Wednesday, 22 July 2026

उपकार और अपकार के बारे में -- पत्र 79

 प्रिय लूसीलियस 


तुम शिकायत करते हो कि तुम्हें एक कृतघ्न व्यक्ति मिला। यदि ऐसा पहली बार हुआ है तो तुम्हें या तो अपने सौभाग्य का आभारी होना चाहिए या अपने स्वयं के प्रयासों का। किन्तु यदि तुम इस अनुभव के कारण दूसरों पर उपकार करना छोड़ देना चाहते हो तो तुम्हारा यह प्रयास तुम्हें केवल कठोर और अनुदार ही बनाएगा। क्योंकि यदि तुम वर्तमान परिस्थिति का जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगे तो तुम किसी पर भी उपकार नहीं कर पाओगे। तब परिणाम यह होगा कि उपकार केवल कृतघ्न व्यक्ति के साथ ही नष्ट नहीं होगा बल्कि तुम्हारे साथ भी समाप्त हो जाएगा। इससे तो यह कहीं बेहतर है कि कुछ उपकारों का प्रत्युत्तर न मिले, बजाय इसके कि उपकार करना ही छोड़ दिया जाए। खराब फसल होने के बाद भी किसान बीज बोना नहीं छोड़ता। अनेक वर्षों तक बंजर भूमि में जो हानि होती रही हो, वह कभी-कभी केवल एक ही वर्ष में उपजाऊ भूमि के कारण पूरी हो जाती है। इसी प्रकार, एक कृतज्ञ व्यक्ति को पाने के लिए कुछ कृतघ्न लोगों का सामना करना भी सार्थक है। कोई भी इतना अचूक नहीं होता कि उपकार करते समय कभी भूल न करे। कुछ उपकार व्यर्थ चले जाएँ ताकि कुछ अपने सही लक्ष्य तक पहुँच सकें। जहाज़ डूब जाने के बाद भी लोग फिर समुद्र की यात्रा पर निकलते हैं। एक बुरे ऋण के कारण साहूकार बाज़ार में धन उधार देना बंद नहीं कर देता। यदि हर उस कार्य को छोड़ दिया जाए जिसमें बाधाएँ आती हैं तो जीवन का सारा प्रवाह ही रुक जाएगा। इसलिए तुम्हारे साथ जो हुआ है, वह तुम्हें और भी अधिक उदार बनाए। क्योंकि जिन कार्यों का परिणाम निश्चित नहीं होता, उन्हें बार-बार करना चाहिए ताकि कभी-न-कभी सफलता अवश्य प्राप्त हो सके।



    लेकिन इस विषय पर मैं अपनी कार्य (संभवतः पुस्तक) उपकार (De Beneficiis) में पर्याप्त चर्चा कर चुका हूँ।इस समय मेरे विचार में एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर अब तक संतोषजनक ढंग से विचार नहीं किया गया है। मान लो, किसी व्यक्ति ने पहले हमारा कोई उपकार किया, किन्तु बाद में उसी ने हमारा अहित भी किया। तो क्या यह माना जाए कि उसने अपने पहले किए गए उपकार और बाद में पहुँचाई गई हानि को बराबर कर दिया। इस प्रकार हमारे ऊपर उसका जो कृतज्ञता का ऋण था, वह समाप्त हो गया? यदि चाहो तो इस प्रश्न को और भी कठिन बना सकते हो। मान लो कि बाद में उसने जो हानि पहुँचाई, वह पहले किए गए उपकार से कहीं अधिक बड़ी थी। तब क्या हमें उसके पहले किए गए उपकार को स्मरण रखना चाहिए या उसकी बाद की हानि को अधिक महत्त्व देना चाहिए?

