Wednesday, 22 July 2026

भय दूर करने के बारे में -- पत्र - 80

 प्रिय लूसीलियस 


मैंने अब तुम्हारी चिंता करना छोड़ दिया है। तुम पूछते हो, “मेरे पक्ष में किस देवता ने आवाज़ उठाई?” वह एकमात्र देवता जिसने कभी छल नहीं किया। वह है... वह मन जो सत्य, न्याय और सद्गुण से प्रेम करता है। तुम्हारा श्रेष्ठतम अंश सुरक्षित है। भाग्य तुम्हें हानि पहुँचा सकता है पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अब मुझे यह भय नहीं रहा कि तुम स्वयं अपने लिए हानिकारक सिद्ध होगे। जिस मार्ग पर तुम चल पड़े हो, उसी पर बने रहो। अपने शांत स्वभाव को स्थायी प्रवृत्ति बना लो— शांत, परंतु कोमल या दुर्बल नहीं। कोमल जीवन की अपेक्षा कठोर जीवन कहीं बेहतर है! अर्थात यदि 'कठोर जीवन' से लोगों का सामान्य आशय लिया जाए, ऐसा जीवन जो परिश्रम, संघर्ष और कठिनाइयों से भरा हो। हम अक्सर लोगों को किसी के जीवन की प्रशंसा करते सुनते हैं क्योंकि वे उससे ईर्ष्या करते हैं। वे कहते हैं, “उसका जीवन बहुत आरामदायक है,” जबकि उनका वास्तविक आशय यह होता है, “वह व्यक्ति स्वयं ही दुर्बल है।” धीरे-धीरे मन भी विलासी और दुर्बल बन जाता है। जब वह आलस्य और आराम में पड़ा रहता है तो उसकी शक्ति शिथिल पड़ जाती है और वह उसी जीवन के समान बन जाता है जिसे वह जी रहा होता है। तुम स्वयं सोचो। यदि कोई सचमुच पुरुषार्थी है तो क्या उसके लिए दृढ़ रहना बेहतर नहीं है, चाहे वह दृढ़ता मृत्यु की कठोरता जैसी ही क्यों न हो? इसके अतिरिक्त, जो लोग अत्यधिक विलासी और दुर्बल हो जाते हैं, वे अंततः अपने जीवन को उसी वस्तु के समान बना लेते हैं जिससे वे सबसे अधिक भय खाते हैं। वास्तविक अवकाश उस अर्थी से सर्वथा भिन्न है जिस पर मृत शरीर ले जाया जाता है।



    तुम पूछते हो, “तुम क्या कहना चाहते हो? क्या उस प्रकार विश्राम करना भी व्यवसायों और भाग-दौड़ के बवंडर में फँसे रहने से बेहतर नहीं है?” निस्संदेह, अत्यधिक परिश्रम कष्टदायक है पर जड़ता भी उतनी ही घातक है। मेरी दृष्टि में सुगंधित तेलों से अभिषिक्त शव भी उतना ही मृत है जितना वह शव जिसे लोहे के काँटे से घसीटकर ले जाया जाता है। अध्ययन के बिना अवकाश मृत्यु के समान है। वह मानो जीवित ही दफना दिए जाने जैसा है। 

    सब कुछ छोड़कर भाग जाने से क्या लाभ? मानो हमारी चिंताएँ समुद्र पार करके हमारा पीछा न करें! ऐसा कौन-सा आश्रय है जहाँ मृत्यु का भय प्रवेश न कर सके? कौन-सा शांत स्थान, चाहे वह पर्वतों के सबसे दुर्गम किले में ही क्यों न हो, पीड़ा के विचार से भयावह नहीं बन जाता? तुम जहाँ कहीं भी छिपो, मानव जीवन के दुःखों का कोलाहल तुम्हें चारों ओर से घेरे रहेगा।

    हमारे चारों ओर बाहरी चिंताएँ फैली हुई हैं, जो हमें छलने और दबाने के लिए तत्पर रहती हैं। उनसे भी कहीं अधिक चिंताएँ हमारे भीतर से ही उभर पड़ती हैं, यहाँ तक कि एकांत के बीच भी। इसलिए हमें अपने चारों ओर दर्शन का ऐसा दुर्ग खड़ा कर लेना चाहिए, जिस पर कभी आक्रमण न किया जा सके और जिसे भाग्य के किसी भी घेराबंदी-यंत्र से भेदा न जा सके। जो मन बाहरी वस्तुओं का त्याग कर देता है और अपने ही आंतरिक दुर्ग में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करता है, वह ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जिसे कोई जीत नहीं सकता। तब गुलेल के पत्थर और तीर उसके चरणों में आकर निष्फल गिर पड़ते हैं। लोग कहते हैं कि भाग्य का हाथ बहुत लंबा होता है, पर वास्तव में भाग्य का हाथ लंबा नहीं होता। वह केवल उन्हीं को पकड़ पाता है जो स्वयं उससे चिपके रहते हैं।

