Tuesday, 14 July 2026

महान दार्शनिकों के सदर्भ में -- पत्र - 64

 प्रिय लूसीलियस 


कल तुम हमारे साथ थे। अब यदि वास्तव में शिकायत करने का कोई कारण होता तो वह तभी होता जब तुम हमारे साथ केवल कल ही रहे होते। इसलिए मैंने कहा, 'हमारे साथ थे', क्योंकि तुम तो आज भी मेरे साथ हो। कल कुछ मित्र मेरे घर आए थे, इसलिए मेरे घर की रसोई से थोड़ा-सा धुआँ उठ रहा था। वैसा नहीं जैसा अमीरों और फैशनपरस्त लोगों की विशाल रसोइयों से उठता है, जिसे देखकर अग्निशमन दल तक सचेत हो जाए बल्कि केवल इतना-सा धुआँ, जो यह संकेत दे रहा था कि घर में अतिथि आए हुए हैं। भोजन के समय हमारी बातचीत अनेक विषयों पर घूमती रही। जैसा प्रायः भोज-सभा में होता है, हम किसी एक विषय को अंत तक नहीं ले गए बल्कि एक बात से दूसरी बात पर सहज ही चले जाते रहे। फिर एक पुस्तक का पाठ किया गया। वह क्विंटस सेक्स्टियस वरिष्ठ की रचना थी। निश्चय ही वे एक महान व्यक्ति थे और यद्यपि वे स्वयं इससे इनकार करते थे, फिर भी वे वास्तव में एक स्टोइक दार्शनिक थे। ईश्वर की शपथ! उस व्यक्ति में कितना अद्भुत ओज है, कितना प्राणबल है! ऐसा गुण हर दार्शनिक में नहीं मिलता। कुछ दार्शनिक अत्यंत प्रसिद्ध हैं किन्तु उनका लेखन नीरस और निर्जीव है। वे तर्क प्रस्तुत करते हैं, वाद-विवाद करते हैं, आपत्तियाँ उठाते हैं, पर पाठक के भीतर कोई उत्साह नहीं जगा पाते क्योंकि उनके अपने शब्दों में ही जीवन का अभाव होता है। किन्तु जब तुम सेक्स्टियस को पढ़ोगे तो तुम्हारे मुँह से अनायास निकलेगा, “यह व्यक्ति सचमुच जीवित है। यह ऊर्जावान है, स्वतंत्र है। यह सामान्य मनुष्यों से कहीं ऊपर उड़ता है। इसे पढ़कर मैं अपार आत्मविश्वास और महान उत्साह से भर उठता हूँ।”



    मैं तुम्हें बताता हूँ कि उन्हें पढ़ते समय मेरी अपनी मनःस्थिति कैसी हो जाती है। मेरा मन हर प्रकार के दुर्भाग्य को ललकारने के लिए व्याकुल हो उठता है। मैं मानो ऊँचे स्वर में पुकारना चाहता हूँ, “हे भाग्य! क्यों रुक गया है? अपना पूरा प्रहार कर। देख, मैं तैयार हूँ!” उस समय मैं अपने भीतर उसी मनुष्य का साहस अनुभव करता हूँ, जो स्वयं अपने लिए परीक्षा-भूमि खोजता है। ऐसा अवसर, जहाँ वह अपने धैर्य और वीरता का प्रमाण दे सके —

वह विनती करता है कि शांत झुंडों के बीच, उसे किसी झाग उड़ाते हुए जंगली वराह का सामना हो या फिर पर्वत-शिखर से उतरते हुए किसी सुनहरे सिंह का।

मेरा मन ऐसी किसी चुनौती की खोज करता है, जिस पर मैं विजय प्राप्त कर सकूँ। ऐसी किसी कठिनाई की, जिसे मैं अपने आत्म-प्रशिक्षण का भाग बनाकर धैर्यपूर्वक सह सकूँ। सेक्स्टियस की यही एक और विलक्षण विशेषता है। वे तुम्हें सच्चे सुख की महानता का दर्शन तो कराते हैं पर उसे प्राप्त करने की आशा तुमसे कभी नहीं छीनते। तुम्हें यह अवश्य अनुभव होता है कि वह आदर्श अभी तुमसे बहुत ऊँचा है फिर भी यह विश्वास बना रहता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से चाहे, वह उस ऊँचाई तक पहुँच सकता है।

    यही भावना स्वयं सद्गुण भी उत्पन्न करती है। तुम उसका आदर और प्रशंसा करते हो और साथ ही यह आशा भी रखते हो कि एक दिन तुम स्वयं भी उसे प्राप्त कर सकोगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, प्रज्ञा का चिंतन ही मेरे समय का बहुत बड़ा भाग अपने में समेट लेता है। उसे निहारते हुए मैं उतना ही विस्मित होता हूँ, जितना कभी-कभी आकाश को देखकर होता हूँ। उस आकाश को भी, जिसे मैं अनेक बार ऐसे देखता हूँ मानो पहली बार देख रहा हूँ।