    यदि तुम उस कठोर और अडिग न्यायाधीश का मत पूछो, जो लोकोक्ति के अनुसार अत्यंत सख्त निर्णय देता है तो वह कहेगा कि एक कर्म दूसरे को निरस्त कर देता है। वह कहेगा, “यद्यपि हानि का पलड़ा भारी है, फिर भी जो अंतर बचता है, उसे उपकार के पक्ष में मान लो।” बाद में हुई हानि अधिक बड़ी थी, किन्तु उपकार पहले किया गया था। इसलिए निर्णय करते समय समय के क्रम का भी ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त कुछ और बातें भी विचारणीय हैं, जो इतनी स्पष्ट हैं कि उन्हें अलग से याद दिलाने की आवश्यकता नहीं। जैसे—उपकार करते समय उसकी इच्छा कितनी सच्ची थी और हानि पहुँचाते समय उसकी अनिच्छा कितनी थी। क्योंकि उपकार और अपकार, दोनों का वास्तविक मूल्य मनुष्य की भावना और उद्देश्य पर निर्भर करता है।कोई कह सकता है, “मैं उपकार करना नहीं चाहता था। मुझे लज्जा के कारण ऐसा करना पड़ा या लोगों के बार-बार आग्रह ने मुझे विवश कर दिया अथवा मैंने यह सोचकर उपकार किया कि इससे मुझे कोई लाभ होगा।” किसी उपकार के प्रति कृतज्ञता भी उतनी ही होनी चाहिए जितनी सच्ची भावना से वह उपकार किया गया था। इसलिए हम केवल उपकार के आकार या मात्रा को नहीं तौलते बल्कि उसे देने वाले की सद्भावना और इच्छा को भी तौलते हैं। अब यदि सभी अनुमान और संदेहों को एक ओर रख दें और यह मान लें कि पहला कार्य वास्तव में उपकार था तथा बाद का कार्य वास्तव में उससे अधिक बड़ा अपकार था, तब भी एक सज्जन मनुष्य अपना हिसाब इस प्रकार करेगा कि उसका झुकाव अपने ही विरुद्ध होगा। वह उपकार के मूल्य को बढ़ाकर आँकेगा और अपकार के मूल्य को घटाकर देखेगा।

    दूसरा न्यायाधीश, जो अधिक उदार है और जिसकी राय को मैं स्वयं अधिक पसंद करता हूँ, तुमसे कहेगा कि अपकार को भूल जाओ किन्तु उपकार को स्मरण रखो। तुम कह सकते हो, “न्याय तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित प्रतिफल दिया जाए, उपकार के बदले कृतज्ञता और अपकार के बदले प्रतिशोध या कम-से-कम मन में रोष।” यह बात तब तक सही है, जब उपकार करने वाला और अपकार करने वाला दो अलग-अलग व्यक्ति हों। किन्तु यदि उपकार और अपकार, दोनों एक ही व्यक्ति ने किए हों तो उसके पहले किए गए उपकार का प्रभाव उसके बाद के अपकार को बहुत सीमा तक निष्प्रभावी कर देता है। यदि कोई व्यक्ति बिना पहले कोई उपकार किए भी क्षमा का पात्र हो सकता है तो जिसने पहले हमारे साथ भलाई की हो और बाद में कोई गलती कर बैठे, वह तो केवल क्षमा ही नहीं, उससे भी अधिक उदार व्यवहार का अधिकारी है। मैं उपकार और अपकार इन दोनों का मूल्य समान नहीं मानता। मेरे विचार में, एक उपकार का मूल्य एक अपकार से कहीं अधिक होता है।

    हर व्यक्ति यह नहीं जानता कि कृतज्ञ कैसे होना चाहिए। कोई विचारहीन, अशिक्षित या सामान्य जन भी यह समझ सकता है कि उस पर किसी का उपकार है, विशेषकर तब जब उसे वह उपकार हाल ही में प्राप्त हुआ हो। किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि उस उपकार का वास्तविक मूल्य कितना है और उसके प्रति उसका दायित्व किस सीमा तक है। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही जानता है कि प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक उपकार का उचित मूल्य क्या है। जिस व्यक्ति का मैंने अभी उल्लेख किया जो सद्भावना रखने पर भी विवेकहीन है, वह उपकार का प्रतिदान या तो जितना करना चाहिए उससे कम करता है या फिर अनुचित समय पर, अनुचित स्थान पर अथवा अनुचित ढंग से करता है। इस प्रकार, जो प्रतिदान उचित रीति से किया जाना चाहिए था, वह व्यर्थ चला जाता है और मानो यूँ ही नष्ट हो जाता है।

