प्रिय लूसीलियस
आज मुझे हमारी भाषा की अत्यन्त दरिद्रता बल्कि उसकी लगभग निर्धनता का अनुभव पहले से कहीं अधिक तीव्रता से हुआ। संयोगवश हम प्लेटो के विषय में चर्चा कर रहे थे। ऐसी असंख्य बातें सामने आईं जिनके लिए हमें शब्दों की आवश्यकता थी पर वे हमें मिल नहीं सके। वास्तव में, उनमें से कुछ बातों के लिए कभी शब्द विद्यमान थे। किन्तु हमारी आज की अत्यधिक परिष्कार-प्रियता और भाषाई नखरों के कारण वे प्रचलन से लुप्त हो गए हैं।
निर्धन और फिर भी नखरेबाज़! यह तो असह्य बात है। यूनानी लोग जिस डंक मारने वाली मक्खी को ओएस्ट्रुस कहते हैं, जो पशुओं के झुंड को आतंकित करके उन्हें तितर-बितर कर देती है और पहाड़ों की ढलानों पर इधर-उधर भगा देती है, उसे हमारी भाषा में पहले असिलुस कहा जाता था। इसके प्रमाण के लिए तुम वर्जिल का कथन देख सकते हो—
“अल्बुर्नुस के प्रदेश में और सिलारिस के निकट हरे-भरे बलूत के वनों में एक मक्खी बहुतायत से पाई जाती है। रोमवासी उसे ‘असिलुस’ कहते हैं जबकि यूनानी उसे ‘ओएस्ट्रुस’ कहते हैं। वह अत्यन्त उग्र होती है। उसकी तीखी भनभनाहट से भयभीत पशुओं के झुंड पूरे जंगल में तितर-बितर हो जाते हैं।”
मेरा विचार है कि इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह पुराना शब्द अब प्रचलन में नहीं रहा। पर इस विषय को यहीं संक्षेप में समाप्त करता हूँ। कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके आगे आज उपसर्ग (प्रिफिक्स) लगाया जाता है। जबकि पहले वे बिना उपसर्ग के ही प्रयुक्त होते थे। उदाहरण के लिए, लोग पहले 'तलवार से निर्णय करना' कहते थे न कि 'तलवार से निर्णीत करना' (अर्थात् उपसर्ग सहित रूप का प्रयोग नहीं करते थे)। इस बात का प्रमाण भी वर्जिल से मिलता है—
आज उस शब्द का बिना उपसर्ग वाला प्रयोग पूरी तरह लुप्त हो गया है। इसी प्रकार प्राचीन लोग 'यदि मैं आदेश दूँ' के स्थान पर ऐसा रूप प्रयोग करते थे जिसका अर्थ था 'यदि मैं आदेश करूँ'; बाद के समय में उसके स्थान पर उपसर्गयुक्त रूप प्रचलित हो गया। इस बात के लिए तुम्हें मेरे कथन पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। वर्जिल पर विश्वास करो—
मैंने यह सारा भाषाशास्त्रीय विवेचन इसलिए नहीं किया कि यह दिखा सकूँ कि मैंने व्याकरणाचार्यों और साहित्य-विदों के बीच कितना समय नष्ट किया है बल्कि इसलिए कि तुम्हें यह स्पष्ट कर सकूँ कि एनियस और अकियस की शब्दावली का कितना बड़ा भाग अब प्रचलन से बाहर हो चुका है। यहाँ तक कि वर्जिल जैसे कवि की रचनाओं में भी जिन्हें लोग आज भी प्रतिदिन बड़े ध्यान से पढ़ते हैं। ऐसे अनेक शब्द मिलते हैं जो अब हमारी भाषा से लुप्त हो चुके हैं।
तुम पूछोगे, “इन सब प्रारम्भिक बातों का उद्देश्य क्या है? तुम आखिर किस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते हो?” मैं यह बात तुमसे नहीं छिपाऊँगा। यदि संभव हो तो मैं तुम्हारे कानों को ‘एसेन्शिया’ (essentia) शब्द को स्वीकार करने के लिए तैयार करना चाहता हूँ। यदि यह शब्द तुम्हारे कानों को अप्रिय भी लगे, तब भी मैं इसका प्रयोग करूँगा। इस शब्द के समर्थन में मेरे पास सिसेरो का प्रमाण है। निश्चय ही उनकी भाषिक संपदा पर किसी को संदेह नहीं हो सकता। यदि तुम किसी अधिक निकटवर्ती लेखक का प्रमाण चाहते हो तो मैं फैबियानस का नाम ले सकता हूँ। ऐसे लेखक का जिसकी अभिव्यक्ति अत्यन्त सहज, प्रभावशाली और सुरुचिपूर्ण थी और जिसकी भाषा इतनी शुद्ध थी कि वह हमारे वर्तमान युग के कठोर भाषाई मानकों पर भी खरी उतरती है।
