Tuesday, 4 August 2026

दर्शन को अपनाने वाले व्यक्ति के बारे में -- पत्र - 109

 प्रिय लूसीलियस 


तुमने मुझसे पूछा था कि यूनानी शब्द सोफिस्मैटा (sophismata) के लिए लैटिन में क्या शब्द है। इसके लिए अनेक शब्द गढ़ने के प्रयास किए गए हैं किन्तु कोई एक शब्द सर्वमान्य नहीं हो पाया। न तो हमें वास्तव में ऐसे कुतर्क प्रिय हैं और न ही हम उनका उपयोग करते हैं। इसलिए उनके लिए प्रयुक्त शब्द भी हमें विशेष पसंद नहीं है। मेरे विचार से सिसेरो द्वारा प्रयुक्त शब्द 'कुतर्क' (cavillationes) सबसे उपयुक्त है। जो लोग इन कुतर्कों में उलझे रहते हैं, वे सचमुच ऐसे प्रश्न गढ़ लेते हैं जो लोगों को उलझन में डाल दें किन्तु इससे उनका जीवन तनिक भी बेहतर नहीं बनता। न वे अधिक साहसी बनते हैं, न अधिक संयमी और न ही उनका चरित्र अधिक उदात्त होता है।



    इसके विपरीत, जब कोई व्यक्ति स्वयं के उपचार के लिए दर्शन को अपनाता है, तब उसका मन विशाल हो जाता है और उसके व्यक्तित्व से आत्मविश्वास झलकने लगता है। उसके जितना निकट जाओ, उसकी श्रेष्ठता उतनी ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे ऊँचे पर्वतों के साथ होता है। दूर से उनकी ऊँचाई उतनी स्पष्ट नहीं दिखाई देती। परन्तु निकट पहुँचने पर उनका वास्तविक विराट स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाता है। प्रिय लूसीलियस, वास्तविक दार्शनिक भी ऐसा ही होता है। वह जो सचमुच दर्शन का जीवन जीता है, न कि छल-कपट या शब्द-कौशल के सहारे। वह एक ऊँचे शिखर पर स्थित होता है, अद्भुत, उन्नत और वास्तव में महान। वह कृत्रिम उपायों से अपनी ऊँचाई नहीं बढ़ाता, न ही पंजों के बल खड़े होकर स्वयं को वास्तविकता से अधिक ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है। वह अपने वास्तविक कद से ही संतुष्ट रहता है। वह संतुष्ट क्यों न हो? वह उस ऊँचाई तक पहुँच चुका है जहाँ तक भाग्य का हाथ भी नहीं पहुँच सकता। इसलिए वह सामान्य मानवीय परिस्थितियों से ऊपर उठ जाता है और हर स्थिति में स्वयं के प्रति समान बना रहता है, चाहे उसका जीवन सहज रूप से आगे बढ़े या बाधाओं और कठिनाइयों से जूझता हुआ आगे बढ़े। ऐसी अटल स्थिरता उन कुतर्कों से प्राप्त नहीं हो सकती जिनकी चर्चा मैं कुछ समय पहले कर रहा था। मन उनसे खेलता अवश्य है किन्तु उससे कोई लाभ नहीं होता बल्कि वे दर्शन को उसकी ऊँची प्रतिष्ठा से गिराकर साधारण धरातल पर ले आते हैं। 

    मैं तुम्हें कभी-कभी ऐसे अभ्यास में लगे रहने से नहीं रोकूँगा। पर केवल तब, जब तुम्हारे पास करने के लिए कोई अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य न हो। किन्तु उनमें एक बड़ी बुराई यह है कि वे अपनी दिखावटी सूक्ष्मता से हमें आकर्षित कर लेते हैं, हमारा ध्यान बाँधे रखते हैं और हमें विलम्ब में डाल देते हैं। जबकि उसी समय हमें कहीं अधिक गंभीर और महत्त्वपूर्ण विषय बुला रहे होते हैं। वास्तव में, पूरे जीवन की अवधि भी केवल यह एक बात सीखने के लिए पर्याप्त नहीं पड़ती कि जीवन को स्वयं कोई अत्यधिक महत्त्व की वस्तु न समझा जाए। “तो क्या जीवन का संचालन अपने हाथ में ले लेना चाहिए?” तुम पूछते हो। हाँ, पर वह दूसरा कार्य है। अपने जीवन पर पूर्ण अधिकार किसी ने भी तब तक प्राप्त नहीं किया, जब तक उसने पहले स्वयं जीवन से अत्यधिक आसक्ति करना छोड़ नहीं दिया।


अभी के लिए विदा 

ज्ञान का पुनरावलोकन करने एवं सीमित आवश्यकता के बारे में -- पत्र - 108

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हें नोमेन्टम स्थित अपने ग्रामीण निवास से शुभकामनाएँ भेजता हूँ। मेरी कामना है कि तुम्हारा मन उत्कृष्ट बने। यह कामना वास्तव में देवताओं की कृपा की कामना भी है क्योंकि जो व्यक्ति सचमुच स्वयं पर उपकार करता है, उसे सभी देवताओं की सद्भावना और सहायता भी प्राप्त होती है। फिलहाल उन लोगों की इस धारणा को एक ओर रख दो कि हममें से प्रत्येक को एक संरक्षक देवता प्रदान किया गया है। ऐसा देवता नहीं जो उच्च श्रेणी का हो बल्कि निम्न श्रेणी का, जिन्हें ओविड (एक रोमन कवि) ने 'साधारण देवता' कहा है। फिर भी, इस विचार को अभी के लिए अलग रखते हुए यह स्मरण रखना कि हमारे पूर्वज, जो इस विश्वास को मानते थे, निश्चय ही स्टोइक विचारधारा के निकट रहे होंगे क्योंकि वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक व्यक्तिगत जीनियस (संरक्षक आत्मा) अथवा स्त्रियों के लिए, एक व्यक्तिगत जूनो (एक शक्तिशाली देवी) को नियुक्त मानते थे। किसी अन्य अवसर पर हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि क्या देवताओं के पास इतना अवकाश है कि वे सामान्य मनुष्यों के दैनिक कार्यों की भी देखभाल कर सकें। अभी के लिए इतना निश्चित जान लो कि चाहे हमें ऐसे संरक्षक मिले हों या हमें भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया हो, किसी व्यक्ति के लिए सबसे भयंकर अभिशाप यही है कि तुम प्रार्थना करो। वह स्वयं अपना ही शत्रु बन जाए।



    परन्तु तुम्हें यह प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं कि देवता किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति शत्रुतापूर्ण हो जाएँ जो दण्ड का अधिकारी प्रतीत होता है। मैं तो कहता हूँ कि वे उसके प्रति पहले से ही प्रतिकूल हैं, चाहे देखने में ऐसा लगे कि वह उनकी कृपा का आनंद ले रहा है। यदि तुम मानव जीवन की परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन उन्हें जैसी वे वास्तव में हैं, वैसा करो न कि जैसा उनका वर्णन किया जाता है तो तुम्हें ज्ञात होगा कि अधिकांश अवसरों पर हमारी विपत्तियाँ हमें कोई वास्तविक हानि नहीं पहुँचातीं। कितनी ही बार तथाकथित विपत्ति ही सुख का कारण और आरम्भ सिद्ध हुई है! कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि कोई व्यक्ति भारी प्रशंसा और सम्मान के बीच पदोन्नत होता गया, ऊँचे से ऊँचे पद पर पहुँचता गया। जबकि वास्तव में वह किसी खड़ी चट्टान के किनारे की ओर बढ़ रहा था। यहाँ तक कि उसका पहले का स्थान भी इतना ऊँचा था कि वहाँ से गिरने का जोखिम बना हुआ था। 

    किन्तु यदि तुम उस अंतिम सीमा को ध्यान में रखो जिसके आगे प्रकृति किसी को नहीं गिराती तो स्वयं पतन में भी स्वभावतः कुछ भी बुरा नहीं है। हमारे समस्त कार्यों का अंत निकट ही है। मैं फिर कहता हूँ, भाग्यशाली व्यक्ति का पतन भी निकट है और दुर्भाग्यग्रस्त व्यक्ति की मुक्ति भी निकट है। इन्हें लंबा तो हम स्वयं ही बनाते हैं। अपनी आशाओं और भय के कारण हम उन्हें खींचते चले जाते हैं। बुद्धिमानी इसी में है कि प्रत्येक बात का मूल्यांकन अपनी मरणशीलता को ध्यान में रखकर किया जाए। तुम्हें अपने आनंद को भी सीमित रखना चाहिए और अपने भय को भी। किसी भी वस्तु का बहुत लंबे समय तक आनंद न लेना ही उचित है ताकि किसी वस्तु से बहुत लंबे समय तक भयभीत भी न रहना पड़े।

    पर मैं इस दोष को केवल इसी सीमा तक क्यों सीमित करूँ? वास्तव में ऐसा कोई कारण नहीं है कि तुम किसी भी वस्तु को भयावह समझो। जो बातें हमें आतंकित और भयभीत करती हैं, वे केवल भ्रममात्र हैं। हममें से किसी ने भी सत्य का अन्वेषण नहीं किया। हम तो केवल अपने भय एक-दूसरे को सौंपते चले आते हैं। कोई भी इतना साहस नहीं करता कि उन बातों के निकट जाकर, जो लोगों को विचलित करती हैं, स्वयं भय के वास्तविक स्वरूप और उसके वास्तविक महत्व को समझे। भय की असत्यता और आधारहीनता आज भी इसलिए स्वीकार की जाती है क्योंकि किसी ने उसका खण्डन नहीं किया है। इसलिए हमें चाहिए कि तथ्यों की गहराई से जाँच करने के महत्व को समझें। तब हमें ज्ञात होगा कि जिन बातों से लोग डरते हैं, वे अल्पकालिक, अनिश्चित और वास्तव में हानिरहित होती हैं। हमारे मन का भ्रम ठीक वैसा ही है जैसा लुक्रेतियस ने कहा है—

“जैसे बच्चे अँधेरे में उन वस्तुओं से काँपते और डरते हैं जिन्हें वे देख नहीं पाते, वैसे ही हम भी दिन के उजाले में भयभीत रहते हैं।”

    तो फिर क्या? क्या हम, जो दिन के उजाले में भयभीत रहते हैं, किसी भी बच्चे से अधिक मूर्ख नहीं हैं? किन्तु, लुक्रेतियस, इस विषय में तुम भूल करते हो। ऐसा नहीं है कि हम दिन के उजाले में भयभीत होते हैं बल्कि हमने अपने जीवन से सम्बन्ध रखने वाली प्रत्येक वस्तु को अन्धकारमय बना लिया है। हमें कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता न यह कि वास्तव में हमारे लिए क्या हानिकारक है और न यह कि क्या हितकर है। हम जीवन भर बिना सोचे-समझे हर ओर भागते रहते हैं। परन्तु इससे न तो हम रुकते हैं और न ही अधिक सावधानी से कदम बढ़ाना सीखते हैं। तुम स्वयं देख सकते हो कि अँधेरे में उतावलेपन से दौड़ना कितना पागलपन है। हमारे व्यवहार का परिणाम यह होता है कि जब लौटना पड़ता है तो हमें अधिक समय लगता है। किन्तु यह जाने बिना कि हम कहाँ जा रहे हैं, हम उसी दिशा में और अधिक वेग से बढ़ते चले जाते हैं, जिस ओर हमारा अंधा आग्रह हमें ले जा रहा होता है।

    यदि हम चाहें, तो प्रकाश प्राप्त हो सकता है। किन्तु यह केवल एक ही प्रकार से संभव है। मानवीय और दैवीय विषयों का ऐसा ज्ञान प्राप्त करके जो केवल सतही न हो बल्कि मन पर स्थायी रूप से अंकित हो। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य बार-बार अपने ज्ञान का पुनरावलोकन करे, उसे अपने जीवन में लागू करे और निरन्तर यह जाँचता रहे कि वास्तव में कौन-सी वस्तुएँ अच्छी हैं, कौन-सी बुरी हैं, किन वस्तुओं को भूलवश अच्छा या बुरा कहा जाता है, क्या सम्माननीय है और क्या लज्जाजनक तथा दैवीय विधान (प्रोविडेन्स) का वास्तविक स्वरूप क्या है। मानव बुद्धि को भी इन्हीं सीमाओं तक बँधे रहने की आवश्यकता नहीं है। उसे तो यह स्वतंत्रता प्राप्त है कि वह स्वर्ग-मण्डल की सीमा से भी परे दृष्टि डाले और विचार करे कि यह जगत किस ओर अग्रसर है, इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई है और इतनी तीव्र गति से यह किस अंतिम अवस्था की ओर बढ़ रहा है। 