    यह आश्चर्य की बात है कि कुछ अवसरों पर हमारी भाषा कितनी उपयुक्त सिद्ध होती है। हमारी प्राचीन भाषिक परंपरा ने कुछ बातों के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो न केवल अत्यंत सटीक हैं बल्कि हमारे कर्तव्य का भी संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए, हम सामान्यतः कहते हैं, “इस व्यक्ति ने उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की” (gratiam rettulit)। यहाँ 'व्यक्त की' या 'लौटाई' का अर्थ है जो तुम्हारा ऋण है, उसे अपनी स्वेच्छा से उसके वास्तविक अधिकारी के पास पहुँचा देना। हम यह नहीं कहते कि 'उसने कृतज्ञता वापस दे दी' (gratiam reddidit)। कोई वस्तु तो मनुष्य अनिच्छा से भी लौटा सकता है, अनुचित समय पर भी लौटा सकता है या किसी दूसरे के माध्यम से भी लौटा सकता है। इसी प्रकार हम यह भी नहीं कहते कि 'उसने उपकार का भुगतान कर दिया' (reposuit beneficium) या 'उसने उसका ऋण चुका दिया' (resolvit)। ये शब्द धन या ऋण चुकाने के लिए तो उपयुक्त हो सकते हैं किन्तु उपकार के प्रतिदान के लिए हमें उचित नहीं लगते। 'लौटाना' (render) का वास्तविक अर्थ है जिससे कोई वस्तु प्राप्त हुई हो, उसे स्वेच्छा से उसी के पास वापस पहुँचाना। इस शब्द में यह भाव निहित है कि कार्य किसी बाहरी दबाव से नहीं बल्कि अपनी ही प्रेरणा से किया गया है।

    बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह विचार करता है कि उसने कितना उपकार प्राप्त किया है, किससे प्राप्त किया है, कब, कहाँ, किस कारण और किस प्रकार प्राप्त किया है। इसीलिए हम कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही सही अर्थों में कृतज्ञता प्रकट करना जानता है, ठीक वैसे ही जैसे केवल वही वास्तविक अर्थों में उपकार करना भी जानता है। स्वाभाविक ही है कि वही बुद्धिमान व्यक्ति उपकार करने में उतना ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक आनंद अनुभव करता है, जितना अन्य लोग उपकार प्राप्त करने में करते हैं।

    कुछ लोग इसे हमारे दर्शनशास्त्र के उन कथनों में से एक मानते हैं जो सामान्य लोगों की अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होते हैं। यूनानी ऐसे कथनों को पैराडॉक्सा (paradoxa) कहते हैं। वे कहते हैं, “क्या केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है? क्या कोई और व्यक्ति यह नहीं जानता कि लेनदार का ऋण कैसे चुकाया जाता है या किसी वस्तु का मूल्य कैसे अदा किया जाता है?” यदि हमारे दर्शन के प्रति इस कारण किसी के मन में रोष उत्पन्न हो तो यह जान लेना चाहिए कि एपिक्यूरस भी यही मत रखता है। कम-से-कम मेट्रोडोरस तो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है। फिर यही मेट्रोडोरस आश्चर्य व्यक्त करते हैं जब हम कहते हैं, “केवल ज्ञानी ही प्रेम करना जानता है। केवल ज्ञानी ही सच्चा मित्र होता है।” किन्तु कृतज्ञता तो प्रेम और मित्रता, दोनों का ही एक अंग है। वास्तव में, कृतज्ञता का व्यवहार सच्ची मित्रता की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक है और अधिक लोगों पर लागू होता है। फिर वही मेट्रोडोरस इस बात पर भी आश्चर्य करते हैं कि हम कहते हैं,“सच्ची निष्ठा केवल ज्ञानी में ही होती है।” मानो वे स्वयं ऐसा नहीं कहते हों! क्या तुम सचमुच यह मानते हो कि जो व्यक्ति कृतज्ञ होना ही नहीं जानता, वह निष्ठावान हो सकता है? अतः लोगों को यह आरोप लगाना छोड़ देना चाहिए कि हम ऐसी बातें कहते हैं जिन पर कोई विश्वास नहीं कर सकता।

    उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ज्ञानी के भीतर जो दिखाई देता है, वह स्वयं सदाचार होता है जबकि सामान्य मनुष्य में केवल सदाचार की छाया या उसका आभास दिखाई देता है। ज्ञानी के अतिरिक्त कोई भी वास्तविक अर्थ में कृतज्ञ होना नहीं जानता। यह अवश्य है कि मूर्ख व्यक्ति भी अपनी समझ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार कृतज्ञता प्रकट करता है। उसमें कमी उसकी सद्भावना की नहीं बल्कि उसके ज्ञान की होती है क्योंकि सद्भावना ऐसी वस्तु नहीं है जिसे सिखाया जाना पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति के सभी पक्षों का परस्पर संबंध देखकर उनका मूल्यांकन करता है। क्योंकि एक ही कार्य का महत्व समय, स्थान और उसके पीछे के उद्देश्य के अनुसार बढ़ भी सकता है और घट भी सकता है। उचित समय पर दिए गए एक हजार डेनारियस किसी परिवार के लिए कभी-कभी उससे कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, जितना कि अनुचित समय पर उस पर पूरा धन-भंडार लुटा देना। इससे भी बहुत अंतर पड़ता है कि तुम केवल कोई उपहार दे रहे हो या वास्तव में किसी संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता कर रहे हो। तुम्हारी उदारता किसी को विनाश से बचा रही है या केवल उसके लिए कोई उपयोगी वस्तु उपलब्ध करा रही है। अनेक बार उपहार आकार में छोटा होता है किन्तु उसके परिणाम अत्यंत महान होते हैं। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इसमें भी बहुत बड़ा अंतर है कि दिया गया उपहार तुम्हारी अपनी कमाई और संपत्ति से दिया गया है या वह केवल किसी और से प्राप्त उपकार को आगे बढ़ाकर दिया गया है?

    किन्तु जिन बातों पर हम पहले ही पर्याप्त चर्चा कर चुके हैं, उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं है। जब उपकार और अपकार की तुलना की जाएगी, तब सज्जन व्यक्ति निश्चय ही यह विचार करेगा कि सबसे न्यायसंगत उत्तर क्या होना चाहिए। फिर भी उसका झुकाव उपकार की ओर ही रहेगा; वह उसी पक्ष को अधिक महत्व देगा। ऐसे मामलों में सामाजिक संबंधों और भूमिकाओं का भी बहुत महत्व होता है। कोई कह सकता है, “तुमने मेरे दास पर उपकार किया किन्तु मेरे पिता का अहित किया। तुमने मेरे पुत्र का जीवन बचाया पर मेरे पिता को मुझसे छीन लिया।” ऐसी प्रत्येक तुलना में इन और इसी प्रकार की अन्य परिस्थितियों का भी विचार किया जाएगा। यदि उपकार और अपकार के बीच का अंतर बहुत कम हो तो बुद्धिमान व्यक्ति उसे अनदेखा कर देगा। बल्कि यदि अंतर काफी बड़ा भी हो किन्तु उसे स्वीकार करने से निष्ठा और कर्तव्यपरायणता को कोई हानि न पहुँचती हो अर्थात यदि वह अपकार केवल उसी के व्यक्तिगत हित से संबंधित हो तो भी वह उसे क्षमा कर देगा। संक्षेप में, वह ऐसा व्यक्ति होगा जिससे समझौता करना सरल होगा। वह अपने ऊपर हुए उपकार को स्वीकार करने में उदार होगा और किसी अपकार के कारण पहले किए गए उपकार को निरर्थक मान लेने में अत्यन्त अनिच्छुक होगा। उसकी समस्त प्रवृत्ति और उसकी सभी इच्छाएँ कृतज्ञता और आभार की ओर ही उन्मुख रहेंगी।

