Wednesday, 2 August 2017

हर बार इश्क़ का रंग पक्का नहीं होता (भाग-2)

परिस्थितियों का जमा और घटा यह था कि यह नौजवान जोड़ा कुछ परेशान-सा बैठा हुआ था। दोनों की सांसें मानो कहीं से जान बचाकर भाग रही हों तेज़ी से अंदर-बाहर निकल रही थीं। चेहरे और बगल से पसीना बह रहा था और उनकी बदहवाशी को बयां कर था। इतना तय था कि वे दोनों डरे हुए थे और बुरी तरह परेशान थे। 

    पर लोग तो परेशान ही रहते हैं। इसलिए मैंने अधिक ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। लेटे-लेटे शाम की बातें याद करने लगी। रेल के हिचकोलों में रात गहरा रही थी। आधा रास्ता माँ के प्रवचन सुन के कट गया। थोड़ी देर बाद अचानक गाड़ी को सिग्नल न मिलने के कारण वह कुछ समय तक एक स्टेशन पर रुक गई। जगह काफी सुहानी थी और माँ के लिए सुनसान। 

    अप्रैल का महीना उतरने लगा था। दिन गरमाने लगे थे। मौसम की बेईमानी धीरे-धीरे समझ आने लगी थी। दिन की गुनगुनी धूप रात के लिए कुछ मसमसाहट और चिपचिपाहट उधार छोड़ रही थी। पसीना बदन पर सुखकर कुनकुनाने लगा था और महक बोनस के साथ बाहर निकलने लगी थी। कुल मिलाकर कहा जा सकता था कि गर्मी का मौसम दस्तक दे चुका था।

    इसी माहौल में छुट्टियों की महक के लिए अपने साज़ो-सामान के साथ माँ पीहर और मैं अपने ननिहाल के लिए निकल चुके थे। माँ ने ज़िद्द कर के मुझे सलवार क़मीज़ में कस दिया था। उनका कहना था कि सफ़र दूर का है और ज़माना बहुत खराब है। पर असल बात तो यह थी कि मेरे शरीर ने उम्र के परे जाकर बाहर झांकना शुरू कर दिया था। मैं अब चहकती हुई नहीं बल्कि छलकती हुई मालूम नज़र आती थी। मैं उम्र से ज्यादा बड़ी हो रही थी। मैंने भी उनका विरोध नहीं किया मन में खयाल आया ठीक ही कह रही हैं।

    पापा फिर नहीं आ पाये। उनका काम इन दिनों ही बढ़ जाता है। पर माँ मुझे अपना ननिहाल दिखाना चाहती थीं। उनका कहना है कि इस समय सरकारी काम बढ़ जाते हैं। नहीं आए तो अच्छा ही है वरना रेल में भी अपनी राजनीति लेकर बैठ जाते। कम से कम इनकी बातों से मुक्ति तो मिलेगी! लेकिन माँ को नहीं पता था कि असल मुक्ति तो पापा को तोहफे में मिली थी।  

    पापा ने हमें समय से कुछ पहले ही रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया था और ढेर सारी हिदायतें देते हुए वो किसी न्यूज़ रीडर की तरह मुझे ज़माने भर की खबरें और उनके नतीजे बताते रहे थे। ये मत करना, बाहर मत जाना, ज़्यादा किसी से बात करने की जरूरत नहीं, माँ का ध्यान रखना, रात तक टी. वी. मत देखना(मामा के यहाँ), छुट्टियों का काम पूरा कर लेना... इतनी बातें! उनके कहने पर मन में उस समय बस यही बात फुदक रही थी कि गाड़ी कब चलेगी!

    मैं अपनी सोलह बरस की उम्र के चश्मे से इस दुनिया को देख रही थी। ऊपर से इतनी सारी हिदायतों से उसमें दरार आ रही थी। मैं घर में भी अक्सर इसी तरह के साये में जीती हूँ। पर ननिहाल के नाम पर मन उछला था। स्टेशन की गहमा-गहमी कितनी अच्छी लग रही थी। कोई नन्ही चिड़िया जिसने अभी अभी अपने घोंसले की सीमा को पार कर दिया हो, जैसी रोमांचित थी मैं। आकाश के जैसे स्टेशन फैला हुआ था। यहाँ हर तरह की दुकान, हर तरह की आवाज़ और हर तरह के चेहरे थे। देखकर मन में खयाल आया, ‘इसे ही दुनिया कहते हैं। यही वो जगह और माहौल जिसे शहर कहा जाता है।

घर की चार दिवारों में सिमटे हुए घर में दुनिया सिर्फ़ घर का सामान और उसमें रह रहे कुछ लोग ही होते हैं। पर यहाँ तो मेरी आँखें चौंधियाँ गई थीं। मैं उस भीड़ को देख रही थी जिसका कोई चेहरा या सूरत नहीं थी। मैं उन आवाज़ों को सोख रही थी जिसे शहर शोर कहता है। मैं उस धूल और धुएँ को सूंघ रही थी जिसे प्रदूषण कहा जाता है।  

चाय की महक हो या अंडे के सिकने की गमक, नाक से लेकर कान तक को चालू रखने के लिए यहाँ सबकुछ था। माँ और पापा अपने घरेलू हिसाब को लेकर जद्दोजहद कर रहे थे। इतनी देर मैंने बाहर का मुआयना लेने की सोची। मुझे अपनी नज़रें सेंकनी थीं। बाद में मुझे इसका ब्यौरा अपने उसे भी तो बताना था। हाँ, मैं उससे कुछ दिन नहीं मिल पाऊँगी पर फोन नाम की चीज़ से उसे अपने संदेशे पहुंचाने का वादा कर के आई थी।  

मैंने पापा से घबराते हुए 'परमिशन' ली। उन्होंने कुछ पल सोचा कहा, “कहाँ जाओगी? रेलवे स्टेशन भी घूमने की जगह है!”

मैंने नज़रें ज़मीन में गढ़ाते हुए कहा, “मुझे चॉकलेट खाने का मन है।” इतना सुनकर उन्होंने मुझे रोका नहीं। बोले, “फटाफट लेकर आ जाओ।”

मैंने हाँ में सिर हिलाया।

मैंने एक दुकान का रुख किया। वहाँ मैंने सजी हुई चॉकलेट देखी तो जीभ में पानी न जाने कहाँ से उतर आया। मैंने दुकान की तरफ खुशी से क़दम बढ़ा दिये थे। तभी एक शोर मचा और माहौल में अफरा तफरी छा गई। अचानक मुझे पीछे से जबर्दस्त धक्का लगा और मैं मुंह के बल धड़ाम से गिरकर ज़मीन चाटने लगी।

“हाय राम!!...

बेइज्ज़ती हो गई। "किस कमीने ने मुझे गिरा डाला?...”

मैं घबराहट में अपनी धूल और खरोंचों के साथ इन अल्फ़ाज़ों को बोलते हुए उठने की कोशिश करने लगी। कुछ लोगों ने मुझे बांह पकड़ के सहारा भी दिया।

न जाने क्या हुआ था। मेरे गिरने के बाद न कोई शोर, न कोई शराबा। धड़-धड़ के साथ कुछ लोग भागे और क्यों भागे किसी को पता नहीं चला। मेरे साथ सब भौंचक्के बने देखते रहे। मैं बहुत घबरा गई। भीड़, जिसकी कोई शक्ल नहीं थी, आपस में बुदबुदाने लगी।

मैंने चॉकलेट का ख़्याल छोड़ा और वापसी का रुख किया।

अब तक माँ और पापा इस शोर से घबरा चुके थे।

मुझे देखते हुए ही माँ की आवाज़ तेज़ हो गई। पूछा, “क्या हुआ?”