    किन्तु इस दिव्य चिंतन से अपने मन को हटाकर हमने उसे तुच्छ और निम्न विषयों में लगा दिया है तथा उसे लोभ का दास बना दिया है। हमने आकाश-मण्डल, उसकी सीमाओं और समस्त जगत का संचालन करने वाले उसके अधिपतियों की उपेक्षा कर दी, ताकि पृथ्वी को खोदकर यह खोज सकें कि उसमें से कौन-सी हानिकारक वस्तुएँ निकाली जा सकती हैं; मानो जो कुछ प्रकृति ने हमें सहज रूप से दिया था, उससे हम संतुष्ट ही न हों। हमारे दिव्य जनक ने जो कुछ हमारे लिए हितकारी था, उसे बिना हमारे खोजे ही सहज उपलब्ध करा दिया था। उन्होंने उसकी प्राप्ति के लिए हमें प्रतीक्षा नहीं कराई बल्कि उसे उदारतापूर्वक प्रदान किया। जो कुछ हमारे लिए हानिकारक था, उसे उन्होंने पृथ्वी की गहराइयों में छिपा दिया। इसलिए यदि किसी के विरुद्ध शिकायत की जा सकती है तो वह केवल हम स्वयं हैं। प्रकृति की इच्छा के विरुद्ध, जिसने उन विनाशकारी वस्तुओं को छिपाकर रखा था, हमने ही उन्हें खोजकर अपने विनाश के साधन बाहर निकाल लिए। हमने अपने मन को भोग-विलास के हवाले कर दिया। जबकि भोग-विलास ही सभी विपत्तियों का प्रारम्भ है और स्वयं को महत्त्वाकांक्षा, यश-लालसा तथा अन्य उतनी ही व्यर्थ और निरर्थक वस्तुओं के अधीन कर दिया।

    तो फिर मैं तुम्हें क्या करने की सलाह देता हूँ? यह नहीं कि तुम कोई नई बात करो क्योंकि जिन रोगों का हम उपचार करना चाहते हैं वे नए नहीं हैं। सबसे पहले स्वयं विचार करो कि वास्तव में क्या आवश्यक है और क्या अनावश्यक। जो आवश्यक है, वह हर स्थान पर मिल सकता है। लेकिन अनावश्यक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए ही मनुष्य को अपना सारा समय और परिश्रम लगाना पड़ता है। मैं यह नहीं कहता कि यदि तुम स्वर्णजटित शय्याओं और रत्नजड़ित पात्रों को तुच्छ समझो तो स्वयं पर गर्व करो। अनावश्यक वस्तुओं का तिरस्कार करने में कौन-सा विशेष सद्गुण है? अपने ऊपर तब गर्व करना, जब तुम आवश्यक वस्तुओं की भी अपेक्षा न रखो।राजसी वैभव का त्याग कर देना, विशालकाय जंगली सूअरों के मांस, राजहंसों की जिह्वाओं तथा विलासी भोजन की उन सब अति की इच्छा न करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। विलासिता की प्रवृत्ति तो इतनी विकृत हो जाती है कि वह अब किसी पूरे प्राणी को खाने में भी संतुष्ट नहीं होती बल्कि विभिन्न प्राणियों के केवल चुने हुए अंगों का स्वाद लेना चाहती है। 

    मैं तुम्हारी प्रशंसा तब करूँगा जब तुम साधारण रोटी की भी परवाह न करोगे और अपने मन को यह विश्वास दिला दोगे कि घास केवल पशुओं के चरने के लिए ही नहीं उगती बल्कि आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य के लिए भी भोजन बन सकती है। जब तुम यह समझ जाओगे कि हमारा पेट जिसे हम मानो किसी सुरक्षित भंडार की तरह महँगे व्यंजनों से भरते रहते हैं, वह वृक्षों की पत्तियों से भी भरा जा सकता है। हमें केवल अपनी भूख शांत करनी चाहिए। भोजन के प्रकार को लेकर आग्रह नहीं करना चाहिए। इससे क्या अंतर पड़ता है कि पेट में क्या गया? वह वहाँ अधिक समय तक रहने वाला तो नहीं है। तुम्हें ऐसी भोजन-मेज़ प्रिय लगती है जिस पर स्थल और समुद्र, दोनों से प्राप्त व्यंजन सजे हों। कुछ इसलिए अधिक प्रिय होते हैं कि वे बिल्कुल ताज़े लाए गए हैं। कुछ इसलिए कि उन्हें कृत्रिम रूप से खिलाकर-पिलाकर इतना मोटा कर दिया गया है कि वे अपने ही भार से फटने को हों और अपना आकार तक संभाल न पा रहे हों। तुम्हें ये सब व्यंजन उनके कलात्मक और आकर्षक विन्यास के कारण प्रिय लगते हैं। पर वास्तव में, चाहे उन्हें कितनी ही कठिनाई से प्राप्त किया गया हो और कितनी ही कुशलता से पकाया और मसालेदार बनाया गया हो, पेट में पहुँचने के बाद वे सब एक ही प्रकार की गंदगी में परिवर्तित हो जाते हैं। यदि तुम भोजन के सुखों का तिरस्कार करना चाहते हो तो यह सोचो कि अंततः तुम्हारा भोजन कहाँ पहुँचता है।

    मुझे स्मरण है कि जब अत्तालस ने ये बातें कही थीं, तब सब लोग उनकी कितनी प्रशंसा करते थे, “लंबे समय तक मैं धन-संपत्ति के मोह में पड़ा रहा। जहाँ-जहाँ भी मैं उसे चमकते हुए देखता, उसे देखकर चकित रह जाता और यह समझता था कि भीतर से भी वह वैसी ही होगी जैसी बाहर से दिखाई देती है। फिर एक अवसर पर मैंने किसी नगर की सम्पूर्ण समृद्धि का सार्वजनिक प्रदर्शन देखा। वहाँ चाँदी और सोने पर उकेरे गए पात्र थे। उनसे भी अधिक मूल्यवान पदार्थों से बनी वस्तुएँ थीं। ऐसे वस्त्र थे जो केवल हमारे राज्य की सीमाओं के बाहर से ही नहीं बल्कि हमारे शत्रुओं की सीमाओं के पार से मँगाए गए दुर्लभ रंगों से रँगे हुए थे। दोनों ओर असाधारण रूप और सौन्दर्य वाले दास और दासियाँ खड़े थे। संक्षेप में, साम्राज्य की अपार संपत्ति अपने वैभव के जो भी साधन प्रस्तुत कर सकती थी, वे सब वहाँ प्रदर्शित थे। मैंने मन ही मन कहा, ‘यह सब तो केवल उन इच्छाओं को और भड़काने का उपाय है, जो पहले ही पर्याप्त प्रबल हैं। धन का यह प्रदर्शन आखिर किसलिए है? क्या हम यहाँ केवल लोभ का पाठ सीखने के लिए एकत्र हुए हैं?’ वास्तव में, वहाँ से लौटते समय मेरे भीतर धन पाने की लालसा उतनी भी नहीं रही जितनी वहाँ जाते समय थी। मैंने धन की उपेक्षा इसलिए नहीं की कि वह अनावश्यक है बल्कि इसलिए कि वह तुच्छ है। क्या तुमने नहीं देखा कि इतनी सावधानी से व्यवस्थित और धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला वह सारा जुलूस कुछ ही घंटों में समाप्त हो गया? जो वस्तु पूरे एक दिन तक भी टिक नहीं सकती, क्या वही हमारे पूरे जीवन पर अधिकार कर ले? मेरे मन में यह विचार भी आया कि वह समस्त वैभव अपने स्वामियों के लिए भी उतना ही अनावश्यक था, जितना उसे देखने वाले दर्शकों के लिए।”

    “इसी कारण, जब भी मेरी आँखें इस प्रकार के वैभव पर ठहरती हैं या जब मैं किसी भव्य भवन, उत्तम प्रशिक्षण पाए हुए दासों की पूरी पंक्ति अथवा सुन्दर कहारों के कंधों पर उठाई जा रही पालकी को देखता हूँ तो मैं अपने आप से कहता हूँ, ‘तुम क्यों इतने प्रभावित और विस्मित हो रहे हो? यह तो केवल एक प्रदर्शन है।’ लोग इन वस्तुओं के वास्तविक स्वामी नहीं होते। वे केवल उनका प्रदर्शन करते हैं। जिस क्षण ये वस्तुएँ हमें आकर्षित करती हैं, उसी क्षण वे नष्ट होने की दिशा में भी बढ़ रही होती हैं। इसके बजाय अपना ध्यान वास्तविक धन-संपदा की ओर लगाओ। थोड़े में संतुष्ट रहना सीखो। पूरे उत्साह तथा निर्भीकता के साथ यह घोषणा करो—

‘हमारे पास जल है। हमारे पास साधारण दलिया है। आओ, हम सुख के लिए स्वयं ज्यूपिटर से भी स्पर्धा करें।’

मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि हम इन वस्तुओं के बिना भी यही चुनौती दें। अपने सुखी जीवन का आधार सोने और चाँदी को बनाना जितना लज्जाजनक है, उतना ही लज्जाजनक उसे केवल जल और साधारण दलिया पर आधारित करना भी है।

    “यदि ये वस्तुएँ भी उपलब्ध न हों तो मैं क्या करूँ?” क्या तुम यह पूछ रहे हो कि घोर निर्धनता की औषधि क्या है? भूख की अंतिम सीमा स्वयं उपवास और मृत्यु है। यदि ऐसा न मानो तो फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि तुम अपार धन-संपत्ति के दास हो या अत्यन्त अल्प साधनों के? यदि भाग्य किसी वस्तु को तुमसे छीन ही सकता है, तो यह क्या महत्त्व रखता है कि वह वस्तु बहुत बड़ी थी या बहुत छोटी? यह जल और यह साधारण दलिया भी किसी दूसरे के अधिकार में हो सकते हैं। वास्तव में स्वतंत्र वह नहीं है, जिस पर भाग्य का प्रभाव कम पड़ता हो। स्वतंत्र तो वह है, जिस पर भाग्य का कोई भी प्रभाव न पड़ सके। यही सत्य है। यदि तुम ज्यूपिटर को, जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, चुनौती देना चाहते हो तो तुम्हें भी किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं रखनी चाहिए।”

अत्तालस हमें यही शिक्षा दिया करते थे। यही शिक्षा प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य को दी है। यदि तुम बार-बार इन बातों पर मनन करने का प्रयास करोगे तो तुम्हारा लक्ष्य वास्तव में सुखी बनना होगा, केवल सुखी दिखाई देना नहीं अर्थात तुम अपने लिए सुखी बनना चाहोगे, दूसरों की दृष्टि में नहीं।

बुद्धिमान व्यक्तियों के व्यवहार के बारे में -- पत्र - 107 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम यह जानना चाहते हो कि क्या एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान व्यक्ति की सहायता कर सकता है। हम कहते हैं कि बुद्धिमान वह है जो समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण है और जिसने परम श्रेष्ठता के शिखर को प्राप्त कर लिया है। तब प्रश्न उठता है जो व्यक्ति पहले ही परम कल्याण को प्राप्त कर चुका है, उसकी सहायता करना कैसे संभव है?



