तमाम
खयालों के बीच ही उसे फिर नींद आ गई। जब इस बार उसकी आँख खुली और वह बिस्तर से
उठकर बाहर आया, तब तक उसका पिता
फैक्टरी जा चुका था, जहाँ उसे
आधे दिन काम करना था। रॉय रसोई में बैठा अपनी माँ से झगड़ रहा था। बच्ची रूथ अपनी
ऊँची कुर्सी पर बैठी दलिया लगे चम्मच से सामने लगी पट्टी पर ठक-ठक कर रही थी। इसका
मतलब था कि वह अच्छे मूड में थी। वह दिन भर किसी ऐसी वजह के जिसे केवल वही जानती थी, चीख-चीखकर रोती नहीं रहेगी और न ही किसी को, अपनी माँ के अलावा, खुद को छूने देगी। सारा चुप थी। आज वह बकबक नहीं कर रही थी
या कम-से-कम अभी तक नहीं कर रही थी। वह चूल्हे के पास, बाँहें मोड़े खड़ी थी और रॉय को उन सपाट, काली आँखों से घूर रही थी। वे आँखें उसके पिता की थीं और
उन्हीं के कारण सारा अपनी उम्र से कहीं अधिक बड़ी दिखाई देती थी।
उनकी माँ ने सिर पर एक
पुराना कपड़ा बाँध रखा था। वह काली कॉफी की चुस्कियाँ लेते हुए रॉय को देख रही थी।
सर्दी के अंत की फीकी धूप कमरे में भर गई थी और उन सबके चेहरों को पीला कर रही थी।
जॉन, नींद की खुमारी और उदासी में डूबा हुआ, यह सोचते हुए कि वह फिर कैसे सो गया और उसे इतनी देर तक सोने कैसे दिया
गया, कुछ क्षणों के लिए उन्हें ऐसे देख रहा था, मानो वे किसी पर्दे पर दिखाई देने वाली आकृतियाँ हों। पीली रोशनी इस
प्रभाव को और गहरा कर रही थी। कमरा सँकरा और गंदा था। उसकी बनावट और आकार को कोई
चीज़ बदल नहीं सकती थी। कोई भी मेहनत उसे कभी साफ़ नहीं कर सकती थी। दीवारों और
फर्श की तख्तियों में गंदगी समाई हुई थी और सिंक के नीचे तो उसका बोलबाला था,
जहाँ तिलचट्टे पैदा होते थे। बर्तनों और कड़ाहियों की महीन धारियों
में भी गंदगी भरी थी। वे हर दिन माँजी जाती थीं। वे नीचे से काली पड़ चुकी थीं और
चूल्हे के ऊपर टँगी रहती थीं। जिस दीवार पर वे बर्तन टँगे थे, उसमें भी गंदगी थी। जहाँ-जहाँ रंग चटक गया था, वहाँ
वह दिखाई देती थी। रंग के कड़े चौकोर टुकड़े और किरचें बाहर की ओर उभरी हुई थीं और
उनके नीचे कागज़ जैसी पतली सतह पर काली जालियाँ-सी बनी हुई थीं। उस भद्दे, विशाल चूल्हे के हर कोने, हर कोने और हर दरार में
गंदगी थी। उसके पीछे भी वह गंदगी उस सड़ी-गली दीवार के साथ एक उन्मत्त सहजीवन में
रहती थी। गंदगी उस चौखट की पट्टी में भी थी, जिसे जॉन हर
शनिवार रगड़-रगड़कर साफ करता था। उसी ने अलमारी की उन ताकों को खुरदरा बना दिया था,
जिन पर दरार पड़े हुए। फिर भी वहाँ चमकते बर्तन रखे थे। इस काले बोझ
के नीचे दीवारें झुकी हुई थीं। इसी बोझ के नीचे छत भी झुकी हुई थी और उसके
बीचोंबीच बिजली की चमक जैसी एक बड़ी दरार थी, जिसके कारण छत
नीचे को धँसी हुई लगती थी। खिड़कियाँ ऐसे चमक रही थीं जैसे, उन्हें सोने या चाँदी
की चादर पर पीट-पीटकर चमकाया गया हो। लेकिन अब जॉन ने पीली रोशनी में देखा कि महीन
धूल ने उनकी उस संदिग्ध चमक पर भी परदा डाल रखा था। खिड़कियों के बाहर सुखाने के
लिए टाँगे गए धूसर पोछे में भी गंदगी रेंग रही थी। जॉन ने शर्म और भय के साथ,
एवं अपने हृदय की कठोरता में एक तरह के क्रोध के साथ सोचा, “जो गंदा है, वह गंदा ही बना रहे।” फिर उसने अपनी माँ
की ओर देखा। उसे ऐसा लगा, मानो वह उसकी माँ नहीं, कोई और स्त्री हो। उसकी आँखों से नीचे की ओर खिंची हुई काली, कठोर रेखाएँ थीं। माथे पर हमेशा बनी रहने वाली गहरी शिकन थी। होंठ नीचे की
ओर झुके हुए और कसकर भींचे हुए थे। उसके हाथ मजबूत, पतले,
साँवले और हड्डियों से उभरे हुए थे। तब वही वाक्य पलटकर दोधारी
तलवार की तरह उस पर ही आ पड़ा। क्या वह स्वयं ही, अपने झूठे
गर्व और अपनी दुष्ट कल्पना में, गंदा नहीं था? आँसुओं के एक ऐसे तूफान के बीच, जो उसकी आँखों तक
पहुँच ही नहीं पा रहा था, वह उस पीले कमरे को घूरता रहा। फिर
कमरा बदलता हुआ-सा लगा, सूरज की रोशनी गहरी पड़ गई और उसकी
माँ का चेहरा बदल गया। उसका चेहरा वैसा हो गया, जैसा चेहरा
जॉन अपने सपनों में उसे देता था। वही चेहरा जो उसने बहुत पहले एक तस्वीर में देखा
था, ऐसी तस्वीर में जो उसके जन्म से पहले खींची गई थी। वह
चेहरा एक जवान और गर्वीली स्त्री का था। ऊपर उठा हुआ, मुस्कान
से भरा हुआ। उस मुस्कान ने उसके चौड़े मुँह को सुंदर बना दिया था और उसकी विशाल
आँखों में एक चमक भर दी थी। वह ऐसी लड़की का चेहरा था जो जानती थी कि कोई भी बुराई
उसे परास्त नहीं कर सकती और जो निश्चय ही हँस सकती थी। वैसे, जैसे उसकी माँ अब नहीं हँसती थी। इन दोनों चेहरों के बीच एक अँधेरा और एक
रहस्य फैला हुआ था। ऐसा अँधेरा और रहस्य, जिससे जॉन डरता था
और जो कभी-कभी उसे अपनी माँ से घृणा करने पर मजबूर कर देता था।
अब उसकी माँ ने उसे देख लिया और रॉय से अपनी बातचीत रोककर
पूछा,
“भूख लगी है, छोटे से नींदू[1]?”
“अच्छा! तुम्हें अब जाकर उठने की फुर्सत मिली,” सारा ने कहा।
वह मेज़ के पास गया और बैठ गया। अपने जीवन की सबसे विचित्र
और उलझन भरी घबराहट उसे महसूस हो रही थी—उसका मन कर रहा था कि वह मेज़, कुर्सियों और कमरे की दीवारों को छू-छूकर यह पक्का कर ले कि
यह कमरा सचमुच मौजूद है और वह सचमुच इसी कमरे में है। उसने अपनी माँ की ओर नहीं
देखा। उसकी माँ उठकर उसका नाश्ता गरम करने के लिए चूल्हे के पास चली गई थी। लेकिन
उसने उससे कुछ कहने के लिए और अपनी ही आवाज़ सुनने के लिए पूछा, “नाश्ते
में क्या है?”
उसे कुछ शर्म के साथ एहसास हुआ कि वह मन ही मन उम्मीद कर
रहा था कि उसके जन्मदिन के लिए उसकी माँ ने उसके लिए कोई खास नाश्ता बनाया होगा।
“तुम्हें क्या लगता है, नाश्ते में क्या है?” रॉय ने व्यंग्य से पूछा। “कोई खास चीज़ खाने का मन है क्या?” जॉन ने उसकी ओर देखा। रॉय का मूड अच्छा नहीं था।
“मैंने तुमसे तो कुछ नहीं कहा,” उसने कहा। “ओह, माफ़
करना,”
रॉय ने उस तीखी, छोटी बच्ची जैसी आवाज़ में कहा, जिसे सुनना जॉन को बेहद नापसंद था।
“आज तुम्हें क्या हो
गया है?” जॉन ने गुस्से में पूछा। साथ ही वह अपनी आवाज़ को
जितना संभव हो सके, उतना भारी और कर्कश बनाने की कोशिश कर
रहा था। “रॉय को अपने ऊपर हावी मत होने दो,” उनकी माँ ने कहा। “आज सुबह से वह बहुत चिड़चिड़ा है।”
“हाँ,” जॉन ने कहा,
“मैं भी यही समझता हूँ।” वह और रॉय एक-दूसरे को देखते रहे। तभी उसकी
प्लेट उसके सामने रख दी गई, होमिनी ग्रिट्स और बेकन का एक छोटा-सा टुकड़ा। उसका मन
बच्चे की तरह रो पड़ने को हुआ, “लेकिन माँ, आज मेरा जन्मदिन
है!” मगर उसने अपनी आँखें प्लेट पर ही टिकाए रखीं और खाना शुरू कर दिया।
“तुम अपने डैडी के बारे में जितना चाहे कह
सकते हो,” उसकी माँ ने रॉय के साथ अपनी बहस फिर शुरू करते
हुए कहा, “लेकिन एक बात तुम नहीं कह सकते। तुम यह नहीं कह
सकते कि उन्होंने तुम्हारे पिता होने की पूरी कोशिश हमेशा नहीं की और यह सुनिश्चित
नहीं किया कि तुम्हें कभी भूखा न रहना पड़े।”
“मैं बहुत बार भूखा रहा हूँ,” रॉय ने कहा। उसे अपनी माँ के खिलाफ यह बात साबित कर पाने पर गर्व हो रहा
था।
“तो उसमें उनकी गलती नहीं थी। ऐसा इसलिए नहीं
था कि वह तुम्हें खाना खिलाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। उस आदमी ने शून्य से भी
नीचे तापमान में बर्फ हटाने का काम किया। जबकि उसे बिस्तर में होना चाहिए था। सिर्फ
इसलिए कि तुम्हारे पेट में खाना जा सके।”
“सिर्फ मेरे पेट में तो नहीं,” रॉय ने नाराज़गी से कहा। “उनका भी पेट है, यह तो
मुझे पता है। और यह भी पता है कि वह आदमी किस तरह खाता है, शर्म
की बात है। मैंने उनसे अपने लिए बर्फ हटाने को तो कहा नहीं था।” उसने अपनी आँखें
नीचे कर लीं, क्योंकि उसे अपने तर्क में कुछ कमी महसूस होने
लगी थी। आखिर में उसने कहा, “मैं बस इतना नहीं चाहता कि वह
हर समय मुझे पीटते रहें। मैं कोई कुत्ता नहीं हूँ।”
उसकी माँ ने आह भरी और थोड़ा दूसरी ओर मुड़कर खिड़की से
बाहर देखने लगी। “तुम्हारे
डैडी तुम्हें इसलिए मारते हैं,” माँ ने कहा, “क्योंकि वह तुमसे प्यार करते हैं।”
रॉय हँसा। “उस तरह का प्यार मेरी समझ में तो नहीं आता, मेरी
बुजुर्ग माँ। तुम्हारे हिसाब से, अगर वह मुझसे प्यार नहीं
करते होते तो मेरे साथ क्या करते?”
“तब वह तुम्हें यूँ ही आगे बढ़ते जाने देते,”
वह झल्लाकर बोली, “सीधे नरक की ओर... ऐसा लग
रहा है कि तुम वहाँ जाने के लिए पूरी तरह दृढ़ हो! जाओ, मिस्टर,
आगे बढ़ते जाओ, जब तक कोई तुम्हें चाकू न मार
दे या तुम्हें जेल न ले जाए!”
“माँ,” जॉन ने अचानक
पूछा, “क्या डैडी अच्छे आदमी हैं?”
उसे खुद भी नहीं पता था कि वह यह सवाल पूछने वाला है। अब वह
हैरानी से अपनी माँ को देख रहा था। उसका मुँह सिकुड़ गया था और उसकी आँखों में
अँधेरा उतर आया था।
“यह कैसा सवाल है?” उसने
शांत स्वर में कहा। “तुम्हें उनसे बेहतर कोई आदमी पता है क्या?”
