Friday, 31 July 2026

अपराध और दंड के बारे में -- पत्र - 95

 प्रिय लूसीलियस 


तुम भूल कर रहे हो, प्रिय लूसीलियस, यदि तुम्हें लगता है कि केवल हमारा ही युग भोग-विलास में डूबा हुआ है और उच्च नैतिक मानकों की उपेक्षा का दोषी है। लोग अपनी ही पीढ़ी को इन कमियों के लिए दोष देना पसंद करते हैं। पर वास्तव में दोष समय का नहीं, मनुष्यों का होता है। ऐसा कोई युग कभी नहीं रहा जो दोषों से मुक्त रहा हो। बल्कि यदि तुम हर युग की दुष्टताओं का आकलन करना शुरू करो तो मुझे यह कहते हुए लज्जा आती है कि जितना अनैतिक आचरण कैटो के समय और उसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति में दिखाई देता है, उतना शायद कभी नहीं हुआ। यह विश्वास करना कठिन है, लेकिन जब पब्लियस क्लोडियस पुल्खर (Publius Clodius Pulcher) पर जूलियस सीज़र (Julius Caesar) की पत्नी के साथ गुप्त व्यभिचार का मुकदमा चल रहा था, तब न्यायाधीशों को रिश्वत दी गई। क्लोडियस ने उस पवित्र धार्मिक अनुष्ठान का अपमान किया था, जो कहा जाता है कि 'जनता के लिए' संपन्न किया जाता है और जिसमें पुरुषों का प्रवेश इतना कठोरता से निषिद्ध था कि वहाँ नर पशुओं के चित्र तक ढँक दिए जाते थे। 



    फिर भी न्यायाधीशों को रिश्वत दी गई और इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए विवाहित स्त्रियों और कुलीन परिवारों के युवकों के साथ यौन संबंध बनाने का अवसर भी दिया गया। अपराध स्वयं उसके बरी किए जाने जितना घोर नहीं था। जिस व्यक्ति पर व्यभिचार का आरोप था, उसी ने अनेक व्यभिचार करवाए और उसने अपनी सुरक्षा केवल इस प्रकार सुनिश्चित की कि न्यायाधीशों को भी अपने समान अपराधी बना दिया। यह सब उसी मुकदमे में हुआ जिसमें कैटो द यंगर (Cato the Younger) ने गवाही दी थी। हालाँकि वे केवल गवाही ही दे सके। मैं इस विषय में सिसरो (Cicero) के शब्द उद्धृत करता हूँ क्योंकि अन्यथा इन घटनाओं पर विश्वास करना कठिन होगा—

"उसने न्यायाधीशों को अपने घर बुलाया, उनसे वादे किए, उनसे विनती की और उन्हें रिश्वत दी। लेकिन, देवताओं की शपथ, इससे भी अधिक बुरा होने वाला था। अंतिम पुरस्कार के रूप में कुछ न्यायाधीशों को विशेष स्त्रियों के साथ रात्रि बिताने का अवसर और कुलीन परिवारों के युवकों के साथ गुप्त मिलन का प्रलोभन दिया गया।"

रिश्वत देना ही पर्याप्त रूप से घृणित था। लेकिन उसके साथ जो अतिरिक्त प्रलोभन दिए गए, वे उससे भी अधिक चौंकाने वाले थे। "वह बड़ा सदाचारी बनने वाला व्यक्ति, क्या तुम उसकी पत्नी चाहते हो? मैं उसे तुम्हारे पास पहुँचा दूँगा। उस धनी व्यक्ति की पत्नी कैसी रहेगी? मैं व्यवस्था कर दूँगा कि वह तुम्हारे साथ रात बिताए। यदि तुम्हें किसी की पत्नी नहीं मिली तो मुझे दोषी ठहराने के पक्ष में मतदान कर देना! जिस सुंदर स्त्री की तुम इच्छा रखते हो, वह तुम्हारे पास आएगी। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें उसके साथ एक रात बिताने का अवसर मिलेगा और मैं यह काम शीघ्र कर दूँगा। अदालत की दो दिन की कार्यवाही-स्थगन अवधि के भीतर मेरा वादा पूरा हो जाएगा।" व्यभिचार की व्यवस्था करना स्वयं व्यभिचार करने से भी अधिक अनैतिक है क्योंकि इसमें सम्मानित विवाहित स्त्रियों पर दबाव डालकर उन्हें इस कृत्य में सम्मिलित किया जाता है। क्लोडियस के न्यायाधीशों ने सीनेट से सुरक्षा की माँग की थी। ऐसी सुरक्षा की आवश्यकता केवल तभी पड़ती यदि वे उसे दोषी ठहराने वाले होते और उनकी यह माँग स्वीकार भी कर ली गई। इसलिए जब अभियुक्त बरी हो गया तो कैटुलस ने व्यंग्य करते हुए न्यायाधीशों से कहा, "तुमने हमसे सुरक्षा क्यों माँगी थी? क्या इसलिए कि कहीं तुम्हारी रिश्वत जब्त न कर ली जाए?" ऐसे ही उपहास और कटाक्ष के बीच वह व्यक्ति बच निकला, जो मुकदमे से पहले व्यभिचारी था और मुकदमे के दौरान दलाल बन गया। दोषमुक्त होने के लिए उसने जो किया, वह उस अपराध से भी अधिक घृणित था जिसके कारण उस पर मुकदमा चलाया गया था।

