Sunday, 27 November 2016

लाख दुखों की एक दवा है, क्यों न आजमाएं

कल 'रोड मूवी' (2010) देख रही थी। इस फिल्म को देखने की तमन्ना थी क्योंकि इसमें रेगिस्तान के चित्र हैं। पहले मुझे यह खयाल रहता था कि मैं कभी भी रेगिस्तान पर कदम नहीं रखूंगी। धूप का डर। प्यास का डर। धूप से जल जाने का डर। रेगिस्तान में खो जाने का डर। ये सभी मेरे अंदर पलने वाले डर थे। लेकिन फिल्म 'जल, पार्च्ड, रोड मूवी, भंवर, बंटवारा, रूदाली' आदि कुछ फिल्में देखकर अब राजस्थान मन में रहने लगा है। खासतौर से उसका रेगिस्तान। शायद कभी तो जाना हो ही जाएगा।

'रोड मूवी' आप सभी ने देखी ही होगी। मुझे फिल्म गज़ब लगी। एक किरदार भी फालतू या कम नहीं है फिल्म में। सिर्फ चार लोग और एक बेहतरीन सफर। फिल्म में एक खास तरह का मज़ा और रोमांच है। हर उम्र का किरदार और उनकी अलग अलग पृष्ठभूमि दमदार है। सधे हुए संवाद और किरदरों की शैली में, कहीं भी खट्टेपन का अहसास नहीं होता।



जब अपना आसपास मुंह चिढ़ाता हो तब एक विचार जो दस्तक देता है वह यह कि भाग जाओ सब छोड़कर। एक आज़ादी का चस्का लेने का मन होने लगता है। कुछ ऐसा खोजने का मन करता है जिसको खोजने के लिए हम यहाँ आए हैं। खाये-पिये और मर गए टाइप में आखिर रखा भी क्या है! फिल्म का मुख्य किरदार विष्णु जब तैल बेचने निकलता है तब एक चिड़चिड़ा नौजवान है। उसे अपने पिता के तैल के व्यवसाय से ऊब है। कुछ भी नया नहीं जिसे सोच कर वह हंस सके। इसलिए वह 1942 में बने एक ट्रक को लेकर एक सफर पर चल पड़ता है। ट्रक में विष्णु है, तैल की बोतलें हैं, एक तिलिस्म यानि फिल्में दिखाने का प्रॉजेक्टर है और हिन्दी-अंग्रेज़ी की कई फिल्मों की रीले हैं।

जब मैं फिल्म देख रही थी तब मुझे भी ये वस्तुएं मामूली ही लगीं। मुझे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि जब किसी भी वस्तुओं से जुड़ों तब एक मैजिक बनने की शुरुआत होती है। जैसे, जब हम कोई किताब पढ़ते हैं और उस किताबी कहानी से जुड़ना शुरू करते हैं, तब उस कहानी के पाठक से कहीं आगे हम अपना एक रिश्ता क़ायम करते हैं। ठीक ऐसा ही होता है जब कोई गीत सुनने की प्रक्रिया होती है और इसका उत्तम रूप उसको गुनगुनाने में दिखलाई देने लगता है। जानती हूँ पढ़ना और सुनना वस्तु नहीं है। लेकिन कहीं न कहीं उनमें वस्तु एक माध्यम है। ये माध्यम जीने को सरल और दिलचस्प बनाते हैं। यह भी एक तरह की कला है।  

फिल्म की कहानी, विष्णु के सफर में आने वाले पड़ाव से आगे बढ़ती है। रास्ते में उसे एक चाय की दुकान पर काम करने वाला छोटा मगर दिमागदार लड़का मिलता है और यही लड़का एक मस्त मनमौजी ट्रक ठीक करने वाले मकैनिक को लेकर आता है। उम्र दराज़ यह व्यक्ति अपने हुनर का पक्का है और ईमान भी साथ रखता है। सबसे खास बात यह कि यह बंदा फिल्मों का शौकीन है। विष्णु को बार बार दस्तक देता है- 'तेरे पास दिल है कि नहीं!' पुलिस वाले के चंगुल में फंस जाने पर यह बंदा एक युक्ति निकाल कर विष्णु को मुसीबत से निकालता है।



इस किरदार कि खासियत देखें तब पाएंगे कि जमाने ने जो बुद्धिमान और ज़िंदादिल होने के मानक तय किए हैं, यह उससे परे बिलकुल स्वाभाविक हैं। सहज बुद्धि की का इस्तेमाल करना अपने आप में बुद्धिमत्ता है। विष्णु इन्हें चाचा कह कर पुकारता है। चाचा को मेले में जाने के लिए लिफ्ट की जरूरत है और विष्णु के पास ट्रक है। चाचा को फिल्में देखने का चस्का है। अंत में चाचा मर जाते हैं। लेकिन उनकी मौत गज़ब की है। मरते तो हम सभी ही हैं। पर चाचा चार्ली चैपलिन की फिल्म देख कर इतना हँसते हैं कि वह इसी हंसी में मर जाते हैं। जिस तिलिस्म ने उनको मोह लिया था, जिसके वे दीवाने थे...उसी की आशिक़ी में मौत होती है।

मौत एक ऐसा पड़ाव है जिसे तकलीफ, खौफ़, खराब, दुख, आँसू , बिछुड़ जाने आदि से जोड़कर देखा जाता है। हिन्दी सिनेमा में मौत को कई अंदाज़ से फिल्माया गया है। अक्सर ज़िंदगी की 'फलसफे' के घोल के साथ घोलते हुए पेश किया जाता है। फिल्म' आनंद' में आनंद का पूरा चरित्र ज़िंदगी की फ़िलॉसफ़ी दर्द और हंसी के बीच फिल्माने में दिखाया गया है। तब भी आनंद के मरने पर मुझे रोना आ गया था। लेकिन जब इस फिल्म में चाचा मरते हैं तब मुझे रोना नहीं आया। बल्कि मुंह से यह निकला- 'वाह! क्या मौत है!'