प्रिय लूसीलियस, मैं और क्या कर सकता हूँ? यूनानी शब्द ओउसिया (ousia) का अनुवाद मैं कैसे करूँ? क्योंकि यह एक ऐसा अनिवार्य दार्शनिक पद है, जिसका अर्थ है— वह सत्ता या तत्त्व जो समस्त वस्तुओं का मूल आधार है। इसीलिए मैं तुमसे इस शब्द का प्रयोग करने की अनुमति माँगता हूँ। फिर भी, तुमने जो यह छूट मुझे दी है, उसका उपयोग मैं यथासंभव संयम से करूँगा। संभव है कि मुझे केवल यह संतोष ही पर्याप्त लगे कि आवश्यकता पड़ने पर मैं इसका प्रयोग कर सकता हूँ।
तुमने मुझे यह छूट तो दे दी, पर उससे क्या लाभ? जिस विचार को व्यक्त करने के लिए मैंने अपनी भाषा की अपर्याप्तता की शिकायत की है, उसे मैं लैटिन में किसी भी प्रकार पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। जब तुम्हें यह पता चलेगा कि जिस शब्द का मैं अनुवाद नहीं कर पा रहा हूँ, वह केवल एक ही अक्षरांश (सिलेबल) का है, तब तुम हमारी रोमन भाषा की सीमाओं पर मुझसे भी अधिक खेद व्यक्त करोगे। क्या तुम जानना चाहते हो कि वह शब्द कौन-सा है? वह है— तो ऑन (to on)। तुम शायद यह सोच रहे हो कि मैं कुछ अधिक ही कठिनाई पैदा कर रहा हूँ। जबकि उसका अनुवाद तो सामने ही है—क्वोद एस्ट (quod est), अर्थात् 'जो है'। किन्तु मेरी दृष्टि में 'जो है' (quod est) और तो ऑन (to on) में पर्याप्त अंतर है। मुझे एक संज्ञा के स्थान पर क्रिया का प्रयोग करने के लिए विवश होना पड़ता है। फिर भी, यदि कोई दूसरा उपाय नहीं है, तो मैं 'जो है' (that which is) ही लिखूँगा।
हमारे एक मित्र, जो अत्यन्त विद्वान हैं, आज कह रहे थे कि प्लेटो तो ऑन (to on) शब्द का छह भिन्न अर्थों में प्रयोग करते हैं। मैं उन सभी का वर्णन करूँगा। पर उससे पहले मुझे यह बताना होगा कि जीनस (genus) और प्रजाति (species) जैसी भी चीज़ें होती हैं। इस समय हम उस मूल जीनस की खोज कर रहे हैं जिस पर अन्य सभी प्रजातियाँ निर्भर करती हैं, जिससे सभी विभाजन उत्पन्न होते हैं और जिसके भीतर सभी वस्तुएँ समाहित हैं। यदि हम वस्तुओं को एक-एक करके देखें और पीछे की ओर चलते जाएँ तो अंततः हम उसी मूल तत्त्व तक पहुँच जाएँगे। अरस्तू के अनुसार 'मनुष्य' एक प्रजाति (species) है। 'घोड़ा' एक प्रजाति है। 'कुत्ता' भी एक प्रजाति है। इसलिए हमें उस समान विशेषता की खोज करनी चाहिए जो इन सबको एक सूत्र में बाँधती है। ऐसी किसी व्यापक सत्ता की जो इन सबको अपने भीतर समेटे हुए हो और जिसके अधीन ये सभी आते हों। वह क्या है? वह है, 'प्राणी' (animate creature)। इस प्रकार 'मनुष्य', 'घोड़ा' और 'कुत्ता'— इन सभी के ऊपर एक सामान्य जीनस स्थापित होती है। वह है—'प्राणी'।
किन्तु कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जिनमें जीवन तो होता है पर वे प्राणी (animate creatures) नहीं होतीं। सामान्यतः यह माना जाता है कि अनिमा अर्थात जीवनदायी तत्त्व, वृक्षों और झाड़ियों में भी विद्यमान होता है। इसी कारण हम कहते हैं कि वे भी जीवित रहते हैं और मरते हैं। अतः 'जीवित वस्तुएँ' (living things) इससे भी उच्चतर श्रेणी में आएँगी क्योंकि इस वर्ग के अंतर्गत प्राणी भी आते हैं और वनस्पतियाँ भी।