    अतः जितना संभव हो सके, हमें भाग्य से दूरी बनाए रखनी चाहिए। परंतु ऐसा करने का एकमात्र उपाय है, अपने और प्रकृति के सही ज्ञान के द्वारा। हमें यह जानना चाहिए कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं और कहाँ से आए हैं। हमारे लिए क्या शुभ है और क्या अशुभ, किसका अनुसरण करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, विवेक क्या है, जो वरणीय और त्याज्य वस्तुओं में भेद करता है, हमारी इच्छाओं के उन्माद को शांत करता है और हमारे भय की उग्रता को नियंत्रित करता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि उन्होंने दर्शन के बिना ही इन शक्तियों पर विजय पा ली है। पर जब किसी विपत्ति के द्वारा उनके धैर्य की परीक्षा होती है, तब अंततः वे स्वयं स्वीकार करने को विवश हो जाते हैं। जब यातना देने वाला कहता है, “अपना हाथ आगे बढ़ाओ!”, और मृत्यु सामने आ खड़ी होती है, तब उनके साहसपूर्ण शब्द उनके होंठों पर ही मर जाते हैं। तब उनसे कहा जा सकता है, “जब तक तुम्हें स्वयं कष्ट का सामना नहीं करना पड़ा था, तब तक उसका उपहास करना तुम्हारे लिए बहुत आसान था। लो, अब यह पीड़ा सामने है जिसे तुम सहने योग्य बताया करते थे। यह मृत्यु भी सामने है, जिसके विरुद्ध तुमने इतने लंबे और प्रभावशाली भाषण दिए थे। अब कोड़े बरस रहे हैं। अब तलवार चमक रही है।

अब, हे एनीयस, अपने साहस का परिचय देने का समय है,
अब अपने दृढ़ हृदय को दिखाने का समय है।”

    तुम्हें वह दृढ़ हृदय निरंतर अभ्यास से प्राप्त होगा। अपने भाषणों का नहीं बल्कि अपने मन का अभ्यास करके और स्वयं को मृत्यु के लिए तैयार करके। जो व्यक्ति केवल तर्कों की चालाकियों के सहारे तुम्हें यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न करता है कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है, उसने न तो तुम्हें प्रोत्साहित किया है और न ही तुम्हारे साहस को जागृत किया है। प्रिय लूसीलियस, यूनानियों की इस कुतर्कप्रिय प्रवृत्ति पर हम हँस ही सकते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि मैं अब तक उनसे पूरी तरह छुटकारा नहीं पा सका हूँ। हमारे मत के प्रवर्तक ज़ेनो यह तर्क प्रस्तुत करते हैं—

कोई भी बुरी वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती।
परंतु मृत्यु गौरवपूर्ण हो सकती है।
अतः मृत्यु बुरी नहीं है।

अब इससे तो मुझे बड़ा लाभ हुआ! अब तुमने मेरे मन से मृत्यु का भय दूर कर दिया है। अब मैं बिना किसी संकोच के अपनी गर्दन तलवार के आगे बढ़ा दूँगा! क्या तुम गंभीरता से बात नहीं कर सकते? क्या जब मैं मृत्यु का सामना करने जा रहा हूँ, तभी तुम मुझे हँसाना चाहते हो?

    वास्तव में, मेरे लिए यह कहना कठिन है कि अधिक कुतर्की कौन था। वह जिसने यह विश्वास किया कि इस तर्क से मृत्यु का भय समाप्त हो जाएगा या वह जिसने इस तर्क का खंडन करने का प्रयास किया, मानो उसमें सचमुच कोई सार हो। उसने हमारे इस सिद्धांत का उल्लेख करते हुए, जिसके अनुसार मृत्यु उदासीन वस्तुओं (जिसे यूनानी भाषा में अडियाफोरा कहते हैं) में से एक है, उसके विरोध में यह तर्क प्रस्तुत किया—

