Monday, 15 June 2026

ज्ञान साझा करने के संदर्भ में -- पत्र - 6 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 

प्रिय लुसीलियस,

मुझे ऐसा लगता है कि मैं केवल सुधर ही नहीं रहा हूँ बल्कि रूपांतरित भी हो रहा हूँ। फिर भी मैं यह दावा नहीं करता, न ही ऐसी आशा करता हूँ कि अब मुझमें ऐसा कुछ भी शेष नहीं है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। निस्संदेह मेरे भीतर बहुत-सी बातें हैं जिन्हें और सुदृढ़ बनाना चाहिए, कुछ को हल्का करना चाहिए, और कुछ को अधिक स्पष्ट रूप से उभारना चाहिए। वास्तव में, यही तथ्य इस बात का प्रमाण है कि मेरी आत्मा पहले से बेहतर हो गई है। अब वह अपनी उन त्रुटियों को पहचान सकती है जिनसे वह पहले अनभिज्ञ थी। जैसे कुछ रोगियों को इस बात पर बधाई दी जाती है कि उन्हें स्वयं अपनी बीमारी का बोध हो गया है, वैसे ही मुझे भी अपने दोषों का ज्ञान होना प्रगति का संकेत लगता है।

    इसलिए मैं अपने भीतर आए इस अचानक परिवर्तन को तुम्हारे साथ साझा करना चाहता हूँ। ऐसा करने से मुझे हमारी मित्रता पर और भी दृढ़ विश्वास होगा...  उस सच्ची मित्रता पर जिसे न आशा तोड़ सकती है, न भय, और न ही स्वार्थ। ऐसी मित्रता, जिसके लिए और जिसमें मनुष्य मृत्यु तक का सामना कर सकता है।

    मैं तुम्हें ऐसे अनेक लोगों के उदाहरण दिखा सकता हूँ जिनके पास मित्र तो थे परंतु मित्रता नहीं थी। किंतु यह स्थिति वहाँ कभी उत्पन्न नहीं हो सकती जहाँ दो आत्माएँ समान प्रवृत्तियों और सम्माननीय इच्छाओं के आधार पर एक हो जाती हैं। ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि ऐसे लोगों को ज्ञात होता है कि उनकी सभी वस्तुएँ साझी हैं —विशेषकर उनके दुःख। तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि मैं प्रतिदिन अपने भीतर कितनी स्पष्ट प्रगति अनुभव करता हूँ।



    और जब तुम कहते हो, “जो लाभ तुम्हें इतने उपयोगी लगे हैं, उनमें मुझे भी भागीदार बनाओ” तो मैं उत्तर देता हूँ कि मैं इन सभी उपहारों को तुम्हारे ऊपर उँडेल देना चाहता हूँ। मैं इसलिए सीखने में आनंद पाता हूँ कि जो सीखा है उसे दूसरों को सिखा सकूँ। कोई भी वस्तु, चाहे वह कितनी ही उत्कृष्ट और लाभदायक क्यों न हो, मुझे तब तक सुखद नहीं लग सकती जब तक मैं उसका ज्ञान केवल अपने तक सीमित रखूँ। यदि मुझे यह शर्त रखकर बुद्धि दी जाए कि उसे छिपाकर रखना होगा और किसी से कहना नहीं होगा तो मैं ऐसी बुद्धि को स्वीकार ही नहीं करूँगा। किसी भी उत्तम वस्तु का स्वामित्व सुखद नहीं होता यदि उसे साझा करने के लिए मित्र न हों।

    अतः मैं तुम्हें वे पुस्तकें भेजूँगा। ताकि तुम उपयोगी विषयों की खोज में समय नष्ट न करो, मैं उनमें कुछ विशेष अंशों को चिह्नित कर दूँगा जिससे तुम सीधे उन्हीं स्थानों पर पहुँच सको जिन्हें मैं सराहता और प्रशंसनीय मानता हूँ। फिर भी, जीवित वाणी और साथ-साथ बिताया गया जीवन तुम्हारी अधिक सहायता करेंगे, लिखित शब्दों की अपेक्षा। तुम्हें स्वयं कर्मक्षेत्र में आना चाहिए। पहला कारण यह है कि लोग अपनी आँखों पर अपने कानों से अधिक विश्वास करते हैं। दूसरा कारण यह है कि यदि कोई केवल उपदेशों का अनुसरण करता है तो मार्ग लंबा होता है परंतु यदि वह उदाहरणों का अनुसरण करता है तो मार्ग छोटा और अधिक सहायक होता है।

    यदि क्लेन्थीस ने केवल ज़ेनो के व्याख्यान सुने होते तो वह कभी उसका सच्चा प्रतिबिंब नहीं बन सकता था। उसने उसके साथ जीवन बिताया, उसके गुप्त उद्देश्यों को समझा, और यह देखा कि क्या वह स्वयं अपने नियमों के अनुसार जीवन जीता है। प्लेटो, अरस्तू और उन सभी महान दार्शनिकों ने, जो आगे चलकर अपने-अपने मार्ग पर चले, सुकरात के शब्दों से कम और उसके चरित्र से अधिक लाभ प्राप्त किया। मेट्रोडोरस, हर्मार्कस और पॉलीएनस जैसे महान पुरुष एपिक्यूरस की कक्षा में बैठकर नहीं बल्कि उसके साथ एक ही छत के नीचे रहकर महान बने। इसलिए मैं तुम्हें केवल इसलिए नहीं बुला रहा कि तुम लाभ प्राप्त करो बल्कि इसलिए भी कि तुम लाभ पहुँचाओ। हम दोनों एक-दूसरे की बहुत सहायता कर सकते हैं।

इस बीच, मैं तुम्हें अपना छोटा-सा दैनिक उपहार देना चाहता हूँ। आज हेकाटो के लेखन में जो बात मुझे विशेष रूप से पसंद आई, वह यह है, “तुम पूछते हो कि मैंने क्या प्रगति की है? मैंने स्वयं अपना मित्र बनना सीख लिया है।” यह वास्तव में एक महान उपलब्धि है। ऐसा व्यक्ति कभी अकेला नहीं रह सकता। निश्चिंत रहो, जो व्यक्ति स्वयं का मित्र बन जाता है, वह समस्त मानवजाति का भी मित्र बन जाता है।

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दार्शनिक के मध्यम मार्ग के संदर्भ में -- पत्र - 5 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)


मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ और प्रसन्न हूँ कि तुम अपने अध्ययन में दृढ़ बने हुए हो तथा अन्य सभी बातों को एक ओर रखकर प्रतिदिन स्वयं को बेहतर मनुष्य बनाने का प्रयास करते हो। मैं केवल तुम्हें ऐसा करते रहने की सलाह ही नहीं देता बल्कि विनती भी करता हूँ कि ऐसा करते रहो। लेकिन मैं तुम्हें सावधान करता हूँ कि उन लोगों की तरह व्यवहार मत करना जो सुधार की अपेक्षा लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। ऐसे कार्यों से बचो जो तुम्हारे कपड़ों या जीवन-शैली के कारण लोगों में चर्चा का विषय बन जाएँ।

