प्रिय लूसीलियस
ऐसी कौन-सी बात है जिसके लिए मुझे राज़ी न किया जा सके? इस बार तो मुझे समुद्र-मार्ग से यात्रा करने के लिए भी मना लिया गया! जब मैं रवाना हुआ, तब समुद्र बिल्कुल शांत था। हाँ, आकाश पर चितकबरे बादल अवश्य छाए हुए थे। वैसे बादल जो प्रायः वर्षा या आँधी में बदल जाते हैं। फिर भी मैंने सोचा कि तुम्हारे नगर पार्थेनोपे से पुटेओली तक की दूरी इतनी कम है कि अनिश्चित और भय उत्पन्न करने वाले मौसम में भी यह यात्रा पूरी की जा सकती है। इसलिए मैंने शीघ्र पहुँचने के उद्देश्य से गहरे समुद्र का मार्ग अपनाया और सीधे नेसिस द्वीप की ओर बढ़ चला ताकि सभी खाड़ियों को छोड़कर निकट का रास्ता ले सकूँ।
जैसे ही मैं उस स्थान पर पहुँचा जहाँ आगे बढ़ने और लौट जाने— दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया था। वैसे ही वह शांत समुद्र जिसने मुझे यात्रा के लिए आकर्षित किया था, वैसा नहीं रहा। अभी पूर्ण तूफ़ान तो नहीं आया था पर समुद्र की लहरें तिरछी होकर उठने लगी थीं और वे लगातार अधिक ऊँची तथा अधिक बार आने लगीं। मैंने नाविक से आग्रह किया कि वह मुझे कहीं किनारे उतार दे। पर उसने कहा कि तट पथरीला है, वहाँ कहीं भी जहाज़ ठहराने का सुरक्षित स्थान नहीं है और तूफ़ान के समय उसे समुद्र से अधिक भय भूमि से लगता है। किन्तु मेरी अवस्था इतनी खराब हो चुकी थी कि मुझे किसी भी खतरे की परवाह नहीं रही। मुझे वह लगातार बनी रहने वाली समुद्री बीमारी हो गई थी जो मितली तो उत्पन्न करती है। पर उल्टी होने पर भी राहत नहीं देती। आखिरकार मैंने नाविक पर ज़ोर डाला और उसे विवश कर दिया कि वह चाहे उसकी इच्छा हो या न हो, नाव को किनारे की ओर मोड़ दे।
जैसे ही हम तट के निकट पहुँचे, मैंने वर्जिल (Virgil) के बताए हुए निर्देशों की प्रतीक्षा नहीं की। न इस बात की कि 'जहाज़ का अग्रभाग समुद्र की ओर मोड़ा जाए' और न ही इस बात की कि 'जहाज़ के अगले भाग से लंगर डाला जाए।' अपनी तैरने की क्षमता को याद करते हुए क्योंकि मैं बहुत पहले से अच्छा तैराक रहा हूँ। मैंने एक शीत-जल स्नान के उत्साही व्यक्ति की भाँति अपना चोगा पहने-पहने ही समुद्र में छलाँग लगा दी। ज़रा कल्पना करो कि टूटती हुई लहरों के बीच रास्ता खोजते हुए, अपना मार्ग बनाते हुए, मैं किस प्रकार लड़खड़ाता हुआ आगे बढ़ा और कितनी कठिनाइयाँ झेलीं। तभी मुझे समझ में आया कि नाविकों को भूमि से भय क्यों लगता है। यह विश्वास करना कठिन है कि मैंने केवल इसलिए इतनी यातना सही क्योंकि मैं अपनी ही अवस्था को और अधिक सहन नहीं कर पा रहा था। मैं तुम्हें बताता हूँ, ओडीसियस (Odysseus) के साथ हर जगह जहाज़-डूबने की घटनाएँ इसलिए नहीं हुईं कि समुद्र उसके प्रति क्रोधित था। बल्कि उसका कारण यह था कि वह स्वयं समुद्री बीमारी का शिकार हो जाता था। यदि मुझे समुद्र-मार्ग से ही यात्रा करनी पड़े तो जहाँ भी जाना होगा वहाँ पहुँचने में मुझे भी बीस वर्ष लग जाएँगे!
