मुझे ऐसा लगता है कि मध्यम आकार की कोई मछली मस्ती कर रही हो। ओह ! मुझे ऐसे ख़याल नहीं लाने चाहिए। तुम पर खराब असर हो सकता है। पर मैं क्या करूँ ? मेरे आसपास का माहौल मुझे अच्छा सोचने भी नहीं देता। 

इसी बीच बिजली आने से पंखा धीमे - धीमे चलता हुआ तेज़ी से चलने लगा।
ओह ! अब मैं राहत की सांस ले सकती हूँ। अब पलंग पर जाकर लेट सकती हूँ। मेरा रंग कॉफी की तरह हो रहा है। चेहरे पर पसीने की बूंदें इस समय सो रही हैं। चेहरे पर एक अजीब - सा खिंचाव, हताशा, चिड़चिड़ाहट और असंतोष रहने लगा है। कमरे ने भी मेरे इस भाव के मुताबिक अपनी ऐसी ही रंगत बना ली है।

मैंने पीले रंग की ढीली - ढाली मैक्सी पहन रखी है। सोने का बिस्तर महकदार है। इस पर मैली और फटी हुई गहरे हरे रंग की चादर बिछी है। मैं अपनी इस दशा में काम नहीं कर पा रही हूँ। पलंग की वजह से कमरे में अधिक जगह नहीं बच पाती। बची हुई जगह में एक बर्नर वाला गैस स्टोव और छोटा सिलेन्डर दुबका पड़ा हुआ है, देखो तो। पास ही दीवार में ईंटों की एक रद्दी छोड़ी हुई अलमारी थी जिसमें रोते हुए दो कप दिख रहे हैं, उधर देखो। कुछ तश्तरियाँ और गिलास हैं। एक प्लास्टिक की मैली बाल्टी है। इसी में कपड़े धुलते हैं और नहाना भी इसी से होता है। मुझे याद है, जब यह बाल्टी खरीदकर लाई गई थी तब इसका रंग लाल था। चमकदार लाल !

कितना अच्छा हो चीज़ें बदले ही न। मैं ज़्यादा पढ़ी - लिखी तो नहीं पर कभी - कभी बहुत अजीब तरह से सोचने लगती हूँ। जैसे कोई दार्शनिक सोचता होगा। जब करने - धरने के लिए कुछ न हो तब दिमाग को करने के लिए बहुत कुछ मिल जाता है। सारा झोल दिमाग का ही है। दिल तो सिर्फ एक मांस का लाल लोथड़ा है। फिल्म वालों ने दिल को इस तरह पेश कर दिया है कि कल का पैदा हुआ बच्चा भी आशिक़ी के नगमें दिल से शुरू करता दिख रहा है। मुझे तो लगता है कि जीवन में सब कुछ, हमारा शरीर भी अपने - अपने हिस्से का काम करते हैं। बाहर के माहौल से टकराहट ही जीवन है। और अंतरंग मन का क्या ? हमारे अंदर भी कितनी टकराहटें होती हैं हर पल।

       


सुनो, तुम पेट में मचलो मत। तुम्हारे ऐसा करने से मेरे ख़याल बिखर जाते हैं। ऐसा लगता है पेट में कुछ घुमड़ - घुमड़कर हवा चल रही है। 

मैं भी कितनी पागल हुई जा रही हूँ। तुम मेरे पेट में से कैसे देख सकती हो यह दशा ? लेकिन तुम्हें पता है, तुम और मैं अलग नहीं हैं। तुम मेरे शरीर से जुड़ी हो। यह बहुत अद्भुत बात है कि मुझे हूबहू अपने जैसे इंसान बनाने की कला आती है। सभी औरतें ऐसा कर सकती हैं। और जो नहीं कर सकते वे कला के ज़रिये अपने को पेश कर लेते हैं। इसलिए तुम मेरी कला हो। कला के पास वह दिव्य शक्ति होती है जो सबकुछ देख सकती है और जीवन में बहा करती है। तुम कहोगी मैं फिर अजीब - सी दार्शनिक बातें कर रही हूँ। अच्छा है न तुम सुनती भी तो हो। तुम मेरे लिए सुनने वाले दो कान हो।

अभी सोने का समय नहीं हुआ है तुम्हारा। तुम सुनती हो तो लगता है कि मेरे साथ कोई है। तुम पेट में तैरती हो तो लगता मैं ज़िंदा हूँ। मैं मर नहीं सकती, क्योंकि तुम मेरे अंदर हो। 