    सज्जन व्यक्ति एक-दूसरे के लिए सहायक होते हैं क्योंकि उनमें से प्रत्येक दूसरे के सद्गुणों का अभ्यास कराता है और उसकी प्रज्ञा को उसके अनुरूप स्थिति में बनाए रखता है। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को किसी ऐसे साथी की आवश्यकता होती है जिसके साथ वह विचारों की तुलना कर सके और उनकी गहराई से जाँच-पड़ताल कर सके। जैसे कुशल पहलवानों का प्रशिक्षण अभ्यास से होता है। संगीतज्ञ अपने समान दक्ष संगीतज्ञों की संगति से प्रेरित होते हैं, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी अपने सद्गुणों को सक्रिय बनाए रखने की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार वह स्वयं अपने सद्गुणों को सक्रिय रखता है, उसी प्रकार दूसरा बुद्धिमान व्यक्ति भी उन्हें सक्रिय बनाए रखने में उसकी सहायता करता है। अब प्रश्न यह है कि एक बुद्धिमान दूसरे की सहायता कैसे करेगा? वह उसे प्रेरित करेगा और सम्माननीय (सदाचारपूर्ण) कर्मों के अवसरों की ओर उसका ध्यान आकर्षित करेगा। इसके अतिरिक्त, बुद्धिमान व्यक्ति अपने कुछ विचारों को व्यक्त करेगा और दूसरे को अपनी खोजों से सीखने का अवसर देगा क्योंकि स्वयं उसके लिए भी सदैव कुछ-न-कुछ नया खोजने और अपने चिंतन का विस्तार करने की संभावना बनी रहती है। 

    दुष्ट व्यक्ति दूसरे दुष्ट व्यक्ति को हानि पहुँचाता है और उसके क्रोध को भड़काकर, उसके विषाद का समर्थन करके तथा उसकी इन्द्रिय-भोग की प्रवृत्तियों की प्रशंसा करके उसे और भी अधिक दुष्ट बना देता है। जब दुष्ट लोग अपनी-अपनी बुराइयों को एक साथ जोड़ देते हैं, तब वे अपनी सबसे निकृष्ट अवस्था में पहुँच जाते हैं और अनेक अपराध मिलकर एक बड़े दुष्कर्म का रूप ले लेते हैं। इसके विपरीत, एक सज्जन व्यक्ति दूसरे सज्जन व्यक्ति की सहायता करता है। 

   "पर कैसे?" तुम पूछते हो। वह उसे प्रसन्नता प्रदान करेगा और उसके आत्मविश्वास को दृढ़ करेगा। उनकी पारस्परिक शान्ति को देखकर दोनों का आनन्द और भी बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त, वे एक-दूसरे को कुछ विषयों का ज्ञान भी देंगे क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति भी सब कुछ नहीं जानता। यदि वह सब कुछ जानता भी हो, तब भी कोई दूसरा व्यक्ति किसी तथ्य तक पहुँचने का अधिक संक्षिप्त मार्ग खोज सकता है और उसे बता सकता है, जिससे सम्पूर्ण विषय को समझना अधिक सरल हो जाए। एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान की सहायता केवल अपनी शक्ति से ही नहीं करेगा। यह तो स्वाभाविक है, बल्कि उस व्यक्ति की अपनी शक्ति का भी उपयोग करेगा जिसकी वह सहायता कर रहा है। निस्सन्देह, दूसरा व्यक्ति अकेला छोड़ दिए जाने पर भी अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सकता है जैसे, धावक की गति उसकी अपनी होती है। फिर भी, उत्साहवर्धन मिलने पर उसे सहायता अवश्य मिलती है। 

    "वास्तव में एक बुद्धिमान दूसरे की सहायता नहीं करता। प्रत्येक अपनी ही सहायता करता है। यदि तुम इसे समझना चाहते हो तो उनमें से किसी एक की विशिष्ट क्षमता को हटा दो। तब दूसरे के पास सक्रिय करने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।" यदि तुम इस प्रकार तर्क करते हो तो तुम्हें यह भी कहना पड़ेगा कि मधु में कोई मिठास नहीं होती। सोचो, कोई व्यक्ति मधु खाने की इच्छा करता है। वह उसके स्वाद से इसलिए आकर्षित होता है क्योंकि उसकी जिह्वा और तालु उस स्वाद के अनुरूप हैं। पर यदि वे उस अवस्था में न हों तो वही मधु उसे अप्रिय लगेगा। वास्तव में, कुछ लोग रोग के कारण मधु को भी कड़वा अनुभव करते हैं। इसी प्रकार, दोनों बुद्धिमानों का समुचित अवस्था में होना आवश्यक है, एक इस योग्य हो कि सहायता कर सके और दूसरा इस योग्य कि सहायता ग्रहण कर सके। 

    "परन्तु जिस वस्तु में पहले से ही अत्यधिक ऊष्मा हो, उसे और गरम करना व्यर्थ है, उसी प्रकार जो व्यक्ति परम कल्याण को प्राप्त कर चुका है, उसकी सहायता करना भी निरर्थक है। क्या एक ऐसा किसान, जिसके पास खेती के सभी उपकरण पहले से उपलब्ध हैं, किसी दूसरे से उपकरण माँगता है? क्या अग्रिम पंक्ति के लिए पर्याप्त रूप से शस्त्र-सज्जित सैनिक को और हथियारों की आवश्यकता होती है? उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। वह जीवन के लिए पर्याप्त रूप से सुसज्जित और सशस्त्र है।" इन आपत्तियों का मेरा उत्तर यह है: जिस वस्तु में अत्यधिक ऊष्मा हो, उसे भी उस तापमान को बनाए रखने के लिए ऊष्मा की निरन्तर आपूर्ति की आवश्यकता होती है। 

     "किन्तु ऊष्मा तो अपने स्वभाव से ही उष्ण होती है।" सबसे पहले, तुम ऐसी वस्तुओं की तुलना कर रहे हो जो एक-दूसरे से अत्यन्त भिन्न हैं। ऊष्मा एक ही प्रकार की वस्तु है जबकि सहायता अनेक प्रकार की हो सकती है। दूसरे, ऊष्मा को उष्ण बने रहने के लिए किसी अतिरिक्त ऊष्मा की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन की उचित अवस्था को बनाए नहीं रख सकता, जब तक कि वह अपने समान बुद्धिमान व्यक्तियों को अपना मित्र न बनाए ताकि वह उनके साथ अपने सद्गुणों को साझा कर सके। इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सभी सद्गुणों के बीच परस्पर मैत्री होती है। इसलिए एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान की सहायता इस प्रकार करता है कि वह अपने समान व्यक्ति के सद्गुणों से प्रेम करता है और बदले में अपने सद्गुणों को भी उसके प्रेम के योग्य बनाता है। समान गुण वाली वस्तुएँ परस्पर आनन्द प्रदान करती हैं, विशेषकर जब वे सम्माननीय (सदाचारपूर्ण) हों और उन्हें ग्रहण करने वाले लोग एक-दूसरे की श्रेष्ठता का पारस्परिक सम्मान और अनुमोदन करना जानते हों। 

    फिर, बुद्धिमान व्यक्ति की बुद्धि को पूर्ण दक्षता के साथ केवल दूसरा बुद्धिमान व्यक्ति ही सक्रिय कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे केवल एक मनुष्य ही दूसरे मनुष्य की बुद्धि को विवेकपूर्ण ढंग से सक्रिय कर सकता है। अतः जैसे बुद्धि को प्रेरित करने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है, वैसे ही पूर्ण बुद्धि को सक्रिय करने के लिए पूर्ण बुद्धि की ही आवश्यकता होती है।

     'सहायता' शब्द का प्रयोग उस स्थिति में भी किया जाता है जब लोग हमें मध्यम श्रेणी की वस्तुएँ उपलब्ध कराते हैं जैसे, धन-संपत्ति, प्रभाव, सुरक्षा तथा जीवन में उपयोगी या वांछनीय अन्य साधन। इन बातों के सम्बन्ध में बुद्धिमान व्यक्ति को मूर्ख से भी सहायता मिल सकती है। किन्तु वास्तविक सहायता वह है जो किसी व्यक्ति के मन को प्रकृति के अनुरूप सक्रिय करे। ऐसी सहायता जो सहायता करने वाले के अपने सद्गुण तथा उस व्यक्ति के सद्गुण, जिसकी सहायता की जा रही है, दोनों के माध्यम से सम्पन्न हो। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि इससे सहायता करने वाले को भी लाभ न पहुँचे क्योंकि जब कोई दूसरे के सद्गुण को सक्रिय करता है, तब वह अनिवार्य रूप से अपने ही सद्गुण को भी सक्रिय करता है। 

    परन्तु यदि तुम परम कल्याण और उसे उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को भी एक ओर रख दो, तब भी बुद्धिमान व्यक्ति एक-दूसरे की सहायता कर सकते हैं। क्योंकि एक बुद्धिमान के लिए दूसरे बुद्धिमान को प्राप्त करना स्वयं में ही चयन के योग्य है। प्रत्येक सद्गुणी व्यक्ति स्वभावतः प्रत्येक अन्य सद्गुणी व्यक्ति को प्रिय होता है। इसलिए उनमें से प्रत्येक एक सद्गुणी व्यक्ति से उतना ही स्नेह रखता है जितना स्वयं अपने प्रति। अपने इस कथन को सिद्ध करने के लिए मुझे इस विषय को छोड़कर एक दूसरे प्रश्न पर आना होगा। क्या बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने ही विचार से निर्णय करेगा या वह किसी दूसरे से भी परामर्श लेगा? सामान्य सार्वजनिक और निजी कार्यों में अर्थात जिसे हम मानवीय जीवन की सामान्य परिस्थितियाँ कह सकते हैं, उसे दूसरे का परामर्श लेना ही पड़ता है। इन विषयों में उसे अन्य लोगों की सलाह की आवश्यकता होती है, ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर, नाविक, विधिवेत्ता और न्यायाधीश को भी कभी-कभी दूसरों की सलाह लेनी पड़ती है। इसलिए एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान की सहायता उसे उचित कार्य-पद्धति का सुझाव देकर करता है। जैसा कि मैंने कहा है, उच्च तथा गंभीर विषयों में भी वह सम्माननीय (सदाचारपूर्ण) बातों पर अपने विचार साझा करके तथा अपने चिंतन और मनन का योगदान देकर उपयोगी सिद्ध होता है। इतना ही नहीं, प्रकृति के अनुरूप तो यह भी है कि मनुष्य अपने मित्रों को अपनाए और उनकी उन्नति में उतना ही आनन्द अनुभव करे जितना अपनी स्वयं की उन्नति में करता है। वास्तव में, यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो सद्गुण हमारे भीतर अधिक समय तक टिक नहीं सकेगा क्योंकि सद्गुण हमारे भावों और सद्भावनाओं के सक्रिय अभ्यास से ही पुष्ट और विकसित होता है।

    प्रत्येक सद्गुण हमें यह आदेश देता है कि हम अपनी वर्तमान परिस्थितियों का सर्वोत्तम उपयोग करें। भविष्य के बारे में विचार करें। सोच-विचार करके निर्णय लें और अपने मन को एकाग्र रखें। एकाग्रता और कार्यकुशलता किसी सहायक साथी के होने से और अधिक सुदृढ़ हो जाती है। इसी कारण सद्गुणी व्यक्ति ऐसे मनुष्य की खोज करेगा जो या तो पहले से ही पूर्ण बुद्धिमान हो अथवा पूर्णता के अत्यन्त निकट पहुँच चुका हो। ऐसे पूर्ण व्यक्ति से उसे जो सहायता प्राप्त होगी, वह यह है कि उसकी योजनाएँ उस साझा प्रज्ञा के द्वारा अधिक समर्थ बन जाएँगी जो दोनों में समान रूप से विद्यमान है। कहा जाता है कि लोग दूसरों के मामलों में अपनी अपेक्षा अधिक सूझ-बूझ रखते हैं। यह बात उन लोगों पर लागू होती है जो आत्म-प्रेम के कारण अंधे हो जाते हैं या संकट के समय भय से इतने व्याकुल हो उठते हैं कि अपना ही हित नहीं देख पाते। जब मनुष्य चिंता से मुक्त और भय से परे हो जाता है, तभी वह वास्तव में बुद्धिमान बनता है। फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें बुद्धिमान व्यक्ति भी अपने मामलों की अपेक्षा दूसरों के मामलों में अधिक स्पष्टता से देख पाता है। इसके अतिरिक्त, वे एक-दूसरे को वह अत्यन्त मधुर और सम्माननीय उपहार भी देते हैं—“एक जैसी इच्छाएँ और एक जैसे द्वेष।” साथ मिलकर कार्य करने पर वे उत्कृष्ट परिणाम उत्पन्न करते हैं। 

