Thursday, 9 July 2026

कोलाहल के बीच मन की स्थिरता के संदर्भ में -- पत्र - 56

 प्रिय लूसीलियस 


मैं इसकी शपथ लेकर कहता हूँ, विद्वत्तापूर्ण एकांतवास के लिए उतनी निस्तब्धता आवश्यक नहीं है जितनी तुम शायद समझते हो। मेरे चारों ओर हर समय कोलाहल गूँजता रहता है क्योंकि मैं स्नानागार के ठीक ऊपर रहता हूँ।

    अपने मन में हर प्रकार के उस भयानक शोर की कल्पना करो जो कानों को चुभता है। जब बलवान पुरुष अपने व्यायाम करते हैं, हाथों में भारी वज़न झुलाते हैं और पूरी शक्ति लगाते हुए (या उसका दिखावा करते हुए) जोर लगाते हैं, तब हर बार साँस छोड़ते समय उनकी घुरघुराहट, हाँफने और भारी साँसों की आवाज़ मेरे कानों में पड़ती है। जब कोई आलसी व्यक्ति आ जाता है, जो साधारण-सी मालिश से ही संतुष्ट है, तब मैं उसके कंधों पर पड़ती हथेलियों की थपथपाहट सुनता हूँ और यह भी सुनता हूँ कि जब मालिश करने वाला हथेली को कप-जैसा बनाकर प्रहार करता है तो आवाज़ अलग होती है और जब सीधी हथेली से मारता है तो अलग। फिर यदि कोई गेंद खेलने वाला आ जाए और यह गिनना शुरू कर दे कि उसने कितनी गेंदें पकड़ीं तो समझो मेरा तो काम ही तमाम हो जाता है!


बाटिक चित्रकला 

    अब इसमें उस झगड़ालू आदमी को भी जोड़ लो। उस व्यक्ति को भी, जो चोरी करते हुए पकड़ा गया है। उस आदमी को भी, जिसे स्नानागार में अपनी ही गायकी सुनना अच्छा लगता है। उन लोगों को भी, जो बड़े धमाके के साथ पानी के कुंड में छलाँग लगा देते हैं। इन सबके अतिरिक्त, जो कम-से-कम अपनी स्वाभाविक आवाज़ में बोलते हैं, उस चिमटी से बाल उखाड़ने वाले व्यक्ति की भी कल्पना करो, जो केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनी तीखी, पतली आवाज़ में बार-बार चीखता रहता है। वह तब तक चुप नहीं होता, जब तक किसी की बगल के बाल उखाड़ते हुए उसे दर्द से चीखने पर मजबूर न कर दे। और फिर इसमें शराब बेचने वाले, सॉसेज बेचने वाले, रोटी बेचने वाले तथा तरह-तरह के पके हुए भोजन बेचने वाले फेरीवालों की पुकारें भी जोड़ लो, जो अपनी-अपनी विशिष्ट लय और स्वर में अपनी वस्तुओं का प्रचार करते रहते हैं।

    तुम कहोगे, “तुम्हारा मन तो अवश्य ही इस्पात का बना होगा या फिर तुम बहरे होगे, जो इतने तरह-तरह के और बेसुरे शोर-गुल के बीच भी अपना ध्यान बनाए रख पाते हो! हमारे अपने क्रिस्पस तो केवल निरंतर आने-जाने वाले आगंतुकों की भीड़ से ही लगभग मृत्यु के कगार पर पहुँच गए थे!” पर सच कहूँ तो मेरे लिए यह शोर-शराबा समुद्र की लहरों या गिरते हुए जल की ध्वनि से अधिक महत्त्व नहीं रखता। मैंने तो यहाँ तक सुना है कि एक जाति ने केवल इसलिए अपना पूरा नगर ही कहीं और बसाया क्योंकि वे नील नदी के एक जलप्रपात के निरंतर गर्जन को सहन नहीं कर पाते थे।

    मेरे विचार से, किसी भी प्रकार के कोलाहल की अपेक्षा मनुष्य की आवाज़ अधिक विचलित करने वाली होती है; क्योंकि आवाज़ हमारे मन को अपनी ओर खींच लेती है जबकि अन्य शोर केवल कानों में गूँजते भर हैं। मेरे चारों ओर जो ध्वनियाँ उठती रहती हैं पर मुझे विचलित नहीं करतीं, उनमें सड़क से गुजरती गाड़ियाँ, भवन में कहीं काम करता बढ़ई, पास ही आरी की धार तेज़ करने वाला कारीगर और वह व्यक्ति भी शामिल है जो मेटा सुदांस के पास बाँसुरी और तुरही का प्रदर्शन करता है। हालाँकि वह उन्हें बजाता कम है, गरजता अधिक है। फिर भी, आज भी मुझे वे आवाज़ें, जो बीच-बीच में रुक-रुककर सुनाई देती हैं, लगातार गूँजते रहने वाले एकरस शोर की अपेक्षा अधिक परेशान करती हैं। लेकिन मैंने अपने आपको इन सब ध्वनियों का इस सीमा तक अभ्यस्त बना लिया है कि अब मैं उस नाव के संचालक की अत्यन्त तीखी पुकार भी सह सकता हूँ जिससे वह चप्पू चलाने वालों को ताल देता है। देखो, मैं अपने मन को विवश करता हूँ कि वह अपना ध्यान स्वयं पर ही केंद्रित रखे और किसी भी बाहरी वस्तु से विचलित न हो। बाहर चाहे जितना भी शोर क्यों न हो, उससे कोई अंतर नहीं पड़ता, यदि भीतर कोई अशांति न हो, यदि इच्छा और भय के बीच संघर्ष न चल रहा हो, यदि लोभ और भोग-विलास परस्पर एक-दूसरे के विरोध में खड़े न हों और एक-दूसरे को दोष न दे रहे हों।