घृणा उत्पन्न करने वाले कपड़े, बिखरे हुए बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी-मूँछ, चाँदी के बर्तनों का दिखावटी तिरस्कार, धरती पर सोना, अथवा आत्म-प्रदर्शन के ऐसे अन्य विकृत रूपों से बचना चाहिए। दर्शन का नाम ही, चाहे वह कितनी ही शांति से क्यों न अपनाया जाए, लोगों के उपहास का पर्याप्त कारण बन जाता है। फिर यदि हम स्वयं को समाज की परंपराओं से अलग दिखाने लगें, तो क्या होगा? भीतर से हमें हर दृष्टि से भिन्न होना चाहिए पर बाहरी रूप से हमें समाज के अनुरूप रहना चाहिए।

                                 

                 The Thinker by Auguste Rodin, 1904

न तो बहुत सुंदर कपड़े पहनने चाहिए और न ही अत्यंत मैले। सोने से जड़ी हुई चाँदी की थालियों की आवश्यकता नहीं है पर हमें यह भी नहीं समझना चाहिए कि सोना-चाँदी का अभाव ही सादगी का प्रमाण है। हमें ऐसा जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए जो सामान्य लोगों से अच्छा हो पर उनसे बिल्कुल विपरीत नहीं। अन्यथा हम उन्हीं लोगों को डरा देंगे और अपने से दूर कर देंगे जिन्हें हम सुधारना चाहते हैं। नतीजा यह होगा कि वे हमारी किसी भी बात का अनुसरण नहीं करना चाहेंगे क्योंकि उन्हें डर होगा कि कहीं उन्हें हर बात में हमारा अनुकरण न करना पड़े।

दर्शन का पहला काम सभी मनुष्यों में एक-दूसरे के के प्रति भाईचारा उत्पन्न करना है। इसे दूसरे शब्दों में सहानुभूति और सामाजिकता कहा जा सकता है। यदि हम स्वयं को दूसरों से बिल्कुल अलग बना लें तो हम अपने ही उद्देश्य से भटक जाते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिन साधनों से हम प्रशंसा पाना चाहते हैं, वे हास्यास्पद या घृणित न हों। हमारा आदर्श है —"प्रकृति के अनुसार जीवन जीना।" लेकिन शरीर को कष्ट देना, सहज सौन्दर्य से घृणा करना, जान-बूझकर गंदा रहना, या ऐसा भोजन करना जो केवल साधारण ही नहीं बल्कि अरुचिकर और घिनौना भी हो — यह प्रकृति के विपरीत है।

जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों की खोज विलासिता का संकेत है वैसे ही सामान्य और सस्ते भोजन से बचना भी मूर्खता है। दर्शन सादगीपूर्ण जीवन की माँग करता है, तपस्या या आत्म-यातना की नहीं। मनुष्य एक साथ सादा और स्वच्छ दोनों हो सकता है। यही वह मध्यम मार्ग (Mean) है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। हमारा जीवन एक ज्ञानी पुरुष के जीवन और सामान्य संसार के जीवन के बीच संतुलित होना चाहिए। लोग उसकी प्रशंसा करें पर उसे समझ भी सकें।

तुम पूछ सकते हो —"तो क्या हम सामान्य लोगों की तरह ही रहें? क्या हमारे और संसार के बीच कोई अंतर न होगा?" हाँ, फर्क अवश्य होगा और बहुत बड़ा होगा। लेकिन वह अंतर तभी दिखाई दे जब लोग हमें ध्यान से देखें। यदि वे हमारे घर आएँ, तो उन्हें हमारे फर्नीचर या सजावट की नहीं बल्कि हमारी प्रशंसा करनी चाहिए। वह व्यक्ति महान है जो मिट्टी के बर्तनों का उपयोग ऐसे करता है मानो वे चाँदी के हों किन्तु उतना ही महान वह भी है जो चाँदी के बर्तनों का उपयोग ऐसे करता है मानो वे मिट्टी के हों। धन को सहन न कर पाना अस्थिर मन का लक्षण है।

अब मैं आज की एक और सीख तुम्हारे साथ बाँटना चाहता हूँ। मैंने हमारे दार्शनिक हेकाटो की रचनाओं में पाया है कि इच्छाओं को सीमित करना भय को भी समाप्त करने में सहायक होता है। वह कहते हैं, "आशा करना छोड़ दो और तुम भय करना भी छोड़ दोगे।" तुम पूछ सकते हो, "इतनी भिन्न चीज़ें एक साथ कैसे चल सकती हैं?" प्रिय लूसिलियस, वास्तव में वे उतनी भिन्न नहीं हैं जितनी दिखाई देती हैं। जैसे एक ही जंजीर कैदी और उसकी रखवाली करने वाले सैनिक दोनों को बाँधती है वैसे ही आशा और भय भी साथ-साथ चलते हैं। भय, आशा का अनुसरण करता है।

मुझे इसमें आश्चर्य नहीं होता क्योंकि दोनों ही उस मन की उपज हैं जो अनिश्चितता में जीता है और भविष्य की चिंता में व्याकुल रहता है। इन दोनों बुराइयों का मुख्य कारण यह है कि हम वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने के बजाय अपने विचारों को बहुत दूर भविष्य में भेज देते हैं। इस प्रकार दूरदर्शिता, जो मानव जाति का सबसे महान वरदान है, विकृत हो जाती है।

पशु उन खतरों से बचते हैं जिन्हें वे सामने देखते हैं और उनसे बच जाने के बाद निश्चिन्त हो जाते हैं। पर हम मनुष्य भविष्य की संभावनाओं और अतीत की स्मृतियों दोनों से स्वयं को पीड़ित करते रहते हैं। हमारे अनेक वरदान ही हमारे लिए अभिशाप बन जाते हैं। स्मृति, पुराने भय और कष्टों को फिर से जीवित कर देती है और दूरदर्शिता आने वाले कष्टों की कल्पना करके हमें पहले ही दुःखी कर देती है। वास्तव में केवल वर्तमान ही ऐसा है जो किसी मनुष्य को दुःखी नहीं कर सकता।

अभी के लिए विदा

 

Saturday, 13 June 2026

मृत्यु के भय के संदर्भ में -- पत्र - 4 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)


