प्रिय लूसीलियस
प्रिय लूसीलियस, जो कुछ हमारे पास है, उसी में हमें संतोष करना चाहिए। तुम्हारे वहाँ एटना है, जो सिसिली का सबसे ऊँचा और सबसे महान पर्वत है। यद्यपि मेस्साला उसे 'अद्वितीय' क्यों कहता है, यह मैं समझ नहीं पाता। या शायद यह बात वाल्गियस ने कही हो। मैंने यह दोनों के यहाँ पढ़ी है।
बहुत-से स्थान अग्नि उगलते हैं। केवल ऊँचे पर्वत ही नहीं, यद्यपि वहाँ ऐसा अधिक होता है क्योंकि अग्नि स्वभावतः ऊपर की ओर उठती है बल्कि समतल भूमि भी ऐसा करती है। और जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं अपनी सामर्थ्य भर बाइए से ही संतोष कर लेता हूँ। मैं वहाँ पहुँचने के केवल एक दिन बाद ही उसे छोड़ आया। यद्यपि वहाँ प्रकृति ने कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान की हैं। फिर भी वह ऐसा स्थान है जिससे बचना चाहिए। इसका कारण यह है कि विलासिता और भोग-विलास ने उसे अपने उत्सवों और मौज-मस्ती का नगर बना लिया है।
“तुम क्या कह रहे हो? क्या ऐसा भी कोई स्थान है जिससे हमें विरक्ति घोषित कर देनी चाहिए?” नहीं। परन्तु जिस प्रकार कुछ वस्त्र बुद्धिमान और सदाचारी व्यक्ति के लिए अन्य वस्त्रों की अपेक्षा अधिक उपयुक्त होते हैं, जिस प्रकार वह किसी भी रंग से घृणा नहीं करता, फिर भी कुछ रंगों को उस व्यक्ति के लिए कम उपयुक्त मानता है, जिसने सादगी और मितव्ययिता का जीवन अपनाने का संकल्प लिया है, उसी प्रकार कुछ ऐसे स्थान भी होते हैं जिनसे बुद्धिमान व्यक्ति या वह जो बुद्धिमत्ता की ओर अग्रसर है, इसलिए बचता है क्योंकि वे उत्तम चरित्र के विकास के अनुकूल नहीं होते।
इस प्रकार, जो व्यक्ति एकांतवास के लिए किसी स्थान का चयन करेगा, वह कभी कैनोपस को नहीं चुनेगा। यद्यपि कैनोपस किसी को सादा जीवन जीने से नहीं रोकता। उसी प्रकार वह बाइए को भी नहीं चुनेगा क्योंकि वह दुर्गुणों का अड्डा बन चुका है। वहाँ भोग-विलास अपने को और अधिक छूट दे देता है, मानो उस स्थान के विशेष अधिकार के कारण वहाँ वह स्वयं को पूरी तरह उन्मुक्त छोड़ देता हो।
हमें ऐसा वातावरण चुनना चाहिए जो केवल हमारे शरीर के लिए ही नहीं बल्कि हमारे चरित्र के लिए भी हितकारी हो। जिस प्रकार मैं जल्लादों के बीच रहना नहीं चाहूँगा, उसी प्रकार मैं मदिरालयों के बीच भी नहीं रहना चाहूँगा। मुझे यह सब देखने की क्या आवश्यकता है। समुद्रतट पर लड़खड़ाते हुए शराबी, नाविकों के उन्मत्त उत्सव, बाजों और वाद्ययंत्रों की ध्वनि से गूँजते हुए सरोवर और वे सब दृश्य जिन्हें निरंकुश भोग-विलास न केवल करता है बल्कि खुलेआम प्रदर्शित भी करता है?
