Tuesday, 14 July 2026

आनंद के संदर्भ में -- पत्र - 59

 प्रिय लूसीलियस 


आपका पत्र पढ़कर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। यद्यपि आपको मुझे सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग करने की अनुमति देनी होगी। मेरे शब्दों को उनके स्टोइक अर्थों में मत लीजिए। हमारे सिद्धांत के अनुसार 'सुख' (Pleasure) एक दोष है। फिर भी, जैसा भी हो, 'सुख' वह शब्द है जिसका प्रयोग हम सामान्यतः मन की प्रसन्न अवस्था के लिए करते हैं।



    मैं जानता हूँ कि यदि हम शब्दों को अपने दार्शनिक नियमों के अनुसार ही बाँध दें तो 'सुख' निंदनीय है। जबकि 'आनंद' केवल बुद्धिमान व्यक्ति का गुण है क्योंकि आनंद उस मन की उन्नत अवस्था है जो वास्तविक और अपने स्वाभाविक शुभ की ओर उन्मुख होता है। फिर भी, सामान्य व्यवहार में हम अक्सर कहते हैं कि अमुक व्यक्ति के कौंसल (Consul) चुने जाने पर हमें बहुत आनंद हुआ या किसी के विवाह पर या उसकी पत्नी के पुत्र-जन्म देने पर। जबकि ये घटनाएँ आनंद का कारण होने से बहुत दूर, प्रायः भविष्य के दुःख का आरंभ सिद्ध होती हैं। क्योंकि आनंद का स्वभाव ही ऐसा है कि वह कभी समाप्त नहीं होता और न ही अपने विपरीत में परिवर्तित होता है। इसलिए जब हमारे कवि वर्जिल कहते हैं, 'मन के दुष्ट आनंद' तो उन्होंने यह बात साहित्यिक दृष्टि से तो अत्यन्त सुंदर कही है, पर दार्शनिक दृष्टि से यह शुद्ध नहीं है क्योंकि कोई भी वास्तविक आनंद दुष्ट नहीं हो सकता। उन्होंने यहाँ 'आनंद' शब्द का प्रयोग वास्तव में 'सुख-भोग' के अर्थ में किया है। इसी प्रकार अपना आशय व्यक्त किया है क्योंकि जिन लोगों की वे बात कर रहे हैं, वे उन वस्तुओं से प्रसन्न होते हैं जो वास्तव में उनके लिए अहितकर होती हैं।

    फिर भी, यह कहने में मैं गलत नहीं था कि आपका पत्र पढ़कर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। क्योंकि यदि कोई अविवेकी व्यक्ति किसी सम्मानजनक कारण से भी प्रसन्न होता है, तब भी मैं उसकी उस भावना को 'सुख' ही कहूँगा। क्योंकि वह अस्थिर होती है, शीघ्र ही अपने विपरीत रूप में बदल जाती है। किसी मिथ्या शुभ में विश्वास के कारण उत्पन्न होती है। इसलिए वह अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाती और सीमा का अतिक्रमण कर बैठती है।

    लेकिन अब मैं अपने मूल विषय पर लौटता हूँ और तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारे पत्र में मुझे सबसे अधिक क्या अच्छा लगा। तुम्हारा अपनी भाषा पर पूरा नियंत्रण है। तुम अपनी वाक्पटुता के प्रवाह में बह नहीं जाते और न ही उसे अपनी इच्छित सीमा से अधिक बढ़ने देते हो। बहुत-से लोग किसी आकर्षक वाक्यांश के मोह में पड़कर उस विषय से भटक जाते हैं, जिस पर वे लिखना शुरू करते हैं। तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होता। तुम्हारा प्रत्येक वाक्य संक्षिप्त है और विषय के बिल्कुल अनुकूल है। तुम उतना ही कहते हो जितना कहना चाहते हो, किंतु तुम्हारे शब्दों का अर्थ उनसे कहीं अधिक व्यक्त कर देता है। यह एक और भी महत्त्वपूर्ण बात का संकेत है। यह दर्शाता है कि तुम्हारा मन भी किसी अनावश्यक या अतिशयोक्तिपूर्ण विचार से भरा हुआ नहीं है।