प्रिय लूसीलियस,

जिस प्रकार तुमने आरम्भ किया है उसी प्रकार आगे बढ़ते रहो और जितनी शीघ्र हो सके उतनी प्रगति करो ताकि तुम एक ऐसे मन का अधिक समय तक आनंद ले सको जो बेहतर हुआ हो और स्वयं के साथ शांति में हो। निस्संदेह, अपने मन को बेहतर व शांत करते समय भी तुम्हें आनंद मिलेगा पर वह सुख बिल्कुल भिन्न और कहीं अधिक श्रेष्ठ है जो उस समय प्राप्त होता है जब मन हर प्रकार के कलंक से मुक्त होकर चमक उठता है।

    तुम्हें याद होगा कि जब तुमने बचपन के कपड़े छोड़कर पुरुषों का कपड़ा पहना था और तुम्हें सम्मानपूर्वक सभा-स्थल तक ले जाया गया था तब तुम्हें कितना आनंद हुआ था। फिर भी उससे कहीं अधिक आनंद की आशा करो जब तुम बालसुलभ मनोवृत्ति का त्याग करोगे और विवेक तुम्हें सच्चे मनुष्यों की श्रेणी में सम्मिलित करेगा।

                                              

                                                          The Misery by Cristobal Rojas Poelo

                                               

हमारे भीतर केवल बचपन ही नहीं रह गया है बल्कि उससे भी बुरी चीज़ — लड़कपन —अब भी बना हुआ है। यह स्थिति और भी गंभीर इसलिए है कि हमारे पास वृद्धावस्था का सम्मान तो है पर मूर्खताएँ अब भी बच्चों जैसी हैं... बल्कि शिशुओं जैसी भी। लड़के तुच्छ बातों से डरते हैं, बच्चे परछाइयों से डरते हैं, और हम दोनों से डरते हैं।

    तुम्हें केवल आगे बढ़ना है तब तुम समझोगे कि कुछ चीज़ें वास्तव में उतनी भयावह नहीं हैं जितनी वे प्रतीत होती हैं। कोई भी बुराई बड़ी नहीं होती यदि वह अंतिम बुराई हो। मृत्यु आती है। वह भय का विषय तब होती यदि वह हमारे साथ बनी रहती। लेकिन मृत्यु या तो आएगी ही नहीं और यदि आएगी तो गुज़रकर चली जाएगी।

    तुम कह सकते हो, “पर मन को इस स्थिति तक पहुँचाना कठिन है कि वह जीवन का तिरस्कार कर सके।” पर क्या तुम नहीं देखते कि कितने तुच्छ कारणों से लोग जीवन का त्याग कर देते हैं? कोई अपनी प्रेमिका के द्वार पर फाँसी लगा लेता है, कोई घर की छत से कूद पड़ता है ताकि गुस्साए मालिक की डाँट न सहनी पड़े, कोई पकड़े जाने के भय से अपनी छाती में तलवार भोंक लेता है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि सद्गुण उतना ही प्रभावशाली हो सकता है जितना अत्यधिक भय? हर पल लंबे जीवन की कामना करने वाला व्यक्ति शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी सकता या यह मानता हो कि बहुत वर्षों तक जीवित रहना ही महान सौभाग्य है।                                              

    प्रतिदिन इस विचार का अभ्यास करो कि जब समय आए तो तुम संतोषपूर्वक जीवन से विदा हो सको क्योंकि बहुत से लोग जीवन से उसी प्रकार चिपके रहते हैं जैसे तीव्र धारा में बहते हुए लोग काँटों और नुकीली चट्टानों को पकड़ लेते हैं।

                                                        

                                                                  Picasso -- Blue Period 

    अधिकांश लोग मृत्यु के भय और जीवन की कठिनाइयों के बीच दुखपूर्वक झूलते रहते हैं। वे जीना नहीं चाहते यह भी की मरना कैसे है।

    इसलिए जीवन को अपने लिए उपयुक्त बनाओ और उसके विषय में सारी चिंता दूर कर दो। कोई भी अच्छी वस्तु अपने स्वामी को सुखी नहीं बना सकती यदि उसका मन उसके खो जाने की संभावना को स्वीकार न कर चुका हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका खोना मृत्यु से कम पीड़ादायक हो क्योंकि मृत्यु के बाद उसकी कमी का अनुभव ही नहीं किया जा सकता। इसलिए अपने मन को सुदृढ़ बनाओ और उन विपत्तियों के लिए तैयार करो जो सबसे शक्तिशाली लोगों पर भी आती हैं।

    उदाहरण के लिए, पॉम्पी का भाग्य एक लड़के और एक हिजड़े द्वारा निर्धारित हुआ। क्रैसस का अंत एक क्रूर और उद्दण्ड पार्थियन के हाथों हुआ। गैयस सीज़र ने लेपिडस को आदेश दिया कि वह अपनी गर्दन जल्लाद की कुल्हाड़ी के सामने प्रस्तुत करे और अंततः उसने स्वयं भी अपनी गर्दन चाएरिया के सामने प्रस्तुत की। भाग्य ने किसी को भी इतना ऊँचा नहीं उठाया कि उसे उतना ही बड़ा खतरा न दिखाया हो जितना बड़ा अनुग्रह उसने पहले दिया था। उसकी शांत प्रतीत होने वाली अवस्था पर भरोसा मत करो। एक क्षण में समुद्र की गहराइयाँ उथल-पुथल हो सकती हैं। जिस दिन जहाज़ अपनी भव्यता का प्रदर्शन करते हैं उसी दिन वे समुद्र में डूब भी सकते हैं।

    यह भी सोचो कि कोई डाकू या शत्रु तुम्हारा गला काट सकता है और चाहे वह तुम्हारा स्वामी न हो फिर भी प्रत्येक दास तुम्हारे जीवन और मृत्यु पर शक्ति रखता है। इसलिए मैं कहता हूँ, जो अपने जीवन की परवाह नहीं करता वही तुम्हारे जीवन का स्वामी बन सकता है। उन लोगों के बारे में सोचो जो अपने ही घरों में षड्यंत्रों का शिकार हुए.. . खुले रूप से या छलपूर्वक मारे गए। तुम पाओगे कि जितने लोग क्रोधित दासों द्वारा मारे गए लगभग उतने ही क्रोधित राजाओं द्वारा भी मारे गए। फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि वह व्यक्ति कितना शक्तिशाली है जिससे तुम डरते हो जब हर व्यक्ति के पास वही शक्ति है जिससे तुम भयभीत हो?