“मुझे तो वह बहुत अच्छे आदमी लगते हैं,”
सारा ने कहा। “वह हर समय प्रार्थना करते रहते हैं।”
माँ ने सारा की बात को अनसुना करते हुए कहा, “तुम बच्चे अभी छोटे हो। तुम्हें यह पता ही
नहीं कि तुम कितने भाग्यशाली हो कि तुम्हारे पास ऐसा पिता है, जो तुम्हारी चिंता करता है और यह कोशिश करता है कि तुम अच्छे इंसान बनकर
बड़े हो।”
“हाँ,” रॉय ने कहा,
“हमें तो पता ही नहीं कि हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमारे ऐसे पिता
हैं, जो हमें सिनेमा जाने नहीं देना चाहते, गलियों में खेलने नहीं देना चाहते, दोस्त नहीं बनाने
देना चाहते... जिन्हें यह नहीं चाहिए और वह नहीं चाहिए, जो
नहीं चाहते कि हम कुछ भी करें। हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमारे ऐसे पिता हैं,
जो बस चाहते हैं कि हम चर्च जाएँ, बाइबल पढ़ें,
वेदी के सामने किसी पागल की तरह चिल्लाएँ और घर में चूहे के बच्चे
की तरह चुपचाप, शांति से बैठे रहें। हम सचमुच बहुत भाग्यशाली
हैं, इसमें कोई शक नहीं। पता नहीं मैंने ऐसा क्या किया था कि
मैं इतना भाग्यशाली निकला।”
माँ हँस पड़ी। “एक दिन तुम्हें पता चल जाएगा,” उसने कहा, “मेरी बात याद रखना।”
“हाँ,” रॉय ने कहा।
“लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होगी,” उसने कहा। “जब तुम्हें पछतावा होगा, तब बहुत देर हो
चुकी होगी…” माँ की आवाज़ बदल गई थी। एक पल के लिए उसकी आँखें जॉन की आँखों से
मिलीं और जॉन डर गया। उसे लगा कि उसके ये शब्द, ठीक उस अजीब
ढंग से जैसे कभी-कभी ईश्वर मनुष्यों से बात करना चुनता है, मानो
स्वर्ग से उसके पास भेजे गए हों और उसी के लिए कहे गए हों। वह चौदह साल का था... क्या
बहुत देर हो चुकी थी? इस बेचैनी को उस एहसास ने और गहरा कर
दिया, जिसे उसी क्षण उसने महसूस किया कि यह भावना उसके मन
में पहले से ही थी। उसकी माँ जो कुछ कहना चाहती थी, वह सब
नहीं कह रही थी। उसने सोचा, जब माँ और आंटी फ्लोरेंस आपस में
बातें करती हैं तो वह उनसे क्या कहती है? या अपने पिता से?
उसके मन में क्या विचार हैं? उसका चेहरा कभी
यह नहीं बता पाता था। और फिर भी, उस क्षण जब उसने नीचे झुककर
जॉन की ओर देखा, जो किसी गुप्त, क्षणिक
संकेत जैसा था, उसके चेहरे ने उसे सब कुछ बता दिया। उसके मन
में कड़वाहट थी।
“मुझे कोई परवाह नहीं,”
रॉय ने उठते हुए कहा। “जब मेरे बच्चे होंगे तो मैं उनके साथ ऐसा
व्यवहार नहीं करूँगा।” जॉन अपनी माँ को देख रहा था। माँ रॉय को देख रही थी। “मुझे पूरा यक़ीन है कि बच्चों के साथ ऐसा नहीं किया जाता। अगर तुम्हें यह
नहीं पता कि बच्चों के साथ कैसे पेश आना चाहिए तो तुम्हें घर भर बच्चे पैदा करने
का कोई हक़ नहीं है।”
“आज सुबह तो तुम बड़े ही समझदार और बड़े हो
गए हो,” उसकी माँ ने कहा। “ज़रा संभलकर।”
“और मुझे एक बात और बताओ,” रॉय ने अचानक अपनी माँ की
ओर झुकते हुए कहा, “मुझे यह बताओ कि वह मुझे कभी उस तरह उससे
बात क्यों नहीं करने देता, जिस तरह मैं तुमसे बात करता हूँ?
वह मेरा पिता है, है न? लेकिन
वह कभी मेरी बात सुनता ही नहीं। मुझे हर
समय उसी की बात सुननी पड़ती है।”
“तुम्हारे पिता,” माँ ने
उसकी ओर देखते हुए कहा, “तुमसे बेहतर जानते हैं। तुम अपने
पिता की बात मानोगे, मैं तुम्हें यक़ीन दिलाती हूँ तो कभी
जेल नहीं पहुँचोगे।”
रॉय ने गुस्से में जीभ से चटखारे की आवाज़ की। “मैं जेल
जाने की सोच भी नहीं रहा हूँ। क्या तुम्हें लगता है कि इस दुनिया में बस जेल और
चर्च ही हैं? तुम्हें इससे बेहतर
मालूम होना चाहिए, माँ।”
“मुझे मालूम है,” माँ ने
कहा, “कि प्रभु के सामने विनम्र होकर चलने के अलावा और कोई
सुरक्षा नहीं है। एक दिन तुम्हें भी यह बात समझ में आ जाएगी। आगे बढ़ो, ज़िद्दी लड़के। तुम्हें इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा।”
अचानक रॉय मुस्कराया।
“लेकिन जब मैं मुसीबत में पड़ूँगा, तब तुम मेरे साथ रहोगी न,
माँ?”
“तुम नहीं जानते,” माँ ने
मुस्कराने से खुद को रोकने की कोशिश करते हुए कहा, “कि प्रभु
मुझे तुम्हारे साथ और कितने समय तक रहने देगा।”
रॉय मुड़ा और नाचने की एक अदा करने लगा। “कोई बात नहीं,” उसने कहा। “मुझे मालूम है, प्रभु डैडी जितने कठोर नहीं हैं। हैं न, जॉन ?”
उसने जॉन से पूछा और उसके माथे पर हल्की-सी चपत लगाई।
“मुझे अपना नाश्ता खाने दो,” जॉन बुदबुदाया। हालाँकि उसकी प्लेट बहुत देर पहले ही खाली हो चुकी थी और
वह इस बात से खुश था कि रॉय का ध्यान अब उसकी ओर हो गया था।
“वह तो सचमुच बड़ा अजीब लड़का है,” सारा ने गंभीरता से रॉय के लिए कहा।
“ज़रा सुनो,” रॉय
चिल्लाया, “इस छोटी संत को! डैडी को इससे कभी कोई परेशानी
नहीं होगी। यह तो पैदा ही पवित्र हुई है। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि इसने अपने
जीवन में जो पहले शब्द बोले होंगे, वे थे—‘धन्यवाद, यीशु।’ है न, माँ?”
“अब यह बेवकूफी बंद करो,” माँ हँसते हुए बोली, “और अपने काम पर लग जाओ। कोई
तुम्हारे साथ पूरी सुबह बेवकूफी नहीं कर सकता।”
“ओह, तो आज सुबह मेरे
लिए कोई काम है? अच्छा, वाह!” रॉय ने
कहा। “क्या काम है मेरे लिए?”
“डाइनिंग-रूम की लकड़ी की पैनलिंग का काम
तुम्हें करना है। और तुम यह काम करोगे भी, इससे पहले कि इस
घर से अपना पैर बाहर निकालो।”
“अब तुम इस तरह क्यों बोल रही हो, माँ? क्या मैंने कहा है कि मैं यह काम नहीं करूँगा?
तुम्हें मालूम है जब मेरा मन होता है तो मैं बहुत अच्छा काम करता
हूँ। इसे कर लेने के बाद क्या मैं जा सकता हूँ?”
“पहले काम करो, फिर
देखेंगे। और बेहतर होगा कि इसे ठीक से करना।”
“मैं हमेशा ठीक से करता हूँ,” रॉय ने कहा। “जब मैं अपना काम पूरा कर लूँगा तो तुम्हें अपनी पुरानी लकड़ी
की पैनलिंग पहचान में ही नहीं आएगी।”
“जॉन,” उसकी माँ ने कहा, “अच्छे बच्चे की तरह मेरे लिए
सामने वाला कमरा बुहार दो और फर्नीचर की धूल भी झाड़ देना। मैं यहाँ सफाई करने
वाली हूँ।”
“जी माँ,” उसने कहा और
उठ खड़ा हुआ। उसकी माँ उसका जन्मदिन भूल चुकी थी। उसने कसम खाई कि वह इसका ज़िक्र
नहीं करेगा। अब वह इसके बारे में और नहीं सोचेगा।
सामने वाले कमरे की सफाई करने का मतलब मुख्य रूप से उस भारी, लाल, हरे और बैंगनी
रंग के प्राच्य शैली (पूर्वी शैली) के कालीन को बुहारना था, जो
कभी उस कमरे की शान हुआ करता था। लेकिन अब वह इतना फीका पड़ चुका था कि उसके सारे
रंग आपस में घुलकर एक ही धुँधले रंग जैसे लगते थे और जगह-जगह से इतना घिस चुका था
कि झाड़ू उसमें उलझ जाती थी। जॉन को इस कालीन को बुहारना बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि
धूल उड़कर उसके नथुनों को भर देती थी और पसीने से चिपचिपी उसकी त्वचा पर चिपक जाती
थी। उसे लगता था कि अगर वह इसे हमेशा-हमेशा बुहारता रहे, तब
भी धूल के बादल कम नहीं होंगे और कालीन साफ नहीं होगा। उसकी कल्पना में यह एक ऐसा
असंभव, जीवन भर चलने वाला काम बन गया था, एक कठिन परीक्षा। ठीक उस आदमी की तरह, जिसके बारे
में उसने कहीं पढ़ा था। उस आदमी का अभिशाप यह था कि वह एक विशाल पत्थर को एक खड़ी
पहाड़ी पर ऊपर धकेलता। लेकिन जैसे ही वह उसे ऊपर पहुँचा पाता, पहाड़ी की रखवाली करने वाला दैत्य उस पत्थर को फिर नीचे लुढ़का देता और यह
सिलसिला हमेशा, अनंत काल तक चलता रहता। वह अभागा आदमी अब भी
कहीं पृथ्वी के दूसरे छोर पर अपनी पहाड़ी पर उस पत्थर को ऊपर धकेल रहा था। जॉन को
उससे पूरी सहानुभूति थी क्योंकि शनिवार की सुबह उसके काम का सबसे लंबा और कठिन
हिस्सा इसी अंतहीन कालीन पर झाड़ू लेकर की जाने वाली उसकी यात्रा थी। जब वह
लिविंग-रूम के आखिर में लगे उन काँच के दरवाज़ों तक पहुँचता, जो कालीन को वहीं रोक देते थे तो उसे ऐसा लगता जैसे कोई बेहद थका-हारा
मुसाफिर आखिरकार अपना घर देख रहा हो। लेकिन जितनी मेहनत से वह दरवाज़े की चौखट पर
एक-एक करके धूल की तसली भरता जाता, उतनी ही देर में मानो कोई
दानव कालीन पर बीस गुना और धूल डाल देता। वह अपने पीछे फैले कालीन पर नज़र डालता
और देखता कि जो धूल उसने अभी-अभी उड़ाई थी, वह फिर से कालीन
में बैठ रही थी। धूल से मुँह भर जाने के कारण वह पहले ही चिड़चिड़ा हो चुका था। वह
दाँत भींच लेता और यह सोचकर लगभग रो पड़ता कि इतनी सारी मेहनत के बदले उसे इतना
थोड़ा-सा इनाम ही मिल रहा था।
जॉन की मेहनत यहीं खत्म नहीं हुई। झाड़ू और धूल की तसली रख
देने के बाद उसने सिंक के नीचे रखी छोटी बाल्टी से धूल झाड़ने वाला कपड़ा, फर्नीचर पर लगाने का तेल और एक गीला कपड़ा
निकाला और फिर बैठक में लौट आया। ऐसा लगता था मानो धूल उनके घर-गृहस्थी के सामान
को दफन कर देने पर तुली हो और जॉन उस धूल में से अपने परिवार के सामान और औज़ार को
खोदकर निकाल रहा हो। अपने जन्मदिन के बारे में कड़वाहट से सोचते हुए उसने कपड़े से
आईने को साफ करना शुरू किया। धीरे-धीरे धुंध के बादल के बीच से उसका चेहरा उभर
आया। एक झटके के साथ उसने देखा कि उसका चेहरा नहीं बदला था। शैतान का हाथ अभी तक
दिखाई नहीं दे रहा था। उसके पिता हमेशा कहते थे कि उसका चेहरा शैतान का चेहरा है। क्या
सचमुच उसके चेहरे में कुछ ऐसा नहीं था, जो उसके पिता की बात
की गवाही देता हो? भौंहों के उठाव में, उसके खुरदरे बालों के माथे पर अंग्रेज़ी के अक्षर वी (V) की तरह बनने के ढंग में... क्या वहाँ ऐसा कुछ नहीं था? उसकी आँखों में ऐसी चमक थी, जो स्वर्ग की रोशनी
नहीं थी। उसका मुँह वासना और अश्लीलता से काँपता हुआ मानो नरक की मदिरा को गहराई
तक पी जाने के लिए लालायित था। वह अपने चेहरे को इस तरह घूरता रहा, मानो वह सचमुच किसी अजनबी का चेहरा हो और जल्द ही उसे वह ऐसा ही दिखाई
देने लगा। ऐसा अजनबी, जिसके पास ऐसे रहस्य थे जिन्हें जॉन
कभी जान नहीं सकता था। और जब उसने अपने चेहरे को एक अजनबी का चेहरा मान लिया तो
उसने कोशिश की कि उसे उसी तरह देखे जैसे कोई अजनबी उसे देख सकता था। उसने यह समझने
की कोशिश की कि दूसरे लोग उसके चेहरे में क्या देखते होंगे। लेकिन उसे केवल
अलग-अलग चीज़ें दिखाई दीं। दो बड़ी-बड़ी आँखें, चौड़ा और
नीचा माथा, उसकी नाक का त्तिकोना आकार, उसका बहुत बड़ा मुँह और ठुड्डी में मुश्किल से दिखाई देने वाली एक छोटी-सी
