Tuesday, 14 July 2026

शोक के संदर्भ में -- पत्र - 63

 प्रिय लूसीलियस 


मुझे इस बात का दुःख है कि तुम्हारे मित्र फ्लैकस का निधन हो गया है। पर मैं चाहता हूँ कि तुम इस शोक में आवश्यकता से अधिक दुःखी न हो।


शगाल द्वारा  

    मैं तुमसे यह तो नहीं कहूँगा कि बिल्कुल भी शोक मत करो। यद्यपि मैं जानता हूँ कि वही सबसे अच्छा होता। पर ऐसी अडिग मानसिक दृढ़ता केवल उसी व्यक्ति में होती है, जो दुर्भाग्य से बहुत ऊपर उठ चुका हो। वह भी ऐसी घटना से क्षणभर के लिए अवश्य व्यथित होगा, पर केवल क्षणभर के लिए। जहाँ तक हमारी बात है, यदि हमारे आँसू अधिक न हों और हम शीघ्र ही स्वयं पर फिर से नियंत्रण पा लें तो हमारे आँसू क्षम्य हैं। मित्र के वियोग में तुम्हारी आँखें बिल्कुल सूखी भी न रहें, पर वे आँसुओं में डूब भी न जाएँ। रोओ, पर विलाप मत करो।

    क्या तुम्हें मेरा यह नियम कठोर प्रतीत होता है? फिर भी यूनान के महानतम कवि ने भी शोक मनाने के लिए केवल एक दिन को ही उचित माना है। वह तो यहाँ तक कहता है कि नायोबी ने भी अंततः भोजन करने का विचार किया।

    क्या तुम पूछते हो कि विलाप कहाँ से उत्पन्न होता है अथवा असीमित रुदन का स्रोत क्या है? अपने आँसुओं के द्वारा हम अपने दुःख को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। हम इसलिए नहीं रोते कि शोक हमें विवश करता है बल्कि इसलिए कि हम दूसरों के सामने अपना शोक प्रदर्शित करना चाहते हैं। लोग केवल अपने लिए दुःखी नहीं होते। कैसी दुर्भाग्यपूर्ण मूर्खता है! शोक में भी मानो एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा होती है।

    “तो फिर?” तुम पूछते हो, “क्या मैं अपने मित्र को भूल जाऊँ?” यदि तुम्हारी स्मृति केवल उतने समय तक ही बनी रहती है, जितने समय तक तुम्हारा शोक रहता है तो यह स्मरण बहुत अल्पकालिक है। वह समय शीघ्र ही आने वाला है जब कोई आकस्मिक बात तुम्हारे चेहरे पर फिर से मुस्कान ले आएगी। मैं कहता हूँ, बहुत जल्द तुम्हारी पीड़ा, चाहे वह कितनी ही तीव्र क्यों न हो शांत पड़ जाएगी और वियोग की प्रत्येक वेदना कम हो जाएगी। जैसे ही तुम अपने शोक का प्रदर्शन करना छोड़ दोगे, तुम्हारे चेहरे की उदासी भी समाप्त हो जाएगी। अभी तो तुम अपने शोक की मानो रक्षा कर रहे हो, फिर भी वह धीरे-धीरे तुमसे दूर होता जा रहा है। शोक जितना अधिक तीव्र होता है, उतनी ही जल्दी उसका अंत भी हो जाता है।

    आओ, हम यह प्रयास करें कि जो लोग इस संसार से जा चुके हैं, उनकी स्मृति हमारे लिए सुखद बन जाए। यदि उनकी याद केवल पीड़ा ही दे तो कोई भी स्वेच्छा से उसे बार-बार स्मरण नहीं करना चाहेगा। इसलिए स्वाभाविक है कि प्रियजनों का नाम आते ही हमारे हृदय में एक कसक उठे। किंतु उस कसक में भी अपना एक विशेष आनंद छिपा होता है। हमारे मित्र एटालस कहा करते थ, “दिवंगत मित्रों की स्मृति वैसा ही आनंद देती है, जैसा हल्की खटास और मिठास से भरे सेबों का स्वाद या फिर पुराने मदिरा की मनभावन खटास। समय बीतने पर जो कुछ हमें पीड़ा देता है, वह सब मिट जाता है और केवल आनंद ही शेष रह जाता है।”

    यदि हम उनकी बात मानें तो जीवित और सकुशल मित्रों का स्मरण करना मानो मधुर पकवानों और शहद का स्वाद लेने जैसा है। जबकि जो मित्र इस संसार से चले गए हैं, उनका स्मरण एक ऐसी अनुभूति है जिसमें मिठास और कड़वाहट दोनों साथ-साथ होती हैं। फिर भी कौन इस बात से इनकार करेगा कि कभी-कभी तीखे और कड़वे स्वाद भी हमें प्रिय लगते हैं?