    मैंने तुम्हारी इस जिज्ञासा का समाधान कर दिया है। हालाँकि इसका उचित स्थान उन विषयों में था जिनकी चर्चा मैं अपने नीतिशास्त्र संबंधी ग्रंथों में कर रहा हूँ। जैसा कि मैं तुम्हें बार-बार बताता हूँ। यह समझो कि ऐसे प्रश्नों के माध्यम से हम केवल अपनी बुद्धि का अभ्यास कर रहे हैं। किन्तु मेरा मन बार-बार यही सोचता है। इस विषय से मुझे क्या लाभ होगा? यह मुझे अधिक साहसी, अधिक न्यायप्रिय और अधिक संयमी कैसे बनाएगा? मैं अभी कर्म के लिए तैयार नहीं हूँ। मुझे अभी भी वैद्य की आवश्यकता है। तुम मुझसे ऐसे ज्ञान की माँग क्यों करते हो जिसका कोई वास्तविक उपयोग नहीं है? तुमने मुझसे बड़े-बड़े वचन दिए थे। लेकिन जो परिणाम मुझे दिखाई देते हैं, वे अत्यन्त अल्प हैं। तुमने कहा था कि यदि चारों ओर तलवारें चमक रही हों, यदि तलवार की धार मेरे गले पर रख दी जाए, तब भी मैं निर्भय रहूँगा। तुमने कहा था कि यदि चारों ओर अग्नि धधक रही हो या यदि अचानक उठी हुई प्रचण्ड आँधी मेरी नाव को समुद्र में इधर-उधर उछाल रही हो, तब भी मैं सुरक्षित रहूँगा। इसलिए मुझे ऐसी साधना सिखाओ जिससे मैं सुख-भोग और यश, दोनों का तिरस्कार कर सकूँ। उसके बाद तुम मुझे जटिल प्रश्नों का समाधान करना, दुरूह बातों को स्पष्ट करना और गूढ़ विषयों का भेदन करना सिखाना। अभी तो मुझे वही सिखाओ जो अनिवार्य है।


अभी के लिए विदा 

Monday, 3 August 2026

ग्रंथों के अध्ययन के विषय में -- पत्र - 106 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारा प्रश्न ऐसी बात से संबंधित है जिसे जानने का कोई प्रयोजन नहीं है, सिवाय इसके कि उसे जान लिया जाए। फिर भी, केवल इसी कारण से तुम उसे शीघ्र जान लेना चाहते हो और उन ग्रंथों की प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं हो जिन्हें मैं इस समय संपूर्ण नीतिशास्त्र के विषय पर तैयार कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अभी दे दूँगा। पर उससे पहले मैं यह लिखना चाहता हूँ कि तुम्हें ज्ञान प्राप्त करने की अपनी प्रबल इच्छा को किस प्रकार संयमित रखना चाहिए। मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारी यह तीव्र जिज्ञासा कहीं तुम्हारे लिए ही हानिकारक न बन जाए। तुम्हें प्रत्येक उस विषय को नहीं अपनाना चाहिए जो तुम्हारे सामने आ जाए। न ही प्रत्येक विषय की संपूर्ण गहराई में लोभपूर्वक उतर जाना चाहिए। किसी विषय का एक अंश भी तुम्हें उसके समग्र स्वरूप का बोध करा सकता है। हमें अपने सामर्थ्य के अनुसार ही भार उठाना चाहिए। अपनी क्षमता से अधिक बोझ अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए। जितना पीने की इच्छा हो, उतना नहीं बल्कि जितना धारण कर सको, उतना ही पीना चाहिए। हाँ, केवल अपना दृष्टिकोण उचित बनाए रखो। समय आने पर तुम उतना ही धारण करने में समर्थ हो जाओगे, जितना तुम्हारी इच्छा होगी। मन जितना अधिक ग्रहण करता है, उतना ही अधिक विस्तृत होता जाता है।



    मुझे स्मरण है कि अत्तालस (Attalus) हमें किस प्रकार शिक्षा दिया करते थे, जब हम निरंतर उनके व्याख्यानों में उपस्थित रहते थे। हम सबसे पहले पहुँचते और सबसे अंत में लौटते थे। यहाँ तक कि जब वे टहल रहे होते, तब भी हम उनसे विभिन्न विषयों का विवेचन करने का आग्रह करते थे क्योंकि वे केवल शिष्यों को स्वीकार ही नहीं करते थे बल्कि स्वयं भी उन्हें खोजते थे। वे कहा करते थे, “गुरु और शिष्य, दोनों का उद्देश्य एक ही होना चाहिए। गुरु का उद्देश्य प्रगति कराना और शिष्य का उद्देश्य प्रगति करना।” जो व्यक्ति किसी दार्शनिक के साथ अध्ययन करता है, उसे प्रतिदिन अपने साथ कुछ-न-कुछ लाभ लेकर लौटना चाहिए या तो अधिक स्वस्थ मन लेकर या ऐसा मन जो उपचार ग्रहण करने के लिए पहले से अधिक खुला हो। ऐसा वह अवश्य करेगा क्योंकि दर्शन की शक्ति इतनी महान है कि वह केवल अपने विद्यार्थियों की ही नहीं बल्कि संयोगवश उपस्थित रहने वालों की भी सहायता करती है। जो लोग धूप में निकलते हैं, उनका रंग साँवला हो जाता है, चाहे वे इस उद्देश्य से बाहर न निकले हों। जो लोग कुछ देर इत्र की दुकान में बैठे रहते हैं, वे वहाँ की सुगंध अपने साथ ले जाते हैं। उसी प्रकार जो लोग किसी दार्शनिक के सान्निध्य में रहते हैं, वे भी अनिवार्य रूप से अपने साथ कोई-न-कोई लाभ लेकर जाते हैं, चाहे उन्होंने उसके लिए कोई विशेष प्रयास न किया हो। ध्यान दो, मैं यह कहता हूँ, “चाहे वे कोई प्रयास न करें” न कि “चाहे वे उसका विरोध ही क्यों न करें।”

    “तुम्हारा क्या अभिप्राय है? क्या हम ऐसे लोगों को नहीं जानते जिन्होंने वर्षों तक किसी दार्शनिक के साथ अध्ययन किया, फिर भी जिन पर उसका तनिक भी रंग नहीं चढ़ा?” निश्चय ही जानता हूँ। ऐसे लोग भी जो अत्यंत नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं। पर मैं उन्हें दर्शन के विद्यार्थी नहीं बल्कि केवल अनुयायी या साथ लगे रहने वाले लोग कहूँगा। कुछ लोग सीखने के लिए नहीं, केवल सुनने के लिए आते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम वाणी, संगीत या कथा का आनंद लेने के लिए रंगमंच की ओर आकर्षित हो जाते हैं। तुम देख सकते हो कि ऐसे श्रोताओं का अधिकांश भाग दार्शनिक प्रवचन को केवल मनोरंजन का साधन समझता है। वे न तो अपने किसी दोष का त्याग करना चाहते हैं, न ही ऐसा कोई जीवन-सिद्धांत अपनाना चाहते हैं जिसके अनुसार अपने आचरण को संयमित कर सकें। वे तो केवल कानों को सुख पहुँचाने वाला आनंद प्राप्त करने आते हैं। कुछ लोग तो अपनी लेखन-पट्टिकाएँ भी साथ लाते हैं। पर विषय-वस्तु को लिखने के लिए नहीं बल्कि केवल सुंदर वाक्यांशों को उतार लेने के लिए ताकि बाद में उन्हें दोहरा सकें। उनसे दूसरों को उतना ही कम लाभ होता है, जितना स्वयं उन्हें उनसे हुआ होता है। कुछ लोग प्रभावशाली भाषणों से भावविभोर हो जाते हैं और वक्ता की भावनाओं से स्वयं भी प्रभावित हो उठते हैं। उनके चेहरे पर उत्साह दिखाई देता है। उनका मन उद्दीप्त हो उठता है। वे उन फ़्राइजीय (प्राचीन भूभाग अथवा क्षेत्र) नपुंसकों के समान उन्मत्त हो जाते हैं, जो बाँसुरी की ध्वनि पर संकेत मिलते ही उन्माद में आ जाते हैं। उन्हें बहा ले जाने वाली चीज़ खोखले शब्दों की ध्वनि नहीं बल्कि विषय की गरिमा और सौंदर्य होता है। जब कोई मृत्यु के भय के विरुद्ध निर्भीकता से बोलता है या भाग्य की चंचलता का साहसपूर्वक सामना करने की शिक्षा देता है, तब वे तुरंत वैसा ही आचरण करने के लिए तैयार हो जाते हैं जैसा उन्होंने सुना है। वे अत्यंत ग्रहणशील होते हैं। उन्हें जैसा बनने के लिए कहा जाता है, वे वैसा ही बनने को तैयार हो जाते हैं। यदि वह प्रेरणा उनके भीतर बनी रहे और यदि उनका यह उत्तम संकल्प लोगों द्वारा, जो सदाचरण के सबसे बड़े निरुत्साहक होते हैं, नष्ट न कर दिया जाए। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपने भीतर उत्पन्न उस संकल्प को अपने घर तक सुरक्षित ले जा पाते हैं।

    श्रोता को प्रेरित करना और उसके भीतर उचित आचरण की इच्छा जगाना सरल है क्योंकि प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य के भीतर सद्गुणों की नींव और उनके बीज पहले से ही रख दिए हैं। हम सब ऐसे ही गुणों के लिए जन्म लेते हैं। जब कोई हमें प्रेरणा देता है तो हमारे भीतर का सद्गुण मानो निद्रा से जाग उठता है। क्या तुमने ध्यान नहीं दिया कि जब रंगमंच पर ऐसी पंक्तियाँ कही जाती हैं जिन्हें हम सब सत्य मानते और स्वीकार करते हैं, तब पूरा दर्शक-वर्ग तालियों की गूँज से भर उठता है? निर्धनता बहुत-सी वस्तुओं से वंचित होती है, पर लोभ हर वस्तु से वंचित होता है। लोभी मनुष्य किसी का भी हितैषी नहीं होता। सबसे बढ़कर वह स्वयं अपने ही प्रति अहितकारी होता है।

    सबसे निकृष्ट अपराधी भी इन पंक्तियों पर ताली बजाता है और अपने ही दुर्गुणों पर किए गए प्रहार को सुनकर प्रसन्न होता है। तब ज़रा सोचो कि जब यही बातें कोई दार्शनिक कहता है। हितकारी उपदेशों को काव्य की लय में ढालकर इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि वे अशिक्षित लोगों के मन में और भी गहराई तक उतर जाएँ तो उनका प्रभाव कितना अधिक होता होगाक्योंकि, जैसा कि क्लेआन्थेस कहा करते थे—

“जिस प्रकार हमारी श्वास की ध्वनि संकरे घुमावों वाली तुरही से होकर गुजरती है और उसके फैले हुए मुख से निकलकर अधिक प्रबल हो जाती है, उसी प्रकार छंद के कठोर अनुशासन में ढल जाने पर हमारे विचार भी अधिक प्रभावशाली हो उठते हैं।”

जब वही बातें साधारण गद्य में कही जाती हैं तो उन पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता और न ही वे उतना प्रभाव उत्पन्न करती हैं। परंतु जब किसी उत्कृष्ट विचार के साथ छंद का निश्चित विन्यास, दीर्घ और ह्रस्व मात्राओं का क्रम जुड़ जाता है, तब वही विचार मानो अधिक शक्तिशाली भुजा द्वारा फेंका गया हो, इस प्रकार अधिक प्रभावशाली हो उठता है। धन के प्रति आसक्ति न रखने के विषय में बहुत कुछ कहा जाता है। लंबे-लंबे उपदेश दिए जाते हैं कि वास्तविक संपत्ति मन में होती है, धन-कोष में नहीं। यह कि वास्तव में धनी वही है जो अपनी निर्धनता के अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है और थोड़े में ही अपने को समृद्ध बना लेता है। किन्तु हमारे मन पर कहीं अधिक प्रभाव तब पड़ता है, जब हम इस प्रकार के पद्य सुनते हैं, जिसकी आवश्यकताएँ सबसे कम हैं, उसी मनुष्य को सबसे कम आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति जितना पर्याप्त है, उसी को चाह सकता है, उसके पास वही सब है जिसकी उसे आवश्यकता है।

    जब हम ऐसी बातें सुनते हैं तो हमें स्वीकार करना ही पड़ता है कि वे सत्य हैं। यहाँ तक कि जो लोग अपने पास जो कुछ है उससे कभी संतुष्ट नहीं होते, वे भी इन बातों की प्रशंसा करते हैं, तालियाँ बजाते हैं और ऊँचे स्वर में कहते हैं कि वे धन से घृणा करते हैं। जब तुम लोगों में ऐसी प्रतिक्रिया देखो तो अवसर का पूरा लाभ उठाओ। उन पर अपने सभी तर्कों का भार डाल दो। उन सूक्ष्म भेदों, न्याय-युक्तियों, कुतर्कों तथा अन्य चतुर किन्तु निष्फल युक्तियों को पीछे छोड़ दो। लोभ के विरुद्ध बोलो। भोग-विलास के विरुद्ध बोलो। जब तुम देखो कि तुम्हारी बातों का प्रभाव पड़ रहा है और श्रोता प्रभावित हो रहे हैं, तब और भी अधिक दृढ़ता से बोलो। तुम्हें आश्चर्य होगा कि ऐसा भाषण कितना लाभदायक सिद्ध होता है, जब उसका उद्देश्य केवल उपचार करना हो और वह पूर्णतः अपने श्रोताओं के कल्याण के लिए समर्पित हो। युवाओं के हृदयों को सम्माननीय और उचित आचरण के प्रति प्रेम की ओर मोड़ना सरल है। जब लोगों को अभी भी शिक्षा दी जा सकती है अर्थात जब वे केवल थोड़े-से ही भ्रष्ट हुए हों, तब सत्य उन पर अपना प्रभाव स्थापित कर देता है। यदि उसे कोई योग्य प्रवक्ता मिल जाए।