फाँक। उसके पिता कहते थे कि वह फाँक शैतान की छोटी उँगली का निशान थी। लेकिन इन
अलग-अलग विशेषताओं से जॉन को कोई मदद नहीं मिली क्योंकि इन सबको एक साथ जोड़ने
वाली मूल बात उसकी समझ से बाहर थी। वह उस बात को नहीं जान पा रहा था, जिसे वह सबसे अधिक उत्कटता से जानना चाहता था, क्या उसका चेहरा कुरूप था
या नहीं।
और उसने अपनी नज़र
मेंटलपीस पर झुका दी। उस पर सजी चीज़ों को वह एक-एक करके उठाने लगा। मेंटलपीस पर
एक अजीब-सी अव्यवस्थित सजावट के बीच तस्वीरें, शुभकामना
कार्ड, फूलों से सजे हुए सूक्तिवाक्य, दो
चाँदी की मोमबत्तियाँ थीं, जिनमें कोई मोमबत्ती नहीं लगी थी और
हरे रंग की धातु का एक साँप था, जो डसने के लिए फन उठाए
तैयार था। आज अपनी उदासीनता में जॉन उन्हें बिना वास्तव में देखे घूरता रहा। वह उन
पर उस अत्यधिक सावधानी से धूल झाड़ने लगा जैसे, गहरे विचारों में डूबा हुआ कोई
व्यक्ति अनमने ढंग से करता है। उन सूक्तिवाक्यों में से एक गुलाबी और नीले रंग का
था और उस पर उभरे हुए अक्षरों में लिखा था, जिससे धूल झाड़ना
और भी कठिन हो जाता था:
शाम
को आओ या सुबह को आओ,
जब तुम्हारी राह देखी जाए तब आओ या बिना बताए आओ,
तुम्हें यहाँ हज़ारों अभिनंदन मिलेंगे,
और तुम जितनी बार यहाँ आओगे, हम तुम्हें उतना
ही अधिक चाहेंगे।
और
दूसरे पर सुनहरी पृष्ठभूमि में अग्नि जैसे चमकते अक्षरों में लिखा था:
“क्योंकि परमेश्वर ने संसार से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र
दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो बल्कि
अनन्त जीवन पाए।”
यूहन्ना
3:16
मेंटलपीस के दोनों ओर
ये कुछ हद तक एक-दूसरे से असंबद्ध भावनाएँ सजी हुई थीं, जिन्हें
चाँदी की मोमबत्तियों ने थोड़ा-सा ढक रखा था। इन दोनों छोरों के बीच, साल-दर-साल क्रिसमस, ईस्टर या जन्मदिन पर मिले
शुभकामना कार्ड अपनी खुशखबरियाँ मानो ऊँची आवाज़ में सुनाते रहते थे। जबकि हरे रंग
का धातु का साँप, जो हमेशा दुष्टता से भरा दिखाई देता था,
इन तमाम स्मृति-चिह्नों के बीच गर्व से अपना सिर उठाए रहता था और
डसने के अवसर की प्रतीक्षा करता था। आईने के सामने तस्वीरें एक जुलूस की तरह क्रम
से सजी हुई थीं।
ये तस्वीरें परिवार की असली पुरानी धरोहर थीं। ऐसा लगता था, मानो इस परिवार का मानना हो कि तस्वीर केवल
बहुत दूर बीते अतीत की ही यादगार होनी चाहिए। जॉन और रॉय की तथा दोनों लड़कियों की
तस्वीरें, जो इस अनकहे नियम का उल्लंघन करती हुई लगती थीं,
वास्तव में उसी नियम को और भी अटल साबित करती थीं। वे सभी तस्वीरें
उनके बचपन की थीं, उस समय की और उस अवस्था की, जिसे बच्चे याद भी नहीं कर सकते थे। अपनी तस्वीर में जॉन सफेद चादर पर
नंगा लेटा हुआ था और लोग हँसकर कहते थे कि वह कितना प्यारा लग रहा है। लेकिन जॉन
उस तस्वीर को कभी भी बिना शर्म और गुस्सा महसूस किए नहीं देख पाता था कि उसके नंगे
शरीर को इतनी बेरहमी से यहाँ सबके सामने दिखा दिया गया था। बाकी किसी बच्चे की
तस्वीर में उसका शरीर नंगा नहीं था। रॉय अपनी पालने में सफेद गाउन पहने लेटा हुआ
था और कैमरे की ओर बिना दाँतों वाली मुस्कान बिखेर रहा था। छह महीने की सारा,
गंभीर मुद्रा में, सफेद टोपी पहने हुए थी। जबकि
रूथ अपनी माँ की बाँहों में थी। जब लोग इन तस्वीरों को देखते और हँसते तो उनकी
हँसी उस हँसी से अलग होती थी, जो वे नंगे जॉन को देखकर हँसते
समय हँसते थे। इसी कारण जब मेहमान जॉन से घुलने-मिलने की कोशिश करते तो वह रूखा और
उदासीन बना रहता। वे यह समझकर कि न जाने क्यों जॉन उन्हें पसंद नहीं करता, बदले में यह तय कर लेते कि वह एक “अजीब” बच्चा है।
बाकी तस्वीरों में एक
तस्वीर आंटी फ्लोरेंस की भी थी, जो उसके पिता की बहन थीं। उस
तस्वीर में पुराने ज़माने के ढंग से उनके बाल ऊपर की ओर उठाकर रिबन से बाँधे गए
थे। जब यह तस्वीर खिंची थी, तब वह बहुत जवान थीं और अभी-अभी
उत्तर में आई थीं। कभी-कभी जब वह मिलने आतीं तो इस तस्वीर को गवाह के तौर पर सामने
लातीं कि अपनी जवानी में वह सचमुच कितनी सुंदर थीं। उसकी माँ की भी एक तस्वीर थी। वह
तस्वीर नहीं, जिसे जॉन पसंद करता था और जिसे उसने केवल एक
बार देखा था बल्कि वह तस्वीर जो उसकी माँ की शादी के तुरंत बाद खींची गई थी। उसके
पिता की भी एक तस्वीर थी। उन्होंने काले कपड़े पहन रखे थे और देहात के एक बरामदे
में बैठे थे। उनके हाथ गोद में भारीपन से जुड़े हुए थे। तस्वीर एक धूप भरे दिन
खींची गई थी और धूप ने बेरहमी से उनके चेहरे की उभरी हुई बनावट को और अधिक स्पष्ट
कर दिया था। वह सिर उठाए सूरज की ओर देख रहे थे— सिर ऊँचा और असहनीय। हालाँकि यह
तस्वीर उनके जवान होने के समय की थी, फिर भी उसमें किसी जवान
आदमी का चेहरा नहीं था। केवल उनके कपड़ों में मौजूद पुराने ज़माने की कोई चीज़ यह
बताती थी कि तस्वीर बहुत पहले खींची गई थी। आंटी फ्लोरेंस के अनुसार, जब यह तस्वीर खींची गई थी, तब तक वह पहले ही पादरी
बन चुके थे और उनकी एक पत्नी थी, जो अब स्वर्ग में थी। उस
समय उनका पादरी होना कोई हैरानी की बात नहीं थी क्योंकि यह कल्पना करना भी असंभव
था कि वह कभी कुछ और रहे होंगे। लेकिन यह जानकर कि बहुत दूर अतीत में उनकी एक
पत्नी भी थी, जो अब मर चुकी थी, जॉन के
भीतर ऐसी हैरानी भर जाती थी, जिसमें ज़रा भी सुख नहीं था। जॉन
सोचता था, अगर वह जीवित होतीं तो उसका जन्म ही कभी नहीं हुआ
होता। उसके पिता कभी उत्तर (दिशा) में नहीं आए होते और उसकी माँ से उनकी मुलाकात
भी नहीं हुई होती। और यह धुँधली-सी स्त्री, जो इतने वर्षों
पहले मर चुकी थी और जिसका डेबरा नाम जॉन जानता था। उसे लगता था कि वह अपनी कब्र की
गहराइयों में उन सभी रहस्यों की चाबी सँभाले हुए है, जिन्हें
जानने के लिए जॉन इतने समय से तरस रहा था। वही थी, जिसने
उसके पिता को उस जीवन में जाना था, जिसमें जॉन मौजूद ही नहीं
था। उस देश में, जिसे जॉन ने कभी देखा तक नहीं था। जब जॉन
कुछ भी नहीं था। न कहीं था, न कोई अस्तित्व था बस धूल,
बादल, हवा और धूप, गिरती
हुई बारिश। जब उसके बारे में सोचा तक नहीं गया था, उसकी माँ
के अनुसार और जब उसकी आंटी के अनुसार वह स्वर्ग में स्वर्गदूतों के साथ था तब
डेबरा उसके पिता को जानती थी और उनके घर में उनके साथ रहती थी। उसने उसके पिता से
प्रेम किया था। वह उसके पिता को तब से जानती थी, जब बिजली
चमकती थी और स्वर्ग में गरज गूँजती थी और उसके पिता कहते थे, “सुनो। ईश्वर बोल रहा है।” वह उसे उस दूर-दराज़ देश की उन सुबहों में जानती
थी, जब उसके पिता बिस्तर पर करवट बदलकर आँखें खोलते थे और वह
उन आँखों में झाँकती थी, यह देखती हुई कि उनमें क्या छिपा है।
वह डरती नहीं थी। उसने उन्हें बपतिस्मा लेते हुए देखा था। खच्चर की तरह पैर पटकते
और चीखते हुए भी। उसने उन्हें अपनी माँ की मृत्यु पर रोते हुए भी देखा था। फ्लोरेंस
के अनुसार, तब वह बहुत जवान थे। क्योंकि उसने उन आँखों में
तब झाँका था, जब उन आँखों ने जॉन को देखा तक नहीं था। इसलिए
वह उन बातों को जानती थी, जिन्हें जॉन कभी नहीं जान सकता था।
उसके पिता की आँखों की वह पवित्रता, जब उनकी आँखों की गहराई
में जॉन का प्रतिबिंब नहीं था। वह जॉन को बता सकती थी। काश, वह
अपने छिपे हुए स्थान से उससे यह पूछ पाने में सक्षम होता कि अपने पिता को उससे
प्रेम करने के लिए कैसे मजबूर किया जाए। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। वह न्याय
के दिन[2] से पहले कुछ नहीं बोलेगी। उन
असंख्य आवाज़ों के बीच, अपनी ही आवाज़ में हकलाते हुए,
जॉन अब उसकी गवाही की कोई परवाह नहीं करता।
जब वह अपना काम पूरा कर
चुका और कमरा रविवार के लिए तैयार हो गया तो जॉन को लगा कि उसका पूरा शरीर धूल से
अटा हुआ और थका हुआ है। वह खिड़की के पास अपने पिता की आरामकुर्सी में बैठ गया। बर्फ
जैसी ठंडी धूप गलियों में फैली हुई थी। तेज़ हवा, कागज़ के टुकड़ों और ठंडी धूल को
हवा में उड़ा रही थी। दुकानों और सड़क किनारे बने चर्चों के लटकते हुए साइनबोर्ड
हवा में ज़ोर-ज़ोर से टकरा रहे थे। सर्दी का अंत था और फुटपाथों के किनारों पर जमा
कचरे से भरी बर्फ अब पिघल रही थी और नालियों में भर रही थी। लड़के नम और ठंडी
गलियों में स्टिकबॉल खेल रहे थे। उन्होंने मोटे ऊनी स्वेटर और मोटी पैंट पहन रखी
थीं। वे उछलते-कूदते और चिल्लाते हुए खेल रहे थे। जब डंडा गेंद पर पड़ता और उसे
हवा में तेज़ी से उड़ा देती तो गेंद “क्रैक!” की आवाज़ करती। उनमें से एक ने
चमकीले लाल रंग की ऊनी टोपी पहन रखी थी, जिसके पीछे ऊन का एक
बड़ा-सा गोला लटक रहा था। जब वह उछलता तो वह गोला भी उछलता-कूदता, मानो उसके सिर
के ऊपर कोई चमकता हुआ शुभ संकेत हो। ठंडी धूप में उन लड़कों के चेहरे ताँबे और
पीतल जैसे दिखाई दे रहे थे और बंद खिड़की के पार से भी जॉन उनकी खुरदरी, बेपरवाह आवाज़ें सुन सकता था। वह चाहता था कि वह भी उनमें से एक हो। सड़क
पर उनके साथ खेले, बिना किसी डर के रहे और उसी सहजता तथा
ताकत के साथ चलता-फिरता रहे। लेकिन वह जानता था कि ऐसा संभव नहीं था। फिर भी,
अगर वह उनके खेल नहीं खेल सकता था तो वह ऐसा कुछ कर सकता था जो वे
नहीं कर सकते थे। उसके एक शिक्षक ने कहा था कि उसमें सोचने की क्षमता थी। लेकिन
इससे उसे ज़रा भी सांत्वना नहीं मिली क्योंकि आज वह अपने ही विचारों से डरा हुआ
था। वह उन लड़कों के साथ सड़क पर रहना चाहता था। बेपरवाह और विचारशून्य होकर वह अपने
इस विश्वासघाती और उलझन भरे शरीर को पूरी तरह थका देना चाहता था।
लेकिन अब ग्यारह बज
चुके थे और दो घंटे बाद उसके पिता घर लौटने वाले थे। फिर शायद वे खाना खाएँग। उसके
बाद उसके पिता उन्हें प्रार्थना के लिए बैठाएँगे और फिर उन्हें बाइबल का पाठ
पढ़ाएँगे। धीरे-धीरे शाम हो जाएगी और वह चर्च की सफाई करने चला जाएगा तथा वहीं रात
की प्रार्थना-सभा के लिए रुक जाएगा। अचानक खिड़की के पास बैठे-बैठे जॉन के भीतर एक
ऐसा प्रचंड क्रोध और आँसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, जैसा उसने
पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसने अपना सिर झुका लिया, खिड़की
के शीशे पर मुट्ठियाँ भींच लीं और दाँत पीसते हुए रो पड़ा, “मैं
क्या करूँ? मैं क्या करूँ?”
