प्रिय लूसीलियस
तुम पूछते हो कि लिबरल आर्ट्स के विषय में मेरा क्या विचार है। मुझे उनमें से किसी के प्रति कोई विशेष सम्मान नहीं है और न ही मैं उस अध्ययन को अच्छा मानता हूँ जिसका उद्देश्य केवल धन कमाना हो। ये तो केवल ऐसी कलाएँ हैं जिन्हें बाज़ार में उपयोग में लाया जा सकता है। उनका महत्त्व केवल इतना है कि वे मन को आगे की शिक्षा के लिए तैयार करती हैं, न कि इसलिए कि उन्हें जीवनभर का व्यवसाय बना लिया जाए। इनका अध्ययन केवल तब तक करना चाहिए, जब तक मन किसी अधिक महत्त्वपूर्ण विषय को ग्रहण करने योग्य न हो जाए। ये हमारी प्रारम्भिक शिक्षा हैं, हमारा वास्तविक कार्य नहीं। यह स्पष्ट है कि इन्हें 'लिबरल' स्टडीज़ क्यों कहा जाता है क्योंकि वे एक स्वतंत्र व्यक्ति के योग्य हैं। किन्तु वास्तव में केवल एक ही अध्ययन ऐसा है जो सच्चे अर्थों में उदार है और वह है वह अध्ययन जो मनुष्य को मुक्त करता है अर्थात् दर्शन का अध्ययन। केवल दर्शन ही उदात्त है, सामर्थ्यवान है और महान आत्मा वाला है। अन्य सभी विद्याएँ तुच्छ और बालसुलभ हैं। या क्या तुम यह सोचते हो कि किसी ऐसी विद्या में वास्तव में कोई मूल्य हो सकता है, जिसके शिक्षक या उसे अपना व्यवसाय बनाने वाले लोग स्वयं अत्यन्त भ्रष्ट और तिरस्करणीय हों? हमारा उद्देश्य इन विद्याओं को सीखते रहना नहीं होना चाहिए बल्कि इन्हें सीखकर आगे बढ़ जाना होना चाहिए।
कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या लिबरल आर्ट्स मनुष्य को अच्छा बनाती हैं। परन्तु स्वयं वे विद्याएँ भी ऐसा दावा नहीं करतीं क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह नहीं है। साहित्य का अध्ययन भाषा की शुद्धता से संबंधित है। यदि उसे आगे बढ़ाया जाए तो वह कथाओं तथा आख्यानों के अध्ययन तक पहुँचता है। अधिक से अधिक वह कविता के अध्ययन तक विस्तृत होता है। किन्तु इनमें से कौन-सा विषय सद्गुण की ओर जाने वाला मार्ग प्रशस्त करता है? अक्षरों और वर्णों की पहचान, शब्दों और वाक्यांशों का सूक्ष्म विश्लेषण, कथाओं का कंठस्थ करना, छंद-रचना के नियम, या छंदों के परिवर्तन, इनमें से कौन-सी बात हमारे भय को शांत करती है, हमारे लोभ को दूर करती है या हमारी इच्छाओं पर संयम स्थापित करती है? अब ज्यामिति और संगीत की ओर चलो। वहाँ भी ऐसी कोई शिक्षा नहीं मिलती जो हमें भय और वासना से मुक्त होने का उपदेश दे। यदि हमें यह नहीं आता कि भय और इच्छा पर कैसे विजय प्राप्त की जाए तो अन्य किसी भी ज्ञान का होना व्यर्थ है।
प्रश्न यह है कि क्या ये लोग सद्गुण की शिक्षा देते हैं। यदि नहीं तो वे अपने विद्यार्थियों को सद्गुण नहीं सिखा रहे हैं। और यदि हाँ तो वे दार्शनिक हैं। क्या तुम जानना चाहते हो कि वे इस उद्देश्य से कितने दूर हैं? बस यह देखो कि उनकी सभी विद्याएँ एक-दूसरे से कितनी भिन्न हैं। यदि वे सभी एक ही सत्य की शिक्षा दे रही होतीं तो उनमें किसी न किसी प्रकार की समानता अवश्य दिखाई देती।
जब तक कि वे तुम्हें यह विश्वास न दिला दें कि होमर एक दार्शनिक था! किन्तु ऐसा करते हुए वे स्वयं अपने तर्कों का खंडन कर बैठते हैं। कभी वे उसे स्टोइक सिद्ध करते हैं, जो केवल सद्गुण को ही श्रेष्ठ मानता है और अमर जीवन प्राप्त करने के लिए भी सम्माननीय आचरण का त्याग नहीं करता, कभी वे उसे एपिक्यूरियन बताते हैं, जो गीत-संगीत और उत्सवों के बीच रहते हुए शांत नागरिक जीवन की प्रशंसा करता है, कभी वे उसे पेरिपैटेटिक कहते हैं, जो तीन प्रकार के शुभों का प्रतिपादन करता है और कभी उसे अकादमिक घोषित करते हैं, जो यह मानता है कि किसी भी विषय में पूर्ण निश्चितता संभव नहीं है। इससे तो केवल यही सिद्ध होता है कि इनमें से कोई भी दर्शन वास्तव में उसका नहीं है क्योंकि यदि वे सभी उसके होते तो वे एक-दूसरे के साथ असंगत न होते। किन्तु मान लो कि होमर वास्तव में एक दार्शनिक था। तब भी वह दार्शनिक तो अपनी कविताएँ सीखने या रचने से पहले ही बन चुका होगा। इसलिए हमें उन बातों का अध्ययन करना चाहिए जिन्होंने होमर को बुद्धिमान बनाया, न कि केवल उसकी कविताओं का।