जैसे ही मेरा पेट कुछ संभला क्योंकि तुम जानते ही हो कि समुद्री बीमारी से छुटकारा पाना, समुद्र से बाहर निकल आने की अपेक्षा अधिक समय लेता है। जैसे ही मैंने शरीर को तरोताज़ा करने के लिए उस पर तेल लगाया, मैं यह सोचने लगा कि हम अपनी कमियों को कितनी आसानी से भूल जाते हैं। हम अपने शरीर की उन स्पष्ट कमियों तक को भूल जाते हैं, जो हर समय हमें अपनी उपस्थिति का एहसास कराती रहती हैं। फिर जो दोष बाहर से दिखाई ही नहीं देते, उन्हें तो हम और भी अधिक भूल जाते हैं। और आश्चर्य यह है कि जितने बड़े दोष होते हैं, उन्हें पहचानना उतना ही कठिन होता है। हल्का-सा ज्वर मनुष्य को धोखा दे सकता है। पर जब वह बढ़कर वास्तविक बीमारी का रूप ले लेता है, तब सबसे कठोर और सहनशील व्यक्ति भी यह स्वीकार करने के लिए विवश हो जाता है कि वह बीमार है। यदि पैरों में दर्द हो या जोड़ों में हल्की-सी चुभन महसूस हो तो हम उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हम कह देते हैं कि शायद टखना मुड़ गया है या अधिक परिश्रम करने से ऐसा हो गया है। जब तक बीमारी आरम्भिक अवस्था में होती है और उसके विषय में संदेह बना रहता है, तब तक हम उसे कोई-न-कोई सुविधाजनक नाम दे देते हैं। लेकिन जब वही रोग पिंडलियों को जकड़ने लगता है और दोनों पैरों को विकृत कर देता है, तब हमें स्वीकार करना ही पड़ता है कि यह गठिया है। किन्तु मन के रोगों के साथ स्थिति ठीक इसके विपरीत होती है। वहाँ जितना अधिक मनुष्य रोगग्रस्त होता है, उतना ही कम उसे अपने रोग का बोध होता है।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, प्रिय लूसीलियस। जब मनुष्य केवल हल्की नींद में होता है, तब उसे अपने आस-पास की कुछ बातें अनुभव होती रहती हैं। कभी-कभी उसे यह भी पता होता है कि वह सो रहा है। परन्तु गहरी नींद तो स्वप्नों तक को मिटा देती है। वह मन को इतनी गहराई में डुबो देती है कि उसे अपने अस्तित्व तक का बोध नहीं रहता। लोग अपने दोषों को स्वीकार क्यों नहीं करते? इसलिए कि वे अभी भी उन्हीं दोषों के वश में जी रहे होते हैं। स्वप्न का वर्णन वही कर सकता है जो जाग चुका हो; उसी प्रकार अपने दोषों को स्वीकार कर लेना भी इस बात का संकेत है कि मनुष्य मानसिक रूप से स्वस्थ होने लगा है।
आओ, हम जाग उठें ताकि अपनी भूलों को पहचान सकें। किन्तु हमें जगा सकने वाली केवल एक ही शक्ति है—दर्शन। वही हमें इस गहरी निद्रा से जगाकर सचेत कर सकता है। अपने आपको पूरी तरह दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। तुम उसके योग्य हो और वह तुम्हारे योग्य है। एक-दूसरे को दृढ़ता से अपना लो। दूसरे सभी दावों को साहस और स्पष्टता के साथ अस्वीकार कर दो। ऐसा कोई कारण नहीं कि तुम दर्शन का अध्ययन केवल अपने अवकाश के समय में ही करो। यदि तुम बीमार होते तो अपने घर-परिवार के दायित्वों से कुछ समय के लिए अलग हो जाते। अपने व्यवसाय और कार्यों की चिंता छोड़ देते। किसी का मुकदमा भी तुम्हारे लिए इतना महत्त्वपूर्ण न होता कि रोग के फिर से उभर आने की आशंका रहते हुए भी तुम