प्रिय लूसीलियस
प्रिय लूसीलियस, वह क्या है जो हमें उस दिशा के विपरीत खींच ले जाता है, जिधर हम जाना चाहते हैं, जो हमें उसी स्थान की ओर वापस धकेल देता है, जहाँ से हम दूर जाना चाहते हैं? वह क्या है जो हमारे मन से संघर्ष करता रहता है और हमें किसी एक बात को एक बार और सदा के लिए पूरे मन से चाहने नहीं देता? हम एक योजना से दूसरी योजना के बीच डगमगाते रहते हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं होती जिसे हम स्वतंत्र रूप से बिना किसी शर्त के और सदा के लिए चाहें। तुम कहोगे, "किसी बात का दृढ़ निश्चय न कर पाना, किसी एक विकल्प पर स्थिर न रह पाना— यही तो मूर्खता है।" किन्तु हम इस मूर्खता से स्वयं को कैसे मुक्त करें और कब? कोई भी व्यक्ति इतना समर्थ नहीं होता कि वह केवल अपने बल पर तैरकर सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाए। किसी को अपना हाथ बढ़ाना पड़ता है। किसी को उसे पकड़कर ऊपर खींचना पड़ता है।
एपिक्यूरस (Epicurus) कहते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो किसी की सहायता के बिना ही सत्य तक पहुँच जाते हैं। वे अपना मार्ग स्वयं बनाते हैं। वे ऐसे लोगों की सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं जिनकी प्रेरणा और प्रगति उनके अपने भीतर से उत्पन्न होती है। वे यह भी कहते हैं कि कुछ लोगों को किसी दूसरे के सहारे की आवश्यकता होती है। यदि कोई उनसे पहले मार्ग न दिखाए तो वे लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। किन्तु वे अच्छे अनुयायी सिद्ध होते हैं। उनके अनुसार मिटरोडोरस (Metrodorus) इसी दूसरी श्रेणी के व्यक्ति थे। यह भी एक उत्कृष्ट बुद्धि है, यद्यपि प्रथम श्रेणी की नहीं बल्कि दूसरी श्रेणी की। हम भी प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों में नहीं आते। हमारे लिए इतना ही बहुत है कि हमें दूसरी श्रेणी में स्थान मिल जाए। ऐसा भी नहीं है कि तुम्हें उस व्यक्ति को तुच्छ समझना चाहिए जो किसी दूसरे की कृपा और मार्गदर्शन से सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाता है। बचाए जाने की इच्छा और तत्परता भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।
इन दोनों प्रकार के लोगों के अतिरिक्त तुम्हें एक तीसरी श्रेणी के लोग भी मिलेंगे और उन्हें भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए। ये वे लोग हैं जिन्हें सही मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना पड़ता है, यहाँ तक कि कभी-कभी बाध्य भी करना पड़ता है। उन्हें केवल एक मार्गदर्शक ही नहीं बल्कि एक सहायक और मानो किसी प्रशिक्षक की भी आवश्यकता होती है। यह तीसरी श्रेणी है। यदि तुम इसका भी एक उदाहरण चाहते हो तो एपिक्यूरस कहते हैं कि हर्मरकुस (Hermarchus) ऐसे ही व्यक्ति थे। इसी कारण वे एक के लिए अधिक बधाई प्रकट करते हैं। किन्तु दूसरे के प्रति अधिक प्रशंसा व्यक्त करते हैं। क्योंकि यद्यपि दोनों अंततः एक ही लक्ष्य तक पहुँच गए फिर भी अधिक कठिन स्वभाव और सामग्री के साथ उसी परिणाम को प्राप्त करना अधिक प्रशंसनीय होता है।
