Monday, 3 August 2026

महान व्यक्तियों से सीख लेने के संदर्भ में -- पत्र - 102 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मैं नोमेन्टम स्थित अपने निवास (विला) में भाग आया हूँ। क्या तुम्हें लगता है कि मैं नगर से बचने के लिए ऐसा कर रहा हूँ? नहीं, मैं उस बुखार से बचना चाहता था जो धीरे-धीरे मुझ पर चढ़ रहा था और जिसने मुझे अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया था। मेरे चिकित्सक का कहना था कि इसका आरंभ तेज़ और अनियमित नाड़ी से हो चुका है। इसलिए मैंने तुरंत अपनी गाड़ी तैयार करने का आदेश दिया। मेरी प्रिय पौलीना ने मुझे रोकने का बहुत प्रयास किया, फिर भी मैं प्रस्थान करने पर अडिग रहा। मैं केवल वही बात दोहरा रहा था जो मेरे गुरु गैलियो ने उस समय कही थी, जब यूनान में उन्हें बुखार आने वाला था। वे तुरंत जहाज़ पर सवार हो गए और बार-बार कहते रहे कि उनकी बीमारी उनके शरीर के कारण नहीं बल्कि उस स्थान के कारण है। मैंने यही बात पौलीना से भी कही। वह मेरे स्वास्थ्य को लेकर अत्यंत चिंतित रहती है। वास्तव में, यह जानकर कि उसका जीवन और उसकी आत्मा पूरी तरह मेरी आत्मा से जुड़ी हुई है, अब मैं उसके कारण अपने स्वास्थ्य की भी चिंता करने लगा हूँ। बढ़ती आयु ने मुझे अनेक परिस्थितियों का सामना करने में अधिक दृढ़ बना दिया है। पर इस एक मामले में मैं अपनी वृद्धावस्था का लाभ खो बैठता हूँ। अब मुझे लगता है कि इस वृद्ध शरीर के भीतर अभी भी एक ऐसा युवा मनुष्य रहता है जिसे कुछ लाड़-प्यार और संरक्षण की आवश्यकता है। चूँकि मैं उसे यह नहीं समझा पाता कि वह मुझे प्रेम करते हुए कुछ अधिक साहस दिखाए। इसलिए अंततः वही मुझ पर यह प्रभाव डाल देती है कि मैं अपने ही जीवन और स्वास्थ्य का पहले से अधिक सावधानीपूर्वक ध्यान रखूँ।



    देखो, सम्माननीय भावनाओं के आगे कभी-कभी झुकना ही पड़ता है। ऐसे अवसर आते हैं जब किसी प्रियजन के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए मनुष्य को, चाहे कितनी ही पीड़ा क्यों न हो, अपने प्राण छोड़ती हुई साँसों को भी वापस बुलाना पड़ता है और मानो उन्हें अपने मुख में ही रोककर रखना पड़ता है। एक सज्जन मनुष्य को उतने समय तक नहीं जीना चाहिए जितना उसे अच्छा लगे बल्कि उतने समय तक जीना चाहिए जितना उसका कर्तव्य अपेक्षा करता है। जो व्यक्ति अपनी पत्नी या अपने मित्र के लिए अपना जीवन कुछ और लंबा करने को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता और मरने पर ही अड़ा रहता है, वह वास्तव में अत्यंत आत्मलिप्त है। जब प्रियजनों का हित इसकी माँग करे, तब मनुष्य को अपने मन से यह अपेक्षा करनी चाहिए कि यदि वह केवल मरना ही नहीं चाहता बल्कि मरने की प्रक्रिया आरम्भ भी कर चुका हो, तब भी वह उसे रोक दे और स्वयं को उनके हित के लिए समर्पित कर दे। 

    दूसरे के लिए जीवन की ओर लौट आना एक महान आत्मा का लक्षण है। महान व्यक्तियों ने अनेक बार ऐसा किया है। इसके अतिरिक्त, यदि तुम्हें यह ज्ञात हो कि तुम्हारा सावधानीपूर्वक जीवित रहना तुम्हारे किसी प्रियजन को प्रसन्न करता है, उसके लिए उपयोगी है और उसकी हार्दिक इच्छा भी यही है तो मुझे लगता है कि अपनी वृद्धावस्था में अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना अत्यंत उदात्त और करुणामय आचरण है। यद्यपि जीवन के इस पड़ाव पर अपने अस्तित्व के प्रति कुछ अधिक निश्चिंत हो जाना और जीवन जीने के ढंग में कुछ अधिक निर्भीक होना भी अपने आप में बड़ा सुखद लगता है। इसके अलावा, अपने प्रति ऐसी सावधानी महान आनंद और पुरस्कार भी साथ लाती है। भला इससे अधिक सुखद और क्या हो सकता है कि तुम अपनी पत्नी को इतने प्रिय हो कि उसी कारण तुम स्वयं भी अपने लिए अधिक प्रिय बन जाओ? इस प्रकार मेरी पौलीना मुझे केवल अपनी आशंकाओं का ही नहीं बल्कि मेरी अपनी चिंताओं का भी भार उठाने के लिए विवश कर देती है। 

    मुझे लगता है कि तुम यह जानने के इच्छुक होगे कि मेरी यह यात्रा कितनी सफल रही। जैसे ही मैं नगर के भारी और दूषित वातावरण से दूर हुआ तथा उन रसोइयों के धुएँ और दुर्गंध से मुक्त हुआ, जहाँ जलती हुई आग के साथ हानिकारक धुआँ और धूल बाहर निकलते रहते हैं, वैसे ही मैंने अपने स्वास्थ्य में तत्काल परिवर्तन अनुभव किया। तुम कल्पना कर सकते हो कि जब मैं अपने अंगूर के बागों में पहुँचा तो मेरी शक्ति कितनी बढ़ गई होगी। चरागाह में छोड़े गए किसी पशु की भाँति मैं पूरे उत्साह से भोजन पर टूट पड़ा। परिणाम यह हुआ कि अब मैं पूर्णतः स्वस्थ हूँ। मेरे शरीर की दुर्बलता और मन की शिथिलता का नामोनिशान नहीं रहा। अब मैं फिर से पूरी एकाग्रता के साथ अपने अध्ययन में लगने लगा हूँ।  

    किन्तु इसके लिए केवल स्थान बदल लेना किसी काम का नहीं, जब तक कि मन स्वयं अपने लिए समय निकालना न सीख ले और व्यस्ततम क्षणों के बीच भी अपने भीतर एक ऐसा आश्रय-स्थल सुरक्षित न रखे जहाँ वह विश्राम कर सके। इसके विपरीत, यदि तुम अवकाश की खोज में हमेशा दूर-दराज़ स्थानों का चयन करते रहोगे तो हर जगह तुम्हें कोई-न-कोई ऐसी वस्तु मिल जाएगी जो तुम्हारा ध्यान भटका देगी। कहा जाता है कि एक व्यक्ति ने सुकरात से शिकायत की कि यात्राओं से उसे कोई लाभ नहीं हुआ। इस पर सुकरात ने उत्तर दिया, “ऐसा होना स्वाभाविक ही था क्योंकि यात्रा के दौरान तुम स्वयं को भी अपने साथ ले गए थे।” यदि कुछ लोग स्वयं से दूर जा सकते तो उनका जीवन कितना बेहतर हो जाता! उनके सारे दबाव, चिंताएँ, कमज़ोरियाँ और भय उनके अपने ही भीतर से उत्पन्न होते हैं। समुद्र पार करने या किसी दूसरे नगर में जाकर बसने से क्या लाभ, यदि तुम अपने कष्टों से छुटकारा पाना चाहते हो? तुम्हें किसी दूसरे स्थान पर नहीं बल्कि स्वयं एक भिन्न मनुष्य बनना होगा। कल्पना करो कि तुम एथेंस या रोड्स पहुँच गए हो या अपनी इच्छा से कोई भी नगर चुन लो। उस स्थान का स्वभाव तुम्हारे लिए क्या परिवर्तन ला देगा? तुम तो अपना स्वभाव अपने साथ ही लेकर जाओगे। 

    तुम अब भी धन को एक परम शुभ वस्तु मानोगे और उस चीज़ से पीड़ित रहोगे जिसे तुम भ्रमवश और अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से अपनी निर्धनता समझते हो। तुम्हारे पास चाहे जितनी भी संपत्ति हो, यदि किसी दूसरे के पास तुमसे अधिक होगी तो तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे पास उतनी ही कमी है जितनी उससे तुम्हारी संपत्ति कम है। तुम सार्वजनिक पद और प्रतिष्ठा को भी अभी तक एक महान उपलब्धि मानते रहोगे। इसलिए जब एक व्यक्ति कौंसल चुना जाएगा और दूसरा पुनः उसी पद पर निर्वाचित होगा तो तुम्हारा मन व्याकुल हो उठेगा। जब भी तुम सरकारी अभिलेखों में किसी का नाम बार-बार अंकित देखोगे, तुम्हारे भीतर ईर्ष्या जाग उठेगी। सफलता पाने का तुम्हारा उन्माद इतना प्रबल बना रहेगा कि यदि कोई तुमसे आगे निकल जाए तो तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे पीछे कोई भी नहीं है।  

    तुम मृत्यु को अब भी सबसे बड़ी बुराई मानते रहोगे। जबकि मृत्यु में सबसे बुरी बात स्वयं मृत्यु नहीं बल्कि उससे पहले का भय है। तुम केवल वास्तविक खतरों से ही नहीं बल्कि उनकी मात्र आशंकाओं से भी आतंकित रहोगे और निरंतर काल्पनिक भय तथा मन की कल्पनाओं से व्याकुल बने रहोगे। तुम्हें इससे क्या लाभ होगा कि तुम आर्गोस के अनेक नगरों से बचकर निकल आए और शत्रुओं के बीच से अपना मार्ग बनाते हुए भाग निकले? शांति भी तुम्हारे भीतर भय उत्पन्न कर देगी। एक बार जब मन भय के आगे समर्पण कर देता है, तब सुरक्षित परिस्थितियों में भी उसका आत्मविश्वास टिक नहीं पाता। निरर्थक चिंताओं का अभ्यस्त हो जाने के कारण वह अपनी ही सुरक्षा सुनिश्चित करने की क्षमता खो बैठता है। तब वह खतरे का बुद्धिमानी से सामना नहीं करता बल्कि उससे भागता है। जबकि वास्तव में हम खतरों के प्रति सबसे अधिक असुरक्षित तभी हो जाते हैं, जब हम उनका सामना करने के बजाय उनसे मुँह मोड़ लेते हैं।

   तुम अपने किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु या उससे बिछुड़ जाने को अब भी जीवन का सबसे बड़ा आघात मानते रहोगे। जबकि ऐसा करना उतना ही मूर्खतापूर्ण है, जितना अपने घर को सुशोभित करने वाले सुंदर वृक्षों से पत्तों के झड़ने पर विलाप करना। जो कुछ भी तुम्हें प्रिय है, उसे उसी दृष्टि से देखो, जिस दृष्टि से तुम हरे-भरे पत्तों को देखते हो जब तक वे बने रहें, उनका आनंद लो। समय बीतने के साथ उनमें से कुछ न कुछ अवश्य झड़ जाएगा। पर उनका खो जाना सहना कठिन नहीं होता क्योंकि नए पत्ते फिर उग आते हैं। तुम्हारे प्रियजनों के बिछुड़ जाने का भी यही स्वरूप है जिन्हें तुम अपने जीवन का सबसे बड़ा सुख मानते हो। उनका स्थान दूसरे लोग ले सकते हैं। हालाँकि वे वही व्यक्ति बनकर पुनः जन्म नहीं लेते।

    “लेकिन वे वही व्यक्ति नहीं होंगे।” और तुम स्वयं भी तो वही नहीं रहोगे। प्रत्येक दिन तुम्हें बदल देता है, और प्रत्येक घंटा भी। अंतर केवल इतना है कि जब दूसरे लोग हमसे छिन जाते हैं, तब वह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। पर अपने ही भीतर होने वाला परिवर्तन हमारी दृष्टि से ओझल रहता है क्योंकि वह बाहर से दिखाई नहीं देता।दूसरे लोग हमसे छिन जाते हैं। लेकिन उसी समय हम स्वयं भी धीरे-धीरे, बिना जाने, अपने आप से छिनते जा रहे होते हैं। तुम्हें इन परिवर्तनों का बोध नहीं होगा, न ही तुम इन दुखों का कोई उपचार कर सकोगे। फिर भी तुम कुछ बातों की आशा करके और कुछ से निराश होकर स्वयं अपने लिए कष्ट उत्पन्न करते रहोगे। बुद्धिमानी इसी में है कि इन दोनों का संतुलन बनाए रखा जाए। न तो संदेह के बिना आशा करो और न ही आशा के बिना संदेह। 

    यात्रा अपने आप में किसी मनुष्य के लिए क्या कर सकी है? वह न तो भोग-विलास पर नियंत्रण रखती है, न इच्छाओं को संयमित करती है, न क्रोध के आवेगों को रोकती है और न ही प्रेम के उग्र आक्रमणों को शांत करती है। संक्षेप में, वह मन के किसी भी विकार को दूर नहीं करती। वह न तो विवेक प्रदान करती है और न ही भ्रांतियों का निवारण करती है। वह केवल दृश्य बदल देती है, जिससे थोड़ी देर के लिए हमारा ध्यान उसी प्रकार बँधा रहता है, जैसे कोई नया खिलौना किसी बच्चे का मन बहला देता है। इसके अतिरिक्त, यात्रा उस मन की चंचलता को और बढ़ा देती है, जो पहले से ही अस्वस्थ हो। वास्तव में, रथ की गति ही हमें अधिक बेचैन और चिड़चिड़ा बना देती है। परिणाम यह होता है कि जो लोग किसी स्थान पर जाने के लिए अत्यंत उत्सुक थे, वे वहाँ से लौटने के लिए उससे भी अधिक उत्सुक हो जाते हैं। वे उन पक्षियों के समान होते हैं जो एक डाल से दूसरी डाल पर उड़ जाते हैं और जितनी शीघ्रता से आए थे, उससे भी अधिक शीघ्रता से वहाँ से चले जाते हैं। यात्रा तुम्हें विभिन्न जातियों और समुदायों से परिचित कराएगी। वह तुम्हें विचित्र आकार वाले पर्वत, अपरिचित मैदान और कभी न सूखने वाली धाराओं से सिंचित घाटियाँ दिखाएगी। वह तुम्हें कुछ नदियों की विशेषताओं का भी ज्ञान कराएगी जैसे, नील नदी का ग्रीष्म ऋतु में बाढ़ के साथ उफान पर आना। टाइग्रिस नदी का कुछ दूरी तक भूमिगत बहने के बाद दृष्टि से ओझल हो जाना और फिर पूर्ण वेग के साथ पुनः प्रकट होना अथवा मीयांडर नदी का बार-बार घुमाव लेना। एक ऐसा विषय जिसे कवि बड़े चाव से अलंकृत करते हैं और अनेक बार अपने ही प्रवाह के निकट लौट आने के बाद फिर आगे बढ़ जाना। किंतु यह सब तुम्हें न शरीर से बेहतर बनाएगा और न ही मन से। 