अच्छा एक बात कहूँ ? मैं दार्शनिक नहीं हूँ। मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं है, शायद है भी ! मैं एकालाप बहुत करती हूँ।"


- महिला लंबी सांसें ले रही थी। ऐसी जो शायद वे कभी भूल गई हो। उसका पेट उभरा हुआ था। गर्भ के चलते ही वह सिकुड़कर और छोटी दिख रही थी। बाल बेढब थे। कंघी किए शायद काफी समय हुआ था। दयनीय स्थिति की उस समय मालकिन थी। अगर कोई भी व्यक्ति उसे देखता तो शायद उसे अच्छा खाना बनाकर तुरंत खिलाता। कमरे की एक दीवार पर दो कमीज़ें भी थीं जिससे पता चलता है कि उस महिला के साथ कोई रहता भी है। घर की स्वामिनी तो वह नहीं ही लग रही थी। पर कमीज़ें चिल्ला - चिल्लाकर बता रही थीं कि वे ही इस घर की मालिक हैं। शाम होते ही वे कमीज़ें बता देंगी कि वे सही हैं। सौ फीसदी सही।
उसने पलंग पर बाईं ओर करवट बदलते हुए फिर कहना शुरू किया -

"उस रात मैंने अजीब - सा सपना देखा। मैं भी कितनी मूर्ख हूँ। सपने तो अजीब होते ही हैं।तुम बहस कर रही थी मुझसे। बहस से मेरा रक्तचाप बहुत बढ़ गया था। मैंने कहा, देखो ज़रा, अभी खुद तो नाल से टिकी है और मुझसे ज़ुबान चला रही है ! मैं सांस न लूँ न, तो मर जाओगी तुम ! बेमौत...।

लेकिन तुम कुछ न बोली। तुम्हारी तो सूरत भी अभी विकसित नहीं हुई होगी। अजीब - सी पीली और भूरी शक्ल थी तुम्हारी। शरीर के नाम पर पिलपिला मांस। तुम बहुत ही दयनीय लग रही थी। मुझसे भी अधिक दया करने लायक प्राणी। मुझे किसी शक्ति से यह बात पता थी कि तुम लड़की हो...एक लड़की ! मैंने आँखें बंद कीं तो एक तरह के रंग के छींटें दिखाई देने लगे। शायद ये सब मेरे ज़्यादा सोचने का नतीजा है।

तुम चूंकि जन्मी नहीं हो इसलिए मैं तुमसे अच्छे से और मुनासिब बातें कह पाती हूँ। मैं अधिक पढ़ी - लिखी तो नहीं। पर लिखना जानती हूँ। मैं डायरी लिखती पर इस तरह का खर्च और रचना करना भी हम गरीबों के लिए भारी है। इसलिए मैं तुमसे ही बात कर लेती हूँ और सोचती हूँ कि मेरी बातें ही मेरी रचना है। और तुम, जिसने अभी जन्म नहीं लिया उस रचना की क़द्रदान। तुम मेरी डायरी ही हो। तुम्हें मैं एक तरह से रच ही तो रही हूँ।

अभी मेरी उम्र बत्तीस के पड़ाव पर है। जब मैं बाईस या तेईस की रही होउंगी, तब मैं कुछ - कुछ अंतराल में एक सपना देखा करती थी। बाईं ओर सीने की जगह पर कुछ चलता रहता था। बाद के बरसों में पता चला इस मांस के अंदरूनी लोथड़े को ही दिल कहते हैं। कुछ लोग मन भी कहते हैं। लेकिन एक बात कहूँ, जब दिल कहती हूँ तो ठोस चीज़ का अहसास होता है और जब मन कहती हूँ, तब अदृश्यता ही समझ आती है। मुझे दोनों से ही प्रभावित होने की मनाही थी। मैंने सपने में देखा, मैंने दिल को एक क़ैदखाने में ले जाकर रख दिया है। तुम कहोगी मैं पागल हूँ। पर मैं कहूँगी, नहीं ! यह सपना है। सपने अजीब ही होते हैं। 

जब मैंने उसे एक ऐसी जगह रखा जहाँ उसके मरने की अधिक संभावना थी तब मुझे डर भी लगा कि इसके बिना मैं जी भी पाऊँगी या नहीं। मुझे समझाया गया, खूब समझाया। इसके बिना लड़कियों की उम्र ज़्यादा होती है। मैं मान भी गई। कुछ दिनों बाद दिमाग भी निकालकर मैंने उसी तय क़ैदखाने में जा रख छोड़ा। इस बार मैं बहुत डर गई। घर आकर मैं बेहद परेशान रहने लगी। हालांकि मुझे यह बताया जाता रहा कि तुम ऐसी ही रहती आई हो सदियों से। लेकिन मेरी बेचैनी ने मुझे चैन न लेने दिया। मुझे लगा मैं मर रही हूँ। मुझे खुद को मरने से रोकना था। कैसे भी करके दोनों को वापस अपनी जगह सेट करने का खयाल था।

क़ैदखाने के गेट पर अजीबोगरीब जल्लाद बैठा करता था। अजीब इसलिए कि वह पूरा सामान्य - सा इंसान था। बिल्कुल सामान्य। मुझे हैरत हुई।

...तुम सुन तो रही हो न ? बोर हो जाओ तो बताना !