    हाँ, मुझे कुछ रूपक अवश्य मिले, पर वे ऐसे नहीं थे जो अत्यधिक साहसिक या जोखिमपूर्ण हों बल्कि वे पहले से प्रचलित और स्वीकृत रूपक थे। मुझे बिंबों का भी प्रयोग मिला। यदि कोई यह कहे कि बिंबों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और उन्हें केवल कवियों के लिए ही उचित माने तो मैं समझूँगा कि उसने हमारे प्राचीन लेखकों को एक बार भी नहीं पढ़ा है। वे ऐसे समय के लेखक थे, जब शैलीगत आडंबर को निरंतर लक्ष्य नहीं बनाया जाता था। वे सरलता से लिखते थे और इस प्रकार अपनी बात कहते थे कि उसका आशय स्पष्ट रूप से समझ में आ जाए। उनकी रचनाएँ उपमाओं से परिपूर्ण हैं। मेरे विचार में उपमाएँ आवश्यक हैं। इसलिए नहीं कि कवि उनका प्रयोग करते हैं बल्कि इसलिए कि वे हमारी बौद्धिक दुर्बलता का सहारा बनती हैं तथा विषय को वक्ता और श्रोता, दोनों के लिए अधिक स्पष्ट और सजीव बना देती हैं।

    संयोग से, मैं अभी-अभी सेक्स्टियस को पढ़ रहा था। एक कठोर और दृढ़ स्वभाव का व्यक्ति। उसके दर्शन के शब्द भले ही यूनानी हों पर उसके आदर्श और मूल्य पूरी तरह रोमन हैं। उसके द्वारा दी गई एक उपमा ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। वह उस सेना का उदाहरण देता है जो वर्गाकार (चौकोर) व्यूह में आगे बढ़ती है और युद्ध के लिए हर समय तैयार रहती है क्योंकि यह आशंका रहती है कि शत्रु किसी भी दिशा से आक्रमण कर सकता है। वह कहता है, “बुद्धिमान व्यक्ति को भी यही करना चाहिए। उसे अपने सद्गुणों को चारों ओर इस प्रकार तैनात रखना चाहिए कि जब भी कोई विपत्ति आए, उसका पूरा सुरक्षा-दल तत्पर रहे और अपने सेनापति के केवल एक संकेत पर बिना किसी अव्यवस्था के तुरंत कार्य करने लगे।” हम किसी महान सेनापति की सेना में देखते हैं कि उसके आदेश का पालन सभी सैनिक एक साथ करते हैं। सेना की व्यवस्था ऐसी होती है कि एक व्यक्ति द्वारा दिया गया संकेत एक ही समय में घुड़सवारों और पैदल सैनिकों, दोनों तक पहुँच जाता है। सेक्स्टियस कहता है कि हमें भी अपने भीतर ऐसी ही तत्परता चाहिए बल्कि हमें इसकी उससे भी अधिक आवश्यकता है। सेनाएँ अनेक बार बिना किसी वास्तविक कारण के ही शत्रु से भयभीत हो जाती हैं। जिस मार्ग को वे सबसे अधिक संकटपूर्ण समझती हैं, वही प्रायः सबसे सुरक्षित निकलता है। परंतु मूर्खता के लिए कहीं भी सुरक्षा का क्षेत्र नहीं होता। उसे ऊपर से भी भय रहता है, नीचे से भी। दाएँ-बाएँ दोनों ओर से, आगे से भी और पीछे से भी। वह हर वस्तु से काँपती रहती है। इसलिए किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार नहीं होती। जो उसकी सहायता करने आते हैं, उनसे भी डर जाती है। इसके विपरीत, बुद्धिमान व्यक्ति हर प्रकार के आक्रमण के विरुद्ध सुदृढ़ और सुरक्षित रहता है। उसका संकल्प अटल होता है। वह न निर्धनता, न शोक, न अपयश और न ही पीड़ा के आक्रमण के सामने पीछे हटता है। वह बिना विचलित हुए उनका सामना करता है और आवश्यकता पड़ने पर उनके बीच भी निर्भीक होकर आगे बढ़ जाता है।

    जहाँ तक हमारी बात है, हमें बाँधने वाली बहुत-सी चीज़ें हैं और हमारी शक्ति को क्षीण करने वाले भी अनेक कारण हैं। हम बहुत लंबे समय से अपने दोषों में पड़े हुए हैं। इसलिए उनसे आसानी से मुक्त नहीं हो सकते। बात केवल इतनी नहीं है कि हम उनसे दूषित हो गए हैं बल्कि हम तो उनमें पूरी तरह डूब चुके हैं। पर अब एक रूपक से दूसरे रूपक की ओर बढ़ने के बजाय, मैं एक प्रश्न उठाना चाहता हूँ, जिस पर मैं अक्सर विचार करता हूँ। मूर्खता का हम पर इतना गहरा अधिकार क्यों है? पहला कारण यह है कि हम उसका साहसपूर्वक प्रतिरोध नहीं करते। हम अपनी समस्त शक्ति लगाकर अपने उपचार का प्रयास नहीं करते। दूसरा कारण यह है कि बुद्धिमानों द्वारा खोजे गए सत्यों पर हमारा पर्याप्त विश्वास नहीं होता। हम उन्हें अपने हृदय में स्थान नहीं देते। इतने महान उद्देश्य के लिए भी हम बहुत कम परिश्रम करते हैं। जो व्यक्ति अपने अधिकांश समय अपने ही दोषों को बढ़ाने में लगाता है और केवल बचा-खुचा समय उन्हें दूर करने की शिक्षा पाने में देता है, वह अपने अवगुणों से लड़ने के लिए आवश्यक ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकता है? हममें से कोई भी किसी विषय में गहराई तक नहीं उतरता। हम केवल ऊपरी बातें जानकर ही संतुष्ट हो जाते हैं और समझते हैं कि दर्शन के लिए कुछ क्षण दे देना ही व्यस्त लोगों के लिए पर्याप्त ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक है।