मेरे लिए यह जाँच करना कि होमर पहले हुए या हेसिओड, उतना ही निरर्थक है जितना यह जानना कि हेकुबा समय से पहले वृद्ध कैसे हो गई, जबकि वास्तव में वह हेलेन से छोटी थी। मैं तुमसे पूछता हूँ, पैट्रोक्लस और अकिलीस की आयु में कौन बड़ा था और कौन छोटा, यह जानने का क्या महत्व है? क्या तुम यह जानना चाहते हो कि यूलिसीस (ओडीसियस) अपनी भटकनों के दौरान कहाँ-कहाँ गया था या यह सीखना चाहते हो कि हमें अपनी निरंतर भटकन से कैसे मुक्त होना चाहिए? हमारे पास यह सुनने का समय नहीं है कि वह इटली और सिसिली के बीच के समुद्र में तूफ़ान का शिकार हुआ था या ज्ञात संसार की सीमाओं से बाहर क्योंकि इतना लंबा समय वह इतने संकरे जलडमरूमध्य में भटक ही नहीं सकता था। सच्चाई यह है कि हम स्वयं अपने जीवन के प्रत्येक दिन मन के तूफ़ानों से घिरे रहते हैं, और हमारे अपने दुर्गुण हमें वही सब कष्ट देते हैं जिनका सामना यूलिसीस ने किया था। वे सब हमारे जीवन में उपस्थित हैं, ऐसा सौंदर्य जो आँखों को मोहित कर ले, शत्रु, मानव-रक्त के प्यासे भयंकर राक्षस, एक ओर सायरनों का मोहक गीत और दूसरी ओर जहाज़-डूबने तथा हर प्रकार के संकट। मुझे यह सिखाओ कि अपने देश से कैसे प्रेम करूँ, अपनी पत्नी से कैसे प्रेम करूँ, अपने पिता से कैसे प्रेम करूँ। मुझे यह सिखाओ कि यदि मार्ग में मेरा जहाज़ भी डूब जाए, तब भी मैं उस सम्मानपूर्ण लक्ष्य तक कैसे पहुँचूँ। तुम यह जानने का प्रयास क्यों करते हो कि पेनेलोपे पवित्र थी या नहीं? क्या उसने अपने आस-पास के सभी लोगों को धोखा दिया था? और क्या उसने यह पहचान लिया था कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति यूलिसीस ही है, उससे पहले कि किसी ने उसे यह बताया? मुझे यह सिखाओ कि पवित्रता क्या है, उसका वास्तविक मूल्य क्या है और वह शरीर में निवास करती है या मन में।
अब मैं संगीत की ओर आता हूँ। तुम मुझे सिखाते हो कि ऊँचे और नीचे स्वरों में किस प्रकार सामंजस्य स्थापित होता है। भिन्न-भिन्न सुरों वाले तार किस प्रकार मधुर संगति उत्पन्न करते हैं। इसके स्थान पर मुझे यह सिखाओ कि मेरे अपने मन में सामंजस्य कैसे स्थापित हो और मेरे संकल्प एक-दूसरे के विरोधी न हों। तुम मुझे बताते हो कि कौन-से राग या संगीत-रूप विषाद व्यक्त करते हैं। इसके बजाय मुझे यह सिखाओ कि विपत्तियों के बीच भी मैं शोक से कैसे बचा रहूँ।
ज्यामिति का ज्ञाता मुझे यह सिखाता है कि किसी खेत का क्षेत्रफल कैसे निकाला जाए, किन्तु वह यह नहीं सिखाता कि मनुष्य के लिए कितनी संपत्ति पर्याप्त है। वह मुझे गणना करना सिखाता है और मेरी उँगलियों को लोभ की सेवा में लगा देता है। परन्तु वह यह नहीं सिखाता कि ऐसी गणनाएँ वास्तव में निरर्थक हैं और यह कि अपनी आय-व्यय का हिसाब रखने वालों को थका देने से कोई अधिक सुखी नहीं हो जाता। बल्कि सच्चाई तो यह है कि जो व्यक्ति अपनी संपत्ति का हिसाब स्वयं करने को ही दुर्भाग्य समझता है, उसके पास आवश्यकता से अधिक और अनावश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यदि मैं अपने भाई के साथ खेत का उचित बँटवारा करना ही नहीं जानता तो किसी भूमि का सही-सही विभाजन करना सीखने से मुझे क्या लाभ? यदि पड़ोसी मेरी भूमि की सीमा से थोड़ा-सा भाग काट ले जाने पर मैं व्याकुल हो उठता हूँ तो एक बगीचे के टुकड़े का क्षेत्रफल एक फुट के दसवें भाग तक की शुद्धता से निकालना मेरे किस काम का? वह मुझे सिखाता है कि अपनी भूमि की सीमा पर स्थित उस छोटे-से हिस्से को खोने से कैसे बचूँ। किन्तु मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि अपनी सारी संपत्ति खोकर भी प्रसन्नचित्त कैसे रहा जाए। “मुझसे वह भूमि छीनी जा रही है जो मेरे पिता और दादा की थी!” तो इससे क्या हुआ? तुम्हारे दादा से पहले उसका स्वामी कौन था? क्या तुम यह भी बता सकते हो कि वह किस जाति या राष्ट्र की थी, किसी व्यक्ति की तो बात ही छोड़ो? तुम उस भूमि पर स्वामी बनकर नहीं बल्कि एक अत्याचारी शासक की तरह अधिकार जमाकर बैठे हो।