मैंने एक हफ्ते तक उस जगह के बारे में जानकारी जुटाई। इस काम में जोखिम था। लेकिन जोखिम ही ज़िंदगी की सच्चाई और सिंचाई है। मैं यह जोखिम नहीं उठाती तो मर सकती थी। फिर मुझे आगे आने वाली पीढ़ियों का भी खयाल आया। 

मैंने घड़ी के समय के मुताबिक रात एक बजे का समय चुना। मैं गई। जल्लाद से बोली कि एक झलक लेनी है दोनों की। बाहर से ही देखकर वापस आ जाऊँगी। उसे बहुत मनाना पड़ा। तब जाकर वह माना। जहाँ दोनों क़ैद थे, उस कमरे में एक आदमक़द खिड़की थी। मैंने बाहर से देखा। तुम यकीन नहीं करोगी। एक अजब रोशनी से वह जगह गुलज़ार थी। हरी लताएँ, ढेरों ताज़ा पत्तियाँ, फल, सबकुछ !
ऐसा लगा कि ज़िंदगी यहीं गुलज़ार है। मैंने नज़रें घुमाई तो देखती हूँ कि ढेरों किताबें, डायरियाँ और कलम वहाँ पड़ी थीं। मुझे बहुत हैरत हुई।

मुझे ऐसा अद्भुत दृश्य कभी नहीं दिखा था। एक पल को लगा कि दीवार टूट जाये और मैं वहाँ घुसकर इस नज़ारे को पास से निहार लूँ। इस खूबसूरती को देखने के दौरान अपने दिल और दिमाग की खबर के लिए नज़रें घुमाईं तो वे नहीं दिखे। मुझे फिर हैरत हुई। बाहर जल्लाद से पूछा कि कमरे में किताबें, लताएँ, पेन आदि के क्या कारण है ? तब वह घूरते हुए बोला इनसे दूर रहो। हिम्मत भी नहीं करना इनको देखने या छूने की। मैं घर आई। कई दिन सोई नहीं। इसी दौरान अपने कॉलेज के किताबघर गई। मैं अब भी सांस लेने की कमज़ोरी से गुज़र रही थी। पर जैसे ही किताब घर गई और उन्हें छूआ तब मेरा दर्द और रोग जाता रहा। मैं ठीक - सा महसूस कर रही थी। अब मुझे यह डर था कि अगर मैं इस जगह से निकलूंगी तब फिर सांस कम होगी और शायद मैं मर जाऊँगी। इसलिए काफी देर बैठी रही।

किताबघर बंद करने का समय हुआ तब मेरा डर और बढ़ा कि अब क्या होगा। मैंने आनन - फानन में जितनी किताबें जारी की जा सकती थीं, उतनी करवाकर अपने बैग में रख लीं। अपने संग ले आई। रात भर बैग अपने पास ही रखा। नज़रों से ओझल नहीं होने दिया। उनके पास होने से मुझे क़ैदखाने का वही दृश्य दिखा। अच्छा लगा।
अब यह सपना नहीं आता। कुछ दिन बाद मेरी शादी हुई और मेरा नाता किताबों से कम हो चला। चोरी - चुपके से सिरहाने कुछ अखबार की कतरने रखती हूँ या फिर कोई दो रुपए का पतला पैन जिनसे मुझे ऊर्जा मिलती रहती है। तुम जब आओगी तब तुम मेरी जैसी गलती मत करना। हमारी सारी शक्ति इन्हीं किताबों में है। इसलिए तुम इनको अपने से चिपका कर रखना ! सुन रही हो न ? मैंने क्या कहा ? कहीं तुम सो तो नहीं गई ? तुम कभी भी अपना दिल और दिमाग अपने से जुदा मत करना। वरना तुम्हें भी सांस लेने की परेशानी होगी और हो सकता है...।"
- इतना कहकर वह औरत अपनी करवट बदल लेती है,
"...कि तुम्हारी जान पर भी बन आए। हाँ, मुझे याद ज़रूर करते रहना !"