फिर उसकी माँ ने उसे
पुकारा और उसे याद आया कि वह रसोई में कपड़े धो रही थी और शायद उसके लिए कोई काम
रखा होगा। वह उदास और खिन्न मन से उठा और रसोई में चला गया। वह कपड़े धोने की टब
के ऊपर झुकी हुई थी। उसकी बाँहें कोहनियों तक गीली और साबुन से भरी थीं और माथे पर
पसीना छलक रहा था। एक पुरानी चादर से बनाया गया उसका एप्रन वहाँ से गीला था,
जहाँ वह कपड़े रगड़ने वाली पटिया पर झुक रही थी। जॉन के अंदर आते ही
वह सीधी हुई और एप्रन के किनारे पर हाथ सुखाने लगी।
“तुमने अपना काम पूरा कर लिया, जॉन?” उसने पूछा।
“जी माँ,” उसने कहा और
सोचा कि वह उसे कितनी अजीब तरह से देख रही थी जैसे, वह किसी और के बच्चे को देख
रही हो।
“अच्छा बच्चा है मेरा,” उसने कहा। वह संकोच भरी, कुछ तनावपूर्ण मुस्कान
मुस्कराई। “तुम जानते हो न, तुम अपनी माँ के दाहिने हाथ हो?”
उसने कुछ नहीं कहा और न ही मुस्कराया। वह उसे देखता रहा और
सोचता रहा कि इस काम के बाद उसे कौन-सा काम सौंपा जाने वाला है।
वह दूसरी ओर मुड़ी, गीले हाथ से अपना माथा पोंछा और अलमारी की ओर चली गई। उसकी पीठ जॉन की ओर
थी और जॉन उसे देखता रहा। उसने फूलों की आकृतियों वाला एक चमकीला फूलदान उतारा,
जिसमें केवल बहुत खास मौकों पर फूल रखे जाते थे और उसके भीतर रखी
चीज़ें अपनी हथेली पर निकाल लीं। उसे सिक्कों की खनखनाहट सुनाई दी, जिससे समझ में आया कि वह उसे दुकान भेजने वाली है। उसने फूलदान वापस रख
दिया और उसकी ओर मुँह करके खड़ी हो गई। उसकी हथेली हल्के से मुड़ी हुई थी।
“मैंने तुमसे कभी नहीं पूछा,” उसने कहा, “कि तुम अपने जन्मदिन पर क्या चाहते थे।
लेकिन यह लो बेटे… बाहर जाकर अपने लिए वह चीज़ खरीद लाओ जो
तुम्हें लगता है कि तुम चाहते हो।”
फिर उसने जॉन की हथेली खोली और अपनी हथेली की गर्मी और नमी
से गरम हुए सिक्के उसमें रख दिए। जिस पल जॉन ने अपनी हथेली में उन गर्म, चिकने सिक्कों और अपनी माँ के हाथ का
स्पर्श महसूस किया, वह ऊपर उठे उसकी माँ के चेहरे को बिना
पलक झपकाए देखने लगा। उसका दिल भर आया और उसका मन हुआ कि जहाँ उसकी माँ का एप्रन
गीला था, वहाँ उसके पेट से सिर लगाकर रो पड़े। लेकिन उसने
अपनी आँखें झुका लीं और अपनी हथेली में रखे सिक्कों के छोटे-से ढेर को देखने लगा।
“बहुत ज्यादा तो नहीं हैं,” उसने कहा।
“कोई बात नहीं।” फिर उसने ऊपर देखा और उसकी
माँ झुककर उसके माथे को चूमने लगी।
“तुम अब,” उसने उसकी
ठुड्डी के नीचे हाथ रखकर उसका चेहरा अपने से थोड़ा दूर करते हुए कहा, “काफी बड़े होते जा रहे हो। तुम बहुत अच्छे आदमी बनोगे। तुम जानते हो न?
तुम्हारी माँ को तुमसे बहुत उम्मीद है।”
और जॉन को फिर एहसास हुआ कि उसकी माँ जो कहना चाहती थी, वह सब नहीं कह रही थी। किसी गुप्त भाषा में
वह आज उसे ऐसी बात बता रही थी, जिसे उसे कल याद रखना और
समझना था। वह उसकी माँ के चेहरे को देखता रहा। उसका हृदय उसके लिए प्रेम से भर उठा
था और साथ ही एक ऐसी पीड़ा से भी, जो अभी उसकी अपनी नहीं थी,
जिसे वह समझ नहीं पा रहा था और जिससे वह डर रहा था।
“जी, माँ,” उसने कहा। उसे उम्मीद थी कि उसकी हकलाती हुई ज़ुबान के बावजूद उसकी माँ
समझ जाएगी कि उसे खुश करने की उसकी इच्छा कितनी गहरी और तीव्र थी।
“मैं जानती हूँ,”
उसने मुस्कराते हुए कहा और उसे छोड़कर सीधी खड़ी हो गई, “ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिन्हें तुम अभी नहीं समझते। लेकिन तुम चिंता मत
करो। प्रभु अपने उचित समय पर तुम्हें वह सब समझा देंगे, जो
वे चाहते हैं कि तुम जानो। प्रभु पर अपना विश्वास रखो, जॉनी। वह तुम्हें ज़रूर इस
मुसीबत से बाहर निकाल लेंगे। जो लोग प्रभु से प्रेम करते हैं, उनके लिए हर चीज़ अंततः भलाई के लिए ही काम करती है।”
वह उसे पहले भी यह कहते सुन चुका था। यह उसका प्रिय वचन था जैसे,
“अपने घर को व्यवस्थित कर लो” उसके पिता का प्रिय वचन था। लेकिन वह जानता था कि आज
उसकी माँ यह बात खास तौर पर उसी से कह रही थी। वह उसकी मदद करने की कोशिश कर रही
थी क्योंकि वह जानती थी कि वह मुसीबत में है। यह मुसीबत उसकी माँ की अपनी भी थी, जिसके बारे में वह जॉन को कभी नहीं बताती। यद्यपि
उसे पूरा विश्वास था कि वे दोनों एक ही बात के बारे में नहीं सोच रहे थे। अगर वे
उन्हीं बातों के बारे में सोच रहे होते तो निश्चित ही उसकी माँ उससे नाराज़ होती
और उसे लेकर उसका गर्व समाप्त हो जाता। फिर भी उसकी माँ का उसके मन की स्थिति को
समझ लेना और उसके प्रति अपने प्रेम को इस तरह प्रकट करना, जॉन
की उलझन को एक ऐसी वास्तविकता दे रहा था, जो उसे भयभीत करती
थी। साथ ही एक ऐसी गरिमा भी, जो उसे सांत्वना देती थी। धुँधले-से
ढंग से उसे महसूस हुआ कि उसे अपनी माँ को सांत्वना देनी चाहिए। और अब उसके मुँह से
जो शब्द निकले, उन्हें सुनकर वह खुद भी स्तब्ध रह गया, “हाँ, माँ। मैं प्रभु से प्रेम करने की कोशिश
करूँगा।”
यह सुनते ही उसकी माँ के चेहरे पर कुछ ऐसा उभर आया जो
चौंकाने वाला, सुंदर और शब्दों से
परे दुख से भरा था—मानो वह जॉन से बहुत दूर, एक लंबी,
अँधेरी सड़क के पार देख रही हो और उस सड़क पर लगातार खतरे में पड़े
किसी यात्री को देख रही हो। क्या वह यात्री जॉन था? या वह
स्वयं थी? या वह यीशु के क्रूस के बारे में सोच रही थी?