    हमें अपना समय अध्ययन में और ज्ञानियों के प्रामाणिक उपदेशों के अध्ययन में लगाना चाहिए ताकि जो बातें पहले ही खोजी जा चुकी हैं उन्हें सीख सकें। जिनका अभी तक पता नहीं चला है उनकी खोज कर सकें। यही वह मार्ग है जिसके द्वारा मन को उसकी दयनीय दासता से मुक्त करके स्वतंत्रता प्राप्त कराई जा सकती है। परंतु जब तक तुम्हें यह ज्ञान नहीं है कि किससे बचना चाहिए और किसका अनुसरण करना चाहिए। जब तक तुम न्याय और अन्याय, सम्माननीय और अपमानजनक के भेद से अनभिज्ञ हो, तब तक तुम वास्तव में यात्रा नहीं कर रहे होते बल्कि केवल भटक रहे होते हो। तुम्हारा इस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान भागते फिरना तुम्हें कोई लाभ नहीं पहुँचाएगा क्योंकि तुम अपनी भावनाओं को भी अपने साथ लेकर यात्रा कर रहे हो। तुम्हारे कष्ट भी तुम्हारे साथ-साथ चलते हैं। बल्कि मेरी तो यह कामना है कि वे तुम्हारा केवल पीछा कर रहे होते क्योंकि तब वे तुमसे कुछ दूर तो रहते! किंतु वास्तविकता यह है कि तुम उनसे आगे नहीं निकल रहे बल्कि उन्हें अपनी पीठ पर ढो रहे हो। तुम जहाँ कहीं भी जाते हो, वही जलाने वाली व्याकुलताएँ तुम्हारे ऊपर बोझ बनी रहती हैं। 

    रोगी व्यक्ति को किसी स्थान की नहीं बल्कि उपचार की आवश्यकता होती है। यदि किसी का पैर टूट जाए या कोई जोड़ अपनी जगह से खिसक जाए तो वह न रथ पर चढ़ता है और न जहाज़ पर। वह किसी वैद्य को बुलाता है ताकि वह टूटी हुई हड्डी को जोड़ दे या खिसके हुए जोड़ को उसके स्थान पर बैठा दे। क्या तुम समझते हो कि जब मन इतने स्थानों पर टूट-फूट गया हो और विकृत हो गया हो, तब केवल स्थान बदलने से वह स्वस्थ हो जाएगा? तुम्हारा रोग इतना गंभीर है कि उसका उपचार इधर-उधर घूमने से नहीं हो सकता। यात्रा किसी को न वैद्य बनाती है और न वक्ता। कोई भी कला केवल स्थान बदलने से नहीं सीखी जाती। तो क्या तुम यह समझते हो कि सभी कलाओं में सर्वोच्च, प्रज्ञा... यात्रा करते-करते प्राप्त हो जाएगी? मुझ पर विश्वास करो, ऐसी कोई यात्रा नहीं है जो तुम्हें इच्छाओं, क्रोध के आवेगों और भय से परे पहुँचा सके। यदि ऐसा होता तो समूची मानव जाति वहाँ झुंड के झुंड पहुँच चुकी होती। जब तक तुम अपने कष्टों के कारणों को अपने साथ लिए संसार भर में भटकते फिरोगे, तब तक वे कष्ट तुम्हें सताते और पीड़ा पहुँचाते रहेंगे। क्या तुम्हें आश्चर्य होता है कि भागते रहने से तुम्हें कोई लाभ नहीं हो रहा? जिससे तुम भाग रहे हो, वही तुम्हारे साथ है। तुम्हें अपने दोषों को सुधारना होगा, अपने ऊपर लदे बोझ को उतार फेंकना होगा और अपनी इच्छाओं को स्वस्थ मर्यादा के भीतर रखना होगा। अपने मन से समस्त दुष्टता का निष्कासन कर दो। 

    यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारी यात्राएँ सुखद हों तो इस बात का ध्यान रखो कि तुम किन लोगों की संगति करते हो। जब तक तुम्हारा साथ लोभी और कृपण लोगों के साथ रहेगा, तब तक लोभ तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा। जब तक तुम अभिमानी लोगों के बीच रहोगे, तब तक अहंकार भी तुमसे चिपका रहेगा। यदि तुम किसी जल्लाद को अपना घनिष्ठ मित्र बना लोगे तो तुम क्रूरता से मुक्त नहीं हो सकोगे। व्यभिचारियों की संगति तुम्हारी वासनाओं को और अधिक भड़काएगी। यदि तुम सचमुच अपने दुर्गुणों से मुक्त होना चाहते हो तो तुम्हें उन लोगों के आचरण से दूर रहना होगा जिनमें वे दुर्गुण विद्यमान हैं। यदि कोई कृपण, व्यभिचारी, क्रूर या छल करने वाला व्यक्ति तुम्हारे निकट रहे तो वह तुम्हें बहुत हानि पहुँचाएगा। पर वास्तविकता यह है कि ये सब दोष पहले से ही तुम्हारे भीतर मौजूद हैं। इसलिए अपने आदर्शों को श्रेष्ठ बनाओ। या तो दोनों कैटो में से किसी एक के साथ रहो या लेलियस अथवा ट्यूबेरो के साथ और यदि तुम यूनानियों की संगति पसंद करते हो तो सुकरात या ज़ेनो के साथ समय बिताओ। पहले तुम्हें सिखाएँगे कि आवश्यकता पड़ने पर कैसे मरना चाहिए। दूसरे यह कि आवश्यकता आने से पहले ही मृत्यु के लिए कैसे तैयार हो जाना चाहिए। क्रिसिपस या पोसिडोनियस की संगति में रहो। वे तुम्हें मानवीय और दैवीय विषयों का ज्ञान देंगे। वे तुम्हें यह सिखाएँगे कि तुम्हारा परिश्रम मधुर वाणी बोलने और अपने शब्दों से लोगों को मोहित करने में नहीं बल्कि अपने मन को दृढ़ बनाने और उसे विपत्तियों का सामना करने योग्य कठोर बनाने में होना चाहिए। 

    हमारे इस तूफ़ानी और अशांत जीवन के लिए केवल एक ही सुरक्षित आश्रय है, भविष्य की घटनाओं से ऊपर उठ जाना, दृढ़ता से खड़े रहना और भाग्य के प्रहारों का खुले रूप से, बिना विचलित हुए, सीधे सामना करने के लिए सदैव तैयार रहना। प्रकृति ने हमें साहसी बनने के लिए उत्पन्न किया है। उसने कुछ प्राणियों को उग्र बनाया, कुछ को चतुर और कुछ को भयभीत। पर मनुष्य को उसने एक गौरवपूर्ण और उदात्त आत्मा प्रदान की है, जो यह नहीं खोजती कि सबसे अधिक सुरक्षित कहाँ रहा जाए बल्कि यह खोजती है कि सबसे अधिक सम्मानपूर्वक कहाँ जिया जाए। यह आत्मा उस विराट विश्वात्मा के अत्यंत निकट है, जिसका वह अनुसरण करती है और जहाँ तक नश्वर मनुष्य की सामर्थ्य पहुँच सकती है, उसके समान बनने का प्रयत्न करती है। ऐसी आत्मा निरंतर उन्नति करती है। उसे विश्वास रहता है कि वह प्रशंसा और सम्मान की अधिकारी है। वह प्रत्येक वस्तु पर अधिकार रखती है और प्रत्येक वस्तु से श्रेष्ठ है। इसलिए उसे किसी भी वस्तु के अधीन नहीं होना चाहिए और न ही किसी ऐसी बात को इतना भारी समझना चाहिए कि वह मनुष्य को दबा सके, "मृत्यु और दुःख, ये केवल देखने में ही भयावह प्रतीत होते हैं।"

    यदि मनुष्य उनका पूरी तरह सामना कर सके और उनके अँधेरे को भेदकर निकल जाए तो वे तनिक भी भयावह नहीं रह जाते। बहुत-सी वस्तुएँ जो रात में डरावनी प्रतीत होती हैं। दिन के उजाले में हास्यास्पद लगती हैं। “मृत्यु और दुःख, देखने में भयावह प्रतीत होने वाले रूप।” हमारे कवि वर्जिल ने यह बात अत्यंत सुंदर ढंग से कही है। उन्होंने उन्हें वास्तव में नहीं बल्कि 'दिखने में' भयावह कहा अर्थात वे भयावह प्रतीत तो होते हैं पर वास्तव में नहीं होते। मैं फिर पूछता हूँ, इन बातों में वास्तव में ऐसा क्या भयानक है, जैसा लोग सामान्यतः मानते हैं? लूसीलियस, मैं तुमसे पूछता हूँ, मनुष्य होकर परिश्रम से क्यों डरना चाहिए? मनुष्य होकर मृत्यु से क्यों भयभीत होना चाहिए? मैं अक्सर ऐसे लोगों से मिलता हूँ जो यह मानते हैं कि जो काम वे स्वयं नहीं कर सकते, वह असंभव है। वे कहते हैं कि हमारे स्टोइक सिद्धांत मानव-स्वभाव की क्षमता से परे हैं। किन्तु मेरा मनुष्य के बारे में विचार इससे कहीं अधिक ऊँचा है। मनुष्य वास्तव में इन बातों को करने में समर्थ है। पर वह उन्हें करना नहीं चाहता। जिसने भी सच्चे मन से प्रयास किया है, क्या उसने कभी इस कार्य को अपनी शक्ति से परे पाया है? क्या उसे यह कार्य करते समय सदैव अपेक्षा से अधिक सरल नहीं लगा? वस्तुओं की कठिनाई हमारे आत्मविश्वास को नष्ट नहीं करती बल्कि हमारे आत्मविश्वास की कमी ही वस्तुओं को कठिन बना देती है। 

    यदि तुम्हें किसी आदर्श की आवश्यकता हो तो सुकरात को देखो, एक अत्यंत धैर्यवान वृद्ध। उन्होंने हर प्रकार के कष्ट सहे। फिर भी न तो निर्धनता ने उन्हें पराजित किया (हालाँकि उनके घरेलू क्लेशों ने उसे और भी कठिन बना दिया था) और न ही उन शारीरिक परिश्रमों ने जिन्हें उन्हें सहना पड़ा, जिनमें सैनिक सेवा भी सम्मिलित थी।घर में भी वे अनेक कठिनाइयों से घिरे रहे, चाहे हम उनकी असभ्य और कटुभाषिणी पत्नी को देखें या उनके उन बच्चों को, जिन्हें शिक्षा देना असंभव था और जो अपने पिता की अपेक्षा अपनी माता के अधिक समान थे। घर के बाहर उनका जीवन या तो युद्ध में बीता या अत्याचारपूर्ण शासन के अधीन अथवा ऐसी स्वतंत्रता में जो युद्ध और अत्याचारियों से भी अधिक क्रूर सिद्ध हुई। युद्ध सत्ताईस वर्षों तक चला। उसके समाप्त होने पर राज्य तीस अत्याचारियों के शासन के अधीन आ गया, जिनमें से अनेक व्यक्तिगत रूप से सुकरात के शत्रु थे। अंततः उन पर सबसे गंभीर अपराधों का अभियोग लगाया गया। उन पर धर्म को नष्ट करने तथा युवाओं को देवताओं, अपने माता-पिता और राज्य के विरुद्ध भड़काकर उन्हें भ्रष्ट करने का आरोप लगाया गया। इसके बाद कारावास और हेमलॉक का विषपान आया। इन सबका सुकरात के मन पर इतना भी प्रभाव नहीं पड़ा कि उनके चेहरे के भाव तक बदल जाते। यह कितना विलक्षण और अनुपम गुण था! जीवन के अंतिम क्षण तक किसी ने भी सुकरात को न तो सामान्य से अधिक प्रसन्न देखा और न ही कम प्रसन्न। भाग्य के अत्यंत तीव्र उतार-चढ़ावों के बीच भी वे सदा एक समान बने रहे।

    क्या तुम दूसरा आदर्श भी देखना चाहोगे? तो युवा कैटो को देखो, जिस पर भाग्य के आघात अधिक प्रबल और अधिक निरंतर हुए। प्रत्येक अवसर पर और अंततः अपनी मृत्यु के समय भी, कैटो ने यह सिद्ध किया कि एक साहसी मनुष्य भाग्य को चुनौती देते हुए जी भी सकता है और मर भी सकता है। उसने अपना समूचा जीवन या तो गृहयुद्धों में एक सैनिक के रूप में बिताया अथवा ऐसी शांति के समय में, जो पहले से ही गृहयुद्ध को जन्म दे रही थी। तुम कह सकते हो कि उसने भी, सुकरात की भाँति, दासों के बीच स्वतंत्रता के प्रति स्वयं को समर्पित कर दिया था। यदि तुम यह नहीं मानते कि पोम्पेई, सीज़र और क्रैसस स्वतंत्रता के सहयोगी थे। राजनीतिक परिस्थितियाँ चाहे जितनी बार बदलीं, किसी ने भी कैटो के चरित्र में कभी कोई परिवर्तन नहीं देखा। चाहे वह किसी पद पर निर्वाचित हुआ हो या पराजित, अभियोजक के रूप में हो या किसी प्रांत में, चाहे राजनीतिक भाषण दे रहा हो, सेना में हो या मृत्यु का सामना कर रहा हो। हर परिस्थिति में उसका चरित्र एक-सा बना रहा।संक्षेप में, जब राष्ट्र गहन संकट में था। एक ओर सीज़र अपनी पूर्ण शक्ति से सुसज्जित दस सेनाओं और अनेक विदेशी राष्ट्रों के समर्थन के साथ खड़ा था और दूसरी ओर पोम्पेई था, तब कैटो उन सबके विरुद्ध अकेला खड़े होने के लिए तैयार था। जब एक पक्ष सीज़र की ओर झुक रहा था और दूसरा पोम्पेई की ओर, तब केवल कैटो ही ऐसा था जिसने गणराज्य का पक्ष लिया। यदि तुम उस समय की मानसिक छवि बनाना चाहते हो तो एक ओर समूची सामान्य जनता की कल्पना करो। साधारण लोग, जो विद्रोह के लिए उत्साहित थे, दूसरी ओर सर्वोच्च कुलीन और अश्वारोही वर्ग, अर्थात राज्य के सबसे प्रतिष्ठित लोग और इनके बीच केवल दो अवशेष, गणराज्य और कैटो। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ, जब तुम यह दृश्य देखोगे, तब तुम्हें यह पंक्ति स्मरण आएगी, “अत्रेयुस का पुत्र, प्रियम और उन दोनों का संहारक— अकिलीस।”

    दोनों पक्षों की निंदा होती है और दोनों के हाथों से उनके अस्त्र मानो छिन जाते हैं, जब कैटो दोनों के विषय में अपना निर्णय प्रकट करता है। वह कहता है, “यदि सीज़र विजयी हुआ तो मैं मृत्यु को चुनूँगा। यदि पोम्पेई विजयी हुआ तो मैं निर्वासन स्वीकार करूँगा।” ऐसे व्यक्ति को भय किस बात का हो सकता था? उसने अपनी पराजय और विजय, दोनों ही स्थितियों के लिए अपने लिए ऐसे कठोर परिणाम पहले ही निश्चित कर लिए थे, जैसे उसके सबसे कट्टर शत्रु भी उसके लिए निर्धारित कर सकते थे। अंततः वह अपनी ही आज्ञा के अनुसार मरा।

    इस प्रकार तुम देख सकते हो कि मनुष्य परिश्रम सहने में समर्थ है। कैटो ने अफ्रीका के निर्जन मरुस्थलों के बीच अपनी सेना का नेतृत्व पैदल किया। तुम देख सकते हो कि मनुष्य प्यास भी सह सकता है। कैटो अपनी अस्त्र-शस्त्रों से रहित और पराजित सेना के बचे हुए सैनिकों को सूखी पहाड़ियों के पार ले जा रहा था। पूर्ण कवच पहने हुए भी उसने अपने होंठों को जल से नहीं भिगोया और जब कहीं पानी उपलब्ध होता तो वह सबसे अंत में पीता। तुम देख सकते हो कि पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठा जा सकता है। जिस दिन कैटो चुनाव हार गया, उसी दिन उसने गेंद का खेल खेला। तुम यह भी देख सकते हो कि अधिक शक्तिशाली लोगों से भयभीत हुए बिना भी जिया जा सकता है। कैटो ने एक साथ पोम्पेई और सीज़र, दोनों को चुनौती दी। जबकि कोई दूसरा व्यक्ति एक को अप्रसन्न करने का साहस भी नहीं करता था क्योंकि ऐसा करने का अर्थ दूसरे की कृपा प्राप्त करना होता।  तुम देख सकते हो कि मृत्यु और निर्वासन, दोनों से ऊपर भी उठा जा सकता है। कैटो ने स्वयं अपने लिए निर्वासन और मृत्यु का निर्णय किया और उनके बीच युद्ध को भी स्वीकार किया। 

