Thursday, 16 July 2026

सद्गगुणों के संदर्भ में - पत्र - 66 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


कई वर्षों के अंतराल के बाद आज मेरी मुलाकात क्लैरानस (Claranus) से हुई। वह मेरा सहपाठी रहा है। जैसा कि तुमने अब तक समझ ही लिया होगा, अब वह वृद्ध हो चुका है। लेकिन उसकी आत्मा आज भी युवा और उत्साह से भरी हुई है जबकि वह अपने दुर्बल और तुच्छ शरीर के साथ निरंतर संघर्ष कर रहा है। प्रकृति ने उसके जैसे महान मन को इतना कमजोर शरीर देकर मानो उसके साथ न्याय नहीं किया। या शायद प्रकृति का उद्देश्य ही यह दिखाना था कि बाहरी रूप चाहे जैसा भी हो, उसके भीतर अत्यंत साहसी और श्रेष्ठ आत्मा निवास कर सकती है। फिर भी उसने हर बाधा पर विजय प्राप्त कर ली है। अपने शरीर की चिंता न करके उसने यह सीख लिया है कि दूसरों की राय या उनके निर्णयों की भी चिंता नहीं करनी चाहिए। मुझे लगता है कि कवि ने यह कहकर भूल की थी, 'सुंदर शरीर में होने पर सद्गुण और भी अधिक प्रशंसनीय हो जाता है।' वास्तव में सद्गुण को महान बनाने के लिए किसी बाहरी शोभा की आवश्यकता नहीं होती। वही स्वयं अपना सबसे बड़ा आभूषण है और जिस शरीर में वह निवास करता है, उसे भी पवित्र बना देता है।


Faith

    निश्चय ही अब मैं अपने मित्र क्लैरानस को एक नई दृष्टि से देखने लगा हूँ। वह मुझे अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है। उसकी आत्मा जितनी सीधी, दृढ़ और उदात्त है, उसका व्यक्तित्व भी उतना ही ऊँचा और गौरवपूर्ण लगता है। जैसे किसी साधारण झोंपड़ी से कोई महान व्यक्ति निकल सकता है, वैसे ही किसी साधारण और विकृत शरीर में भी एक महान और सुंदर मन निवास कर सकता है। मुझे लगता है कि प्रकृति ने कुछ लोगों को जान-बूझकर ऐसा बनाया है ताकि यह सिद्ध हो सके कि सद्गुण का जन्म किसी भी स्थान पर हो सकता है। यदि वह बिना शरीर के ही मन की रचना कर सकती तो शायद ऐसा ही करती। लेकिन उसने इससे भी श्रेष्ठ कार्य किया है। वह ऐसे लोगों को जन्म देती है जिनका शरीर उनकी राह में बाधा बनता है। फिर भी वे उन सभी बाधाओं को पार कर जाते हैं। मेरे विचार से क्लैरानस का जन्म ही इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हुआ था कि विकृत शरीर मन को कुरूप नहीं बना सकता बल्कि सुंदर मन ही शरीर को शोभायमान बना देता है। खैर, यद्यपि हम दोनों ने साथ बहुत कम दिन बिताए। फिर भी हमारे बीच अनेक वार्तालाप हुए। अब मैं उन्हें लिखकर तुम्हें भेजूँगा।

    पहले दिन हमारी चर्चा का विषय यह था कि यदि सभी अच्छे गुण या शुभ वस्तुएँ तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित हैं तो वे एक-दूसरे के समान कैसे हो सकती हैं? हमारे दर्शन का मत है कि कुछ शुभ वस्तुएँ सर्वोच्च श्रेणी की होती हैं जैसे, आनंद, मन की शांति और अपने देश की सुरक्षा। कुछ दूसरी श्रेणी की होती हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रकट होती हैं जैसे, यातना सहते हुए धैर्य बनाए रखना या गंभीर बीमारी में आत्मसंयम रखना। पहली श्रेणी की वस्तुओं को हम बिना किसी शर्त के अपनाना चाहते हैं जबकि दूसरी श्रेणी की वस्तुओं को तभी स्वीकार करते हैं जब परिस्थितियाँ उन्हें आवश्यक बना दें। इसके अतिरिक्त तीसरी श्रेणी भी है, जिसमें संयमित चाल, शांत और गरिमापूर्ण मुखमुद्रा तथा बुद्धिमान व्यक्ति के अनुरूप आचरण और हाव-भाव आते हैं। फिर प्रश्न यह उठता है कि जब इनमें से कुछ वस्तुएँ स्वाभाविक रूप से अपनाने योग्य हैं और कुछ ऐसी हैं जिनसे सामान्यतः बचना चाहिए तो वे सभी एक-दूसरे के समान कैसे कही जा सकती हैं?