Wednesday, 15 August 2018

एक नोट

आपको पता है 15 अगस्त को क्या हुआ था?
टीचर का यह सवाल ऐसा था जो अब समझ आया. इस सवाल की मंशा जवाब की इच्छा के साथ नहीं थी बल्कि दिमाग में यह बैठा देने या जमा देने की जिद्द के साथ थी कि आपको आज़ादी मिली थी. यह वहम था. क्या सिर्फ अंग्रेजों से ही आज़ादी चाहिए थी? देश को आज़ादी मिली थी. हम अंग्रेजों के गुलाम थे. वो हम पर राज करते थे. हमें बहुत से नेताओं और लोगों ने आज़ादी दिलाई.  टीचर ने बहुत सालों तक यहीबताया जब तक स्कूल में पढ़ती रही. अब तो थकावट सीलगती इन जवाबों और बातों से. क्या मुझे भी आगे इसी जवाब को दोहराना होगा? यह सवाल अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है. 
फिर भी मैंने यह जवाब याद कर लिया था.

15अगस्त 1947- देश आजाद हो गया!

 ...15 अगस्त सन् 1947 को आज़ादी मिली थी. मैंने बहुत कुछ याद किया.
पर वास्तव की ज़िन्दगी में आज़ादी शब्द और बर्ताव में फर्क था. दिमाग से लेकर दिल में जंजीरें थीं और हैं. आज भी बहुत बड़ा बदलाव नहीं है. कभी कभी लगता है मेरी ज़िन्दगी के साथ ही यह जद्दोजहद दफ्न हो जाएगा. आसपास कितना बुरा हो रहा है. बहुत बुरा. कभी कभी इतनी गहरी चोट लगती है कि वह दिखाई और बताई नहीं जा सकती.

मुझे आज भी एक आज़ादी का इंतजार रहता है. सभी के लिए इस शब्द के अपने मायने हैं और शायद सभी को इस आज़ादीका इंतजार होगा ...है!

Tuesday, 26 June 2018

बारिश का मौसम

मौसम जब अपने समय पर आता है तब ज्यादा सुहावना लगता है. मन में कोई खोट नहीं होती. मन भी मौसम के साथ बहने लगता है. अब का तो पता नहीं पर जब कॉलेज में पढ़ती थी तब अगर कोई पूछता था कि सबसे अच्छा मौसम कौन सा लगता है. तब बिना देरी किये जवाब और उत्साह में कहती थी- बारिश का! बारिश का मौसम वास्तव में है भी बहुत अच्छा. पहली बारिश की बूँदें जब मिट्टी से आकर मिल जाती हैं तब जो महक उठती है उस की जगह दुनिया का कोई भी सेंट नहीं ले सकता. दिलचस्प यह भी है कि बूँद और मिट्टी के इस मिलन में कितनी आत्मीयता होती है इसे हर कोई समझ सकता है. यह महक नैसर्गिक है. कम से कम मैं तो यही मानती हूँ.

बारिश का होना ही हमारी दुनिया के लिए चमत्कार से कम नहीं. लेकिन न जाने क्यों लोग अब इस चमत्कार को पहचान नहीं पाते! जब छोटी थी तब मेरी बहन कहती थी कि अगर तुमने जरा सी भी शरारत की तो बारिश का चमत्कार कभी नहीं देख पाओगी. बादल उनके लिए जादू करते हैं जो कम शरारत करते हैं और अपनी बहन का काफी काम करते हैं. इसलिए बारिश के मौसम में मैं अपने बर्ताव से सबको हैरान कर देती थी. घर में मेरा होना मालूम भी कम चलता था. किस्मत से घर में कुछ खिड़कियाँ थीं जो बाहर के माहौल को जीने का मौका देती थीं. जैसे ही बारिश होती थी मेरा चहकना बढ़ जाता था. कई बार तो रात के नींद के पहर भी मुझे खिड़की के पास अकेले बाहर निहारते देखा जाना सामान्य था. 