मैंने उन्हें बिना देखे ही कहा, “पता नहीं पीछे से किसी ने धक्का दिया और मैं गिर गई।”

पापा बोले, “अब यहाँ कौन आतंकवादी आ गया!... कहीं भी चैन नहीं।”

मैंने इसी बीच पापा से पूछ लिया, “पापा आपको कैसे पता कि वे लोग आतंकवादी हैं?”

वो कुछ नहीं बोले और गुस्से से आँखें गरम करके वे बाहर की तरफ़ चल दिये।

मेरे मन में फिर से वही सवाल दुबारा आया, ‘रेल चल क्यों नहीं रही!

लगभग दस मिनट बाद पापा कुछ फल हाथ में लिए हुए लौटे। बोले, “कुछ लोग दो लोगों की तलाश में स्टेशन में घुस आए थे। कुल चार लोग हैं। कोई लड़का-लड़की भागे हैं। उन्हें वे लोग ढूंढ रहे हैं। अब उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया है। घबराने की कोई ज़रूरत नहीं।”

जब माँ ने ये बातें सुनी तब फिर ज़माने की दुहाई दी। मेरे उभरते बदन को देखा और मुझे चुन्नी को ठीक से ओढ़ने की हिदायत दी। फिर थोड़ी देर बाद ख़ुद ही चुप हो गईं। मैंने झिझकती हुई नज़रों से सामने बैठे जोड़े को देखा और सोचा जाने यह क्या सोच रहे होंगे। लेकिन इस बार फिर वे घबराए हुए ही लगे।

मैं इसलिए सुकून से थी क्योंकि आख़िरकार रेल चले जा रही थी और माँ इसलिए बेचैन थी कि हो हल्ला हो गया था। उनकी जवान बेटी भी उनके साथ थी। ट्रेन में वक़्त गुज़ारने के लिए मैंने एक किताब जो इस उम्र की महक लिए हुए थी को, माँ की नज़रों से बचाकर अपने पास रख ली थी। मैंने अपनी क्लास की एक दोस्त से ज़िद्द करके उसे हासिल किया था। प्रेम कहानी वाली किताब। उस किताब के किरदार बस इंसान थे जिनका न तो कोई मज़हब था और न कोई ज़ात। पर वो गुनाहगार थे। सामाजिक गुनाहगार। वे प्रेमी थे।

ट्रेन में फीकी और डरी रंगत लिए बैठा नया कपल अपने में उलझा था। न तो वे दोनों कुछ खा रहे थे न कुछ पी रहे थे। मेरे मन में आया कि उनसे उनकी परेशानी का सबब पूछ लूँ। पर जब माँ का चेहरा देखा तो मेरी हिम्मत की धज्जियां उड़ गईं।

मैंने रात उनके बेइंतहा डरे-परेशान चेहरे को देख कर काटनी शुरू की। उन दोनों ने एक दूसरे के हाथों को कस कर पकड़ा हुआ था, बिलकुल मेरी किताब के प्रेम क़ैदियों की तरह। दोनों के चेहरे परेशान ज़रूर थे पर आँखों में कल के सपने भी मौजूद थे। उन्हें देखते-देखते लगभग तीन बजे मेरी आँख के पर्दे गिर गए। जब सुबह आँखों की दुकान खुली तो वो जोड़ा नदारद था।

बहरहाल स्टेशन पर मामाजी ने काफ़ी पहले आकर मोर्चा खोल दिया था। माँ को उन्होंने एक लंबा सा प्रणाम किया तो माँ गदगद हो उठीं। मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार की मुद्रा अपनाई।

शाम को घर-बैठक जम गई थी। मुहल्ले के सब लोग माँ से मिलने आए थे। पूरा जमावड़ा लग चुका था। मुझे जबर्दस्ती बीच में बिठाकर रखा गया था। मेरे ज़िस्म का भराव उन लोगों की नज़रों तक पहुँच चुका था। सभी के पास मेरी शादी के लिए एक रिश्ता मौजूद था। मैं इस तरह के रिश्तों की महिमा सुन रही थी और साथ ही अपनी माँ के चेहरे की चमकीली चमक को भी देख के हैरान थी।

पर शुक्र है कि अंधेरा गहराया तो लोगों को अपने अपने घर जाने की याद आ गई। नहीं तो मेरी शादी की शहनाई ही बज जाती। आठ बजते-बजते घर पड़ोसियों से खाली हो गया। खाना खाकर मैंने सोने की इच्छा जताई तो मामाजी ने पढ़ाई का हालचाल जानने के लिए रोक लिया। मैं अभी उन्हें अपने पढ़ाई का हाल बताने ही जा रही थी कि साढ़े आठ बजे की समाचार की सुर्खियों में हम सब के कानों को अपनी ओर खींच लिया। “देश में फिर एक बार ऑनर कीलिंग का मामला सामने आया है। रेलवे स्टेशन पर एक जोड़े की सिर कटी लाशें मिलीं हैं और...।” मैंने आगे की ख़बर नहीं सुनी बस चुन्नी से अपनी छाती को ढका और सामने पड़े पानी के गिलास से एक घूंट अपने गले में उतार लिया।   

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Tuesday, 1 August 2017

महिला तस्करी और उसके सच

कई दफ़े हम टर्मिनोलॉजी का शिकार हो जाते हैं और लगभग सभी चीजों को उसके अंदर से ही गुज़ार कर देखना शुरू कर देते हैं। याद कीजिये उस लेंस को जो चीज़ों को बड़ा बनाकर हमें दिखाता है जिन्हें हम सूक्ष्म होने के कारण देख नहीं पाते। लेकिन यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्रत्येक वस्तु की अपनी एक सीमा है। और उस सीमा के बाद चीजें वैसे ही हैं जैसे कि वह पहले से ही हैं। लेंस जहां जहां फिराया जाएगा केवल वहाँ वहाँ ही चीजें बड़ी होकर दिखाई देंगी। लेकिन उसके बाहर की सीमा में नहीं। हम आजकल इसी लेंस वाली नज़र का इस्तेमाल खूब करते हैं। जहां देखते हैं वहीं लेंस लगा लेते हैं। इसे नज़र का केन्द्रीयकरण क़रार दिया जा सकता है।  इसकी अपनी खूबियाँ और खामियाँ दोनों हैं।

ठीक इसी तरह बहुत सी और भी शब्द-शब्दावली है जो आजकल शक़ की निगाह से देखी जा रही है। चिंतन की विचारधारा से जुड़े हुए शब्द जो किसी एक जाति को चेहरा और प्रतिनिधित्व करने की क्षमता दे रहे हैं वे भी तो अब पवित्र नहीं माने जा रहे हैं। 'नारीवाद' एक ऐसा ही शब्द है। इस शब्द को सुनते ही कुछ लोग चिढ़ जाते हैं। बहुत बुरी तरह। पर यह एक जरूरी, जायज़ और दिलचस्प शब्दावली है। औरतों का इतिहास इतना अधिक क्रूर दिखाई देता है कि 'आधी आबादी' जैसा शब्द अगर इस्तेमाल हो जाता है तो इसमें क्या हर्ज़ा है? नारीवादी शब्द विचार, स्त्री विमर्श में तब्दील होता है तो इसके अपने ही गुण और मायने हैं। लेकिन जरूरत यह भी है कि लेंस के इर्द गिर्द हो रही घटनाओं की भी सुध ली जाये। 

                                                 (1)

