Tuesday, 14 July 2026

मनुष्य की अतृप्ति के संदर्भ में -- पत्र - 60

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुमसे असंतुष्ट हूँ, तुमसे असहमति रखता हूँ, तुम पर क्रोधित हूँ। क्या तुम अब भी उन्हीं वस्तुओं की कामना करते हो, जिनकी तुम्हारे लिए तुम्हारी धाय, तुम्हारे शिक्षक या तुम्हारी माँ कामना किया करते थे? क्या तुम्हें अब भी यह समझ में नहीं आया कि जिन बातों की वे तुम्हारे लिए इच्छा करते थे, उनमें से कितनी वास्तव में हानिकारक थीं? अरे, हमारे अपने सबसे निकट और प्रिय लोगों की प्रार्थनाएँ भी कितनी बार हमारे लिए अहितकारी सिद्ध होती हैं! और जब वे प्रार्थनाएँ सचमुच पूरी हो जाती हैं, तब तो वे और भी अधिक अनिष्टकारी बन जाती हैं। अब मुझे यह आश्चर्य नहीं होता कि बचपन से ही हम इतने प्रकार के कष्टों से घिरे रहते हैं क्योंकि हम अपने माता-पिता की ऐसी ही अहितकारी कामनाओं के बीच बड़े होते हैं। ईश्वर करे कि हम अपने लिए ऐसी प्रार्थना करें, जिसे पूरा करने में कुछ भी मूल्य न चुकाना पड़े।



    हम कब तक देवताओं से कुछ-न-कुछ माँगते रहेंगे? क्या हम अब भी अपना पेट स्वयं भरने में समर्थ नहीं हुए हैं? हमारे बोए हुए खेत इतने विशाल क्षेत्र में फैले हैं कि उनमें बड़े-बड़े नगर बस सकते हैं। कब तक? कब तक हमारी फसल काटने के लिए पूरी की पूरी आबादी लगी रहेगी? और एक ही भोजन की मेज़ सजाने के लिए कितने जहाज़ों को और एक से अधिक समुद्रों को पार करना पड़ेगा? एक बैल कुछ ही एकड़ चरागाह से तृप्त हो जाता है। एक ही वन एक से अधिक हाथियों के लिए पर्याप्त होता है। पर मनुष्य भूमि और समुद्र— दोनों का उपभोग करता है। ऐसा क्यों है? क्या प्रकृति ने हमें इतनी अतृप्त भूख दी है कि शरीर तो हमें छोटा-सा मिला है, फिर भी हम भोजन की लालसा में सबसे बड़े और सबसे अधिक खाने वाले पशुओं से भी आगे निकल जाएँ? ऐसा बिल्कुल नहीं है। हमारी प्राकृतिक आवश्यकताएँ तो बहुत थोड़ी हैं। प्रकृति की माँगों को पूरा करने के लिए बहुत कम ही पर्याप्त होता है। हमारे व्यय का कारण शरीर की भूख नहीं, बल्कि हमारी महत्त्वाकांक्षा है। इसलिए, जैसा कि सालुस्त  ने कहा है, "जो लोग केवल अपने पेट की ही चिंता करते हैं, उन्हें मनुष्यों की अपेक्षा पशुओं की जाति का सदस्य समझना चाहिए।"

    वास्तव में कुछ लोगों को तो हमें जीवित प्राणियों की श्रेणी में भी नहीं गिनना चाहिए बल्कि उन्हें चलते-फिरते शव समझना चाहिए। मनुष्य तभी वास्तव में जीवित होता है, जब वह बहुत-से लोगों के लिए उपयोगी हो। तब भी जीवित होता है, जब वह स्वयं अपने लिए उपयोगी हो। जो लोग आलस्य में डूबे घरों में छिपे रहते हैं, वे मानो कब्र में ही पड़े हों। चाहो तो उनके द्वार के ऊपर संगमरमर पर यह लिखवा दो —

“इनकी मृत्यु
इनसे पहले ही
हो चुकी थी।”


अभी के लिए विराम 

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