    जहाँ तक मेरा अपना संबंध है, जब मैं अत्तालस को दुर्गुणों, भ्रांतियों और जीवन की सभी बुराइयों के विरुद्ध अपने भाषण के उत्कर्ष पर बोलते हुए सुनता था, तब मुझे प्रायः समस्त मानव जाति पर दया आने लगती थी। मुझे लगता था कि अत्तालस एक महान व्यक्ति हैं, जो मानवीय परिस्थितियों की सर्वोच्च सीमा से भी ऊपर उठ चुके हैं। वे स्वयं कहा करते थे कि वे एक राजा हैं। पर मुझे लगता था कि वे राजा से भी बढ़कर हैं क्योंकि वे ऐसे व्यक्ति थे जो राजाओं की भी निंदा कर सकते थे। जब वे निर्धनता की प्रशंसा करने लगते, यह तर्क देते हुए कि हमारी मूलभूत आवश्यकताओं से अधिक की सारी संपत्ति केवल ऐसा बोझ है जो हमें दबाती है, तब मैं प्रायः व्याख्यान से निकलते समय निर्धन बन जाना चाहता था। जब वे हमारे भोग-विलास की कठोर आलोचना करते, पवित्र शरीर, संयमित आहार और निर्मल मन की प्रशंसा करते, ऐसा मन जो केवल अवैध भोगों से ही नहीं बल्कि अनावश्यक भोगों से भी मुक्त हो तब मैं भी अपने भोगी पेट पर संयम लगाने का निश्चय कर लेता था।

    ल्यूसीलियस, उस समय मैंने जो कुछ संकल्प किए थे, उनमें से कुछ आज भी मेरे साथ बने हुए हैं। उस समय मैं पूरे उत्साह के साथ आत्म-संयम के मार्ग पर चला था। जब बाद में मैंने फिर से अपेक्षाकृत सामान्य तथा सामाजिक जीवन-शैली अपना ली, तब भी उन अच्छे अभ्यासों में से कुछ को मैंने कभी नहीं छोड़ा। तब से लेकर आज तक मैंने सीप (oysters) और कुकुरमुत्ते (mushrooms) खाना छोड़ रखा है। ये वास्तव में पोषक भोजन नहीं हैं। ये तो केवल ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन हैं जो पहले से तृप्त व्यक्ति को भी और अधिक खाने के लिए उकसाते हैं। पेटू मनुष्य की यही इच्छा होती है कि वह अपनी क्षमता से अधिक पेट भरता रहे। ये पदार्थ आसानी से निगल लिए जाते हैं और उतनी ही आसानी से उल्टी होकर बाहर भी आ जाते हैं। उसी समय से मैंने सुगंधित तेलों का प्रयोग भी त्याग दिया। मेरे विचार में शरीर की सबसे उत्तम सुगंध यही है कि उसमें किसी प्रकार की कृत्रिम सुगंध न हो। तब से मैंने अपने पेट को मदिरा से भी मुक्त रखा है। जीवन भर मैंने गर्म स्नानागारों (सार्वजनिक स्नान-गृहों) से भी दूरी बनाए रखी है। मुझे लगता है कि शरीर को अत्यधिक गर्म करके फिर पसीना बहाकर उसे निचोड़ देना न तो किसी उपयोग का कार्य है और न ही संयमपूर्ण बल्कि यह विलासिता और भोग-वृत्ति का प्रतीक है। अन्य कुछ अभ्यास, जिन्हें मैंने पहले छोड़ दिया था, समय के साथ फिर मेरे जीवन में लौट आए। किंतु अब भी, यद्यपि मैं उनका पूर्ण त्याग नहीं करता, उन पर अत्यंत कठोर संयम रखता हूँ। ऐसा संयम लगभग पूर्ण विरक्ति (abstinence) के समान ही है बल्कि कई बार उससे भी अधिक कठिन होता है क्योंकि कुछ आदतों को पूरी तरह छोड़ देना उन्हें केवल सीमित कर देने की अपेक्षा अधिक सरल होता है।

    जब से मैंने तुम्हें यह बताना शुरू किया है कि युवावस्था में मैं दर्शन के प्रति जितनी उत्कटता से समर्पित था, उतनी शीघ्रता से अब वृद्धावस्था में भी उसके पीछे नहीं दौड़ता, तब मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मैं पाइथागोरस के प्रति गहरे अनुराग से अभिभूत था। सोतियोन ने मुझे बताया कि पाइथागोरस ने पशु-आहार का त्याग क्यों किया था। बाद में सेक्स्टियस ने भी ऐसा ही क्यों किया। दोनों के कारण अलग-अलग थे। परंतु दोनों ही अत्यंत प्रभावशाली थे। सेक्स्टियस का मत था कि मनुष्य बिना पशुओं का वध किए भी पर्याप्त भोजन प्राप्त कर सकता है। जब रक्तपात को स्वाद और भोग के लिए अपनाया जाता है, तब मनुष्य में क्रूरता की आदत विकसित हो जाती है। वह यह भी कहा करता था कि विलासिता के साधनों को कम करना चाहिए। वह तर्क देकर सिद्ध करता था कि भोजन में अत्यधिक विविधता हमारे शरीर की प्रकृति के अनुकूल नहीं है तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। 

    दूसरी ओर, पाइथागोरस समस्त प्राणियों के परस्पर संबंध और आत्माओं के एक रूप से दूसरे रूप में गमन की बात करता था। यदि उसकी बात पर विश्वास किया जाए तो कोई भी आत्मा कभी नष्ट नहीं होती बल्कि केवल उस अत्यल्प क्षण के लिए अपनी क्रिया से विराम लेती है, जब वह एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। अंततः हम जानेंगे कि उसे फिर से मनुष्य का शरीर प्राप्त करने से पहले कितने युगों तक और कितनी बार एक निवास से दूसरे निवास में जाना पड़ता है। इस प्रकार पाइथागोरस ने मनुष्यों में दुष्कर्मों का भय उत्पन्न किया, विशेष रूप से पितृहत्या का। क्योंकि यदि किसी शरीर में उनके किसी संबंधी की आत्मा निवास कर रही हो तो वे अनजाने में ही अपने माता या पिता की आत्मा पर चाकू या अपने दाँतों से आघात कर सकते हैं। जब सोतियोन ने इन सब बातों का अपने तर्कों द्वारा विस्तार से वर्णन किया, तब उसने आगे कहा—

क्या तुम यह विश्वास नहीं करते कि आत्माएँ एक शरीर के बाद दूसरे शरीर में प्रवेश करती हैं। जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह वास्तव में केवल आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरण है? क्या तुम यह विश्वास नहीं करते कि इन पालतू पशुओं, इन वन्य जीवों और इन समुद्री प्राणियों में ऐसी आत्मा निवास कर रही है जो कभी किसी मनुष्य की थी? क्या तुम यह विश्वास नहीं करते कि इस संसार में कोई भी वस्तु वास्तव में नष्ट नहीं होती बल्कि केवल अपना स्थान बदलती है। जैसे आकाशीय पिंड निश्चित कक्षाओं में निरंतर घूमते रहते हैं, वैसे ही प्राणियों की आत्माएँ भी युग-युगांतर तक चक्र लगाती रहती हैं और अंततः वहीं लौट आती हैं जहाँ से उन्होंने यात्रा आरंभ की थी? महान पुरुषों ने इन बातों पर विश्वास किया है।  अतः यदि तुम चाहो तो निर्णय देने से विरत रहो। परंतु मन को खुला रखो। यदि ये बातें सत्य हैं तो पशु-आहार का त्याग करने का अर्थ है किसी भी प्राणी को हानि न पहुँचाना। यदि ये असत्य हैं, तब भी इससे केवल मितव्ययिता का ही पालन होता है। क्रूरता का त्याग करने से तुम्हारा क्या नुकसान होगा? मैं तो केवल तुम्हें सिंहों और गिद्धों के भोजन से ही वंचित कर रहा हूँ।

    इन बातों से प्रेरित होकर मैंने पशु-आहार का त्याग कर दिया। एक वर्ष बाद यह आदत मेरे लिए न केवल सहज हो गई बल्कि आनंददायक भी लगने लगी। मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि मेरा मन पहले की अपेक्षा अधिक प्रखर और सजीव हो गया है। आज भी मुझे संदेह है कि शायद वास्तव में ऐसा ही था। क्या तुम जानना चाहोगे कि फिर मैंने इसका त्याग क्यों कर दिया? जब मैं युवा था, वह टाइबेरियस के शासन के आरंभिक वर्षों का समय था। उस समय विदेशी मूल के धर्मों का दमन किया जा रहा था। पशु-आहार से विरत रहना उन धर्मों के अनुयायी होने का प्रमाण माना जाता था। इसलिए मेरे पिता के आग्रह पर जो लोकनिंदा से नहीं डरते थे बल्कि दर्शन से ही घृणा करते थे, मैं अपनी पुरानी भोजन-प्रणाली पर लौट आया। वास्तव में, मुझे पहले की तरह अच्छा भोजन करने के लिए मनाना उनके लिए कोई कठिन काम नहीं था। अत्तालस प्रायः ऐसे बिस्तर की सिफारिश किया करते थे जो शरीर के भार से धँस न जाए। मैं आज भी, वृद्धावस्था में भी, उसी प्रकार का बिस्तर उपयोग करता हूँ। ऐसा बिस्तर जिस पर लेटने के बाद शरीर का कोई निशान नहीं रह जाता। 

    तुम्हें यह सब बताने का मेरा उद्देश्य केवल यह दिखाना था कि जब नए-नए विद्यार्थी को प्रेरित करने और उत्साहित करने वाला कोई व्यक्ति मिल जाता है, तब वह सदाचार के प्रत्येक रूप के प्रति कितनी तीव्र उत्सुकता से भर उठता है। परंतु कुछ दोष शिक्षकों की ओर से भी होता है क्योंकि वे हमें यह सिखाते हैं कि किसी विषय पर तर्क-वितर्क कैसे किया जाए, यह नहीं कि जीवन कैसे जिया जाए। कुछ दोष विद्यार्थियों की ओर से भी होता है, क्योंकि वे अपने मन को श्रेष्ठ बनाने के लिए नहीं बल्कि अपनी वाक्पटुता को निखारने के उद्देश्य से अध्ययन करने आते हैं। परिणाम यह हुआ है कि जो कभी दर्शन था, वह अब केवल भाषाशास्त्र बनकर रह गया है।

    किसी भी विद्याक्षेत्र का अध्ययन करते समय मनुष्य का उद्देश्य क्या है, इसका बहुत महत्त्व होता है। जब कोई भावी साहित्य-विद्वान वर्जिल की अपनी प्रति का अध्ययन करता है और उसकी यह उत्कृष्ट पंक्ति पढ़ता है, “समय उड़ता चला जाता है और फिर कभी लौटकर नहीं आता।” तो उसके मन में यह विचार नहीं आता कि “हमें सावधान हो जाना चाहिए। यदि हमने शीघ्रता नहीं की तो हम पीछे रह जाएँगे। यह क्षणभंगुर समय निरंतर भागा जा रहा है और हमें भी अपने साथ बहाए लिए जा रहा है। हम लापरवाही में बहते चले जा रहे हैं। हम सदा टालमटोल करते रहते हैं। अवसर तीव्र गति से निकलता जा रहा है और फिर भी हम विलंब किए जाते हैं।” नहीं, वह तो इसे केवल इस उद्देश्य से पढ़ता है कि यह देख सके कि जब-जब वर्जिल समय के तीव्र गति से बीतने की बात करता है, तब-तब वह 'उड़ता है' (fugit लैटिन शब्द जो उड़ कर जल्दी से चले जाना से संबंधित है) शब्द का ही प्रयोग करता है, जैसे कि निम्नलिखित पंक्तियों में—

“हम नश्वर प्राणियों के जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले उड़ जाते हैं। 

उनके स्थान पर रोग, दुःखद वृद्धावस्था, कष्ट और पीड़ा आ जाती है। 

अंत में कठोर तथा निर्मम मृत्यु हमें अपने साथ ले जाती है।”