इसी विमर्श से थोड़ा सा इधर उधर देखें तो कुछ बातें जो लेंस से बाहर हो रही हैं पता चलती हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन महाराष्ट्र में सम्पन्न हुआ। इसमें 18 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इसका मूल विषय महिला तस्करी था। कार्यकर्ता सुनीता कृष्णन के मुताबिक़ तस्करी से केवल 7% ही लड़कियों को छुड़वाया जा रहा है जबकि 93% अभी भी उसी  दलदल में फंसी हैं। इसके पीछे की वजहें ज़्यादा गंभीर हैं। औरतों की तस्करी के गिरोह बेहद मज़बूत हैं। उन्हें सरकारी रसूखदार लोगों का संरक्षण प्राप्त है। साधारण पंक्ति में कहा जाये तब - 'सब मिले हुए हैं।' हमारा पूरा तंत्र जो हमारे कल्याण की बात कहता है वही इसका पोषण कर रहा है। वरना इस हमाम में कोई एक ही नंगा नहीं हो सकता। एक बस की बात नहीं है। 

इसके पीछे का एक और कारण यह भी है कि एक बार उन्हें तस्करी के गिरोह से निकाल लेने के बाद उनके घर वाले उन्हें नहीं अपनाते। उनके लिए वे लड़कियां या औरतें जो एक बार खरीद फ़रोख्त का शिकार हो जाती हैं वे मर चुकी होती हैं। यह सबसे दयनीय बात है। इंच भर की जगह कैसे किसी परिवार की इज्जत की नंबर प्लेट है, यह आज भी दकियानूस सोच है। इसलिए जब तस्लीमा नसरीन यह कहती हैं कि औरत का कोई देश नहीं तो वह पूरी तरह सच ही कह रही होती हैं। वास्तव में घर भी कब औरत का रहा है? वहाँ भी वह नौकरानी से भी बदतर हो जाती है, एक औरत! हाँ, यह बात अलग है कि उसे गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, गृहणी, अन्नपूर्णा आदि आदि नाम से पुकारते हैं। जबकि इन शब्दों के पीछे लंबी चौड़ी वह फ़ेहरिश्त है जिसमें मुफ़्त का श्रम मौजूद है। इस श्रम का आज तक कोई बहीखाता किसी ने तैयार नहीं करवाया। आज भी यह जारी है। जब किसी लड़की को तस्करी से  बचाया जाता है तब वह कई बार घर में जाने से मना भी कर देती है। साफ वजह है कि उसे वह सम्मान वहाँ नहीं मिलता जिसकी वह हक़दार होती है। इसके साथ ही घर के लोगों का बर्ताव बहुत ही खराब हो जाता है। कई घर वाले तो मिलना भी पसंद नहीं करते।

                                                  (2)

अमृता प्रीतम का मशहूर उपन्यास 'पिंजर' बड़ी मार्मिकता से यह दृश्य आँखों के आगे रख देता है। पुरो को रशीद उठाकर ले गया। खानदानी रंजिश के चलते। वह उसे भाग जाने देता है। जब पुरो अपने घर के किवाड़ खटखटाती है तो उसे उसके ही बचपन के घर में नहीं घुसने दिया जाता। उसकी ही हम-नस्ल उसकी माँ जाने किन किन बातों का वास्ता देकर उसे घर के अंदर नहीं आने देती। आह! निकल जाती है एक। वैसी आह रोज़ निकला करती हैं जब तस्करी से छुड़ाई गई लड़की को घर में पनाह नहीं मिलती। 

इसके अलावा सरकारें भी अव्वल दर्ज़े की जिम्मेदार हैं। वह छुड़ाई गई लड़कियों के लिए कोई आर्थिक आधार विकसित नहीं कर पाती। जो मौजूद हैं वे भी टोकरी बीनने तक समेट दिये जाते हैं। उनके लिए नितांत सभी सुविधाओं का अभाव रहता है। वे इन हालातों में कई बार वापस उसी रास्ते का रुख कर लेती हैं। राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव ही है कि महज़ 7 % ही लड़कियों को छुड़वाया जा पाता है। यह प्रतिशत बेहद कम है। एक बार फिर महिला आरक्षण बिल पर सोचने की जरूरत है और उसका जल्द से जल्द क्रियान्वयन करने की शीघ्र आवश्यकता है। राजनीति में उन सक्रिय और ज़मीन से जुड़ी औरतों की बेहद अनिवार्यता है जो जानती हैं कि महिलाओं से जुड़े मुद्दे कितने संवेदनशील होते हैं। उनके पीछे शोषण और हिंसा की लंबी सूची होती है। 

यह बहुत अफसोस की बात लगती है कि जो औरतें राजनीति में हैं भी तो वे पानी साफ करने वाली, हवा साफ करने वाली, फल और सब्ज़ी साफ करने वाली मशीनों के विज्ञापन देती हैं। यह बहुत निराशाजनक है। हवा स्सफ करने के लिए महोदया जी को खुद पेड़ लगाने चाहिए और अपने संसदीय क्षेत्र में भी लोगों को पेड़ लगाने में मदद करनी चाहिए। इसी तरह पानी और सब्ज़ी साफ करने का मसला हल किया जा सकता है। 

आप पैसा कमाना बंद करें और इन संवेदनशील मुद्दों को सुलझाइए। आपको इसलिए ही चुना गया है कि आप परेशानियों का स्वस्थ हल निकालें। सभी के लिए बेहतर स्पेस बनाएँ ताकि सब जी सकें सम्मान के साथ। बाकी धीरे धीरे और भी तबके और जाति की महिलाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरणा और मदद दें। स्थिति सुधरनी तो कम से कम शुरू हो ही जाएगी।

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1.यह चित्र सन् 2013 में जोएल ने ओहायो, अमरीका में Sex Trafficking Awareness Project के दौरान कुछ छात्रों के साथ मिलकर बनाया था। 

https://joelartista.com/ohio-sex-trafficking-awareness/

2. Anna Kuntsman’s Catherine the Great deals with human trafficking. | Photo: Tricky Women 2013

https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=6111194188281992144#editor/target=post;postID=1434132795482902528



Sunday, 23 July 2017

हर बार इश्क़ का रंग पक्का भी नहीं होता!

'तुम आराम से क्यों नहीं बैठती हो? कहानियाँ सुनना आराम से होता है...रुककर। और एक तुम हो कि भागने के मूड में रहती हो।'

मैंने झिझकते हुए कहा- 'ऐसी तो बात नहीं है। शाम काफी ढल गई है। तो बस समझिए कि माँ का फोन आता ही होगा। आपको नहीं पता मैं घर न पहुंचूँ तो उनकी जान बाहर को आने लगती है।'

'चली जाना। चाय पीकर।' उन्होने बराबर हक़ जमाते हुए कहा। मैंने इसके बाद कुछ नहीं कहा। मैं घर लौटी तो उनकी कहानी साथ लेकर आई। उन्होने कुछ सुनाया जो दिमाग में अटक गया था। लिखने की कोशिश करती हूँ। उनका नाम लेने का मन नहीं। हालांकि इजाज़त ले चुकी हूँ।

ओम प्रकाश बाल्मीकी की आत्मकथा का वह हिस्सा याद आ रहा है जिसमें एक लड़की को उनकी जाति के बारे में पता चलता है और प्यार रफ्फ़ू चक्कर हो जाता है। ऐसा ही कुछ प्यार इन मोहतरमा का था। मोहतरमा तथकथित जाति में निम्न थीं और इनका प्रेमी भारद्वाज था। शुरूआत में प्रेम , प्रेम ही रहा। लेकिन पहली उत्साही मुलाकात से जैसे सब मर गया। भारत देश में प्रेम सबसे पहले जाति, रंग रूप और पैसा देखकर तौला जाता है। शायद बाकी देशों में भी ऐसे ही मापक जरूर होते होंगे। मैं कभी बाहर नहीं गई। खैर विषय यह भी तो नहीं है।