...लेकिन कोई फिल्म करती क्या है? हमारे दिमाग में वह एक परत सेट करती है। जो बातें हमें बचपन से संस्कार में मिली होती हैं उसी के आधार पर हम गलत सही का फैसला करते हैं। उसी की ताक पर किरदारों का बंटवारा। ज़रा सोचिए जब किसी फिल्म का खलनायक मरता है तब हमें कितनी खुशी होती है। तब मौत अच्छी लगती है। हममें से कई तो ताली बजाते हैं। इसका अच्छा उदाहरण 'शोले' है। जब 'गब्बर' मरता है तब खुशी और जब 'जय' मरता है तब आँसू निकलते हैं। यही सिनेमा का खेल है। दिमाग को पूरा जकड़ लेने का खेल। इसलिए मेरा एक खयाल यह जरूर रहता है कि फिल्म देखने के दौरान फिल्म और मेरा एक फासला रहे। फिल्म और दर्शक के बीच में एक निश्चित फासला जरूर होना चाहिए। आम समझ यह है कि हम फिल्म देख रहे होते हैं पर वास्तव में फिल्म तो आपके हाथ को पकड़ कर अपने अंदर बहा ले जाती है। अगर दिलचस्पी अधिक रही तब फिल्म के खत्म होने के बाद होश आता है। आप खुद पर इसका एक टेस्ट कर सकते हैं।



बहरहाल फिल्म पर आते हैं। सफर का उद्देश्य बदलता है और तीनों पानी की तलाश के लिए शॉर्टकट रास्ता अपनाते हैं इसी दौरान इन्हें एक जिप्सी औरत मिलती है जो खुद पानी की तलाश में यहाँ वहाँ भटक रही है। बस यहीं से चारों की मंजिल एक दूसरे के साथ हो जाती है। चाचा सुनसान जगह पर हताश होने की बजाय एक आइडिया और लगाते हैं और फिल्म का पर्दा लगाते हैं। फिर क्या, रात होती है और मेला सज जाता है। फिल्म दिखाने पर इनकी मोटी कमाई होती है और पानी भी मिल जाता है।

इसके बाद के दृश्य में सभी चरित्रों की परतें खुलती हैं। विष्णु का डर खत्म होता है। एक खुलापन नज़र आता है। वह पानी डाकुओं से भी तैल का सौदा कर पानी लेता है और उसे प्यासे लोगों में बांटता है। इस एक्शन में कहीं न कहीं उसके दिल का होना मालूम देता है। जिप्सी औरत जिसका पति नहीं है। उसे विष्णु से प्यार हो जाता है। लेकिन अंत में वह विष्णु को रोकती नहींहै बल्कि यह कहती है कि हमारे रास्ते अलग हैं। कहीं न कहीं इस चरित्र में एक मजबूत फैसले लेने की क्षमता दिखती है। बच्चे का किरदार उतना नहीं उभरा है पर वह भी फिल्म का ज़रूरी हिस्सा है।

इस फिल्म का ज़िक्र इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि मेरे पास भी बोरियत की एक फेहरिश्त है। सभी के पास होती है। उसे जीतने के सभी के अपने अपने नुस्खे भी होते हैं। मेरे पास भी हैं। यह सब बातें व्यस्त लोगों के लिए नहीं है। उनके पास तो बेहतरीन जरिया यही है कि वे बिज़ी हैं। हम जैसे फक्कड़ लोगों को अधिक जरूरत पड़ती है अपने आसपास को बार बार देखने की। कभी 90 डिग्री के कोण से तो कभी 180 डिग्री के। इससे ज़िंदादिल रहा जा सकता है। वाद विवाद से बचकर रहा जा सकता है। नए अनुभवों को किताबों की बजाय नई जगहों से पाना सबसे अच्छा तोहफा है। इसके अलावा अपने अंदर के अजनबीपन को पहचानने का सबसे बेहतर तरीका सफर के दौरान ही समझ आता है। इन बातों के तहत यह फिल्म एक नज़रिया तो बतलाती ही है।

जब 'दि अलकेमिस्ट' उपन्यास पढ़ा था तब यही महसूस हुआ था कि किसी अंजान सफर पर जाना कितना रोमांचक होता है। 'सेंटियागो' को अपने झोले में रखकर चलती हूँ। ठीक है उसे एक खजाने के की खोज थी। मेरा खजाना तो नई जगहें ही हैं। मैं जान बूझकर नई जगहों पर जाने की सूची बनाती हूँ। ठीक है शायद नहीं जा पाऊँगी। लेकिन अपनी वसीयत में यह फेहरिश्त तो छोड़ कर जा ही सकती हूँ। शायद किसी और के काम आ जाए।  



Friday, 25 November 2016

वो पीले जूतों वाली लड़की- ...And everyone wants a piece of her

दो दिन पहले की बात है। FB पर किसी म्यूचुअल दोस्त के दोस्त ने रिक्वेस्ट भेजी। मैंने एक्सेप्ट कर ली। लेकिन सज्जन इतने आतुर दिखे कि मुझे बेहद अजीबो-गरीब मैसेज करने लगे। इतना ही नहीं मुझे उनके चलते एक जानकारी और मिली कि FB में कॉलिंग फीचर भी है। मुझे इसका इल्म नहीं था। सज्जन लगातार कॉल कर रहे थे। न जाने उन्हें मुझमें दिलचस्पी थी या कोई अनंत रहस्य दिखाई दे गया था। ख़ैर, मैंने उनका और अपना दोनों का समय बचाया और ब्लॉक करने का विकल्प इस्तेमाल किया। इस व्यक्ति की एक बात और खास थी। इनका FB कवर फ़ोटो अपनी पत्नी के साथ था। पहली नज़र में किसी को भी लगेगा कि भला व्यक्ति है। बिलकुल पत्नी भक्त। फिर मुझे इतने मैसेज करने के पीछे क्या मतलब निकाला जाए?

इन दो दिनों से कुछ दिन पहले मैंने इस नोटबंदी के मौसम से बचने के लिए फिल्म 'देट गर्ल इन यैलो बूट्स' देखी। फिल्म मुझे बेहतर लगी। हालांकि यह फिल्म मैंने दो टुकड़ों में देखी। एक हिस्सा पहले और दूसरा हिस्सा दो दिन बाद। लेकिन इतना तय था कि फिल्म की मुख्य किरदार भारतीय पिता और ब्रितानी माता की बेटी 'रूथ' मेरे साथ हो चुकी थी। वह हजारों मील दूर अपने भारतीय पिता को खोजने के लिए बॉम्बे आने वाली एक नौजवान लड़की है। वह तोड़ मरोड़ की हिन्दी से बेहतर हिन्दी भी बोल लेती है। लेकिन यह लड़की हर भारतीय लड़की जैसी ही दिक्कतों का सामना करती है।

फिल्म को हर कोण से देखा जा सकता है। जैसे एक विदेशी लड़की की नज़र से। रिश्तों में मजबूत रिश्ता यानि पिता को पाने की चाह रखने वाली बेटी की नज़र से। एक मसाज पार्लर में आदमियों को मसाज देने वाली और 1000 रुपये की अतिरिक्त फीस के साथ 'हैंड मसाज' करने वाली पार्लर वाली की नज़र से। एक ड्रग लेने वाले लड़के की प्रेमिका की नज़र से। ...कहने का मकसद है कि 'रूथ' अंजान बॉम्बे शहर में कई चेहरे के साथ जीने की कोशिश करती है। उसके चरित्र में चालाकी का भी शेड है जिसे फिल्म के कई दृश्य में देखा जा सकता है। जैसे बॉम्बे शहर के सरकारी कार्यलयों में या फिर पोस्ट ऑफिस में जब वह अपना काम निकलवाना चाहती है तब 'घूस' जैसी चीज को वह दान जैसे शब्द से जोड़ते हुए देती है। उसे भारतीय सरकारी दफ्तरों का खूब अंदाज़ा है। यह दान देना उसके कई अटके हुए काम बखूबी करवा भी देता है।