लेकिन कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जो जीवित नहीं होतीं, जैसे—पत्थर। इसलिए 'जीवित वस्तुओं' से भी पहले एक और व्यापक श्रेणी होगी और वह है— 'शरीर' (body)। मैं इस जीनस (genus) का विभाजन इस प्रकार करूँगा। सभी शरीर दो प्रकार के होते हैं या तो वे जीवित होते हैं या फिर निर्जीव।
किन्तु 'शरीर' (body) से भी ऊपर एक और व्यापक श्रेणी है। क्योंकि हम कहते हैं कि कुछ वस्तुएँ साकार (corporeal) हैं और कुछ निराकार (incorporeal)। इसलिए वह कौन-सी जीनस होगी जिसके अंतर्गत ये दोनों आती हैं? वह वही होगी जिसे हमने, यद्यपि यह नाम पूरी तरह उपयुक्त नहीं है, 'जो है' (that which is) कहा है। इस जीनस का विभाजन इस प्रकार होगा, 'जो है' (that which is) या तो साकार है या निराकार। यही, यदि मुझे ऐसा कहने की अनुमति हो, प्रथम और प्राथमिक जीनस (primary genus) है। वह सार्वभौमिक जाति जिसके ऊपर कोई दूसरी जाति नहीं है। अन्य सभी जातियाँ वास्तव में जातियाँ तो हैं पर साथ ही वे किसी और व्यापक जाति की प्रजातियाँ (species) भी हैं। उदाहरण के लिए, 'मनुष्य एक जीनस (genus) है क्योंकि उसके भीतर अनेक प्रजातियाँ या उपवर्ग समाहित हैं जैसे, विभिन्न राष्ट्र (यूनानी, रोमी, पार्थियन) या विभिन्न वर्ण (श्वेत, श्याम, पीत)। इसके अतिरिक्त उसके अंतर्गत अनेक व्यक्ति भी आते हैं जैसे, कैटो, सिसेरो और लुक्रेतियस। इस प्रकार 'मनुष्य' उस दृष्टि से जाति है कि उसके अंतर्गत अनेक इकाइयाँ आती हैं। किन्तु वह प्रजाति भी है क्योंकि वह स्वयं किसी अधिक व्यापक श्रेणी के अधीन है। परन्तु 'जो है' (that which is) यह सार्वभौमिक और मूल जाति, अपने ऊपर किसी अन्य जाति को नहीं रखती। वही समस्त वस्तुओं का प्रारम्भिक आधार है। अन्य सभी श्रेणियाँ उसी के अधीन आती हैं।
स्टोइक दार्शनिक इसके भी ऊपर एक और इससे भी अधिक मूलभूत जीनस (genus) स्थापित करना चाहते हैं। उसके विषय में मैं अभी थोड़ी देर में कहूँगा। पर पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जिस जाति का मैंने अभी वर्णन किया है, उसे सर्वोच्च स्थान देना उचित है क्योंकि उसके भीतर सभी वस्तुएँ समाहित हैं। मैं 'जो है' (that which is) का विभाजन इस प्रकार करता हूँ। या तो वह साकार (corporeal) है या निराकार (incorporeal)। इसके अतिरिक्त कोई तीसरी प्रजाति (species) नहीं है। अब मैं 'शरीर' (body) का विभाजन कैसे करूँ? इस प्रकार कि सभी शरीर या तो सजीव हैं या निर्जीव। फिर 'सजीव वस्तुओं' (living things) का विभाजन कैसे करूँ? एक प्रकार से इस प्रकार, कुछ में मन (mind) होता है और कुछ में केवल जीवन (life)। या दूसरे प्रकार से इस प्रकार, कुछ में प्रेरणा या स्वाभाविक गति (impulse) की क्षमता होती है। वे चलते-फिरते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं जबकि कुछ पृथ्वी में जड़ें जमाए रहते हैं, अपनी जड़ों के माध्यम से पोषण ग्रहण करते हैं और बढ़ते हैं। अब 'प्राणियों' (animate creatures) का विभाजन किन प्रजातियों में किया जाए? वे या तो नश्वर (mortal) होते हैं या अमर (immortal)।
कुछ स्टोइक दार्शनिकों का मत है कि सबसे मूलभूत जीनस (primary genus) 'कुछ' (something) है। वे ऐसा क्यों मानते हैं। इसका कारण भी मैं यहाँ बताता हूँ। वे कहते हैं, 'विश्व-प्रकृति में कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं जो वास्तव में अस्तित्व रखती हैं। कुछ ऐसी हैं जो अस्तित्व नहीं रखतीं। फिर भी, जो वस्तुएँ वास्तव में नहीं हैं, वे भी किसी न किसी रूप में विश्व के दायरे में आती हैं अर्थात वे जो केवल मन में उत्पन्न होती हैं, जैसे सेंटौर (आधा मनुष्य, आधा घोड़ा), दैत्य, और वे सभी रूप जिनकी रचना कल्पनाशक्ति करती है। वे मन में एक प्रकार की छवि तो बना लेते हैं। यद्यपि उनका वास्तविक अस्तित्व या पदार्थ (substance) नहीं होता।”