    जो व्यक्ति दर्शन की ओर दृष्टि रखता है, वह इन्हीं पंक्तियों को पढ़कर उनका उचित अर्थ ग्रहण करता है। वह कहता है, “वर्जिल कभी यह नहीं कहता कि समय ‘बीतता’ है। वह सदा यही कहता है कि समय ‘उड़ता’ है। इसका कारण यह है कि उड़ना गति का सबसे तीव्र रूप है। उसका आशय यह है कि जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले हमसे दूर हो जाते हैं। फिर हम स्वयं भी उस सबसे तीव्र धावक के वेग के अनुरूप अपने कदम क्यों न बढ़ाएँ? हमारे श्रेष्ठ दिन शीघ्रता से बीतते जा रहे हैं। उनके बाद निकृष्ट दिन आने वाले हैं। हमारा जीवन एक भंडारण-पात्र के समान है। उसमें जो सबसे शुद्ध अंश होता है, वही सबसे पहले निकाल लिया जाता है। सारी तलछट तथा मटमैला अंश नीचे बैठ जाता है। क्या हम यह होने देंगे कि हमारे जीवन का सर्वोत्तम भाग दूसरों के लिए निकल जाए और अपने लिए केवल अवशेष ही बचाकर रखें? इन पंक्तियों को सदैव स्मरण रखो। इन्हें अपने लिए देववाणी के समान मानो—

“हम नश्वर प्राणियों के जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले उड़ जाते हैं।”

    सबसे अच्छे दिन ही क्यों? क्योंकि जो शेष रह जाता है, वह अनिश्चित होता है। सबसे अच्छे दिन ही क्यों? क्योंकि युवावस्था में हम सीखने में समर्थ होते हैं। उस समय हमारा मन अभी भी लचीला होता है और उसे श्रेष्ठ मार्ग की ओर मोड़ा जा सकता है। यही वह अवस्था है जो कठोर परिश्रम के लिए, अध्ययन द्वारा बुद्धि को और श्रम द्वारा शरीर को विकसित करने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त होती है। जो समय उसके बाद बचता है, वह अधिक धीमा, अधिक थका हुआ और जीवन के अंत के अधिक निकट होता है। इसलिए हमें अपने सभी व्यर्थ के मनोरंजनों को त्याग देना चाहिए और पूरे मन से केवल इसी एक लक्ष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम क्षणभंगुर समय की तीव्र गति को तब समझें, जब बहुत देर हो चुकी हो और उसे रोक पाना असंभव हो। हमें प्रत्येक नए दिन का इस प्रकार स्वागत करना चाहिए कि मानो वही जीवन का सबसे उत्तम दिन हो जो हमें प्राप्त होने वाला है। उसे अपने जीवन की पूँजी में जोड़ते जाना चाहिए। जीवन निरंतर उड़ता चला जा रहा है। हमें उसे पकड़ लेना चाहिए।

    जो व्यक्ति साहित्य-विद्वान की दृष्टि से पढ़ता है, वह इस बात पर विचार नहीं करता कि हमारे जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले क्यों चले जाते हैं, कि उनके स्थान पर रोग आ जाता है, कि वृद्धावस्था। जबकि हम अब भी अपनी युवावस्था में ही मग्न रहते हैं, धीरे-धीरे हमारे सिर पर आ खड़ी होती है। इसके बजाय वह कहता है कि वर्जिल सदैव 'रोग' और 'वृद्धावस्था' शब्दों का साथ-साथ प्रयोग करता है। वास्तव में वह ऐसा करता भी है। उचित कारण से करता है क्योंकि वृद्धावस्था एक ऐसा रोग है जिसका कोई उपचार नहीं है। वह आगे कहता है, इसके अतिरिक्त, वर्जिल वृद्धावस्था के साथ एक स्थिर विशेषण का प्रयोग करता है। वह उसे ‘दुखद’ कहता है—

‘और उनके स्थान पर रोग
और दुखद वृद्धावस्था आ जाती है...’

एक अन्य स्थान पर वह कहता है—

‘जहाँ पीले पड़ चुके रोग और कठोर वृद्धावस्था निवास करते हैं।’

    एक ही सामग्री से प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने अनुरूप विचार ग्रहण करता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। एक ही घास के मैदान में बैल घास खोजता है, कुत्ता खरगोश खोजता है और सारस छिपकली खोजता है। जब तीन व्यक्ति, एक प्राचीन वस्तुओं का अध्येता, एक साहित्य-विद्वान और एक दार्शनिक, सिसेरो की कृति ऑन द रिपब्लिक (On the Republic) को पढ़ते हैं तो उनमें से प्रत्येक का ध्यान अलग-अलग बातों पर जाता है। दार्शनिक इस बात पर आश्चर्य करता है कि न्याय के विरुद्ध इतने अधिक तर्क कैसे प्रस्तुत किए जा सकते हैं। उसी अंश को पढ़ते हुए प्राचीन वस्तुओं का अध्येता इस तथ्य पर ध्यान देता है कि रोम के दो ऐसे राजा थे, जिनमें से एक का कोई पिता नहीं था और दूसरे की कोई माता नहीं थी। सर्वियस की माता के विषय में कोई निश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है। एन्कस के विषय में यह नहीं कहा जाता कि उसका कोई पिता था। केवल इतना कहा जाता है कि वह नूमा का पौत्र था। 

    वह यह भी उल्लेख करता है कि जिस पदाधिकारी को हम आज 'तानाशाह' (dictator) कहते हैं, उसे प्राचीन काल में 'जनता का प्रधान' (master of the populace) कहा जाता था। इसका प्रमाण आज भी ऑगरों के अभिलेखों में मिलता है। इसका एक और प्रमाण यह है कि तानाशाह द्वारा नियुक्त अधिकारी को 'अश्वदल का प्रधान' (master of horse) कहा जाता है। वह यह भी इंगित करता है कि रोम्यूलस की मृत्यु सूर्यग्रहण के समय हुई थी। राजतंत्र के काल में भी जनता के समक्ष अपील करने की व्यवस्था विद्यमान थी। इसका उल्लेख पोंटिफ़ों के अभिलेखों में भी मिलता है। फेनेस्टेला तथा कुछ अन्य लेखक भी इसी मत का समर्थन करते हैं। 

    जब साहित्य-विद्वान इन्हीं ग्रंथों की व्याख्या करता है तो वह सबसे पहले यह बताता है कि सिसेरो ने 'वास्तव में' (re ipsa) के स्थान पर रिप्से (reapse) और 'स्वयं' (se ipse) के स्थान पर 'सेप्से' (sepse) शब्दों का प्रयोग किया है। इसके बाद वह भाषा-प्रयोग में समय के साथ आए परिवर्तनों की चर्चा करता है। उदाहरण के लिए, सिसेरो लिखता है, “उसके हस्तक्षेप ने हमें फिर से उसी लाइम लाइन (lime line) तक लौटा दिया,” अर्थात दौड़ की समाप्ति-रेखा तक। जिसे हम आज दौड़ की चॉक लाइन (chalk line) कहते हैं, उसे प्राचीन लेखक लाइम लाइन अथवा चुने की रेखा (lime line) कहा करते थे। इसके बाद वह एनियस की विभिन्न पंक्तियाँ एकत्र करता है, विशेषकर वे जो स्किपियो अफ़्रीकानस के विषय में हैं—

“जिसकी सहायता का मूल्य
न तो कोई नागरिक चुका सकता था,
और न ही कोई शत्रु।”

    इन पंक्तियों के आधार पर वह यह निष्कर्ष निकालता है कि प्राचीन लेखकों के यहाँ ऑप्स (ops - सहायता) शब्द का अर्थ केवल 'सहायता' ही नहीं बल्कि 'प्रयत्न' या 'परिश्रम' भी होता था। क्योंकि एनियस का आशय यह है कि न तो कोई नागरिक और न ही कोई शत्रु, स्किपियो के परिश्रम का मूल्य कभी चुका सकता था। इसके बाद वह यह जानकर स्वयं को बधाई देता है कि उसे वर्जिल की इस पंक्ति का स्रोत मिल गया है—

“जिसके ऊपर स्वर्ग का विशाल द्वार गर्जना करता है।”

वह कहता है कि एनियस ने यह पंक्ति होमर से ली थी। वर्जिल ने उसे एनियस से ग्रहण किया क्योंकि सिसेरो ने अपनी उसी कृति On the Republic में एनियस का यह द्विपद उद्धृत किया है—

“यदि किसी मनुष्य के लिए स्वर्ग पर चढ़ना उचित है,
तो केवल मेरे लिए ही स्वर्ग का महान द्वार खुला है।”

    परंतु मेरा अपना उद्देश्य न तो प्राचीन वस्तुओं का अध्येता बनना है और न ही साहित्य-विद्वान। मेरा कार्य कुछ और ही है। मैं केवल यह सलाह देता हूँ कि जब हम दार्शनिकों को पढ़ें या उन्हें सुनें, तब हमारा ध्यान अपने उस लक्ष्य पर केंद्रित होना चाहिए, जो सुखमय जीवन की प्राप्ति है। हमें प्राचीन शब्दों, नए गढ़े गए शब्दों, विचित्र रूपकों और अलंकारों की खोज में नहीं लगे रहना चाहिए बल्कि ऐसे हितकारी उपदेशों तथा साहस और प्रेरणा से परिपूर्ण वचनों की तलाश करनी चाहिए जिन्हें हम शीघ्र ही अपने जीवन में व्यवहार में ला सकें। हमें उन्हें इतनी अच्छी तरह आत्मसात कर लेना चाहिए कि हमारे शब्द कर्म में परिवर्तित हो जाएँ।

    परंतु जिन लोगों ने मानवजाति के साथ सबसे बड़ा अहित किया है, उनमें सबसे बुरे वे हैं जो दर्शन को किसी व्यवसाय या शिल्प की भाँति धन लेकर सिखाते हैं। स्वयं अपना जीवन अपनी ही शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत ढंग से जीते हैं क्योंकि जिन दोषों की वे दूसरों में निंदा करते हैं, उन्हीं दोषों के वे स्वयं प्रत्यक्ष उदाहरण होते हैं। इस प्रकार वे यह भली-भाँति सिद्ध कर देते हैं कि उनकी शिक्षा कितनी निष्फल है। 

    ऐसी शिक्षा से मुझे उतना ही लाभ हो सकता है जितना उस नाविक से, जिसे समुद्र में तूफ़ान आने पर स्वयं समुद्री बीमारी घेर ले। जब लहरें तीव्र वेग से उठ रही हों, पतवार को दृढ़ता से थामने वाला हाथ चाहिए हो, समुद्र की प्रचंड शक्ति से संघर्ष करना पड़े और प्रबल हवा में पाल समेटने हों, तब ऐसे नाविक का क्या उपयोग जो स्वयं घबराकर उल्टियाँ करने लगे? जीवन तो किसी भी समुद्री यात्रा की अपेक्षा कहीं अधिक भीषण तूफ़ानों से घिरा हुआ है। मुझे ऐसा व्यक्ति नहीं चाहिए जो केवल उपदेश देता रहे। मुझे ऐसा व्यक्ति चाहिए जो मेरा मार्गदर्शन कर सके। 

    वे जो कुछ कहते हैं, श्रोताओं की भीड़ के सामने जो भी सुंदर भाषण देते हैं, वह सब किसी और से लिया हुआ होता है। वे शब्द प्लेटो, ज़ेनो, क्रिसिपस, पोसिडोनियस अथवा दर्शन के अन्य महान आचार्यों के होते हैं। वे यह कैसे सिद्ध करेंगे कि वे विचार वास्तव में उनके अपने हैं? मैं बताता हूँ, वे तभी ऐसा सिद्ध कर सकते हैं, जब वे स्वयं अपने उपदेशों के अनुसार जीवन व्यतीत करें। 

    अब मैं वह सब कह चुका हूँ जो मैं तुम्हें बताना चाहता था। अब मैं तुम्हारे अनुरोध का पालन करूँगा। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं एक नए पत्र में दूँगा ताकि किसी ऐसे कठिन विषय को पढ़ते समय, जिसके लिए गंभीर और एकाग्र मन से सुनना आवश्यक है, तुम अनावश्यक रूप से थक न जाओ।