उसकी बॉम्बे की ज़िंदगी में कई मर्द हैं। एक उसका प्रेमी, जो नशे में रहता है और ड्रग के बिना जी नहीं सकता, दूसरा एक माफिया का आदमी जो अपने पिता को बचपन में खो चुका है, तीसरा एक अंजान आदमी जो उसके घर के बाहर कभी पैसे लेने तो कभी उससे से संबंध बनाने की चाहत लिए आता रहता है, चौथा एक बुजुर्ग आदमी जो मसाज करवाने आता है और उसे 'बेटी या बेटा' कहकर पुकारता है, पांचवा एक अमीर आदमी जो उसके पिता से मिलवाने का भरोसा देकर उसका फायदा अपने बिजनेस के लिए उठाना चाहता है और छठा आदमी उसका एक और मसाज कस्टमर जो उसका पिता है। वह अपने पिता को 'हैंड मसाज' भी देती है।

फिल्म के अंत में रूथ तब और चौंक (सदमा) जाती है जब उसे मालूम चलता है कि उसका पिता और कोई नहीं वही व्यक्ति है जो उसका नियमित मसाज ग्राहक है। उसका सब्र का बांध टूट भी जाता है। अंत के दृश्य में उसे दुखी, हैरान और सदमे के चेहरे के साथ टॅक्सी में बैठकर जाते हुए दिखाया जाता है। मुझे लगता है कि यह दृश्य वास्तव में उस सच्चाई की परतें खोलता है जिसमें रूथ को पता चलता है कि लड़की होना बहुत से लोगों के लिए सिर्फ शरीर भर होना ही है। मुझे इस बाबत एक बैठक याद आ जाती है जिसमें एक कार्यकर्ता ने बताया था कि एक 7 साल की बच्ची का रेप उसके खुद के पिता द्वारा रोजाना किया जाता था। इस हरकत की खबर माँ को भी थी पर वह चुप रही।

रूथ पूरी फिल्म में पीले जूतों में नज़र आती है। वह हर जगह इन्हीं जूतों को पहनकर जाती है। एक ही जोड़ी जूता और वह भी एक ही रंग का, यह बतलाता है कि आप कहीं भी जाओ, किसी भी कोने में... औरत और उसके शरीर को लेकर 'आबादी' की सोच साफ है। उस सोच में वही एक रंग है। वही एक झलकी है। शरीर से बाहर कुछ भी नहीं दिखता। जब आप गूगल में इस फिल्म के बारे में पढ़ेंगे तो पायेंगे  वास्तव में हर आदमी उसके खूबसूरत शरीर में एक मौज-मस्ती वाली हिस्सेदारी चाहता है। खुद उसका पिता भी यही करना चाहता है। (...And everyone wants a piece of her.)

हाल ही में आई दो फिल्में 'पार्च्ड' और 'पिंक' दोनों ही महिला आधारित फिल्में हैं। दोनों ही फिल्मों की आलोचना की जा सकती है। फिर भी दोनों फिल्में एक संवाद रचने में कामयाब हैं। 'पार्च्ड' में वे मुख्य महिला किरदार हैं जो ग्रामीण इलाक़े से ताल्लुक रखती हैं और वे पढ़ी लिखी नहीं हैं। जबकि 'पिंक' फिल्म में शहर से ताल्लुक रखने वाली और आर्थिक रूप से स्वतंत्र लड़कियों की कहानी है। तीनों लड़कियां पढ़ी लिखी हैं फिर भी उनको निशाने पर लिया जाता है। 'देट गर्ल इन यैलो बूट्स' फिल्म काफी पहले बन चुकी है और इसमें एक विदेशी मूल की लड़की की कहानी है। लेकिन वह भी उसी तरह की तकलीफ़ों का सामना कर रही है जिसका कि बाक़ी भारतीय लड़कियां।

ये सभी फिल्में मेरे लिए ख़ास हैं। इसलिए नहीं कि इनसे मेरा मनोरंजन हो रहा है या फिर कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है। मुझे इस राजनीति, समाज, संस्कृति और पारिवारिक संरचना में कब क्या देखने और समझने को मिल जाये,  इसका अंदाज़ा लगाने में ये सभी फिल्में मददगार हैं। अपने आसपास एक जाल की बुनावट समझ आती है। हर स्तर पर मोटी-मोटी तहें हैं। नियम व शर्तें लागू हैं। इन फिल्मों से बहुत न सही कुछ तो समझ आ ही जाता है।

'रूथ' का किरदार ज़्यादा दिलचस्प है 'पार्च्ड' फिल्म की नायिकाओं की तरह। अंजान बॉम्बे शहर में वह अपनी शैली से जी रही है। वह काम कर रही है। पिता को खोजने का व्यक्तिगत खोजी अभियान चला रही है। सड़े-गले नोकिया फोन का बखूबी इस्तेमाल कर रही है। वह चालाक है। वह दिक्कतों से बाहर निकलने का तरीका भी जानती है। अपने प्रेमी को न कहना और थप्पड़ जड़ना भी वह जानती है। वह माफिया के सरगना से निपटने का जरिया जानती है और उसे अपनाती भी है। अपने मानसिक रूप से विकृत पिता को गरम तैल से जलाती है और तो और उस पर पिस्तौल भी तानती है। वह रोती है पर खुद पर नहीं लोगों के दिमाग पर। रोना अपने आप को हल्के करने का साधन है न कि लाचारी और कमजोर करने का। कुल मिलाकर 'रूथ' से मुलाक़ात बेहतरीन रही।  


Tuesday, 22 November 2016

20 रुपये लेने वाला डॉक्टर

कुछ आदतें देर से लगती हैं। लेकिन चलती बहुत दूर तक हैं। यानि लंबे सफर में कोई साथ दे या न दे, लेकिन कुछ आदतें चिपक जाती है और साथ भी देती हैं। ऐसी एक आदत अखबार पढ़ने की है। चाहे लाख इन्हें कोस लूँ, पढ़ूँ न पढ़ूँ, फिर भी मैं पन्ने पलट लेती हूँ। मामूली हूँ सो एक अदद नौकरी की कामना कर के ही जीती हूँ। जी. के. को दुरुस्त रखना कोई बच्चों का खेल नहीं। इसलिए अखबार से बेहतर कोई और साधन समझ नहीं आता।

सुर्खियां अब धोखा देती हैं। क्या पढ़ा जाये और क्या छोड़ा जाये का विकल्प शुक्र है कि अभी तक अपने हाथ में वरना तो खैरियत ही नहीं होती। विमुद्रीकरण के मौसम में आरोप और प्रत्यारोप की प्रक्रिया चल रही है। अखबार इसी खबर से भरे हुए हैं। लोगों की दिक्कत और उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनजर कितने ही शोध छप कर आ रहे हैं और शायद ये सब अखबार के पन्नों में जरूरी हिस्सा भी हैं। लेकिन एक खबर दिखी जिस पर मेरा ध्यान गया और सुबह से उस पर थोड़ा बहुत दिमाग का खर्चा भी किया।



खबर है तो दुखद फिर भी मुझे खास लगी। तमिलनाडु के दूसरे सबसे बड़े शहर माने जाने वाले कोयंबटूर में एक स्थानीय डॉक्टर के इंतकाल के बाद उन्हें श्र्द्धांजलि देने के लोग उमड़ पड़े। हर रोज़ कई लोग मरते हैं। लेकिन यकायक इतने अधिक लोगों की आँखें एक साथ नम हो जाएँ ऐसा आजकल कहाँ होता है! बगल में सिर काट लिया जाता है, सड़कों पर जच्चगी हो जाती है तब भी संवेदनशील लोगों की संवेदनाएँ सोई रहती हैं। फिर ऐसा आखिर क्या हो गया कि एक डॉक्टर की मौत पर लोग इकट्ठा हो गए?