अब मैं उस विषय पर लौटता हूँ जिसका उल्लेख करने का मैंने तुमसे वचन दिया था कि प्लेटो 'जो है' (that which is) का छह प्रकार से विभाजन कैसे करते हैं। पहला 'जो है' ऐसा है जिसे न आँखों से देखा जा सकता है न स्पर्श किया जा सकता है और न ही किसी अन्य इन्द्रिय से ग्रहण किया जा सकता है। उसे केवल बुद्धि द्वारा समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, 'मनुष्य' अपनी सामान्य या जातिगत (generic) अवस्था में आँखों के सामने उपस्थित नहीं होता। आँखों से तो केवल उसका विशिष्ट रूप (specific) दिखाई देता है जैसे, सिसेरो या कैटो। इसी प्रकार 'प्राणी' (animate creature) दिखाई नहीं देता। वह केवल विचार का विषय है। जो दिखाई देते हैं, वे उसकी प्रजातियाँ हैं जैसे, घोड़ा और कुत्ता।
प्लेटो जिन वस्तुओं को 'जो है' (that which is) कहते हैं, उनमें दूसरी वह है जो अन्य सभी वस्तुओं से श्रेष्ठ और उनसे ऊपर है। उनके अनुसार यही 'सर्वोच्च सत्ता' (preeminent being) है। जिस प्रकार 'कवि' शब्द सामान्यतः उन सभी व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है जो कविता रचते हैं, परन्तु यूनानियों में समय के साथ यह शब्द केवल एक ही व्यक्ति का बोध कराने लगा है। इसलिए जब तुम 'कवि' शब्द सुनते हो तो तुम्हारे मन में केवल 'होमर' का ही विचार आता है। तो यह 'सर्वोच्च सत्ता' क्या है? निस्संदेह वह ईश्वर है क्योंकि वही समस्त वस्तुओं से महान और अधिक सामर्थ्यवान है।
तीसरा प्रकार उन वस्तुओं का है जिन्हें वास्तविक और शुद्ध अर्थ में 'अस्तित्ववान' कहा जाता है। उनकी संख्या असंख्य है, पर वे हमारी दृष्टि की पहुँच से परे हैं। क्या तुम पूछते हो कि वे क्या हैं? वे प्लेटो के दर्शन की विशिष्ट अवधारणाएँ हैं, जिन्हें वे आइडियाज़ (Ideas) कहते हैं। इन्हीं से वे सभी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं जिन्हें हम देखते हैं। प्रत्येक वस्तु का रूप इन्हीं के अनुरूप निर्मित होता है। ये आइडियाज़ अमर हैं, अपरिवर्तनशील हैं और अविनाशी हैं। अब आइडिया क्या है या अधिक ठीक कहें, प्लेटो के अनुसार आइडिया क्या है— इसे सुनो। 'आइडिया उन वस्तुओं का शाश्वत प्रतिरूप (eternal model) है जो प्रकृति के अनुसार अस्तित्व में आती हैं।' इस परिभाषा को तुम्हारे लिए और स्पष्ट करने के उद्देश्य से मैं इसमें थोड़ा स्पष्टीकरण जोड़ता हूँ। मान लो कि मैं तुम्हारा चित्र बनाना चाहता हूँ। उस चित्र के लिए तुम मेरे सामने एक प्रतिरूप (model) के रूप में उपस्थित हो। तुम्हें देखकर मेरा मन तुम्हारे रूप की एक विशेष छवि ग्रहण करता है और उसी के अनुसार अपने कार्य को आकार देता है। इसलिए तुम्हारा वह रूप, जो मुझे मार्गदर्शन देता है और मेरे चित्र को स्वरूप प्रदान करता है तथा जिससे उसकी प्रतिकृति बनाई जाती है, वही आइडिया है। इसी प्रकार प्रकृति में ऐसे असंख्य शाश्वत प्रतिरूप विद्यमान हैं। मनुष्यों के, विभिन्न प्रकार की मछलियों के, वृक्षों के और अन्य सभी वस्तुओं के। प्रकृति जिन-जिन वस्तुओं को उत्पन्न करती है, वे सभी इन्हीं शाश्वत प्रतिरूपों के अनुसार आकार ग्रहण करती हैं।