    जब हम अपनी गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकते हैं, तब हम भी इन्हीं कष्टों का उसी धैर्य और दृढ़ता से सामना करने में समर्थ हो जाते हैं। इसकी शुरुआत हमें भोग-विलास का तिरस्कार करने से करनी चाहिए। वे अपनी असंख्य माँगों के द्वारा हमें दुर्बल और पुरुषार्थहीन बना देते हैं तथा हमें भाग्य से भी बहुत कुछ माँगने का अभ्यस्त बना देते हैं। इसके बाद हमें धन का भी तिरस्कार करना चाहिए क्योंकि वह दासता का प्रतिफल है। हमें सोना, चाँदी और उन सब वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए जो समृद्ध घरों को बोझिल बना देती हैं। स्वतंत्रता बिना मूल्य चुकाए प्राप्त नहीं होती। यदि तुम उसे अत्यधिक मूल्यवान समझते हो तो तुम्हें अन्य सभी वस्तुओं का मूल्य कम समझना होगा।


अभी के लिए विदा 

Sunday, 2 August 2026

दार्शनिक जीवन के प्रदर्शन के बारे में -- पत्र - 101 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम उन बातों की टोह क्यों लगाए रहते हो जो शायद तुम्हारे साथ घटें। परंतु यह भी संभव है कि कभी घटें ही नहीं? मेरा आशय आग लगने, भवनों के ढह जाने और ऐसी ही अन्य घटनाओं से है, जो कभी-कभी हमारे साथ घट तो जाती हैं पर उनका उद्देश्य हमें हानि पहुँचाना नहीं होता। इसके बजाय, उन बातों पर दृष्टि रखो जो वास्तव में तुम्हें हानि पहुँचाने के लिए तत्पर हैं, जो तुम्हारे विरुद्ध षड्यंत्र रचती हैं, और उनसे बचने का प्रयास करो। यद्यपि जहाज़ का डूब जाना या रथ से गिर पड़ना जैसी दुर्घटनाएँ निश्चय ही गंभीर होती हैं, फिर भी वे विरले ही घटती हैं। परंतु एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को जो खतरा होता है, वह तो प्रतिदिन उपस्थित रहने वाली बात है।



    इनसे बचने के लिए स्वयं को तैयार करो और अपना ध्यान इन्हीं पर केंद्रित करो। इससे अधिक सामान्य, अधिक निरंतर और अधिक कपटपूर्ण कोई विपत्ति नहीं है। तूफ़ान आने से पहले उसके लक्षण दिखाई देते हैं। भवन गिरने से पहले चरमराने लगते हैं। धुआँ आग लगने का संकेत दे देता है। किंतु मनुष्यों द्वारा पहुँचाई जाने वाली हानि तत्काल आती है। वह जितनी निकट होती है, उतनी ही अधिक सावधानी से छिपाई जाती है। जिन लोगों से तुम मिलते हो, उनके चेहरे पर विश्वास करना भूल है। उनका रूप तो मनुष्य का होता है, किंतु स्वभाव जंगली पशुओं का। अंतर केवल इतना है कि पशुओं का पहला आक्रमण ही सबसे अधिक खतरनाक होता है। वे किसी को छोड़कर फिर लौटकर उसका पीछा नहीं करते। वे केवल तभी आक्रमण करते हैं जब भूख या भय उन्हें विवश कर देता है। इसके विपरीत, मनुष्य तो प्रायः दूसरे मनुष्य का विनाश करने में ही आनंद अनुभव करता है। 

    फिर भी, जब तुम यह विचार करो कि अन्य मनुष्यों से तुम्हें किस प्रकार के खतरे हो सकते हैं, तब तुम्हें मनुष्यों के एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों का भी स्मरण रखना चाहिए। एक व्यक्ति पर इसलिए दृष्टि रखो कि उससे तुम्हें हानि न पहुँचे। दूसरे के प्रति इसलिए सावधान रहो कि तुम्हारे कारण उसे कोई हानि न हो। दूसरों की सफलता में प्रसन्नता प्रकट करो, उनके दुख और विपत्ति में सहानुभूति रखो। यह स्मरण रखो कि कब तुम्हें सहायता के लिए आगे बढ़ना चाहिए और कब सावधानी से काम लेना चाहिए।

    यदि तुम इस प्रकार जीवन व्यतीत करोगे तो तुम्हें क्या प्राप्त होगा? यह आवश्यक नहीं कि तुम हर प्रकार की हानि से बच जाओगे लेकिन कम-से-कम तुम उस हानि का शिकार अनजाने में नहीं बनोगे। जहाँ तक संभव हो, अपने को दर्शन की शरण में ले जाओ। दर्शन तुम्हारी रक्षा करेगा। उसके आश्रय में तुम सुरक्षित रहोगे या कम-से-कम पहले से अधिक सुरक्षित अवश्य रहोगे। लोग तभी एक-दूसरे से टकराते हैं जब वे एक ही मार्ग पर चल रहे होते हैं। 

    पर तुम्हें अपने दर्शन का प्रदर्शन या उसका घमंड नहीं करना चाहिए। अनेक लोग केवल इसलिए संकट में पड़ गए हैं कि उन्होंने अपने दार्शनिक जीवन का भद्दे ढंग से प्रदर्शन किया। तुम दर्शन का उपयोग अपने दोषों को दूर करने के लिए करो, न कि दूसरों की आलोचना करने के लिए। दर्शन को सामान्य जीवन-पद्धति से अलग मत करो, और न ही ऐसा प्रतीत होने दो कि वह केवल इसलिए संसार की हर बात की निंदा करता है क्योंकि वह स्वयं उन कार्यों से विरत रहता है। बिना किसी प्रदर्शन के और बिना लोगों में विरोध या वैमनस्य उत्पन्न किए भी, बुद्धिमानी और दर्शन का आचरण किया जा सकता है।


अभी के लिए विदा 

मृत्यु के बाद मिलने वाली कीर्ति के बारे में -- पत्र - 100 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


यह अत्यंत खीझ उत्पन्न करने वाली बात होती है कि किसी सुखद सपने से अचानक जगा दिया जाए क्योंकि जो सुख उससे छिन जाता है, वह चाहे काल्पनिक ही क्यों न हो, उसका प्रभाव वास्तविक होता है। तुम्हारे पत्र ने भी मेरे साथ कुछ ऐसा ही किया। उसने मुझे उस समय बाधित कर दिया, जब मैं ऐसे चिंतन में पूर्णतः तल्लीन था, जो मुझे अत्यंत प्रिय है और अवसर मिलता तो मैं उसे और भी देर तक जारी रखता। मैं आत्मा की अमरता के विषय में विचार करने का आनंद ले रहा था। इतना ही नहीं, मैं उस पर विश्वास करने के लिए भी तैयार हो गया था। मैं उन महान पुरुषों के मतों के प्रति सहानुभूति अनुभव कर रहा था, जो इस अत्यंत मनोहर संभावना का समर्थन करते हैं।  हालाँकि वे उसे पूरी तरह सिद्ध नहीं कर पाते। मैंने स्वयं को इस महान आशा के हवाले कर दिया था। मैं अपने वर्तमान जीवन से पहले ही विरक्त होने लगा था। अपने दुर्बल जीवन के शेष बचे हुए अंशों से भी मेरा मन ऊब चुका था। मेरे सामने उस असीम काल में प्रवेश करने और शाश्वतता का अधिकारी बनने की संभावना थी। पर तभी तुम्हारा पत्र आ पहुँचा और मैं जैसे नींद से जगा दिया गया। इस प्रकार मेरा वह मनोहर स्वप्न टूट गया। फिर भी, यदि मैं तुमसे कुछ समय के लिए छुटकारा पा सका तो मैं उसे फिर खोज निकालूँगा और पुनः प्राप्त कर लूँगा।


    तुम्हारे पत्र का आरंभ इस बात पर ज़ोर देता है कि मैं उस विवेचना को पूरा नहीं कर पाया, जिसमें मैं स्टोइक मत के इस सिद्धांत को सिद्ध करने का प्रयास कर रहा था कि मृत्यु के बाद मिलने वाली कीर्ति भी एक प्रकार का शुभ है। तुम्हारा कहना है कि मैं हमारे विरोधियों की इस आपत्ति का समाधान नहीं कर सका, “कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। किंतु यह तो ऐसी ही पृथक वस्तुओं से मिलकर बना है।” प्रिय लूसीलियस, तुम्हारी यह कठिनाई उसी विवेचना के अंतर्गत आने वाले एक दूसरे विषय से संबंधित है। इसलिए मैंने न केवल उसका उत्तर देना स्थगित रखा बल्कि उससे संबंधित अन्य प्रश्नों की चर्चा भी नहीं की क्योंकि, जैसा कि तुम जानते हो, नीतिशास्त्र में कुछ ऐसे विषय भी सम्मिलित होते हैं जो तर्कशास्त्र के क्षेत्र में आते हैं। 

    इसी कारण अब तक मैंने केवल उन्हीं विषयों पर विचार किया है जो सीधे-सीधे नीतिशास्त्र से संबंधित हैं जैसे कि क्या अपने अंतिम दिन के बाद तक अपनी चिंता का विस्तार करना मूर्खता और निरर्थकता है अथवा क्या हमारे सभी शुभ हमारे साथ ही समाप्त हो जाते हैं और हमारे अस्तित्व समाप्त हो जाने के बाद कुछ भी हमारा नहीं रहता? क्या उस वस्तु से, जो हमारे अस्तित्व समाप्त हो जाने के बाद घटित होगी और जिसका अनुभव हम कभी नहीं कर सकेंगे, पहले से ही किसी लाभ की आशा की जा सकती है या उसका कोई लाभ अनुभव किया जा सकता है? ये सभी प्रश्न नीतिशास्त्र से संबंधित हैं। इसलिए मैंने उन्हें उनके उचित स्थान पर ही रखा है। लेकिन इस स्टोइक सिद्धांत के विरुद्ध तर्कशास्त्रियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को अलग रखना आवश्यक था। इसलिए मैंने उन्हें एक ओर रख दिया। अब, चूँकि तुम पूरे विषय का निरूपण चाहते हो। इसलिए मैं उन सभी आपत्तियों का क्रमशः उल्लेख करूँगा और फिर एक-एक करके उनका खंडन करूँगा।

    मेरे प्रतिवादों को समझने योग्य बनाने के लिए आवश्यक है कि मैं पहले कुछ प्रारंभिक बातें कहूँ। मेरा आशय क्या है? कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो अखंड होती हैं जैसे, एक मनुष्य। कुछ अन्य संयुक्त होती हैं जैसे, एक जहाज़, एक घर, अथवा वे सभी वस्तुएँ जो विभिन्न भागों के परस्पर जुड़ने से एक इकाई बनती हैं। कुछ ऐसी होती हैं जो पृथक-पृथक भागों से मिलकर बनी होती हैं, जिनका प्रत्येक भाग अपनी अलग सत्ता बनाए रखता है जैसे, एक सेना, एक जनसमुदाय या एक सीनेट। इन अंतिम प्रकार की संस्थाओं के जिन घटकों से उनका निर्माण होता है। वे विधि या कार्य के आधार पर एक साथ जुड़े रहते हैं पर स्वभावतः वे अलग-अलग व्यक्ति ही होते हैं। अब मुझे और कौन-सी प्रारंभिक बातें कहनी चाहिए? हम स्टोइकों का सिद्धांत है कि कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। इसका कारण यह है कि कोई भी एक शुभ वस्तु एक ही आत्मा के नियंत्रण और संचालन में होनी चाहिए अर्थात किसी एक शुभ वस्तु का संचालन करने वाली शक्ति भी एक ही होनी चाहिए। यदि कभी तुम इसका प्रमाण चाहो तो यह बात स्वयं अपने स्वरूप से सिद्ध की जा सकती है। फिलहाल मुझे इसे एक आधारभूत मान्यता के रूप में स्वीकार करना पड़ा है क्योंकि हमारे ही सिद्धांतों का उपयोग हमारे विरुद्ध किया जा रहा है।

    इस प्रकार हमारा प्रतिपक्षी कहता है, “तुम यह दावा करते हो कि कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। किंतु जिस यश की तुम बात कर रहे हो, वह तो सज्जनों की अनुकूल धारणा है। प्रतिष्ठा किसी एक व्यक्ति के कथन का नाम नहीं है। न ही अपयश किसी एक व्यक्ति के प्रतिकूल निर्णय का परिणाम है। उसी प्रकार यश भी केवल किसी एक सद्गुणी व्यक्ति को प्रसन्न करने का विषय नहीं है। यश तभी अस्तित्व में आता है, जब अनेक प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति एक ही मत पर सहमत होते हैं। अतः यश अनेक व्यक्तियों के निर्णयों का परिणाम है। ऐसे व्यक्तियों के निर्णयों का, जो एक-दूसरे से पृथक हैं। इसलिए यश कोई शुभ नहीं हो सकता।”

    इसके अतिरिक्त वह कहता है, “यश वह प्रशंसा है जो सज्जन लोग किसी सज्जन व्यक्ति को प्रदान करते हैं। लेकिन प्रशंसा तो वाणी है। एक अर्थपूर्ण कथन। परंतु वाणी, चाहे वह सज्जनों की ही क्यों न हो, स्वयं कोई शुभ वस्तु नहीं है। यद्यपि एक सज्जन व्यक्ति की प्रत्येक विशेषता प्रशंसनीय और सराहनीय होती है, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि उसके द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य शुभ ही हो। वह ताली भी बजाता है और हूट भी करता है। पर कोई भी न तो उसकी ताली को शुभ कहता है और न ही उसके हूट करने को जैसे, कोई उसकी छींक या उसकी खाँसी को शुभ नहीं कहता। इसलिए यश कोई शुभ वस्तु नहीं है। 

    अंत में हमें यह बताओ कि यह शुभ किसका है, प्रशंसा करने वाले का या प्रशंसा पाने वाले का? यदि तुम कहते हो कि यह प्रशंसा पाने वाले का शुभ है तो यह उतना ही हास्यास्पद होगा, जितना यह कहना कि किसी दूसरे व्यक्ति का उत्तम स्वास्थ्य मेरा स्वास्थ्य है। पर जो व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है, उसकी प्रशंसा करना एक श्रेष्ठ कर्म है। इसलिए शुभ तो उसी का है जो प्रशंसा करता है क्योंकि वही उसका कर्म है। हमारा नहीं, जिनकी प्रशंसा की जा रही है। यही तो विवाद का विषय था।” 

    अब मैं इन प्रत्येक बिंदुओं पर क्रमशः विचार करूँगा। सबसे पहले, यह प्रश्न कि क्या कोई शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर बन सकता है जो एक-दूसरे से पृथक हों। यह विषय अभी भी विचाराधीन है और दोनों पक्षों के समर्थक विद्यमान हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि क्या यश के लिए अनेक व्यक्तियों की स्वीकृति आवश्यक है? नहीं। वह तो एक ही सज्जन व्यक्ति के निर्णय से भी पूर्ण हो सकता है क्योंकि यह वही सज्जन व्यक्ति है जो यह निर्णय करता है कि हम भी सज्जन हैं।