तुम किसके किरायेदार हो? यदि तुम्हारा सौभाग्य है तो उसी व्यक्ति के किरायेदार हो जो तुम्हारे बाद उसका उत्तराधिकारी बनेगा। विधिवेत्ता कहते हैं कि सार्वजनिक भूमि पर कोई भी व्यक्ति स्थायी स्वामित्व स्थापित नहीं कर सकता। जिस भूमि पर तुम रहते हो और जिसे अपनी कहते हो, वह वास्तव में सार्वजनिक है बल्कि उससे भी बढ़कर, वह समस्त मानव-जाति की है। क्या अद्भुत कौशल है! तुम वक्र आकृतियों का माप जानते हो। तुम्हें जो भी आकृति दी जाए, उसे वर्ग में परिवर्तित कर सकते हो। तुम तारों के बीच की दूरी बता सकते हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे तुम माप न सको। यदि तुम इतने ही कुशल मापक हो तो मनुष्य के मन को मापो। बताओ कि वह कितना महान है और कितना तुच्छ भी हो सकता है। तुम जानते हो कि कौन-सी रेखा समकोण बनाती है। किन्तु यदि तुम्हें यह नहीं मालूम कि जीवन में क्या सही है, तो उस ज्ञान का तुम्हारे लिए क्या उपयोग है?
अब मैं उस विद्या की ओर आता हूँ जो स्वयं को आकाश और नक्षत्रों के ज्ञान पर गर्व करती है—
जहाँ शीतल ज्योति वाला शनि अपना मार्ग बनाता है,
और चंचल बुध का अग्निमय तारा किन-किन कक्षाओं में विचरण करता है।
इन बातों को जानकर मुझे क्या लाभ होगा? क्या केवल इसलिए कि जब शनि और मंगल आमने-सामने हों या जब बुध संध्या समय शनि की दृष्टि में अस्त हो, तब मैं चिंता करता रहूँ? इसके बजाय मुझे यह सीखना चाहिए कि ग्रह जहाँ कहीं भी हों, वे मेरे लिए अनुकूल ही हैं और उन्हें बदला नहीं जा सकता। उनकी गतियाँ भाग्य के निरंतर और अटल विधान द्वारा निर्धारित हैं। वे निश्चित मार्गों पर चलते हैं और या तो संसार की सभी घटनाओं का निर्धारण करते हैं अथवा उनका संकेत देते हैं। किन्तु यदि वे सब कुछ घटित कराते हैं तो ऐसी बातों को जानने से क्या लाभ जिन्हें बदला ही नहीं जा सकता? और यदि वे केवल भविष्य की घटनाओं का संकेत देते हैं तो उन बातों को पहले से जान लेने का क्या लाभ जिनसे बचा ही नहीं जा सकता? वे घटनाएँ तो तुम्हें पता हों या न हों, घटित होकर ही रहेंगी।
यदि तुम सूर्य की तीव्र गति पर और उसके पीछे क्रम से चलने वाले तारों पर दृष्टि रखो,
तो आने वाला कल तुम्हें कभी अचानक नहीं चौंकाएगा,
और निर्मल रात्रि भी तुम्हें किसी छिपे हुए आक्रमण से भयभीत नहीं करेगी।
किन्तु जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैंने ऐसे किसी भी आकस्मिक आघात से बचने के लिए पहले ही पर्याप्त तैयारी कर रखी है।
“क्या सचमुच यह सत्य है कि आने वाला कल मुझे कभी आश्चर्यचकित नहीं करेगा? जो घटना किसी व्यक्ति के ज्ञान के बिना घटती है, क्या वह उसे आश्चर्यचकित नहीं करती?” मैं यह नहीं जानता कि कल क्या होगा। किन्तु मैं यह अवश्य जानता हूँ कि क्या-क्या हो सकता है। ऐसी किसी भी संभावना को मैं अपनी अपेक्षा से बाहर नहीं रखता। मैं हर संभावित घटना की अपेक्षा करता हूँ और यदि उनमें से किसी से मेरा बचाव हो जाए, तो मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ। आने वाला कल मुझे तभी चकित करता है जब वह मुझे किसी विपत्ति से बचा लेता है। परन्तु तब भी वह मुझे वास्तव में आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि जिस प्रकार मैं जानता हूँ कि ऐसी कोई भी घटना नहीं है जो मेरे साथ घटित न हो सके, उसी प्रकार मैं यह भी जानता हूँ कि उनमें से कोई भी घटना निश्चित रूप से घटित होगी, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए मैं सर्वोत्तम की आशा करता हूँ, किन्तु सबसे बुरे के लिए भी स्वयं को तैयार रखता हूँ।