न्यायालय पहुँच जाते। तब तुम्हारा पूरा प्रयास केवल एक ही उद्देश्य में लगा रहता— यथाशीघ्र रोगमुक्त होना। तो फिर अब ऐसा क्यों नहीं करते? जो कुछ भी तुम्हारे मार्ग में बाधा बन रहा है, उसे दूर कर दो। अपने मन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए समय निकालो। जो व्यक्ति सांसारिक कार्यों और निरंतर व्यस्तताओं में उलझा रहता है, वह कभी भी आत्मिक उत्कृष्टता और सच्चे ज्ञान की ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकता।
दर्शन अपनी सत्ता और अधिकार का दावा करता है। वह हमें समय प्रदान करता है। वह केवल उतने समय से संतुष्ट नहीं होता जितना हम उसे देना चाहें। दर्शन कोई अवकाश के समय का शौक नहीं बल्कि पूर्णकालिक साधना है। वह हमारा मार्गदर्शक और स्वामी है, जो हमें अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश देता है। एक बार सिकंदर महान (Alexander the Great) से एक नगर ने यह वचन दिया कि वह उसे अपनी खेती योग्य भूमि का एक भाग और अपनी समस्त उपज का आधा हिस्सा देगा। इस पर उसने उत्तर दिया, “मैं एशिया इसलिए नहीं आया हूँ कि तुम मुझे जो देना चाहो, वही स्वीकार कर लूँ बल्कि मैं इसलिए आया हूँ कि जो कुछ मैं तुम्हारे लिए छोड़ दूँ, वही तुम्हारे पास रह सके।” दर्शन भी प्रत्येक परिस्थिति में यही बात कहता है, “मैं तुम्हारे बचे-खुचे समय को स्वीकार करने नहीं आया हूँ बल्कि जो समय मैं अस्वीकार कर दूँगा, केवल वही तुम्हारे लिए बचेगा।”
अपने संपूर्ण मन को दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। दर्शन के समीप बैठो, उसकी सेवा करो। तब तुम सामान्य मनुष्यों से बहुत ऊपर उठ जाओगे। सभी नश्वर मनुष्य तुमसे बहुत पीछे रह जाएँगे और देवता भी तुमसे बहुत अधिक आगे नहीं होंगे। क्या तुम जानना चाहते हो कि तब तुम्हारे और देवताओं के बीच क्या अंतर रह जाएगा? केवल इतना कि उनका अस्तित्व तुमसे अधिक समय तक रहता है। किन्तु किसी विशाल और पूर्ण वस्तु को एक लघु कृति में समेट देना ही तो महान कलाकार की वास्तविक पहचान है। उसी प्रकार, बुद्धिमान व्यक्ति के लिए उसका सीमित जीवन उतना ही व्यापक और पूर्ण होता है, जितना ईश्वर के लिए समस्त काल। बल्कि एक अर्थ में ज्ञानी मनुष्य ईश्वर से भी श्रेष्ठ होता है। ईश्वर तो अपनी प्रकृति के कारण निर्भय है; परन्तु ज्ञानी मनुष्य उसी निर्भयता को अपने स्वयं के प्रयास और साधना से प्राप्त करता है। निस्संदेह, यह अत्यन्त महान उपलब्धि है कि मनुष्य अपनी मानवीय दुर्बलताओं के साथ रहते हुए भी ईश्वर जैसी शांति और समत्व को बनाए रखे।
यह आश्चर्यजनक है कि भाग्य के सभी आक्रमणों को परास्त कर देने की शक्ति दर्शन में कितनी प्रबल होती है। कोई भी अस्त्र उसके शरीर में धँस नहीं सकता। उसकी रक्षा-व्यवस्था अभेद्य होती है। जब भाग्य के बाण उसकी ओर आते हैं, तब वह या तो झुककर उन्हें अपने ऊपर से निकल जाने देता है अथवा अडिग खड़ा रहता है और उन्हें इस प्रकार लौटा देता है कि वे प्रहार करने वाले की ओर ही पलट जाते हैं।
अभी के लिए विदा
No comments:
Post a Comment