प्रिय लूसीलियस
अभी-अभी मैं पालकी की सवारी करके लौटा हूँ। मैं उतना ही थक गया हूँ, मानो जितनी देर मैं बैठा रहा, उतनी ही देर पैदल चला होता। लंबे समय तक दूसरों के द्वारा ढोया जाना भी एक प्रकार का श्रम है। शायद उससे भी अधिक कठिन क्योंकि यह प्रकृति के विरुद्ध है। प्रकृति ने हमें पैर इसलिए दिए हैं कि हम स्वयं चल सकें और आँखें इसलिए दी हैं कि हम स्वयं देख सकें। विलासपूर्ण और अत्यधिक आराम का जीवन अंततः हमें दुर्बल बना देता है। जब हम किसी कार्य को लंबे समय तक करना छोड़ देते हैं तो धीरे-धीरे उसे करने की हमारी क्षमता ही समाप्त हो जाती है।
लेकिन वास्तव में मेरे लिए इस शरीर को अच्छी तरह झकझोरना आवश्यक था ताकि यदि मेरी श्वासनली में कोई द्रव जमा हो गया हो तो वह ढीला पड़ जाए या यदि किसी कारण से मेरी साँस की नलियाँ संकुचित हो गई हों तो यह झटके उन्हें खोल दें। अनुभव से मैंने जान लिया है कि इससे मुझे कुछ लाभ अवश्य होता है। इसी कारण मैं अपेक्षा से अधिक देर तक उसी सवारी में बना रहा। समुद्रतट का वह मार्ग मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था, जो क्यूमे और सर्विलियस वातिया के भवन के बीच से होकर जाता है। उसके एक ओर समुद्र है और दूसरी ओर झील। वह किसी सँकरे मार्ग के समान प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त, हाल ही में आए तूफ़ान के कारण वह मार्ग काफ़ी सख्त और मजबूत हो गया था। जैसा कि तुम जानते हो, जब लहरें लगातार और तीव्र गति से आती हैं तो वे रेत को दबाकर उसे ठोस बना देती हैं जबकि लंबे समय तक शांत मौसम रहने पर, रेत को बाँधे रखने वाली नमी सूख जाती है और वह फिर ढीली पड़ जाती है।
अपनी आदत के अनुसार मैंने चारों ओर दृष्टि दौड़ानी शुरू की, यह देखने के लिए कि वहाँ ऐसी कौन-सी बात है जिससे मुझे कोई लाभदायक शिक्षा मिल सके।
मेरी दृष्टि उस भवन पर जाकर ठहर गई जो कभी वातिया का था। वहीं वह धनी भूतपूर्व प्रेटर अपने बुढ़ापे तक रहा। विश्राम और एकांत के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से वह प्रसिद्ध नहीं था। केवल इसी कारण लोग उसे भाग्यशाली समझते थे। जब भी कोई व्यक्ति ऐसीनियस गेलस (Asinius Gallus) से मित्रता के कारण या सेजानस (Sejanus) की शत्रुता के कारण और बाद में उसके प्रेम या मित्रता के कारण भी क्योंकि सेजानुस का मित्र होना उतना ही खतरनाक हो गया था जितना उसका शत्रु होना, विनष्ट हो जाता था, तब लोग कहा करते थे, “हे वातिया! केवल तुम ही जानते हो कि जीवन कैसे जिया जाता है!” किन्तु वास्तव में वह जीना नहीं बल्कि स्वयं को छिपाकर रखना जानता था। आराम और अवकाश का जीवन जीने तथा भय के कारण संसार से छिप जाने में बहुत बड़ा अंतर होता है। वातिया के जीवनकाल में मैं जब भी उस भवन के पास से गुज़रता था, तो यही कहा करता था, “यहाँ वातिया दफ़न है।”
फिर भी, प्रिय लूसीलियस, दर्शन इतना पवित्र और इतना सम्मान के योग्य है कि जो वस्तु केवल उसका आभास भी देती है, वह भी कुछ संतोष प्रदान करती है, चाहे वह केवल उसका बाहरी दिखावा ही क्यों न हो। जब कोई व्यक्ति एकांत और अवकाश का जीवन बिताता है तो सामान्य लोग प्रायः यह समझ लेते हैं कि वह आत्मचिंतन में लीन है, शांत है, आत्मनिर्भर है और अपने लिए जी रहा है। जबकि वास्तव में ये गुण केवल बुद्धिमान व्यक्ति में ही होते हैं। वास्तव में केवल वही व्यक्ति अपने लिए जीना जानता है क्योंकि वही जीना जानता है। यही सबसे पहली आवश्यकता है। परन्तु जो व्यक्ति संसार और लोगों से भाग जाता है, जिसकी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, इसलिए वह स्वयं निर्वासन में चला गया, जो दूसरों को अपने से अधिक समृद्ध देखकर सहन नहीं कर सका या जो किसी आलसी और भयभीत पशु की तरह डरकर अपने बिल में छिप गया, वह अपने लिए नहीं जी रहा होता। वह तो, और इससे अधिक लज्जाजनक क्या होगा, केवल अपने पेट के लिए, अपनी नींद के लिए और अपनी वासनाओं के लिए जी रहा होता है। केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी और के लिए नहीं जी रहा, यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने लिए जी रहा है। फिर भी, उद्देश्य की दृढ़ता और अपने संकल्प पर अटल बने रहने का गुण इतना महान है कि यदि कोई व्यक्ति अपने चुने हुए एकांत और निष्क्रियता पर भी निरंतर स्थिर बना रहे तो उसका वह निष्क्रिय जीवन भी लोगों के सम्मान का पात्र बन जाता है।