उन्होने मुझे बताया-
मेरी उम्र यही 21 के आसपास होगी। फेसबुक दस्तक दे चुका था। लोग ऑर्कुट से बाहर आकर एफ़बी पर अपना खाता खोल रहे थे। घर में हमारे पास  कंप्यूटर नहीं था इसलिए हम अब भी इस तरह की साइट्स से दूर थे। लेकिन बड़े भईया कॉमर्स की पढ़ाई कर रहे थे और कॉलेज में कंप्यूटर भी विषय के रूप में ले लिया था इसलिए घर में पिताजी ने उनकी ही खुशी और पढ़ाई लिखाई का ध्यान रखते हुए एक कंप्यूटर खरीद लिया। हम दो बहनों को उसके पास फटकने की भी मनाही थी। छोटी वाली तो अल्हड़ थी सो वो बाहर घूमने में जी लगा लिया करती थी। मैं बड़ी थी सो घर में काम में मन लगा लेती थी। आते जाते भाई के कमरे में कंप्यूटर दिखता तो जी करता कि एक दफा देख लूँ... यह है क्या जो टीवी की तरह दिखता है। लेकिन यह तो वह मशीन थी जिसका दरवाज़ा दुनिया में खुलता था।

पर कभी हिम्मत नहीं हुई। एक रोज़ भाई से पूछा तो बोले चलो खुद से देख लो। जबरन ले गए और बताने लगे कि तुम अब क्या क्या कर सकते हो सिर्फ इस कंप्यूटर से। कुछ दिनों बाद उन्होने खुद मेरा एफ़बी अकाउंट भी खोल दिया। खुद से ही कुछ लोगों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भी भेज दी। मेरी लिए उस समय एफ़बी एक ऐसी दुनिया बन गया था जिसका रास्ता सीधे वंडरलैंड जाता था। हालांकि लोग उसे बुरा कहते थे। यह बुरी और खराब चीज है। लड़कियों को इससे दूर रहना चाहिए। पर चस्का नाम की भी तो कोई चीज होती है। आदमी को भी कई चस्के हैं। सो अगर एक लड़की या औरत को लग गया तो क्या हो गया। बिग बैंग का धमाका तो नहीं हो जाएगा फिर से! हो जाये...मेरी बला से...मैं उस समय ऐसा ही सोचती थी। शायद आज भी।

एफ़बी पर मेरी किसी से बात हुई जिनके नाम के पीछे भारद्वाज लगता था। लड़का खूब गोरा था। नैन नक्श उतने तीखे नहीं थे जैसे मेरे थे। हल्की हल्की बातें शुरू हुईं और बात एफ़बी से आगे बढ़ गई। या यूं कहूँ कि हमने मिलने का फैसला किया। हालांकि मैं खुद को बहुत चालाक समझती थी सो लड़के को अपने एरिया के आसपास ही बुलाया। वह राजी था। मैं भी राजी थी।



रेगिस्तान को तो प्यास की तलाश होती है और सूखे दिल को प्यार की। मुझे लग रहा था कि तलाश खत्म हो गई है। अब जैसे तैसे घर में बात चलाई जाएगी और मामला सेट किया जाएगा। कोई न माने तो मैं भागने में भी झिझकूंगी नहीं। मेरे लिए यह मेरा क्रांतिकारी व्यक्तित्व था। मुझे इतने अरसे से यह भी नहीं मालूम था कि मैं इतना बड़ा कुछ धमाकेदार भी सोच सकती हूँ।

हम जिस रोज़ मिले, वो तारीख मुझे याद नहीं है। मैं कॉलेज के अंतिम साल में थी। वह लड़का शायद किसी अंतर्राष्ट्रीय कॉल सेंटर में काम करता था। मैं इतने हद तक खुश रहती थी कि घर बसाने के अच्छे खयाल सेट कर चुकी थी। यह शानदार अनुभव था। ऐसा मुझे आज भी लगता है। ख़ैर हम मिले। वो फोटो से भी ज्यादा दूध सा सफ़ेद था। मेरा रंग ऐसा नहीं था। गहरे में भी गहरा। शायद यही वजह थी कि वो बोला- 'अरे यार!...तुम तो फोटो से बहुत अलग हो!..' मैंने कुछ नहीं कहा और सिर्फ एक मुस्कुराहट बाहर रख दी। ...इसके बाद हम बैठने की जगह खोजने में लग गए। निगोड़ी गर्मी ऐसी थी कि सभी एसी और छायादार जगहें भरी पड़ी थीं। हमें कहीं भी कोई जगह नहीं मिल रही थी। आखिर में एक पार्क मिला जहां हम कुछ देर बैठे।

पार्क खाली ही था। क्योंकि उसके ज़्यादातर हिस्से में धूप थी। इक्का दुक्का लोग ही दिख रहे थे और वे भी शायद उसकी देख रेख करने वाले लोग थे। उन्होने हम पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया यह मेरे लिए सुकून की बात थी। उसके लिए कोई मतलब नहीं था क्योंकि वह इस इलाके से था ही नहीं। अक्सर लड़कियों के अपने इलाक़े में किसी लड़के साथ घूमना उनकी अच्छी ख़ासी पिटाई का विषय बन जाता है। इस खयाल से मुझे थोड़ी घबराहट थी पर इश्क़ जिसे हुआ वह निर्भीक न हुआ तो क्या खाक हुआ! यही मैं थी उस समय।

हम बैठे थे और गर्मी से परेशान पानी के घूंट अपने अंदर ले रहे थे। कुछ देर बाद पेड़ की छाया और हवा से हमें राहत मिल गई जिससे हम अपनी बात कुछ आगे बढ़ा सके।

मैंने उसे आँखें गढ़ा कर देखा। ऊपर से नीचे। उसने अपने सीधे हाथ की सभी उंगलियों में रंग बिरंगी (पत्थर वाली) अंगूठियाँ पहनी थीं। बाएँ हाथ पर ध्यान नहीं दे पाई। मैंने मज़ाक के लहजे में उसे कहा- 'कहाँ से डकैती की है इन अंगूठियों की? इतनी सारी भी कोई अंगूठियाँ पहनता है भला। उसे मेरा यह मज़ाक बिलकुल अच्छा नहीं लगा। गंभीर होते हुए बोला- 'अपनी माँ की खातिर पहनता हूँ। उनका इन सब बातों पर बहुत विश्वास है। दिल रखने के लिए करना पड़ता है।' ...मैंने हम्म में बात अटपटी होते हुए भी पी ली। 

उसने आगे अपने पिता और मामा का ज़िक्र भी किया। उसका यह कहना था कि पिता तो बहुत ही अच्छे हैं और जात-पात में यकीन नहीं रखते। मैंने पलटते हुए पूछा-  'और रंग के बारे में उनके क्या ख़याल हैं?' उसने सवाल झेंपते हुए टाल दिया। वह आगे बोला- 'मुझे तो तुम पसंद हो, पर माँ तुम्हें कभी नहीं अपनाएगी। पक्की पंडिताइन है। उस पर भी वह मामाजी के वश में रहती है। पापा भी तुम्हें अपना लेंगे। पर माँ कभी नहीं मानेगी। कहीं अपने को कुछ कर न बैठे!'