    उपकार लौटाने की अपेक्षा उसे प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होना एक भूल है। जिस प्रकार ऋण चुकाने वाला व्यक्ति ऋण लेने वाले की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होता है, उसी प्रकार हमें भी प्राप्त उपकार के महान ऋण से स्वयं को मुक्त करते समय उससे कहीं अधिक आनंद अनुभव करना चाहिए जितना उपकार प्राप्त करते समय हुआ था। कृतघ्न लोग इस विषय में भी भूल करते हैं। वे अपने धन के लेनदारों का ऋण तो ब्याज सहित चुका देते हैं किन्तु यह समझते हैं कि उपकारों को बिना किसी प्रतिदान के सदा अपने ऊपर रखा जा सकता है।वास्तव में, उपकार का ऋण भी समय बीतने के साथ बढ़ता जाता है। जितनी अधिक देर प्रतिदान करने में होती है, उतना ही अधिक लौटाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना किसी 'ब्याज' के उपकार का प्रतिदान करता है, वह कृतघ्न है। अर्थात उसे केवल उपकार के बराबर ही नहीं बल्कि उससे अधिक उत्साह, सम्मान और सद्भावना के साथ उसका प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए जब हम अपने प्राप्त उपकारों और उनके प्रतिदान का हिसाब लगाएँ, तब इस बात को भी अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

    हमें यथासंभव अपनी पूरी कृतज्ञता प्रकट करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इसका सबसे बड़ा लाभ अंततः हमारा अपना ही होता है। आखिर कृतज्ञता केवल न्याय नहीं है, जैसा कि सामान्यतः लोग समझते हैं। न्याय का संबंध मुख्यतः दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य से होता है जबकि कृतज्ञता का अधिकांश कल्याण स्वयं हमारे ही भीतर लौटकर आता है। जो व्यक्ति किसी दूसरे का उपकार करता है, वह वास्तव में अपना ही उपकार करता है। मेरा यह अर्थ नहीं है कि जिसे सहायता मिली है, वह आगे किसी और की सहायता करेगा या जिसकी रक्षा की गई है, वह दूसरों की रक्षा करेगा। न ही मेरा आशय यह है कि एक अच्छा कार्य केवल उदाहरण बनकर फिर उसी व्यक्ति के पास लौट आता है। बुरे उदाहरण भी अपने कर्ता के पास लौटते हैं। जिसने दूसरों को अन्याय करना सिखाया हो, जब वही अन्याय उसके साथ होता है तो उसे किसी की सहानुभूति नहीं मिलती। मेरा आशय यह है कि प्रत्येक सद्गुण स्वयं अपना पुरस्कार है। मनुष्य सद्गुणों का पालन किसी पुरस्कार को पाने के लिए नहीं करता। सही कर्म का सबसे बड़ा प्रतिफल यही है कि उसने सही कर्म किया। मैं कृतज्ञता इसलिए नहीं प्रकट करता कि मेरे उदाहरण से कोई दूसरा भी मेरे प्रति अधिक कृतज्ञ हो जाए। मैं कृतज्ञता इसलिए प्रकट करता हूँ क्योंकि ऐसा करना अपने-आप में अत्यंत सुखद और सुंदर कर्म है। मैं कृतज्ञ इसलिए नहीं होता कि यह लाभदायक है बल्कि इसलिए कि यह मेरे लिए प्रिय और आनंददायक है। यदि इसे सिद्ध करने के लिए ऐसी स्थिति आ जाए कि मैं केवल कृतघ्न दिखाई देकर ही अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकता हूँ, यदि किसी उपकार का प्रतिदान करने का एकमात्र उपाय यह हो कि लोग मुझे किसी का अहित करने वाला समझें तो भी मैं निःसंकोच बदनामी के बीच अपने सम्मानपूर्ण उद्देश्य को पूरा करूँगा। मेरे विचार में, सद्गुण का मूल्य उससे अधिक कोई नहीं समझता और उसके प्रति उससे अधिक निष्ठावान कोई नहीं होता, जिसने अपनी अंतरात्मा को निर्मल बनाए रखने के लिए अपनी अच्छी प्रतिष्ठा तक का बलिदान दे दिया हो।