कोई भी उदासीन वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती।
परंतु मृत्यु गौरवपूर्ण हो सकती है।
अतः मृत्यु उदासीन वस्तु नहीं है।

    तुम स्वयं देख सकते हो कि यह तर्क किस प्रकार भ्रम उत्पन्न करता है। गौरवपूर्ण मृत्यु नहीं होती बल्कि साहसपूर्वक मरना गौरवपूर्ण होता है। जब तुम कहते हो, “कोई भी उदासीन वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती,” तो मैं इस कथन को इस शर्त पर स्वीकार करता हूँ कि कोई भी वस्तु तब तक गौरवपूर्ण नहीं होती जब तक उसमें किसी उदासीन वस्तु का संबंध न हो। उदाहरण के लिए, मैं बीमारी, पीड़ा, निर्धनता, निर्वासन और मृत्यु को उदासीन वस्तुएँ कहता हूँ अर्थात वे अपने आप में न तो अच्छी हैं और न बुरी। इनमें से कोई भी अपने आप में गौरवपूर्ण नहीं है, फिर भी इनके बिना कोई भी गौरवपूर्ण कार्य संभव नहीं है। क्योंकि हम निर्धनता की प्रशंसा नहीं करते बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जो निर्धनता के सामने न तो अपमानित होता है और न ही टूटता है। हम निर्वासन की नहीं बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जिसने निर्वासन को उससे भी अधिक साहस के साथ स्वीकार किया, जितने साहस से वह किसी दूसरे को निर्वासित होने के लिए विदा करता। हम पीड़ा की नहीं बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जिस पर पीड़ा अपना वश नहीं चला सकी। कोई मृत्यु की प्रशंसा नहीं करता। हम उस आत्मा की प्रशंसा करते हैं जिसे मृत्यु अपने साथ तो ले जा सकती है पर पराजित नहीं कर सकती। ये सभी वस्तुएँ अपने आप में न तो सम्माननीय हैं और न ही गौरवपूर्ण। परंतु जब सद्गुण उनका सामना करता है और उन्हें अपने अधीन कर लेता है, तब वही उन्हें सम्माननीय और गौरवपूर्ण बना देता है। अपने स्वभाव से वे मध्यवर्ती अर्थात् उदासीन हैं। अंतर केवल इतना है कि उन पर अधिकार दुर्गुण का होता है या सद्गुण का। वही मृत्यु जो कैटो के मामले में गौरवपूर्ण थी। डेसिमस ब्रूटस के मामले में तुरंत ही नीच और लज्जाजनक बन गई। उसने अपने जल्लादों से कुछ क्षण रुकने की प्रार्थना की और शौच के लिए चला गया। फिर जब उन्होंने उसे वापस बुलाकर गर्दन आगे बढ़ाने का आदेश दिया तो उसने कहा, “यदि तुम मुझे जीवित रहने दोगे, तो मैं ऐसा करूँगा।” कैसी मूर्खता है—जहाँ बच निकलने का कोई उपाय ही नहीं, वहाँ भी भागने का प्रयत्न करना! “मैं ऐसा करूँगा, यदि तुम मुझे जीवित रहने दोगे।” उसे तो यह भी जोड़ देना चाहिए था, “चाहे एंटनी के अधीन ही क्यों न जीना पड़े!” वास्तव में ऐसा व्यक्ति जीवित बचाए जाने के योग्य ही था।

    पर जैसा कि मैं कह रहा था, यह स्पष्ट है कि मृत्यु अपने आप में न तो अच्छी है और न ही बुरी। कैटो ने उसका जो उपयोग किया, वह अत्यंत सम्माननीय था। ब्रूटस ने उसका जो उपयोग किया, वह अत्यंत लज्जाजनक था। जब सद्गुण किसी वस्तु के साथ जुड़ जाता है तो वह उसे ऐसा गौरव प्रदान कर देता है जो उसका अपना नहीं होता। हम कहते हैं कि कोई कमरा अच्छी तरह प्रकाशित है जबकि वही कमरा रात के समय अंधकारमय रहता है। दिन उसमें प्रकाश भर देता है और रात उससे प्रकाश छीन लेती है। इसी प्रकार जिन वस्तुओं को हमारा दर्शन 'उदासीन' या 'मध्यवर्ती' कहता है जैसे, धन, बल, सौंदर्य, सम्मान और सत्ता। दूसरी ओर मृत्यु, निर्वासन, अस्वस्थता, पीड़ा और वे सभी बातें जिनसे हम कम या अधिक भय करते हैं। उनका अच्छा या बुरा नाम सद्गुण या दुर्गुण ही निर्धारित करता है। लोहे का एक टुकड़ा अपने आप में न तो गरम होता है और न ठंडा। उसे भट्ठी में डाल दो तो वह लाल होकर तपने लगता है। पानी में डुबो दो तो ठंडा हो जाता है। उसी प्रकार मृत्यु भी तभी सम्माननीय बनती है, जब उसमें वास्तव में सम्माननीय वस्तु अर्थात सद्गुण और वह मन जो बाहरी परिस्थितियों की परवाह नहीं करता, समाहित हो।