अखबार में छपी खबर के मुताबिक डॉक्टर साहब का नाम वी. बालासुब्रमण्यम था। उनका क्लीनिक सिधापुदुर में था। खास और चौंकाने वाली बात यह थी कि महंगाई के इस जमाने में डॉक्टर साहब ने कभी भी अपनी फीस 20 रुपये से ज़्यादा नहीं की। क्लीनिक की शुरुआत में उनकी फीस मात्र 2 रुपये बताई जाती है। इसके अलावा यदि कोई बड़ी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति उनके पास आता था तब वह उसकी अनगिनत विज़िट पर भी उससे केवल एक बार ही फीस के रूपये लेते थे। बाहर की दावा लिखने का बाद भी फीस का रुपया 50 से अधिक नहीं जाता था। पूरे शहर में उन्हें लोग '20 रुपये वाला डॉक्टर' कहकर पुकारते थे। इसके पीछे यही फीस 20 रुपये होना है।

मुझे उनके मौत का दुख है। उनकी मौत एक न भर पाने वाला नुकसान जरूर है। लेकिन सबसे ज़्यादा अहम उनकी सोच का मूल्य है। उनका संतोष है। हम लाख एन. सी. आर. टी. की आदर्शवादी कहानी पढ़ लेते हैं पर न जाने बड़े होने पर किस रेत के नीचे दबा आते हैं। (नदी गंदी कर चुके हैं, मिट्टी की भी अच्छी दशा नहीं रख छोड़ी है) डॉक्टर साहब का इतनी कम फीस लेने के बारे में कहना था कि भगवान ने मुझे मेरा खयाल रखने के लिए काफी पैसा दिया है। इसलिए मैं गरीबों को स्वस्थ रहने में मदद करता हूँ।



कुछ दिनों पहले मैं अपनी सिर दर्द की परेशानी को लेकर एक MBBS डॉक्टर से मुलाकात कर बैठी। एक सफ़ेद पर्चा भर गया। मालूम चला कि आधे पर्चे पर ढेर सारी दवाइयाँ लिखी गई हैं तो आधे पर दर्जन भर टेस्ट लिखे गए हैं। मैंने पूछा कि क्या मुझे ट्यूमर हो गया है या फिर मुझे घर बैठकर 'आनंद' फिल्म के गीत सुनने चाहिए तब डॉक्टर ने बड़े गंभीर लहजे से कहा - 'कुछ कहना मुश्किल है। पहले ये सब टेस्ट करवाकर आइये।' मैंने फिर पूछा कि जब कह नहीं सकते तो दवाइयाँ इतनी अधिक क्यो वो भी 500 रुपये की? तब वह झल्ला गया और बोलने लगा, आप लोगों को ज़्यादा पुछने की आदत न जाने क्यों है? डॉक्टर हम हैं या आप?...खैर कुछ दिनों तक लगा कि मेरे पास अधिक समय नहीं और दिल के ग़म में 'आनंद' फिल्म के गीत भी सुन लिए।

घर पर कभी डॉक्टर के लिखे पर्चे को पढ़ने की कोशिश करती तो कभी दवाइयों की गूगल पर खोज करती। लेकिन पर्चे पढ़ने की प्रक्रिया में मुझे एक बात यही समझ आई कि डॉक्टर ने मुझसे हुई बातचीत को पर्चे पर छाप दिया था। खैर मैंने न तो दवाइयाँ खरीदीं और न ही टेस्ट करवाए। मैं अब बेहतर महसूस करती हूँ। सारा खेल तो रूटीन और खानपान में छुपा है।

फिजूल के टेस्ट और दवाएं आजकल के झोला छाप और प्रमाणपत्र धारण किए डॉक्टरों की आय का मुख्य जरिया बन चुका है। ऐसे बहुत कम डॉक्टर हैं जो वास्तव में मरीज का मर्म और दर्द समझकर ईलाज कर रहे हैं। मेरी मुलाकात फिर भी ऐसे अच्छे डॉक्टर से अभी तक नहीं हुई। बड़े अस्पतालों का क्या कहना! उनके तो बाथरूम का फर्श भी मेरे घर के फर्श से अधिक चमकदार होता है। उसकी सफाई का खर्च भी मरीज के गले पर ऑपरेशन का चाकू रखकर आराम से ले लिया जाता है। मरीज को लगता है कि उसका बड़ा ऑपरेशन किया गया है।

क़ातिल तो सामने आकर चाकू से वार करता है। पर ये बड़े बड़े अस्पताल पीछे से ही गला काट रहे हैं। ऐसे माहौल में इन जैसे डॉक्टर का अब न होना एक बड़ी हानी है। आपको नहीं लगता?    









       

Sunday, 20 November 2016

छुक छुक की आवाज़ से बढ़कर है रेल...

आज की बड़ी खबर रात के करीब 3 बजे ही घट चुकी थी। जी हाँ, इंदौर-पटना एक्सप्रेस के 14 डिब्बे अपनी पटरी से कानपुर के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गए और मरने वालों की संख्या खबरों के मुताबिक 115 बताई जा रही है। देश में एक बड़ी घटना 8 नवंबर 2016 की रात को पहले ही घट चुकी है। अभी वह घटना खत्म भी नहीं हुई कि जब तक यह भयानक हादसा हो गया। हादसों में तो आजकल हर व्यक्ति जी रहा है। हादसे मानों आदत बन चुके हैं। इसलिए आज किसी हादसे पर कलम नहीं चलानी। 

इत्तिफाक़ से कल मैं अपने एक दोस्त के साथ भारतीय रेल की तारीफ में व्यस्त थी। राजा रवि वर्मा, गांधी, नेहरू और वे लोग जिनके मैं नाम नहीं जानती, सभी ने इसी भारतीय रेल से हिंदुस्तान को बेहतर जाना है। इतना ही नहीं हिन्दी फिल्मों में तो  रेल और उसकी पटरियों की अहम भूमिका है, चाहे बात इश्क़ की हो या फिर शोध की। रेल है ही आकर्षित करने वाली।