    क्या तुम्हें लगता है कि कभी लोगों के नैतिक मानदंड इससे अधिक पतित रहे होंगे। ऐसे लोगों के, जिन्हें न तो धर्म का भय रोक सकता था और न ही न्यायालय का? उन्होंने सीनेट की विशेष न्यायिक कार्यवाही के दौरान उसी अपराध से भी बड़ा अपराध कर डाला जिसकी जाँच की जा रही थी। विवाद का प्रश्न यह था कि क्या व्यभिचार का दोषी व्यक्ति स्वतंत्र रह सकता है। लेकिन जो बात सामने आई, वह यह थी कि ऐसा व्यक्ति व्यभिचार का सहारा लिए बिना निर्दोष घोषित ही नहीं किया जा सकता था। यह सब कुछ पोम्पेई, सीज़र, सिसेरो और कैटो की उपस्थिति में तय किया गया। और ध्यान रहे, यही वही कैटो थे जिनकी उपस्थिति में कहा जाता है कि फ्लोरा के उत्सव के दौरान जनता ने नर्तकियों से नग्न प्रदर्शन की माँग करना भी बंद कर दिया था। यदि तुम इस बात पर विश्वास कर सको तो उस समय के दर्शकों के नैतिक मानदंड न्यायाधीशों की अपेक्षा अधिक ऊँचे थे। 

    ऐसी घटनाएँ पहले भी होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। नागरिक जीवन का नैतिक पतन कभी-कभी भय और दबाव के कारण कुछ समय के लिए थम सकता है। लेकिन वह अपनी इच्छा से कभी समाप्त नहीं होता। इसलिए तुम्हें यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा युग किसी भी अन्य युग की तुलना में अधिक वासना का दास हो गया है या कानूनों का कम सम्मान करता है। आज के युवा उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक संयमित हैं। उस समय तो स्थिति यह थी कि व्यभिचार का आरोपी अपने न्यायाधीशों के सामने स्वयं को निर्दोष बताता था, जबकि न्यायाधीश उसके सामने अपने ही व्यभिचार के दोषी होने की स्वीकृति दे चुके होते थे। मुकदमे का निर्णय प्रभावित करने के लिए व्यभिचार और काम-वासना से भरे आयोजन किए जाते थे। क्लोडियस, जिस अपराध का वह स्वयं दोषी था, उसी प्रकार के अनैतिक आचरण से लाभ उठाते हुए मुकदमे की कार्यवाही के दौरान ही गुप्त प्रेम-संबंधों की व्यवस्था कर रहा था। क्या कोई इस बात पर विश्वास करेगा कि एक व्यक्ति, जिस पर केवल एक व्यभिचार का मुकदमा चल रहा था, अनेक व्यभिचारों का सहारा लेकर निर्दोष घोषित हो गया?

    क्लोडियस जैसे लोग हर युग में मिल जाते हैं। लेकिन कैटो जैसे लोग हर युग में नहीं मिलते। हमारा झुकाव सदैव बुराई की ओर रहता है क्योंकि हमेशा कोई न कोई आगे बढ़कर उसका मार्ग दिखाने वाला होता है और कोई न कोई उसका अनुसरण करने वाला। बल्कि उनके बिना भी बुराई का सिलसिला तेज़ी से चलता रहता है। हम केवल दुष्कर्म की ओर झुकते ही नहीं बल्कि उसमें पूरी तरह कूद पड़ते हैं। अन्य कलाओं और व्यवसायों में यदि कोई गलती हो जाए तो वह उस कारीगर के लिए लज्जा का कारण होती है। वह अपनी त्रुटि से दुखी होता है। लेकिन जीवन के मामले में लोग अपने दुष्कर्मों से ही आनंद प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि अधिकांश लोगों को सुधारना लगभग असंभव हो जाता है। एक नाविक को जहाज़ के डूब जाने में कोई सुख नहीं मिलता। एक डॉक्टर अपने रोगी के अंतिम संस्कार से प्रसन्न नहीं होता और यदि कोई वकील अपने मुवक्किल का मुकदमा हार जाए तो उसे भी उससे आनंद नहीं मिलता। लेकिन मनुष्य अपने स्वयं के अनैतिक आचरण से आनंद लेता है। कोई व्यक्ति व्यभिचार में इसलिए सुख अनुभव करता है कि उसका निषिद्ध और कठिन होना ही उसे रोमांचित करता है। दूसरा जालसाज़ी और चोरी में रोमांच महसूस करता है। वह अपने कर्मों के लिए स्वयं को तभी दोष देता है जब उसका भाग्य उसका साथ छोड़ देता है। हमने बुरे आचरण को अपनी आदत बना लिया है और यही उसकी परिणति है। 