    इसलिए, जैसा कि मैंने पहले कहा था, तुम्हारी कृतज्ञता दूसरे व्यक्ति के हित से अधिक तुम्हारे अपने हित के लिए होती है। दूसरे व्यक्ति को तो केवल एक साधारण-सी वस्तु प्राप्त होती है, उसे वही वापस मिल जाता है जो उसने पहले दिया था। परन्तु तुम्हें उससे कहीं अधिक मूल्यवान वस्तु प्राप्त होती है। ऐसी वस्तु, जो मन की सर्वोत्तम अवस्था से उत्पन्न होती है: कृतज्ञता। यदि दुर्गुण मनुष्य को दुःखी बनाता है और सद्गुण उसे सुखी करता है तथा यदि कृतज्ञता एक सद्गुण है तो तुमने भले ही साधारण-सी वस्तु लौटाई हो। किन्तु बदले में तुमने वह अमूल्य वस्तु प्राप्त कर ली है जिसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता, एक कृतज्ञ हृदय। ऐसा हृदय केवल दिव्य और धन्य आत्मा ही प्राप्त कर सकती है। 

    इसके विपरीत अवस्था में रहने वाला व्यक्ति भीतर से गहरे असंतोष का अनुभव करता है। जो दूसरों के प्रति कृतज्ञ नहीं है, वह कभी अपने ही मन की दृष्टि में सम्मानित नहीं हो सकता। क्या तुम्हें लगता है कि मैं यह कह रहा हूँ कि कृतघ्न व्यक्ति भविष्य में कभी दुखी होगा? नहीं, मैं उसे इतना भी समय नहीं देता। वह तो इसी क्षण दुखी है। इसलिए हमें कृतघ्नता से दूसरों के हित के लिए नहीं बल्कि अपने ही हित के लिए बचना चाहिए। मनुष्य की दुष्टता का केवल सबसे छोटा और हल्का भाग ही दूसरों तक पहुँचता है। उसका सबसे घना और सबसे विषैला भाग तो उसी के भीतर रह जाता है और उसी का जीवन दूषित करता रहता है। जैसा कि हमारे मित्र अटालुस कहा करते थे—

“दुर्गुण अपना अधिकांश विष स्वयं ही पी जाता है।”

यह विष उस विष के समान नहीं है जिसे साँप दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए बनाते हैं जबकि स्वयं उससे अप्रभावित रहते हैं। यह तो ऐसा विष है जो सबसे अधिक उसी व्यक्ति को नष्ट करता है जिसके भीतर वह रहता है। कृतघ्न व्यक्ति स्वयं अपने को यातना देता है, स्वयं अपने लिए कष्ट का कारण बनता है। वह अपने ऊपर किए गए उपकारों से घृणा करने लगता है क्योंकि उन्हें लौटाने का दायित्व उसे बोझ प्रतीत होता है। इसलिए वह उन उपकारों के महत्व को कम करके आँकता है, जबकि अपने साथ हुए अपकारों को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है।इससे अधिक दुखद स्थिति और क्या हो सकती है कि मनुष्य अपने जीवन में प्राप्त सभी उपकारों को भुला दे जबकि केवल अपने साथ हुए अपकारों को ही स्मरण रखे?