    परंतु, लूसीलियस, जिन वस्तुओं को हम 'मध्यवर्ती' या 'उदासीन' कहते हैं, उनमें भी एक महत्वपूर्ण भेद है। मृत्यु उसी प्रकार उदासीन नहीं है, जैसे यह बात उदासीन है कि तुम्हारे सिर पर बालों की संख्या सम है या विषम। मृत्यु उन वस्तुओं में से है जो बुरी तो नहीं हैं परंतु उनमें बुराई का आभास अवश्य होता है। हमारे भीतर स्वभावतः अपने प्रति प्रेम होता है। जीवित रहने और अपने अस्तित्व को बनाए रखने की सहज इच्छा होती है। विघटन या नष्ट हो जाने के प्रति स्वाभाविक भय भी होता है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उससे हम अनेक अच्छे साधनों से वंचित हो जाएँगे और उन परिचित परिस्थितियों से अलग हो जाएँगे जिनके हम अभ्यस्त हैं। मृत्यु हमें इसलिए भी पराई और भयावह लगती है कि इस संसार को तो हम जानते हैं पर जिस संसार की ओर हम जा रहे हैं, वह कैसा है, यह नहीं जानते। अज्ञात के प्रति स्वाभाविक भय होता है। इसके अतिरिक्त, अंधकार का भी हमारे भीतर जन्मजात भय होता है और लोग यह मानते हैं कि मृत्यु हमें अंधकार में ले जाएगी। इसलिए, यद्यपि मृत्यु उदासीन है, फिर भी वह ऐसी वस्तु नहीं है जिसकी उपेक्षा सहजता से की जा सके। मन को निरंतर अभ्यास द्वारा इतना दृढ़ बनाना चाहिए कि वह मृत्यु के दर्शन और उसके निकट आने को सहन कर सके। 

    हमें मृत्यु की उतनी चिंता नहीं करनी चाहिए जितनी हम करते हैं। हमने उसके विषय में अनेक भयानक और झूठी कथाओं पर विश्वास कर लिया है। बहुत-से लोगों ने एक-दूसरे से बढ़कर उसके बारे में और भी डरावनी कल्पनाएँ गढ़ी हैं। वे पृथ्वी के नीचे स्थित किसी कारागार और अनंत अंधकार से भरे प्रदेशों का वर्णन करते हैं, जहाँ—

नरक का विशाल प्रहरी
हड्डियों के बिछौने पर पड़ा रहता है और गुर्राता हुआ
रक्तरंजित गुफा में उन्हें कुतरता रहता है
और अपने भय से रक्तहीन समस्त प्रेतात्माओं को आतंकित कर देता है।

    यदि तुम लोगों को यह भी समझा दो कि ये सब केवल मनगढ़ंत कथाएँ हैं और मरने वालों के लिए अब भयभीत होने जैसा कुछ भी शेष नहीं रहता, तब भी एक दूसरा भय सामने आ खड़ा होता है। हेडीज़(मृतकों का लोक) का जितना भय उन्हें होता है, उतना ही भय उन्हें इस बात का भी होता है कि मृत्यु के बाद वे कहीं भी नहीं रह जाएँगे, उनका कोई अस्तित्व ही शेष नहीं रहेगा।