मेरा दिल टूटा जैसे किसी भी माशूका का टूट जाता है। इतनी तेज़ आवाज़ हुई कि घूमकर मुझमें ही दफ्न हो गई। पर अपनी आँखों से आंसुओं को गिरने नहीं दिया। मुझे पता था कि भारद्वाज माँ की आड़ ले रहे हैं शायद। एक औरत पर बंदूक भी चलाई जा रही वह भी किसी दूसरी औरत के कंधे पर रखकर। मुझे वह उसी समय दिल से उतरता हुआ महसूस हुआ। मुझे अपने आकर्षण के झीने पर्दे फटते हुए दिखाई दिये। भारत और उसके देश की व्यवस्था की गहराई से उसी दिन खबर हुई। जाति, रंग, रुतबा, भाषा, अमीरी आदि इश्क़ में बहुत मायने रखते हैं।

मुझे एक बात और समझ आई इस सब हादसे के पीछे। मैं और मेरा माहौल इस तरह का था जिससे मुझे शायद जल्दी आकर्षण हो गया। अगर मेरी परवरिश में मुझमें लड़कों के साथ लिखने पढ़ने की संगत और बराबरी का माहौल मिला होता तो शायद भारद्वाज जी को बेहतर जवाब दे पाती। यही अच्छी परवरिश उन्हें मिली होती तो वह मुझे वास्तव में प्यार कर पाते। उनके मन में जात को डालने वाले उनके कट्टर माँ और मामा थे। मुझे एकांत, सहमी और बंदकोश देने वाले मेरे घर के लोग। कहीं मायनों में भैया को देखकर सुकून हुआ कि वह नए जमाने के साथ थे और चाहते थे कि उनकी बहनें बाहर की दुनिया को जानें भी।

(उनकी कहानी बहुत लंबी थी। मैंने बहुत छोटे में इसे लिखा है। जो भी प्रभाव यदि आप लोगों पर पढ़कर हुआ तो वह उनका होगा। जो भी गलत या जल्दबाज़ी महसूस होगी उसका ज़िम्मा मेरा। और भी कहानियाँ लाती रहूँगी। साथ ही रहिए। फोटो गूगल से आभार सहित।)



Saturday, 22 July 2017

मानो तो झंझट, न मानो तो कुछ भी नहीं

मेरे पास मुझसे कुछ ही साल कम उम्र की लड़कियों और लड़कों के फोन आते हैं। वे निहायती निराश और परेशान समझ आते हैं। बहुतों को देश में मौजूद व्यवस्था या आसपास की सामाजिक प्रणाली से शिकायतें होती हैं। बहुत लोग सवाल पूछते हैं। अपने करियर से जुड़े। कुछ लोगों की प्रेम कहानियाँ सुनती हूँ। कुछ लोगों के परिवार का हिस्सा जाने कब बन जाती हूँ। कुछ लोगों की फौरी परेशानियों का हल बताने की कोशिश करती हूँ। हालांकि मैं कितनी और कहाँ तक-सही गलत होती हूँ मुझे भी इस बात की ख़बर नहीं है। हाँ, पर मैं मदद जो कर पाऊँ तब जरूर करती हूँ।



इन नौजवान लोगों से ही मुझे आजकल सुनने की अच्छी आदत लगी है। कई लोग मुझे व्हाट्सएप और फ़ेसबुक पर भी देर तक बातें करते हैं। उनकी बहुत सी बातें निजी होती हैं। निजी बातों के दायरे में आते ही मुझमें थोड़ी हकलाहट होने लगती है। एक ज़िम्मेदारी का अहसास हो आता है। पर इन सब से यह भी पता चलता है कि आजकल के ये नौजवान लोग (इनमें मैं भी शामिल हूँ) बहुत ही रफ़्तार पसंद लोग बनते जा रहे हैं। कर्म से पहले फल को सोच लेने वाले, पढ़ाई से पहले जानकारी को कैच करने वाले, जल्दी भावुक होने वाले, जल्द ही विश्वास करने वाले, मिश्रित प्रकृति वाले हैं ये लोग।

उनकी रीडिंग से यह पता चलता है कि कई बार ये नौजवान अपने कामों और फैसलों से चौंका देते हैं। उम्मीद से परे या तो ये बहुत हद तक जिम्मेदारियों को समझ लेते हैं या फिर कई इतनी सी उम्र में बेहद परिपक्वता वाली बातों को अंजाम देते हैं। कभी जब पास बैठती हूँ तब इनमें से भारी उर्ज़ा को चारों ओर फैलता हुआ अनुभव करती हूँ। ऐसा लगता है कि इनका दिमाग बड़ी तेज़ गति से काम कर रहा है। ठीक इसी तरह जब मैं मेट्रो में यात्रा कर रही होती हूँ तब मुझे यकायक बहुत आहिस्ता से कही गई बातें भी सुनाई दे जाती हैं। यकीन मानिए मेरा यह कतई मतलब नहीं है कि मैं जानबूझकर सुनना चाहती हूँ। मैं कानों पर दीवार नहीं खड़ी कर सकती और न ही आवाज़ की गुणवत्ता को मार सकती हूँ। मुझे बस सुनाई देता है।

और इस तरह से धीरे-धीरे मैं उनके संसार में कदम रखती चली जाती हूँ। ठीक वैसे ही जैसे एलिस करती थी। अहा! एक कहानी जो मुझे हाल ही में अपनी मेट्रो यात्रा में सुनाई दी। ...उसे साझा करना चाहूंगी।

बहुत भीड़ थी और बहुत कोलाहल भी था। एक लड़की बहुत ही धीमे से हेड्स फोन से बात कर रही थी। चूंकि मुझे कहीं खड़े होने की जगह नहीं मिल रही तो मैं उससे थोड़ी नजदीक खड़ी हो गई। उसने मुझे नज़रें उठाकर देखा। मैंने भी। हम दोनों मुस्करा दिये। वह थोड़ा खिसक गई और मैं ठीक से खड़े होते हुए उसके और नजदीक आ गई। उस दिन मैं शायद परेशान थी कुछ बातों को लेकर। इसलिए मेरा ध्यान शुरू शुरू में उसकी बातों पर नहीं गया। वह मेरी ही हमउम्र लग रही थी। आवाज़ महीन थी। उसके बाल घुँघराले और रंग पक्का था। मेरा वाला रंग। आँखों को मसकारे से सजाया था। वह कुल मिलाकर बहुत ही अच्छी लग रही थी।

वह बात कर रही थी- 'मैं क्या करूँ? मैंने खुद से ही सीख लिया है। Yes...I  learned now...totally. जब उसे मेरी फिक्र नहीं तो मैं क्यों अपना दिमाग उस पर जाया करूँ! पहले काफी इंटरेस्ट लेता था। but now...he has just stooped. I know...he has anyone. May be beautiful more than me...सुन मैंने तो तुझसे कुछ कभी नहीं छिपाया। उसकी जो अजीब सी शर्तें हैं, वो पूरी नहीं हो सकती। प्यार में शर्त ही है आजकल। Honesty तो बची ही नहीं है। ...'

दूसरी तरफ कोई लड़की ही थी जो मेरी तरह अच्छे कान रखती थी। वह हाँ या yes बोलकर इस लड़की की बातों को आगे बढ़ा रही थी। मुझे ऐसा भी लगा कि वह अच्छे तरीके से किसी के सीने का ग़ुबार निकलवा रही थी।

यह लड़की आगे बोली-

'नहीं... अभी सब बंद। जबर्दस्ती तो किसी से कहा जा नहीं सकता कि मुझे पसंद करो। पता नहीं लोग इतने अजीब से क्यों होते हैं! मशीन के type। समझ नहीं आते। अभी मुझे न थकावट होती है। भाड़ में जाए साला सब कुछ। कूल रहूँगी। अपना पढ़ाई वढ़ाई पर ध्यान देना है। वैसे भी distance kills relationship. अभी मुझे खुश रहना है। कुछ करना है। हर बात में दिल में मातम लेकर नहीं बैठना चाहती। बहुत stress हो जाता है। दुनिया में पहले से ही इतना कुछ हो रहा है। फिर मैं क्यों किसी एक के मुझे पसंद न करने से मरी जा रही हूँ।...'