चौथा स्थान एइदोस (eidos) अर्थात रूप (form) का है। अब यह एइदोस क्या है? इसे समझने के लिए तुम्हें ध्यानपूर्वक सुनना होगा। यदि विषय कठिन लगे तो उसका दोष मुझे नहीं प्लेटो को देना क्योंकि इस प्रकार के सूक्ष्म भेद बिना कठिनाई के समझे नहीं जा सकते। अभी कुछ देर पहले मैंने एक चित्रकार का उदाहरण दिया था। जब वह चित्रकार रंगों से वर्जिल का चित्र बनाना चाहता था तो वह स्वयं वर्जिल को देखता था। वर्जिल का वास्तविक रूप जो बनने वाले चित्र का आदर्श प्रतिरूप (model) था, वही आइडिया (Idea) था। उस प्रतिरूप को देखकर कलाकार ने जो रूप अपने मन में ग्रहण किया और जिसे उसने अपनी कृति में उतार दिया, वही एइदोस (eidos) है। अब तुम पूछोगे कि दोनों में अंतर क्या है? एक आदर्श प्रतिरूप (model) है। दूसरा उस प्रतिरूप से ग्रहण किया गया रूप (form) जिसे कलाकार अपनी रचना में मूर्त रूप देता है। कलाकार पहले का अनुकरण करता है और दूसरे का निर्माण करता है। उदाहरण के लिए, किसी मूर्ति का एक रूप होता है। वही उसका एइदोस है। पर जिस मूल प्रतिरूप को देखकर मूर्तिकार ने वह मूर्ति बनाई, उसका भी एक रूप होता है वही आइडिया है। यदि तुम्हें यह भेद और स्पष्ट चाहिए तो इसे इस प्रकार भी समझ सकते हो। एइदोस कृति (work) के भीतर विद्यमान होता है जबकि आइडिया कृति के बाहर होता है। केवल बाहर ही नहीं बल्कि कृति के अस्तित्व में आने से पहले से ही विद्यमान रहता है।
पाँचवाँ प्रकार उन वस्तुओं का है जिनका अस्तित्व सामान्य अर्थ में माना जाता है। यही वे वस्तुएँ हैं जिनसे हमारा प्रत्यक्ष संबंध होता है। जैसे, 'समस्त वस्तुएँ', 'मनुष्य', 'पालतू पशु' और 'वस्तुएँ'। छठा प्रकार उन वस्तुओं का है जिनका अस्तित्व केवल एक प्रकार से या मानो अस्तित्व जैसा है जैसे, शून्य (void) और समय (time)।
प्लेटो उन सभी वस्तुओं को, जिन्हें हम देख सकते हैं या स्पर्श कर सकते हैं, उन वस्तुओं की श्रेणी से बाहर रखते हैं जो उनके मत में वास्तविक और शुद्ध अर्थ में 'अस्तित्ववान' हैं। क्योंकि वे निरंतर परिवर्तनशील हैं। वे लगातार घटती और बढ़ती रहती हैं। हममें से कोई भी व्यक्ति वृद्धावस्था में वैसा नहीं रहता जैसा वह युवावस्था में था। हममें से कोई भी आज प्रातः वैसा नहीं है जैसा वह कल था। हमारे शरीर तीव्र गति से बहती हुई नदियों की तरह निरंतर बहते चले जा रहे हैं। तुम जो कुछ भी देखते हो, वह समय के साथ-साथ निरंतर बीतता और बदलता रहता है। हमारी दृष्टि के सामने उपस्थित कोई भी वस्तु स्थिर नहीं रहती। मैं स्वयं भी, जबकि मैं तुम्हें इन परिवर्तनों का वर्णन कर रहा हूँ, उसी दौरान बदल चुका हूँ।
इसी का आशय हेराक्लाइटस के उस कथन से है, “हम एक ही नदी में दो बार उतरते भी हैं और नहीं भी उतरते।” नदी का नाम तो वही रहता है, पर उसका जल आगे बढ़ चुका होता है। यह बात नदी के संबंध में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, पर ठीक यही स्थिति मनुष्य की भी है। हमें भी समय की धारा निरंतर बहाए लिए जा रही है। उसका प्रवाह किसी नदी से कम तीव्र नहीं है। इसी कारण मुझे आश्चर्य होता है कि हम कितने विवेकहीन हैं, जो इस शरीर जैसी क्षणभंगुर वस्तु से इतना प्रेम करते हैं। मृत्यु से इतने भयभीत रहते हैं जबकि प्रत्येक क्षण हमारी पूर्व अवस्था की मृत्यु ही तो है। जब वही घटना प्रतिदिन घट रही है तो उसके केवल एक बार घटने से भयभीत होने का क्या कारण है?