अभी के लिए विराम 


जीवन और परिस्थितियों के बारे में -- पत्र - 105 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारी समझ-बूझ और विवेक कहाँ चले गए? तुम्हारे चरित्र की दृढ़ता का क्या हुआ? क्या तुम इतनी तुच्छ-सी बात से व्याकुल हो रहे हो? तुम्हारे दासों ने देखा कि तुम व्यस्त हो। उन्होंने इसे भाग निकलने का अवसर समझ लिया। यदि तुम्हें धोखा देने वाले तुम्हारे मित्र होते... चलो, प्रचलित किन्तु गलत शब्द का ही प्रयोग कर लें ताकि उनके मित्रोचित व्यवहार न करने का दोष और भी अधिक स्पष्ट हो तो निश्चय ही तुम्हारे सारे कामों की हानि होती। परंतु इस स्थिति में तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगड़ा। तुमने केवल ऐसे लोगों को खोया है जो तुम्हारी अच्छी सेवा नहीं करते थे और जो तुम्हें एक कठिन स्वामी समझते थे। 



    इस घटना में न तो कुछ असाधारण है और न ही अप्रत्याशित। ऐसी बातों पर व्यथित होना उतना ही हास्यास्पद है जितना स्नानागार में पानी के छींटे पड़ने, भीड़ में धक्का लग जाने या कीचड़ भरे मार्ग पर कपड़े मैले हो जाने की शिकायत करना। जीवन भी हम पर वही परिस्थितियाँ लादता है जिनका सामना हम स्नानागार, भीड़ या यात्रा के दौरान करते हैं। कुछ बातें जान-बूझकर किए गए आघात होंगी। कुछ केवल संयोगवश घटित होंगी। जीवन फूलों की सेज नहीं है। तुम एक लंबी यात्रा पर निकले हो। इस मार्ग में तुम्हारा ठोकर खाना, किसी से टकरा जाना, गिर पड़ना, थक जाना और यह कह उठना... “अब मैं मर जाना चाहता हूँ”, अनिवार्य है। हालाँकि यह केवल एक क्षणिक उद्गार होगा। किसी स्थान पर तुम किसी साथी को पीछे छोड़ दोगे, किसी दूसरे स्थान पर किसी का अंतिम संस्कार करोगे और कहीं किसी अन्य के कारण भयभीत हो जाओगे। इसी प्रकार की घटनाओं से भरे इस ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर तुम्हें आगे बढ़ना होगा। 

    यदि कोई सचमुच मरना चाहता है तो उसे अपने को उन सभी बातों के लिए तैयार कर लेना चाहिए जो आगे आने वाली हैं। उसे यह जान लेना चाहिए कि वह उस स्थान पर आ पहुँचा है जहाँ गर्जन सुनाई देता है, जहाँ-,विलाप और प्रतिशोधी चिंताओं ने अपना निवास बना रखा है।  जहाँ भयंकर रोग और कठोर वृद्धावस्था निवास करते हैं।

    इन्हीं लोगों के बीच तुम्हें अपना जीवन बिताना है। तुम इन बातों से बच नहीं सकते, पर उनसे ऊपर अवश्य उठ सकते हो; और यदि तुम बार-बार उन पर विचार करोगे तथा भविष्य में आने वाली बातों का पहले से अनुमान लगाते रहोगे, तो ऐसा करने में सफल हो जाओगे। 

    जिस परिस्थिति के लिए मनुष्य लंबे समय से स्वयं को तैयार करता रहा हो, उसका सामना वह अधिक धैर्य के साथ करता है। जिन कष्टों की पहले से अपेक्षा की गई हो, उन्हें भी सहा जा सकता है। इसके विपरीत, जो लोग तैयार नहीं होते, वे अत्यंत तुच्छ बातों से भी भयभीत हो जाते हैं। इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमने किसी भी संभावना की उपेक्षा न की हो। क्योंकि प्रत्येक नई बात अधिक गंभीर प्रतीत होती है। इसलिए निरंतर चिंतन यह सुनिश्चित करेगा कि तुम किसी भी संकट का सामना एक नए सैनिक की तरह न करो। 

    “मेरे दास मुझे छोड़कर भाग गए।” हाँ, और किसी दूसरे व्यक्ति के दासों ने उससे चोरी की है, उस पर अपराध का आरोप लगाया है, उसकी हत्या की है, उसके साथ विश्वासघात किया है, उसे पैरों तले रौंदा है, उसे विष देकर या झूठे अभियोग लगाकर नष्ट करने का प्रयास किया है। जिन बातों को तुम अपने दुखों की सूची मानते हो, उनका अनुभव बहुत-से लोग कर चुके हैं। बहुत-से लोग आगे भी करेंगे। अनेक प्रकार के अस्त्र हमारी ओर लक्षित हैं। उनमें से कुछ पहले ही हमें घायल कर चुके हैं। कुछ हमारी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और शीघ्र ही हम तक पहुँचने वाले हैं। कुछ, जो किसी और के लिए छोड़े गए थे, हमें केवल छूते हुए निकल जाते हैं। जिन बातों का सामना करने के लिए हमारा जन्म हुआ है, उनसे हमें कभी आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। किसी को भी उनकी शिकायत नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे सभी मनुष्यों के लिए समान हैं। मेरा आशय यह है कि वे समान हैं क्योंकि जिन कष्टों से कुछ लोग बच जाते हैं, वे भी ऐसे कष्ट हैं जिन्हें वे भोग सकते थे। कोई नियम तभी न्यायसंगत होता है जब वह सब पर समान रूप से लागू होता है, न कि केवल तब जब उसका अनुभव सबको हो। अपने मन को न्यायप्रिय बनाओ। अपनी नश्वरता का जो कर हमें चुकाना है, उसे बिना शिकायत चुकाएँ।

    शीत ऋतु शीत लेकर आती है। हमें ठिठुरना पड़ता है। ग्रीष्म ऋतु फिर उष्णता लेकर आती है। हमें पसीना बहाना पड़ता है। मौसम की अनियमितता हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। हमें बीमार पड़ना पड़ता है। कहीं हमारा सामना हिंसक पशुओं से होगा तो कहीं ऐसे मनुष्यों से, जो किसी भी हिंसक पशु से अधिक खतरनाक होते हैं। हमें जल से भी हानि पहुँचेगी और अग्नि से भी। हम इस व्यवस्था को बदल नहीं सकते। हम केवल इतना कर सकते हैं कि एक सज्जन पुरुष के योग्य दृढ़ चरित्र धारण करें ताकि जीवन की आकस्मिक घटनाओं को साहसपूर्वक सह सकें और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखें। प्रकृति इस दृश्य जगत का संचालन परिवर्तन के माध्यम से करती है। बादलों से घिरे आकाश के बाद निर्मल आकाश आता है। शांत समुद्र के बाद वह उथल-पुथल से भर उठता है। वायु बारी-बारी से चलती है। रात्रि के बाद दिन आता है। आकाश का एक भाग उदित होता है और दूसरा अस्त हो जाता है। इन्हीं परस्पर विरोधी परिवर्तनों के कारण संसार का अस्तित्व बना रहता है। हमें अपने मन को इसी नियम के अनुरूप ढालना चाहिए। उसका अनुसरण करना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए। जो कुछ भी घटित हो, हमें यह समझना चाहिए कि उसका घटित होना आवश्यक था। प्रकृति को दोष देने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। जिसे सुधारा नहीं जा सकता, उसे धैर्यपूर्वक सहना ही सर्वोत्तम है। जो दैवी सत्ता समस्त घटनाओं के क्रम का संचालन करती है, उसके साथ बिना शिकायत चलना चाहिए। जो सैनिक अपने सेनापति के पीछे चलते हुए कुड़कुड़ाता है, वह अच्छा सैनिक नहीं होता।

    अतः आओ, हम अपने भाग में आए आदेशों को निरंतर उत्साह और दृढ़ता के साथ स्वीकार करें। इस अत्यंत सुंदर विश्व द्वारा निर्धारित मार्ग को न छोड़ें क्योंकि हमारे भविष्य के समस्त अनुभव उसी के साथ गुंथे हुए हैं। आओ, इस विराट जगत के संचालक ज्यूपिटर को हमारे अपने क्लेआन्थेस के उन उत्कृष्ट पदों में संबोधित करें, जिन्हें मैं वाग्मिता के आचार्य सिसेरो के उदाहरण का अनुसरण करते हुए अनुवाद करने का साहस कर रहा हूँ। यदि ये तुम्हें पसंद आएँ तो उनका श्रेय मुझे देना। यदि पसंद न आएँ, तो समझ लेना कि मैंने केवल सिसेरो का अनुकरण किया है—

हे पिता, उच्च आकाश के स्वामी,
जहाँ भी तुम्हारी इच्छा हो, मेरा मार्गदर्शन करो। 
मैं तत्पर हूँ और शीघ्र ही आज्ञा का पालन करूँगा।

यदि मैं अनिच्छुक होकर भी कराहूँ,
तो भी मुझे जाना ही होगा,
जो कार्य मैं सद्गुणी होता तो अपनी इच्छा से करता,
उसी को अब मुझे विवश होकर दुःख सहते हुए करना पड़ेगा।

भाग्य इच्छुक मनुष्य का मार्गदर्शन करता है,
और अनिच्छुक को घसीटकर ले जाता है।

    हमें इसी प्रकार जीना और इसी प्रकार बोलना चाहिए कि भाग्य हमें सदैव तैयार और तत्पर पाए। यही वह दृढ़ चरित्र है जिसने स्वयं को भाग्य के प्रति समर्पित कर दिया है। इसके विपरीत वह दुर्बल और पतित मनुष्य है, जो संघर्ष करता रहता है, विश्व-व्यवस्था के प्रति बुरा विचार रखता है और स्वयं को सुधारने के बजाय देवताओं को सुधारना अधिक उचित समझता है।


अभी के लिए विदा 

क्या शुभ है के बारे में -- पत्र - 104 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारे पत्रों का उत्तर देने में मुझे जो कुछ विलंब हुआ है, उसका कारण अत्यधिक व्यस्तता नहीं है। इस बहाने पर विश्वास मत करना। मेरे पास पर्याप्त समय है। जो भी समय चाहता है, उसके पास भी पर्याप्त समय होता है। किसी के पीछे काम नहीं पड़ा रहता बल्कि लोग स्वयं काम के पीछे भागते हैं और व्यस्त रहने को अपनी समृद्धि का प्रमाण समझते हैं। तो फिर ऐसी कौन-सी बात थी जिसने मुझे तुरंत तुम्हें उत्तर लिखने से रोक दिया? इसका कारण यह था कि तुम्हारा प्रश्न मेरे व्यापक कार्य का एक भाग है। जैसा कि तुम जानते हो, मेरा उद्देश्य नीतिशास्त्र पर एक विस्तृत ग्रंथ तैयार करना है, जिसमें उससे संबंधित सभी प्रश्नों का क्रमबद्ध और विस्तारपूर्वक विवेचन हो। इसलिए मैं यह सोच रहा था कि क्या तुम्हें तब तक प्रतीक्षा करने के लिए कहूँ, जब तक उस विषय का क्रम न आ जाए या फिर निर्धारित क्रम को छोड़कर पहले ही तुम्हें अपना निर्णय बता दूँ। किन्तु चूँकि तुम्हारा प्रश्न बहुत दूर से मेरे पास पहुँचा है इसलिए मैंने उचित नहीं समझा कि तुम्हें और अधिक प्रतीक्षा कराऊँ। अतः मैं इस विषय को उसके निर्धारित क्रम से अलग करके प्रस्तुत करूँगा। तुम्हारे माँगे बिना भी उससे संबंधित अन्य आवश्यक बातें तुम्हें लिख भेजूँगा।


 

    क्या तुम सोच रहे हो कि वे कौन-सी बातें होंगी? वे ऐसी बातें हैं जिन्हें जानना उपयोगी होने की अपेक्षा अधिक रुचिकर होता है जैसे तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर, क्या ‘शुभ’ एक भौतिक वस्तु है?

    कोई शुभ वस्तु, जहाँ तक वह हित पहुँचाती है, क्रिया करती है और जो क्रिया करता है, वह भौतिक होता है।शुभ वस्तु मन पर प्रभाव डालती है और एक प्रकार से उसे आकार देती तथा उसका गठन करती है। आकार देना तथा गठन करना भौतिक वस्तु के ही गुण हैं। शरीर के शुभ भौतिक हैं। इसलिए, चूँकि मन भी भौतिक है, मन के शुभ भी भौतिक हैं। चूँकि मनुष्य स्वयं भौतिक है इसलिए मनुष्य का शुभ भी भौतिक होना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो वस्तुएँ मनुष्य का पोषण करती हैं तथा उसके स्वास्थ्य को बनाए रखती या पुनः स्थापित करती हैं, वे भौतिक हैं; अतः मनुष्य का शुभ भी भौतिक है।

    मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस बात में कोई संदेह होगा कि भावनाएँ भी भौतिक होती हैं, जैसे क्रोध, प्रेम और शोक (तुम्हारे प्रश्न से बाहर की एक बात का उल्लेख करूँ तो) क्योंकि निश्चय ही तुम यह स्वीकार करते हो कि वे हमारे चेहरे की अभिव्यक्ति बदल देती हैं, हमारे माथे पर बल डाल देती हैं, हमारे मुख को शिथिल कर देती हैं, लज्जा से चेहरा लाल कर देती हैं या उसे पीला पड़ जाने देती हैं। तो क्या तुम यह समझते हो कि शरीर पर इतने स्पष्ट चिह्न किसी अभौतिक वस्तु द्वारा अंकित किए जा सकते हैं?