    “यह कैसे संभव है?” हमारा प्रतिपक्षी कहता है। “क्या प्रतिष्ठा केवल एक व्यक्ति के सम्मान का नाम होगी? क्या अपयश केवल एक व्यक्ति की निंदा से उत्पन्न हो जाएगा? मैं तो यह मानता हूँ कि यश का क्षेत्र कहीं अधिक व्यापक होता है और उसके लिए अनेक लोगों की सहमति आवश्यक है।” परंतु प्रतिष्ठा और अपयश का विषय यश से भिन्न है। क्यों? इसलिए कि यदि किसी सज्जन व्यक्ति की मेरे बारे में अच्छी राय है तो मेरी स्थिति वही है मानो सभी सज्जन व्यक्तियों की मेरे बारे में वही राय हो। वास्तव में, यदि वे सब मुझे जानते होते तो उनकी भी वही राय होती। उनका निर्णय एक ही होता है और वह समान रूप से सत्य पर आधारित होता है। वे एक-दूसरे से असहमत नहीं हो सकते। इसलिए यह मानना उचित है कि उन सबका निर्णय एक ही है क्योंकि उनके लिए कोई भिन्न निर्णय लेना संभव ही नहीं है। 

पर जहाँ यश अर्थात व्यापक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, वहाँ एक व्यक्ति की राय पर्याप्त नहीं होती। पहले प्रसंग में एक व्यक्ति का निर्णय सभी का प्रतिनिधित्व कर सकता है क्योंकि यदि सभी सज्जन व्यक्तियों से पूछा जाए तो उनका निर्णय सर्वसम्मत होगा। दूसरे प्रसंग में, विभिन्न लोग भिन्न-भिन्न निर्णय करते हैं। ऐसी स्थिति में सहमति प्राप्त होना कठिन होता है, और पूरा विषय संदेह, अनिश्चितता तथा शंका से भरा रहता है। क्या तुम यह समझते हो कि सभी लोग एक ही मत के हो सकते हैं? ऐसा तो एक ही व्यक्ति के भीतर भी नहीं होता। सज्जन व्यक्ति के मामले में निर्णय का आधार सत्य होता है। सत्य की शक्ति भी एक ही होती है तथा उसका स्वरूप भी एक ही होता है। लेकिन अन्य लोगों के मामले में वे असत्य बातों को स्वीकार करते हैं। असत्य कभी स्थिर नहीं रहता। वह सदा परिवर्तनशील होता है तथा मतभेद और असहमति को जन्म देता है।

    “पर प्रशंसा तो केवल एक कथन है और कथन कोई शुभ वस्तु नहीं है।” जब स्टोइक यह कहते हैं कि यश वह प्रशंसा है जो सज्जन लोग किसी सज्जन व्यक्ति को प्रदान करते हैं, तब उनका आशय किसी कथन से नहीं बल्कि एक धारणा या निर्णय से होता है। वास्तव में, कोई सज्जन व्यक्ति कुछ कहे बिना भी यदि यह निर्णय कर ले कि कोई व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है तो वह व्यक्ति प्रशंसित हो चुका है। इसके अतिरिक्त, प्रशंसा और स्तुतिगान एक ही बात नहीं हैं। स्तुतिगान के लिए वाणी आवश्यक है। इसी कारण कोई 'अंत्येष्टि-प्रशंसा' नहीं कहता बल्कि 'अंत्येष्टि-प्रशस्ति' कहता है क्योंकि प्रशस्ति का कार्य उसे सार्वजनिक रूप से बोलकर व्यक्त करना है। जब हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है, तब हमारा आशय यह नहीं होता कि लोग उसके विषय में मधुर शब्द बोलेंगे बल्कि यह होता है कि वे उसके बारे में अनुकूल निर्णय करेंगे। इसलिए प्रशंसा तब भी होती है, जब कोई व्यक्ति बिना कुछ कहे किसी सज्जन के विषय में अच्छा विचार रखता है और केवल अपने मन में ही उसकी प्रशंसा करता है। 

    इसके अतिरिक्त, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, प्रशंसा का संबंध मन की वृत्ति से है, न कि उन शब्दों से जो उस प्रशंसा को व्यक्त करके सार्वजनिक रूप से प्रकट करते हैं। किसी की प्रशंसा करना अर्थात यह निर्णय करना कि वह प्रशंसा का पात्र है। जब हमारा त्रासदी-कवि कहता है कि “उस व्यक्ति द्वारा प्रशंसित होना, जो स्वयं प्रशंसित है, अत्यंत गौरव की बात है,” तो उसका अभिप्राय यह है कि “उस व्यक्ति द्वारा, जो स्वयं प्रशंसा के योग्य है।” जब एक अन्य प्राचीन कवि कहता है कि “प्रशंसा कलाओं का पोषण करती है,” तो उसका आशय स्तुतिगान से नहीं है क्योंकि वास्तव में स्तुतिगान ही कलाओं को नष्ट कर देता है। वस्तुतः, जनसाधारण की प्रशंसा ने जितना वक्तृत्व-कला और उन सभी कलाओं को भ्रष्ट किया है जो केवल श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए विकसित की जाती हैं, उतना किसी और चीज़ ने नहीं किया। निश्चय ही, प्रतिष्ठा के लिए उसका उच्चारित होना आवश्यक है। लेकिन यश बिना बोले भी विद्यमान हो सकता है। उसके लिए केवल एक अनुकूल निर्णय पर्याप्त है। यश केवल मौन रहने वालों के बीच ही पूर्ण नहीं होता बल्कि उन लोगों के बीच भी पूर्ण रहता है जो उसका विरोध करते हैं और उसे दबाने का प्रयास करते हैं। मैं तुम्हें यश और प्रसिद्धि के बीच का अंतर बताता हूँ। प्रसिद्धि का आधार जनसाधारण का निर्णय होता है। जबकि यश का आधार सज्जन व्यक्तियों का निर्णय होता है।

    “यश अर्थात किसी सज्जन व्यक्ति को सज्जनों द्वारा दी गई प्रशंसा, किसका शुभ है? क्या वह उस व्यक्ति का शुभ है जिसकी प्रशंसा की जाती है, या उसका जो प्रशंसा करता है?” वह दोनों का शुभ है। जब मेरी प्रशंसा की जाती है, तब वह मेरा शुभ है क्योंकि स्वभावतः मेरे मन में सभी मनुष्यों के प्रति स्नेह है। मुझे इस बात का आनंद होता है कि मैंने अच्छा आचरण किया है तथा ऐसे लोगों से मिला हूँ जो मेरे सद्गुणों के प्रति कृतज्ञ हैं। उनकी कृतज्ञता इस शुभ को अनेक लोगों से संबंधित बना देती है। फिर भी वह मेरा भी शुभ है क्योंकि मेरी मनोवृत्ति ऐसी है कि मैं दूसरों के शुभ को भी अपना शुभ मानता हूँ, विशेषकर उन लोगों का, जिनके लिए मैं स्वयं किसी शुभ का कारण बना हूँ। वही शुभ उन लोगों का भी है जो प्रशंसा करते हैं क्योंकि वे यह कार्य सद्गुणपूर्वक करते हैं। प्रत्येक सद्गुणपूर्ण कर्म स्वयं एक शुभ है। यदि मैं स्वयं सद्गुणी न होता तो उन्हें भी यह शुभ प्राप्त न होता। इस प्रकार, उचित और योग्य प्रशंसा दोनों पक्षों के लिए शुभ है। ठीक उसी प्रकार जैसे उचित निर्णय, निर्णय देने वाले के लिए भी शुभ होता है और उस व्यक्ति के लिए भी, जिसे उस निर्णय का लाभ प्राप्त होता है। निस्संदेह, तुम यह स्वीकार करोगे कि न्याय उस व्यक्ति के लिए भी शुभ है जिसके भीतर वह गुण है। उस व्यक्ति के लिए भी जिसे उसका उचित अधिकार प्राप्त होता है। उसी प्रकार, किसी योग्य व्यक्ति की प्रशंसा करना न्याय है। इसलिए यह शुभ दोनों पक्षों का होता है।

    इन कुतर्क करने वालों के उत्तर में इतना ही पर्याप्त है। हमें अपना उद्देश्य इन सूक्ष्म और तुच्छ विवादों में उलझना नहीं बनाना चाहिए और न ही दर्शन को उसकी गरिमा से गिराकर ऐसी क्षुद्र बातों तक ले आना चाहिए।सीधे और खुले मार्ग पर चलना कितना अधिक संतोषजनक है बजाय इसके कि मनुष्य स्वयं ही घुमावदार रास्ते बनाए और फिर बड़े कष्ट से उन्हीं पर लौटने को विवश हो। इस प्रकार के तर्क-वितर्क वास्तव में चतुर वाद-विवाद करने वालों के बौद्धिक विनोद मात्र हैं।

    मुझे तो इसके बजाय यह बताओ कि अपने मन को अनंत तक विस्तृत करना कितना स्वाभाविक है। मानव-मन एक महान और उदात्त वस्तु है। वह अपने लिए कोई सीमा स्वीकार नहीं करता, सिवाय उन सीमाओं के जिन्हें वह स्वयं देवत्व के साथ साझा करता है। सबसे पहले, वह किसी संकीर्ण मातृभूमि को स्वीकार नहीं करता। चाहे वह इफिसस हो, अलेक्ज़ान्द्रिया हो अथवा कोई और अधिक जनसंख्या वाला और अधिक भव्य नगर ही क्यों न हो। उसकी वास्तविक मातृभूमि वह है जो समस्त विश्व की ऊँचाइयों और सम्पूर्ण विस्तार को अपने भीतर समेटे हुए है, स्वयं आकाश का विशाल मंडल। उसी के भीतर समुद्र और पृथ्वी दोनों स्थित हैं। उसी के भीतर वायु का निम्न प्रदेश मनुष्यों और देवताओं के बीच भेद भी स्थापित करता है और उन्हें जोड़ता भी है। उसी में असंख्य दैवी शक्तियाँ अपने-अपने निश्चित स्थानों पर स्थित रहकर निरंतर अपने-अपने कार्यों की सावधानीपूर्वक देखरेख करती हैं। दूसरे, मन अपने लिए सीमित जीवनकाल को भी स्वीकार नहीं करता। वह कहता है, “समस्त वर्ष मेरे हैं। कोई भी युग महान बुद्धियों के लिए बंद नहीं है। कोई भी काल चिंतन के लिए अनुपलब्ध नहीं है। जब वह दिन आएगा जो इस दैवी और मानवीय तत्वों के मिश्रण को अलग कर देगा, तब मैं इस शरीर को वहीं छोड़ दूँगा जहाँ मैंने उसे पाया था। स्वयं को देवताओं को समर्पित कर दूँगा। अभी भी मैं उनसे पृथक नहीं हूँ। केवल इस पृथ्वी-निर्मित शरीर का भार ही मुझे उनसे अलग रखे हुए है।”

    हमारा समूचा नश्वर जीवन केवल प्रतीक्षा का एक काल है। उस श्रेष्ठ और अधिक दीर्घ जीवन की एक भूमिका मात्र। जिस प्रकार हमारी माताओं का गर्भ हमें दस महीनों तक अपने भीतर रखता है। हमें अपने लिए नहीं बल्कि उस संसार के लिए तैयार करता है जहाँ हम पहली बार श्वास लेने और खुले वातावरण में जीवित रहने योग्य होकर प्रकट होते हैं; उसी प्रकार शैशव से लेकर वृद्धावस्था तक का यह समस्त जीवन भी हमें एक दूसरे जन्म के लिए तैयार करता है। हमारी प्रतीक्षा में एक नया आरंभ है, एक भिन्न अवस्था हमारा इंतज़ार कर रही है। अभी हम स्वर्गलोक को केवल दूर से ही सहन कर सकते हैं। इसलिए उस निर्णायक क्षण की निडर होकर प्रतीक्षा करो। वह तुम्हारे मन का अंतिम क्षण नहीं है। केवल शरीर का अंतिम क्षण है। अपने चारों ओर की प्रत्येक वस्तु को किसी सराय में रखे हुए सामान के समान समझो। तुम्हें आगे बढ़ जाना है। जैसे तुम प्रकृति की आज्ञा से इस संसार में आए थे, वैसे ही उसी मार्ग से लौट भी जाओगे। तुम्हें अपने साथ उससे अधिक कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं है जितना तुम लेकर आए थे बल्कि सत्य तो यह है कि जो कुछ तुम अपने साथ जीवन में लाए थे, उसका भी अधिकांश यहीं छोड़ना पड़ेगा। तुम्हारे शरीर का यह त्वचा-रूपी आवरण, जो तुम्हारा सबसे निकट का वस्त्र है, तुमसे अलग कर दिया जाएगा। तुम अपने मांस से, अपने पूरे शरीर में प्रवाहित रक्त से तथा उन हड्डियों और स्नायुओं से भी अलग कर दिए जाओगे, जो तुम्हारे कोमल और तरल अंगों को सहारा देते हैं।

    जिस दिन से तुम अपने जीवन का अंतिम दिन समझकर भयभीत होते हो, वही तुम्हारी अनंतता का जन्मदिन है।अपना बोझ उतार दो। तुम विलंब क्यों कर रहे हो? क्या तुमने इससे पहले भी उस शरीर को नहीं छोड़ा था, जिसमें तुम छिपे हुए थे। बाहर नहीं आए थे? तुम ठहरना चाहते हो, तुम विरोध करते हो। किंतु उस समय भी तुम्हें तुम्हारी माता के प्रबल प्रयासों से बाहर निकाल दिया गया था। तुम रोते और विलाप करते हो। वास्तव में जन्म लेते समय भी मनुष्य यही करता है। पर तब तुम्हें क्षमा किया जा सकता था क्योंकि तुम बिल्कुल अनभिज्ञ और अनुभवहीन होकर संसार में आए थे। जब तुम्हें अपनी माता के गर्भ के उस गर्म और कोमल आश्रय से बाहर भेजा गया, तब पहली बार स्वतंत्र वायु ने तुम्हें स्पर्श किया। फिर तुमने किसी कठोर हाथ का स्पर्श अनुभव किया। उस समय तुम अत्यंत कोमल थे और संसार के विषय में कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए इस अपरिचित वातावरण से भयभीत और विस्मित हो गए थे। किन्तु अब तुम्हारे लिए यह कोई नई बात नहीं है कि तुम उस वस्तु से अलग हो जाओ, जिसका कभी तुम एक भाग थे। अतः अब शांति के साथ उन अंगों को छोड़ दो जिनकी तुम्हें अब आवश्यकता नहीं रही। उस शरीर का त्याग कर दो जिसमें तुम इतने लंबे समय तक निवास करते रहे हो। वह तो वैसे भी फट जाएगा, चूर-चूर हो जाएगा और नष्ट हो जाएगा। तुम शोक क्यों करते हो? यही तो प्रकृति का नियम है। जिस प्रकार प्रसव के बाद गर्भ की झिल्ली नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार यह शरीर भी नष्ट होने के लिए ही है। तुम उससे ऐसा प्रेम क्यों करते हो मानो वह वास्तव में तुम्हारा अपना हो? वह तो केवल तुम्हारा आवरण था। वह दिन अवश्य आएगा जो तुम्हें इस मलिन और दुर्गंधयुक्त उदर के संबंध से अलग करके बाहर ले जाएगा।