    पर तुम कहोगे, “यदि तुम शत्रु के हाथों पड़ गए तो विजेता तुम्हें मृत्यु के लिए ले जाएगा।” हाँ, पर वह तुम्हें वहीं ले जाएगा जहाँ तुम पहले से ही जा रहे हो। तुम स्वयं को धोखा क्यों देते हो और अब पहली बार यह सुनना क्यों चाहते हो कि तुम्हारा भाग्य क्या है? मेरी बात मानो, जिस दिन तुम जन्मे थे उसी दिन से तुम उसी दिशा में ले जाए जा रहे हो। यदि हम उस अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा करते समय शांत रहना चाहते हैं जिसके भय से हमारे सभी पूर्व क्षण अशांत हो जाते हैं तो हमें इस विचार और ऐसे ही अन्य विचारों पर निरंतर मनन करना चाहिए।

    पर अब मुझे अपना पत्र समाप्त करना चाहिए। आज मुझे जो उक्ति पसंद आई, उसे तुम्हारे साथ साझा करता हूँ। यह भी किसी दूसरे के उपवन से (लेखन) ली गई है — “प्रकृति के नियमों के अनुरूप बनी हुई गरीबी ही महान संपत्ति है।” क्या तुम जानते हो कि प्रकृति का नियम हमारे लिए कौन-सी सीमाएँ निर्धारित करता है? केवल भूख, प्यास और ठंड से बचना। भूख और प्यास मिटाने के लिए धनवानों के द्वार पर चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं है... न कठोर तिरस्कार सहने की... न अपमानजनक कृपा स्वीकार करने की... न समुद्रों की खाक छानने की आवश्यकता है और न युद्ध-अभियानों में भटकने की। प्रकृति की आवश्यकताएँ सरल हैं और सहज उपलब्ध हैं।

मनुष्य जिन वस्तुओं के लिए इतना परिश्रम करता है वे अधिकांशतः अनावश्यक और अतिरिक्त होती हैं। वही अतिरिक्त वस्तुएँ हमारे वस्त्रों को घिस देती हैं, हमें शिविरों में बूढ़ा कर देती हैं और हमें विदेशी तटों पर भटका देती हैं। जो पर्याप्त है, वह तो हमारे हाथों के निकट ही उपलब्ध है। जिसने गरीबी के साथ न्यायपूर्ण समझौता कर लिया है, वही वास्तव में धनी है।

अभी के लिए विदा।


Friday, 12 June 2026

सच्ची और झूठी मैत्री के संदर्भ में -- पत्र - 3 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस,

तुमने अपने एक 'मित्र' के हाथ मेरे पास एक पत्र भेजा है जैसाकि तुम उसे कहते हो। लेकिन अगले ही वाक्य में तुम मुझे चेतावनी देते हो कि मैं उससे उन बातों की चर्चा न करूँ जो तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हैं, यह कहते हुए कि तुम स्वयं भी उसके साथ ऐसी बातें साझा करने के अभ्यस्त नहीं हो। दूसरे शब्दों में, उसी पत्र में तुमने उसे अपना मित्र भी कहा और मित्र नहीं भी माना।

यदि तुमने 'मित्र' शब्द का प्रयोग सामान्य लोगों की तरह किया है, जैसे हम चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को 'माननीय सज्जन' कह देते हैं या रास्ते में मिलने वाले किसी व्यक्ति का नाम भूल जाने पर उसे 'आदरणीय महोदय' कहकर संबोधित करते हैं, तो ठीक है। लेकिन यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति को मित्र मानते हो जिस पर तुम्हें उतना विश्वास नहीं जितना स्वयं पर है तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो और सच्ची मित्रता का अर्थ पर्याप्त रूप से नहीं समझते।

वास्तव में, मैं चाहता हूँ कि तुम अपने मित्र के साथ हर बात साझा करो; लेकिन सबसे पहले उस व्यक्ति को परखो। जब मित्रता स्थापित हो जाए तब पूरा यकीन करो; लेकिन मैत्री स्थापित करने से पहले उसका मूल्यांकन अवश्य करो। जो लोग पहले मित्र बना लेते हैं और बाद में उसका परीक्षण करते हैं, वे अपने कर्तव्यों को उलट देते हैं और भ्रमित कर देते हैं। वे थियोफ्रेस्टस के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं जिन्होंने कहा था कि किसी व्यक्ति को परखकर ही उसे मित्र बनाना चाहिए न कि मित्र बनाने के बाद उसकी परीक्षा करनी चाहिए। लंबे समय तक विचार करो कि किसी व्यक्ति को अपना दोस्त बनाना अथवा या नहीं। लेकिन जब एक बार उसे स्वीकार करने का निर्णय कर लो तब उसे पूरे हृदय और आत्मा से अपनाओ। उसके साथ उतनी ही निर्भीकता से बात करो जितनी तुम स्वयं से करते हो।


                                                               New Fairy Tale by Belsky

जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, तुम्हें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि तुम्हारे पास ऐसा कोई राज़ न हो जिसे तुम अपने शत्रु को भी न बता सको। फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें सामाजिक परंपरा गोपनीय रखती है इसलिए तुम्हें कम-से-कम अपनी चिंताओं और विचारों को अपने मित्र के साथ अवश्य साझा करना चाहिए। उस पर यकीन करो और तुम देखोगे कि वह निष्ठावान व्यक्ति में परिवर्तित हो रहा है।  

कुछ लोग धोखा खाने के भय से दूसरों को धोखा देना सिखा देते हैं। अपनी शंकाओं के कारण वे अपने मित्र को गलत करने का अवसर दे देते हैं। मेरे मित्र की उपस्थिति में मैं कोई बात क्यों छिपाऊँ? उसके साथ रहते हुए मैं स्वयं को अकेला क्यों समझूँ?

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जिनसे भी मिलते हैं उन्हें वे बातें बता देते हैं जो केवल मित्रों को ही बताई जानी चाहिए। वे अपनी हर परेशानी किसी भी आकस्मिक श्रोता पर उँडेल देते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग अपने सबसे निकट के लोगों पर भी विश्वास करने से डरते हैं और यदि संभव हो तो वे स्वयं पर भी विश्वास न करें, अपने रहस्यों को हृदय की गहराइयों में दबाकर रखते हैं। लेकिन हमें इनमें से कोई भी रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। हर किसी पर विश्वास करना भी दोष है और किसी पर विश्वास न करना भी। फिर भी मैं कहूँगा कि पहला दोष अधिक सरल और निष्कपट है जबकि दूसरा अधिक सुरक्षित।

इसी प्रकार तुम्हें दो प्रकार के लोगों को फटकारना चाहिए। एक वे जो कभी शांत नहीं बैठते और दूसरे वे जो हमेशा निष्क्रिय बने रहते हैं। अत्यधिक व्यस्तता से प्रेम करना परिश्रम नहीं है। यह केवल एक बेचैन और चिंतित मन की अस्थिरता है। और सच्चा आराम भी हर प्रकार की गतिविधि को कष्ट मानकर उससे दूर भागने में नहीं है। ऐसा आराम तो केवल आलस्य और जड़ता है।

इसलिए तुम्हें मेरे अध्ययन में पढ़ी हुई पोम्पोनियस की यह उक्ति याद रखनी चाहिए। "कुछ लोग इतने अँधेरे कोनों में सिमट जाते हैं कि वे दिन के उजाले में भी अंधकार ही देखते हैं।"