    इसी कारण मैं दर्शन के उन महान आविष्कारों का भी आदर करता हूँ और उन महापुरुषों का भी, जिन्होंने उन्हें खोजा। यह सोचकर मेरा हृदय आनंद से भर उठता है कि मानो मुझे अनेक पूर्वजों की छोड़ी हुई एक महान विरासत प्राप्त हुई है। उन्होंने जो कुछ एकत्र किया, जिस ज्ञान के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया, वह सब मेरे लिए है। पर हमें भी एक योग्य गृहस्वामी की भाँति आचरण करना चाहिए। जैसे वह अपनी पैतृक संपत्ति में वृद्धि करता है, वैसे ही हमें भी इस बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत को समृद्ध करना चाहिए। जब यह धरोहर मुझसे आगे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचे तो वह पहले से अधिक समृद्ध हो। अभी भी बहुत-सा कार्य किया जाना शेष है। सदा शेष रहेगा। कोई भी बात उन लोगों को, जो आज से हजारों पीढ़ियों बाद जन्म लेंगे, इस महान कार्य में अपना योगदान देने से नहीं रोक सकती। 

    किन्तु यदि यह मान भी लिया जाए कि प्राचीनों ने सब कुछ खोज लिया था, तब भी एक कार्य ऐसा है जो सदैव नया बना रहेगा। दूसरों द्वारा की गई खोजों को व्यवहार में लाना, उन्हें ठीक प्रकार से समझना और व्यवस्थित रूप देना। मान लो, आँखों के उपचार के लिए आवश्यक सभी औषधियाँ हमें पहले से ही विरासत में मिल गई हों। तब मुझे नई दवाएँ खोजने की आवश्यकता नहीं होगी, परंतु मुझे उनका उपयोग रोग और परिस्थिति के अनुसार करना तो सीखना ही होगा। एक औषधि आँख की सूजन दूर करती है, दूसरी पलक की सूजन कम करती है, तीसरी अचानक होने वाले दर्द और आँसू बहने को रोकती है और चौथी दृष्टि को बेहतर बनाती है। किंतु इन सबका लाभ तभी मिलता है, जब तुम स्वयं भी अपना कर्तव्य निभाओ। औषधि को उचित मात्रा में तैयार करो और रोगी की अवस्था के अनुसार सही समय तथा सही विधि से उसका प्रयोग करो। मन के रोगों की औषधियाँ भी प्राचीन मनीषियों ने खोज ली थीं। पर उन्हें कब, कैसे और किस परिस्थिति में प्रयोग करना है। यह पता लगाना हमारा कार्य है। हमारे पूर्वजों ने निस्संदेह बहुत महान कार्य किए हैं, पर उनका कार्य अभी भी पूर्ण नहीं हुआ है।

    फिर भी हमें उन सबका आदर करना चाहिए बल्कि उनका सम्मान उसी श्रद्धा से करना चाहिए, जैसी हम देवताओं के प्रति रखते हैं। आखिर मैं उन महान पुरुषों की प्रतिमाएँ अपने पास क्यों न रखूँ ताकि वे मेरे मन को सत्कर्म के लिए प्रेरित करती रहें? मैं उनके जन्मदिवस क्यों न मनाऊँ? प्रत्येक अवसर पर सम्मानपूर्वक उनका नाम लेकर उन्हें श्रद्धांजलि क्यों न अर्पित करूँ? जितना सम्मान मैं अपने गुरुओं का करता हूँ, उतना ही सम्मान मुझे समस्त मानवजाति के उन महान आचार्यों का भी करना चाहिए, जिनसे हमें इतना महान कल्याण प्राप्त हुआ है।

    यदि मेरे सामने कोई कौंसुल या प्रेटर आ जाए तो मैं उसके पद का सम्मान करते हुए वही सब करूँगा जो प्रथा के अनुसार उचित है। घोड़े से उतरूँगा, अपना सिर अनावृत करूँगा और उसे मार्ग दूँगा। तो फिर बताओ, क्या मुझे मार्कस कैटो (ज्येष्ठ और कनिष्ठ), बुद्धिमान लेलियस, सुकरात, प्लेटो, ज़ेनो और क्लीन्थीस जैसे महापुरुषों का इससे भी अधिक सम्मानपूर्वक स्वागत नहीं करना चाहिए? निस्संदेह, मैं इन महान व्यक्तियों के प्रति गहरी श्रद्धा रखता हूँ। जब भी उनके महान नामों का उच्चारण होता है, मैं आदरवश खड़ा हो जाता हूँ।


अभी के लिए विदा 

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