यदि मैं नियमित क्रम का पालन न करूँ तो इसे सहन करना। मैं चित्रकारों को उदार कलाओं के साधकों में नहीं गिन सकता। उसी प्रकार मूर्तिकारों, संगमरमर तराशने वालों और विलासिता की सेवा करने वाले अन्य सभी कारीगरों को भी नहीं। इसी प्रकार मैं पहलवानों तथा उन सभी विद्याओं को भी अस्वीकार करता हूँ जिनका संबंध केवल तेल और धूल-मिट्टी से है। अन्यथा मुझे मालिश करने वालों, रसोइयों और उन सभी लोगों को भी उदार कलाओं में गिनना पड़ेगा जो अपनी कला को केवल हमारे भोग-विलास की पूर्ति में लगाते हैं। ज़रा बताओ तो सही, उन भूखे-से दिखने वाले लोगों की कला को कैसे उदार कला कहा जा सकता है, जो शरीर को तो भोजन की नाँद के सामने पालते-पोसते हैं। जबकि उनका मन पोषण के अभाव में दुर्बल होता जाता है? क्या हमें आज के युवकों की इस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए कि यही उदार शिक्षा है? हमारे पूर्वज अपने युवकों को सीधा और दृढ़ खड़ा होना सिखाते थे, भाला फेंकना, बरछी चलाना, घुड़सवारी करना तथा तलवार और ढाल का उपयोग करना सिखाते थे। वे अपने बच्चों को ऐसी कोई शिक्षा नहीं देते थे जिसे लेटकर सीखा जाए। किन्तु न तो ये प्राचीन कलाएँ और न ही आज की नई कलाएँ सद्गुण की शिक्षा देती हैं या उसका विकास करती हैं। क्योंकि घोड़े को नियंत्रित करना, लगाम से उसकी चाल को रोकना और दिशा देना सीख लेने से क्या लाभ, यदि स्वयं सवार ही अपनी अनियंत्रित और बेलगाम वासनाओं के वश में हो? कुश्ती या मुक्केबाज़ी में अनेक प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर लेने से क्या लाभ, यदि विजेता स्वयं अपने क्रोध का पराजित बंदी बना हुआ हो?
“तो क्या उदार विद्याओं का हमें कोई लाभ ही नहीं है?” है, पर केवल कुछ सीमित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए। सद्गुण की प्राप्ति के लिए नहीं। क्योंकि वे कलाएँ भी, जो अपने निम्न स्तर को खुले रूप में स्वीकार करती हैं और जिनका आधार हाथ का कौशल है, जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। फिर भी उनका सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। “तो फिर हम अपने बच्चों को उदार विद्याओं की शिक्षा क्यों देते हैं?” इसलिए नहीं कि वे उन्हें सद्गुण सिखा सकती हैं बल्कि इसलिए कि वे उनके मन को सद्गुण ग्रहण करने योग्य बनाती हैं। जैसे प्रारंभिक शिक्षा, जिसे पहले ‘अक्षर-ज्ञान’ कहा जाता था, बच्चों को शिक्षा की मूल बातें सिखाती है। पर स्वयं उदार विद्याओं की शिक्षा नहीं देती। वह केवल उनके लिए आधार तैयार करती है। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी मन को सीधे सद्गुण तक नहीं पहुँचातीं बल्कि उस यात्रा के लिए उसे तैयार करती हैं।
पॉसिडोनियस के अनुसार कलाएँ चार प्रकार की होती हैं— साधारण और निम्न कलाएँ, मनोरंजन की कलाएँ, बाल्यावस्था की कलाएँ और उदार कलाएँ। साधारण कलाएँ वे हैं जिनका अभ्यास कारीगर करते हैं। उनका आधार हाथ का कौशल है और उनका उद्देश्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। इनमें न तो कोई विशेष आकर्षण है और न ही सम्माननीयता का कोई आभास। मनोरंजन की कलाएँ वे हैं जिनका संबंध आँखों और कानों के सुख से है। इनमें उन अभियंताओं की कला भी आती है जो रंगमंच पर ऐसे यंत्र बनाते हैं जिनसे मंच बिना किसी सहारे के ऊपर उठता हुआ दिखाई देता है या मंच के भाग बिना किसी आवाज़ के आकाश की ओर उठ जाते हैं। इसी प्रकार वे अनेक विचित्र युक्तियाँ बनाते हैं, जहाँ समतल भूमि थी वहाँ अचानक दरारें खुल