    जहाँ तक संभव हो, अभी से अपने को इस शरीर से अलग करो। उन सुखों से भी दूर हो जाओ, सिवाय उनके जो शरीरधारी जीवन की आवश्यकताओं से जुड़े हुए हैं। अभी से अपने शरीर से विरक्ति उत्पन्न करो और किसी अधिक ऊँची तथा अधिक उदात्त वस्तु का चिंतन करो। समय आने पर प्रकृति के रहस्य तुम्हारे सामने प्रकट हो जाएँगे। वर्तमान का यह कुहासा हट जाएगा और चारों ओर से निर्मल प्रकाश तुम्हें आलोकित करेगा। अपने मन में उस प्रकाश की महानता की कल्पना करो, जहाँ असंख्य तारों का तेज एक साथ मिल जाता है। वहाँ इस शांति को भंग करने वाली कोई छाया नहीं होगी। आकाश का प्रत्येक भाग समान रूप से प्रकाशित होगा। दिन और रात का क्रम तो केवल इस निम्न वायुमंडल का नियम है। 

    जब तुम अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ उस पूर्ण प्रकाश का दर्शन करोगे, तब स्वीकार करोगे कि अब तक तुम अंधकार में ही जीते रहे थे। अभी तुम उसे केवल अपनी आँखों की इन संकीर्ण खिड़कियों के माध्यम से धुंधले रूप में देखते हो, फिर भी दूर से ही उस पर विस्मित हो उठते हो। तब वह दिव्य प्रकाश तुम्हें कैसा प्रतीत होगा, जब तुम उसे उसके अपने ही लोक में प्रत्यक्ष देखोगे? ऐसे विचार मन में किसी भी तुच्छ, क्षुद्र या पतित भावना को स्थान नहीं लेने देते। वे बताते हैं कि देवता प्रत्येक कर्म के साक्षी हैं। वे हमें प्रेरित करते हैं कि हम उनकी स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयास करें, आने वाले समय के लिए स्वयं को तैयार रखें, और अपनी दृष्टि अमरत्व पर स्थिर करें। जिस व्यक्ति के मन में यह विचार दृढ़ हो जाता है, वह किसी भी सेना से नहीं डरता, रणभेरी की ध्वनि से विचलित नहीं होता और किसी भी प्रकार की धमकी से भयभीत नहीं होता। वह भयभीत हो भी क्यों? क्योंकि वह तो मृत्यु की प्रतीक्षा भी आशा और उत्सुकता के साथ करता है।

    किन्तु वह व्यक्ति भी, जो यह मानता है कि मन केवल उतनी ही देर तक बना रहता है, जितनी देर वह शरीर के बंधन में रहता है और उससे मुक्त होते ही तुरंत विलीन हो जाता है, फिर भी मृत्यु के बाद भी अपने को उपयोगी बनाने का प्रयत्न करता है। हालाँकि वह हमारी आँखों से ओझल हो जाता है, फिर भी—

“उसका पराक्रम और उसके कुल की महिमा
बार-बार हमारे मन में आती रहती है।”

यह विचार करो कि महान व्यक्तियों के उत्तम उदाहरणों से हमें कितना लाभ होता है। तब तुम समझोगे कि महान पुरुषों की स्मृति उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति से किसी प्रकार कम उपयोगी नहीं होती।


अभी के लिए विदा 

जीवन को भविष्य पर आश्रित न रहने देने के बारे में -- पत्र - 99 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


हर दिन और हर क्षण हमें यह दिखा देता है कि हम कितने तुच्छ और क्षणभंगुर हैं। प्रत्येक नया अनुभव किसी न किसी नए प्रमाण के साथ हमें हमारी विस्मृत नश्वरता का स्मरण कराता है। समय का निरंतर प्रवाह हमें मृत्यु के विषय में सोचने के लिए विवश कर देता है, ठीक उसी समय जब हमारा मन अनंतता पर विचार कर रहा होता है। 


 

    आप सोच रहे होंगे कि यह भूमिका किस ओर संकेत कर रही है? यह बात कॉर्नेलियस सेनेसियो के विषय में है। एक प्रतिष्ठित, कर्तव्यनिष्ठ और सम्मानित रोमन अश्वारोही (इक्वेस्ट्रियन)। आप उन्हें जानते थे। साधारण परिस्थितियों से उठकर उन्होंने अपने परिश्रम और योग्यता के बल पर ऊँचा स्थान प्राप्त किया था। भविष्य में उनकी उन्नति और भी सरल होने वाली थी क्योंकि प्रतिष्ठा प्राप्त करना जितना कठिन होता है, उसे और बढ़ाना उतना कठिन नहीं होता। धन का भी यही स्वभाव है। निर्धनता से धन का संचय बहुत धीरे-धीरे आरंभ होता है। जब तक मनुष्य गरीबी की स्थिति से बाहर नहीं निकलता, तब तक संपत्ति बढ़ती नहीं। परंतु सेनेसियो उस अवस्था तक पहुँच चुके थे जहाँ उनके लिए धन-संपत्ति तीव्र गति से बढ़ने वाली थी। इसमें उनकी दो अत्यंत प्रभावशाली योग्यताओं ने सहायता की थी। वे धन कमाना भी जानते थे और उसे सुरक्षित रखना भी। इन दोनों में से कोई एक गुण भी किसी व्यक्ति को धनी बना सकता था। 

    वे अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वे अपनी संपत्ति की जितनी सावधानी से देखभाल करते थे, उतनी ही अपने स्वास्थ्य की भी। उस दिन भी, जैसा कि उनका नियम था, वे प्रातःकाल मुझसे मिलने आए। उसके बाद वे संध्या तक अपने एक गंभीर रूप से बीमार मित्र के शय्यापाश में बैठे उसकी सेवा करते रहे। रात्रि-भोज के समय वे पूरी तरह प्रसन्न और स्वस्थ दिखाई दे रहे थे। पर अचानक उन्हें गले में तीव्र पीड़ा (एंजाइना) का ऐसा दौरा पड़ा कि उनका गला सूज गया और वे ठीक से साँस भी नहीं ले पा रहे थे। भोर होने तक ही उनका जीवन समाप्त हो गया। इस प्रकार, एक पूर्णतः स्वस्थ और सक्रिय व्यक्ति के सभी दैनिक कर्तव्यों का पालन करने के केवल कुछ ही घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई। वे देश और विदेश, दोनों स्थानों पर निजी निवेश कर रहे थे और लाभ कमाने के उद्देश्य से हर प्रकार के सार्वजनिक कार्यों में भी लगे हुए थे। ठीक उसी समय, जब प्रत्येक कार्य उनके पक्ष में सफल हो रहा था और धन निरंतर उनके पास आ रहा था, मृत्यु ने उन्हें अपने साथ ले लिया।

"अब अपने नाशपाती के पेड़ लगाने का समय है, हे मेलिबोयस;
अब अपनी अंगूर की बेलों को व्यवस्थित करने का समय है।"

जब मनुष्य कल का भी स्वामी नहीं है, तब पूरे जीवन की योजनाएँ बनाना कितना मूर्खतापूर्ण है! कितना बड़ा भ्रम है कि कोई व्यक्ति लंबे-लंबे कार्यक्रम बनाते हुए कहे, “मैं संपत्ति खरीदूँगा और भवन बनवाऊँगा। मैं ऋण दूँगा और उन्हें वापस वसूल करूँगा। मैं सार्वजनिक पदों पर आसीन होऊँगा और उसके बाद लंबी तथा निश्चिंत वृद्धावस्था का आनंद लेने के लिए सेवानिवृत्त हो जाऊँगा।” विश्वास कीजिए, सब कुछ अनिश्चित है। यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जो भाग्यशाली प्रतीत होते हैं। किसी को भी भविष्य के बारे में अपने लिए कोई निश्चित आश्वासन नहीं देना चाहिए। जिस वस्तु को हम इस समय अपने हाथों में थामे हुए हैं, वही हमारे हाथों से फिसल सकती है। जिस क्षण को हम पकड़ लेना चाहते हैं, उसे भी संयोग एक ही पल में समाप्त कर सकता है। समय का प्रवाह तो अपने निश्चित क्रम से चलता रहता है, परंतु हम स्वयं अपने भविष्य के विषय में अज्ञान के अंधकार में रहते हैं। यदि मेरा अपना जीवन ही अनिश्चित है तो प्रकृति की इस निश्चित व्यवस्था से मुझे क्या लाभ? 

    हम दूर-दूर की यात्राओं की योजनाएँ बनाते हैं। विदेशी तटों की यात्रा के बाद बहुत समय बाद घर लौटने की कल्पना करते हैं। हम सैनिक जीवन की योजना बनाते हैं और कठिन युद्ध-अभियानों के बाद मिलने वाले लंबे समय से प्रतीक्षित पुरस्कारों की आशा करते हैं। हम प्रांतों के राज्यपाल बनने और पदोन्नति प्राप्त करने के स्वप्न देखते हैं।इसी बीच मृत्यु हमारे बिल्कुल पास खड़ी रहती है। पर हम उसके बारे में तभी सोचते हैं जब वह किसी और के जीवन में आती है। हम प्रतिदिन मृत्यु के असंख्य उदाहरण देखते हैं, पर वे हमारे मन पर केवल उतनी ही देर प्रभाव डालते हैं, जितनी देर तक वे हमें चकित करते हैं। इससे अधिक मूर्खता और क्या हो सकती है कि जिस घटना के किसी भी दिन घटित होने की संभावना थी, उसके किसी विशेष दिन घट जाने पर हम आश्चर्य करें? मानव-जीवन का एक निश्चित अंत है, जिसे हमारे भाग्य की अटल और अपरिहार्य व्यवस्था ने निर्धारित कर रखा है। लेकिन हममें से कोई भी यह नहीं जानता कि वह उस अंतिम क्षण के कितना निकट पहुँच चुका है। इसलिए हमें अपने मन को इस प्रकार तैयार करना चाहिए मानो हम जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके हों। किसी भी कार्य को कल पर न टालें। हमें प्रतिदिन अपने जीवन का हिसाब चुकता कर लेना चाहिए। 

    हमारे जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कभी पूर्ण नहीं होता। उसका कोई-न-कोई भाग हमेशा भविष्य के लिए टलता रहता है। जो व्यक्ति प्रत्येक दिन अपने जीवन को अंतिम रूप दे देता है, उसे समय की कभी कमी नहीं होती। समय की इसी अनुभूत कमी से भय उत्पन्न होता है और भविष्य के प्रति निरंतर बनी रहने वाली तृष्णा हमें भीतर-ही-भीतर कचोटती रहती है। इस चिंता से अधिक दुखद और कुछ नहीं कि आगे क्या होगा और घटनाओं का परिणाम क्या निकलेगा। हम निरंतर इस भय में जीते रहते हैं कि हमारे पास कितना समय शेष है और भविष्य हमारे लिए क्या लेकर आएगा। तो फिर इस मानसिक अशांति से मुक्ति कैसे मिले? इसका केवल एक ही उपाय है। अपने जीवन को भविष्य पर आश्रित न रहने देना बल्कि उसे वर्तमान में ही समेट लेना। लोग भविष्य से इसलिए चिपके रहते हैं क्योंकि वे वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। परंतु जब मैं अपने प्रति अपना समस्त दायित्व पूरा कर चुका होता हूँ। मेरा मन दृढ़तापूर्वक यह स्वीकार कर लेता है कि एक दिन और एक समूचे जीवनकाल में कोई वास्तविक अंतर नहीं है, तब वह आने वाले सभी दिनों और भविष्य की समस्त घटनाओं को व्यापक दृष्टि से देख सकता है और समय की संपूर्ण धारा का शांत एवं प्रसन्न भाव से अवलोकन कर सकता है। जब किसी का मन अनिश्चितताओं के प्रति स्थिर और संतुलित हो जाए, तब भाग्य के उतार-चढ़ाव और उसकी चंचलता उसे क्यों विचलित करें?

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, जीना शीघ्र आरंभ करो। प्रत्येक दिन को एक संपूर्ण जीवन के समान समझो। जो व्यक्ति इस प्रकार अपने को तैयार करता है और प्रत्येक दिन को ही अपना सम्पूर्ण जीवन मानकर जीता है, वही वास्तव में निश्चिंत और सुरक्षित रहता है। इसके विपरीत, जो लोग केवल भविष्य की आशाओं के सहारे जीते हैं, उनके हाथों से वर्तमान का प्रत्येक क्षण फिसलता चला जाता है। वे लोभ और मृत्यु-भय के वश में हो जाते हैं। यह अत्यंत दयनीय अवस्था है, जो जीवन की हर दूसरी वस्तु को भी दुखमय बना देती है। इसी भावना के कारण मैकेनास ने वह अत्यंत चौंका देने वाली प्रार्थना की थी, जिसमें वह बीमारी, शारीरिक विकृति और अंततः क्रूस पर कीलों से जड़ दिए जाने जैसी भीषण यातना तक सहने को तैयार हो जाता है। बस एक ही शर्त पर कि इन सब कष्टों के बीच उसका जीवन कुछ और लंबा हो जाए।

मेरे हाथ निर्बल कर दो,
मेरे पैरों को शक्तिहीन बना दो,
मेरी पीठ पर कूबड़ उगा दो,
मेरे सारे दाँत गिरा दो,
पर जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मुझे सब स्वीकार है।
मुझे जीने दो, मुझे जीने दो,
चाहे मुझे क्रूस की नोक पर ही क्यों न बैठना पड़े,
बस मुझे जीने दो।

यदि यह प्रार्थना पूरी हो जाती तो वह अत्यंत भयानक होती क्योंकि उसमें जीवन के नाम पर केवल यातना को लंबा करने की याचना की गई है। यदि वह सचमुच क्रूस पर चढ़ाए जाने तक भी जीवित रहने की इच्छा रखता था तो मैं उसे पूर्णतः मामूली व्यक्ति मानता। सुनिए, वह क्या कहता है, “जब तक मेरे टूटे-फूटे और अशक्त शरीर में कुछ जान बची है, तब तक तुम मुझे निर्बल कर सकते हो। जब तक मुझे अपने विकृत और टेढ़े-मेढ़े शरीर में कुछ और समय जीने को मिल जाए, तब तक तुम मुझे विकृत कर सकते हो। तुम मुझे लटका सकते हो और क्रूस पर चढ़ा सकते हो।” क्या अपने ही घाव को ढोते चले जाना इतना मूल्यवान है? क्या उस क्रूस पर फैले हुए लटके रहना उचित है। जबकि इस प्रकार मनुष्य पीड़ा की सबसे बड़ी राहत अर्थात उसके अंत को ही टाल रहा होता है? क्या केवल अंतिम साँस लेने के लिए जीवन को बनाए रखना इतना अधिक मूल्यवान है? ऐसे मनुष्य के लिए तो बस ईश्वर की दया की ही कामना की जा सकती है। वह इस लज्जाजनक और कोमल कविता के द्वारा क्या कहना चाहता है? इस अत्यंत हीन भय के साथ यह सौदेबाज़ी क्यों? जीवन के लिए यह घृणित याचना क्यों? मुझे नहीं लगता कि उसने कभी वर्जिल को यह पंक्ति पढ़ते हुए सुना होगा—

“क्या मृत्यु इतनी दुःखद है?”

मैकेनास सबसे भीषण प्रकार की पीड़ा की कामना करता है। उसे और भी असहनीय बना देता है क्योंकि वह चाहता है कि वह पीड़ा लंबी चले और उसे लंबे समय तक सहना पड़े। इसके बदले उसे क्या प्राप्त होता है? निस्संदेह, कुछ अधिक लंबा जीवन। पर वह कैसा जीवन है, जो केवल लंबी होती हुई मृत्यु है? क्या हमें ऐसा कोई व्यक्ति मिल सकता है जो कष्टों के बीच धीरे-धीरे क्षीण होता रहे, जिसके अंग एक-एक करके शिथिल पड़ते जाएँ, जो बार-बार साँस के लिए तड़पता रहे और फिर भी एक ही बार में प्राण त्याग देने के बजाय इस दशा को स्वीकार करे? क्या हमें ऐसा कोई व्यक्ति मिल सकता है जो पहले से ही दुर्बल, विकृत और अपने कंधों तथा वक्ष पर भद्दी सूजन से फूला हुआ हो, जिसके पास क्रूस पर चढ़ाए जाने के अतिरिक्त भी मर जाने के अनेक कारण हों। फिर भी वह उस भयावह फाँसी के ढाँचे से बँधे रहने तथा ऐसी साँसें लेते रहने की इच्छा रखे जो अपने साथ इतनी सारी यातनाएँ लेकर आती हों? 