    मेरा अनुभव इससे भिन्न है। मेरे लिए दिवंगत मित्रों का स्मरण मधुर और सांत्वनादायक होता है। क्योंकि जब वे मेरे साथ थे, तब भी मैं उन्हें इस भावना के साथ चाहता था कि एक दिन उनसे बिछुड़ना पड़ सकता है।  और अब, जब वे इस संसार में नहीं हैं, तब भी मैं उन्हें इस भाव से स्मरण करता हूँ मानो वे आज भी मेरे साथ हों।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, वही करो जो न्याय और विवेक के अनुकूल हो। भाग्य ने तुम्हारे साथ जो किया है, उसका गलत अर्थ लगाना छोड़ दो। भाग्य ने तुमसे एक चीज़ अवश्य छीन ली है, पर यह भी मत भूलो कि वही भाग्य उसे तुम्हें देकर भी गया था।

    चूँकि हमें यह निश्चित रूप से कभी ज्ञात नहीं होता कि हमारे मित्र कितने समय तक हमारे साथ रहेंगे, इसलिए जब तक वे हमारे पास हैं, तब तक हमें उनके सान्निध्य का भरपूर आनंद लेना चाहिए। यह भी सोचो कि कितनी ही बार हम लंबी यात्राओं पर गए और उन्हें पीछे छोड़ आए। कितनी ही बार एक ही नगर में रहते हुए भी उनसे मिल न सके। तब हमें समझ में आएगा कि उनके जीवित रहते हुए ही हमने उनके साथ बिताने योग्य कितना समय खो दिया था। कुछ लोग अपने मित्रों के रहते हुए उनकी उपेक्षा करते हैं। जब वे इस संसार से चले जाते हैं, तब उनके लिए अत्यधिक शोक करते हैं। क्या ऐसी प्रवृत्ति को स्वीकार किया जा सकता है? उन्हें अपने मित्रों से प्रेम तभी होता है, जब वे उन्हें खो चुके होते हैं! उन्हें यह भय सताता है कि कहीं लोगों को उनके प्रेम पर संदेह न हो जाए। इसलिए वे अपने शोक का और भी अधिक प्रदर्शन करते हैं। मानो वे अपने स्नेह का प्रमाण बहुत देर से खोजने का प्रयास कर रहे हों।

    यदि हमारे अन्य मित्र भी हैं तो हम उनके साथ अन्याय करते हैं और उनके सम्मान के योग्य भी नहीं रहते, यदि हम उन्हें उस मित्र के वियोग में कोई मूल्यवान सांत्वना देने योग्य नहीं समझते जो अब इस संसार में नहीं रहा। यदि हमारे पास कोई दूसरा मित्र ही नहीं है तो हम अपने साथ भाग्य से भी अधिक अन्याय कर रहे हैं। भाग्य ने हमसे केवल एक व्यक्ति को छीना है जबकि हम स्वयं उन सभी लोगों को अपने से दूर कर रहे हैं जिन्हें हम अपना मित्र बना सकते थे। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति एक से अधिक लोगों के साथ मित्रता नहीं कर सकता, वह वास्तव में उस एक से भी बहुत गहरा प्रेम नहीं करता। मान लो किसी व्यक्ति का एकमात्र वस्त्र खो जाए और वह दूसरा वस्त्र खोजकर अपने शरीर को ढकने और ठंड से बचने के बजाय केवल रोता-बिलखता रहे तो क्या तुम उसे मूर्ख नहीं कहोगे? जिस व्यक्ति से तुम प्रेम करते थे, वह अब इस संसार में नहीं है। इसलिए किसी और को अपना स्नेह दो। नए मित्र बनाना और प्रेम का संबंध स्थापित करना, शोक में डूबे रहने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

    मैं जानता हूँ कि जो बात मैं अब कहने जा रहा हूँ, वह बहुत पुरानी और बार-बार दोहराई गई उक्ति है। फिर भी केवल इसलिए कि उसे सभी कह चुके हैं, मैं उसे छोड़ने वाला नहीं हूँ।

