प्रिय लूसीलियस
अस्वस्थता ने मुझे लंबे समय तक कुछ राहत दी थी। परन्तु अचानक उसने फिर मुझ पर आक्रमण कर दिया। तुम पूछोगे, “इस बार क्या तकलीफ़ थी?” और तुम्हारा यह प्रश्न उचित भी है क्योंकि ऐसा कोई रोग नहीं है जिससे मेरा कभी परिचय न हुआ हो। किन्तु एक रोग ऐसा है जिसने मानो मुझे पूरी तरह अपने अधिकार में ले रखा है। भला मैं उसका यूनानी नाम क्यों लूँ? मैं उसे सरल शब्दों में 'साँस फूलना' या 'घरघराहट' ही कह सकता हूँ। यही नाम उसके लिए पर्याप्त और उपयुक्त है।
इसका दौरा बहुत थोड़े समय के लिए आता है बिल्कुल किसी अचानक उठने वाले तूफ़ानी झोंके की तरह। प्रायः वह एक घंटे के भीतर ही समाप्त हो जाता है। आखिर कोई व्यक्ति बहुत देर तक अंतिम साँस की अवस्था में तो नहीं रह सकता! शरीर की लगभग हर प्रकार की पीड़ा और हर संकट से मैं गुज़र चुका हूँ। फिर भी मुझे लगता है कि इससे अधिक कष्टदायक कुछ नहीं है। और ऐसा क्यों न हो? अन्य सभी रोगों में मनुष्य केवल बीमार होता है। पर इस रोग में ऐसा लगता है मानो उसके प्राण ही शरीर से बाहर निकल रहे हों। इसी कारण चिकित्सक इसे 'मृत्यु का पूर्वाभ्यास' कहते हैं क्योंकि यह साँस का अवरोध कई बार वही करने का प्रयास करता है, जिसे एक दिन मृत्यु वास्तव में पूरा कर देती है। क्या तुम्हें लगता है कि मैं यह सब तुम्हें बड़े आनंद से लिख रहा हूँ, केवल इसलिए कि मैं इस बार बच निकला? यदि मैं इस थोड़ी-सी राहत पर ऐसे प्रसन्न होऊँ मानो मैं पूर्णतः स्वस्थ हो गया हूँ तो मैं उतना ही हास्यास्पद होऊँगा, जितना वह व्यक्ति जो केवल इसलिए यह समझ बैठे कि उसने अपना मुक़दमा जीत लिया है क्योंकि उसकी सुनवाई कुछ समय के लिए टल गई है।
फिर भी, जब मेरा दम घुट रहा था, तब भी मैं प्रसन्न और साहसपूर्ण विचारों के सहारे अपनी मानसिक शांति बनाए रखने में सफल रहा। मैंने अपने आप से कहा, “यह क्या है? क्या मृत्यु बार-बार मेरी परीक्षा ले रही है? तो लेने दो। मैं भी बहुत पहले उसकी परीक्षा ले चुका हूँ।” तुम पूछोगे, “कब?” जन्म लेने से पहले। मृत्यु तो केवल अस्तित्व का अभाव है। यह कैसी अवस्था होती है, मैं पहले से ही जानता हूँ। मेरे बाद जो स्थिति होगी, वही तो मेरे जन्म से पहले भी थी। यदि इस अवस्था में कोई यातना होती तो हमारे इस संसार का प्रकाश देखने से पहले भी अवश्य ही वह यातना रही होती। पर उस समय तो हमें किसी प्रकार का कोई कष्ट अनुभव नहीं हुआ था।
मैं तुमसे पूछता हूँ। क्या तुम उस व्यक्ति को अत्यन्त मूर्ख नहीं कहोगे, जो यह समझे कि एक दीपक बुझ जाने के बाद, जलाए जाने से पहले की अपेक्षा अधिक बुरी अवस्था में होता है? हम भी उसी दीपक के समान हैं। हम प्रज्वलित होते हैं और फिर बुझ जाते हैं। इन दोनों अवस्थाओं के बीच ही कुछ समय ऐसा होता है, जब हमें अनुभव और चेतना होती है। परन्तु दोनों ओर केवल पूर्ण अनस्तित्व और किसी भी प्रकार की अनुभूति का अभाव है। प्रिय लूसीलियस, यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम समझते हैं कि मृत्यु केवल जीवन के बाद आती है। वास्तव में, मृत्यु जीवन से पहले भी होती है और उसके बाद भी। जो कुछ हमारे जन्म से पहले था, वही तो मृत्यु थी। फिर अंत हो जाने और कभी आरम्भ ही न होने में क्या अंतर है? दोनों का परिणाम एक ही है—अनस्तित्व।
इन उत्साहवर्धक विचारों से और इसी प्रकार के अनेक अन्य विचारों से, मैं निरंतर अपने आपको धैर्य और साहस देता रहा। स्वाभाविक ही है कि मैं उन्हें बोलकर नहीं कह सकता था क्योंकि मेरे पास बोलने के लिए साँस ही नहीं बची थी। फिर धीरे-धीरे मेरी घरघराहट, जो पहले ही हाँफने में बदल चुकी थी, अधिक लंबे अंतराल पर आने लगी। उसके बाद उसकी तीव्रता कम होती गई और अंततः मेरी साँस कुछ स्थिर हो गई। फिर भी, अब जबकि वह दौरा समाप्त हो चुका है, मेरी साँस अभी तक पूरी तरह स्वाभाविक नहीं हुई है। अब भी उसमें एक प्रकार का रुकाव, अटकाव और झिझक-सी बनी रहती है।
तो ऐसा ही सही, जब तक कि मैं जान-बूझकर आहें नहीं भर रहा हूँ! मैं तुम्हें यह वचन देता हूँ। अपने जीवन के अंत के समय मैं भय से नहीं काँपूँगा। मैं पहले से ही उसके लिए तैयार हूँ। मैं अपने जीवन की कुल अवधि के बारे में तनिक भी चिंता नहीं करता। प्रशंसा और अनुकरण उसी व्यक्ति का करना चाहिए जो जीवन का आनंद तो लेता है, परन्तु मृत्यु आने पर उससे विमुख या अनिच्छुक नहीं होता। आखिर उस व्यक्ति में क्या विशेष गुण है, जो केवल तब जीवन छोड़ता है जब उसे उससे बलपूर्वक अलग कर दिया जाता है? फिर भी, इसमें भी एक सद्गुण है। यद्यपि मुझे सचमुच जीवन से बाहर किया जा रहा है फिर भी मैं इस प्रकार विदा हो रहा हूँ मानो यह मेरा अपना स्वेच्छापूर्ण प्रस्थान हो।
इसी कारण बुद्धिमान व्यक्ति को वास्तव में कभी भी जीवन से बलपूर्वक बाहर नहीं किया जाता। क्योंकि बलपूर्वक निकाला जाना उसी को कहा जाता है जिसे उस स्थान से हटाया जाए, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता। परन्तु ज्ञानी पुरुष ऐसा कोई कार्य नहीं करता जिसे वह अनिच्छा से करे। वह अनिवार्यता पर इस प्रकार विजय प्राप्त कर लेता है कि जो कार्य परिस्थितियों की अनिवार्यता उससे किसी भी स्थिति में करवाने वाली है, उसे वह अपनी इच्छा से ही करने लगता है।
अभी के लिए विदा
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