    अब तुम्हें स्वीकार करना चाहिए कि प्रकृति हम पर बहुत दयालु है क्योंकि उसने मृत्यु को अपरिहार्य बना दिया है। फिर भी, अनेक लोग मैकेनास से भी कहीं अधिक निकृष्ट समझौते करने को तैयार रहे हैं। केवल जीवन कुछ और लंबा करने के लिए किसी मित्र के साथ विश्वासघात कर देना अथवा अपने ही बच्चों को स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति के लिए सौंप देना ताकि उन्हें उस दिन के प्रकाश को कुछ और समय तक देखने का अवसर मिल सके, जो उनके असंख्य अपराधों का साक्षी है। हमें जीवन के प्रति इस मोह को त्याग देना चाहिए। हमें यह सीखना चाहिए कि इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि तुम कष्ट कब सहते हो, क्योंकि देर-सवेर तुम्हें कष्ट सहना ही है। महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि तुम कितने लंबे समय तक जीते हो, बल्कि यह है कि तुम कितना अच्छा जीवन जीते हो। अनेक बार, अच्छा जीवन जीने का अर्थ यही होता है कि मनुष्य बहुत लंबे समय तक जीवित न रहे।


अभी के लिए विदा 

फ़ैबियानस की लेखन शैली के बारे में -- पत्र - 98 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


आप अपने पत्र में मुझे लिखते हैं कि आपने पैपिरियस फ़ैबियानस की पुस्तक 'ऑन पॉलिटिक्स' बड़े मनोयोग से पढ़ी। लेकिन अंततः उससे निराश हुए। फिर, यह भूलकर कि वह दर्शनशास्त्र की एक कृति है, आप उसकी रचना-शैली की आलोचना करने लगते हैं।

    मान लीजिए कि आप सही हैं कि वे शब्दों को बिना किसी विशेष क्रम में व्यवस्थित किए ही प्रवाहित होने देते हैं। सबसे पहले, उसी में भी अपना एक आकर्षण है। यह ऐसी शैली है जो सहज और अविरल रूप से बहने वाले विचार-विमर्श के लिए उपयुक्त होती है। मेरे विचार से, लापरवाही से लिखने और स्वाभाविक प्रवाह के साथ लिखने में बहुत बड़ा अंतर है। इसके अतिरिक्त, एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण भेद भी है। मेरी दृष्टि में फ़ैबियानस अपने विचारों को स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होने देते हैं। परंतु उन्हें अनियंत्रित बाढ़ की तरह नहीं बहने देते। उनकी भाषा समृद्ध और विस्तृत है। किंतु वह निरंतर आगे बढ़ती रहती है और कभी भी अपना संयम नहीं खोती। आरंभ से ही ऐसा प्रतीत होता है कि उनके लेखन को अत्यधिक घिसा-पिटा या बार-बार संशोधित नहीं किया गया है। फिर भी, यदि आपकी ही राय को स्वीकार कर लिया जाए तो भी उनका उद्देश्य हमारे शब्दों को नहीं बल्कि हमारे आचरण को व्यवस्थित करना था। उन्होंने यह कृति कानों को प्रसन्न करने के लिए नहीं बल्कि मन को शिक्षित करने के लिए लिखी थी। 



    इसके अतिरिक्त, यदि वे स्वयं सामने उपस्थित होकर बोल रहे होते तो आपको उनके वाक्यों की बारीकियों का विश्लेषण करने का अवसर ही नहीं मिलता क्योंकि आप उनके संपूर्ण वक्तव्य के प्रभाव से ही अभिभूत हो जाते। किसी वक्ता की ऊर्जा और प्रभावशाली प्रस्तुति के कारण जो बातें हमें सुनते समय अत्यंत प्रिय लगती हैं, वे प्रायः पढ़ने पर उतनी आकर्षक नहीं लगतीं। फिर भी, पहली ही दृष्टि में किसी का ध्यान आकर्षित कर लेना कोई साधारण बात नहीं है, भले ही सूक्ष्म परीक्षण करने पर उसमें कुछ दोष दिखाई दें। मेरे विचार में, वह वक्ता अधिक महान है जो आरंभ में ही श्रोताओं की स्वीकृति और प्रशंसा प्राप्त कर लेता है, उस वक्ता की अपेक्षा जिसे लोगों की स्वीकृति धीरे-धीरे अर्जित करनी पड़ती है। फिर भी, मैं यह स्वीकार करता हूँ कि दूसरा प्रकार का वक्ता अधिक विश्वसनीय होता है और भविष्य में उत्कृष्ट उपलब्धियों का अधिक दृढ़ आश्वासन देता है।

    दार्शनिक के लिए अत्यधिक परिष्कृत और शब्द-सज्जा पर अत्यधिक ध्यान देने वाला भाषण उपयुक्त नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति अपने शब्दों में ही संकोची हो तो वह साहस और दृढ़ता कब दिखाएगा या अपने प्राणों को जोखिम में डालने का साहस कब करेगा? फ़ैबियानस अपनी वाणी में लापरवाह नहीं थे बल्कि वे उसके प्रति अनावश्यक चिंता नहीं करते थे। इसी कारण आपको उनकी शैली में कुछ भी भद्दा या असभ्य नहीं मिलेगा। उनके शब्दों का चयन अत्यंत उपयुक्त है। किंतु उनमें कहीं भी कृत्रिमता या बनावट नहीं है। वर्तमान प्रचलन के विपरीत, वे शब्दों के स्वाभाविक क्रम को उलट-पुलट नहीं करते। फिर भी उनकी अभिव्यक्ति, यद्यपि सामान्य बोलचाल की भाषा से ली गई है, अत्यंत उत्कृष्ट है। उनके लेखन में आपको उदात्त और भव्य विचार मिलते हैं। वे विचार सूक्तियों (संक्षिप्त और चमत्कारपूर्ण वाक्यों) में जबरन नहीं बाँधे गए हैं, बल्कि विस्तारपूर्वक व्यक्त किए गए हैं। निस्संदेह, हमें कुछ ऐसे स्थान मिल सकते हैं जहाँ भाषा पर्याप्त संक्षिप्त नहीं है, या वाक्य-रचना आज के मानकों के अनुसार कुछ कम सुसंगठित अथवा कम सुरुचिपूर्ण प्रतीत होती है। किंतु समग्र रूप से देखें तो उसमें कहीं भी निरर्थक परिष्कार या दिखावटी अलंकरण का कोई चिह्न नहीं है। निस्संदेह, किसी को उसमें विभिन्न रंगों वाले संगमरमर की चमक, शयनकक्षों तक पानी पहुँचाने वाली जल-व्यवस्था, गरीबों की छोटी कोठरी अथवा वे सभी विलासपूर्ण सुविधाएँ नहीं मिलेंगी जिन्हें हमारी भोग-विलासी रुचियाँ इसलिए चाहती हैं क्योंकि साधारण सौंदर्य से उनका संतोष नहीं होता। परंतु, जैसा कि कहा जाता है, वह एक अच्छी तरह निर्मित भवन है। 

    इसके अतिरिक्त, शैली के विषय में लोगों की रुचियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। कुछ लोग ऐसी शैली चाहते हैं जिसमें तनिक भी खुरदरापन न हो; जबकि कुछ लोग इतनी ऊबड़-खाबड़ शैली पसंद करते हैं कि यदि कोई वाक्य स्वाभाविक रूप से अधिक सहज और सुचारु बन गया हो तो वे जान-बूझकर उसे भी तोड़-मरोड़ देते हैं और उसके अंतिम भाग को इस प्रकार अधूरा छोड़ देते हैं कि वह पाठक की अपेक्षा के अनुरूप न हो। सिसरो को पढ़िए।उनकी शैली आरंभ से अंत तक एक समान और सुसंगत रहती है। जब वे किसी वाक्य को पूर्ण करते हैं तो उसका समापन कोमल और सहज होता है। किंतु उसमें कमी, कोमलता या दुर्बलता नहीं होती। इसके विपरीत, असिनियस पोलियो की शैली झटकेदार और आकस्मिक है। वह वहाँ रुक जाती है जहाँ पाठक इसकी बिल्कुल अपेक्षा नहीं करता। सिसरो के यहाँ प्रत्येक वाक्य सुव्यवस्थित और पूर्ण समापन तक पहुँचता है। जबकि पोलियो के यहाँ वाक्य प्रायः अचानक टूट जाते हैं। केवल कुछ ही स्थान ऐसे हैं जहाँ वे किसी निश्चित लय और एकरूप विन्यास का पालन करते हैं।

    आप यह भी कहते हैं कि आपको उनकी पूरी कृति सपाट और पर्याप्त ऊँचाई से रहित प्रतीत होती है। किंतु मुझे उनमें यह दोष दिखाई नहीं देता। उनकी शैली सपाट नहीं है बल्कि संयमित है। वह उनके शांत, संतुलित और सुव्यवस्थित मन के अनुरूप ढली हुई है। वह समतल है, किंतु निम्न नहीं। निस्संदेह, उसमें वह प्रखर वक्तृत्व-कला नहीं है, न वे उत्तेजक प्रभाव हैं जिनकी आप अपेक्षा करते हैं और न ही सूक्तियों के समान अचानक चमत्कृत कर देने वाला प्रभाव। लेकिन यदि पूरी कृति को समग्र रूप में देखा जाए तो उसकी कलात्मकता के विषय में आपका जो भी मत हो, वह अपने स्वरूप में उदात्त और गरिमामयी है। उसकी शैली स्वयं शायद असाधारण विशिष्टता न रखती हो। परंतु वह अपने पाठक को विशिष्टता अवश्य प्रदान करती है। 

    अब बताइए, आप किस लेखक को फ़ैबियानस से श्रेष्ठ मानते हैं? यदि आप सिसरो का नाम लें जिनकी दार्शनिक पुस्तकों की संख्या लगभग फ़ैबियानस के समान ही है तो मैं इसे स्वीकार कर लूँगा। किंतु कोई रचना केवल इसलिए तुच्छ नहीं हो जाती कि वह सर्वश्रेष्ठ से कुछ नीचे है। यदि आप असिनियस पोलियो का नाम लें तो उसे भी मैं स्वीकार करूँगा। पर मेरा उत्तर केवल इतना होगा कि इतने विशाल साहित्यिक क्षेत्र में तीसरे स्थान पर आना भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। आप लिवी का नाम भी प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्होंने ऐसे संवाद (संवादात्मक ग्रंथ) भी लिखे हैं जो इतिहास और दर्शन, दोनों का समन्वय हैं। ऐसी पुस्तकें भी लिखी हैं जो विशेष रूप से दर्शनशास्त्र पर केंद्रित हैं। उनके लिए भी मैं स्थान दूँगा। परंतु यह भी देखिए कि केवल इन तीन लेखकों और शैली के इन तीन महान आचार्यों, से पीछे रह जाने पर भी फ़ैबियानस कितने अन्य लेखकों से आगे निकल जाते हैं। यही अपने आप में उनकी महानता का प्रमाण है।

    फिर भी, यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें प्रत्येक गुण विद्यमान है। यद्यपि उनकी शैली उदात्त है, पर वह साहसपूर्ण नहीं है। यद्यपि उसमें विस्तार है, फिर भी उसमें वेग और प्रहार-शक्ति का अभाव है। वह चमत्कृत करने वाली अपेक्षा अधिक स्पष्ट है। आप कहते हैं, “उसमें दुर्गुणों की कठोर निंदा नहीं मिलती, संकटों के प्रति उत्साहपूर्ण चुनौती नहीं है, भाग्य के सामने गर्वपूर्ण प्रत्युत्तर नहीं है और महत्त्वाकांक्षा पर तिरस्कारपूर्ण प्रहार भी नहीं है। मैं चाहता हूँ कि विलासिता को फटकारा जाए, व्यभिचार को सार्वजनिक रूप से लज्जित किया जाए और आक्रामकता को कुचल दिया जाए। उसमें वक्तृत्व-कला की तीक्ष्णता, त्रासदी की भव्यता और हास्य-नाटक की सरलता, इन सबका कुछ न कुछ अंश होना चाहिए।” 

    परंतु आप चाहते हैं कि उनका ध्यान शब्दों पर हो। जबकि शब्द अपने आप में बहुत छोटी और गौण वस्तु हैं। उन्होंने अपने विषय की महानता का साथ चुना है। वे अपनी वाग्मिता का प्रदर्शन नहीं करते बल्कि वाग्मिता उनके पीछे उसी प्रकार चलती है जैसे किसी व्यक्ति के पीछे उसकी छाया चलती है। निस्संदेह, उनके लेखन में कुछ कमियाँ भी मिलेंगी। कहीं-कहीं विषय अधूरा रह जाएगा, कुछ अंश ढीले ढंग से लिखे हुए प्रतीत होंगे और कुछ शब्द ऐसे होंगे जो पाठक को न तो झकझोरेंगे और न ही उत्तेजित करेंगे। मैं यह सब स्वीकार करता हूँ। अनेक वाक्य बिना कोई विशेष प्रभाव छोड़े ही निकल जाएँगे और कभी-कभी उनकी शैली कुछ शिथिल तथा अत्यधिक विस्तारपूर्ण भी लगेगी। किन्तु इसके साथ ही, उनके पूरे लेखन में आपको पर्याप्त प्रकाश मिलेगा और ऐसे लंबे-लंबे अंश भी मिलेंगे जिनमें तनिक भी नीरसता नहीं होगी। अंततः वे आपको यह विश्वास दिलाने में सफल होंगे कि उन्होंने जो कुछ लिखा है, उस पर वे स्वयं सच्चे मन से विश्वास करते हैं। आपको स्पष्ट हो जाएगा कि उनका उद्देश्य आपको अपने विचारों से परिचित कराना है, न कि केवल आपको प्रसन्न करना। उनकी संपूर्ण रचना का लक्ष्य मनुष्य की उन्नति और उसके चरित्र की उत्कृष्टता है। वह तालियों और प्रशंसा की आकांक्षा नहीं करती।

    मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि उनकी रचनाएँ ऐसी ही हैं, यद्यपि मुझे उनका प्रत्येक विवरण अब स्मरण नहीं है। मेरे मन में जो बात आज भी बनी हुई है, वह उनकी शैली और स्वर का एक समग्र प्रभाव है। ठीक वैसे ही जैसे किसी ऐसे व्यक्ति की स्मृति बनी रहती है जिसे हम बहुत लंबे समय से जानते हों, किंतु हाल के दिनों में उससे निकटता से बातचीत न हुई हो। निश्चय ही, जब मैंने उन्हें स्वयं बोलते हुए सुना था, तब भी उनकी रचनाएँ मुझे ऐसी ही प्रतीत हुई थीं, पूर्णतः दोषरहित नहीं, किंतु अत्यंत समृद्ध। उनका लेखन ऐसा था कि वह किसी प्रतिभाशाली और आशाजनक युवक को उनका अनुकरण करने के लिए प्रेरित कर सकता था, साथ ही उसके मन में यह आशा भी जगा सकता था कि वह एक दिन उनसे आगे निकल सकेगा। मेरे विचार में, यही प्रोत्साहन का सबसे प्रभावशाली रूप है। जब कोई लेखक हमें उसका अनुकरण करने के लिए प्रेरित तो करे। पर साथ ही यह निराशा भी उत्पन्न कर दे कि उसकी बराबरी कभी नहीं की जा सकती, तब वह प्रेरणा उत्साहवर्धक नहीं रहती बल्कि हतोत्साहित कर देती है। जो भी हो, फ़ैबियानस अत्यंत प्रचुर अभिव्यक्ति-शक्ति वाले लेखक थे। यद्यपि उनके लेखन के कुछ अंश आलोचना के योग्य हो सकते हैं, फिर भी समग्र रूप में उनका साहित्य अत्यंत भव्य, प्रभावशाली और प्रशंसनीय था।