नहीं, मनुष्य को इन दोनों प्रवृत्तियों का समन्वय करना चाहिए। जो आराम करता है उसे काम भी करना चाहिए और जो काम करता है उसे आराम भी करना चाहिए।

इस विषय पर प्रकृति से परामर्श करो।  वह तुम्हें बताएगी कि उसने दिन और रात दोनों की रचना की है।

अभी के लिए विदा।

Thursday, 11 June 2026

पठन और मन की छिटकती एकाग्रता के संदर्भ में -- पत्र - 2 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)


प्रिय लूसीलियस,

तुम मुझे जो लिखते हो और जो मैं सुनता हूँ, उसके आधार पर मैं तुम्हारे भविष्य के बारे में अच्छी राय बना रहा हूँ। तुम इधर-उधर नहीं भटकते और न ही बार-बार अपना निवास स्थान बदलकर स्वयं को विचलित करते हो; क्योंकि ऐसी बेचैनी एक अव्यवस्थित मन का संकेत है। मेरे विचार में, एक सुव्यवस्थित मन की पहली पहचान यह है कि व्यक्ति एक ही स्थान पर रह सके और अपने ही साथ समय बिता सके।

फिर भी सावधान रहो कि अनेक प्रकार के लेखकों और पुस्तकों का अध्ययन तुम्हें चंचल और अस्थिर न बना दे। यदि तुम ऐसे विचार प्राप्त करना चाहते हो जो तुम्हारे मन में दृढ़ता से स्थापित हो जाएँ तो तुम्हें कुछ चुनिंदा महान विचारकों के साथ टिककर रहना चाहिए और उनके कार्यों को अच्छी तरह आत्मसात करना चाहिए। जो व्यक्ति हर जगह होता है, वह वास्तव में कहीं भी नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति अपना सारा समय विदेश यात्राओं में बिताता है तो उसके बहुत-से परिचित तो बन जाते हैं पर मित्र नहीं बनते। ठीक ऐसा उन लोगों के साथ भी होता है जो किसी एक लेखक से गहरा परिचय स्थापित नहीं करते बल्कि सबके पास जल्दी-जल्दी और सतही रूप से जाते रहते हैं।


                                    Keats’ last moments in 1821, Joseph Severn

भोजन तब तक शरीर को लाभ नहीं पहुँचाता और न ही उसका अंग बनता है, जब तक वह पेट में ठहरकर पच न जाए। बार-बार दवा बदलने से रोग का उपचार बाधित होता है। बार-बार नई दवा लगाने से घाव नहीं भरता। यदि किसी पौधे को बार-बार उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जाता है, तब वह कभी मजबूत पेड़ में तब्दील नहीं हो सकता।

कोई भी वस्तु इतनी प्रभावशाली नहीं होती कि लगातार इधर-उधर किए जाने पर भी लाभ पहुँचा सके। इसी प्रकार बहुत-सी पुस्तकों का अध्ययन मन को बिखेर देता है। क्योंकि तुम अपनी सभी पुस्तकों को पढ़ नहीं सकते इसलिए उतनी ही पुस्तक रखो जितनी तुम वास्तव में पढ़ सकते हो।

पर तुम कहोगे, "मैं पहले एक पुस्तक को थोड़ा-सा पढ़ना चाहता हूँ और फिर दूसरी को।" मैं कहता हूँ कि यह अत्यधिक अच्छी वाली भूख का लक्षण है जो अनेक प्रकार के व्यंजनों का स्वाद तो लेना चाहती है पर उनसे पोषण नहीं पाती। अलग-अलग तरह का अत्यधिक भोजन तृप्त नहीं करता बल्कि ऊब उत्पन्न करता है।

इसलिए तुम्हें हमेशा बेहतरीन लेखकों को पढ़ना चाहिए और जब बदलाव का मन हो तो उन्हीं लेखकों की ओर लौटना चाहिए जिन्हें तुम पहले पढ़ चुके हो। हर दिन कुछ ऐसा सीखो या जानो जो तुम्हें गरीबी, मृत्यु और अन्य दुर्भाग्यों का सामना करने के लिए मजबूत बनाए... और जब तुम अनेक विचारों को देख-पढ़ लो तब उनमें से एक विचार चुनो और उस दिन उसे पूरी तरह आत्मसात करो।

यह मेरी अपनी आदत है; जो अनेक बातें मैं पढ़ता हूँ, उनमें से किसी एक को मैं अपना बना लेता हूँ।

आज का विचार मुझे एपिक्यूरस से मिला है क्योंकि मैं कभी-कभी शत्रु के शिविर में भी जाता हूँ। एक भगोड़े की तरह नहीं बल्कि एक टोह लेने वाले व्यक्ति की तरह।

एपिक्यूरस कहता है: "संतोषपूर्ण गरीबी एक सम्मानजनक अवस्था है।"

वास्तव में यदि गरीबी में संतोष है तो वह किसी भी तरह से गरीबी नहीं रह जाती। गरीब वह नहीं है जिसके पास बहुत कम है बल्कि वह है जो और अधिक पाने की लालसा करता रहता है। क्या फर्क पड़ता है कि किसी व्यक्ति ने अपनी तिजोरी या गोदाम में कितना धन जमा किया है, उसके पास कितने पशु हैं अथवा वह कितना मुनाफा प्राप्त करता है इसके बाद भी यदि वह अपने पड़ोसी की संपत्ति पर नज़र रखता है और अपने पिछले लाभों के बजाय भविष्य में मिलने वाले लाभों की ही गणना करता रहता है? यदि तुम पूछो कि धन की उचित सीमा क्या है तो उसका उत्तर यह है कि सबसे पहले जरूरत के सामान या वस्तुओं की प्राप्ति और दूसरा उतना ही रखना जितना पर्याप्त है।   

अभी के लिए विदा

सेनेका द्वारा अपने मित्र लूसीलियस को लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद -- समय के संदर्भ में -- पत्र - 1 (Hindi Translation of Seneca's Letters)

 प्रिय लूसीलियस,

जैसा तुम कर रहे हो, वैसा ही करते रहो—अपने हित के लिए स्वयं को मुक्त करो। अपने समय को इकट्ठा करो और बचाकर रखो क्योंकि अब तक वह या तो तुमसे छीन लिया गया है, या चोरी हो गया है, या फिर तुम्हारे हाथों से यूँ ही फिसल गया है। मेरी बात पर विश्वास करो कि कुछ पल हमसे जबरदस्ती छीन लिए जाते हैं, कुछ धीरे-धीरे हमसे दूर कर दिए जाते हैं और कुछ हमारी पहुँच से बाहर निकल जाते हैं। परंतु सबसे शर्मनाक नुकसान वह है जो हमारी लापरवाही के कारण होता है। यदि तुम इस बात पर ध्यान से विचार करोगे तो पाओगे कि हमारे जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा उस समय बीत रहा होता है जब हम बुरा कर रहे होते हैं, एक अच्छा-खासा हिस्सा कुछ भी न करने में चला जाता है। यह उन कामों में जाता है जो वास्तव में उद्देश्यपूर्ण नहीं होते।