जाती हैं, फिर अपने-आप बंद हो जाती हैं या ऊँचे उठे हुए मंच धीरे-धीरे नीचे आ जाते हैं। जो लोग इन युक्तियों से परिचित नहीं होते, उनकी आँखों को ये सब अत्यंत अद्भुत लगते हैं। वे प्रत्येक अप्रत्याशित दृश्य पर आश्चर्य करते हैं क्योंकि वे उसके कारण को नहीं जानते। बाल्यावस्था की कलाएँ उदार विद्याओं से कुछ समानता रखती हैं। यूनानी इन्हें ‘एन्साइक्लिकल’ (encyclical) कहते हैं। हमारी भाषा में इन्हें ‘उदार विद्याएँ’ कहा जाता है। किन्तु वास्तव में केवल वही विद्याएँ उदार हैं और सच कहूँ तो केवल वही वास्तव में स्वतंत्र मनुष्य के योग्य हैं जिनका संबंध सद्गुण से है।
कोई इस प्रकार आपत्ति कर सकता है। “दर्शन के कई विभाग हैं। एक प्राकृतिक जगत का अध्ययन है, दूसरा नीतिशास्त्र और तीसरा तर्कशास्त्र। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी दर्शन के भीतर अपना स्थान चाहती हैं। जब हम प्रकृति से संबंधित प्रश्नों की जाँच करते हैं, तब हम ज्यामिति के प्रमाणों का सहारा लेते हैं। इसलिए, यदि ज्यामिति दर्शन की सहायता करती है तो वह दर्शन का एक भाग भी होनी चाहिए।” किन्तु अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो हमारी सहायता तो करती हैं पर हमारा अंग नहीं होतीं। बल्कि यदि वे स्वयं हमारा अंग होतीं तो वे हमारी सहायता करने वाली वस्तुएँ न कहलातीं। भोजन शरीर की सहायता करता है, फिर भी वह शरीर का अंग नहीं है। उसी प्रकार ज्यामिति दर्शन के लिए उपयोगी है जैसे, ज्यामिति के लिए उपकरण बनाने वाला कारीगर आवश्यक होता है। परंतु जैसे वह कारीगर स्वयं ज्यामिति का भाग नहीं है, वैसे ही ज्यामिति भी दर्शन का भाग नहीं है। इसके अतिरिक्त, दोनों का अपना-अपना निश्चित विषय है। दार्शनिक प्राकृतिक घटनाओं की जाँच करता है और उनका ज्ञान प्राप्त करता है। जबकि ज्यामितिज्ञ आकृतियों और मापों का अध्ययन करता है तथा उनके आधार पर गणनाएँ करता है। आकाशीय पिंडों की गति का कारण, उनका प्रभाव और उनका स्वभाव—ये सब दार्शनिक के अध्ययन के विषय हैं। किन्तु उनकी कक्षाएँ, उपवृत्त (एपिसाइकिल), और वे प्रत्यक्ष गतियाँ जिनमें वे कभी ऊपर उठते, कभी नीचे आते या कभी स्थिर प्रतीत होते हैं। जबकि वास्तव में कोई भी आकाशीय पिंड स्थिर नहीं रहता, ये सब गणितीय खगोलशास्त्री के विषय हैं। दार्शनिक यह जानता है कि दर्पण में प्रतिबिंब क्यों दिखाई देता है। जबकि ज्यामितिज्ञ तुम्हें बता सकता है कि वस्तु अपने प्रतिबिंब से कितनी दूरी पर होनी चाहिए और किस प्रकार का दर्पण किस प्रकार का प्रतिबिंब उत्पन्न करता है। दार्शनिक यह सिद्ध करेगा कि सूर्य विशाल है। जबकि खगोलशास्त्री अनुभव और निरीक्षण के आधार पर यह ज्ञात करेगा कि वह वास्तव में कितना बड़ा है। परंतु इस प्रकार निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए उसे कुछ मूल सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। कोई भी विद्या अपने बल पर पूर्ण नहीं हो सकती यदि उसके मूल सिद्धांत किसी दूसरी विद्या से प्राप्त होते हों। दर्शन किसी अन्य विद्या से कुछ नहीं माँगता। वह अपनी पूरी इमारत की नींव स्वयं रखता है। गणितीय खगोलशास्त्र मानो उस इमारत की ऊपरी मंज़िल है, जो किसी दूसरी नींव पर खड़ी की गई है। वह अपने मूल सिद्धांत कहीं और से ग्रहण करता है और उन्हीं के सहारे आगे बढ़ता है। यदि वह अपने बल पर सत्य तक पहुँच सकता, यदि वह स्वयं सम्पूर्ण विश्व-प्रकृति को समझ पाने में समर्थ होता, तो मैं स्वीकार कर लेता कि उसके पास हमें देने के लिए बहुत कुछ है। क्योंकि आकाशीय घटनाओं का अध्ययन करते हुए हमारा मन भी अधिक व्यापक और अधिक ऊँचा बनता है।