आख़िर पड़ोस में पूर्ण निस्तब्धता होने से क्या लाभ, यदि मनुष्य के अपने ही मन में भावनाओं का तूफ़ान मचा हुआ हो?

    “रात्रि की विश्रामदायिनी शांति में सब कुछ शांत हो गया था।”

    यह असत्य है। वास्तविक शांति केवल वही है, जो विवेक द्वारा स्थापित की जाती है। रात्रि हमारी चिंताओं को दूर नहीं करती बल्कि उन्हें और स्पष्ट कर देती है, केवल एक चिंता के स्थान पर दूसरी चिंता ला खड़ी करती है। क्योंकि जब हम सो रहे होते हैं, तब भी हमारे स्वप्न जागृत जीवन जितने ही अशांत हो सकते हैं। सच्ची शांति हमें तभी प्राप्त होती है, जब हमारा मन उत्कृष्टता और सद्गुण की अवस्था तक विकसित हो जाता है।

    उस व्यक्ति को देखो, जो एक ऐसे घर की पूर्ण निस्तब्धता में, जहाँ सब लोग सो चुके हैं, नींद की आकांक्षा करता है। उसके कानों तक एक भी आवाज़ नहीं पहुँचती। उसके दासों का पूरा समूह मौन है। वे उसके कक्ष के सामने से भी पंजों के बल दबे पाँव निकलते हैं। फिर भी वह बार-बार करवटें बदलता रहता है, अपने दुःखों के बीच अधसोया-सा पड़ा रहता है। उन आवाज़ों की शिकायत करता है जिन्हें उसने वास्तव में सुना ही नहीं। तुम्हें क्या लगता है, इसका कारण क्या है? उसका मन ही शोर से भरा हुआ है। उसी को शांत करना चाहिए। उसी के विद्रोह को दबाना चाहिए। केवल इसलिए यह मत समझो कि शरीर स्थिर पड़ा है तो मन भी शांत है। कभी-कभी बाहरी शांति भी अपने भीतर अशांति को समेटे रहती है। इसलिए, जब हम निष्क्रियता के बोझ से दब जाएँ तो हमें स्वयं को किसी कार्य में लगा देना चाहिए या साहित्य, विद्या और कला जैसे सांस्कृतिक उपक्रमों में व्यस्त हो जाना चाहिए। क्योंकि निष्क्रियता स्वयं अपने को भी सहन नहीं कर पाती। महान सेनापति, जब देखते हैं कि उनकी सेना बेचैन होने लगी है तो वे उसे कोई-न-कोई काम सौंप देते हैं और उसके समय को लगातार मार्च तथा अभ्यासों में लगा देते हैं। जब लोग कार्य में व्यस्त रहते हैं, तब उन्हें अनुशासनहीन होने का अवसर नहीं मिलता। इससे अधिक निश्चित बात कोई नहीं कि निष्क्रियता के दोष केवल सक्रियता से ही दूर किए जा सकते हैं।

    अनेक बार राजकीय कार्यों से उत्पन्न हुई थकान और ऐसे श्रम के प्रति पुनर्विचार जिसमें न तो कोई प्रतिफल मिलता है और न ही कृतज्ञता, हमें एकांत में चले जाने के लिए प्रेरित करते हैं। कम-से-कम हमें ऐसा ही प्रतीत होता है। परंतु उस आश्रय में, जहाँ थकावट और भय हमें ले आए हैं, वहीं भीतर-ही-भीतर महत्त्वाकांक्षा फिर से पनपने लगती है। उसका उन्मूलन नहीं हुआ होता। उसने हमें सताना भी बंद नहीं किया होता। वह केवल थक गई थी या यूँ कहो कि इस बात से क्षुब्ध थी कि परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं रहीं। भोग-विलास के विषय में भी मैं यही कहता हूँ। कभी-कभी ऐसा लगता है कि उसका प्रभाव समाप्त हो गया है। लेकिन जैसे ही हम सादगीपूर्ण जीवन जीने का संकल्प लेते हैं, वह फिर हमें सताने लगती है। हमारे मितव्ययी जीवन के बीच भी वह उन सुखों के पीछे दौड़ती है जिन्हें हमने वास्तव में त्यागा नहीं था बल्कि केवल उनसे दूर हो गए थे। जितना अधिक उन्हें छिपाकर रखा जाता है, उतनी ही अधिक तीव्रता से वह उनका पीछा करती है। वास्तव में, हमारे सभी दोष खुले रूप में अपेक्षाकृत कम हानिकारक होते हैं। रोग भी तभी स्वस्थ होने की दिशा में बढ़ते हैं, जब वे छिपे रहने के बजाय प्रकट हो जाते हैं और अपनी पूरी शक्ति दिखा देते हैं। इसी प्रकार जब लोभ, महत्त्वाकांक्षा और मनुष्य के मन के अन्य विकार ऊपर से शांत और स्वस्थ दिखाई देने लगें, तभी समझ लेना चाहिए कि वे अपनी सबसे अधिक घातक अवस्था में हैं।