हमें यथासंभव अपने और दुर्गुणों के लिए उकसाने वाली हर चीज़ के बीच दूरी बनाए रखनी चाहिए। हमें अपने मन को दृढ़ बनाना चाहिए और उसे सुख-भोग के प्रलोभनों से दूर रखना चाहिए। वहाँ बिताई गई केवल एक ही शीत ऋतु ने हैनिबल को दुर्बल बना दिया। जिस व्यक्ति को आल्प्स के हिमाच्छादित पर्वत पराजित नहीं कर सके, वही कैंपानिया के भाप-स्नानागारों ने निर्बल कर दिया। वह युद्धभूमि में विजयी था परन्तु दुर्गुणों के हाथों पराजित हो गया।
हमें भी अभियान पर निकले सैनिकों के समान जीवन जीना चाहिए। ऐसे अभियान पर जिसमें न विश्राम का अवसर है और न ही अवकाश का। विशेष रूप से, हमें इन्द्रिय-सुखों पर विजय प्राप्त करनी है क्योंकि जैसा कि तुम देखते हो, उन्होंने कभी-कभी सबसे अधिक युद्धप्रिय और वीर स्वभाव वाले लोगों को भी अपना बंदी बना लिया है। यदि हम अपने कार्य की विशालता पर विचार करें तो समझ जाएँगे कि विलासपूर्ण और फैशनेबल जीवन हमारा मार्ग नहीं हो सकता। गरम स्नानागारों से मेरा क्या प्रयोजन? उन भाप से भरे कक्षों से मुझे क्या लेना-देना जिनका उद्देश्य केवल शरीर की शक्ति को निचोड़ देना है? हमारा सारा पसीना तो परिश्रम से बहना चाहिए। यदि हम भी हैनिबल की तरह अपने कार्यों को बीच में छोड़ दें, अपने संघर्ष को भूल जाएँ और अपना समय केवल शरीर को आराम और लाड़-प्यार देने में लगाने लगें तो हर व्यक्ति हमें ऐसे अनुचित समय के आलस्य के लिए दोष देगा। उसका दोष देना उचित भी होगा। ऐसा आलस्य तो एक विजेता के लिए भी घातक है। फिर उस व्यक्ति के लिए कितना अधिक जो अभी विजय प्राप्त करने के मार्ग पर ही है।
भाग्य मेरे विरुद्ध युद्ध कर रहा है फिर भी मैं उसकी आज्ञा का पालन नहीं करूँगा। मैं उसका जुआ अपने ऊपर नहीं उठाऊँगा। बल्कि मैं उससे भी अधिक साहस का कार्य करूँगा। मैं उस जुए को अपने ऊपर से उतार फेंकूँगा। मेरे मन को दुर्बल नहीं होने देना चाहिए। यदि मैं सुख-भोग के सामने झुक गया तो मुझे पीड़ा, कठिन परिश्रम और निर्धनता के सामने भी झुकना पड़ेगा। महत्त्वाकांक्षा भी मुझ पर अपना वही अधिकार जताएगी और क्रोध भी। इतने सारे आवेगों के अधीन होकर मैं कभी एक दिशा में तो कभी दूसरी दिशा में खिंचता रहूँगा बल्कि, अंततः मैं टुकड़े-टुकड़े हो जाऊँगा। हमारे लिए तो कार्थेज के सैनिकों की अपेक्षा भी कम छूट है। यदि हम पराजित होकर इन्द्रिय-सुखों के आगे झुक जाएँ तो हमारा संकट अधिक बड़ा है। यदि हम दृढ़ बने रहें, तब भी हमारा परिश्रम उनसे कहीं अधिक कठिन है।
हमारे सामने स्वतंत्रता का लक्ष्य रखा हुआ है। उसी पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए हम प्रयत्न कर रहे हैं। क्या तुम पूछते हो कि स्वतंत्रता क्या है? स्वतंत्रता यह है— किसी भी वस्तु की दासता स्वीकार न करना, न किसी बाध्यता की, न ही संयोगवश घटने वाली घटनाओं की बल्कि भाग्य का सामना समान स्तर पर करना। जिस दिन मुझे यह लगेगा कि भाग्य की शक्ति मुझ पर अत्यधिक भारी पड़ रही है, उसी दिन उसकी वह शक्ति मेरे लिए समाप्त हो जाएगी। जब मृत्यु सदैव मेरे हाथ की पहुँच में है, तब मुझे भाग्य का अत्याचार क्यों सहना चाहिए?