मनुष्य का मन अपनी पूर्ण ऊँचाई केवल एक ही मार्ग से प्राप्त करता है जब उसे इस बात का अटल ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में क्या शुभ है और क्या अशुभ। और इस विषय में किसी अन्य विद्या के पास सिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। अब आओ, हम एक-एक करके सद्गुणों का विचार करें। साहस वह सद्गुण है जो भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु का तिरस्कार करता है। जो कुछ भी हमें भयभीत करता है और हमारी स्वतंत्रता को दासता के जुए के नीचे झुका देता है, उसका साहस तिरस्कार करता है, उसका सामना करता है और उस पर विजय प्राप्त करता है। क्या उदार विद्याएँ इस साहस को दृढ़ बनाने में कोई सहायता करती हैं? निष्ठा मनुष्य के हृदय का सबसे पवित्र गुण है। कोई भी कष्ट उसे छल करने के लिए विवश नहीं कर सकता और कोई भी पुरस्कार उसे विश्वासघात के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। निष्ठा कहती है, “मुझे जला दो, मेरे अंग काट दो, मुझे मार डालो, फिर भी मैं अपने विश्वास के साथ विश्वासघात नहीं करूँगी। जितना अधिक पीड़ा मुझसे मेरे रहस्य उगलवाने का प्रयास करेगी, उतना ही अधिक मैं उन्हें अपने भीतर छिपाकर रखूँगी।” क्या उदार विद्याएँ ऐसा चरित्र गढ़ सकती हैं? आत्मसंयम हमारी इच्छाओं और भोगों पर शासन करता है। कुछ इच्छाओं का वह तिरस्कार करके उन्हें पूरी तरह त्याग देता है और कुछ को सीमित कर स्वस्थ मर्यादा के भीतर रखता है। वह कभी भी सुखों को केवल उनके अपने लिए नहीं चाहता क्योंकि वह जानता है कि इच्छाओं की सबसे उत्तम सीमा यही है कि जितनी आवश्यकता हो उतना ही ग्रहण किया जाए, न कि जितनी इच्छा हो उतना। सद्भाव या दयालुता मनुष्य को अपने साथियों के प्रति घमंडी या दोष-दृष्टि रखने वाला बनने से रोकती है। वह वाणी, व्यवहार और भावना, तीनों में सबके प्रति कोमल और सहज रहती है। वह दूसरों के प्रत्येक दुःख को अपना दुःख समझती है और प्रत्येक शुभ अवसर का स्वागत मुख्यतः इसलिए करती है कि उसका लाभ दूसरों के साथ बाँट सके। क्या उदार विद्याएँ ऐसा आचरण सिखाती हैं? नहीं। वे हमें ईमानदारी, आत्मसंयम, मर्यादा, सादगी और मितव्ययिता भी नहीं सिखातीं। उसी प्रकार वे हमें क्षमा और करुणा भी नहीं सिखातीं। वह करुणा जो दूसरे के रक्त के प्रति उतनी ही सावधान रहती है जितनी अपने रक्त के प्रति क्योंकि वह जानती है कि किसी भी मनुष्य को कभी भी दूसरे मनुष्य के जीवन का मूल्य नहीं भूलना चाहिए।
“तुम लोग कहते हो कि उदार विद्याओं के बिना सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती। फिर तुम यह कैसे कहते हो कि उनका सद्गुण में कोई योगदान नहीं है?” इसका उत्तर यह है, जिस प्रकार भोजन के बिना भी सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती, फिर भी भोजन का सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। उसी प्रकार लकड़ी जहाज़ के निर्माण में कोई योगदान नहीं देती, यद्यपि जहाज़ लकड़ी के बिना बनाया नहीं जा सकता। मेरा आशय यह है कि केवल इसलिए यह नहीं मान लेना चाहिए कि एक वस्तु दूसरी में योगदान देती है क्योंकि दूसरी वस्तु उसके बिना अस्तित्व में नहीं आ सकती। इसके अतिरिक्त, यह भी कहा जा सकता है कि वास्तव में उदार विद्याओं के बिना भी बुद्धिमत्ता प्राप्त की जा सकती है। क्योंकि यद्यपि सद्गुण को सीखना आवश्यक है, पर उसे इन विद्याओं के माध्यम से नहीं सीखा जाता। मेरे पास यह मानने का क्या कारण है कि जो व्यक्ति अक्षर-ज्ञान से वंचित है, वह बुद्धिमान नहीं बन सकता? बुद्धिमत्ता अक्षरों में नहीं रहती। अक्षर केवल तथ्य सिखाते हैं, शब्द नहीं और संभव है कि जब स्मृति को अपने अतिरिक्त किसी दूसरे सहारे पर निर्भर न रहना पड़े, तब वह और भी अधिक दृढ़ हो जाती है।