एक बार मेरे किसी आत्मीय की बातचीत से मुझे यह मालूम चला था कि भारतीय रेलवे गजब का माध्यम है। यह माध्यम असली भारतियों के साथ असली भारत का सफर तय करवाता है। यह छोटी से छोटी जगह से जुड़ा है। यह लोगों से कई सालों से हुआ है। इसकी अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन अभी भी इस में कुछ गुणवत्ता समय की मांग के अनुसार नहीं जुड़ पाएँ हैं, क्योंकि हम और हमारी सरकार इसके लिए मुस्तैद नहीं हैं।

रेल का ज़िक्र कर रही हूँ तब मैं अपनी ही बात बताती हूँ। बात क्या एक किस्सा है। मैंने रेलवे से कई छोटे और बड़े सफर किए हैं। मुझे आज भी लगभग 4 साल की उम्र के अपने दूसरे (पहला बेहद कम उम्र में था जो याद नहीं)  सफर की हल्की याद है। इस सफर में मैं, अम्मी और मेरे बड़े भाई एक साथ थे। हम स्लीपर में थे। मुझे रेल के धुएँ से ऐसी दिक्कत हुई की ठसाठस भरे हुए डिब्बे में मुझे उल्टी होनी शुरू हो गई। बहुत उल्टी हुई। कई लोग कहने लगे कि इस डिब्बे से निकलो, जाओ, बाहर जाओ...सब गंदा कर के रख दिया लड़की ने।

                                               एक टिकट चेकर द्वारा बनाया गया चित्र

डिब्बे में कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्हों ने कहा कि जब उनकी बच्ची की दशा ठीक नहीं है तो ऐसे में यह उसे कहाँ लेकर जाएंगी। आप लोग तो ऐसे कह रहे हो जैसे आप के बच्चे गंदे ही नहीं होते।
 
मेरी माँ आवाज़ और मिजाज़ की तेज़ नहीं हैं। सबसे ज़्यादा उन्हीं के कपड़े गंदे हुए। मेरे भाई मुझे पानी दे देकर कुल्ला करवा रहे थे। जब मेरा जी शांत हुआ तब माँ ने अपनी गोद में मेरे सिर को रखकर हौले हौले सहलाया। इसके बाद खिड़की की हवा और चाँद की रोशनी ने मुझे चैन और नींद का तोहफा दिया। मुझे यह सब के सब दृश्य आज भी ज्यों के त्यों याद है। अपनी माँ की साड़ी का रंग मेरे बड़े भैया का कम उम्र वाला चेहरा। हमारी पेटी। उसका रंग। स्टेशन। उसके कुछ लोग। उनकी बातें। सब याद है।

पर इन सबसे ज़्यादा मुझे रेल याद है। गहरा मिट्टी रंग था उस रेल का। ज़्यादा नई भी नहीं थी और न ही बेहद पुरानी। एक दम लंबी। ढेरों लोगों को ले जाती हुई मशीन। उसका रूप ऐसा कि हैरत में डाल दे। जैसे ही रुकती एक नई दुनिया ही नज़र आती। कभी कोई चाय लेकर आ जाता तो कोई चने... वहाँ इतनी आवाज़ें थीं कि मैंने पहली बार जाना था कि जब बहुत सी आवाज़ें एक दूसरे में घुल जाती हैं तब साफ न सुनना एक बेबसी की दशा है। शोर कहकर क्यों दोष लगाया जाये? जैसे ही ट्रेन नदी या फिर किसी पुल से गुजरती तो रोमांच सा महसूस होने लगता।  खैर, चीज़ खरीदने और खाने की ज़िद्द के चलते मुझे रेल के बारे में 'ऑन द स्पॉट' कहानी रच कर सुनाई गई।

                                                        अदिति भट्ट का बनाया हुआ चित्र

"चीज़ खाओगी तो रेल से बात नहीं कर पाओगी। रेल उनसे बात नहीं करती जो रो रो कर चीज खाने की ज़िद्द करते हैं।"
(...हद है। मुझे पहले क्यों नहीं बताया कि ऐसा मामला है।) ..."फिर कैसे बात करेगी, बताओ...?"

"अरे कुछ नहीं देखो उसके आगे जाओ। वहीं उसका मुंह है गोल सा बोलने वाला। पापा तो वहीं जाकर उससे बात कर लेते हैं।"

फिर क्या था। जिस स्टेशन पर ट्रेन रुकती मैं आगे पहुँच जाती। मैंने बहुत कोशिश की, कि ट्रेन से बात हो जाये पर हुई नहीं। इस बीच मुझे उल्टी नहीं हुई और मैंने कोई ज़िद्द भी नहीं की। घर तक मैं यही पुछती रही कि पापा से कैसे बात करती है मुझसे तो बोली ही नहीं! फार्मूला काम कर रहा था। ... आज भी भैया मेरी बेवकूफी पर खूब हँसते हैं।   

कुछ ऐसी है भारतीय रेल। ढेरों किस्से हैं जो हर उस व्यक्ति के अंदर है जिसने इससे अपना सफर किया है। इसलिए जब यह हादसे होते हैं तो मानिए कि कुछ चकनाचूर हो जाता है। सही प्रबंधन न होना इसकी एक बड़ी वजह है। लोग भी इसकी ओर से बेरुखी दिखाते हैं। हम भला कौन सी ज़िम्मेदारी निभाते हैं? हमारी सरकारें जिस भी आदमी को इसका सरताज बनाती हैं वह रेल बजट निकाल कर ही निकल जाता है। मुझे रेलवे की खूब खबर तो नहीं लेकिन यह अहसास जरूर है कि इस पुरानी और चरमराती संपदा को एक सुगठित सुधार की बेहद जरूरत है।

हादसों की जवाबदेही तय करनी चाहिए। हम भारत के लोगों को वास्तव में 'हम' यह भारतीय रेल भी बनाती है। आपको ऐसा नहीं लगता? गर नहीं लगता तो जनाब आपने फिर रेल को जीया ही नहीं। रेल छुक छुक की आवाज़ से बढ़कर कुछ और भी है। जब फिल्म 'गांधी' या फिर अ ट्रेन टू पाकिस्तान' देखी तब उस आज़ादी से पहले और आसपास के भारत के चित्र दिमाग में  घुमने लगे। फिल्म 'वॉटर' में भी ट्रेन से जुड़ा एक अंत में बेहद खूबसूरत दृश्य है। इन फिल्मों के दृश्य में रेल एक बदलाव के साथ दिखाई देती है। एक सकारात्मक परिवर्तन की दस्तक देने वाली सूचक की तरह। आपने गुलज़ार साहब की मशहूर कहानी 'रावी पार' पढ़ी होगी। नहीं पढ़ी तो पढ़िये। आपको वह कहानी उस समय का दर्द बयां करेगी। एक रेल के ऊपर बैठे पिता के चेहरे से। तब आप न हिन्दू रह पाएंगे और न मुसलमान।

कुछ ऐसी है रेल। महज डिब्बे नहीं जिन्हें एक पुराना इंजन खींचता है। बल्कि रेल निशानी है जिंदगी में गति की और निरंतर बढ़ने की। आगे से छुक छुक न सुनिएगा बल्कि बात कर के लौटिएगा।... आपकी यात्रा शुभ हो!     