    सबसे बड़ी बाधा यह है कि हम बहुत जल्दी अपने आप से संतुष्ट हो जाते हैं। यदि कोई हमें अच्छा, विवेकशील और चरित्रवान कहने को तैयार मिल जाए तो हम तुरंत उस वर्णन को स्वीकार कर लेते हैं। थोड़ी-सी प्रशंसा से भी हमारा मन नहीं भरता। निर्लज्ज चापलूसी हमारे ऊपर जितनी भी प्रशंसा का ढेर लगा दे, हम उसे अपना उचित अधिकार समझकर स्वीकार कर लेते हैं। जब लोग हमें श्रेष्ठ, यहाँ तक कि अत्यंत बुद्धिमान बताते हैं तो हम उनकी बात मान लेते हैं जबकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि वे अक्सर और खुलकर झूठ बोलते हैं। हम अपने प्रति इतने पक्षपाती हो जाते हैं कि जिन गुणों का हमारे आचरण से दूर-दूर तक संबंध नहीं होता, उनके लिए भी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न हो उठते हैं। कोई व्यक्ति कठोर दंड देते समय भी स्वयं को 'सबसे दयालु' कहलाते हुए सुनता है। चोरी करते हुए भी 'सबसे उदार' और मद्यपान तथा व्यभिचार में लिप्त रहते हुए भी 'सबसे संयमी' कहलाता है। परिणामस्वरूप, हमारे भीतर बदलने की कोई इच्छा ही नहीं बचती क्योंकि हम पहले से ही यह मान बैठे होते हैं कि हम उत्कृष्टता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हैं।

    एक बार, जब सिकंदर भारत में इधर-उधर घूमते हुए उन जातियों को लूट रहा था, जो अपने पड़ोसी लोगों तक के लिए भी लगभग अपरिचित थीं, तभी उसे एक तीर आ लगा। यह उस समय की बात है जब वह एक नगर की घेराबंदी किए हुए उसकी प्राचीरों के चारों ओर घूम-घूमकर उनकी कमजोर जगहों का पता लगा रहा था। वह लंबे समय तक अपने आरंभ किए हुए कार्य को पूरा करने के दृढ़ निश्चय के साथ डटा रहा। किंतु जब रक्तस्राव रुक गया और घाव पर पपड़ी जम गई, तब पीड़ा और बढ़ गई। घोड़े पर सवार होने पर उसके पैर की संवेदना भी जाती रही। अंततः उसे युद्ध छोड़ना पड़ा। तब उसने कहा, “सब लोग शपथ लेकर कहते हैं कि मैं बृहस्पति का पुत्र हूँ लेकिन यह घाव पुकार-पुकारकर बता रहा है कि मैं एक मनुष्य हूँ।” हमें भी यही करना चाहिए। चापलूसी हमारे पद और प्रतिष्ठा के अनुसार हम सबको मूर्ख बना देती है। इसलिए हमें चापलूसों से कहना चाहिए, “तुम मुझे बुद्धिमान कहते हो लेकिन मैं स्वयं देखता हूँ कि मैं कितनी ऐसी वस्तुओं की इच्छा करता हूँ जो बिल्कुल निरर्थक हैं। कितनी ऐसी चीज़ों की लालसा रखता हूँ जो मेरे लिए हानिकारक हैं। मुझे तो आज तक यह भी नहीं मालूम कि भोजन और पेय में कहाँ रुकना चाहिए जबकि पशु भी तृप्ति का अनुभव होते ही अपनी सीमा पहचान लेते हैं। आज तक मैं अपने ही पेट की क्षमता नहीं जान पाया हूँ।”

    अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम कैसे पहचान सकते हो कि तुम अभी बुद्धिमान नहीं बने हो। बुद्धिमान व्यक्ति आनंद से परिपूर्ण होता है। वह प्रसन्न, शांत और निर्भय रहता है। वह देवताओं के समान आत्मविश्वास और संतुलन के साथ जीवन जीता है। अब स्वयं को देखो। यदि तुम कभी निराश नहीं होते, यदि भविष्य की किसी आशा या चिंता से तुम्हारा मन विचलित नहीं होता, यदि तुम्हारी मानसिक अवस्था दिन-रात समान, स्थिर, सीधी और अपने आप में संतुष्ट रहती है, तब निश्चय ही तुमने मनुष्य जीवन के सर्वोच्च कल्याण को प्राप्त कर लिया है। लेकिन यदि तुम हर दिशा में और हर प्रकार के सुख की खोज करते फिरते हो तो समझ लो कि तुम बुद्धिमत्ता से उतने ही दूर हो, जितने आनंद से। तुम्हारा लक्ष्य तो आनंद है, पर तुम गलत मार्ग पर चल रहे हो। तुम सोचते हो कि धन, वैभव और सम्मान के बीच तुम्हें आनंद मिल जाएगा। अर्थात् तुम चिंता के बीच आनंद खोज रहे हो। जिन वस्तुओं के पीछे तुम इसलिए भागते हो कि वे तुम्हें सुख और प्रसन्नता देंगी, वास्तव में वही दुःख और क्लेश का कारण बन जाती हैं।

    हर व्यक्ति जिसे तुम देखते हो, आनंद की खोज में लगा हुआ है। लेकिन कोई यह नहीं जानता कि महान और स्थायी आनंद कहाँ प्राप्त होता है। कोई उसे दावतों और भोग-विलास में खोजता है। कोई चुनावों और समर्थकों की भीड़ में। कोई अपनी प्रेमिका में और कोई ऐसे निरर्थक विद्या-प्रदर्शन तथा साहित्य-अध्ययन में, जो मन की वास्तविक व्याधि का उपचार नहीं कर सकते। ये सभी लोग आकर्षक प्रतीत होने वाले, परंतु क्षणिक प्रलोभनों से धोखा खा जाते हैं। यह ठीक मद्यपान के समान है, जो एक घंटे के उन्मत्त उल्लास का मूल्य लंबे समय तक रहने वाले सिरदर्द और पीड़ा से वसूल करता है। या फिर बड़ी भीड़ की तालियों और जय-जयकार के समान है, जिसे प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए भारी चिंता और व्याकुलता का मूल्य चुकाना पड़ता है।

    अतः इस बात पर गंभीरता से विचार करो कि बुद्धिमत्ता का फल स्थिर और अडिग आनंद है। बुद्धिमान का मन चंद्रलोक के ऊपर स्थित आकाश के समान होता है— सदैव निर्मल, शांत और अविचल। इसलिए यदि बुद्धिमत्ता के साथ सदा आनंद जुड़ा रहता है तो तुम्हारे पास उसे पाने की प्रबल इच्छा रखने का पर्याप्त कारण है। किंतु यह आनंद केवल एक ही स्रोत से उत्पन्न होता है— अपने सद्गुणों के प्रति सजग और आश्वस्त चेतना से। जो व्यक्ति साहसी नहीं है, जो न्यायप्रिय नहीं है और जो संयमी नहीं है, वह सच्चे आनंद का अनुभव करने में सक्षम नहीं हो सकता।

    तुम पूछते हो, “क्या कहना चाहते हो? क्या मूर्ख लोग भी आनंदित नहीं होते?” होते तो हैं, पर उनका आनंद उतना ही वास्तविक होता है जितना शिकार पकड़ लेने पर सिंह का। जब लोग मदिरा और वासना में स्वयं को पूरी तरह थका डालते हैं, जब उनके दुर्गुण रात समाप्त होने पर भी उनका साथ नहीं छोड़ते और जब शरीर की स्वाभाविक सीमा से अधिक भोगे गए सुख सड़ने लगते हैं और पीड़ा का कारण बन जाते हैं, तब वे दुःख में डूबकर वर्जिल की वह प्रसिद्ध पंक्ति दोहराते हैं —

“तुम जानते हो कि हमने वह अंतिम रात छलपूर्ण सुखों के बीच कैसे बिताई थी।”

    वास्तव में, भोग-विलास में डूबे लोग तो मानो हर रात ऐसे ही छलपूर्ण सुखों के बीच बिताते हैं, जैसे वह सचमुच उनकी अंतिम रात हो।

     परंतु जो आनंद देवताओं को प्राप्त है और उन लोगों को भी, जो देवताओं के समान जीवन जीने का प्रयास करते हैं, उसमें न कोई विराम होता है और न ही उसका कोई अंत। यदि उसका स्रोत बाहर की किसी वस्तु में होता तो उसका अंत भी संभव होता। किंतु उसका स्रोत किसी दूसरे के हाथ में नहीं है। इसलिए न कोई दूसरा उसे दे सकता है और न ही उससे छीन सकता है। जिसे भाग्य ने दिया ही नहीं, उसे भाग्य छीन भी नहीं सकता।


विदा 

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