मान लो कि दो भवन बनाए गए हैं और दोनों एक समान हैं, ऊँचाई में भी और भव्यता में भी। एक भवन ऐसी भूमि पर बनाया गया जहाँ ज़मीन दृढ़ और ठोस थी। इसलिए उसका निर्माण शीघ्रता से पूरा हो गया। दूसरे भवन की नींव ढीली और खिसकने वाली मिट्टी पर रखी जानी थी। उसे मजबूत और स्थिर बनाने में बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ा, तभी निर्माण आगे बढ़ सका। पहले निर्माणकर्ता का कार्य तो सबकी आँखों के सामने दिखाई देता है पर दूसरे के परिश्रम का सबसे बड़ा और सबसे कठिन भाग दर्शकों की दृष्टि से ओझल रहता है क्योंकि वह नींव को मजबूत करने में लगा होता है। इसी प्रकार कुछ लोगों का स्वभाव सहज और बिना किसी विशेष बाधा के विकसित हो जाता है जबकि कुछ अन्य, जैसा कि कहा जाता है, “हाथों के कठिन परिश्रम का काम” होते हैं। उन्हें सबसे पहले अपने चरित्र की नींव को ही मजबूत बनाने में जुटना पड़ता है। इसलिए मैं कहूँगा कि जिसे अपने ही स्वभाव से संघर्ष नहीं करना पड़ता, वह निश्चय ही अधिक भाग्यशाली है। किन्तु वास्तविक प्रशंसा का अधिक अधिकारी वह है जिसने अपने स्वभाव की कमजोरियों पर विजय प्राप्त की हो, जो केवल बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ा ही नहीं बल्कि अपने आपको खींचते हुए, संघर्ष करते हुए, वहाँ तक पहुँचाया हो।
जिस बुद्धि और मन पर हमें कार्य करना है, वह कठोर और आसानी से न झुकने वाला है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लेना ही उचित है। हमारे मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं। अतः हमें उनका डटकर सामना करना चाहिए और सहायता के लिए अतिरिक्त शक्ति भी बुला लेनी चाहिए।
तुम पूछते हो, “मैं किसे बुलाऊँ? इस व्यक्ति को या उस व्यक्ति को?” वास्तव में, तुम्हें अपने पूर्वजों और प्राचीन महान व्यक्तियों की ओर भी लौटना चाहिए। वे किसी काम में व्यस्त नहीं हैं। केवल जीवित लोग ही हमारी सहायता नहीं कर सकते। जो इस संसार से जा चुके हैं, वे भी अपने विचारों और शिक्षाओं के माध्यम से हमारी सहायता कर सकते हैं।
फिर भी, जहाँ तक जीवित लोगों का प्रश्न है, हमें ऐसे लोगों को नहीं चुनना चाहिए जो शब्दों की बाढ़ बहा देते हैं, घिसी-पिटी बातें दोहराते रहते हैं और घर में भी मानो भीड़ को संबोधित कर रहे हों। इसके बजाय, हमें ऐसे लोगों को अपना मार्गदर्शक बनाना चाहिए जो अपने जीवन के आचरण से शिक्षा देते हैं। वे केवल यह नहीं बताते कि क्या करना चाहिए बल्कि स्वयं वैसा करके भी दिखाते हैं। और जिन बातों से बचने की शिक्षा वे देते हैं, बाद में तुम उन्हें स्वयं वही करते हुए नहीं पाओगे। अपने सहायक के रूप में ऐसे व्यक्ति को चुनो, जिसे देखकर तुम उससे उतना ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक प्रभावित और सम्मानित हो जाओ, जितना केवल उसकी बातें सुनकर होते हो।
इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें उन लोगों से दूर रहना चाहिए जो सामान्यतः श्रोताओं के सामने व्याख्यान देते हैं। मैं तुम्हें उनकी बातें सुनने से भी नहीं रोकता बशर्ते कि वे लोगों के बीच यश और प्रतिष्ठा पाने की महत्त्वाकांक्षा से न जाएँ बल्कि केवल इस उद्देश्य से जाएँ कि वे अपने श्रोताओं का भी और अपना भी सुधार कर सकें। क्योंकि प्रशंसा की भूखी दर्शन-विद्या से अधिक लज्जाजनक और कुछ नहीं हो सकता। क्या कोई रोगी उस चिकित्सक की प्रशंसा करता है जो उसका शल्य-चिकित्सा द्वारा उपचार कर रहा हो?
इसलिए तुम सब शांत रहो और मौन रहकर अपना उपचार होने दो। यदि तुम पीड़ा में चिल्लाओ भी, तब भी मैं तुम्हारी बात उसी प्रकार सुनूँगा, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति की कराह सुनता हूँ जिसके घाव पर हाथ लग गया हो। क्या तुम यह प्रकट करना चाहते हो कि तुम ध्यानपूर्वक सुन रहे हो और विषय की महानता से तुम्हारा हृदय प्रभावित हुआ है? निश्चय ही ऐसा कर सकते हो। मैं इसकी अनुमति क्यों न दूँ, जब तक कि तुम्हारी प्रतिक्रिया अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति के विचारों के समर्थन और सम्मान की अभिव्यक्ति हो?