Charity

    यदि हम इस प्रश्न का समाधान करना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले परम शुभ की ओर लौटना चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि उसका वास्तविक स्वरूप क्या है।

वह मन, जो सत्य का दर्शन करता है, जो यह जानता है कि किसका अनुसरण करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, जो वस्तुओं का मूल्य लोकमत के आधार पर नहीं बल्कि प्रकृति के अनुरूप निर्धारित करता है, जो स्वयं को समस्त ब्रह्मांड का अंग मानकर उसके प्रत्येक कार्य-व्यापार का चिंतन करता है, जो विचार और कर्म— दोनों पर समान रूप से ध्यान देता है, जो महान और शक्तिशाली है, जो न विपत्तियों से पराजित होता है और न ही समृद्धि के प्रलोभनों से मोहित, जो स्वयं को न किसी सुख के हवाले करता है और न किसी दुःख के बल्कि प्रत्येक संयोग और दुर्घटना से ऊपर उठ जाता है, जो सौंदर्य और शक्ति— दोनों से पूर्ण है, जो स्वस्थ, संयमी, शांत और निर्भय है, जिसे न कोई शक्ति वश में कर सकती है और न कोई आकस्मिक घटना उसे कभी ऊँचा उठा सकती है या गिरा सकती है, ऐसा ही मन सद्गुण है। जब सद्गुण एक साथ अपने संपूर्ण स्वरूप में प्रकट होता है, तब उसका रूप यही होता है। किंतु उसके अनेक रूप दिखाई देते हैं क्योंकि जीवन की प्रत्येक परिस्थिति और प्रत्येक कर्म में वह अलग-अलग प्रकार से व्यक्त होता है। फिर भी स्वयं सद्गुण न कभी घटता है और न बढ़ता है। वह सदा अपने पूर्ण रूप में ही बना रहता है।

    परम शुभ न तो कभी घट सकता है और न ही सद्गुण अपने स्थान से पीछे हट सकता है। वह केवल परिस्थितियों के अनुसार अपना रूप बदलता है और जिस कार्य को करने जा रहा होता है, उसके अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है।जिस किसी वस्तु को वह स्पर्श करता है, उसे अपने ही स्वरूप और रंग में रंग देता है। वह कर्मों को, मित्रताओं को, और कभी-कभी पूरे परिवार को जिसमें वह प्रवेश कर उसे सुव्यवस्थित कर देता है, शोभायमान बना देता है। वह जिस किसी का भी स्पर्श करता है, उसे प्रिय, विशिष्ट और प्रशंसनीय बना देता है। उसकी शक्ति और उसकी महानता में अब कोई वृद्धि नहीं हो सकती क्योंकि जो सबसे महान है, उससे आगे कुछ नहीं बढ़ सकता। जैसे जो वस्तु सही है, उससे अधिक सही कुछ नहीं हो सकता। जो सत्य है, उससे अधिक सत्य कुछ नहीं हो सकता। जो संयमित है, उससे अधिक संयमित भी कुछ नहीं हो सकता। प्रत्येक सद्गुण अपनी पूर्ण सीमा पर स्थित होता है। प्रत्येक सीमा का एक निश्चित माप होता है। जैसे स्थिरता, आत्मविश्वास, सत्यनिष्ठा और निष्ठा अपनी पूर्णता से आगे नहीं बढ़ सकते, वैसे ही सद्गुण भी अपनी पूर्णता से आगे नहीं जा सकता। यदि कोई वस्तु पूर्ण है तो उसमें और क्या जोड़ा जा सकता है? कुछ भी नहीं। यदि उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है तो इसका अर्थ है कि वह पहले पूर्ण नहीं थी। इसलिए सद्गुण में भी कुछ जोड़ा नहीं जा सकता। यदि उसमें वृद्धि संभव हो तो इसका अर्थ होगा कि उसमें पहले कोई कमी थी।

    प्रत्येक शुभ वस्तु इन्हीं सिद्धांतों के अधीन होती है। व्यक्तिगत हित, सार्वजनिक हित से जुड़ा हुआ है। ठीक उसी प्रकार जैसे जो प्रशंसनीय है, उसे उस वस्तु से अलग नहीं किया जा सकता जिसका अनुसरण करना हमारा कर्तव्य है। इसी कारण सभी सद्गुण एक-दूसरे के समान हैं। इसी प्रकार सद्गुणपूर्ण कर्म और वे सभी व्यक्ति भी समान हैं जिनमें सद्गुण विद्यमान है। किन्तु पौधों और पशुओं के विषय में ऐसा नहीं है। चूँकि वे स्वयं नश्वर हैं इसलिए उनके गुण भी नष्ट हो जाने वाले, क्षणभंगुर और अनिश्चित होते हैं। वे कभी बढ़ते हैं, कभी घटते हैं इसलिए उनका मूल्य समान नहीं माना जाता। मानव के सद्गुण एक ही नियम के अधीन होते हैं क्योंकि सम्यक् विवेक स्वयं एक समान होता है। दिव्य से अधिक दिव्य कुछ नहीं होता और आकाशीय से अधिक आकाशीय भी कुछ नहीं होता।

