Friday, 31 July 2026

मनुष्य जीवन और शिकायतों के बारे में -- पत्र - 94

 प्रिय लूसीलियस 


तुम अभी भी किसी बात से व्यथित हो; तुम अभी भी शिकायत किए जा रहे हो। क्या तुम्हें यह समझ नहीं आता कि इन सबमें वास्तव में बुराई केवल तुम्हारा व्यथित होना और शिकायत करना ही है? यदि तुम मेरी राय पूछो तो मैं कहूँगा कि किसी मनुष्य के लिए कोई भी वस्तु तब तक भयानक नहीं होती, जब तक वह स्वयं प्रकृति की व्यवस्था में किसी बात को भयानक न मान ले। जिस दिन मैं किसी परिस्थिति को सहन करने में असमर्थ हो जाऊँगा, उसी दिन मैं स्वयं को भी सहन करने योग्य नहीं रहूँगा। 'मैं बीमार हूँ, यह तो मेरे जीवन की स्वाभाविक संभावना थी। 'मेरे दास बीमार पड़ गए हैं। मेरी आय घट गई है। मेरा घर जर्जर होकर चरमराने लगा है। मुझे हानि, शारीरिक पीड़ा, कठिन परिश्रम और चिंताओं ने घेर लिया है' , ऐसा होता है बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि ऐसा होना ही था। ये घटनाएँ पूर्वनियत हैं। ये कोई आकस्मिक या अप्रत्याशित घटनाएँ नहीं हैं। 



    इस पर विश्वास करो, मैं इस समय अपने हृदय की सबसे गहरी भावना तुम्हारे सामने प्रकट कर रहा हूँ। जो कुछ भी प्रतिकूल और कठिन प्रतीत होता है, उसके संबंध में मैंने अपने मन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया है। मैं ईश्वर की केवल आज्ञा का पालन नहीं करता बल्कि उसकी इच्छा से सहमत होता हूँ। मैं उसका अनुसरण अपनी स्वेच्छा से करता हूँ। इसलिए नहीं कि मैं ऐसा करने के लिए विवश हूँ। मेरे साथ जो कुछ भी घटित होगा, मैं उसे बिना शोक किए और बिना उदासी का मुख बनाए स्वीकार करूँगा। जीवन जो भी कर (देय मूल्य) मुझसे माँगेगा, मैं उसे प्रसन्नतापूर्वक चुका दूँगा। जिन बातों के कारण हम कराहते हैं और भयभीत हो जाते हैं, वे वास्तव में जीवन के कर (देय मूल्य) मात्र हैं। इसलिए, प्रिय लूसीलियस, न तो उनसे छूट की आशा करो और न ही उसकी कामना करो।

    तुम मूत्राशय के दर्द से पीड़ित थे, तुम्हें चिंताजनक पत्र मिले और तुम्हारी हानियाँ लगातार बढ़ती रहीं। संक्षेप में कहूँ तो तुम्हें अपने प्राणों का भय सताने लगा। लेकिन क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं था कि जब तुम दीर्घायु होने की प्रार्थना कर रहे थे, तब वास्तव में तुम इन्हीं सब बातों की भी प्रार्थना कर रहे थे? लंबा जीवन इन सबको अपने भीतर समेटे रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे एक लंबी यात्रा में धूल, कीचड़ और वर्षा, सब कुछ आता है। “मैं तो जीना चाहता था, पर इन सब कष्टों के बिना।” इस प्रकार की कोमल और दुर्बल वाणी एक पुरुष को शोभा नहीं देती। तुम इसे जैसे चाहो वैसे समझो। पर मैं तुम्हारे लिए जो प्रार्थना करता हूँ, वह केवल सद्भावना से ही नहीं बल्कि पूरी गंभीरता से करता हूँ, “ईश्वर और देवियाँ तुम्हें कभी भी विलासिता की गोद में न बैठाए रखें।” अपने आप से पूछो, यदि कोई देवता तुम्हें यह विकल्प दे कि तुम अपना जीवन बाज़ार की सुख-सुविधाओं के बीच बिताना चाहते हो या सैनिक शिविर में तो तुम किसे चुनोगे? 

    प्रिय लूसीलियस, जीवन एक युद्ध-अभियान है। इसी कारण जो लोग कठिनाइयों को सहते हैं, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चढ़ते-उतरते हैं और सबसे जोखिम भरे अभियानों में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, वही सच्चे वीर होते हैं और वही शिविर के नेता बनने योग्य होते हैं। इसके विपरीत, जो लोग आराम और सुविधा में पड़े-पड़े धीरे-धीरे निष्क्रिय होते रहते हैं, जबकि सारा कठिन कार्य दूसरे लोग करते हैं, वे पिंजरे में पाले जाने वाले फाख्तों के समान हैं। वे केवल इसलिए सुरक्षित दिखाई देते हैं क्योंकि कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता।


अभी के लिए विदा 


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