वह उसी विचित्र उदासी के साथ फिर कपड़े धोने की टब की ओर मुड़ गई।
“अब तुम चले जाओ,” उसने
कहा, “इससे पहले कि तुम्हारे डैडी घर आ जाएँ।”
सेंट्रल पार्क में उसकी पसंदीदा पहाड़ी पर अभी बर्फ पिघली
नहीं थी। यह पहाड़ी पार्क के बीचोंबीच थी। जलाशय के चारों ओर का रास्ता पार करने
के बाद वह वहाँ पहुँचता था। वहाँ ऊँची, एक-दूसरे को काटती हुई तारों की बाड़ के बाहर उसे हमेशा फर के कोट पहने गोरी
औरतें[3] अपने बड़े-बड़े कुत्तों को
टहलाती हुई दिखाई देती थीं या छड़ी लिए हुए बूढ़े गोरे सज्जन[4] दिखाई देते थे। पार्क को घेरने
वाली इमारतों की बनावट और अपनी सहज पहचान के सहारे, एक
निश्चित जगह पर वह पेड़ों से ढकी एक खड़ी पगडंडी पर मुड़ गया। थोड़ी दूर चढ़ने के
बाद वह उस खुले स्थान तक पहुँचा, जो पहाड़ी की ओर जाता था। अब
उसके सामने पहाड़ी की ढलान ऊपर की ओर फैली हुई थी और उसके ऊपर चमकता हुआ आकाश था।
उसके पार, बादलों से घिरी दूर की जगह में उसे न्यूयॉर्क की
गगनरेखा दिखाई दे रही थी। उसे पता नहीं क्यों लेकिन उसके भीतर अचानक एक उल्लास और
शक्ति का एहसास उमड़ पड़ा। वह किसी इंजन या किसी पागल आदमी की तरह पहाड़ी पर दौड़
पड़ा, मानो उसके सामने चमकते हुए शहर में सिर के बल छलाँग लगा देने को तैयार हो।
लेकिन जब वह शिखर पर
पहुँचा तो ठिठक गया। वह पहाड़ी की चोटी पर खड़ा रहा, ठुड्डी
के नीचे हाथ बाँधे हुए, नीचे की ओर देखता रहा। तब जॉन को लगा
कि वह किसी ऐसे दैत्य के समान है, जो अपने क्रोध से इस पूरे
शहर को चूर-चूर कर सकता है। उसे लगा कि वह किसी ऐसे अत्याचारी के समान है, जो अपनी एड़ी के नीचे इस शहर को कुचल सकता है। उसे लगा कि वह एक लंबे समय
से प्रतीक्षित विजेता है, जिसके पैरों के नीचे फूल बिछाए
जाएँगे और जिसके सामने भीड़ “होसन्ना!”[5] पुकारेगी। वह सबसे अधिक
शक्तिशाली होगा। सबसे अधिक प्रिय होगा। प्रभु का अभिषिक्त होगा और वह इस चमकते हुए
शहर में रहेगा, जिसे उसके पूर्वजों ने बहुत दूर से लालसा भरी
आँखों से देखा था। यह शहर उसी का था। शहर के निवासियों ने स्वयं उससे कहा था कि यह
उसका है। उसे बस दौड़ते हुए नीचे जाना था... पुकारते हुए और वे उसे अपने हृदय से
लगा लेते और उसे वे अद्भुत चीज़ें दिखाते, जिन्हें उसकी
आँखों ने कभी नहीं देखा था।
और फिर भी, उस पहाड़ी की चोटी पर वह ठिठका रहा। उसे उस शहर में दिखाई देने वाले वे
लोग याद आए, जिनकी आँखों में उसके लिए कोई प्रेम नहीं था।
उसे उनके तेज़ और निर्मम कदम याद आए, उनके पहने हुए गहरे
धूसर कपड़े याद आए और यह भी कि जब वे उसके पास से गुजरते थे तो उसे देखते तक नहीं
थे। अगर देखते भी थे तो व्यंग्य से मुस्करा देते थे। उसे यह भी याद आया कि उनकी
रोशनी लगातार उसके ऊपर जलती-बुझती रहती थी और वह उस शहर में कितना अजनबी था। फिर
उसे अपने पिता और अपनी माँ याद आए और वे सभी बाँहें भी, जो
उसे पीछे खींचने के लिए… उसे थाम लेने के लिए आगे बढ़ी थीं ताकि
वे उसे उस शहर से बचा सकें, जहाँ, उनके
अनुसार, उसकी आत्मा विनाश के रास्ते पर चली जाती।
और निश्चय ही उस शहर
में चलने वाले लोगों के पैरों के नीचे विनाश अपना मुँह खोले पड़ा था। उसकी विशाल
मीनारों और रोशनी में विनाश की चीखें गूँजती थीं। सिनेमा घरों के दरवाज़ों पर
प्रतीक्षा करते लोगों के चेहरों पर शैतान के निशान पाए जा सकते थे। उन विशाल
फिल्मी पोस्टरों पर, जो लोगों को पाप के लिए आमंत्रित करते
थे, शैतान के शब्द छपे होते थे। यह उन अभिशप्त लोगों की
गर्जना थी जो ब्रॉडवे[6] को भर देती थी, जहाँ
मोटर-कारें, बसें और जल्दी-जल्दी चलते लोग मौत के साथ सड़क
के हर इंच के लिए होड़ करते थे। ब्रॉडवे, मृत्यु की ओर ले जाने वाला मार्ग चौड़ा
था और उस पर चलने वाले बहुत लोग थे। लेकिन वह मार्ग संकरा था जो अनंत जीवन की ओर
ले जाता था और उसे पाने वाले बहुत कम थे। जॉन उस संकरे मार्ग की लालसा नहीं करता
था, जिस पर उसके अपने सभी लोग चलते थे, जहाँ मकान ऊपर उठकर,
मानो स्थिर बादलों को चीरते हुए आकाश में नहीं जाते थे। बल्कि गंदगी
से भरी धरती के बिल्कुल पास, चपटे और तुच्छ ढंग से एक-दूसरे
से सटे हुए खड़े रहते थे। जहाँ सड़कें, गलियारे और कमरे
अँधेरे थे और जहाँ चारों ओर धूल, पसीने, पेशाब और घर में बनाई जाने वाली जिन[7] की कभी न मिटने वाली गंध फैली
रहती थी। उस संकरे मार्ग पर, क्रूस के उस मार्ग पर, उसके लिए हमेशा के लिए केवल अपमान ही प्रतीक्षा कर रहा था। एक दिन वहाँ
उसके पिता के घर जैसा ही एक घर उसका इंतज़ार कर रहा था। उसके पिता के चर्च जैसा ही
एक चर्च और उसके पिता जैसी ही नौकरी, जिसमें वह भूख और मेहनत
से धीरे-धीरे बूढ़ा और काला पड़ जाता। क्रूस के इस मार्ग ने उसके पेट में केवल गैस
भर दी थी और उसकी माँ की पीठ को झुका दिया था। उन्होंने कभी अच्छे कपड़े नहीं पहने
थे। लेकिन यहाँ, जहाँ इमारतें मानो ईश्वर की शक्ति को चुनौती देती थीं और जहाँ
स्त्री-पुरुष ईश्वर से नहीं डरते थे, यहाँ वह अपने मन की इच्छा के अनुसार खा-पी
सकता था और अपने शरीर को ऐसे अद्भुत कपड़ों से ढक सकता था, जो
देखने में समृद्ध और छूने में सुखद हों। लेकिन तब उसकी आत्मा का क्या होगा,
जो एक दिन मृत्यु को प्राप्त होगी और न्याय के आसन के सामने नग्न
खड़ी होगी? उस दिन शहर पर अपनी विजय से उसे क्या लाभ होगा? क्या वह क्षणिक सुख के लिए अनंत काल की महिमा को यूँ ही फेंक देगा?
इन महिमाओं की कल्पना
करना भी असंभव था। लेकिन शहर वास्तविक था। वह कुछ क्षण पिघलती हुई बर्फ पर खड़ा
रहा, उलझन में डूबा हुआ। फिर वह पहाड़ी से नीचे की ओर दौड़ने
लगा। जैसे-जैसे ढलान तेज़ होती गई, उसे लगा मानो वह उड़ रहा
हो और वह सोच रहा था, “मैं वापस ऊपर चढ़ सकता हूँ। अगर यह
गलत हुआ तो मैं हमेशा वापस ऊपर चढ़ सकता हूँ।” पहाड़ी के नीचे, जहाँ ज़मीन अचानक समतल होकर बजरी की पगडंडी में बदल जाती थी, वह लगभग एक बूढ़े गोरे आदमी से टकरा गया। उस बूढ़े की सफेद दाढ़ी थी और वह
अपनी छड़ी के सहारे बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। दोनों रुक गए। हैरानी से एक-दूसरे
को देखने लगे। जॉन हाँफते हुए अपनी साँस सँभालने और माफी माँगने की कोशिश कर रहा
था। लेकिन बूढ़ा मुस्करा दिया। जॉन भी मुस्करा दिया। ऐसा लगा मानो उन दोनों के बीच
कोई बहुत बड़ा रहस्य हो, जिसे वे दोनों जानते हों। फिर बूढ़ा
आगे बढ़ गया। पूरे पार्क में जगह-जगह बर्फ चमक रही थी। फीकी लेकिन तेज़ धूप के
नीचे पेड़ों की शाखाओं और तनों पर जमी बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही थी।
वह फिफ्थ एवेन्यू पर
पार्क से बाहर निकला। वहाँ, हमेशा की तरह पुराने ढंग की
घोड़ागाड़ियाँ सड़क के किनारे कतार में खड़ी थीं। उनके सारथी ऊँची सीटों पर बैठे
थे और घुटनों के चारों ओर कंबल लपेटे हुए थे या दो-तीन की टोलियों में घोड़ों के
पास खड़े थे। वे पैर पटक-पटककर गरम कर रहे थे, पाइप पी रहे
थे और बातें कर रहे थे। गर्मियों में उसने लोगों को इन घोड़ागाड़ियों में सवारी
करते देखा था। वे उसे किताबों के पात्रों जैसे लगते थे या उन फिल्मों के लोगों
जैसे, जिनमें हर कोई पुराने ज़माने के कपड़े पहनता था और रात
होते ही जमी हुई सड़कों पर तेजी से भागता था। जबकि उनके दुश्मन उनका पीछा करते हुए
उन्हें वापस मौत के मुँह में ले जाने की कोशिश करते थे। “पीछे
देखो, पीछे देखो,” जॉन को याद था कि
लंबे सुनहरे घुँघराले बालों वाली एक सुंदर स्त्री चिल्लाई थी, “देखो, कोई हमारा पीछा तो नहीं कर रहा!” और जहाँ तक
जॉन को याद था, उसका अंत बहुत भयानक हुआ था। अब वह उन घोड़ों
को घूर रहा था, विशाल, भूरे और धैर्यवान घोड़े, जो बीच-बीच में अपना चमकदार खुर ज़मीन पर पटक देते थे। वह सोचने लगा कि एक
दिन अपना घोड़ा होने पर कैसा लगेगा। वह उसका नाम राइडर रखेगा। सुबह के समय,
जब घास पर ओस जमी होगी, वह उस पर सवार होगा और
घोड़े की पीठ से चारों ओर फैले, धूप से भरे विशाल खेतों को
देखेगा। वे खेत उसके अपने होंगे। उसके पीछे उसका घर होगा। बहुत बड़ा, दूर-दूर तक फैला हुआ और बिल्कुल नया। रसोई में उसकी पत्नी, एक सुंदर स्त्री, नाश्ता तैयार कर रही होगी और चिमनी
से उठता धुआँ सुबह की हवा में घुल रहा होगा। उनके बच्चे होंगे, जो उसे “पापा” कहेंगे और जिनके लिए वह क्रिसमस पर बिजली से चलने वाली
रेलगाड़ियाँ खरीदेगा। उसके पास टर्की, गायें, मुर्गियाँ और हंस होंगे और राइडर के अलावा कई दूसरे घोड़े भी होंगे। उनकी
एक अलमारी में व्हिस्की और शराब भरी होगी। उनके पास गाड़ियाँ भी होंगी। लेकिन वे
किस चर्च में जाएँगे? और जब शाम को उसके बच्चे उसके चारों ओर
बैठेंगे, तब वह उन्हें क्या सिखाएगा? वह
सीधे सामने फिफ्थ एवेन्यू की ओर देखने लगा। वहाँ फर के कोट पहने सुंदर स्त्रियाँ
चल रही थीं और रेशमी पोशाकों, घड़ियों और अंगूठियों से सजी
दुकानों की खिड़कियों में झाँक रही थीं। वे किस चर्च में जाती होंगी? और शाम को जब वे अपने फर के कोट उतारेंगी, अपनी
रेशमी पोशाकें बदलेंगी, अपने गहने किसी डिब्बे में रख देंगी
और मुलायम बिस्तरों पर लेटकर सोने से पहले कुछ क्षण बीते हुए दिन के बारे में
सोचेंगी, तब उनके घर कैसे होंगे? क्या
वे हर रात बाइबल की कोई पंक्ति पढ़ती होंगी और घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना करती
होंगी? लेकिन नहीं क्योंकि उनके विचार ईश्वर के बारे में
नहीं थे और उनका मार्ग ईश्वर का मार्ग नहीं था। वे संसार में थीं और संसार की ही
थीं और उनके पैर नरक को थामे हुए थे।
फिर भी, स्कूल में उनमें से कुछ लोग उसके साथ अच्छे रहे थे और यह सोचना कठिन था कि
वे हमेशा के लिए नरक में जलेंगी। वे, जो अभी इतनी शालीन और
सुंदर थीं। एक बार, सर्दियों में, जब
वह बहुत बीमार था और उसका तेज़ जुकाम जाने का नाम नहीं ले रहा था, उसकी एक शिक्षिका ने उसके लिए कॉड लिवर ऑयल की एक बोतल खरीदी थी। उसमें
गाढ़ी चाशनी मिलाई गई थी ताकि उसका स्वाद इतना खराब न लगे। यह निश्चय ही एक ईसाई
जैसा नेक काम था। उसकी माँ ने कहा था कि ईश्वर उस स्त्री को आशीर्वाद देगा। जॉन
ठीक हो गया था। वे दयालु थीं। उसे पूरा विश्वास था कि वे दयालु थीं और जिस दिन वह
किसी तरह उनका ध्यान अपनी ओर खींच पाएगा, उस दिन वे निश्चित
ही उससे प्रेम करेंगी और उसका सम्मान करेंगी। लेकिन उसके पिता की राय ऐसी नहीं थी।
उसके पिता कहते थे कि सभी गोरे लोग दुष्ट हैं और ईश्वर एक दिन उन्हें नीचा
दिखाएगा। वे कहते थे कि गोरे लोगों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। वे झूठ के अलावा