बुद्धिमत्ता विशाल और व्यापक होती है। उसे पर्याप्त स्थान चाहिए। मनुष्य को मानव-संबंधी और दैवी विषयों का अध्ययन करना चाहिए। भूतकाल और भविष्य का, नश्वर और शाश्वत का भी। समय के विषय में भी उसे विचार करना चाहिए और देखो, केवल इसी एक विषय पर कितने प्रश्न उठते हैं! पहला, क्या समय स्वयं में कोई स्वतंत्र सत्ता है? दूसरा, क्या समय से पहले भी कुछ था, क्या कोई ऐसी सत्ता है जो समय से परे है? क्या समय का आरंभ संसार के साथ ही हुआ या चूँकि संसार से पहले भी कुछ अस्तित्व में था, इसलिए समय भी तब से विद्यमान था? केवल आत्मा के विषय में ही असंख्य प्रश्न पूछे जा सकते हैं। वह कहाँ से आती है? उसका स्वरूप क्या है? उसका अस्तित्व कब प्रारंभ होता है। वह कितने समय तक रहती है? क्या वह एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती रहती है, एक जीवित प्राणी से दूसरे में अपना निवास बदलती रहती है? या क्या वह केवल एक बार ही इस देह-बंधन को सहती है और मुक्त होकर समस्त ब्रह्मांड में विचरण करती है? क्या वह साकार है या निराकार? जब वह हमारे माध्यम से कार्य करना बंद कर देती है, तब वह क्या करती है? इस कारागार से मुक्त होने के बाद वह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग किस प्रकार करती है? या क्या वह अपने पूर्व जीवन को भूल जाती है और शरीर से अलग होकर उच्च लोकों में पहुँचते ही पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप को जानती है? मानव और दैवी विषयों में से तुम किसी भी एक को चुन लो, तुम्हें इतने अधिक प्रश्न मिलेंगे कि उनके अध्ययन और विचार में पूरा जीवन लग सकता है। जब हमारे मन को व्यस्त रखने के लिए इतने महान विषय उपस्थित हैं, तब हमें उनके लिए स्थान बनाना चाहिए और उन सब बातों को निकाल देना चाहिए जो अनावश्यक हैं। सद्गुण इतने संकुचित स्थान में निवास नहीं करता। इतना महान अतिथि विस्तृत स्थान चाहता है। इसलिए सब अनावश्यक बातों को हृदय से बाहर कर दो और अपने पूरे हृदय को सद्गुण के लिए खुला रहने दो।
“फिर भी अनेक प्रकार की विद्याओं का ज्ञान होना आनंददायक है।” यदि ऐसा है तो हमें उनमें से केवल उतना ही रखना चाहिए जितनी वास्तव में आवश्यकता हो। या क्या तुम्हें यह उचित लगता है कि जो व्यक्ति अपने घर के लिए अनुपयोगी सामान खरीदता है और महँगी वस्तुओं का प्रदर्शन करता है, उसकी तो आलोचना की जाए, पर जो व्यक्ति अनावश्यक साहित्यिक ज्ञान का विशाल भंडार इकट्ठा करने में लगा रहता है, उसकी नहीं? आवश्यकता से अधिक जानने की इच्छा भी असंयम का ही एक रूप है। वास्तव में उदार विद्याओं का ऐसा अध्ययन मनुष्यों को अप्रिय, वाचाल, आडंबरपूर्ण और आत्मसंतुष्ट बना देता है। क्योंकि वे उन बातों को सीखते रहते हैं जिन्हें जानने की उन्हें आवश्यकता नहीं होती, और परिणामस्वरूप वे उन बातों को सीख ही नहीं पाते जिन्हें वास्तव में जानना चाहिए। साहित्य के विद्वान डिडिमस ने चार हज़ार ग्रंथ लिखे थे। यदि उसने केवल उतनी ही निरर्थक पुस्तकों का अध्ययन किया होता तो भी मुझे उस पर दया आती। कुछ ग्रंथों में वह यह खोजता है कि होमर का जन्मस्थान कहाँ था। कुछ में यह कि ऐनियस की वास्तविक माता कौन थी। कुछ में यह कि अनाक्रेयोन अधिक कामुक था या अधिक मद्यपान का अभ्यासी। कुछ में यह कि क्या सैफो वास्तव में वेश्या थी और ऐसे ही अनेक अन्य विषयों पर भी उसने लिखा। यदि तुम्हें ऐसे प्रश्नों के उत्तर मालूम भी हों तो तुम्हें उन्हें भूलने का प्रयत्न करना चाहिए। फिर भी तुम कहते हो कि जीवन बहुत छोटा है! किन्तु हमारे अपने देशवासियों में भी ऐसी अनेक अतिशयताएँ हैं जिन्हें कुल्हाड़ी से काटकर हटाने की आवश्यकता है। कितना समय नष्ट करके और दूसरों के कानों को कितना कष्ट पहुँचाकर हम केवल यह प्रशंसा सुनने के लिए प्रयत्न करते हैं—“क्या विद्वान व्यक्ति है!” इससे कहीं अच्छा है कि हम एक कम आडंबरपूर्ण उपाधि से ही संतुष्ट रहें—“क्या अच्छा मनुष्य है!”