पायथागोरस (Pythagoras) के शिष्यों को पाँच वर्षों तक मौन रहने का अभ्यास कराया जाता था। इसलिए क्या तुम यह समझते हो कि जब उन्हें बोलने का अधिकार मिला तो उसी क्षण उन्हें प्रशंसा करने का अधिकार भी मिल गया? लेकिन अशिक्षित लोगों की तालियों और जय-जयकार से रोमांचित होकर सभा से बाहर निकलना वास्तव में अत्यन्त मूर्खता है। तुम उन लोगों की प्रशंसा से प्रसन्न क्यों होते हो, जिनकी प्रशंसा तुम स्वयं करने योग्य नहीं समझते? पापिरीअस फैबियानस (Papirius Fabianus) श्रोताओं के सामने व्याख्यान दिया करते थे। किन्तु लोग उन्हें बड़े संयम और गंभीरता के साथ सुनते थे। कभी-कभी उनके मुख से प्रशंसा के उद्गार अवश्य फूट पड़ते थे, परन्तु वे किसी अलंकृत वाक्पटुता या भाषण-कौशल के कारण नहीं, बल्कि विषय की गहनता और महत्ता से उत्पन्न होते थे। नाट्यशाला में बजने वाली तालियों और व्याख्यान-सभा में व्यक्त की जाने वाली प्रशंसा के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। प्रशंसा करने की भी एक मर्यादा, शालीनता और सौंदर्य होता है।
यदि मनुष्य ध्यानपूर्वक देखे तो प्रत्येक वस्तु किसी न किसी दूसरी वस्तु का संकेत होती है। किसी व्यक्ति के चरित्र का अनुमान उसकी अत्यन्त छोटी-से-छोटी बातों से भी लगाया जा सकता है। चरित्रहीन व्यक्ति अपने चलने के ढंग, अपनी मुद्राओं, कभी-कभी केवल एक उत्तर देने के ढंग, सिर पर उँगली फेरने की आदत या आँखें घुमाने की शैली से ही पहचाना जाता है। दुराचारी व्यक्ति उसकी हँसी से प्रकट हो जाता है। पागल व्यक्ति उसके चेहरे के भाव तथा उसके व्यवहार से पहचाना जाता है। इन सब बातों को उनके संकेतों को पढ़कर जाना जा सकता है। इसी प्रकार, यदि तुम यह देखो कि कोई व्यक्ति दूसरों की प्रशंसा किस प्रकार करता है और स्वयं किस प्रकार प्रशंसा प्राप्त करता है तो तुम उसके चरित्र का भी अनुमान लगा सकते हो। जब तुम देखते हो कि चारों ओर से श्रोता किसी दार्शनिक की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं और प्रशंसकों की भीड़ उसे चारों ओर से घेरे खड़ी है तो समझ लो कि वहाँ क्या हो रहा है। वह अब वास्तविक प्रशंसा नहीं रह जाती। वह केवल तालियाँ और शोर बनकर रह जाती है। ऐसी धूमधाम और दिखावटी प्रशंसा उन कलाओं के लिए छोड़ देनी चाहिए जिनका उद्देश्य जनता का मनोरंजन करके उन्हें प्रसन्न करना है। दर्शन का स्वागत केवल श्रद्धा और सम्मान के साथ होना चाहिए।
हमें युवाओं को उनके आवेगपूर्ण मन के अनुसार प्रतिक्रिया करने की कुछ छूट देनी होगी। पर केवल तब, जब वे वास्तव में सहज आवेग से ऐसा कर रहे हों और स्वयं को शांत रहने का आदेश देने में अभी समर्थ न हों। ऐसी प्रशंसा स्वयं श्रोताओं के लिए भी एक प्रकार की प्रेरणा का कार्य करती है। वह युवा मन में उत्साह और प्रोत्साहन उत्पन्न करती है। परन्तु उन्हें विषय की महानता से प्रभावित होना चाहिए न कि कृत्रिम और बनावटी शब्द-सज्जा से। अन्यथा वाक्पटुता उनके लिए हानिकारक सिद्ध होती है क्योंकि तब वे विषय के प्रति नहीं बल्कि केवल भाषण-कला के प्रति आकर्षित होने लगते हैं।
इस विषय पर मैं आगे की चर्चा अभी स्थगित करता हूँ क्योंकि यह अपने आप में विस्तृत विवेचन की माँग करता है कि जनता के सामने किस प्रकार बोलना चाहिए, उनकी उपस्थिति में स्वयं को कितनी स्वतंत्रता देनी चाहिए, और उन्हें कितनी। इसमें कोई संदेह नहीं कि दर्शन ने अपने आपको सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय बनाकर कुछ न कुछ खो दिया है। फिर भी उसके सबसे अंतरंग और पवित्र रहस्यों को भी लोगों के सामने प्रकट किया जा सकता है। किन्तु इसके लिए उसका प्रतिनिधि कोई व्यापारी या दिखावा करने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि एक पुजारी के समान श्रद्धा, पवित्रता और निष्ठा रखने वाला होना चाहिए।
अभी के लिए विदा
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