कुछ नहीं बोलते और उनमें से एक ने भी कभी किसी “निग्रो” से प्रेम नहीं किया। जॉन
स्वयं एक “निग्रो” था और उसके पिता कहते थे कि जैसे-जैसे वह थोड़ा बड़ा होगा,
उसे पता चल जाएगा कि गोरे लोग कितने दुष्ट हो सकते हैं। जॉन ने उन
अत्याचारों के बारे में पढ़ा था, जो गोरे लोग अश्वेत लोगों
के साथ करते थे। किस तरह दक्षिण में, जहाँ से उसके माता-पिता आए थे, गोरे लोग
अश्वेतों की मजदूरी हड़प लेते थे। उन्हें जला देते थे और गोली मार देते थे। उसके
पिता कहते थे कि वे इससे भी बदतर काम करते थे, जिन्हें
ज़ुबान पर लाना भी संभव नहीं था। उसने पढ़ा था कि किस तरह अश्वेत लोगों को उन
अपराधों के लिए बिजली की कुर्सी पर बिठाकर जला दिया जाता था, जो उन्होंने किए ही नहीं थे। किस तरह दंगों में उन्हें डंडों से पीटा जाता
था। किस तरह जेलों में उन्हें यातनाएँ दी जाती थीं। किस तरह नौकरी देने में उन्हें
सबसे अंत में रखा जाता था और नौकरी से निकालने में सबसे पहले। जिन सड़कों पर जॉन
अब चल रहा था, वहाँ “निग्रो” लोग नहीं रहते थे। यहाँ उनका
रहना मना था। फिर भी जॉन यहाँ चल रहा था और किसी ने उस पर हाथ तक नहीं उठाया था। लेकिन
क्या वह इस दुकान के भीतर जाने की हिम्मत कर सकता था, जहाँ
से अभी-अभी एक स्त्री बड़ी-सी गोल डिब्बेनुमा चीज़ लेकर सहजता से बाहर निकली थी? या उस अपार्टमेंट में, जिसके सामने एक गोरा आदमी
चमकदार वर्दी पहने खड़ा था? जॉन जानता था कि आज वह ऐसा करने
की हिम्मत नहीं कर सकता। उसे अपने पिता की हँसी सुनाई दी, “नहीं,
कल भी नहीं!” उसके लिए पिछला दरवाज़ा था, अँधेरी
सीढ़ियाँ थीं, रसोई थी या तहखाना। यह दुनिया उसके लिए नहीं
थी। अगर उसने इस बात को मानने से इनकार किया और अपनी जान जोखिम में डालकर इसे
तोड़ने की कोशिश की तो वह सूरज के चमकना बंद कर देने तक कोशिश करता रह सकता था। वे
(गोरे लोग) उसे कभी भीतर नहीं आने देंगे। तब जॉन के मन में उन लोगों और उस एवेन्यू
का रूप ही बदल गया। वह उनसे डरने लगा और उसे मालूम हुआ कि अगर ईश्वर ने उसके हृदय
को नहीं बदला तो एक दिन वह उनसे घृणा भी कर सकता था।
वह फिफ्थ एवेन्यू
छोड़कर पश्चिम की ओर, सिनेमा घरों की दिशा में चल पड़ा। यहाँ
42वीं स्ट्रीट पर माहौल कम सुरुचिपूर्ण था। लेकिन उतना ही
अजीब था। उसे यह सड़क लोगों या दुकानों के कारण पसंद नहीं थी। बल्कि उन पत्थर के
शेरों के कारण पसंद थी जो पब्लिक लाइब्रेरी की विशाल मुख्य इमारत की रखवाली करते
थे। वह इमारत किताबों से भरी हुई थी। इतनी विशाल कि उसकी कल्पना करना भी मुश्किल
था। जॉन ने अभी तक उसमें प्रवेश करने की हिम्मत नहीं की थी। वह जानता था कि वह
अंदर जा सकता है क्योंकि वह हार्लेम की शाखा का सदस्य था और शहर की किसी भी
लाइब्रेरी से किताबें लेने का अधिकार रखता था। लेकिन वह कभी अंदर नहीं गया था क्योंकि
इमारत इतनी बड़ी थी कि उसमें निश्चित ही अनगिनत गलियारे और संगमरमर की सीढ़ियाँ
होंगी। उसे डर था कि उनके भूलभुलैया-जैसे जाल में वह खो जाएगा और जिस किताब को
ढूँढ़ना चाहता है, उसे कभी नहीं ढूँढ़ पाएगा। फिर वहाँ अंदर
मौजूद सभी गोरे लोग जान जाएँगे कि वह इतनी बड़ी इमारतों में आने का आदी नहीं है,
न ही इतनी सारी किताबों के बीच रहने का। वे उसे दया की दृष्टि से
देखेंगे। वह किसी और दिन वहाँ जाएगा। उस दिन, जब वह शहर के
ऊपरी हिस्से की सारी किताबें पढ़ चुका होगा। उसे लगता था कि यह उपलब्धि उसे इतना आत्मविश्वास और आत्मसंयम दे देगी
कि वह दुनिया की किसी भी इमारत में प्रवेश कर सकेगा। अधिकतर पुरुष लोग
लाइब्रेरी के चारों ओर बने ऊँचे पार्क की पत्थर की मुंडेरों पर झुककर खड़े थे या
इधर-उधर टहल रहे थे और सार्वजनिक नलों पर झुककर पानी पी रहे थे। चाँदी जैसे चमकीले
कबूतर कुछ क्षणों के लिए शेरों के सिरों या फव्वारों के किनारों पर आ बैठते और फिर
टहलते हुए रास्तों पर आगे बढ़ जाते। जॉन, वूलवर्थ की दुकान
के सामने कुछ देर ठिठका रहा। वह मिठाइयों की सजी हुई प्रदर्शनी को घूरता रहा और तय
करने की कोशिश करता रहा कि कौन-सी मिठाई खरीदे। लेकिन उसने कुछ नहीं खरीदा क्योंकि
दुकान भीड़ पर थी और उसे पूरा यकीन था कि बिक्री करने वाली लड़की उस पर ध्यान ही
नहीं देगी। फिर वह कृत्रिम फूल बेचने वाले एक विक्रेता के सामने रुका। उसके बाद वह
सिक्स्थ एवेन्यू पार कर गया, जहाँ ऑटोमैट रेस्तराँ था। टैक्सी
खड़ी थीं और ऐसी दुकानें थीं, जिनकी खिड़कियों में गंदे
पोस्टकार्ड और अश्लील-से मज़ाक के सामान चिपके थे। आज वह उनकी ओर देखना भी नहीं
चाहता था। सिक्स्थ एवेन्यू के आगे सिनेमा घर शुरू हो गए। अब वह फिल्मों के स्थिर
चित्रों को ध्यान से देखने लगा और तय करने की कोशिश करने लगा कि इन सभी थिएटरों
में से उसे किसमें जाना चाहिए। आखिरकार वह एक बहुत बड़े, रंगीन
पोस्टर के सामने रुक गया। उसमें एक खराब स्त्री आधे कपड़ों में दरवाज़े पर झुकी
हुई थी और लगता था कि वह एक सुनहरे बालों वाले आदमी से झगड़ रही है, जो बेबसी से सड़क की ओर देख रहा था। उन दोनों के सिरों के ऊपर लिखा था, “हर परिवार में उसके जैसा एक मूर्ख होता है और बगल में ऐसी औरत भी होती है
जो उसे अपने कब्ज़े में ले लेती है!” उसने यह देखने का निश्चय किया क्योंकि वह
स्वयं को उस सुनहरे बालों वाले युवक के साथ जुड़ा हुआ महसूस कर रहा था, जो अपने परिवार में मूर्ख समझा जाता था। वह अपने इतने खुले तौर पर निर्दयी
भाग्य के बारे में और अधिक जानना चाहता था।
इसलिए वह टिकट बेचने
वाली खिड़की के ऊपर लिखी कीमत को घूरा और अपने सिक्के उसे दिखाकर वह कागज़ का
टुकड़ा ले लिया, जिसमें दरवाज़े खोल देने की शक्ति भरी हुई
थी। एक बार भीतर जाने का निश्चय कर लेने के बाद उसने फिर सड़क की ओर मुड़कर नहीं
देखा। इस डर से कि कहीं कोई संत वहाँ से गुजरता हुआ उसे देख न ले। उसका नाम पुकार
न उठे और उस पर हाथ रखकर उसे घसीटता हुआ वापस न ले जाए। वह कालीन बिछी हुई लॉबी को
बहुत तेज़ी से पार कर गया, किसी चीज़ की ओर देखे बिना। केवल
तब रुका जब टिकट जाँचने वाली महिला ने उसका टिकट फाड़ा। उसका आधा हिस्सा चाँदी के
एक डिब्बे में डाल दिया और आधा उसे वापस कर दिया। फिर उस अँधेरे महल के दरवाज़े
कर्मचारी महिला ने खोले और अपने पीछे रखी हुई टॉर्च की रोशनी में उसे उसकी सीट तक
ले गई। अपनी निर्धारित सीट तक पहुँचने के लिए घुटनों और पैरों के एक जंगल के बीच
से धक्का देते हुए निकल जाने के बाद भी उसने साँस लेने की हिम्मत नहीं की। यहाँ तक
कि माफी की आख़िरी, बीमार-सी उम्मीद के कारण उसने पर्दे की
ओर देखने की भी हिम्मत नहीं की। वह अपने चारों ओर पसरे अँधेरे को और उन चेहरों की
आकृतियों को घूरता रहा, जो धीरे-धीरे उस अँधेरे से उभर रही
थीं। वह अँधेरा जो नरक के अँधेरे से इतना मिलता-जुलता था। वह प्रतीक्षा करता रहा
कि दूसरी बार आने वाले प्रभु की रोशनी[8] इस अँधेरे को चीरकर उसे
चकनाचूर कर देगी... छत ऊपर की ओर फट जाएगी और हर आँख के सामने अग्निमय रथ दिखाई
देंगे, जिन पर एक क्रुद्ध ईश्वर और स्वर्ग की समस्त सेना
उतरती हुई आएगी। वह अपनी सीट में बहुत नीचे तक धँस गया, मानो
इस तरह सिकुड़कर बैठ जाने से वह अदृश्य हो जाएगा और वहाँ अपनी मौजूदगी से ही इनकार
कर सकेगा। लेकिन फिर उसने सोचा, “अभी नहीं। न्याय का दिन अभी
नहीं आया है।” तभी उसके कानों तक आवाज़ें पहुँचीं। निस्संदेह उस अभागे आदमी और उस
दुष्ट स्त्री की आवाज़ें और उसने नाउम्मीद होकर अपनी आँखें उठाईं और पर्दे की ओर
देखने लगा।
वह स्त्री सबसे अधिक
दुष्ट थी। उसके बाल सुनहरे थे और चेहरा फीका, गाढ़ा-सफेद था।
वह लंदन में रह चुकी थी, जो इंग्लैंड में था। उसके कपड़ों को देखकर लगता था कि यह
बात काफ़ी समय पहले की थी। उसे खाँसी आती थी। उसे एक भयानक बीमारी थी। तपेदिक
(टी.बी.), जिसके बारे में जॉन ने सुना था। उसकी माँ के परिवार में भी कोई व्यक्ति
इसी बीमारी से मर चुका था। उसके बहुत-से प्रेमी थे, वह
सिगरेट पीती थी और शराब पीती थी। जब उसकी मुलाकात उस युवक से हुई, जो एक
विद्यार्थी था और उससे बहुत प्रेम करता था। वह उसके प्रति बेहद क्रूर थी। वह उसका
मज़ाक उड़ाती थी क्योंकि वह लँगड़ा था। वह उसके पैसे ले लेती और दूसरे पुरुषों के
साथ बाहर जाती और उस विद्यार्थी से झूठ बोलती, जो निश्चित ही मूर्ख था। वह युवक
नरम और उदास-सा दिखाई देता हुआ लँगड़ाता फिरता था। धीरे-धीरे जॉन की सारी
सहानुभूति उस उग्र और दुखी स्त्री के पक्ष में हो गई। जब वह गुस्से में चीखती,
अपने कूल्हे मटकाती और सिर पीछे झटककर इतनी उन्मत्त हँसी हँसती कि
लगता उसकी गर्दन की नसें फट जाएँगी, तब जॉन उसे समझ पाता था।
वह ठंडी, कोहरे से भरी गलियों में चलती। छोटी-सी और सुंदर न
होने वाली स्त्री। लेकिन अपनी चाल में एक अश्लील, क्रूर अकड़
लिए हुए। पूरी दुनिया से कहती हुई, “तुम सब भाड़ में जाओ।” न
कोई चीज़ उसे वश में कर सकती थी, न तोड़ सकती थी। न दया उसे
छूती थी, न तिरस्कार, न घृणा, न प्रेम। उसने कभी प्रार्थना के बारे में सोचा तक नहीं था। यह कल्पना करना
भी असंभव था कि वह कभी अपने घुटनों पर झुकेगी और धूल भरे फर्श पर रेंगती हुई किसी
की वेदी तक जाएगी और क्षमा के लिए रोएगी। शायद उसका पाप इतना बड़ा था कि उसे क्षमा
ही नहीं किया जा सकता था। शायद उसका अभिमान इतना महान था कि उसे क्षमा की आवश्यकता
ही नहीं थी। वह उस ऊँचे पद से गिर चुकी थी, जो ईश्वर ने
स्त्री-पुरुषों के लिए निर्धारित किया था और उसने अपने पतन को गौरवमय बना दिया था क्योंकि
उसका पतन इतना पूर्ण था। अगर जॉन ने अपने हृदय में झाँकने की हिम्मत की होती तो
उसे वहाँ उसके उद्धार की कोई इच्छा नहीं मिलती। वह उसके जैसी बनना चाहता था। बस
उससे अधिक शक्तिशाली, अधिक पूर्ण और अधिक क्रूर। वह चाहता था
कि उसके आस-पास के लोग, वे सभी जिन्होंने उसे चोट पहुँचाई थी,
उसी तरह पीड़ा सहें जैसे उस स्त्री ने उस विद्यार्थी को पीड़ा दी थी
और जब वे अपनी पीड़ा के लिए दया की भीख माँगें, तब वह उनके
मुँह पर हँसे। वह किसी से दया नहीं माँगता। उसकी पीड़ा उनसे कहीं अधिक थी। “जारी रखो, लड़की,” वह
फुसफुसाया, जब वह विद्यार्थी, उसके
अडिग और निर्दयी विरोध का सामना करते हुए, आहें भर रहा था और
रो रहा था। “जारी रखो, लड़की।” एक दिन
वह भी इसी तरह बोलेगा। वह उनके सामने खड़ा होकर उन्हें बताएगा कि वह उनसे कितनी
नफ़रत करता है… उन्होंने उसे कितना कष्ट दिया है... वह
उन्हें इसका बदला कैसे चुकाएगा!