मुझे ऐसा कौन-सा व्यक्ति दिखा सकते हो जो अपने वक़्त की कीमत समझता हो...  जो हर दिन की कीमत का अनुमान लगाता हो... जो यह जानता हो कि वह प्रतिदिन मर रहा है? हम मृत्यु को लेकर भ्रम में रहते हैं क्योंकि हम उसे भविष्य की घटना समझते हैं जबकि मृत्यु का बड़ा हिस्सा तो पहले ही बीत चुका है। हमारे जीवन के जो साल पीछे छूट गए हैं, वे मृत्यु के दायरे में जा चुके हैं।



इसलिए, लूसीलियस, जैसा तुम अपने पत्र में लिखते हो, वैसा ही करो—हर घंटे को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ो। आज के कार्य को आज ही पूरा करो, तब तुम्हें कल पर इतना निर्भर नहीं रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम जानते हो? जब तक हम जीवन को टालते रहते हैं, जीवन तेजी से आगे निकलता जाता है।

लूसीलियस, समय के अलावा हमारा कुछ भी नहीं है। प्रकृति ने हमें केवल इसी एक वस्तु का स्वामित्व सौंपा है—जो इतना क्षणभंगुर और फिसलनभरा (रेत की तरह हाथों से फिसलने वाला) है कि कोई भी व्यक्ति हमें इससे वंचित कर सकता है। कितने मूर्ख हैं ये मनुष्य! वे सस्ती और तुच्छ वस्तुओं का हिसाब रखते हैं जिन्हें आसानी से फिर से पाया जा सकता है; लेकिन जब उन्हें समय जैसी अमूल्य संपत्ति मिलती है तब वे कभी स्वयं को उसका कर्जदार नहीं मानते। जबकि समय ऐसा कर्जा है जिसे सबसे कृतज्ञ व्यक्ति भी कभी चुका नहीं सकता।

तुम शायद जानना चाहोगे कि मैं, जो तुम्हें इतनी स्वतंत्रता से उपदेश देता हूँ, स्वयं इसका पालन कैसे करता हूँ। मैं दिल से स्वीकारता हूँ कि मेरा हिसाब-किताब संतुलित है, जैसा किसी उदार लेकिन सावधान व्यक्ति का होना चाहिए। मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैं कुछ भी व्यर्थ नहीं करता लेकिन मैं कम से कम यह बता सकता हूँ कि मैं क्या बर्बाद कर रहा हूँ, इसका कारण और मैं किस तरीके से कर रहा हूँ।  मैं यह भी बता सकता हूँ कि मैं गरीब क्यों हूँ। हालाँकि मेरी स्थिति उन बहुत-से लोगों जैसी है जो अपनी गलती के बिना ही तंगहाली में पहुँच जाते हैं। सब लोग उन्हें माफ तो कर देते हैं पर उन्हें बचाने के लिए कोई आगे नहीं आता।

तो फिर स्थिति क्या है? स्थिति यह है कि मैं किसी व्यक्ति को गरीब नहीं मानता, यदि उसके पास बचा हुआ थोड़ा-सा भी उसके लिए काफी है। मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि जो वास्तव में तुम्हारा है, उसे सुरक्षित रखो और तुम इसकी शुरुआत जल्दी नहीं कर सकते। जैसा हमारे पूर्वज मानते थे, जब पीपे के तल तक पहुँच जाओ, तब बचत शुरू करना बहुत देर हो चुकी होती है। तल में जो बचता है, वह मात्रा में तो कम होता ही है और गुणवत्ता में भी खराब होता है।

अभी के लिए विदा

Tuesday, 9 June 2026

एक बुजुर्ग औरत की डायरी

 

उम्र तो दिमाग का तेल है। खामखां का फितूर है। फिर भी एक बात कहूँऔरतों को उम्र जल्दी छूती है। खुद औरतें भी अजीब हो जाती हैं उम्र को लेकर और जमाना तो सिर के ऊपर के पके बालों को सबसे पहले देखता है। जाने कैसे, कब यह सफ़ेद रंग चुभने-सा लगा था... याद नहीं! जब स्कूल में थी तब तो सरसों का तेल ही चुपटा रहता था। मैं आज की बात नहीं बता रही। तब की बात बता रही हूँ जब घरों में टीवी होना भी अचरज और अमीरी की निशानी हुआ करती थी। मैं तब के जमाने की ख़वातीन हूँ। आज भी अपने को जवान ही समझती हूँ। पचपन की हूँ तो भी क्या हुआ? दिल तो अब भी वही सोलह-सत्रह वाला है। और आज भी यह बहुत गुलाबी धड़कता है।



पर मेरे बेटे और नाती-पोते सभी मुझे यह बताने पर तुले रहते हैं कि मैं बहुत बूढ़ी हो गई हूँ। उनकी एक ही चाहत कि मैं मंतर-संतर का जाप करूँ या फिर मोती मनका फेरूँ। कभी जो मेरे लिए कपड़े लाते हैं तब अधिकतर कपड़ों का रंग सफ़ेद या बुझा हुआ-सा रहता है। कसम खाकर कहती हूँ। मुझे वे रंग तनिक भी नहीं भाते। उनका बाप मरा हैमैं तो ज़िंदा हूँ। ये आधुनिक जमाने के लोग भले ही अपने आप को नए जमाने के लोग बोले पर अपनी माँ के नाम पर ये निहायती मूढ़ हैं। विधवा पति ने बनाया... रस्म ने बनाया पर एहसास तो इन बच्चों ने कराया जो खूब पढ़े-लिखे हैं। उन्हें आज भी बुढ़िया या बुढ़ापे की सभी रस्में याद हैं। मुझे बहुत खीझ बढ़ने लगी है इन पर।

जनवरी 20..

शुक्र है कि मुझे पढ़ने और थोड़ा बहुत कलम चलाने का शौक है वरना ये बहुएँ मुझसे अपने बच्चे ही संभालवाती रहतीं। मुझे बच्चों से प्यार है पर दूर से। कम उम्र में माँ बन गई थी... ज़बर्दस्ती का मातृत्व उठाया और सबके आगे अच्छी बनी रही। पर सच कहूँमुझे हमेशा से ही उड़ान पसंद थी। आज पैरों में दर्द नहीं है। मन कर रहा है छत पर टहल आऊँ। अभी 12 बज रहे हैं। सर्दी के दिन चढ़े हैं पर मुझे अच्छे लगते हैं।

जनवरी 20..