मैं यह बता चुका हूँ कि मनुष्य एक ऐसा पदार्थ है जो निरंतर परिवर्तनशील है, नश्वर है और हर प्रकार के प्रभाव के अधीन है। समस्त ब्रह्मांड भी। यद्यपि वह चिरस्थायी और अजेय है। फिर भी निरंतर परिवर्तित होता रहता है और कभी भी एक-सा नहीं रहता। क्योंकि उसके भीतर जो कुछ पहले था, वह सब तो बना रहता है। परंतु वह उन्हें पहले की अपेक्षा भिन्न रूप में धारण करता है। वह केवल उनके विन्यास और व्यवस्था को बदल देता है।
तुम कहोगे, “तुम्हारे इन सूक्ष्म भेदों से मुझे क्या लाभ होने वाला है?” यदि मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा, प्रत्यक्ष रूप से कोई विशेष लाभ नहीं। किन्तु जैसे कोई नक्काशी करने वाला कारीगर, लंबे समय तक अत्यन्त सूक्ष्म काम करते-करते थक जाने पर, अपनी आँखों को विश्राम देने और, जैसा हम कहते हैं, उन्हें फिर से तरोताज़ा करने के लिए कुछ देर अपना ध्यान हटा लेता है उसी प्रकार हमें भी कभी-कभी अपने मन को विश्राम देना चाहिए और किसी हल्के-फुल्के बौद्धिक मनोरंजन से उसे ताज़गी प्रदान करनी चाहिए। फिर भी, हमारा मनोरंजन भी सार्थक होना चाहिए। यदि तुम उसमें मन लगाकर भाग लोगे तो उससे भी तुम्हें कुछ-न-कुछ ऐसा अवश्य प्राप्त होगा जो भविष्य में तुम्हारे लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है।
प्रिय लूसीलियस, मेरी तो यही आदत है कि मैं प्रत्येक विचार से, चाहे वह दर्शन से कितना ही दूर क्यों न हो— कुछ-न-कुछ उपयोगी बात निकालने का प्रयास करता हूँ और उसे किसी अच्छे उद्देश्य के लिए काम में लाता हूँ। अभी जिन विषयों की मैंने चर्चा की, उनसे चरित्र-सुधार का भला क्या संबंध हो सकता है? प्लेटो के आइडियाज़ मुझे एक बेहतर मनुष्य कैसे बना सकते हैं? उनसे मुझे ऐसा क्या मिलेगा जो मेरी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में सहायता करे? शायद केवल यही शिक्षा कि वे सभी वस्तुएँ, जो हमारी इन्द्रियों को लुभाती हैं, हमें आकर्षित करती हैं और हमारी वासनाओं को उत्तेजित करती हैं, प्लेटो के अनुसार वास्तविक अर्थ में अस्तित्ववान नहीं हैं। इस प्रकार वे केवल आभास हैं। क्षणिक प्रतीतियाँ जो थोड़े समय के लिए दिखाई देती हैं। उनमें से कोई भी स्थायी या दृढ़ नहीं है। फिर भी हम उन्हें इस प्रकार चाहते हैं, मानो वे सदा बनी रहेंगी या मानो वे सदा के लिए हमारी ही बनी रहेंगी।
हम स्वयं भी दुर्बल और परिवर्तनशील हैं। भ्रमों के बीच खड़े हैं। इसलिए हमें अपने मन को उन वस्तुओं की ओर लगाना चाहिए जो शाश्वत हैं। हमें ऊपर उठना चाहिए और आश्चर्य के साथ समस्त वस्तुओं के शाश्वत प्रतिरूपों का तथा उनके बीच निवास करने वाले ईश्वर का दर्शन करना चाहिए। चूँकि ईश्वर अपनी सृष्टि की वस्तुओं को अमर नहीं बना सकता था क्योंकि पदार्थ की प्रकृति इसमें बाधक थी इसलिए अपनी दिव्य व्यवस्था में उसने हमें मृत्यु के विरुद्ध यह उपाय प्रदान किया कि हम विवेक के द्वारा शरीर की सीमाओं और दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करें। वास्तव में सभी वस्तुएँ इसलिए बनी नहीं रहतीं कि वे स्वभाव से अमर हैं बल्कि इसलिए कि उनका शासक उनकी रक्षा करता है। यदि वे स्वयं अमर होतीं तो उन्हें किसी संरक्षक की आवश्यकता ही न होती। सृष्टिकर्ता अपनी शक्ति से पदार्थ की दुर्बलता पर विजय पाकर उन्हें सुरक्षित रखता है। अतः हमें उन सभी वस्तुओं का तिरस्कार करना चाहिए जो इतनी तुच्छ हैं कि यह भी निश्चित नहीं कहा जा सकता कि उनका वास्तविक अस्तित्व है भी या नहीं।