    नश्वर वस्तुएँ कभी ऊपर उठती हैं और कभी नीचे गिरती हैं। कभी घटती हैं और कभी बढ़ती हैं। कभी रिक्त होती हैं और कभी भर जाती हैं। इसी कारण वे उतनी ही असमान होती हैं जितना कि उनका भाग्य अस्थिर होता है। किन्तु जो वस्तुएँ दिव्य हैं, उनका स्वभाव केवल एक ही होता है। सम्यक् बुद्धि तो दिव्य सत्ता का ही एक अंश है, जो मानव शरीर में समाहित है। यदि विवेक दिव्य है और विवेक के बिना कोई शुभ नहीं हो सकता तो प्रत्येक शुभ भी दिव्य है। फिर, जब दिव्य वस्तुओं में कोई भेद नहीं है तो शुभ वस्तुओं में भी कोई भेद नहीं हो सकता। इसलिए एक ओर आनंद और दूसरी ओर यातना को दृढ़तापूर्वक सहने की क्षमता— दोनों समान हैं क्योंकि दोनों में आत्मा की महानता समान रूप से विद्यमान है। अंतर केवल इतना है कि पहले में वह शांत और प्रसन्न होकर प्रकट होती है जबकि दूसरे में वह संकेंद्रित और संघर्षशील रूप में दिखाई देती है। ऐसा क्यों न माना जाए? क्या तुम्हें लगता है कि जो व्यक्ति शत्रु के दुर्ग पर साहसपूर्वक आक्रमण करता है, उसका साहस उस व्यक्ति के साहस के बराबर नहीं है, जो उसी आक्रमण को अद्भुत धैर्य के साथ सहता है? क्या तुम्हें लगता है कि स्किपियो की महानता जिसने नुमांशिया का घेराव किया और उन अजेय हाथों को स्वयं अपना विनाश करने के लिए विवश कर दिया। उन घिरे हुए लोगों की महानता के बराबर नहीं थी जो यह जानते थे कि जब तक मृत्यु का मार्ग खुला है, तब तक कोई वास्तव में घिरा हुआ नहीं होता क्योंकि वह स्वतंत्रता की गोद में प्राण त्याग सकता है?


Hope
Artist Italian Umbrian Painter 

    "तुम्हारा क्या अभिप्राय है? क्या आनंद और पीड़ा को अडिग होकर सहने में कोई अंतर नहीं है?" सद्गुणों की दृष्टि से तो कोई अंतर नहीं है। हाँ, उनके प्रकट होने के ढंग में अवश्य बहुत अंतर है। एक स्थिति में मन स्वाभाविक रूप से प्रसन्न, सहज और विस्तृत होता है जबकि दूसरी स्थिति में उसे पीड़ा का सामना करना पड़ता है, जो प्रकृति के प्रतिकूल है। इसी कारण ये परिस्थितियाँ जिनमें इतना बड़ा अंतर दिखाई देता है, केवल मध्यवर्ती अवस्थाएँ हैं। किंतु उनमें विद्यमान सद्गुण समान रहता है। परिस्थितियाँ सद्गुण को नहीं बदलतीं। कठिन परिस्थितियाँ उसे कमतर नहीं बनातीं और सुखद एवं अनुकूल परिस्थितियाँ उसे अधिक श्रेष्ठ नहीं बनातीं। इसलिए दोनों में विद्यमान सद्गुण अनिवार्य रूप से समान है। क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में जो कुछ किया जाता है, वह समान रूप से उचित, समान रूप से बुद्धिमत्तापूर्ण और समान रूप से सम्माननीय होता है इसलिए उनसे प्राप्त शुभ भी समान हैं। न तो आनंद की स्थिति में कोई व्यक्ति इससे अधिक उत्तम आचरण कर सकता है और न ही यातना की स्थिति में दूसरा व्यक्ति। और जो दो वस्तुएँ किसी भी प्रकार से और अधिक श्रेष्ठ नहीं बनाई जा सकतीं, वे एक-दूसरे के समान ही होती हैं। इसी प्रकार अन्य सभी शुभ गुण भी एक-दूसरे के समान हैं जैसे, मन की शांति, स्पष्टवादिता, उदारता, दृढ़ता, प्रसन्नचित्त शांति और धैर्य। क्योंकि इन सभी का आधार एक ही है— सद्गुण, जो मनुष्य को सीधा, अडिग और अचल मन प्रदान करता है।