    इसके विपरीत, बुद्धिमत्ता प्रत्येक उपकार के मूल्य को और अधिक बढ़ा देती है। वह उन्हें अपने मन में आदरपूर्वक संजोकर रखती है और उनके निरंतर स्मरण में आनंद का अनुभव करती है। दुष्ट व्यक्ति को उपकार से केवल एक ही सुख मिलता है, और वह भी थोड़े समय के लिए जब वह उपकार प्राप्त कर रहा होता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति का आनंद स्थायी और चिरस्थायी होता है। उसका सुख उपकार प्राप्त करने में नहीं बल्कि इस बात में होता है कि उसे कभी उपकार प्राप्त हुआ था। यही स्मृति उसके लिए सदा बनी रहती है और कभी नष्ट नहीं होती। वह अपने साथ हुए अपकारों को महत्व नहीं देता। वह उन्हें लापरवाही के कारण नहीं बल्कि अपनी इच्छा से भुला देता है। वह हर बात का सबसे बुरा अर्थ नहीं निकालता और न ही अपने दुर्भाग्य के लिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने की तलाश करता है। बल्कि दूसरों के अनुचित व्यवहार का कारण भी वह प्रायः भाग्य को ही मान लेता है। वह लोगों के शब्दों या उनके चेहरे के भावों में दोष नहीं खोजता। जो कुछ भी घटित होता है, उसकी वह यथासंभव सद्भावनापूर्ण व्याख्या करता है, और इसी कारण जीवन की कठिनाइयाँ उसके लिए अधिक सहनीय हो जाती हैं। वह उपकारों की अपेक्षा अपकारों को अधिक याद रखने वाला व्यक्ति नहीं होता। जहाँ तक संभव हो, वह लोगों के साथ जुड़े पुराने और अच्छे प्रसंगों को ही स्मरण करता है। जो लोग कभी उसके प्रति उपकारी रहे हों, उनके प्रति वह अपना दृष्टिकोण तब तक नहीं बदलता, जब तक कि उनके अपराध इतने अधिक और इतने स्पष्ट न हो जाएँ कि उन्हें अनदेखा करना असंभव हो। तब भी वह केवल उतना ही बदलता है जितना उस व्यक्ति के पहले उपकार से पूर्व उसका संबंध था। क्योंकि जब अपकार का परिमाण उपकार के बराबर भी हो जाए, तब भी उसके मन में कुछ सद्भावना शेष रहती है। जिस प्रकार किसी न्यायालय में मत बराबर हो जाने पर अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया जाता है। प्रत्येक संदिग्ध मामले में उदारता बेहतर पक्ष का समर्थन करती है, उसी प्रकार जब किसी व्यक्ति के अच्छे और बुरे कार्य समान हो जाते हैं, तब बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह मानना छोड़ देता है कि वह उसका ऋणी है। किन्तु वह कृतज्ञ बने रहने की इच्छा नहीं छोड़ता। वह उन लोगों के समान होता है जो ऋण माफ़ हो जाने के बाद भी स्वेच्छा से अपना ऋण चुका देते हैं।

    कोई भी व्यक्ति तब तक सच्चे अर्थों में कृतज्ञ नहीं हो सकता, जब तक वह उन वस्तुओं को अधिक महत्व देना न छोड़ दे जिनके पीछे सामान्य लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। यदि तुम किसी उपकार का वास्तविक प्रतिदान करना चाहते हो तो तुम्हें आवश्यकता पड़ने पर निर्वासन सहने के लिए तैयार रहना होगा। अपना रक्त बहाने के लिए भी तैयार रहना होगा। निर्धनता का सामना करना होगा और कई बार तो अपनी प्रतिष्ठा तक को दाँव पर लगाना होगा तथा ऐसे अपवादों और बदनामी को भी सहना होगा जिसके तुम अधिकारी नहीं हो। कृतज्ञता का मूल्य बहुत बड़ा होता है। वह बिना किसी त्याग के प्राप्त नहीं होती। जब तक हम किसी उपकार की आशा करते रहते हैं, तब तक हमें उससे बढ़कर कोई वस्तु मूल्यवान नहीं लगती। किन्तु जैसे ही वह उपकार हमें प्राप्त हो जाता है, हम उसी का सबसे कम मूल्य आँकने लगते हैं। ऐसा क्यों होता है कि हम प्राप्त उपकारों को भूल जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमें और अधिक पाने की लालसा लगी रहती है। हमारा ध्यान इस बात पर नहीं रहता कि हमें अब तक क्या-क्या मिल चुका है। हम केवल अगली माँग और अगली प्राप्ति के बारे में सोचते रहते हैं। धन, सम्मान, सत्ता और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ जो हमारी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान प्रतीत होती हैं जबकि वास्तव में उनका मूल्य बहुत कम है। हमें सत्य और सदाचार के मार्ग से भटका देती हैं। हम वस्तुओं का वास्तविक मूल्यांकन करना ही नहीं जानते। इसलिए हमें अपने निर्णयों का आधार लोकमत को नहीं बनाना चाहिए। हमें वस्तुओं के वास्तविक स्वभाव को देखना चाहिए। इन बाहरी वस्तुओं में अपने-आप में ऐसा कुछ भी अद्भुत नहीं है जो हमारे मन को आकर्षित करे। उन्हें आकर्षक बनाने वाली केवल हमारी वह आदत है जिसके कारण हम उनका आदर और प्रशंसा करते आए हैं। वे इसलिए मूल्यवान नहीं मानी जातीं कि वे वास्तव में वांछनीय हैं; बल्कि वे इसलिए वांछनीय प्रतीत होती हैं क्योंकि लोग उन्हें मूल्यवान मानते हैं। इस प्रकार, पहले व्यक्तियों की भूल से समाज में एक भ्रम उत्पन्न होता है, और फिर वही सामाजिक भ्रम आगे चलकर प्रत्येक व्यक्ति को फिर से भ्रमित करता रहता है।