 
घर के लोगों को लगता था कि मुझे शायद कोई मनोरोग है. मेरी माँ को अक्सर इस बात की चिंता रहती थी कि ये लड़की आसमान, बादल और तारों में क्या देखती रहती है, क्यों देखती है? एक बार उनके पूछने पर कहा भी था- "पता नहीं. बस, अच्छा लगता है!" हालाँकि तारे दिखा दिखा कर माँ ने ही उनके नाम बताये थे. जैसे सात तारों की कहानी, ध्रुव तारे के बारे में भी. और भी बहुत कुछ. बाद के बढ़ते हुए सालों में, घर की बनावट और पड़ोसियों के घरों ने आहिस्ता आहिस्ता ये सब छीन लिया. मुझे इस बात की खबर अब के समय होती है. हालाँकि मेरे घर के लोगों को यह लगता है कि बचपन वाली बीमारी ठीक हो गई है. लेकिन मुझे लगता है अब ज्यादा बीमार हूँ. कुछ दीखता ही नहीं कहीं. न बादल, न आसमान और न अच्छी वाली बारिश. 

हम्म ...पानी...जल...स्कूल की उस किताब में चित्र से दिखाया और समझाया जलचक्र. कितना गज़ब था यह जानना कि पानी का सफ़र क्या है! एक बार मुझे समुद्र देखने और बोट से उसके बीच में जाने का मौका भी मिला था. उस अनुभव को कभी डायरी में दर्ज नहीं कर पाई. कैसे लिखें उस अनुभव को जिसे महसूस किया जाता है! जो सिर्फ और सिर्फ महसूस करने के लिए ही होते हैं. समुद्र में ऐसा कुछ जादू है जो सम्मोहित करता है. यह बेमिसाल है. लगता है कि शरीर का 70% पानी चुम्बक की तरह समुद्र के पानी की ओर बढ़ रहा है. आसमान ठीक सर के ऊपर बैठा है. हवा आपको बारम्बार चूम रही है. सुमुद्र और उसके नीचे फिर जमीन. सब अद्भुत है. हालाँकि डिस्कवरी चैनल ने समुद्र को जिस तरह पेश किया है वह एक रूप है. पर समुद्र हर उस इन्सान के लिए अलग अलग रूप में है जो उससे मुलाक़ात करता है.'जब जब फूल खिले' फिल्म में नंदा और शशि कपूर की जोड़ी तो बेमिसाल थी पर वे शिकारे और लाजवाब थे जो झील में तैरते थे...झील बोले तो पानी...समुद्र बोले तो पानी...तालाब बोले तो पानी...कुछ तो कहीं गड़बड़ करने का हक होना ही चाहिए.  



बिन मौसम बारिश चुभती है. जलन देती है.उमस लाती है. फसल ख़राब कर देती है. वो बारिश मुझे उतनी नहीं सुहाती. मन में बहुत अल्फाज़ अब घुमड़ रहे हैं. सब लिखूंगी तो देर हो सकती है. फ़िलहाल तो मौसम ने आज दस्तक दी है. छत पर आज ही दोपहर में नन्ही नन्ही बूंदें देखी थीं. मन तृप्त हो गया था. मौसम आ गया. बारिश का. बरखा का. वर्षा ऋतु का. रैनी का. बूंदा बांदी का...उस कहानी का भी जो मेरी मां आज भी जिद्द करने पर शब्द दर शब्द सुना देती है...'टिपटिपवा' नाम की कहानी. बारिश से जुड़ी कहानियां बहुतेरी मिल जाएंगी. इनका मज़ा भी इसी मौसम में आता है. लुत्फ़ लीजिये इस मौसम का. पानी इकठ्ठा करें और उसका सही इस्तेमाल भी. यकीं करें मन संतुष्ट होता है.     



Sunday, 20 May 2018

विज्ञापन और छवियाँ - स्त्री छवियाँ


जीवन एक बहुत बड़ा फ़लक है जिसमें तमाम तरह के अनुभव सांस लेते हैं। यह किसी बैंक खाते के अंदर मौजूद दूसरा छोटा खाता होता है जिसमें हम अपनी थोड़ी थोड़ी बचत रखते जाते हैं और जरूरत के समय उसका उम्दा इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। जब रोज़मर्रा में कुछ अलहदा टकराता है तब एक के बाद एक अनुभव खुलने लगते हैं। ये अच्छे और बुरे तो होते ही हैं और संख्या में भी अधिक
 होते हैं। हम औरतों के लंबे से अनुभव संचय होते रहे हैं। हमारे समय की एक विशेषता यह भी है कि अनुभवों के कई तरह की सतहें जुड़ रही हैं और इनका रुख बाहर की दुनिया की ओर भी है। अब किसी भी औरत के पास अपने दफ़्तरस्कूलकॉलेजसड़कदुकानबाज़ारपार्क आदि जगहों से जुड़े कई तजुर्बे बनते हुए दिखाई और सुनाई देते हैं। निश्चित तौर पर हम एक लंबा सफर कर के आ रहे हैं और आज अपने हकों के लिए लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। फिर भी हमें उन छवियों से सावधान रहना ही पड़ेगा जिनमें एक ‘इंसान’ को वस्तु या एक ही फ्रेम में क़ैद करके पेश किया जा रहा है।