जहाँ तक उस भवन का प्रश्न है, उसके बारे में मैं तुम्हें निश्चित रूप से कुछ नहीं लिख सकता। मैं केवल उतना ही जानता हूँ जितना बाहर से दिखाई देता है। उसका अग्रभाग और वे अन्य हिस्से जो राहगीरों की दृष्टि में आते हैं। उसमें दो कृत्रिम गुफाएँ हैं, जिन्हें अत्यन्त परिश्रम से बनाया गया है। वे किसी भी विशाल प्रांगण जितनी बड़ी हैं। उनमें से एक में सूर्य का प्रकाश बिल्कुल प्रवेश नहीं करता जबकि दूसरी में सूर्यास्त तक प्रकाश बना रहता है। वहाँ चनार (प्लेन) के वृक्षों का एक उपवन भी है जिसके बीच से एक नहर बहती है। वह नहर अकेरोन झील और समुद्र को उसी प्रकार जोड़ती है जैसे यूरिपुस जलडमरूमध्य। यदि नियमित रूप से भी वहाँ से मछलियाँ पकड़ी जाएँ तो भी वह नहर निरंतर मछलियों की आपूर्ति कर सकती है। किन्तु जब तक समुद्र में मछली पकड़ना संभव रहता है, तब तक उसका उपयोग नहीं किया जाता। केवल जब तूफ़ान के कारण समुद्र मछुआरों के लिए अनुपयोगी हो जाता है, तब वह नहर तुरंत उपयोग के लिए उपलब्ध हो जाती है।
किन्तु उस भवन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उसके बिल्कुल निकट बाइए का प्रसिद्ध विश्राम-स्थल स्थित है। इस प्रकार वह बाइए की असुविधाओं से तो मुक्त रहता है पर उसके सुख-सुविधाओं का आनंद भी प्राप्त कर लेता है। मैं भी स्वीकार करता हूँ कि ये उसके वास्तविक गुण हैं। मुझे यह भी लगता है कि वह भवन पूरे वर्ष रहने के लिए उपयुक्त है, क्योंकि वहाँ पश्चिमी हवा अच्छी तरह पहुँचती है। बल्कि वह स्वयं ऐसी स्थिति में है कि बाइए तक उस हवा के पहुँचने में भी कुछ रुकावट उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार, अपने एकांत और विश्राम के जीवन के लिए इस स्थान का चुनाव करने में वातिया कोई मूर्ख नहीं था।
वास्तव में, किसी स्थान का मन की शांति में बहुत अधिक योगदान नहीं होता। सबसे महत्त्वपूर्ण बात वह मन है, जो प्रत्येक परिस्थिति को अपने अनुकूल बना लेना जानता है। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो सुखद, सुंदर और आनंददायक भवनों में रहते हुए भी उदास और व्यथित रहते हैं। ऐसे लोगों को भी देखा है जो पूर्ण एकांत में रहकर भी इतने व्यस्त और सक्रिय दिखाई देते हैं मानो उनके पास अनगिनत कार्य हों। इसलिए केवल इस कारण अपने आपको कम भाग्यशाली मत समझो कि तुम कैंपानिया में नहीं रहते। फिर भी, क्यों न विचारों के माध्यम से यहीं आ जाओ? अपने मन को सदा इसी दिशा में ले आया करो। मित्रों से उनकी अनुपस्थिति में भी बातचीत की जा सकती है। वास्तव में, तुम ऐसा जितनी बार चाहो और जितनी देर चाहो, उतनी देर तक कर सकते हो। यह आनंद, निस्संदेह बहुत बड़ा आनंद है। हम वास्तव में तब अधिक अनुभव करते हैं जब हम एक-दूसरे से दूर होते हैं। क्योंकि निरंतर साथ रहने से हम एक-दूसरे के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि साथ बैठने, साथ चलने और साथ बातचीत करने के बाद, जब अलग होते हैं तो उन्हीं लोगों के बारे में भी सोचना छोड़ देते हैं जिन्हें हम अभी कुछ ही समय पहले देखकर आए होते हैं।
और एक कारण यह भी है कि हमें अपने बिछोह को शांत मन से स्वीकार करना चाहिए। वह यह कि जो लोग हमारे बिल्कुल निकट रहते हैं, उनसे भी हम अधिकांश समय अलग ही रहते हैं। ज़रा सोचो, सबसे पहले तो रात हमें एक-दूसरे से अलग कर देती है। फिर प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहता है। उसके बाद एकांत में अध्ययन करने का समय होता है और आस-पास के स्थानों की यात्राएँ भी होती हैं। यदि इन सबको जोड़कर देखो तो समझ में आएगा कि दूर की दूरी वास्तव में हमसे बहुत थोड़ा ही छीन पाती है। मित्र को अपने मन में सदा सँजोए रखना चाहिए क्योंकि मन कभी अनुपस्थित नहीं होता। वह प्रतिदिन जिस किसी से मिलना चाहे, उससे मिल सकता है। इसलिए मेरे साथ अध्ययन करो! मेरे साथ भोजन करो! मेरे साथ सैर करो! हमारे विचारों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। यदि ऐसा संभव होता तो हमारा जीवन सचमुच किसी मठ या कारागार में बंद जीवन के समान हो जाता। प्रिय लूसीलियस, मैं तुम्हें देखता हूँ। मैं तुम्हें सुनता हूँ— उतनी ही स्पष्टता से, जितनी पहले। मैं अपने आपको तुम्हारे इतना निकट अनुभव करता हूँ कि मुझे तो ऐसा लगता है, मानो तुम्हें पत्रों के स्थान पर प्रतिज्ञा-पत्र (हस्तलिखित दस्तावेज़) भेजने ही वाला हूँ।
अभी के लिए विदा
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