इस लड़की ने एक लंबी सांस ली और आगे बात करती गई। मेरा स्टेशन आ गया था। मैं उस रोज़ घर आई तो एक लड़की, जिसकी प्रेम ज़िंदगी अजीब मोड़ पर थी उसे उस लड़की की बातों से उदाहरण ले लेकर समझाया। मुझे नहीं पता कि उसे कितना समझ आया। पर मुझे समझ आ गया। उसकी कुछ लाइंस तो मैंने दिल में गांठ बांधकर रख ली। कसम से बहुत राहत है।

शुक्रिया उस लड़की का।





  







  

Saturday, 15 July 2017

ज़िक्र-ए-ख़्वाब

कभी कभी ऐसा लगता है कि घड़ी की सुइयों को हमसे अधिक जल्दी है। कभी लगता है, समय को खींचकर अपने साथ लेकर भाग रही हैं। उनको जलन तो नहीं होती हमसे? हो भी सकता है। आजकल सब कुछ हो सकता है। जो होना है वो भी हो रहा है पर जो नहीं होना चाहिए वो तो पक्का हो रहा है। कुछ दिन से माथे के अंदर अजब गजब सी शांति थी सो कुछ नहीं छापा। आज इस शांति ने मुझे एक पर्ची पकड़ाई कि कुछ तो अपने लिए लिखो। दूसरों के लिए क्या लिखना! आसपास कितना कुछ हो रहा है। सब कुछ चक्कर-घिन्नी की तरह घूमता है। फिर भी सपनों की बात करना ज़्यादा महत्वपूर्ण है। घटनाओं के लिए मीडिया तो है ही।



रोज़ कोशिश करती हूँ कि अपने दिमाग को समेट लूँ। उसमें इतनी लहरे हैं कि उनकी लगाम मेरे वश से बाहर है। जितनी कोशिश करूँ, उन्हें संभाल नहीं पाती। आज उस सपने का ज़िक्र रह रह कर मन में आ रहा है जो तीन साल पहले देखा था। जब मेरे शरीर का ऊपरी भाग यकायक विशाल हो गया था और मेरे सीधे हाथ पर पृथ्वी अपनी चरम रफ़्तार में घूम रही थी। इस सपने ने मुझे कुछ ऐसा चौंकया कि आजतक इसे अपनी छवि तिजोरी में लिए रहती हूँ। मैंने कभी इसे तालाबंद करने की कोशिश नहीं की। चाहती हूँ कि इसे भाग निकलने का मौक़ा मिले। पर यह छवि वाला सपना कभी फरार नहीं होता। आज भी फेविकोल के मजबूत जोड़ के साथ मुझसे चिपका हुआ है। स्कूल के समय से ही मेरी याद में जंग लगा हुआ है। कभी कोई चीज़ याद ही नहीं हुई न रट्टा लगा पाई। लेकिन इस तरह के सपने मुझे रटे हुए हैं।

अगर वास्तव में भोलेनाथ मेरे सिर के ऊपर वाले आसमान में रहते हैं तब तो मेरा एक दिल वाला शुक्रिया कि क्या गज़ब किए हो महादेव! इतने सपने मेरे माथे में भरे हैं। मुझे शुरुआत में कुफ्त होती थी। लेकिन अब इनके प्रति दिलचस्पी और जिज्ञासा होती है। इनमें फैले रंग और बनावट इतने जुदा होते हैं कि मुझे इस बात की हैरानी होती है कि हमारा दिमाग अपनी ही तरह का शानदार वर्कशॉप है।



सपने सबसे ज़्यादा गुंजल और बिखरे हुए होते हैं। बेताल की तरह पीठ पर सवार। इनकी अपनी एक भाषा होती है। कुछ चेहरों और पल पल में बदलते घटनाक्रम कुछ संकेत देते हैं। ये संकेत आसपास की हमारी दुनिया से जुड़े होते हैं। इनको समझना अपने वास्तविक जीवन की जटिलताओं को सुलझाने जैसा है। कम-से-कम उनके नजदीक तो पहुँचना ही है।

सपने बेवजह की उपज नहीं होते। वे कहीं न कहीं और किसी भी तरह से हमसे ही जुड़े होते हैं। उनकी जगह बेशक दिमागी दुनिया होती है पर वे उस तरह का साया हैं जो काफी विशाल है। वे छलिया होते हैं। छलते हुए भी सही की ओर इशारा करते हैं। वे लोगों और परिस्थितियों के ठगने के घटनाक्रम का हल्का ब्योरा पेश करने की कोशिश करते हैं। वे जो नहीं कहा जाता, उसे सामने लाने की कोशिश करते हैं। वे यह भी साबित करते हैं कि आपका कुछ हिस्सा डिवाइन है। रोबोट को सपने नहीं आते। कम्प्यूटर सपने नहीं देख सकता। वो तो आप और मैं ही देख सकते हैं।

कुछ सपने एक ही स्लाइड में आते हैं। कुछ सपनों की बनावट एक के अंदर दूसरे सपने की संरचना में दिखती है। यह मेरा अनुभव है। हो सकता है किसी और को दूसरी तरह के सपने आते हों। सपनों का अंतराल या उनकी उम्र का मतलब सीधे तौर पर जागने के बाद याद में महज़ कुछ छवियों के रह जाने से जुड़ा है। यह प्रक्रिया इतनी गजब है कि जो किसी में भी रचनात्मकता को जन्म देते हैं। सपनों से बहुत कुछ उधार लिया जा सकता है।


....जारी है, अगली पोस्ट में सपना का ज़िक्र!







Wednesday, 12 July 2017

वी द पीपल

आज (11जुलाई 2017) कुछ बच्चों से बातचीत हो रही थी तब मैंने उन्हीं की किसी पंक्ति पर झपट्टा मारते हुए पूछा- 'देश क्या है, आपको क्या लगता है?'
उसके बाद जो जवाब मिले वो बड़े दिलचस्प थे-
भारत
इंडिया
हमारा घर
हमारा परिवार
जहां के हम होते हैं
दुनिया
जगह
प्यार से रहना, एक साथ
बहुत बड़ी जगह
हमारा गाँव ...

शायद कुछ देर और रहती तो बातचीत अच्छे मुकाम तक पहुँचती। लेकिन उनके इन शब्दों को मैं साथ लेती आई। घर तक। अपने ज़ेहन तक। अब इन्हें एक समझ की शक्ल देने की कोशिश कर रही हूँ। आजकल इसी बात का झगड़ा है। कोई छोटा या मोटा नहीं बल्कि जानलेवा झगड़ा। देशभक्ति और देश के इर्द-गिर्द घूमता हुआ। देश शब्द अब डराने या धमकाने सा लगा है। जबकि देश किसी भी व्यक्ति के लिए महज एक भौगोलिकता नहीं होता। वह इस दायरे से भीतर और बाहर दोनों होता है। देश शब्द के मायने सभी के लिए अलाहिदा हो सकते हैं और ये इस हद तक लचीले हैं कि कोई भी अपने हिस्से के आयतन के साथ खुशी से रह सकता है। सब अपनी समझ से इसे परिभाषित कर सकते हैं। यह छूट इस देश के संविधान ने तो दी ही है साथ यह नैसर्गिक भी है। मैंने अपनी किसी पोस्ट में यह लिखा था कि शीला धर द्वारा लिखी किताब 'दिस इंडिया' मे वह बहुत अच्छी तरह से लिखती हैं कि भारतीयता वह तत्व है जो इस देश में जन्म लेते समय ही शिशु में मौजूद होता है। उसे अलग से डालने की ज़रूरत नहीं होती। इस लिए तमाम इल्ज़ाम जो इस देश के नागरिकों पर देश द्रोह से जुड़े लगाए जाते हैं उन्हें बड़ी आसानी से ख़ारिज़ किया जा सकता है।