    वास्तव में विज्ञापन की दुनिया में या फिर डिजिटल जगत में छाई हुई कुछ छवियों पर एक संज्ञान लेने की इस युवा महिला-पुरुष पीढ़ी को ज़रूरत है। हमारे साथी पुरुषों को यह सोचना ही होगा कि औरत कोई बे-दिमाग प्राणी या रोबोट नहीं है जो एक अदना सा सेंट सूंघकर उस पर फिदा हो जाएगी। जब भी इस तरह के विज्ञापन टीवी पर प्रसारित होंतब यह जरूर सोचें कि यह अपने उत्पाद को बेचने की घटिया रचनात्मकता भर है और उन पर तरस खाएं। महिलाओं को यह जरूर मुंह खोल कर और तेज़ आवाज़ में बताना चाहिए कि यह एक घटिया विज्ञापन है जो सरासर भ्रामकता पैदा करता है। प्रेम और मोह जैसे भाव नितांत आत्मिक होते हैं जिनका सेंट और उसकी महक से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है।

    फोन सेवा देने वाली भारत की एक बड़ी कंपनी का विज्ञापन बेहद आराम से आधी आबादी को एक सेविका के ही फ्रेम में फिट करने का गेम खेल रही है। विज्ञापन का सार यह है कि पत्नी दफ़्तर में मालकिन है और पति एक कर्मचारी। वह महिला काम के प्रति प्रतिबद्ध है। लेकिन दूसरे ही दृश्य में वह घर पर जाकर खाना बनाती है और वीडियो कॉल करके इंतज़ार करने की बात कहती है। यह विज्ञापन पहली नज़र में बिलकुल सादा और आकर्षक है। लोगों को प्रेम सा एहसास देने के लिए काफी है। लेकिन यह बहुत खतरनाक है कि दफ्तर में भी काम करो और घर पर जाकर खाना बनाओ। वास्तव में जिस बात को हल्के से लिया गया है वह महिला श्रम है। थकान दोनों को होती है।

    घर और उसके अंदर के भाग भी लंबे समय से औरतों के लिए पक्के किए जाते रहे हैं। जैसे दहलीज़ पर नहीं खड़ा होना चाहिएखिड़की से नहीं झांकना चाहिए आदि। जब मेहमान आए तो कोई लड़की उनके सामने न आएजैसी रस्म भी आज भी हमारे कस्बों और शहरों में दिखती है। दरवाज़ों पर लगे पर्दों का पूरा विमर्श ही हम औरतों को इंगित करता है। इन सब से अधिक रसोई के अंदर जमी हुई छवि माँ व पत्नी के नाम ही सुपुर्द है। इसलिए कहीं न कहीं इन परंपरागत छवियों को चटकाना जरूरी है। एक बार चटकी तो टूटेंगी जरूर। 

 

    इसी तरह एक मोटर साईकिल का विज्ञापन टीवी पर दिखाया जाता है। विज्ञापन के नेपथ्य में एक राजस्थानी गाना चलता है जो सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन इस विज्ञापन पर पर्याप्त निगाह डालकर समझना जरूरी है। महिला पानी भरने दूर रेगिस्तान में गई है और उसके पास लगभग पाँच पानी के धातु के छोटे-बड़े घड़े हैं। वह राह पर खड़ी है। तभी एक मोटर साईकिल वाला आता है और वह पीछे बैठती है। अपने सिर पर लगातार पाँचों घड़ों को लिए बैठीवह यह देखती है कि घड़े गिर नहीं रहे हैं। मोटर साईकिल ऐसे चलाई जाती है कि महिला को झटके नहीं लगते और उसका पानी नहीं गिरता। अंत में गाने में कहते भी हैं, झटका झूठ लागे रे!’ विज्ञापन भले ही मोटर साईकिल के पुर्जों और बनावट का है फिर भी राजस्थानी महिला की वही पूर्ववत छवि है। अब या तो राज्य सरकारों ने अपना काम इतने सालों से ठीक नहीं किया कि आज भी उन्हें पानी लेने जाना पड़ता है। या फिर इन कंपनियों के रचनात्मक विभाग इतने दयनीय क्यों होते हैं कि वे किन्हीं दूसरी छवियों के बारे में सोच नहीं पाते?

    एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जब गूगल पर अंग्रेज़ी में विलेज़ विमीन टाइप किया जाता है तब महिलाओं के घिसे-पिटे चित्र भी साथ में दिखाये जाते हैं। उनमें से अधिकतर गाँव कि महिलाओं को चूल्हा-चौकाखेतों में काम करते हुएपनघट में पानी भरते हुए मटकों के साथरोटी थापते हुएघर की चार दीवारी मेंकिसी के इंतज़ार में रहते हुए दिखाया गया है। दिलचस्प यह है कि उनके पास गाँव की महिलाओं की किसी दूसरी छवि की कल्पना ही नहीं है। यह एक अदृश्य पर भयानक तथ्य है। जिसे हम बेहद सामान्य तौर-तरीकों से लेते हैं। इसलिए गढ़ी गई छवियों से डर लगता है। यह ख़्वाहिश है कि ये सभी गढ़ी हुई छवियाँ टूटे और हम भी किसी कलाकार के रूप मेंयात्री के रूप मेंकिसी फोटोग्राफर के रूप मेंजंगल में सफारी करते हुएआसमानी राइडिंग करते हुएसमुद्री ट्रिप का मज़ा लेते हुए आदि छवियों में दिखें और पहचानी जाएँ। ये सब छवियाँ ऐसा नहीं है कि मौजूद नहीं हैं पर वे सिर्फ एक वर्ग तक सीमित हैं। एक आम महिला भी यह सब कर ही सकती है तो वे क्यों न दिखे!  

    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आता है तब हम महिला सशक्तिकरण की बातें करने के मोड में आ जाते हैं। रैलियाँ निकाली जाती हैं। बैनर बड़े आकार में दिखने लगते हैं। कुछ नारे तेज़ आवाज़ों में सुनाई देने लगते हैं। सरकारी और गैरसरकारी संगठन अपनी आवाज़ें बुलंद करने से पीछे नहीं हटते। आधी आबादी तुरंत ब्रेकिंग न्यूज़ की तस्वीरों में तब्दील हो जाती है। लेकिन उन मुद्दों का क्या जिनकी वास्तव में खबर लेने लायक़ हैं। देश में अब भी उन कच्चे और पके हुए औरताना अनुभवों की सुध नहीं ली जाती जो आधी आबादी के सशक्तिकरण के संकेतक हैं। पढ़ चुकी बिटियाओं के लिए अब भी रोजगार दूर का चाँद है जो बस दिखता है पर कभी हासिल नहीं होता। सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। इन सब मुद्दों के साथ बाज़ार द्वारा घटिया और परंपरागत जली-कुटी छवियों को भी महत्वपूर्ण मानना पड़ेगा। आज हर हाथ में मोबाइल है और हर कोई वीडियो-फिल्म्स देखने का दीवाना है। ऐसे में ये बाजारी विज्ञापन औरतों की गलत छवि पेश करते हैं जिनका हमें संज्ञान लेना ही होगा।    

 (Painting by Thomas Hammer)

 

Wednesday, 21 March 2018

हॅलो दिल्ली

मिथ- दिल्ली की लड़कियों की आवाज़ सुरीली नहीं होती!

जवाब सुनते जाइए... आइये!

उसने पूछा- "आप कहाँ की हैं?"

मैंने चौंकते हुए पूछा- "मतलब?"

उसने फिर पूछा- "मतलब आप कहाँ की रहने वाली हैं?"

मुझे इस सवाल से भी परेशानी हुई और फिर मैंने वही शब्द दोहराया- "मतलब?"

उसने इस बार साफ तरीके से सवाल पूछा- "मेरा मतलब दिल्ली की हैं या इससे बाहर?"

इस सवाल से हर बार बहुत कुफ़्त होती है। जहां बैठी हूँ वहीं की हूँ। जहां मैं नहीं हूँ, वहाँ की मैं हो ही नहीं सकती। न मैं होना चाहती हूँ। मैंने उसे थोड़ा इंतज़ार करवाते हुए जवाब दिया- "अम्म...दिल्ली की हूँ...यहीं जन्म लिया, यहीं पढ़ाई की और यहीं आगे की पढ़ाई भी जारी है।"

जवाब सुनकर उसने थोड़ा संभलते कहा- "दिल्ली की लड़कियां आपकी तरह बहुत धीमे धीमे नहीं बोलती। उनकी आवाज़ सुरीली नहीं होती जैसी आपकी है। मुझे लगा आप कहीं और की रहने वाली हैं।"