साथ ही हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि यदि दैवी व्यवस्था (प्रोविडेन्स) इस समस्त ब्रह्मांड की रक्षा करती है जो हमारी ही भाँति नश्वर है तो हमारी अपनी विवेकपूर्ण व्यवस्था भी इस तुच्छ शरीर के जीवन को कुछ समय तक और बढ़ा सकती है, बशर्ते हम उन इच्छाओं पर शासन और नियंत्रण रखना सीख लें जो प्रायः मृत्यु का कारण बनती हैं। प्लेटो ने अपने जीवन का सावधानीपूर्वक संचालन करके वृद्धावस्था तक जीवन प्राप्त किया। यह सत्य है कि उनका शरीर स्वभावतः सुदृढ़ था और वे सौभाग्यशाली भी थे। उनके चौड़े वक्षस्थल के कारण ही उन्हें 'प्लेटो' नाम मिला था। पर समुद्री यात्राओं के कष्टों ने उनके स्वास्थ्य को बहुत क्षीण कर दिया था। फिर भी, संयमित जीवन, अपने स्वास्थ्य की सतर्क देखभाल और इन्द्रिय-वासना को भड़काने वाली वस्तुओं पर नियंत्रण के कारण, उन्होंने अनेक बाधाओं के बावजूद दीर्घायु प्राप्त की। मेरा विश्वास है कि तुम जानते होगे कि अपनी इस सावधानीपूर्ण जीवन-पद्धति के कारण प्लेटो ने पूरे इक्यासी वर्ष का जीवन पूरा किया और अपने जन्मदिन के ही दिन, एक भी दिन कम हुए बिना, उनका देहावसान हुआ।
इसी कारण एथेंस में उपस्थित कुछ फ़ारसी ज्योतिषियों ने उनकी मृत्यु के बाद उनके सम्मान में अग्नि-बलि अर्पित की। उनका विश्वास था कि चूँकि प्लेटो ने नौ गुणा नौ अर्थात इक्यासी जो उनके अनुसार सर्वाधिक पूर्ण संख्या थी, को पूरा करके जीवन समाप्त किया था। इसलिए उनका भाग्य साधारण मनुष्यों से कहीं अधिक महान था। किन्तु मेरा विचार है कि यदि तुम्हें उतने वर्षों के बदले कुछ दिन कम स्वीकार करने पड़ें और उस प्रकार के सम्मान का त्याग भी करना पड़े तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। फिर भी, संयमपूर्ण जीवन वृद्धावस्था को कुछ और लंबा अवश्य कर सकता है। यद्यपि मैं यह नहीं मानता कि वृद्धावस्था ऐसी वस्तु है जिसकी लालसा करनी चाहिए, फिर भी उसे ठुकराना भी उचित नहीं है। जहाँ तक संभव हो, अपने ही साथ बने रहना सुखद है, बशर्ते कि तुमने स्वयं को ऐसा बना लिया हो कि तुम्हारा अपना साथ तुम्हें अच्छा लगे।
अब मैं उस प्रश्न पर अपना मत व्यक्त करता हूँ जो तुमने उठाया है। क्या अत्यन्त जर्जर वृद्धावस्था का तिरस्कार करना उचित है? अर्थात क्या मनुष्य को मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहने के बजाय स्वयं अपने जीवन का अंत कर देना चाहिए? मेरा विचार है कि केवल निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा करना कायरता के बहुत निकट है। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति मदिरा के प्रति इतना आसक्त हो कि वह पात्र की अंतिम बूँद तक ही नहीं बल्कि तलछट तक भी पी जाए। किन्तु मेरा प्रश्न यह है, क्या जीवन का अंतिम भाग वास्तव में उसी तलछट के समान है या फिर वही उसका सबसे निर्मल और श्रेष्ठ अंश है? बशर्ते कि मन विकृत न हुआ हो, इन्द्रियाँ सुरक्षित हों और मन की सेवा करने में समर्थ हों तथा शरीर समय से पहले इतना जर्जर और निष्प्राण न हो गया हो कि वह अपने स्वाभाविक कार्य भी न कर सके। क्योंकि इसमें बहुत बड़ा अंतर है कि कोई व्यक्ति जीवन को लंबा कर रहा है या केवल मृत्यु की प्रक्रिया को लंबा खींच रहा है। पर यदि शरीर अब किसी प्रकार की सेवा करने में समर्थ नहीं रहा तो फिर उस पीड़ित मन को मुक्त कर देना अनुचित क्यों माना जाए?