बच्चों की देश की समझ में धर्म भी नहीं दिखा। इस बात का मुझे आश्चर्य भी है। हम एक धर्म निरपेक्ष देश हैं। इसका मतलब राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा। वह राज्य में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करेगा जिसमें सभी धर्म का सत्व समाज को लाभ पहुंचाए। कुछ ऐसी ही हमारी संवैधानिक परिभाषा में धर्म के बारे में समझ मिल जाएगी। हो सकता है यह सब बच्चों ने कहीं किसी से सीखा हो, स्कूल में, घर में या कहीं भी। लेकिन बच्चों की दाद देनी होगी कि उन्हों ने अपनी समझ को अपनी जरूरत के मुताबिक ही लिया। बाकी को छोड़ दिया। या यह भी संभव है कि उन्हें सवाल के जवाब का हुनर आता हो। चाहे इसके पीछे कोई भी वजह हो। लेकिन मैं खुश थी कि कहीं भी धर्म ने दस्तक नहीं दी।

तीसरी बात यह भी ध्यान खींचने वाली रही कि देश के मतलब में वे इकाई से आगे बढ़ते हुए दिखे। हमारा परिवार से लेकर दुनिया तक। यह दिलचस्प है। बहुत। भई... पासपोर्ट के बाहर भी बहुत कुछ है। जो पढ़े लिखे लोग 'वसुधैव ही कुटुंबकम्' को हजारियों बार कहकर अपनी दिमाग की बत्ती की नुमाइश करते हैं उनसे अगर इसके पीछे की तस्वीर पूछ ली जाए तो उनका दम निकल जाएगा। इसके जवाब में वे लोग फिर संस्कृत के गल चुके श्लोक चिपकाएँगे जिनका मतलब वे खुद ही जानते हैं। यहाँ मैं रोज़मर्रा और आसपास को सीखने-सिखाने 
जरिये के रूप में महत्वपूर्ण मान रही हूँ। देखिये यह आमफहम समझ कितनी ही शानदार है कि आपके देश में दुनिया के सभी हिस्से समा रहे हैं। ज़रा सोचिए उन फकीरी यात्राओं के बारे में कैसे बिना पासपोर्ट के एक देश से दूसरे देश जाया जाता था। जब लकीरें मौजूद नहीं थीं। पर आज तो अपने ही देश के दूसरे राज्य में जाने के लिए टोल टैक्स लग जाता है। आज के मसले भी सरल नहीं हैं। सुरक्षा के मद्देनज़र सीमाओं को खुला भी नहीं छोड़ा जा सकता।

लेकिन मुझे इस बात की खुशी है कि बच्चे अपनी कल्पनाओं को वैधानिक और अवैधानिक लकीर से आगे ले जा रहे हैं। ऐसे माहौल में जब देश और देशभक्ति की हाय-तौबा जानलेवा बन चुकी है तब बच्चों में इस तरह की समझ मुझे शांति दे रही है।





Monday, 3 July 2017

...वरना इस गली में अकेला मकान तो किसी का नहीं है

इंटरॉडक्शन सबसे अच्छा मुझे बचपन में सुने एक गीत में लगा था। 'अमर अकबर एंथनी' फ़िल्म में अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गीत में वह क्या खूब अपना परिचय देते हैं। यह परिचय दिल्लगी वाला है।

"माय नेम इज़ एंथनी गोंसाल्वेस 
मैं दुनिया मे अकेला हूँ 
दिल भी है खाली घर भी है खाली 
इसमे रहेगी कोई किस्मत वाली 
हाय जिसे मेरी याद आये जब चाहे चली आये.. 
रूपनगर प्रेमगली खोली नंबर चार सौ बीस..."

थोड़ा दार्शनिक और रूमानी परिचय फिल्म 'परिचय' के एक गीत में आता है-

मुसाफ़िर हूँ यारो
न घर है न ठिकाना
मुझे चलते जाना है
बस चलते जाना

सोचिए कोई इंटरव्यू में यह पूछे कि अपने बारे में कुछ बताइये। तब क्या मज़ेदार माहौल हो सकता है और ऐसा भी कि आपको बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, तुरंत। मेरे साथ यही अजीबो-गरीब घटना घटती है। जब भी किसी इंटरव्यू में जाना होता है तब दिमाग में यह गाना बजना शुरू हो जाता है। बेहद असमंजस में पड़ जाती हूँ कि आखिर यह क्यों हो रहा है!

यह तो रही फिल्म और मेरी बात। लेकिन परिचय हल्की चीज नहीं होती। यह गंभीर है। इसे मज़ाक में नहीं बताया जा सकता और न ही किसी और का मज़ाक में परिचय समझा जा सकता है। अभी तक के दिये अपने परिचय पर मुझे संतुष्टि नहीं हुई है न ही बढ़िया परिचय गढ़ पाई हूँ और ऐसा किसी का परिचय रोचक नहीं लगा है जो याद रहे। किसी रोज़ यह भी हो ही जाएगा।

गौर करती हूँ तब पाती हूँ कि दिमाग का अनुकूलन बचपन से एक दूसरी दिशा की तरफ किया गया है। परिवार, स्कूल और बाहरी माहौल ने इसमें समान भागीदारी निभाई है। जनता की एक इकाई के रूप में वह मजबूती नहीं दी गई जिसकी की 'डमोक्रेसी' में उम्मीद होनी चाहिए। जुल्म न करने की शिक्षा, यह प्रणाली न तो अमीरों में भर पाई और जुल्म न सहने की शिक्षा, न हम गरीबों में कूट कूट कर भर पाई। यह लोकतंत्रीय प्रणाली जनता को निष्क्रिय जनता बनाए रखने में ज़्यादा सक्रिय रूप से उभर रही है।

लेकिन आजकल कुछ गुंडों और हत्यारों का परिचय अखबारों और टीवी की खबरों में देखने को मिल रहा है। गौ-रक्षक! कुछ देर इस शब्द को ध्यान से सोचिए। इस शब्द की थरथरी को महसूस कीजिये। सोचिए घड़ी की सेकंड की सुई के साथ। फिर मिनट की सुई के साथ और उसके बाद आपको लगेगा कि एक तस्वीर साफ हो रही है। समाज की इकाई के तौर पर हम सभी पर उंगली उठ रही है। हम जनता, भीड़ और गौ रक्षक नामक हत्यारों में बंटे हुए खुद को पाते हैं। हम यह तय तो कर ही सकते हैं कि हम कौन हैं और हमारा पाला क्या है!नकारात्मक ताक़तें कब नहीं थीं? अपने मिथकों की कहानियों को उठाकर देख लीजिये। उसके बाद के समाजों को दोहरा लीजिये। समय के हर पड़ावों पर ये ताक़तें रही हैं। दिलचस्प इनके विरोध रहे हैं। इन विरोधों में हम यानि आप और मैं कहाँ और कौन थे, यह जान लेना भी जरूरी है।