उस दिन मैं जरा देर छत पर टहलने क्या चली गईछोटी वाली ने अगले दिन सभी के सामने ड्रामा रच दिया। कहती है, “अम्मा आपकी उम्र हो रही है। ऐसे में आप ध्यान रखा करो। कहीं तबीयत खराब हो गई तब हम आपको कहाँ-कहाँ लेकर फिरते रहेंगे! धूप में जाया कीजिए और आराम से बैठा कीजिए ...दिन में! लेकिन इतनी रात में छत पर क्या करने गई थीं आप?” उसके कहने भर की देर थी। सब आँखों से ही मुझे उलाहना देने लगे। मैंने यह महसूस किया कि मेरी तबीयत की फिक्र किसी को नहीं थी। न कभी होती है। इनको दिन-रात बस यही खयाल रहता है कि मैं कब मरूँ! अब बताओ मौत की भी कहीं दुआ में माँगी जाती हैपर ये सब लोग माँगते हैं! हाय! मेरे बच्चे...

14 जनवरी 20..

पुस्तक मेला लगा था। मैंने कई रोज़ पहले ही चलने की इच्छा घर में जता दी थी। तब भी बहू ने टोक दिया था, “आप क्या करेंगी चलकर... थक जाएँगी!” मैंने भी गुस्से में कहा था, “तुम क्या करोगी जाकरतुम किताबें तो पढ़ती नहीं हो।” गुस्से में मुझे सब छोड़कर चले गए थे। पर क्या मैं अनाथ हूँ... जिनके खुद के हाथ वो काहे का अनाथ। इतनी पेंशन मिलती है कि मैं अच्छे से जी सकती हूँ और किताब भी खरीद सकती हूँ!

 

16 जनवरी 20..     

सच में! किताबों के मेले हमेशा लगे रहने चाहिए। हर दिनहर पल। वहाँ दर्द का पता नहीं चलता। किताब मरहम की तरह लगती है। मुझे याद नहीं कब से मुझे किताब पढ़ने का शौक़ चढ़ा! इनको भी तो मेरी ये आदत अच्छी लगती थी। किताब पढ़ने के बाद नींद भी अच्छी आती है। मुझे तो किताबें एक वजह देती हैं ज़िंदगी की। ख़ैरमैंने पुस्तक मेले में अपनी ही उम्र के पति- पत्नी देखे। पत्नी ने भूरी स्कर्टटी-शर्ट के साथ पहनी थी। बाल भी कितने अच्छे से कटे हुए थे। सोच रही हूँ मैं भी कटवा ही लूँ। और स्कर्ट..सोच पर भी लगाम लगा रखी है जमाने ने... तहलका भी तो मच जाएगा। इस उम्र में स्कर्ट पहन रही हैं माँ और सासु माँ! उफ़्फ़... जीने भी नहीं देते मन से!  

19 जनवरी 20..

आज सुबह एक सपना आया था। मैं रफ़्तार से कहीं भाग रही थी। हाँफ गई थीफिर भी कितनी तेज़ी से भाग रही थी। कभी कभी लगता है घर से बाहर सितारों तक एक दौड़ लगा आऊँ रफ़्तार के साथ। पर कहीं इस उम्र में हड्डियों का सुर्मा बन गया तो! आख़िर शरीर की भी तो अपनी सीमा है। पर दिल का तो कुछ नहींहाँ दिल तो बच्चे की तरह ही होता है।

14 फरवरी 20..

आज प्यार के दिन बेटे-बहू सब बच्चों के साथ मौज मनाने गए हैं। मैं यहाँ अकेले घर में पड़ी हूँ। वो लोग तो चाहते हैं कि मैं रामचरित मानस की चौपाई गा-गा कर मर जाऊँ। वो इंतज़ार कर रहे हैं कि कब मेरा दिल मुझे धोखा दे कर रूक जाए। पर क्यों रुकेगामुझे किसी बात का ग़म नहीं है। मैं तो खुश रहती हूँ। मुझे तो लगता है कि मेरे मन के अंदर कोई बैठकर किसी लड़की की तरह हँस रही है... खिलखिला रही है। कभी गाल लाल हो रहे हैं तो कभी मासूमियत अपना साया मुझ पर ओढ़ा रही है। मैं कल जाकर अपने मन से अपना प्यार का दिन मनाऊँगी। पर कहाँसोचना पड़ेगा।

19 फरवरी 20..

बूढ़े लोग या बूढ़ी औरत आख़िर क्यों नहीं प्यार का सोच सकतीदुनिया को क्यों आग लग जाती है? 15 को जैसे ही मैंने सुबह नहा-धोकर लाल साड़ी निकाली तो बातों के तीर मेरे सीने में जबरन धंसा दिए गए। इतनी लानत दी गई कि मेरा दिल भी रो गया। क्यों बूढ़ी जैसी सोच मैं सोच नहीं पाती...यही मेरा गुनाह है। हे भगवान...मैं क्या करूँ?

मार्च 20..

आह! क्या मौसम आया है...मैं खुश हूँबहुत! मेरी नज़र इस बहार को न लग जाए! एक गाना याद आ रहा है...आज मदहोश हुआ जाए रे ... मेरा मन ...मेरा मन! ...ये गीत गाने न होते तो मेरी ज़िंदगी एक बुझा हुआ दीया ही होती। मुझे तो हर पल गुनगुनाना पसंद है। खुश रहना इतना मुश्किल भी नहीं होता। लोगों को गीत गाना चाहिए। सुर की परवाह के बगैर।



जून 20..

मेरी डायरी जला दी गई। उनको लगता है विधवा और बूढ़ी जब मन का करे तो बदचलन मानी जाती है। उनके मुताबिक़ मैं बदचलन हूँ। खुद उनकी माँ बदचलन हैअगर वो ऐसा सोचते हैं तब मैं हूँ। चाहे जितनी डायरी जला दो। चाहे राख कर दो...मेरे मन को कभी न जला पाओगे। मुझे नहीं गाने तुम्हारे सड़े हुए भजन। मैं ज़िंदगी के गीत गाऊँगी। जब तक सांस चल रही हैतब तक मैं गाऊँगी। ...लो अब खुल्लम-खुल्ला डायरी सबके सामने रखी जाएगी। जो करना है करो...बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की डायरी। अब खुश?     

 ... जारी 

(पेंटिंग्स प्रिय सेराफिन की)

बेवकूफ जूलिएट और अकेला रोमियो

जून 12 - अकेलापन और रोमियो

तुम इतना अकेले क्यों रहते हो जबकि मैं तुम्हारे साथ ही रहती हूँ ? पास रहने पर भी लगता है कि कहीं किसी समुद्र के ऊपर तैर रहे हो। यह गलत है। मैं तुम्हारे साथ रहने के बाद भी बस तुम्हारा इंतजार करती रह जाती हूँ। अकेलेपन का यह कौन सा रूप है? मुझे समझ नहीं आता। अजीब सी छटपटाहट होती है। बेचैनी सी रहती है। सांस भी रुक जाती है। उफ़! मुझे क्या हो रहा है! एक छोटा पत्थर भी पानी में फेंक दो तो तरंग उठ जाती है। पर तुम तो समुद्र की गहराई की तरह शांत रहते हो। भला ऐसे भी कोई करता है !