यदि भावनाएँ भौतिक हैं, तो मन की दुर्बलताएँ भी, जैसे लोभ, क्रूरता और वे दोष जो गहरे जड़ पकड़ चुके हैं और असाध्य बन गए हैं, भौतिक ही हैं। इसलिए दुर्गुण भी भौतिक है। उसके सभी रूप जैसे, दुष्टता, ईर्ष्या और अहंकार भी भौतिक हैं। अतः सद्गुण भी भौतिक हैं। पहला कारण यह है कि वे इन दुर्गुणों के विपरीत हैं। दूसरा यह कि वे भी तुम्हें उसी प्रकार के संकेत प्रदान करते हैं। तुम किसी मनुष्य की आँखों में साहस से उत्पन्न तेज, विवेक से उत्पन्न एकाग्रता, मर्यादा से उत्पन्न संयम और शांति, प्रसन्नता से उत्पन्न संतुलन, कठोरता से उत्पन्न दृढ़ता तथा कोमल स्वभाव से उत्पन्न सहजता को देख सकते हो। जो वस्तुएँ शरीर के रंग और रूप में परिवर्तन लाती हैं, वे स्वयं भौतिक होती हैं क्योंकि वे शरीरों पर ही अपना प्रभाव डालती हैं। जिन सभी सद्गुणों का मैंने उल्लेख किया है, वे शुभ हैं। उनके आधार पर जो कुछ भी है, वह भी शुभ है।

    निश्चय ही तुम्हें इसमें कोई संदेह नहीं होगा कि जो कुछ स्पर्श कर सकता है या जिसका स्पर्श किया जा सकता है। वह भौतिक है जैसा कि लुक्रेतियस कहता है, “भौतिक वस्तु के अतिरिक्त न तो कोई किसी को स्पर्श कर सकता है और न ही स्वयं स्पर्श किया जा सकता है।”

    जिन बातों का मैंने उल्लेख किया है, उनमें से कोई भी शरीर को स्पर्श किए बिना उसमें परिवर्तन उत्पन्न नहीं कर सकती। इसलिए वे सब भौतिक हैं। 

    इसके अतिरिक्त, जो भी वस्तु आगे बढ़ाने, बाध्य करने, रोकने या संयमित करने की शक्ति रखती है, वह भौतिक होती है। तो फिर क्या भय हमें नहीं रोकता? क्या साहसिकता हमें आगे नहीं बढ़ाती और वीरता हमें प्रेरित नहीं करती? क्या संयम हमें नियंत्रित नहीं करता और हमें वापस नहीं बुलाता? क्या प्रसन्नता हमें ऊँचा नहीं उठाती और शोक हमें नीचे नहीं गिरा देता? 

    संक्षेप में, हम जो कुछ भी करते हैं, वह या तो सद्गुण के आदेश पर करते हैं या दुर्गुण के आदेश पर। जो वस्तु शरीर को आदेश देती है, वह भौतिक होती है जैसे, जो वस्तु शरीर पर बल का प्रयोग करती है, वह भी भौतिक होती है। शरीर का शुभ भौतिक है। मनुष्य का शुभ भी शरीर का ही शुभ है। इसलिए मनुष्य का शुभ भी भौतिक है। 

    अब जबकि मैंने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे दिया है तो अब मुझे उस आपत्ति का पहले ही उत्तर दे देना चाहिए जिसे मैं तुम्हारे मन में उठते हुए देख रहा हूँ, “हम तो यहाँ मानो चौपड़ खेल रहे हैं।” हम अपने मन को तुच्छ बातों में व्यर्थ लगा रहे हैं। ऐसी बातों में जो मनुष्य को अच्छा बनने के बजाय केवल चतुर बनाती हैं। बुद्धिमान बनना इससे कहीं अधिक स्पष्ट बल्कि कहना चाहिए कहीं अधिक सरल बात है। मानसिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए बहुत अधिक पांडित्यपूर्ण अध्ययन की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी हम दर्शन को भी उसी प्रकार तुच्छ बातों में नष्ट कर रहे हैं, जैसे अपनी अन्य संपत्तियों को नष्ट करते हैं। अध्ययन में भी, अन्य सभी बातों की तरह, हम अति के दोष से ग्रस्त हैं। हम जीवन के लिए नहीं बल्कि विद्यालय के लिए सीख रहे हैं।


अभी के लिए विदा 

सुरक्षित जीवन जीने के उपाय के बारे में -- पत्र - 103 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हें बताऊँगा कि अधिक सुरक्षित जीवन जीने के लिए तुम्हें किन बातों से सावधान रहना चाहिए। परंतु इन उपदेशों को उसी प्रकार समझना, जैसे मैं तुम्हें आर्देआ (दलदली क्षेत्रों के कारण स्वास्थ्य के लिए चुनौतियों भरा क्षेत्र) प्रदेश में स्वस्थ रहने के उपाय बता रहा हूँ। अपने मन को उन कारणों पर केंद्रित करो जो एक मनुष्य को दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए प्रेरित करते हैं। तुम्हें पाँच कारण मिलेंगे— आशा, ईर्ष्या, घृणा, भय और अनादर। 



    इन सबमें सबसे कम महत्त्वपूर्ण अनादर है, यहाँ तक कि बहुत-से लोग इसे एक प्रकार का उपाय मान लेते हैं। निश्चय ही तिरस्कृत होना पीड़ादायक है। पर उसकी पीड़ा अधिक समय तक नहीं रहती। यह प्रायः बिना सोचे-समझे और आकस्मिक रूप से किया जाता है। युद्ध में भी कोई उस शत्रु पर प्रहार नहीं करता जो पहले ही गिर चुका हो। प्रहार उसी पर किया जाता है जो अब भी खड़ा है। जहाँ तक दुष्ट लोगों की आशाओं का प्रश्न है, उनसे तुम तभी बच सकते हो जब तुम्हारे पास ऐसा कुछ न हो जो उन्हें उस वस्तु की लालसा करने के लिए उकसाए जो उनकी नहीं है। तुम्हारे पास ऐसी कोई वस्तु भी न हो जो सबसे अलग दिखाई देती हो। यदि कोई वस्तु लोगों की दृष्टि में आ जाए और दुर्लभ हो तो वे छोटी-सी वस्तु के लिए भी लालायित हो उठते हैं। ईर्ष्या से तुम तब बचोगे जब स्वयं को लोगों के ध्यान का केंद्र नहीं बनाओगे, अपनी संपत्ति का प्रदर्शन नहीं करोगे और एकांत में संतोषपूर्वक जीवन जीना सीखोगे। घृणा या तो किसी को ठेस पहुँचाने से उत्पन्न होती है, जिससे तुम किसी को उकसाए बिना बच सकते हो या फिर वह बिना किसी कारण के भी उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा सौम्य और विनम्र स्वभाव ही तुम्हारी रक्षा करेगा। बहुत-से लोगों ने इस संकट का सामना किया है। यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी रहे हैं जिन्हें कभी कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं मिला, फिर भी उन्हें लोगों की घृणा सहनी पड़ी। 

    यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे भयभीत न हों, तो तुम्हें संयमित जीवन और कोमल स्वभाव अपनाना चाहिए। लोगों को यह ज्ञात होने दो कि वे बिना किसी भय के तुम्हें अप्रसन्न कर सकते हैं। यह भी सुनिश्चित करो कि उनके लिए तुमसे फिर से मेल-मिलाप करना सरल हो। भय का कारण बनना घर में उतना ही कष्टदायक है जितना सार्वजनिक जीवन में, चाहे तुमसे, तुम्हारे दास भय खाते हों या स्वतंत्र व्यक्ति। प्रत्येक मनुष्य में तुम्हें हानि पहुँचाने की पर्याप्त शक्ति होती है। फिर जो लोग दूसरों में भय उत्पन्न करते हैं, वे स्वयं भी भयग्रस्त रहते हैं। कोई भी व्यक्ति दूसरों को भयभीत करके स्वयं चिंता से मुक्त नहीं रह सका है। अब केवल तिरस्कार शेष रह जाता है। उसे सीमित रखना प्रत्येक मनुष्य के अपने अधिकार में है। यदि वह उसे स्वयं अपनी इच्छा से स्वीकार करे, न कि इसलिए कि वह वास्तव में उसका अधिकारी है। विद्या और संस्कृति का अध्ययन उसकी कटुता को कम कर देता है। इसी प्रकार किसी प्रभावशाली व्यक्ति के निकट रहने वालों से संबंध रखना भी सहायक होता है। ऐसे लोगों से परिचय रखना तुम्हारे लिए उपयोगी होगा। पर उनसे अत्यधिक घनिष्ठता मत बढ़ाना। कहीं ऐसा न हो कि उपचार ही रोग से अधिक कष्टदायक सिद्ध हो।

    सामान्य रूप से तुम्हारे लिए सबसे अधिक लाभदायक यही होगा कि तुम शांत रहो, दूसरों से बहुत कम बात करो। पर अपने आप से बहुत अधिक संवाद करो। बातचीत में एक सूक्ष्म और मोहक आकर्षण होता है। जैसे मदिरापान या यौन-संबंध मनुष्य से उसके रहस्य उगलवा लेते हैं, वैसे ही बातचीत भी उसके गुप्त भेद प्रकट करा देती है। जो कुछ कोई सुन लेता है, उसे अपने तक सीमित नहीं रखता। न वह केवल उतना ही बताता है जितना उसने सुना था। न ही वह किसी घटना का वर्णन उसके स्रोत का उल्लेख किए बिना करता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास कोई-न-कोई ऐसा होता है, जिसे वह वही सब सौंप देता है जो स्वयं उसे सौंपा गया था। यदि वह अपनी वाचालता पर संयम भी रखे तथा केवल एक ही व्यक्ति तक बात सीमित रखे, तब भी वह एक से अनेक श्रोताओं को जन्म दे देता है। इस प्रकार जो बात अभी थोड़ी देर पहले तक एक रहस्य थी, वही शीघ्र ही जन-चर्चा का विषय बन जाती है।

    सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार यह है कि मनुष्य किसी के साथ अन्याय न करे। जिन लोगों में आत्मसंयम का अभाव होता है, उनका जीवन सदा व्याकुल और अशांत रहता है। उनका भय उनके दुष्कर्मों के अनुपात में ही होता है। उन्हें कभी विश्राम नहीं मिलता। दुष्कर्म करने के बाद उनका मन उद्विग्न रहता है और वे किसी दूसरे कार्य में मन नहीं लगा पाते। उनका अंतःकरण उन्हें आगे बढ़ने नहीं देता बल्कि बार-बार उन्हें स्वयं के सामने खड़ा कर देता है। जो व्यक्ति दंड की अपेक्षा करता है, वह वास्तव में दंड भोग ही रहा होता है। जो दंड का अधिकारी है, वह निरंतर उसी की आशंका करता रहता है। दोषपूर्ण अंतःकरण के साथ सुरक्षा तो संभव है पर मानसिक शांति नहीं। अपराधी यह सोचता रहता है कि वह पकड़ा जा सकता है, चाहे वास्तव में वह पकड़ा न भी गया हो। उसकी नींद अशांत रहती है। जब भी वह किसी दूसरे के अपराध की चर्चा करता है, उसका ध्यान अपने ही अपराध की ओर चला जाता है। उसे लगता है कि उसका अपराध न तो पर्याप्त रूप से छिपा है और न ही पूरी तरह ढका हुआ है। अपराधी को कभी-कभी छिपे रहने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इस बात का निश्चिंत विश्वास कभी नहीं मिल सकता कि वह सचमुच छिपा हुआ है।


अभी के लिए विराम 

थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग चार: अंकल पियो)

  भाग चार: अंकल पियो By Louisa Starr Canziani अपने एक पत्र ( XXIX उ नतीसवें पत्र) में मार्केसा दे मोंतेमायोर अंकल पियो, “ हमारे बूढ़े हार...