फिर भी, जब अंततः उसकी मृत्यु का समय आया और वह सचमुच मर गई तो वह पहले से भी अधिक
वीभत्स दिखाई दे रही थी, जैसा कि उसके साथ होना ही चाहिए था।
उस क्षण जॉन के विचार अचानक रुक गए और उसके चेहरे पर उभरी अभिव्यक्ति ने उसे भीतर
तक सिहरा दिया। वह स्त्री मानो अनंत काल तक बाहर और नीचे की ओर देख रही थी। ऐसे
प्रचंड और चुभते हुए हवा के झोंके के सामने, जो धरती पर उसने
अब तक महसूस की गई किसी भी हवा से कहीं अधिक तीखा था। उसे लग रहा था कि वह तेज़ी
से एक ऐसे लोक की ओर धकेली जा रही है, जहाँ कोई भी चीज़ उसकी
सहायता नहीं कर सकती। न उसका अभिमान, न उसका साहस, न उसकी गौरवमयी दुष्टता। जिस जगह वह जा रही थी, वहाँ
इन चीज़ों का कोई महत्व नहीं था। वहाँ किसी और ही चीज़ का महत्व था। ऐसी चीज़,
जिसका उसके पास कोई नाम तक नहीं था। केवल उसका एक ठंडा-सा आभास था।
ऐसी चीज़, जिसे वह ज़रा भी बदल नहीं सकती थी और जिसके बारे
में उसने कभी सोचा तक नहीं था। वह रोने लगी। उसका पतित चेहरा सिकुड़कर एक छोटे
बच्चे के रोते हुए चेहरे जैसी विकृति में बदल गया। लोग उससे दूर हट गए। उसे एक
गंदे कमरे में गंदगी से सनी हुई, अकेली छोड़कर अपने
सृष्टिकर्ता का सामना करने के लिए। दृश्य धीरे-धीरे धुँधला पड़ा और वह स्त्री चली
गई। फिल्म चलती रही। उसमें उस विद्यार्थी को एक दूसरी लड़की से शादी करते हुए
दिखाया गया। वह लड़की अधिक साँवली और बहुत मृदु स्वभाव की थी। लेकिन पहली स्त्री
जितनी ध्यान खींचने वाली बिल्कुल नहीं थी। फिर भी जॉन का मन उसी स्त्री और उसके
भयानक अंत में अटका रहा। अगर ऐसा सोचना ईश्वर-निंदा न होता तो वह फिर यही सोचता कि
स्वयं प्रभु ही उसे इस सिनेमाघर में ले आए थे ताकि उसे पाप की मज़दूरी का एक
उदाहरण दिखा सकें। फिल्म समाप्त हो गई और उसके आस-पास लोग हिलने-डुलने लगे।
समाचार-फिल्म शुरू हो गई। पर्दे पर स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहने लड़कियाँ कतार में
गुजरती रहीं, मुक्केबाज़ गुर्राते हुए एक-दूसरे से लड़ते रहे,
बेसबॉल खिलाड़ी दौड़कर सुरक्षित होम बेस तक पहुँचते रहे और उन देशों
के राष्ट्रपति और राजा, जो जॉन के लिए केवल नाम भर थे, झिलमिलाती रोशनी के उस
चौकोर पर्दे पर कुछ क्षणों के लिए दिखाई देते और फिर गायब हो जाते। लेकिन जॉन नरक,
अपनी आत्मा के उद्धार और उस रास्ते के बीच कोई समझौता खोजने की
कोशिश करता रहा जो अनंत जीवन की ओर जाता था और उस रास्ते के बीच जो नरक की खाई में
जाकर समाप्त होता था। लेकिन कोई समझौता संभव नहीं था क्योंकि उसे बचपन से ही सत्य
की शिक्षा दी गई थी। वह यह कहकर अपने को निर्दोष नहीं ठहरा सकता था जैसा कि शायद
अफ्रीकी जंगली लोग ठहरा सकते थे... कि उसके पास कभी किसी ने सुसमाचार पहुँचाया ही
नहीं था। उसके पिता और उसकी माँ और सभी संतों ने उसके बचपन के सबसे शुरुआती दिनों
से ही उसे सिखाया था कि ईश्वर की इच्छा क्या है। या तो वह इस सिनेमाघर से उठकर चला
जाए और फिर कभी यहाँ वापस न आए। दुनिया और उसकी सुख-सुविधाओं, उसके सम्मान और उसकी चमक-दमक को पीछे छोड़ दे या फिर वह यहीं दुष्ट लोगों
के बीच बना रहे और उनकी निश्चित सज़ा में सहभागी बने। हाँ, यह
सचमुच एक संकरा रास्ता था। जॉन अपनी सीट पर बेचैनी से हिला-डुला। इस भावना को अपने
भीतर आने देने का साहस किए बिना कि इतनी निर्मम पसंद करने के लिए मजबूर किया जाना
शायद ईश्वर का अन्याय था।
दोपहर बाद जब जॉन फिर
अपने घर के पास पहुँचा तो उसने छोटी सारा को देखा। उसका कोट खुला हुआ था और वह घर
से निकलकर उड़ती हुई-सी सड़क की पूरी लंबाई पार करती हुई उससे दूर, सड़क के दूसरे छोर पर स्थित दवा की दुकान की ओर भागी जा रही थी। जॉन तुरंत
घबरा गया। वह एक पल के लिए रुक गया और खाली निगाहों से सड़क के नीचे की ओर देखता
रहा। वह सोचने लगा कि ऐसी घबराई हुई जल्दबाज़ी की आखिर क्या वजह हो सकती है। यह सच
था कि सारा अपने महत्व को कुछ ज़्यादा ही समझती थी और वह जो भी काम करने जाती,
उसे ऐसा बना देती मानो वह जीवन-मरण का प्रश्न हो। फिर भी, इस बार उसे सचमुच किसी काम से भेजा गया था और इतनी जल्दी में कि उसकी माँ
को उसका कोट तक बटन लगाने का समय नहीं मिला था।
फिर उसे थकान महसूस हुई।
अगर सचमुच कुछ हुआ था तो ऊपर घर में इस समय माहौल बहुत अप्रिय होगा। वह उसका सामना
नहीं करना चाहता था। लेकिन शायद बात सिर्फ इतनी थी कि उसकी माँ के सिर में दर्द था
और उसने सारा को दुकान से एस्पिरिन लाने भेजा था। लेकिन अगर ऐसा था तो इसका मतलब
था कि उसे रात का खाना तैयार करना पड़ेगा, बच्चों की देखभाल
करनी पड़ेगी और पूरी शाम अपने पिता की निगाहों के सामने नंगा रहना पड़ेगा। और फिर वह
और धीरे-धीरे चलने लगा।
सीढ़ियों के चबूतरे पर
कुछ लड़के खड़े थे। जैसे-जैसे वह उनके पास पहुँचा, वे उसे
देखते रहे। उसने कोशिश की कि उनकी ओर न देखे और उनकी चाल में जो अकड़ थी, वैसी ही अकड़ अपनी चाल में लाने की कोशिश की। जब जॉन पत्थर की छोटी-सी
सीढ़ियाँ चढ़कर गलियारे में दाखिल होने लगा, उनमें से एक ने कहा, “लड़के, आज तुम्हारे भाई को
बहुत बुरी तरह चोट लगी है।”
उसने एक तरह के भय से
उनकी ओर देखा। लेकिन सबकुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। उसने देखा कि वे लड़के भी
ऐसे लग रहे थे जैसे, किसी लड़ाई में रहे हों। उनके चेहरों पर कुछ ऐसा सहमा-सहमा
भाव था, जिससे लगता था कि उन्हें वहाँ से भाग खड़ा होना पड़ा
था। फिर उसने नीचे देखा और पाया कि दहलीज़ पर खून था और प्रवेश-कक्ष की टाइलों पर
भी खून के छींटे पड़े थे। उसने फिर उन लड़कों की ओर देखा, जो
अब भी उसे लगातार देख रहे थे। जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ गया।
दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। निश्चय ही सारा के लौटने के लिए। वह
बिना कोई आवाज़ किए भीतर चला गया। उसके भीतर एक उलझी हुई-सी इच्छा उठ रही थी कि वह
भाग जाए। रसोई में कोई नहीं था। हालाँकि बत्ती जल रही थी बल्कि पूरे घर की
बत्तियाँ जल रही थीं। रसोई की मेज़ पर सामान से भरा हुआ एक थैला रखा था और जॉन समझ
गया कि उसकी आंटी फ्लोरेंस आ चुकी हैं। वह कपड़े धोने की टब, जिसमें उसकी माँ कुछ देर पहले कपड़े धो रही
थी, अब भी खुली पड़ी थी और उसकी खट्टी-सी गंध से पूरी रसोई
भरी हुई थी।
यहाँ भी फर्श पर खून की बूँदें थीं और सीढ़ियाँ चढ़ते समय
उसे वहाँ भी खून के छोटे-छोटे, धुँधले-से
धब्बे दिखाई दिए थे।
यह सब उसे बुरी तरह डरा
रहा था। वह रसोई के बीचोंबीच खड़ा रहा, यह कल्पना करने की
कोशिश करता हुआ कि आखिर हुआ क्या है और अपने आपको बैठक में जाने के लिए तैयार कर
रहा था, जहाँ उसे लगा कि पूरा परिवार मौजूद है। रॉय पहले भी
मुसीबत में पड़ चुका था। लेकिन यह नई मुसीबत उसे किसी भविष्यवाणी के पूरा होने की
शुरुआत जैसी लग रही थी। उसने अपना कोट उतारकर एक कुर्सी पर डाल दिया और बैठक की ओर
बढ़ने ही वाला था कि उसे सारा के सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आने की आवाज़ सुनाई दी।
वह वहीं रुक गया। सारा एक भद्दा-सा पार्सल लिए दरवाज़े से
भीतर आ धमकी।
“क्या हुआ?” उसने
फुसफुसाकर पूछा।
वह आश्चर्य और एक विचित्र-सी उन्मत्त खुशी के भाव से उसे
घूरने लगी। जॉन ने फिर सोचा कि उसे सचमुच अपनी बहन पसंद नहीं थी। साँस सँभालते हुए
उसने विजयी भाव से जल्दी-जल्दी कहा, “रॉय को चाकू मार दिया गया!” और वह भागती हुई बैठक में चली गई।
“रॉय को चाकू मार दिया
गया था।” इसका जो भी मतलब हो, इतना निश्चित था कि आज रात
उसके पिता अपने सबसे भयंकर रूप में होंगे। जॉन धीरे से बैठक में दाखिल हुआ।
उसके पिता और माँ, दोनों के बीच पानी से भरा एक छोटा-सा बेसिन रखा था। वे सोफ़े के पास घुटनों
के बल बैठे थे, जहाँ रॉय लेटा हुआ था। उसके पिता रॉय के माथे
से खून साफ कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि उसकी माँ, जिसका स्पर्श कहीं अधिक कोमल था,
को उसके पिता ने एक ओर कर दिया था क्योंकि वे अपने घायल बेटे को किसी और के हाथ से
छुआ जाना सहन नहीं कर सकते थे। अब उसकी माँ उन्हें देख रही थी। उसका एक हाथ पानी
में था और दूसरा किसी गहरी व्याकुलता में उसकी कमर पर टिका हुआ था। सुबह बाँधा गया
अस्थायी एप्रन अब भी उसकी कमर के चारों ओर बँधा था। उसे देखते हुए उसके चेहरे पर
दर्द और भय साफ दिखाई दे रहे थे। ऐसा तनाव, जिसे वह बड़ी
मुश्किल से सँभाल पा रही थी। और ऐसी करुणा, जिसे शायद वह तब
भी पूरी तरह व्यक्त न कर पाती, अगर अपने रोने से उसने पूरी
दुनिया को ही क्यों न भर दिया होता। उसका पिता रॉय से धीमी आवाज़ में मीठी,
बेसुध-सी बातें कर रहा था। जब वह फिर बेसिन में हाथ डुबोकर कपड़े को
निचोड़ते समय उसके हाथ काँप रहे थे। आंटी फ्लोरेंस अभी भी अपनी टोपी पहने और हाथ
में अपना हैंडबैग लिए, उनसे कुछ दूर खड़ी थीं। वह नीचे उनकी
ओर देख रही थीं और उनके चेहरे पर चिंता और भय की गहरी छाप थी।
तभी सारा उछलती हुई
उसके आगे-आगे कमरे में आ गई। उसकी माँ ने ऊपर देखा, हाथ
बढ़ाकर वह पार्सल लिया और जॉन को देखा। उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन उसे एक अजीब,
तीखी नज़र से देखा, मानो उसकी ज़बान पर कोई चेतावनी हो, जिसे वह उस समय कहने की हिम्मत न कर पा रही हो। आंटी फ्लोरेंस ने ऊपर देखा
और कहा. “हम सोच रहे थे कि तू कहाँ रह गया था, लड़के। तेरा ये बदमाश भाई बाहर गया और खुद को चोट लगवा आया।”
लेकिन जॉन ने उनकी आवाज़ के लहजे से समझ लिया कि शायद
हंगामा खतरे से कुछ ज़्यादा ही था, आखिर रॉय मरने वाला नहीं था। उसका दिल थोड़ा
हल्का हो गया। तभी उसके पिता मुड़े और उसकी ओर देखने लगे।
“कहाँ था तू, लड़के?”