    दूसरी ओर, सभी लोग अपने दुष्कर्मों को छिपाते भी हैं। चाहे वे उन कार्यों से कितना ही लाभ क्यों न उठा लें, वे उनका आनंद तो लेते है। लेकिन उनके तथ्य छिपाए रखते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जो लोग पूरी तरह पतन की राह पर चले गए हैं, उनमें भी सही और गलत का कुछ न कुछ बोध शेष रहता है। वे यह नहीं जानते कि क्या गलत है। ऐसा नहीं है। वे तो बस जान-बूझकर उसकी उपेक्षा करते हैं। लेकिन निर्मल अंतःकरण चाहता है कि वह खुले रूप में सामने आए और सबके सामने दिखाई दे। जबकि दुष्टता अँधेरे से भी डरती है। इसी कारण मुझे लगता है कि एपिक्यूरस ने बहुत अच्छी बात कही थी, “दुष्कर्मी संयोगवश छिपा रह सकता है। लेकिन वह कभी इस बात के प्रति निश्चिंत नहीं हो सकता कि वह हमेशा छिपा ही रहेगा।” इस विचार को और भी बेहतर ढंग से इस प्रकार कहा जा सकता है, “दुष्कर्म करने वालों को अपने अपराध छिपाने से कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता। क्योंकि यदि सौभाग्य से वे छिप भी जाएँ, तब भी उन्हें कभी यह विश्वास नहीं होता कि वे सदा छिपे रहेंगे।” अर्थात अपराध कभी भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं हो सकता। मेरे विचार से, यदि इस कथन का यही अर्थ समझा जाए, तो यह हमारे स्टोइक दर्शन के भी विरोध में नहीं है। कैसे? क्योंकि दुष्कर्मी के लिए पहला और सबसे बड़ा दंड यही है कि उसने अपराध किया है। कोई भी अपराध, चाहे भाग्य ने उसे वैभव से सजा दिया हो, चाहे उसी भाग्य ने उसे संरक्षण और सुरक्षा प्रदान कर दी हो, दंड से मुक्त नहीं होता। अपराध का दंड उसी अपराध के भीतर निहित होता है। फिर भी, उस पहले और मूल दंड के तुरंत बाद दूसरे दंड भी उसके पीछे-पीछे चलते हैं। लगातार भय, आतंक और अपनी सुरक्षा के प्रति अविश्वास। तो फिर मैं दुष्टता को इस दंड से क्यों मुक्त कर दूँ? मैं उसे निरंतर आशंका और अस्थिरता की स्थिति में क्यों न रहने दूँ? 

    जब एपिक्यूरस यह कहते हैं कि स्वभावतः कोई भी वस्तु न्यायपूर्ण नहीं होती और यह कि मनुष्य को दुष्कर्मों से केवल इसलिए बचना चाहिए क्योंकि उनसे उत्पन्न होने वाली चिंता से बचा नहीं जा सकता तो इस बात से हमें असहमति रखनी चाहिए। लेकिन हमें उनसे इस बात पर सहमत होना चाहिए कि अपराधी अपने ही अंतःकरण द्वारा सताया जाता है। उसका सबसे बड़ा दंड यह है कि उसे निरंतर चिंता की मार और भय की चाबुक सहनी पड़ती है क्योंकि वह उन लोगों पर भी विश्वास नहीं कर सकता जो उसे सुरक्षा का आश्वासन देते हैं। एपिक्यूरस, यही बात स्वयं इस बात का प्रमाण है कि दुष्कर्मों के प्रति हमारे भीतर स्वाभाविक घृणा होती है। हर अपराधी डरता है, चाहे वह पूरी तरह सुरक्षित स्थान पर ही क्यों न हो। भाग्य बहुत-से लोगों को बाहरी दंड से बचा सकता है। लेकिन चिंता से किसी को नहीं बचा सकता। यदि ऐसा न होता कि प्रकृति ने हमारे भीतर दुष्कर्मों के प्रति जन्मजात घृणा रखी है तो ऐसा क्यों होता? मनुष्य कभी भी इस बात के प्रति निश्चिंत नहीं हो सकता कि उसका अपराध हमेशा छिपा रहेगा क्योंकि उसका अंतःकरण स्वयं उसे दोषी ठहराता है और उसे उसके अपने सामने ही प्रकट कर देता है। अपराधियों की पहचान ही यह है कि वे निरंतर भय से भरे रहते हैं। यदि कानून की सज़ा और निर्धारित दंड से बहुत-से अपराध बच निकलते हैं तो हमारी स्थिति अत्यंत दयनीय होती। यदि प्रकृति ने स्वयं ऐसे अपराधों के लिए तत्काल और कठोर दंड की व्यवस्था न की होती। वह दंड है भय, जो बाहरी सज़ा का स्थान ले लेता है।


अभी के लिए विदा 

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