Friday, 18 November 2016

अपनी मरम्मत भी बहुत ज़रूरी है...

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में एक महिला द्वारा अपने पति को सरकारी अस्पताल में स्ट्रेचर न होने के कारण घसीट कर ले जाने का एक वीडियो फिर से सोशल मीडिया में छाया है। अखबारों और एक दो चैनलों के मुताबिक उस महिला को अपने बीमार पति के लिए एक स्ट्रेचर की जरूरत थी जो कि अस्पताल में मौजूद नहीं था। इसके अलावा अफसोस की बात यह है कि आसपास लोग भी मौजूद थे जों खड़े देखते रहे पर किसी ने भी उस महिला की मदद की जरूरत नहीं समझी। यहाँ अस्पताल प्रशासन की लापरवाही तो है ही साथ ही हमारे समाज के मरने का भी इशारा है।

हमें सरकार को गाली देने में जों सुख मिलता है वही सुख शायद अपने अंदर के नैतिक मूल्य को मरने की खबर नहीं होने देता। खुद मुझमें कितनी नैतिकता बाकी है इसका मुझे अंदाज़ नहीं पर इतना है कि मैं कई बार बाहर की दुनिया में कुछ गलत बातों की तरफ से अपना ध्यान हटा लेती हूँ। यह बचने की तमन्ना ही मेरा खोल है। यही अवरोध भी है। अपने अंदर एक सड़ने की प्रक्रिया को देख रही हूँ और अच्छी तरह से महसूस भी कर रही हूँ।  हम सभी धीरे धीरे सड़ ही रहे हैं। इसके बाद हमारी जगह कूड़ेदान होगा।


                                                 खोजिए अपनी जड़ें- फेकसाटन के सौजन्य से

कुछ महीने पहले इसी तरह की एक घटना ओड़ीसा के कालाहांडी में रहने वाले दानामाझी के साथ हुई थी। वह अपनी मृत पत्नी को अपने ही कंधे पर उठाकर अस्पताल से अपने घर तक की शव यात्रा कर रहे थे। इसमें भी अस्पताल प्रशासन की घोर लापरवाही सामने आती है। दिलचस्प है कि इस घटना को लेकर हर जगह बे-इंतहा शोर शराबा और प्रवचन कहे गए पर, कुछ दिनों बाद हुआ क्या?... साहब, सोशल मीडिया का जमाना है, जितनी तेज़ी से कुछ 'ब्रेकिंग ताज़ा माल' बिकता है उतनी तेज़ी से उसकी क़ीमत भी घट जाती है। कुछ बची खुची खबरों पर नज़र डालें तब यही पता चलता है कि दानामाझी अपनी बेटियों को पढ़ा रहे हैं। कोई नहीं जानता कि इस नोट बंदी में दानामाझी क्या बैंक के बाहर खड़ी कतार का एक हिस्सा हैं, क्या उनका भी नंबर आ पा रहा है या वह भी दो दिन लाईन में खड़े होकर वापस आ जाते हैं, हम बेखबर हैं। पक्की बात है कि नहीं जानते।

ठीक यही दशा इस महिला की है। चूंकि मेरा अभी तक का समय उत्तर भारत में ही गुजरा है वो भी एक छोटे से हिस्से में। ठीक से अपना शहर भी नहीं देखा। दूर से उड़कर जो कानों तक आया उससे लगा कि दक्षिण भारत के लोग एक दूसरे के साथ बेहतर बर्ताव करते हैं। काफी मददगार हैं। लेकिन जब केरल का जीशा बलात्कार और हत्याकांड सुना तब लगा कि नहीं मैं गलत थी। हर जगह के आधुनिक और पौराणिक मानव में बेहद दिक्कतें हैं और थीं।

                                                                    गूगल से लिया है

अपने देश की संस्कृति को महान बेशक आप जबरन कहलवा लीजिये पर यह भी अच्छी तरह से जान लीजिये कि महान को छत्तीस दफा महान कहने की जरूरत नहीं होती। ज़ात के नाम पर आप एक बहुत बड़े तबके को आज भी दूर से देख के राह बदल देते हैं। मुझे बताइये कि आप महान कब, क्यों, कहाँ और कैसे हो गए?

अगर आप को भ्रम पालने का शौक है तब पालते रहिए और एक दिन वही भ्रम जब अजगर बनेगा तब सबसे पहले आपको ही निगलेगा और डकार भी नहीं लेगा। इसलिए बचने के उपाय यही हैं कि बोलिए जब किसी को बेवजह रुलाया जाये, किसी का हक़ छिना जाये...इस तरह की खबरें ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं हैं बल्कि वे घटनाएँ हैं जो आपके कितने इंसान होने की जांच करती हैं।



नोटबंदी में 'बंदिनी'

जब भीड़ को समझना हो तब क़रीब से देखना एक अच्छा तरीका है। लेकिन आपको भीड़ का हिस्सा बनना होगा। घुस जाइए और जानिए कि भीड़ के घटक तत्व क्या हैं? लोग कहने से ही चेहरा समझ नहीं आएगा।

दो दिन से कतार का हिस्सा बन रही हूँ। साधारण होना आपको कई अच्छे मौक़े दे देता है। आम लोगों के बीच जगह बन जाती है। आसानी से मैं उनकी ज़िंदगी में थोड़ी देर के लिए घुस पाई। थोड़ा सा जान पाई उन्हें जो 'सेकंड सेक्स' हैं भारत जैसे देश में।

सरकार द्वारा नोटबंदी करने के फैसले से उन पर क्या असर पड़ा है, इसका अंदाज़ केवल उनसे बात करके ही मालूम चला। लाइन लगाने के लिए बैंक के बाहर लगभग 300 लोग थे। आदमी और औरत दोनों की संख्या में बहुत बड़ी असमानता नहीं थी। लेकिन गिनती की जाती तो शायद 'माओं' की संख्या ज़्यादा निकल आती। जी हाँ, कल और आज मुझे यही अनुभव हुआ कि कतार में ज़्यादातर शादीशुदा औरतें अधिक थीं जिनकी उम्र 30 साल से कुछ ऊपर जा रही थी। कुछ औरतें 50 तक थीं और थोड़ी सीनियर सिटिज़न में भी शामिल थीं।

                                                                  मिथिला चित्रकारी

बुझे चेहरों के साथ यह औरतें बैंक के गेट पर ही अपनी मुस्तैद नज़र जमाकर बैठी थीं। कई औरतों के सिर पर हाथ थे। हाथ में कभी खरीदे गये कपड़े के साथ आई पोलिथीन थीं जिनमें आधार का 'कारड' और 'फोरम' पड़ा था। कुछ एक दूसरे से कह रही थीं- "भई किसी को लाइन में घुसने मत देना। हम पागल हैं जो भूखे प्यासे खड़े हैं..."