    फिर साहसपूर्वक मृत्यु का सामना करना गौरवपूर्ण क्यों न माना जाए जबकि उसमें मनुष्य उन भय और चिंताओं से संघर्ष करता है जो लंबे समय से उसके मन में जड़ जमाए हुए हैं? यह मानव-मन की सबसे महान उपलब्धियों में से एक क्यों न हो? यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि मृत्यु एक बुराई है तो वह कभी सद्गुण की ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच सकता पर यदि वह उसे उदासीन समझता है, तभी वह वहाँ पहुँच सकता है। प्रकृति किसी भी व्यक्ति को उस वस्तु की ओर साहसपूर्वक बढ़ने की अनुमति नहीं देती जिसे वह बुरा समझता हो। वह उसकी ओर केवल धीमे-धीमे और अनिच्छा से ही बढ़ेगा। पर जो कार्य कोई व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध, कायरतापूर्वक करता है, वह गौरवपूर्ण नहीं हो सकता। सद्गुणपूर्ण कर्म कभी भी दबाव या विवशता में नहीं किया जाता। इसके अतिरिक्त, कोई भी कर्म तब तक सम्माननीय नहीं हो सकता जब तक मन पूर्णतः उसी उद्देश्य के प्रति समर्पित न हो और उसके किसी भी भाग में कोई अनिच्छा न हो। जब कोई व्यक्ति किसी ऐसी वस्तु को अपनाता है जिसे वह बुरा समझता है या तो इसलिए कि वह उससे भी बड़ी किसी बुराई से बचना चाहता है अथवा इसलिए कि उसके सामने कुछ ऐसे लाभ हैं जिनके लिए वह उस एक बुराई को सहने योग्य मानता है, तब उसके निर्णय परस्पर विरोधी हो जाते हैं। एक ओर उसका निर्णय उसे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर वही निर्णय उसे पीछे खींचता है और उस वस्तु से बचने के लिए कहता है जिसे वह हानिकारक समझता है। इस प्रकार वह विपरीत दिशाओं में खिंचने लगता है और ऐसी स्थिति में उसके कर्म का गौरव नष्ट हो जाता है। सद्गुण अपने निर्णयों पर मन की पूर्ण एकता और सामंजस्य के साथ कार्य करता है। वह अपने किए जाने वाले कर्म से भयभीत नहीं होता।

    और जहाँ तक तुम्हारा संबंध है, “विपत्तियों के सामने कभी समर्पण मत करो। अपने भाग्य जितनी कठिनाइयाँ तुम्हारे सामने रखे, उनसे भी अधिक साहस के साथ उनका सामना करो।”

    यदि तुम यह मानते रहोगे कि वे सचमुच बुराइयाँ हैं तो तुम उनका सामना अधिक साहस से नहीं कर सकोगे। इस विश्वास को अपने हृदय से निकाल फेंकना होगा। अन्यथा चिंता तुम्हें कर्म करने में संकोची बना देगी। जहाँ तुम्हें स्वयं आगे बढ़कर आक्रमण करना चाहिए, वहाँ तुम्हें दूसरों के धक्के की आवश्यकता पड़ेगी।

    निस्संदेह, हमारा दर्शन चाहेगा कि ज़ेनो का तर्क सही सिद्ध हो और उसके विरोध में दिया गया तर्क मिथ्या तथा दोषपूर्ण माना जाए। पर जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं इन विषयों को तर्कशास्त्र के नियमों और पेशेवर तर्कविदों की उन घिसी-पिटी पहेलियों तक सीमित नहीं करता। मेरा मत है कि इस प्रकार की सारी बातों को एक ओर फेंक देना चाहिए। उनका परिणाम केवल इतना होता है कि सामने वाले को यह अनुभव होता है कि उसके साथ चालाकी की गई है। वह मानने के लिए विवश तो हो सकता है पर जो वह स्वीकार करता है, वास्तव में उसके मन का विश्वास वह नहीं होता। सत्य के पक्ष में दिए जाने वाले भाषण अधिक सरल होने चाहिए और भय के विरुद्ध दिए जाने वाले भाषण अधिक साहसपूर्ण।