अभी के लिए विराम 

स्वजन की मृत्यु के बाद शोक के बारे में -- पत्र - 97 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 


मैंने मारुलस को उसके शिशु पुत्र की मृत्यु के बाद लिखा था, वह पत्र संलग्न है। जब मुझे यह समाचार मिला कि वह इस शोक से अत्यन्त व्यथित है। उस पत्र में मैंने सामान्य ढंग नहीं अपनाया। मुझे लगा कि उसके साथ कोमलता से व्यवहार नहीं करना चाहिए क्योंकि उसे सांत्वना से अधिक फटकार की आवश्यकता थी। क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी अत्यन्त बड़े दुख को सहन करने में कठिनाई अनुभव कर रहा हो, तब कुछ समय के लिए उसे छूट देनी चाहिए ताकि उसका शोक स्वयं ही धीरे-धीरे शांत हो जाए या कम-से-कम अपनी प्रारम्भिक तीव्रता खो दे। किन्तु जो लोग जान-बूझकर अपने शोक को बनाए रखते हैं और उसे स्वयं पालते-पोसते हैं, उन्हें आरम्भ से ही डाँटना चाहिए और उन्हें यह सीखना चाहिए कि कभी-कभी आँसू भी उपहास का विषय बन जाते हैं।



    क्या तुम सांत्वना की अपेक्षा करते हो? यहाँ तुम्हें सांत्वना नहीं बल्कि फटकार मिलेगी। क्या अपने पुत्र की मृत्यु को सहने में तुम इतने दुर्बल हो गए हो? यदि तुम्हारे किसी मित्र की मृत्यु हो जाती, तब तुम क्या करते? जो पुत्र चला गया, वह तो अभी केवल भविष्य की एक अनिश्चित आशा था, एक नन्हा-सा शिशु। उसके साथ तो जीवन का केवल एक छोटा-सा अंश ही समाप्त हुआ है। हम तो मानो दुख करने के बहाने खोजते फिरते हैं। जब शिकायत करने का कोई उचित कारण भी नहीं होता, तब भी हम अपने भाग्य को दोष देना चाहते हैं, मानो हमें कभी वास्तविक दुख का सामना ही न करना पड़े। फिर भी, सच तो यह है कि मैं तुम्हें सदैव इतना धैर्यवान समझता था कि तुम बड़े-से-बड़े दुर्भाग्य का भी साहसपूर्वक सामना कर सको, उन काल्पनिक दुखों की तो बात ही क्या, जिन पर लोग केवल सामाजिक परम्परा निभाने के लिए विलाप करते हैं। यदि तुम्हें सबसे बड़ी हानि भी उठानी पड़ती अर्थात किसी सच्चे मित्र को खोना पड़ता, तब भी तुम्हारा प्रयत्न इस बात पर होना चाहिए था कि तुम्हें ऐसा मित्र कभी मिला था, इस बात का आनंद मनाओ न कि इस बात का शोक करो कि अब वह तुम्हारे पास नहीं रहा। 

    लेकिन अधिकांश लोग यह विचार ही नहीं करते कि उन्हें कितने बड़े वरदान प्राप्त हुए हैं और उन्होंने जीवन में कितने गहन आनंद का अनुभव किया है। यही कारण है कि तुम्हारा शोक केवल व्यर्थ ही नहीं बल्कि कृतघ्नता का भी परिचायक है। क्या उस मित्र का साथ पाना व्यर्थ था? इतने वर्षों का साथ, इतने अनुभव जो तुमने मिलकर बाँटे, समान रुचियाँ, साझा प्रयत्न और गहरी मित्रता, क्या यह सब कुछ शून्य हो गया? क्या तुम अपने मित्र के साथ-साथ अपनी मित्रता को भी दफना देना चाहते हो? यदि उससे तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, तभी तो उसके वियोग पर शोक करने का कोई अर्थ बनता है। मुझ पर विश्वास करो, जिन्हें हमने सच्चे मन से प्रेम किया है, वे संयोगवश हमसे बिछड़ जाने पर भी बहुत बड़े अंश में हमारे साथ बने रहते हैं। जो समय बीत चुका है, वह हमारा अपना है। जो हमारे अतीत का हिस्सा बन चुका है, उससे अधिक सुरक्षित कोई संपत्ति नहीं होती। भविष्य की आशाओं में डूबकर हम उन वरदानों के प्रति कृतघ्न हो जाते हैं जो हमें पहले ही मिल चुके हैं। हम यह भी भूल जाते हैं कि यदि वह आशान्वित भविष्य कभी आया भी तो शीघ्र ही वह भी अतीत बन जाएगा। 

    जो व्यक्ति केवल वर्तमान क्षण में ही सुख खोजता है, वह अपने जीवन के आनंद को स्वयं ही अत्यन्त संकीर्ण बना देता है। सुख तो भविष्य और अतीत, दोनों में निहित है। भविष्य में आशा का सुख है और अतीत में स्मृतियों का। अंतर केवल इतना है कि भविष्य अनिश्चित है, वह आए भी या नहीं किन्तु अतीत का होना कभी असत्य नहीं हो सकता। फिर इससे बढ़कर मूर्खता और क्या होगी कि मनुष्य अपनी सबसे सुरक्षित संपत्ति को ही अपने हाथों से फिसल जाने दे? आओ, उस आनंद में संतोष पाना सीखें जिसे हम जीवन के कुएँ से पहले ही निकाल चुके हैं। बशर्ते हमारा मन ऐसी छलनी न हो, जिसमें से हर मूल्यवान अनुभव रिसकर बाहर निकल जाए।  

    ऐसे असंख्य लोगों के उदाहरण मिलते हैं जिनके पुत्र युवावस्था की दहलीज़ पर ही चल बसे, फिर भी वे लोग सीधे श्मशान से निकलकर सीनेट या किसी अन्य सार्वजनिक सभा में पहुँचे और बिना आँसू बहाए तुरंत अपने कर्तव्यों के पालन में लग गए। और उन्होंने ठीक ही किया। पहला कारण यह है कि जिस शोक से कुछ भी प्राप्त नहीं होना, उसे करने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरा, जो घटना एक व्यक्ति के साथ घटी है और जो अंततः हम सबकी भी नियति है, उसके लिए शिकायत करना अनुचित है। तीसरा, जब हम स्वयं भी उसी मंज़िल से बहुत दूर नहीं हैं जहाँ वह पहुँच चुका है, तब उसके वियोग पर विलाप करना बुद्धिमानी नहीं बल्कि मूर्खता है। इसलिए हमें और भी अधिक धैर्य तथा संतुलन बनाए रखना चाहिए क्योंकि हम भी उसी व्यक्ति के पीछे-पीछे उसी मार्ग पर चले आ रहे हैं। 

    ज़रा विचार करो कि समय कितनी तीव्र गति से बीत रहा है। सोचो, वह दूरी कितनी छोटी है जिसे हम इतनी शीघ्रता से पार कर लेते हैं। देखो, समस्त मानव-समुदाय उसी एक दिशा में अग्रसर है। हमारे बीच केवल समय का थोड़ा-सा अंतर है। वह चाहे हमें कितना ही बड़ा क्यों न दिखाई दे, वास्तव में वह बहुत छोटा है। जिसे तुम खोया हुआ समझते हो, वह केवल तुमसे कुछ पहले आगे निकल गया है। इससे अधिक हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि मनुष्य उस व्यक्ति के लिए रोए जो उसी मार्ग पर उससे कुछ पहले चल पड़ा है, जिस मार्ग पर स्वयं उसे भी अवश्य चलना है? क्या कोई उस घटना पर शोक करता है जिसके घटित होने का उसे पहले से ही ज्ञान था या क्या उसे यह मालूम नहीं था कि मनुष्य नश्वर है? यदि नहीं था तो वह स्वयं को धोखा दे रहा था। जो व्यक्ति इस बात की शिकायत करता है कि कोई मर गया, वह वास्तव में इस बात की शिकायत कर रहा है कि वह मनुष्य था। हम सब एक ही नियम के अधीन जीवन जीते हैं। जो जन्म लेता है, उसे एक दिन अवश्य मरना पड़ता है। हमारे बीच केवल समय का अंतर है किन्तु अंत सबको समान बना देता है। 

    हमारे जन्म के पहले दिन और अंतिम दिन के बीच का सारा समय अनिश्चित और परिवर्तनशील है। यदि उसे हमारे दुखों के आधार पर आँका जाए, तो वह एक छोटे बच्चे के लिए भी बहुत लंबा प्रतीत होता है। लेकिन यदि उसकी तीव्र गति को देखा जाए तो वह वृद्ध से वृद्ध व्यक्ति के लिए भी अत्यन्त छोटा है। इस संसार में सब कुछ असुरक्षित है, छलपूर्ण है और मौसम से भी अधिक परिवर्तनशील है। हर वस्तु डगमगाती रहती है और भाग्य की इच्छा के अनुसार पल-भर में अपने विपरीत रूप में बदल जाती है। मानव जीवन के इस सारे कोलाहल और अस्थिरता के बीच केवल एक ही बात ऐसी है जो पूरी तरह निश्चित है— मृत्यु। फिर भी विडम्बना यह है कि लोग उसी एक सत्य की शिकायत करते हैं जिसमें किसी प्रकार का छल या धोखा नहीं है।

    "लेकिन वह तो अभी बालक ही था जब उसकी मृत्यु हो गई।" इस समय मैं यह नहीं कह रहा कि जो व्यक्ति कम आयु में मर जाता है, वह अधिक भाग्यशाली होता है। बल्कि उस व्यक्ति के जीवन पर विचार करो जिसने वृद्धावस्था तक पहुँचने का अवसर पाया। उस वृद्ध को उस बालक की तुलना में वास्तव में कितना अधिक लाभ मिला? अपने मन में समय की असीम विशालता की कल्पना करो। समूचे ब्रह्मांड को अपने विचारों में समेटो, फिर उस अनन्त काल की तुलना उस अवधि से करो जिसे हम मानव-जीवन कहते हैं। तब तुम्हें स्पष्ट दिखाई देगा कि जिस जीवन को हम इतनी उत्कट इच्छा से लंबा करना चाहते हैं, वह वास्तव में कितना तुच्छ और क्षणभंगुर है। उस थोड़े-से जीवन का कितना बड़ा भाग आँसुओं और चिंताओं में बीत जाता है! कितना समय मृत्यु आने से पहले ही उसकी कामना करने में निकल जाता है! कितना समय रोगों में व्यतीत होता है, और कितना भय में! फिर जीवन का एक बड़ा हिस्सा असहाय बाल्यावस्था में बीत जाता है और दूसरा निष्फल वृद्धावस्था में। इतना ही नहीं, लगभग आधा जीवन तो नींद में ही निकल जाता है। इन सबके साथ यदि तुम दुःख, शोक और निरन्तर बने रहने वाले संकटों को भी जोड़ दो तो समझ जाओगे कि सबसे लंबा जीवन जीने वाला मनुष्य भी वास्तव में जीने के लिए बहुत थोड़ा ही समय पाता है। 

    क्या कोई व्यक्ति केवल इसलिए अधिक अभागा हो जाता है कि उसे अपेक्षाकृत जल्दी मरना पड़ा? ऐसा कौन मानेगा? उसकी यात्रा थकान आने से पहले ही समाप्त हो गई। जीवन अपने आप में न तो अच्छा है और न बुरा; वह तो केवल अच्छाई और बुराई के प्रकट होने का एक मंच है। इसलिए उसने वास्तव में कुछ नहीं खोया, सिवाय उस दाँव के जिसमें परिस्थितियाँ पहले से ही उसके विरुद्ध थीं। यह संभव था कि वह संयमी और बुद्धिमान बनता। तुम्हारे मार्गदर्शन और देखभाल से उसका चरित्र उत्तम बन सकता था। लेकिन अधिक संभावना तो यही थी कि उसका जीवन भी अधिकांश लोगों की तरह ही बीतता। ज़रा चारों ओर देखो, कितने ही प्रतिष्ठित और कुलीन परिवारों के युवक भोग-विलास के कारण पतन की धूल में मिल गए हैं। अपनी वासनाओं और दूसरों की वासनाओं के वशीभूत होकर वे अनैतिक जीवन में फँस गए। ऐसा शायद ही कोई दिन बीतता हो जब वे मद्यपान या किसी घोर दुष्कर्म में लिप्त न हों। इन सबको देखकर स्पष्ट है कि उस बालक के भविष्य में आशा की अपेक्षा भय की संभावना कहीं अधिक थी। 

    इसलिए तुम्हें जान-बूझकर शोक करने के कारण नहीं खोजने चाहिए। न ही छोटी-सी विपत्ति को अत्यधिक व्याकुल होकर बड़ा बना देना चाहिए। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा कि असाधारण धैर्य या वीरता का प्रदर्शन करो। तुम्हारे बारे में मेरी धारणा इतनी छोटी नहीं है कि मैं समझूँ, इस घटना का सामना करने के लिए तुम्हें अपना सारा साहस जुटाना पड़ेगा। जो तुम अनुभव कर रहे हो, वह वास्तविक शोक नहीं बल्कि केवल एक तीखी चुभन है। उसी चुभन को तुम स्वयं शोक का रूप दे रहे हो। यदि तुम्हारे मनोबल का आधार यही है कि तुम एक ऐसे बालक के वियोग में टूट जाओ जो अपने पिता की अपेक्षा अपनी धाय (दूध पिलाने वाली) को अधिक जानता था तो फिर दर्शन ने तुम्हें अब तक कितना लाभ पहुँचाया है? 