    किन्तु चूँकि हम सामान्यतः लोकमत पर विश्वास करते हैं तो इस विषय में भी हमें उसी पर विश्वास करना चाहिए कि कृतज्ञता से बढ़कर कोई सद्गुण और कोई सम्माननीय गुण नहीं है। सभी राष्ट्र, यहाँ तक कि सबसे असभ्य माने जाने वाले लोग भी इस बात पर एकमत हैं। इस विषय में सज्जन और दुष्ट, दोनों समान रूप से सहमत हैं। कुछ लोग सुख को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं जबकि कुछ कठिन परिश्रम और तपस्या को श्रेष्ठ समझते हैं। कुछ कहते हैं कि दुख सबसे बड़ी बुराई है, तो कुछ का मत है कि दुख बुराई ही नहीं है। कोई धन को सबसे बड़ा शुभ मानता है तो कोई कहता है कि धन मानव जीवन के लिए अभिशाप है। सबसे बड़ा धन वही है जहाँ भाग्य के पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी शेष न हो। इन सब मतभेदों के बावजूद एक बात ऐसी है, जिस पर सभी एक स्वर से सहमत हैं, जब किसी ने हमारा उपकार किया हो तो हमें उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। इतने विविध विचारों वाले लोग भी इस एक विषय पर एकमत हैं। फिर भी विडंबना यह है कि अनेक बार हम उपकार के बदले अपकार कर बैठते हैं। लोगों के कृतघ्न होने का पहला कारण यह है कि वे उतने कृतज्ञ हो ही नहीं पाते, जितना उन्हें होना चाहिए।

    यह पागलपन अब इतनी चरम सीमा तक पहुँच गया है कि किसी पर बहुत बड़ा उपकार करना भी अत्यंत जोखिम भरा हो गया है। क्योंकि जिसे उपकार प्राप्त होता है, वह उसका प्रतिदान न कर पाने की लज्जा से इतना व्याकुल हो उठता है कि वह यही चाहता है कि वह व्यक्ति ही न रहे, जिसके प्रति उसे अपना ऋण चुकाना है।जो कुछ तुम्हें दिया गया है, उसे अपने पास ही रहने दो। मैं उसे वापस नहीं माँगता। न मैं उस पर कोई आग्रह करता हूँ। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारी सहायता बिना किसी भय और दंड के कर सकूँ। उस घृणा से अधिक घातक कोई घृणा नहीं होती, जो इस लज्जा से उत्पन्न होती है कि मनुष्य किसी के उपकार का उचित प्रतिदान नहीं कर सका और इस प्रकार उस उपकार को व्यर्थ जाने दिया।


अभी के लिए विदा 

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उपकार और अपकार के बारे में -- पत्र 79

 प्रिय लूसीलियस  तुम शिकायत करते हो कि तुम्हें एक कृतघ्न व्यक्ति मिला। यदि ऐसा पहली बार हुआ है तो तुम्हें या तो अपने सौभाग्य का आभारी होना च...