    मेरी इच्छा तो यह होगी कि उनके इन उलझे हुए तर्कों को सीधा और सरल करके प्रस्तुत करूँ ताकि लोगों को छलकर नहीं बल्कि उन्हें विश्वास दिलाकर समझा सकूँ। जब कोई सेनापति अपनी सेना को युद्ध में ले जाने वाला होता है, जहाँ उन्हें अपनी पत्नियों और बच्चों के लिए अपने प्राण न्योछावर करने हैं, तब वह उन्हें किस प्रकार प्रेरित करता है? वह फैबियस कुल का स्मरण कराता है, जिसके एक ही परिवार ने अपने देश के समस्त युद्ध का भार अपने ऊपर उठा लिया था। वह थर्मोपाइली की संकरी घाटी में डटे स्पार्टनों का स्मरण कराता है। वे न विजय की आशा रखते थे, न घर लौटने की। वे जानते थे कि वही स्थान उनकी समाधि बनेगा। ऐसे वीरों को तुम किस प्रकार प्रेरित करोगे कि वे पूरे राष्ट्र के विनाश को रोकने के लिए अपने शरीरों को ढाल बना दें और अपना स्थान छोड़े बिना अपने प्राण दे दें? क्या तुम उनसे यह कहोगे, “कोई भी बुरी वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती। पर मृत्यु गौरवपूर्ण है। इसलिए मृत्यु बुरी नहीं है”? कितना प्रभावशाली भाषण होगा यह! इसे सुनकर भला कौन बिना हिचकिचाए स्वयं को भालों के सामने फेंक देगा और खड़े-खड़े मर जाना स्वीकार कर लेगा? इसके विपरीत, लियोनिदास ने अपने सैनिकों को कितने साहस के साथ संबोधित किया। उसने कहा, “सैनिकों, अपना नाश्ता कर लो। रात का भोजन हेडीज़ में होगा।” यह सुनकर उन्हें भोजन निगलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। न भोजन उनके गले में अटका, न हाथों से गिरा। वे उत्साहपूर्वक अपना नाश्ता करने बैठे और अपने अंतिम भोजन की ओर भी उसी उत्साह से चले। उस रोमन सेनापति का क्या कहना, जिसने अपने सैनिकों को शत्रुओं की विशाल सेना द्वारा संरक्षित एक स्थान पर अधिकार करने के लिए भेजते समय कहा, “सैनिकों, वहाँ जाना आवश्यक है। लौटकर आना आवश्यक नहीं।” देखो, सद्गुण कितना सरल, कितना स्पष्ट और कितना आदेशात्मक होता है।

    पर तुम्हारी इन तर्क-कपटपूर्ण युक्तियों से भला कौन अधिक दृढ़ या अधिक साहसी बन सकता है? वे तो मनोबल को ही कुचल देती हैं। जबकि यदि कोई ऐसा समय है जब मन को संकीर्ण और उलझे हुए तर्कों की काँटेदार गलियों में नहीं ठूँसा जाना चाहिए तो वह वही समय है जब मनुष्य किसी महान कार्य के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हो। हमारा कार्य केवल तीन सौ सैनिकों के मन से मृत्यु का भय दूर करना नहीं है बल्कि उन सभी मनुष्यों के मन से उसे दूर करना है जो नश्वर हैं। तुम उन्हें कैसे सिखाओगे कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है? बचपन से ही मन में बैठी हुई धारणाओं को तुम कैसे मिटाओगे? मानवीय दुर्बलता के लिए तुम्हारे पास कौन-सी सहायता है? तुम्हारे कौन-से शब्द लोगों के हृदय में ऐसा उत्साह भर देंगे कि वे स्वयं संकट के बीच कूद पड़ें? तुम्हारा कौन-सा भाषण भय के साथ किए गए उस मौन समझौते को तोड़ देगा? तुम्हारी कौन-सी वाणी समस्त मानव जाति के उन विश्वासों को उलट देगी, जो तुम्हारे विरुद्ध खड़े हैं? तुम मुझे इन पहेलीनुमा शब्दों और चालाकी से गढ़े गए छोटे-छोटे प्रश्नों के जाल प्रस्तुत करते हो! इतने बड़े शत्रु के विरुद्ध यही तुम्हारे महान अस्त्र हैं!

    अफ्रीका का वह भयानक सर्प रोमन सेनाओं के लिए स्वयं युद्ध से भी अधिक भयावह था। उन्होंने उस पर गुलेलों और तीरों की वर्षा की, पर सब व्यर्थ गया। यदि पाइथन का वध करने वाला अपोलो भी वहाँ होता तो शायद वह भी उसे घायल न कर पाता। उसके विशाल शरीर और अभेद्य चमड़े ने लोहे और मनुष्य द्वारा चलाए जा सकने वाले हर अस्त्र का सामना कर लिया। अंततः चक्की के विशाल पाटों ने उसे कुचलकर मार डाला। तो क्या तुम मृत्यु जैसे शत्रु के सामने ऐसे छोटे-छोटे बाण चलाओगे? क्या तुम सिंह का सामना एक पिन से करोगे? तुम्हारे तर्क भले ही बहुत पैने हों पर भूसे का तिनका भी नुकीला होता है। कभी-कभी कोई वस्तु अपनी अत्यधिक बारीकी के कारण ही निष्प्रभावी और निरर्थक हो जाती है।


अभी के लिए विदा 

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भय दूर करने के बारे में -- पत्र - 80

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