बहुत देर खड़े रहने के कारण मुझे थकावट हो चली थी सो मैं कहीं कोई बैठने के लिए चबूतरा खोज रही थी तभी किसी महिला ने मुझे हताश चेहरे के साथ पीछे से कहा- "क्या आपके पास फुन है? एक फुन करना है बस!"...मैंने हाँ कहा और वह हिन्दी अंकों में नंबर बताने लगीं। मैंने नंबर लगाकर उन्हें फोन दिया तब वह बोलीं- "ज़ाहिद के अब्बू, अब खड़ा न हुआ जा रिया है। आ ही जाओ। पहले वाले बैंक वालों ने ये कह दिया है कि पैसा न है...अब दूसरे बैंक में आई हूँ। उसी के बगल में है। जल्दी आ जाओ।"

फोन देते हुए मुझे शुक्रिया बोलीं। मैंने कहा - "आप सीनियर सिटिज़न वाली लाइन में लग जाओ। क्यों परेशान हो रही हैं आप? वहाँ आपका जल्दी हो जाएगा।"

वो बोलीं- "नहीं लग सकती। उमर न है। लाइन से निकाल देंगे तो बेइज्जती सी लगेगी।"
वह औरत खड़े होकर इतना थक गई थी कि उन्हें जबरन बैठने के लिए लगातार कहा गया। पर वह टस से मस न हुई कि कहीं मेरा नंबर कोई दूसरा न हथिया ले। वह नहीं बैठी।

ऐसी ही एक औरत बंगाली भाषा में दूसरी ही बंगाली औरत से बोल रही थी- "कल 6 बजे आई थी। लाइन में लगी लेकिन काम नहीं हुआ। बताओ अंधेरे में कैसे आ जाऊं लगने! आज आँख नहीं खुल पाई तो 7 बजे आई हूँ।"

दूसरी ने भी अपनी मजबूरी बताई। उसका नंबर भी कल नहीं आ पाया था- "काफी लोग जो लाइन में खड़े थे भड़क गए और पुलिस वालों से झगड़ा भी हुआ। पुलिस वाला तो डर गया था। उसने फोन करके कई और अपने साथियों को बुलाया। मैंने भी अपना गुस्सा उतारा और 3-4 गलियाँ बक दीं। बताओ कोई क्या करेगा! गुस्सा तो आ ही जाता है जब खड़े रहो और काम न हो।"

                                                              मिथिला चित्रकारी है

एक औरत ने कहा- "हम तो सैलरी वाले लोग हैं। महीने के महीने तनखा आती है और खत्म भी हो जाती है। कुछ बचा लेते हैं। बच्चों वाले लोग हैं। नहीं बचाएंगे तो आड़े टेढ़े वक़्त किसके आगे हाथ फैलाएँगे।" वह यहीं नहीं रूकी और आगे बौखलाहट में बोलने लगीं - "सारी कमाई मेहनत की है फिर काला कहना का क्या मतलब? यहाँ तो कोई गाड़ी वाला दिखाई ही नहीं दे रहा...बेटी की फीस देनी है। तीन से लड़की की छुट्टी करवाई है। 'ये' काम पर जाएंगे मैं यहाँ हूँ तो घर में तो कोई होना ही चाहिए।"

ऐसे ही कई और बयान सुनने को मिले। ये औरतें वही हैं जो 20 रुपये दर्जन वाली पक्की चूड़ियों की तलाश कर कर के पहनती हैं, ताकि पक्की चुड़ियाँ कलाइयों में ज़्यादा दिनों तक टिकें। बार बार चूड़ियों को पहनने का खर्च कम हो। फेंसी चुड़ियाँ तो त्योहारों के लिए जतन से रखी जाती हैं। इन्हीं औरतों में कई औरतें इतनी मासूम थीं कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि बैंक में जाकर आखिर क्या क्या काम करने होंगे।  कई झुंड बनाकर आई थीं कि इकट्ठे होने में काम जल्दी हो जाएगा। साथ बना रहेगा। सबसे दुखद बात यह कि जैसे ही दिन शाम की तरफ बढ़ रहा था वैसे-वैसे ही इनके चेहरे पीले पड़ रहे थे।

भीड़ में से एक औरत ने कहा - "आज जाने दिन इतनी जल्दी क्यों बीत रहा है!" इसके बाद कई सिर डूबते हुए सूरज की ओर मुड़ गए।   

गौरतलब हो कि नारीवाद पर तमाम तरह की गोष्ठियाँ और बैठकें कर लेने वाले लोग इस लाइन के पास दिखे तक नहीं। न जाने वे कौन सी कतारों में खड़ी हैं और खड़े हैं! मिलते तो हाल चाल ही पूछ लेती।
   

Thursday, 17 November 2016

एक बहाना मिल गया अच्छा...सरकार ने आ के मेरा हाल (न) पूछा

अपने समय को दर्ज़ न करना सबसे बड़ा जुर्म है। खैर मुझे यह जुर्म नहीं करना इसलिए अपने हैसियत के अनुसार लिखने की कोशिश कर रही हूँ। मेरा समय बहुत हलचल वाला है। नई नीतियों, तकनीक, रहने के बदलते तौर-तरीकों, काम-धंधों, सम्बन्धों आदि में इन कारकों से हर समय की तरह हमारे समय में भी बदलाव हो रहे हैं।

जैसे ही 5 साल वाली सरकारें आती हैं, वैसे ही हमारे रहन-सहन में बदलाव आता है। हमारी शब्दावली बदल जाती है। कुछ शब्द राजनीतिक तरीके से जीभ पर 'ट्रांसप्लांट' किए जाते हैं। ऐसा नहीं है कि यह 'स्थापना' राजनीति ही करती है। बल्कि यह कई तरीकों से ताउम्र चलता रहता है। जैसे घर में बच्चों को रिश्ते संबंधी शब्द की सौगात देना, स्कूल में नागरिक संबंधी बर्ताव को पनपाना और तरह-तरह की विचारधाराओं को समझते समझाते हुए बड़ी बड़ी 'टर्मिनोलॉजी' की गहरी और आम समझ देना। यह सब तो चलता ही रहता है बॉस! पर कुछ जो यकायक हो जाए वह कैसे ज़ुबान, हाव भाव, रूटीन, समझ, माइंडसेट आदि बदलता है उसका उदाहरण मुझे आज मिला।  