तो क्या मुझे सभी राष्ट्रों के इतिहास खँगालने चाहिए ताकि यह पता लगा सकूँ कि कविता सबसे पहले किसने लिखी? क्या मुझे यह गणना करनी चाहिए कि ऑर्फ़ियस और होमर के बीच कितने वर्ष बीते। जबकि इस संबंध में कोई लिखित प्रमाण ही उपलब्ध नहीं हैं? क्या मुझे उन संपादकीय चिह्नों का अध्ययन करना चाहिए जिनसे अरिस्टार्कस ने दूसरे कवियों की रचनाओं पर अपनी टिप्पणियाँ अंकित की थीं और अपना जीवन मात्र अक्षरों और मात्राओं के विश्लेषण में बिता देना चाहिए? क्या मुझे ज्यामिति की धूल में ही उलझे रहना चाहिए? क्या मैं वह हितकारी उपदेश भूल गया हूँ, “अपने समय का सदुपयोग करो”? यदि मैं इन सब बातों को सीखने में लगा रहूँ तो फिर किन बातों को छोड़ दूँ? गायस सीज़र के शासनकाल में एपियोन नामक एक साहित्य-विद्वान यूनान की यात्रा पर गया। वहाँ के नगरों ने उसे होमर के नाम पर अपना नागरिक बना लिया। वह कहा करता था कि होमर ने ओडिसी और इलियड की रचना पूरी करने के बाद अपनी कृति के आरंभ में एक प्रस्तावना भी जोड़ दी थी, जिसमें पूरे ट्रॉय-युद्ध का सार समाहित था। इसके प्रमाण के रूप में वह यह तर्क देता था कि इलियड की पहली पंक्ति के पहले दो अक्षर जान-बूझकर इस उद्देश्य से रखे गए थे कि वे उस कृति के खंडों (पुस्तकों) की संख्या का संकेत दें। यही वे बातें हैं जिन्हें तथाकथित बहुश्रुत विद्वान के लिए जानना आवश्यक माना जाता है! ज़रा सोचो, तुम्हारे जीवन का कितना समय रोगों में बीत जाता है। कितना सार्वजनिक और निजी कार्यों में। कितना दैनिक आवश्यकताओं में और कितना नींद में। अपने जीवन का ठीक-ठीक हिसाब लगाओ। उसमें इतनी सारी निरर्थक बातों के लिए स्थान ही नहीं है।
मैं अब तक उदार विद्याओं की चर्चा कर रहा था। किन्तु दार्शनिकों के पास भी समय नष्ट करने के अपने तरीके हैं और उनके भी अपने निरर्थक विषय हैं। वे भी अक्षरों की मात्राएँ गिनने, तथा अव्ययों और संबंधबोधक शब्दों के सही अर्थ निर्धारित करने में लग जाते हैं। साहित्य-विदों और ज्यामितिज्ञों से ईर्ष्या करके उन्होंने उनकी सारी अनावश्यक सूक्ष्मताओं को अपना लिया है। परिणाम यह हुआ कि वे सही ढंग से बोलने की कला तो अधिक जानते हैं। पर सही ढंग से जीना नहीं। मैं तुम्हें बताता हूँ कि ऐसी अतिसूक्ष्म तर्कबाज़ी कितनी हानिकारक हो सकती है और वह सत्य से कितनी दूर ले जाती है। प्रोटागोरस का दावा था कि वह किसी भी प्रश्न के दोनों पक्षों का समान शक्ति से समर्थन कर सकता है, यहाँ तक कि इस प्रश्न का भी कि क्या वास्तव में हर प्रश्न के दोनों पक्षों का समर्थन किया जा सकता है। नाउसिफ़ानेस का कहना था कि जो वस्तुएँ हमें वास्तविक प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में अवास्तविक वस्तुओं से अधिक वास्तविक नहीं हैं। पार्मेनिदेस का मत था कि जो कुछ हमें अनेक और भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, वह वास्तव में उस एकमात्र सत्ता से अलग नहीं है। एलेआ के ज़ेनो ने तो पूरा विवाद ही समाप्त कर दिया। उसका कहना था कि वास्तव में कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। पाइर्रोनवादी, मेगारावादी, एरेट्रियावादी और अकादमिक, ये सब भी कमोबेश इसी दिशा में चले गए। उन्होंने एक ऐसी नई प्रकार की विद्या प्रस्तुत की, जो यह दावा करती है कि वह कुछ भी नहीं जानती। इन सबको भी लिबरल आर्ट्स की उसी निरर्थक भीड़ में डाल दो। पहली श्रेणी के लोग मुझे कोई उपयोगी ज्ञान नहीं देते। दूसरी श्रेणी तो मुझसे ज्ञान प्राप्त करने की आशा भी छीन लेती है। निरर्थक बातें सीख लेना, कुछ भी न सीखने से फिर भी बेहतर है। एक वर्ग मेरे सामने सत्य का मार्ग दिखाने के लिए कोई दीपक नहीं जलाता। दूसरा तो मेरी आँखें ही निकाल देता है।
यदि मैं प्रोटागोरस पर विश्वास करूँ तो संसार में कोई भी बात निश्चित नहीं रह जाती। सब कुछ विवादास्पद हो जाता है। यदि मैं नाउसिफ़ानेस पर विश्वास करूँ, तो केवल एक बात निश्चित है कि कुछ भी निश्चित नहीं है। यदि मैं पार्मेनिदेस पर विश्वास करूँ तो उस एकमात्र सत्ता के अतिरिक्त कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। और यदि मैं ज़ेनो पर विश्वास करूँ तो वह एकमात्र सत्ता भी नहीं है। तो फिर हम क्या हैं? और ये सब वस्तुएँ क्या हैं जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं, हमारा पालन-पोषण करती हैं और हमें जीवित रखती हैं? क्या यह समूचा संसार केवल एक छाया है या तो पूर्णतः शून्य या फिर छल से भरी हुई? मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि मुझे किस पर अधिक क्रोध आता है, उन पर, जिन्होंने चाहा कि हम कुछ भी न जानें या उन पर, जिन्होंने हमसे इतना भी छीन लिया कि हम यह भी न जान सकें कि हम कुछ नहीं जानते।
अभी के लिए विराम
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