वे चिल्लाए, “इतनी देर से? क्या तुझे पता नहीं कि घर में तेरी ज़रूरत है?”
उनके शब्दों से भी अधिक
उनके चेहरे ने जॉन को तुरंत द्वेष और भय से जकड़ दिया। उसके पिता का चेहरा क्रोध
से भयंकर हो उठा था। लेकिन इस समय उसमें केवल क्रोध नहीं था। अब जॉन ने उसमें वह
चीज़ देखी, जिसे उसने इससे पहले कभी नहीं देखा था, सिवाय
अपनी बदले की कल्पनाओं में। एक तरह का उन्मत्त, आँसुओं से
भरा आतंक, जिसने उस चेहरे को एक ओर अधिक युवा बना दिया था और
दूसरी ओर अकल्पनीय रूप से अधिक बूढ़ा और अधिक क्रूर। और जैसे ही उसके पिता की
आँखें जॉन पर पड़ीं, जॉन समझ गया कि उसके पिता उससे इसलिए
घृणा कर रहे थे क्योंकि जॉन उस सोफ़े पर नहीं पड़ा था, जहाँ
रॉय पड़ा हुआ था। जॉन मुश्किल से अपने पिता की आँखों में आँखें डाल पा रहा था। फिर
भी, एक क्षण के लिए उसने ऐसा किया। बिना कुछ कहे। उसके मन
में विजय की एक अजीब-सी अनुभूति उठी और साथ ही वह मन-ही-मन चाहता था कि रॉय मर जाए
ताकि उसके पिता को भीतर तक तोड़ सके।
उसकी माँ ने पार्सल
खोला और हाइड्रोजन पेरॉक्साइड की एक बोतल निकालकर खोलने लगी। उसने कहा, “लो, अब इसे इससे धो देना।” उसकी आवाज़ शांत और रूखी
थी। उसने एक पल अपने पति की ओर देखा। उसके चेहरे के भाव समझ पाना मुश्किल था। फिर
उसने बोतल और रूई उसके हाथ में थमा दी।
“इससे दर्द होगा,” उसके
पिता ने कहा। इस बार उनकी आवाज़ कितनी अलग थी, कितनी उदास और
कोमल! फिर सोफ़े की ओर मुड़ गए। “लेकिन तुम बस थोड़ा-सा मर्द बनकर चुपचाप पड़े
रहना। ज़्यादा देर नहीं लगेगी।”
जॉन देखता और सुनता रहा और उससे घृणा करता रहा। रॉय कराहने
लगा। आंटी फ्लोरेंस मैन्टलपीस की ओर चली गईं और धातु के साँप के पास अपना हैंडबैग
रख दिया। अपने पीछे वाले कमरे से जॉन ने बच्चे के सिसकने की आवाज़ सुनी।
“जॉन,” उसकी माँ ने कहा, “जाकर
उसे उठा लो, अच्छे बच्चे की तरह।” उसके हाथ काँप नहीं रहे थे
और वे लगातार काम में लगे थे। उसने आयोडीन की बोतल खोल ली थी और पट्टी के लिए
कपड़े की पट्टियाँ काट रही थी।
जॉन अपने माता-पिता के सोने के कमरे में गया और रोती हुई
बच्ची को उठा लिया। उसके कपड़े गीले थे। जैसे ही रूथ ने महसूस किया कि जॉन ने उसे
उठा लिया है, वह रोना बंद कर चुपचाप
उसे बड़ी-बड़ी, दयनीय आँखों से देखने लगी, मानो उसे मालूम हो कि घर में कुछ गड़बड़ है। जॉन को उसकी ऐसी बहुत
पुरानी-सी लगने वाली व्याकुलता पर हँसी आ गई। वह अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करता
था। वह उसे लेकर बैठक की ओर लौटने लगा और उसके कान में फुसफुसाया, “अब सुन, बच्ची, तेरा बड़ा भाई
तुझे एक बात बताता है। जैसे ही तू अपने पैरों पर खड़ी होने लायक हो जाए, इस घर से भाग जाना। बहुत दूर भाग जाना।” उसे ठीक-ठीक पता नहीं था कि उसने
ऐसा क्यों कहा था या वह चाहता था कि रूथ कहाँ भागे। लेकिन यह कहने भर से उसे तुरंत
कुछ बेहतर महसूस होने लगा।
जॉन के कमरे में लौटते
ही उसके पिता कह रहे थे, “मुझे यक़ीन है, अभी मैं तुमसे कुछ सवाल पूछने वाला हूँ, बहन। मैं यह
जानना चाहता हूँ कि आखिर तुमने इस लड़के को बाहर जाकर लगभग मरने की हालत में
पहुँचने कैसे दिया।”
“ओह, नहीं, ऐसा नहीं होगा,” आंटी फ्लोरेंस ने कहा। “आज शाम तुम
यह सारा तमाशा शुरू नहीं करने वाले हो। तुम अच्छी तरह जानते हो कि रॉय कभी किसी से
नहीं पूछता कि वह कुछ कर सकता है या नहीं। वह बस अपनी मर्ज़ी से वही करता है जो
उसे करना होता है। एलिज़ाबेथ उसके पैरों में बेड़ियाँ तो डाल नहीं सकती। इस घर में
पहले ही उसके सिर पर बहुत-सी जिम्मेदारियाँ हैं और अगर रॉय का दिमाग अपने पिता
जितना ही ज़िद्दी है तो इसमें उसका कोई दोष नहीं है।”
“लगता है, तुम्हारे पास
कहने के लिए बहुत कुछ है। कभी तो ऐसा कर सकती हो कि मेरे मामलों में अपनी टाँग न
अड़ाओ।” उसने यह बात उसकी ओर देखे बिना कही।
“इसमें मेरा क्या दोष है,” उसने कहा, “कि तुम जन्म से ही मूर्ख थे, हमेशा मूर्ख रहे हो और कभी बदलने वाले भी नहीं हो। मैं अपने प्रभु की कसम
खाकर कहती हूँ, तुम तो अय्यूब के धैर्य की भी परीक्षा[9] ले डालो।”
“मैं तुम्हें पहले भी बता चुका हूँ,” उन्होंने कहा, वह कराहते हुए रॉय की देखभाल करना बंद नहीं कर रहे थे। अब
उसके घाव पर आयोडीन लगाने की तैयारी कर रहे थे,“मैं नहीं चाहता कि तुम यहाँ आकर
मेरे बच्चों के सामने इस गली-मोहल्ले वाली भाषा का इस्तेमाल करो।”
“तुम मेरी भाषा की चिंता मत करो, भाई,” उसने जोश के साथ कहा, “तुम्हें
अपनी ज़िंदगी की चिंता करनी चाहिए। ये बच्चे जो सुनते हैं, उससे
उन्हें उतना नुकसान नहीं होने वाला, जितना उस चीज़ से होगा
जो वे देखते हैं।”
“क्या देखते देखते हैं,” उसके पिता बुदबुदाए,
“यही कि एक गरीब आदमी है जो प्रभु की सेवा करने की कोशिश कर रहा है।
यही मेरी ज़िंदगी है।”
“तो फिर मैं गारंटी देती हूँ,” उसने कहा, “कि वे अपनी पूरी कोशिश करेंगे कि वह उनकी
ज़िंदगी न बने। मेरी बात याद रखना।”
उसने मुड़कर उसकी ओर देखा और दोनों स्त्रियों के बीच से
गुज़रती हुई उस नज़र को पकड़ लिया। जॉन की माँ, अपने पति के कारणों से बिल्कुल अलग कारणों से चाहती थी कि आंटी फ्लोरेंस
चुप रहें। उसने व्यंग्यपूर्ण ढंग से नज़रें फेर लीं। जॉन ने देखा कि उसकी माँ ने
कड़वाहट से अपने होंठ भींच लिए और अपनी आँखें नीचे झुका लीं। उसके पिता चुपचाप रॉय
के माथे पर पट्टी बाँधने लगे।
“यह तो बस ईश्वर की दया
है,” उसने आखिरकार कहा, “कि इस लड़के
की आँख नहीं गई। इधर देखो।”
उसकी माँ झुककर रॉय के चेहरे की ओर देखने लगी और दुख तथा
सहानुभूति से कुछ बुदबुदाई। फिर भी, जॉन को लगा कि उसने तुरंत ही रॉय की आँख और उसकी जान पर मंडराने वाले खतरे
की गंभीरता समझ ली थी और अब वह उस चिंता से आगे निकल चुकी थी। अब वह मानो केवल समय
काट रही थी और अपने आपको उस क्षण के लिए तैयार कर रही थी, जब
उसके पति का सारा क्रोध पूरी ताकत से उसकी ओर मुड़ेगा।
अब उसके पिता ने जॉन की ओर देखा, जो रूथ को गोद में लिए फ्रेंच दरवाज़ों के
पास खड़ा था।
“इधर आओ, लड़के,”
उसने कहा, “और देखो कि उन गोरे लोगों ने
तुम्हारे भाई का क्या हाल कर दिया है।”
जॉन सोफ़े की ओर बढ़ा। वह अपने पिता की क्रोध से भरी आँखों
के सामने उतने ही गर्व से अपने को सँभालकर चल रहा था जैसे, कोई राजकुमार फाँसी के
तख्ते की ओर बढ़ रहा हो।
“इधर देखो,” उसके पिता
ने कहा और उसकी एक बाँह को बेरहमी से पकड़ लिया, “अपने भाई
को देखो।”
जॉन ने नीचे रॉय की ओर देखा। रॉय अपनी काली आँखों से लगभग
निर्विकार भाव से उसकी ओर देख रहा था। लेकिन जॉन उसके जवान होंठों पर उभरी थकी हुई, अधीर मुद्रा से समझ गया कि उसका भाई उससे
कह रहा था कि इन सब बातों के लिए उसे दोषी न ठहराया जाए। रॉय की आँखें मानो कह रही थीं। यह न उसकी गलती
थी, न जॉन की। जॉन को यह एहसास हुआ कि रॉय की आँखें कह रही हैं
कि उनका पिता इतना पागल है।
[1] नींद से डूबा हुआ
[2] ईसाई धार्मिक संदर्भ में Judgment Day वह दिन है जब ईश्वर मनुष्यों के
कर्मों का अंतिम न्याय करेगा
और तय करेगा कि कौन उद्धार पाएगा और कौन दंडित होगा।
[3] White women
[4] White men
[5][5]
यह
हिब्रू मूल का धार्मिक शब्द है। इसका मूल अर्थ, उद्धार करना अथवा बचाना है। पर
यहाँ इस शब्द का अर्थ प्रभु की जय करने से है।
[6] न्यूयॉर्क
शहर की एक प्रसिद्ध सड़क का नाम है। यह विशेष रूप से मैनहैटन के थिएटरों और रंगमंच की
दुनिया के लिए
प्रसिद्ध है।
[7] घरेलू तौर पर बनाई गई शराब। जुनिपर एक
प्रकार का सदाबहार झाड़ीदार/छोटा पेड़ है। इसके छोटे, बेर
जैसे फल (जिन्हें juniper berries कहते हैं) का उपयोग जिन बनाने
में किया जाता है।
[8] वह समय जब
मान्यता के अनुसार यीशु मसीह संसार के अंत न्याय के समय फिर से आएँगे।
[9]
वे
एक धनी, धर्मपरायण और
धैर्यवान व्यक्ति माने जाते
हैं। बाइबल की कथा में उनके जीवन में एक के बाद एक बहुत बड़ी विपत्तियाँ आती हैं। उनकी
संपत्ति नष्ट होती है, उनके बच्चे
मर जाते हैं और वे स्वयं भी भयंकर कष्ट सहते हैं। फिर भी वे ईश्वर के प्रति अपनी
आस्था और धैर्य बनाए रखने का संघर्ष करते हैं। इसी कारण अय्यूब धैर्य और अत्यंत कठिन
परिस्थितियों को सहने के प्रतीक
बन गए हैं।
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