संभव है कि आवश्यकता पड़ने से कुछ पहले ही निर्णय लेना अधिक उचित हो ताकि जब वह समय वास्तव में आ पहुँचे, तब ऐसा न हो कि तुम निर्णय लेने में ही असमर्थ हो जाओ। दुःख और असहायता से भरा जीवन जीने का जोखिम, शीघ्र मृत्यु के जोखिम से कहीं अधिक बड़ा है। यदि ऐसा है तो थोड़े-से समय का त्याग करके इतने बड़े जोखिम से बच निकलने का अवसर न लेना मूर्खता ही होगी। बहुत कम लोगों को ऐसा सौभाग्य मिलता है कि दीर्घ वृद्धावस्था उन्हें बिना किसी शारीरिक या मानसिक क्षति के मृत्यु तक पहुँचा दे। इसके विपरीत, अधिकांश लोग अपने अंगों के उपयोग से वंचित होकर बिस्तर तक सीमित हो जाते हैं। क्या तुम्हें सचमुच यह अधिक क्रूर प्रतीत होता है कि मनुष्य अपने जीवन का कुछ अंश छोड़ दे बजाय इसके कि वह अपने जीवन का अंत स्वयं करने का अधिकार ही खो बैठे?
यह मत सोचकर मेरी बात सुनने से इनकार मत करो कि यह विचार सीधे तुम्हारे ही विषय में है। मैं जो कह रहा हूँ, उसका मूल्यांकन उसके अपने गुण-दोषों के आधार पर करो। मैं वृद्धावस्था का त्याग तब तक नहीं करूँगा, जब तक वह मुझे मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ रहने दे अर्थात मेरे उस श्रेष्ठ भाग, मेरे विवेक और मेरे मन को अक्षुण्ण रखे। पर यदि वह मेरे मन पर आघात करने लगे, उसे धीरे-धीरे नष्ट करने लगे और मुझे केवल जीवित रखे, जीवन जीने योग्य न छोड़े, तब मैं उस जर्जर और ढहते हुए भवन से स्वयं बाहर निकल जाऊँगा। मैं केवल रोग से बचने के लिए मृत्यु का वरण नहीं करूँगा, यदि वह रोग उपचार योग्य हो और मेरे मन के लिए बाधक न हो। केवल पीड़ा के कारण भी मैं अपने ऊपर हाथ नहीं उठाऊँगा क्योंकि ऐसी मृत्यु पराजय होगी। किन्तु यदि मुझे यह निश्चित रूप से ज्ञात हो जाए कि मुझे निरंतर बिना किसी विराम के, पीड़ा सहनी पड़ेगी तो मैं वहाँ से विदा हो जाऊँगा। पीड़ा के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि वह मुझे उन सभी बातों से वंचित कर देगी जो जीवन को जीने योग्य बनाती हैं। जो व्यक्ति केवल पीड़ा के कारण मर जाता है, वह दुर्बल और आलसी है। जो व्यक्ति केवल पीड़ा सहने के लिए ही जीवित रहता है, वह मूर्ख है।
पर मैं बहुत अधिक विस्तार में चला गया हूँ। इस विषय के अतिरिक्त भी इतनी सामग्री शेष है कि उस पर पूरे दिन चर्चा की जा सकती है। किन्तु जो व्यक्ति एक पत्र तक समाप्त नहीं कर पा रहा, वह अपने जीवन का अंत कैसे करेगा? अतः अब विदा... यह विदा का शब्द तुम निश्चय ही मृत्यु पर मेरे इस निरंतर चले आ रहे विचार-विमर्श से अधिक प्रसन्नता के साथ पढ़ोगे।
सेनेका
No comments:
Post a Comment