मुझे उसकी यह बात सुनकर एक पल को लगा कि कोई कड़वाहट मुंह में जबरन घुल गई है। मन में एक लहर उठने लगी कि लोगों ने ऐसे विचार आखिर कहाँ से अपने मन में ट्यूनिंग के साथ जमा लिए हैं कि फलां लोग यहाँ के ऐसे होते हैं तो फलां लोग वैसे होते हैं। लोग, लोग जैसे क्यों नहीं होते। पिछले दिनों मार्केज़ के लिखे उपन्यास को पढ़ते हुए उस पंक्ति पर रुक गई जिसमें लिखा था कि व्यक्ति जहां मरता है वही जगह उसकी हो जाती है। घर आकार मैं देर तक यही सोचती रही कि मैं कहाँ मरूँगी? क्या यहीं इसी शहर में? या फिर तक़दीर कहीं और ले जाएगी?...ऐसे सवाल मन में चल ही रहे थे तब मन में सुरीली आवाज़ का ज़िक्र आया। 

मुझे यह तारीफ़ कतई नहीं लगी। लगी तो बेइज्जती ही। हर जगह हर तरह के लोग होते हैं। जैसी जलवायु-जमीन वैसी ही उनकी बनावट। लेकिन क्योंकि इंसान पेड़ नहीं है तो वह एक जगह नहीं रहता अपनी जिंदगी के चक्र में उसने हर तरह के रिश्ते क़ायम किए हैं। इसलिए शरीर की बनावट में फर्क आ ही जाते हैं। और ये अंतर स्वाभाविक ही हैं। ये हर तरह के भी है।अब दिल्ली विषय पर आते हैं। यहा...देश की राजधानी में हर तरह के लोग रहते हैं और यह सिलसिला अभी भी चल रहा है और मुझे हाल के वर्षों में ऐसा नहीं लगता कि थमेगा भी। हर रोज़ बहुत से लोग आते हैं और यहीं के हो जाते हैं। 

 

                                Robert Farquhar- The Bohemian Village Voice

जिसकी जहां मर्ज़ी वहीं घर बसाये। सबको हक़ है। रोटी की तलाश मेरे पिताजी को दिल्ली के आपातकालीन वर्षों में ले आई थी और तब से उन्हों ने और दिल्ली से जितना लिया उतना ही लौटाया भी। बहुत सालों से सभ्य नागरिक बने हुए हैं यही क्या कम बात है! इसके बाद मेरी बारी आई। मैंने जब से अपना होश संभाला यहीं की गलियों में खुद को पाया। मुझे यह नहीं बताया गया कि तुम फलां राज्य की हो, न मेरे टीचर ने कभी मुझे यह कहकर पढ़ाया कि तुम फलां राज्य से ताल्लुक रखती हो...और न ही उन्हों ने यह बताया कि आप दिल्ली की हो तो कैसा बर्ताव करोगी...उन्हों ने यही कहा कि हम जिस देश में रहते हैं वह भारत है और तुम भारतीय हो। बस्स! किसी ने भी यह नहीं सिखाया की दिल्ली  के लोग सुरीले नहीं होते तो दिल्ली के लोग ऐसे नहीं वैसे होते हैं.. !

इतने साल हो गए हैं मुझे इस शहर में सांस लेते लेते कि अब कहीं और के शहर की शुद्ध हवा में भी मुझे दमे जैसी फीलिंग आने लगती है। मेरा मन एक या दो दिन के बाद अपने ही घर और शहर में लौट आने का करता है। हाँ घंटों सड़कों में बस में बैठी रह जाती हूँ। जी भर के इस शहर को खरी खोटी भी सुनाती हूँ...फिर भी अगले दिन तैयार हो जाती हूँ कि मुझे जाना है। 

इसलिए लोगों के मासूम सवाल भी मुझे कभी कभी चुभ जाते हैं। उनको मेरी आवाज़ से प्यार नहीं बल्कि यह सवाल है कि यह इतनी उत्तेजित क्यों नहीं है? क्यों वॉल्यूम इतना नीचे हैं? बोलने में मैं इतना समय क्यों ले लेती? ऐसे दिल्ली वाले नहीं बात करते...उनके लिए यह जवाब है कि जनाबे आली ...दिल्ली की लड़कियों की आवाज़ हर तरह की है। वक़्त पर मद्धम, कभी तेज़, कभी खामोशी, कभी गीत, कभी ग़ज़ल, कभी चिल्लाहट, कभी बेलगाम हंसी, कभी फूहड़-भौंडी, कभी खिलंदड़, कभी शोर और कभी सिसकी...हर तरह की है। क्यों एक एक फ्रेम वाला कैमरा लेकर फिरती/फिरते हो?



The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...