जो व्यक्ति ऐसे विचारों को गंभीरता से अपनाता है, उसे ऐसे स्थानों का चुनाव करना चाहिए जो संयम और शुद्ध जीवन के अनुकूल हों। अत्यधिक आराम मनुष्य के मन को निर्बल और स्त्रैण बना देता है। केवल स्थान का प्रभाव भी निस्संदेह किसी की शक्ति को नष्ट करने की क्षमता रखता है। जिन भारवाही पशुओं के खुर कठोर भूमि पर चलने से मजबूत हो गए हैं, वे किसी भी मार्ग पर चल सकते हैं। परन्तु जो कोमल घास के मैदानों में पलकर मोटे-ताज़े हुए हैं, वे शीघ्र ही लँगड़ा जाते हैं। जो सैनिक दुर्गम और ऊबड़-खाबड़ प्रदेशों में तैनात रहा है, वह और अधिक सशक्त बन जाता है जबकि नगर में रहने वाला व्यक्ति आलसी हो जाता है। जिन हाथों ने हल की मूठ पकड़ने के बाद सीधे तलवार की मूठ थामी है, वे हर प्रकार का कार्य करने में सक्षम होते हैं। परन्तु जिन हाथों की चमक केवल मैनीक्योर और मालिश से आई है, वे ज़रा-सी गंदगी लगते ही काम छोड़ देते हैं।
कुछ स्थानों का कठोर अनुशासन मनुष्य के मन को दृढ़ बनाता है और उसे महान कार्यों के योग्य बना देता है। लिटर्नम में स्पिओ (Scipio) का निर्वासन, बाइए में होता तो जितना सम्मानजनक न होता, उससे कहीं अधिक सम्मानजनक था। इतनी बड़ी पतनावस्था को इतना कोमल आश्रय नहीं मिलना चाहिए था। यह सत्य है कि गैउस मरीअस (Gaius Marius), ग्नाउस पोमपेई (Gnaeus Pompey) और जूलियस सीजर (Julius Caesar), वे सभी महान सेनानायक, जिन पर भाग्य ने रोमन जनता के समस्त संसाधनों की वर्षा की थी। उन्होंने भी बाइए के निकट अपने निवास-स्थान बनवाए थे। किन्तु उन्होंने उन्हें पहाड़ियों की चोटियों पर बनवाया क्योंकि सेनापति होने के नाते उन्हें यह अधिक उपयुक्त प्रतीत होता था कि वे ऐसी ऊँचाई पर रहें जहाँ से नीचे के समस्त प्रदेशों पर दृष्टि रखी जा सके। उनके द्वारा चुने गए स्थानों और निर्मित भवनों को ध्यान से देखो, तब तुम्हें समझ में आ जाएगा कि वे केवल विलास-भवन नहीं थे बल्कि दुर्ग थे।
क्या तुम्हें लगता है कि मार्कस कैटो (Marcus Cato) कभी वहाँ रहना पसंद करते? किसलिए? क्या इसलिए कि वे वहाँ से नौकाओं में घूमती हुई व्यभिचारिणी स्त्रियों को देखते रहें, भिन्न-भिन्न रंगों से सजी असंख्य मनोरंजन-नौकाओं को निहारें अथवा सरोवर की सतह पर तैरते हुए गुलाबों को देखते रहें? क्या इसलिए कि वे प्रत्येक रात संगीतकारों के कोलाहल को सुनते रहें? क्या वे इसके बजाय अपने ही हाथों से केवल एक रात के उपयोग के लिए खोदी गई किसी साधारण खाई या सैनिक शिविर की परिखा में ठहरना अधिक पसंद न करते? भला कौन-सा सच्चा पुरुष ऐसा होगा जो अपनी नींद भंग करने के लिए किसी मधुर संगीत-सभा की अपेक्षा रणभेरी बजाने वाले सैनिक को अधिक पसंद न करे?
खैर, बाइए के साथ मेरा यह विवाद यहीं समाप्त होता है। यद्यपि उसके दुर्गुणों की मैं जितनी भी निंदा करूँ, वह कभी पर्याप्त नहीं होगी। प्रिय लूसीलियस, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि इन दुर्गुणों का बिना किसी सीमा और बिना किसी अंत के पीछा करो और उनका विरोध करते रहो क्योंकि वे स्वयं भी असीम और अनंत हैं। अपने भीतर से प्रत्येक उस दोष को निकाल फेंको जो तुम्हारे हृदय को घायल करता है। यदि किसी अन्य उपाय से उन्हें दूर न कर सको तो उन दोषों सहित अपने हृदय को ही उखाड़ फेंको। सबसे बढ़कर, इन्द्रिय-सुखों को अपने जीवन से दूर कर दो। उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु समझो। वे उन डाकुओं के समान हैं जिन्हें मिस्रवासी 'स्वीटहार्ट्स' कहते हैं, वे पहले हमें प्रेमपूर्वक आलिंगन में बाँधते हैं और फिर उसी आलिंगन में हमारा गला घोंट देते हैं।
अभी के लिए विदा
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