मैं उन विरोधों के समर्थन में रहती हूँ जिनमें कोई हीरो न हो। जनता की प्रत्येक इकाई जहां सक्रिय है वहीं मेरा मन रमता है। मसीहा टाइप की छवियों से मुझे हिकारत होती है। आखिर क्यों किसी एक को ही दिव्य शक्ति मिल जाती है? जब सब में वह महान शक्ति अपना अंश रखती है। वन मैन आर्मी वाला हाल हमें इस हद तक ले आया है कि कोई बेगुनाह को मार देता है और हम एक कोने में खड़े होकर बस देख ही लेते हैं। किसी गाँव में किसी औरत को डायन बताकर मारना हो या किसी को गाय के मांस पर ही चाकू घोंपना हो, ये सब काम कर दिये जाते हैं और आत्मा जो नहीं मरती, वह शरीर को छोड़ कर चली जाती है। सत्य तो यही है कि ज़िंदगी सभी की अनमोल है और सभी को बराबर हक़ हैं। मुझपर कोई वार कर रहा है तो मैं श्री कृष्ण के दसवें अवतार का इंतज़ार नहीं करूंगी। या तो बचूँगी या फिर बदले में वार करूंगी। यही व्यक्तिगत बात हुई।

जितेंद्र की एक पुरानी फिल्म है- 'हातिम ताई।' आपने देखी ही होगी यह फिल्म। फिल्म मोटे तौर पर बुराई और अच्छाई की भिड़ंत है जिसमें जितेंद्र एक अकेले मसीहा टाइप के किरदार में अच्छाई का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। हालांकि यह कहानी पुरानी मिथक कहानी से प्रेरित थी। इसके बाद और साथ साथ आई फिल्मों में भी अकेला मसीहा तारणहार ही दिखाई दिया। मुझे न... दिक्कत यहीं लगती है। हमारे समाजों को मसीहा वाला इंजेक्शन ही दिया जाता रहा है। यह क्रम अभी तक चालू है। इसका उदाहरण आजकल आपको 'शीर्ष नेता' या फलां पार्टी की 'सुप्रीमो' आदि के इस्तेमाल में होता है। हालांकि ये शब्द मीडिया द्वारा शुद्ध रूप से गढ़े हुए हैं फिर भी इनमें मुझे गलती नहीं दिखती। आजकल वर्तमान में केन्द्रीय सरकार में भी महज़ कुछ चेहरे ही हैं जिनको बहुत से अक्ल के अंधे मसीहा का रूप बता रहे हैं।


मसीहा से हटकर दूसरे पक्ष पर बात करें तो जनता का पक्ष दिखता है। एक अथाह जनसमूह। गिनती नहीं कर सकोगे जब जनता शब्द को सोचोगे। स्कूल में हरीशंकर परसाई की एक कहानी पढ़ाई गई थी। उसमें भेड़ों को जनता का रूप दिया गया था। तब से आजतक मुझे भी जनता शब्द का रंग सफ़ेद दिखता है। उनकी खाल और सफ़ेद मुलायम बाल महसूस करती हूँ। इस बात का भी पूरा आभास रहता है कि हर भेड़ की बलि चढ़ा दी जाएगी। कुछ की चढ़ाई जा रही है हर एक सेकंड। जनता में मैं उन लोगों को नहीं गिनना चाहती जिनके आलीशान बंगले हैं। जो नहीं जानते कि धूप क्या होती है। जिनको रोटी, कपड़े और मकान का सुरक्षित भविष्य मिला हुआ है, वह जनता नहीं होती। बल्कि वे लोग वही खूनचूषक होते हैं जो हाथ रिक्शे की वजनदार 50 रुपये की सवारी करने के बाद 40 रुपये पचा जाना चाहते हैं। ये लोग जनता वाली जमात में नहीं आते।



जनता का दिमाग कहाँ खोजा जाये, यह महत्वपूर्ण सवाल है। किसी एक व्यक्ति का दिमाग शरीर के ऊपर होता है। लेकिन यही चीज भीड़ में कहाँ समझी जाये? किन क्रियाओं में इसे जाना जाये? अगर दिमाग नाम की चीज है तो इसकी नैतिकता की नाप क्या मापी जाए...ऐसे सवाल मैं अभी तक सोचती रही हूँ। जनता की इकाई की परवरिश में ही खामी है। इस परवरिश के अपने ही कई प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कारण भी हैं। अव्वल दर्जे तक गहरी असमानता बहुत है। पर्याप्त साधन तक नहीं हैं जीने के लिए। लैंगिक असमानता इस कद्र है कि औरतों को तो आज तक औरत को इंसान मान लेने की जंग लड़ी जा रही है। कई बार जब का हिंसक भीड़ का ज़िक्र होता है तब महिलाओं का भाग न के बराबर होता है। इसलिए महिलाएं भी जनता का बराबर हिस्सा है। कहीं आप लोग यह न सोच लेना कि औरतें जनता नहीं हुआ करतीं।

हमारे समाजों में वशीकरण मंत्र का बहुत ज़ोर रहा है। भीड़ के साथ भी यही मंत्र इस्तेमाल होता है। उनके दिमाग को सामूहिकता में वश में कर के उनसे अपने मतलब का काम करवाया जा रहा है। दुखद यह है कि इसमें राजनीतिक दलों का बहुत बड़ा हाथ है जो ऐसे 'ब्रेनलेस' समूह तैयार कर रहे हैं। ये दल इस तरह की विचारधारा को लोगों में इनपुट कर रहे हैं जो अपने होश-हवाश से बाहर होकर अपने कृत्य को अंजाम देती है। ये समूह इस हद तक क्रूर हैं कि पीट पीटकर जान लेने तक उतारू हो चुके हैं। भीड़ का ब्रेन ऐसी ही विचारधारा में मौजूद है। मारक। जानलेवा विचारधारा। जिसका आधार नफरत पर खड़ा है।

जब इस तरह की घटनाएँ घट जाती हैं तब अपराधी के प्रति मेरा और आपका मन कितनी घृणा से भर जाता है। हम स्वर में स्वर मिलाकर यह कहते हैं कि इन अपराधियों को फांसी दे दो.., सूली पर चढ़ा दो। हम कब अपराधी के पाले में खड़े हो जाते हैं यह पता भी नहीं चलता। दोनों में ही हिंसा मुख्य स्वर हो जाती है। हम हिंसा का जवाब हिंसा से देना चाहते हैं। हमने इसलिए जेल बना रखी है। ...लेकिन यह कैसे संभव है कि हिंसा का जवाब हिंसा हो! जब मैं जेल की प्रणाली को सोचती हूँ तब सिहर उठती हूँ। जेलों में ज़िंदा जीवन तिल तिल मरता है। हमें यह समझना होगा कि जिसे मारा जा रहा है वो भी आम इंसान है और जो मार रहा है वह भी हिंसा से पहले आम इंसान ही था। मुझको आपको लड़वा कर, एक दूसरे को मरवाकर कोई तीसरा अपनी मज़े की ज़िंदगी काट रहा है। अगली बार उठाने से  पहले ये बातें सोच लेना। हमारा ध्येय हथियार उठाना और कत्ल करना कतई नहीं है। जीवन का मतलब मिलकर जीना है। यही सच है। बाकी कुछ नहीं।

हमें अपने अंदर इंसान बनने का ऐलान करना होगा। कुछ गलत करने से पहले पूछिये कि आपके असली धर्म इंसानियत पर इसका क्या असर होगा! हम ही जनता और भीड़ का निर्माण करते हैं। इसलिए यह तय कर लेना सबसे जरूरी है कि भीड़ में मुर्दा बनना है या जनता के रूप में सचेत।...वरना इस गली में अकेला मकान तो किसी का नहीं है। सभी जलेंगे। बस क्रम अलग होगा।


(आजकल गलत अर्थ लेने की परंपरा है। इसलिए यह साफ करती चलूँ कि मैं क़त्ल करने वालों का पक्ष नहीं ले रही। बल्कि उनके अंदर आए इस परिवर्तन को समझने की कोशिश कर रही हूँ। यह शुरुआत है।)    






The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...