एक्शन भी तो मायने रखता है। किसी का भी।

                                                                 वर्ली चित्रकारी

नोटबंदी जैसी नीति और एक्शन (लागूकरण) ने हर जगह के लोगों की ज़िंदगी को थाम कर रख लिया है। यहाँ बात सरकार के इस फैसले के पक्ष और विपक्ष की नहीं है। यह बहुत स्वाभाविक है कि कुछ लोग इस निर्णय के साथ हैं और कुछ नहीं भी हैं। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ दोनों ही से जुदा हैं। कई असमंजस की स्थिति में भी जरूर होंगे। खबरियों की भी खबर रखनी चाहिए। तो दोस्तों सभी चैनलों पर सूट बूट वाले कह रहे हैं कि नोटबंदी के फायदे भी होंगे। तो होंगे...हमने कब इंकार किया है। सरकार के पास बहुत दिमागदार लोग होंगे जिन्हों ने इस नीति के बारे में एक गहरा और लंबा शोध किया होगा। तभी तो इसे लागू किया गया। उन्हें बेहद उम्दा इल्म होगा कि इस नीति के क्या और कौन से नतीजे होंगे। मुझे इसमें दिलचस्पी अभी नहीं आ रही।

मैं बात, इस 'बात' पर भी नहीं कर रही। मुझे अपना मुद्दा निकाल कर लाने की बेहद मामूली समझ है। मैं बड़े बड़े विषयों पर डेटा वाली बहस नहीं कर सकती। मेरी सीमा है।



आज मैं भी सुबह के साढ़े आठ बजे वाली लाइन में जाकर लग गई। इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं था। मैं हैरत में थी कि लाइन लंबी इस शुरू होती सुबह में ही थी। उम्रदराज लोगों की लाइन छोटी थी और बाकी सभी लोग जो एक ही लाइन में लगे थे, उनकी सांप की तरह बलखाती हुई लंबी कतार थी। सभी के चेहरे बेरौनक़ थे। हम लोग आपसी बातचीत में लगे हुए थे। कई लोग जो बहुत सुबह से आए थे वे लघु शंका के लिए भी नहीं जा रहे थे कि कहीं उनको लाइन से बेदखली न मिल जाये या झगड़े फसाद में न हो जाये। लड़कियां और औरतें सूखे गले बैठे हुए थीं। खाना न खाकर आने की बात सभी ने कही। किसी को फॉर्म को भरने की गदर चिंता थी। सुनिए (पढ़िये) जरा कैसी पंक्तियाँ थीं उनकी ज़ुबानों पर-

  • कैसे भरते हैं, 
  • क्या कागज लाने हैं, 
  • दस्तख़त बहुत पहले किए थे...पर अब याद नहीं, कहीं रद्द न कर दें, 
  • कितना रुपया देंगे, मैं तो आठ हज़ार का चेक भर कर लाई हूँ, पता नहीं कहीं ये न कह दें कि कैश खत्म हो गया, 
  • बेटी की फीस भरनी है, कॉलेज वाले मान भी नहीं रहे,
  • मेरी कमर अब जवाब दे रही है, 
  • बताओ दो दिन(तीन दिन वाले भी)से आ रही हूँ, 
  • मैं बहुत परेशान हूँ, 
  • मैं क्या बताऊँ- दूसरे बैंक में लगे थे पर उन्हों ने भी भगा दिया, 
  • कोई इज्जत से बात भी नहीं कर रहा, 
  • मरे हुए को मार रहे हैं, पाप पड़ेगा, भगवान छोड़ेंगे नहीं, 
  • अरे अब भगवान भी नहीं रहा, 
  • गला सूख रहा है...पानी कैसे पियें,
  • टॉइलेट वाले 5 रुपये मांग रहे हैं,
  • क्या आप के फुन से एक 'फून' कर लूँ ,
  • ज़ाहिद के अब्बा, अब आ जाओ-मुझसे न खड़ा हो जा रिया है,
  • आज काम न बनेगा,
  • बताओ ऐसा भी कोई करता है, 
  • गरीब ही मरते हैं हमेशा,
  • घर में कुछ नहीं है,
  • बच्चे भी हमें देखकर मायूस हो जा रहे हैं,
  • हम तो आज छुट्टी लेकर आए हैं,
  • आप अपने आगे किसी को मत लगने देना,
  • आप तो पीछे थीं आगे कैसे आ गई- बताओ हम बेवकूफ हैं,
  • अब मैं घर कैसे चलाऊँ,
  • हद हो गई है अब,
  • बुड्डे लोगों को चुनोगे तो यही होगा,
  • सभी गला काटने के लिए आते हैं, 
  • हमें कुछ लेना देना नहीं है बस पैसे मिल जाएँ,
  • अच्छा किया सरकार ने लेकिन तैयारी तो कर लेते,
  • अरे नए नोटों से रंग छूट रहा है,
  • चूरन वाले नोट हैं, 
  • दिक्कत यहाँ ये भी है कि दो हज़ार का खुल्ला भी नहीं हो रहा,
  • दबा के जूता मार रहे हैं,
  • ढाई साल रुक जाओ यार, 
  • हमें तो कछु जानकारी नाय है,
  • लाइन आगे सरक क्यों न रही है,
  • उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है,
  • 4 बजे तक कूपन देंगे,
  • काम कितनी धीरे धीरे कर रहे हैं,
  • ये भी तो इंसान है,
  • कितनी देर से लंच कर रहे हैं...
  • पुलिस वाले क्या कम हैं, ये और मज़ा कर रहे हैं 
  • धमका भी रिये हैं
  • इनसे कौन बोलेगा 
  • रात को भी 7 बजे तक बैंक खुले थे, अमीरन के लिए 
  • आज काम नहीं हुआ तो 3 बजे आऊँगा रात को 
  • हद है क्या करें हम किरायेदार   
  • थोड़े दिन बाद सब ठीक हो जाएगा 

मेरा मकसद सरकार की छवि गिराने का नहीं है न ही किसी तरह की बहस-विवाद करने का। थोड़ा सा देखिये और समझिए की ज़मीन पर क्या चल रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि कई लोगों का काम बेहद 'स्मूद' तरीके से हुआ होगा। लेकिन ऐसे रुझान मुझे नहीं मिले। जो मिलें वे मैंने यहाँ अपनी याद को पछाड़ते हुए छाप दिये।

इन हालातों में बहस छोड़ कर कैसे प्रबंध किए जाने चाहिए, इस पर सरकार को ध्यान देना जरूरी है। यकीन मानिए स्थिति उतनी अच्छी नहीं है। न्यूज़ चैनलों पर अधिक विश्वास न करें। ऐसा मालूम होता है कि वह देश विशेष रिपोर्टिंग न कर के पार्टी और कुछ लोगों की रुचि विशेष कार्यक्रम दिखा रहे हों।

रुकिए कुछ लोगों को मेरी यह बात बेहद विरोधी लगेगी। उसमें मुझे कोई दिक्कत नहीं। मुझे जो दिखा और जो मैंने महसूस किया वही रच डाला। मुझ पर छापे मारने वाले पहले सुबह से शाम तक लाइन में लगें तब मुंह खोलें। तब तक जय बम भोले।

ईश्वर सबको धैर्य दे!  
   

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...