    तो क्या मैं अब कठोरता का उपदेश दे रहा हूँ? क्या मैं चाहता हूँ कि अंतिम संस्कार के समय भी तुम्हारे चेहरे पर कोई भाव न आए? क्या मैं तुम्हें यह भी मना कर रहा हूँ कि तुम्हारे मन में दुख की पहली लहर तक न उठे? काभी नहीं। वह सद्गुण नहीं बल्कि अमानवीयता होगी कि मनुष्य अपने प्रियजन के निर्जीव शरीर को उसी निर्विकार भाव से देखे, जिस भाव से वह उसे जीवित अवस्था में देखा करता था या जब परिवार का एक सदस्य उससे सदा के लिए अलग हो जाए, तब उसके हृदय में पहली बार भी कोई वेदना न उठे। यदि मैं ऐसा निषेध भी करूँ, तब भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हमारे वश में नहीं होतीं। आँसू तो उन्हें रोकने का प्रयत्न करने पर भी निकल पड़ते हैं। उनका बह जाना मन के लिए एक प्रकार का हल्कापन और राहत लेकर आता है। 

    तो फिर क्या करना चाहिए? आँसुओं को आने दो। लेकिन उन्हें बुलाओ मत। जो आँसू स्वाभाविक भावावेग से स्वयं बह निकलें, उन्हें बहने दो। पर ऐसे आँसू मत बहाओ जो केवल दूसरों की नकल करने के लिए बहाए जाएँ।अपने वास्तविक शोक में कृत्रिम प्रदर्शन मत जोड़ो। दूसरों का अनुसरण करने के लिए अपने दुख को उससे अधिक मत बढ़ाओ जितना वह वास्तव में है। क्योंकि शोक का प्रदर्शन हमसे उतनी माँग करता है, जितनी स्वयं शोक भी नहीं करता। आख़िर कितने लोग हैं जो सचमुच केवल अपने दुख के कारण रोते हैं? जब देखने वाला कोई होता है, तब उनकी सिसकियाँ और भी ऊँची हो जाती हैं। जब वे अकेले होते हैं, तब उनके मुँह से कोई आवाज़ तक नहीं निकलती। लेकिन जैसे ही कोई भीतर आता है, वे फिर से विलाप करने लगते हैं। तभी वे अपना सिर पीटते हैं। जबकि यह काम वे तब भी कर सकते थे, जब कोई उनका हाथ पकड़ने वाला न होता। तभी वे अपने लिए मृत्यु की कामना करने लगते हैं। तभी वे पलंग से लुढ़ककर ज़मीन पर गिर पड़ते हैं। पर जैसे ही दर्शक हट जाता है, उनका शोक भी समाप्त हो जाता है। इस विषय में भी और जीवन की अनेक अन्य बातों की तरह, हम एक दोष से ग्रस्त हैं।हम अपने आचरण का निर्धारण अपनी आवश्यकता या विवेक से नहीं बल्कि दूसरों की नकल और प्रचलित रीति के अनुसार करते हैं। हम प्रकृति का साथ छोड़कर भीड़ का अनुसरण करने लगते हैं। जबकि भीड़ न तो कभी अच्छा मार्गदर्शक होती है और न ही किसी बात में स्थिर। जब वे किसी व्यक्ति को धैर्यपूर्वक अपना शोक सहते हुए देखते हैं तो उसे निष्ठुर और हृदयहीन कह देते हैं। जब किसी को मृत शरीर पर गिरकर बिलखते देखते हैं तो उसे कमजोर और दुर्बल कहने लगते हैं। इसलिए ऐसे सभी व्यवहारों का निर्णय विवेक की कसौटी पर होना चाहिए, न कि भीड़ की राय पर। इससे अधिक मूर्खता क्या होगी कि मनुष्य शोक की ख्याति प्राप्त करने की चेष्टा करे या आँसुओं को ही अपनी स्वीकृति और सम्मान का आधार बना ले? 

    मेरा विश्वास है कि बुद्धिमान व्यक्ति भी कभी-कभी आँसू बहाता है। कभी इसलिए कि वह उन्हें बहने देता है और कभी इसलिए कि वे अपने आप उमड़ पड़ते हैं। दोनों में क्या अंतर है, यह मैं स्पष्ट करता हूँ। जब किसी प्रियजन की असमय मृत्यु का समाचार पहली बार हमें आघात पहुँचाता है, जब हम उस शरीर को अपनी बाँहों में थामे होते हैं जो कुछ ही क्षणों बाद हमारी गोद से उठकर अग्नि को समर्पित कर दिया जाएगा, तब प्रकृति की अनिवार्यता हमारे आँसू निकाल लाती है। जैसे शोक का आघात हमारी साँसों को झकझोर देता है और पूरा शरीर काँप उठता है, वैसे ही वह आँखों के पास संचित नमी को भी दबाकर बाहर ले आता है। ऐसे आँसू भीतर उठे स्वाभाविक आवेग के कारण निकलते हैं। वे हमारी इच्छा से नहीं बल्कि अनायास बहते हैं। किन्तु कुछ आँसू ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम स्वयं बहने देते हैं। जब हम अपने बिछुड़े हुए प्रियजनों की स्मृतियों में लौटते हैं और अपने शोक में भी एक मधुरता का अनुभव करते हैं। जब उनकी प्रिय बातें, उनका प्रसन्न साथ और उनका स्नेहपूर्ण समर्पण स्मरण में आता है तब हमारी आँखों से आँसू वैसे ही बह निकलते हैं जैसे आनंद के क्षणों में। ऐसे आँसुओं को हम स्वयं स्थान देते हैं। पर पहले प्रकार के आँसू हम पर अपना अधिकार जमा लेते हैं। इसलिए यदि तुम्हारे पास कोई खड़ा हो या तुम्हारे निकट बैठा हो, तो केवल उसके कारण अपने आँसू मत रोकना और न ही उसकी उपस्थिति के कारण स्वयं को रुलाने का प्रयत्न करना। क्योंकि न आँसू बहाना और न आँसू रोक लेना, इनमें से कोई भी बात उतनी लज्जाजनक नहीं है, जितनी कि बनावटी आँसू बहाना। आँसुओं को तभी आने दो, जब वे स्वाभाविक रूप से स्वयं आएँ। 

    आँसू बहाते हुए भी मनुष्य के भीतर शांति और आत्मसंयम बना रह सकता है। बुद्धिमान लोगों ने भी अनेक बार आँसू बहाए हैं, किन्तु इससे उनके चरित्र की गरिमा कभी कम नहीं हुई। उनके आँसुओं में इतना संयम होता है कि वे एक साथ अपनी मर्यादा और अपनी मानवीय संवेदना, दोनों को सुरक्षित रखते हैं। मैं फिर कहता हूँ, मनुष्य प्रकृति के अनुरूप चल सकता है और साथ ही अपनी गरिमा भी बनाए रख सकता है। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो अपने किसी प्रिय परिजन के अंतिम संस्कार में भी सम्मान के पात्र बने रहे। उनके चेहरे पर अपने प्रिय के प्रति सच्चा स्नेह स्पष्ट दिखाई देता था। पर उसमें शोक का कोई कृत्रिम प्रदर्शन नहीं था। उनके मन में जो भी भाव थे, वे स्वाभाविक और निष्कपट थे। शोक में भी एक मर्यादा होती है और बुद्धिमान व्यक्ति उसी मर्यादा का पालन करता है। आँसुओं में भी सीमा होनी चाहिए जैसे, जीवन की हर दूसरी चीज़ में होती है। अत्यधिक शोक और अत्यधिक हर्ष, दोनों ही मूर्खता के लक्षण हैं।  

    जिसे स्वीकार करना ही पड़े, उसे शांत मन से स्वीकार करो। इसमें ऐसा क्या हुआ है जो न कभी पहले हुआ हो या जिस पर विश्वास न किया जा सके? इसी समय न जाने कितनी शवयात्राओं की तैयारी हो रही है, कितने कफ़न खरीदे जा रहे हैं और तुम्हारे शोक समाप्त कर लेने के बाद भी न जाने कितने लोग अपने प्रियजनों के लिए विलाप कर रहे होंगे। जब भी तुम्हें यह याद आए कि वह एक बालक था, तब यह भी याद रखना कि वह एक मनुष्य था।  इसलिए उसके लिए किसी निश्चित भविष्य की गारंटी कभी नहीं थी। भाग्य किसी को भी अनिवार्य रूप से वृद्धावस्था तक नहीं पहुँचाता। वह जब उचित समझता है, जीवन-यात्रा वहीं समाप्त कर देता है। 

    फिर भी, उसके विषय में बार-बार बात करो और जितना संभव हो उसकी स्मृति का सम्मान करते रहो। यदि उसकी याद कटुता से मुक्त होगी तो वह बार-बार तुम्हारे पास लौटेगी। क्योंकि कोई भी व्यक्ति सदैव दुःखी रहने वाले के साथ समय बिताना नहीं चाहता, फिर स्वयं दुःख के साथ कौन रहना चाहेगा? यदि उसकी कोई भोली-भाली बातें थीं, कोई बालसुलभ चुटकुले या मासूम शरारतें थीं जो तुम्हें प्रसन्न करती थीं तो उन्हें बार-बार याद करो और सुनाया करो। एक पिता के रूप में तुमने उसके भविष्य के बारे में जो सुंदर आशाएँ सँजोई थीं, उन्हें भी निस्संकोच स्मरण करो। अपने प्रियजनों को भूल जाना, उनकी स्मृतियों को उनके शरीर के साथ ही दफना देना, बहुत रोना लेकिन उन्हें शायद ही कभी याद करना, यह संवेदनशीलता नहीं बल्कि अमानवीयता का प्रमाण है। पक्षी और वन्य पशु भी अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, किन्तु उनका स्नेह केवल एक उग्र और लगभग उन्मत्त आवेग होता है। जैसे ही उनका बच्चा मर जाता है, उनका वह लगाव भी समाप्त हो जाता है। किन्तु एक विवेकशील मनुष्य के लिए ऐसा व्यवहार उचित नहीं है। उसे शोक करना छोड़ देना चाहिए, पर स्मरण करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। 

    मैं किसी भी प्रकार से मेट्रोडोरस की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि शोक से मिलता-जुलता एक सुख भी होता है और ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य को उसी सुख की खोज करनी चाहिए। मेट्रोडोरस ने अपनी बहन को लिखे एक पत्र में कहा है, "शोक से मिलता-जुलता एक प्रकार का सुख भी होता है और ऐसी स्थिति में मनुष्य को उसकी तलाश करनी चाहिए।" इन शब्दों के विषय में तुम्हारा क्या मत होगा, इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है। क्योंकि इससे अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है कि कोई व्यक्ति शोक के बीच ही सुख खोजने निकले? बल्कि शोक के माध्यम से ही आनंद प्राप्त करने का प्रयत्न करे और आँसुओं के बीच भी किसी मनोहर अनुभव की तलाश करे! और यही लोग हम पर अत्यधिक कठोर होने का आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं कि हमारे उपदेश बहुत कठोर हैं, केवल इसलिए कि हम यह कहते हैं या तो शोक को मन में प्रवेश ही मत करने दो और यदि वह आ जाए तो उसे शीघ्र ही विदा कर दो। अब बताओ, इनमें से कौन-सी बात अधिक कठिन और कम मानवीय प्रतीत होती है। मित्र के वियोग पर शोक को अपने ऊपर हावी न होने देना या फिर उसी शोक के बीच सुख का शिकार करने निकल पड़ना? 

    हमारी शिक्षा तो कहीं अधिक गरिमापूर्ण है। हम कहते हैं कि जब स्वाभाविक भावावेग मनुष्य से कुछ आँसू निकलवा ले और उसका पहला उबाल शांत हो जाए, तब उसे अपने मन को शोक के हवाले नहीं कर देना चाहिए। क्या सचमुच तुम यह कहना चाहते हो कि शोक में भी सुख मिलाकर उसे हल्का किया जाए? यह तो वैसा ही है जैसे किसी रोते हुए बच्चे को मिठाई देकर चुप कराया जाए, या दूध पिलाकर उसकी रुलाई रोक दी जाए। यह बुद्धिमानों के लिए नहीं बल्कि छोटे बच्चों को बहलाने का उपाय है। 

    क्या तुम यह भी स्वीकार नहीं करोगे कि जब पुत्र की चिता जल रही हो या कोई प्रिय मित्र अपने अंतिम श्वास ले रहा हो, तब कम-से-कम उस समय तो सुख का अंत हो जाना चाहिए? क्या हमारे शोक में भी आनंद की गुदगुदी बनी रहनी चाहिए? बताओ, अधिक गरिमापूर्ण क्या है? मन से शोक को दूर कर देना या शोक के बीच ही सुख को प्रवेश दे देना? मैंने तो केवल यह कहा था कि सुख को शोक के बीच आने दिया जाता है। पर मेट्रोडोरस तो इससे भी आगे बढ़कर कहता है कि शोक के भीतर से ही सुख को निकाल लेना चाहिए। वह कहता है, "शोक से मिलता-जुलता एक सुख होता है।" ऐसी बात हम स्टोइक कह सकते हैं, लेकिन तुम नहीं। क्योंकि तुम्हारे मत में केवल एक ही वस्तु शुभ है, सुख। केवल एक ही वस्तु अशुभ है, पीड़ा। फिर भला शुभ और अशुभ के बीच कोई समानता या निकटता कैसे हो सकती है? लेकिन मान लो कि ऐसी कोई समानता है भी तो क्या यह उसका अन्वेषण करने का उचित अवसर है? क्या हम शोक के बीच बैठकर यह खोजने लगें कि उसमें कहीं कोई मधुर या सुखद तत्व छिपा हुआ है? चिकित्सा में भी कुछ ऐसे उपचार होते हैं जो शरीर के किसी अंग के लिए लाभदायक होते हैं। लेकिन दूसरे अंगों पर उनका प्रयोग अनुचित और लज्जाजनक माना जाता है। जो उपचार एक स्थान पर उचित होता है, वही घाव की स्थिति बदल जाने पर अनुचित प्रतीत होने लगता है। तो क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती कि तुम शोक का उपचार सुख से करना चाहते हो? हृदय के इस गहरे घाव के लिए कहीं अधिक गंभीर, संयमपूर्ण और दृढ़ उपचार की आवश्यकता है।

    इसके बजाय हमें यह समझाना चाहिए कि जो मर चुका है, उसे किसी भी बुराई का कोई अनुभव नहीं हो सकता क्योंकि यदि उसे किसी बात का अनुभव हो रहा है तो वह मरा ही नहीं है। मैं फिर कहता हूँ, जो अब अस्तित्व में ही नहीं है, उसे कोई भी पीड़ा नहीं पहुँचा सकती। क्योंकि यदि उसे पीड़ा पहुँच रही है तो इसका अर्थ है कि वह अभी जीवित है। ज़रा सोचो, उसे किस बात से कष्ट हो सकता है, अपने अस्तित्व के समाप्त हो जाने से या किसी प्रकार के शेष बचे हुए अस्तित्व से? यदि उसका अस्तित्व ही नहीं रहा तो उसे किसी यातना का अनुभव कैसे होगा? जहाँ चेतना ही नहीं है, वहाँ पीड़ा का अनुभव भी नहीं हो सकता। यदि किसी रूप में उसका अस्तित्व बना हुआ है तो उसने मृत्यु की सबसे बड़ी हानि से मुक्ति पा ली है क्योंकि मृत्यु की सबसे बड़ी हानि तो यही मानी जाती है कि मनुष्य का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। 

    जो व्यक्ति अपने उस प्रियजन के लिए रो रहा है, जिसे युवावस्था में ही मृत्यु ने छीन लिया, उससे हमें यह भी कहना चाहिए कि ब्रह्मांड के अनंत काल की तुलना में युवा हो या वृद्ध, हर मनुष्य का जीवन समान रूप से छोटा है।मनुष्य की सबसे लंबी आयु भी उस अनंत काल की तुलना में इतनी नगण्य है कि उसे एक क्षणांश भी नहीं कहा जा सकता। क्षणांश तो फिर भी कुछ होता है। पर हमारा जीवन तो उसके सामने मानो कुछ भी नहीं है। यही नगण्य-सा जीवन हम सबको समान रूप से मिला हुआ है। हम कितने मूर्ख हैं कि इसी को लेकर इतना मोह और विलाप करते हैं! 

    मैंने यह सब तुम्हें इसलिए नहीं लिखा कि मुझे लगा तुम अब भी किसी विलंबित उपचार की प्रतीक्षा कर रहे हो। मुझे पूरा विश्वास है कि ये सभी बातें तुम स्वयं भी अपने मन से कह चुके होगे। मेरा उद्देश्य तो केवल इतना था कि थोड़ी देर के लिए तुम अपने वास्तविक स्वरूप और अपने विवेक को भूल बैठे थे। इसलिए तुम्हें उसकी याद दिलाऊँ और साथ ही तुम्हें यह साहस दूँ कि भविष्य में भाग्य के प्रत्येक आघात का दृढ़ता से सामना कर सको। भाग्य के प्रहारों को केवल संभावनाएँ मत समझो; उन्हें ऐसी घटनाएँ मानो जिनका घटित होना एक दिन निश्चित है।


अभी के लिए विदा 


थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग चार: अंकल पियो)

  भाग चार: अंकल पियो By Louisa Starr Canziani अपने एक पत्र ( XXIX उ नतीसवें पत्र) में मार्केसा दे मोंतेमायोर अंकल पियो, “ हमारे बूढ़े हार...