    समय स्वयं शोक का अंत कर देता है —

भले ही तुम स्वयं उसे समाप्त करने का निर्णय न लो। अंततः मनुष्य शोक करते-करते थक जाता है। किंतु एक विवेकशील व्यक्ति को यह सोचकर लज्जा होनी चाहिए कि उसके शोक का उपचार केवल समय के कारण हुआ। इससे कहीं बेहतर है कि तुम स्वयं अपने शोक का त्याग करो न कि शोक तुम्हारा साथ छोड़ दे। जब यह निश्चित है कि तुम चाहकर भी बहुत लंबे समय तक शोक नहीं कर सकते तो फिर जितनी जल्दी संभव हो, उतनी जल्दी उसे छोड़ देना ही उचित है।

    हमारे पूर्वजों ने स्त्रियों के लिए शोक की अवधि एक वर्ष निर्धारित की थी। इसका अर्थ यह नहीं था कि उन्हें पूरे एक वर्ष तक शोक करना चाहिए बल्कि यह था कि वे उससे अधिक समय तक शोक न करें। पुरुषों के लिए तो शोक की कोई कानूनी अवधि निर्धारित ही नहीं की गई क्योंकि उनके लिए किसी भी अवधि तक शोक करते रहना सम्मानजनक नहीं माना गया। फिर भी उन स्त्रियों में भी जो मृतक की अर्थी से बड़ी कठिनाई से हटाई जाती हैं, जिन्हें शव से अलग करना पड़ता है, ऐसी एक भी स्त्री दिखाना कठिन है जिसके आँसू पूरे एक महीने तक लगातार बहते रहे हों। शोक से अधिक शीघ्र घृणित कोई और चीज़ नहीं बनती। जब वह नया होता है, तब लोगों की सहानुभूति और सांत्वना प्राप्त करता है। पर जब वह लंबा खिंच जाता है, तब वह केवल उपहास का विषय बन जाता है। यह उचित भी है क्योंकि उस समय तक वह या तो मूर्खता बन चुका होता है या मात्र दिखावा।

    और ये बातें मैं तुम्हें वही व्यक्ति लिख रहा हूँ, जिसने अपने प्रिय अनेयुस सेरेनस के निधन पर इतना असंयमित होकर विलाप किया था कि स्वयं मुझे ही अपनी इच्छा के विरुद्ध शोक से पराजित मनुष्य का उदाहरण बनना पड़ता है। किन्तु आज मैं अपने उस व्यवहार की स्वयं आलोचना करता हूँ। अब मैं समझता हूँ कि मेरे इतने गहरे शोक का मुख्य कारण यह था कि मैंने कभी यह सोचा ही नहीं था कि उसकी मृत्यु मेरी मृत्यु से पहले भी हो सकती है। मेरे मन में केवल यही बात थी कि वह मुझसे छोटा है, बहुत छोटा। मानो जन्म का क्रम ही हमारे भाग्य और मृत्यु का समय निर्धारित करता हो!

    इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी और अपने प्रियजनों, दोनों की मरणशीलता को सदैव स्मरण रखें। उस समय मुझे अपने आप से यह कहना चाहिए था, “मेरा प्रिय सेरेनस मुझसे आयु में छोटा है, पर इससे क्या अंतर पड़ता है? उचित तो यही है कि उसकी मृत्यु मेरे बाद हो किन्तु ऐसा भी हो सकता है कि वह मुझसे पहले ही मर जाए।” चूँकि मैंने ऐसा नहीं सोचा, इसलिए भाग्य ने मुझे अचानक और पूरी तरह अप्रस्तुत अवस्था में आ घेरा। अब मैं यह बात सदा ध्यान में रखता हूँ कि केवल इतना ही नहीं कि प्रत्येक मनुष्य और प्रत्येक वस्तु को एक दिन नष्ट होना है बल्कि यह भी कि मृत्यु किसी निश्चित नियम या क्रम का पालन नहीं करती। जो कभी भी हो सकता है, वह आज भी हो सकता है।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम भी शीघ्र ही उसी स्थान पर जाने वाले हैं, जहाँ वह पहुँच चुका है जिसके लिए हम शोक कर रहे हैं। यदि दार्शनिकों की यह बात सत्य हो कि मृत्यु के बाद कोई ऐसा लोक है जो हमें अपने भीतर स्थान देता है तो जिस व्यक्ति को हम खोया हुआ समझते हैं, वह वास्तव में नष्ट नहीं हुआ है वह तो केवल हमसे पहले वहाँ पहुँच गया है।


अभी के लिए विदा 

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