    हम अपने आपको अवकाश में समझते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं होता। क्योंकि यदि सचमुच हमने अवकाश ग्रहण किया है, यदि वास्तव में हमने पीछे हटने का निर्णय कर लिया है, यदि हमने उन वस्तुओं से मुँह मोड़ लिया है जो केवल चमकती हैं, पर वास्तविक मूल्य नहीं रखतीं, तो फिर, जैसा कि मैं कह रहा था, कोई भी वस्तु हमें विचलित नहीं कर सकती। न मनुष्यों की बातचीत, न पक्षियों का कलरव, कुछ भी हमारे विचारों में बाधा नहीं डाल सकता। ऐसे विचारों में, जो अब उत्कृष्ट, दृढ़ और स्थिर हो चुके हैं। जो मन हल्का, चंचल और अभी तक आत्मनिरीक्षण का अभ्यस्त नहीं हुआ है, वही किसी आवाज़ या आकस्मिक घटना से विचलित हो उठता है। उसके भीतर कोई न कोई चिंता, कोई भय का अंश छिपा रहता है, जो उसे अस्थिर बनाए रखता है। हमारे कवि वर्जिल कहते हैं, 

“मैं, जो अब तक उड़ते हुए बाणों को बिना विचलित हुए सहता आया था,
और यूनानियों की धमकी देती हुई सुसज्जित सेनाओं के सामने भी अडिग रहा था,
अब हवा की सरसराहट से भी डरने लगा हूँ, अब हर आहट पर चौंक उठता हूँ,
अपने साथी और अपने बोझ—दोनों के लिए समान रूप से काँपता हुआ।”

    पहली अवस्था उस बुद्धिमान व्यक्ति की है, जो उड़ते हुए बाणों, सघन पंक्तियों में खड़ी सशस्त्र सेना या घेराबंदी के अधीन किसी नगर के कोलाहल से भी भयभीत नहीं होता। दूसरी अवस्था उस अनुभवहीन व्यक्ति की है, जो अपने ही काम-धंधों की चिंता में हर आहट पर काँप उठता है। उसे हर आवाज़ किसी आसन्न संकट की गर्जना प्रतीत होती है और ज़रा-सी हलचल भी उसे आतंकित कर देती है। उसका अपना बोझ ही उसके भय का कारण बन जाता है। उन समृद्ध लोगों में से किसी एक को चुन लो, जिनके पास ढोने के लिए बहुत-सा सामान है और जिनके पीछे बड़ी संख्या में अनुचर चलते हैं, तुम उसे भी “अपने साथी और अपने बोझ—दोनों के लिए समान रूप से काँपते हुए” देखोगे।

    इसलिए तुम निश्चिंत होकर समझ सकते हो कि तुम्हारा मन तभी वास्तव में स्थिर है, जब कोई भी शोर तुम्हारे भीतर तक नहीं पहुँचता। जब कोई भी आवाज़, चाहे वह मधुर प्रलोभन के रूप में हो, चाहे धमकी के रूप में या केवल निरर्थक कोलाहल के रूप में, तुम्हें स्वयं से विचलित नहीं कर पाती।

    “तो क्या तुम यह कहना चाहते हो कि कभी-कभी शोर-शराबे से दूर रहना अधिक आसान नहीं होता?”

    हाँ, मैं इसे स्वीकार करता हूँ। और इसी कारण मैं इस स्थान को छोड़ने वाला हूँ। मैं तो केवल अपनी परीक्षा लेना चाहता था, स्वयं को अभ्यास में डालना चाहता था। लेकिन जब उद्देश्य पूरा हो चुका है तो फिर मैं अनावश्यक रूप से अपने आपको क्यों कष्ट दूँ? आखिर जब यूलिसीस ने अपने साथियों के लिए इतना सरल उपाय खोज लिया था तो मैं क्यों न अपनाऊँ? वह उपाय तो सायरनों के मोहक गीतों के विरुद्ध भी सफल सिद्ध हुआ था!


अभी के लिए विराम 

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