जून 13 - बेवकूफ जूलिएट

तुम इतना समझाते क्यों हो? मैं बेवकूफ तो नहीं हूँ। सुनती हूँ क्योंकि इस बहाने तुम अपनी ख़ामोशी तोड़ते हो। चलो ठीक है तुम्हारी आवाज़ सुनने का मोल मेरी बेवकूफी है तो कभी कभी तो मंजूर कर ही सकती हूँ। हमेशा नहीं। तुम्हें ऐसा लगता है कि मुझे कुछ खबर ही नहीं है। तो क्या जरा देर से बातें समझ आती हैं! आती तो हैं। घर लौट के आने के बाद तक मैं तुम्हारी बातें दोहराती हूँ...रुको, गुनगुनाती हूँ। पर सुनो मैं बेवकूफ नहीं हूँ...समझे! प्यार है तुमसे वरना तो हिसाब मैं नंबर वन हूँ। एक पाई इधर न उधर ! एक बात कहूँ, मुझे तुम्हारे साथ बैठना और बात करना बहुत पसंद है। तुम्हें सुनना, मुझे इतनी ख़ुशी और तसल्ली देता है कि मैं बता नहीं सकती। प्यार आपको एक अच्छा सुनने वाले में तब्दील करता है। सुनना धैर्य देता है। जान-बूझकर मासूम बनती हूँ ताकि तुम मुझे समझा सको। इस बहाने तुम्हारा साथ मिलता है...पर सुनो ! मैं बेवकूफ नहीं हूँ !

18 जून - खोजकर्ता जूलिएट

लो अब मैंने क्या कर दिया? तुम हर बार यही पूछते हो। पर मैं दुविधा में पड़ जाती हूँ कि इसका वाजिब जवाब क्या दूँ। तुम्हें अपने जवाब से संतुष्ट नहीं करना चाहती। पर यकीं करो मैं खुद के लिए तुमसे जुड़े जवाब खोजती रहती हूँ। घर में रहूँ या बाहर, मैं कुछ न कुछ खोजती रहती हूँ। महबूबा बन रही हूँ या खोजकर्ता, यह भी नहीं समझ पा रही। तुम मेरी मदद भी तो नहीं करते ! 'खोजना' यह बतलाता है कि कुछ गुम हुआ है। यह भी बताता है कि कोई नई चीज मिलेगी या किसी नई बात का पता चलेगा। कोई रहस्य खुल जायेगा। लेकिन तुम्हारे पास रहो तो हर पल तुम्हें नई तरह से पाती हूँ। तुम चौंका देने वाले शख्सियत लगते हो। मेरे लिए यह सब आसान नहीं है। प्रेमिका का हर पल चौंकना ठीक बात नहीं। हाँ, पर इस हैरान हो जाने में भी एक मज़ा है। मुझे इस बात का घमंड है कि मेरा प्रेमी कोई नीरस आदमी नहीं है। वह तो तिलिस्म है। मैं तुम्हें पाकर बहुत खुश हूँ। मैं बता नहीं सकती कितनी!

20 जून - कन्फ्यूजन है

कभी कभी लगता है कि तुम्हें भी मोहब्बत है। इस बात से राहत मिलती है। आहिस्ता-आहिस्ता जब तुम्हारी हर बात को दोहराती हूँ तब लगता है कि हाँ है न मोहब्बत। लेकिन तभी तुम सब कुछ उलट पलट कर रख देते हो। फिर बढ़ते कदम थम जाते हैं। तब समझ नहीं आता कि बातें दोस्तों की तरह करूँ, महबूबा की तरह करूँ या फिर अजनबी की तरह? तुम्हें घूरते हुए पहचानने की कोशिश रहती है। मैं क्यों कन्फ्यूज हो रही हूँ? मैं अपने को तुम पर थोपना भी तो नहीं चाहती। थोपना प्यार का क़त्ल कर देता है। शायद एक रोज़ मेरी कंफ्यूजन दूर हो जाएगी। मुझे उस दिन का इंतजार है। असमंजस प्यार को बरक़रार रखने या दिलचस्प बनाये रखने के मसाले जैसा है। पर कभी कभी यह दहला भी देता है। जो शख्स आपके अन्दर घुल रहा है, वह यदि अपने बर्ताव से एक पल में ही अनजाना और अजनबी बन जाये तो डर लगना तय है। यही सब सोचकर कंफ्यूजन बढ़ जाती है। तुम भी तो इसे दूर करने की कोशिश नहीं कर रहे!

25 जून - झगड़ा फिर इकरार

अरे यार हद है! मैं पागल हो जाउंगी। अगर यह सब ऐसा ही चलता रहा तो पक्का एक रोज़ मेरा दिमागी संतुलन बिगड़ जायेगा। अच्छा हुआ जो आज झगड़ा हो ही गया। सच में, मेरा माथा सनक जाता है रोज़ सोच सोचकर। ठीक हुआ जो किस्सा ख़त्म हुआ। मैं तुम्हें नहीं झेल सकती। भला कोई अपनी जिद्द पर इस तरह भी अड़ा रहता है! मैंने तो उसी दिन कहा था, कि या तो तुम चले जाओ या फिर मुझे जाने दो। लेकिन तुम्हें कुछ समझ आये तब न। जब लगता है कि तुम गए तब राहत होती है कि चलो एक बार दर्द होगा फिर समय उस पर भी मरहम लगा देगा।लेकिन कुछ दिन बाद फिर आ जाते हो। आज गए हो तो खुदा की कसम न लौट कर आना। जहाँ हो वहीं रह जाना..। फिर भी एक बात बोलूं - “मैं तुमसे प्यार करती हूँ!”

तुमसे झगड़ा हो तो कहीं अन्दर तुम्हें खो देने का खौफ समा जाता है। दो आंसू निकलते हैं और मैं उनमें घुल-सी जाती हूँ। यह सब इतना आसान नहीं। प्रेमिका की बनावट कच्चे घड़े की तरह होती है। अगर प्रेमी का प्यार उसे पकाए नहीं तो मजबूती कहाँ से आएगी ? तुमने कभी सोचा है इन बातों के बारे में ? तुम इस डायरी में ज्यादा नजदीक रहते हो। यहाँ झगड़ते भी नहीं। इसलिए यहाँ बार-बार यही लिख देने का मन होता है - 'तुमसे प्यार है... तुमसे ही तो प्यार है!'

 

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...