    यदि सद्गुण के बाहर की वस्तुएँ उसे घटा या बढ़ा सकती हैं तो सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही एकमात्र शुभ नहीं रह जाता। यदि तुम यह मान लेते हो तो सम्माननीय का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। ऐसा क्यों? मैं बताता हूँ। कोई भी कर्म तब सम्माननीय नहीं हो सकता जब वह अनिच्छा से या किसी दबाव में किया जाए। जो कुछ भी सम्माननीय है, वह स्वेच्छा से किया जाता है। यदि उसमें अनिच्छा, शिकायत, पश्चाताप, संकोच या भय का कोई भी अंश मिला दिया जाए तो वह अपना सबसे बड़ा गुण खो देता है। वह अब स्वयं की स्वतंत्र इच्छा से किया गया कर्म नहीं रह जाता। भय दासता का सूचक है। जो स्वतंत्र नहीं है, वह सम्माननीय भी नहीं हो सकता। जो कुछ भी सम्माननीय है, वह चिंता से मुक्त और शांत होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य से कतराता है, उसकी शिकायत करता है या उसे बुरा समझता है तो उसका मन विचलित हो जाता है और वह गहरे आंतरिक संघर्ष में पड़ जाता है। एक ओर नैतिकता उसे पुकारती है और सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है, दूसरी ओर संभावित हानि का भय उसे पीछे हटने के लिए उकसाता है।

    मैं जानता हूँ कि इस पर कोई यह आपत्ति कर सकता है, "क्या तुम हमें यह विश्वास दिलाना चाहते हो कि आनंद का अनुभव करने और यातना-चक्र पर बँधे रहकर तब तक पीड़ा सहने में, जब तक यातना देने वाला ही थक न जाए, कोई अंतर नहीं है?" 

    इसके उत्तर में मैं यह कह सकता था, एपिक्यूरस भी कहता है कि यदि कोई ज्ञानी फालारिस के पीतल के बैल (प्राचीन यातना देने की प्रथा) में जीवित भून दिया जाए, तब भी वह कहेगा, यह सुखद है। इससे मुझे तनिक भी कष्ट नहीं है। फिर यदि मैं यह कहता हूँ कि भोज पर आराम से बैठे व्यक्ति और यातना सहते हुए अडिग खड़े व्यक्ति— दोनों के शुभ समान हैं तो इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है। जबकि स्वयं एपिक्यूरस तो इससे भी अधिक अविश्वसनीय बात कहता है कि यातना सहना भी सुखद होता है?

    किन्तु मैं इसका उत्तर इस प्रकार देता हूँ। "निस्संदेह आनंद और पीड़ा में बहुत बड़ा अंतर है। यदि मुझे इनमें से किसी एक को चुनना हो तो मैं आनंद को ग्रहण करूँगा और पीड़ा से बचूँगा क्योंकि एक प्रकृति के अनुकूल है और दूसरा उसके प्रतिकूल। जब तक उनका मूल्यांकन इस आधार पर किया जाता है, तब तक दोनों में बहुत अधिक अंतर है। किन्तु जहाँ सद्गुण का प्रश्न है, वहाँ दोनों समान हैं; एक ही सद्गुण अनुकूल परिस्थितियों में प्रकट होता है और वही सद्गुण प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना स्वरूप बनाए रखता है। क्लेश, पीड़ा और जो कुछ भी कष्टदायक है, उसका अपने आप में कोई महत्व नहीं है; क्योंकि सद्गुण उन सब पर विजय प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार सूर्य का प्रखर प्रकाश हमारे छोटे-छोटे दीपकों की ज्योति को फीका कर देता है, उसी प्रकार सद्गुण की महानता सभी पीड़ाओं, कष्टों और दुखों को ढँक देती है। जहाँ कहीं भी सद्गुण अपना प्रकाश बिखेरता है, वहाँ उसके अभाव में जो कुछ महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता था, वह सब उसके तेज के सामने लुप्त हो जाता है। जब हमारे दुःख, कष्ट और असुविधाएँ सद्गुण के संपर्क में आती हैं तो उनका प्रभाव उतना ही नगण्य रह जाता है, जितना महासागर में गिरने वाली वर्षा की कुछ बूँदों का।

    इसी से तुम जान सकते हो कि यह बात सत्य है। यदि कोई कर्म श्रेष्ठ और सम्माननीय है तो एक सज्जन व्यक्ति उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करेगा। चाहे उसके सामने जल्लाद खड़ा हो, यातना देने वाला हो या अग्नि प्रज्वलित हो, फिर भी वह अपने संकल्प पर अडिग रहेगा। उसकी दृष्टि इस पर नहीं होगी कि उसे क्या सहना पड़ेगा बल्कि इस पर होगी कि उसे क्या करना है। वह उस सम्माननीय कर्म पर उसी प्रकार विश्वास करेगा जैसे किसी श्रेष्ठ व्यक्ति पर करता है। उसे अपने लिए उपयोगी, सुरक्षित तथा लाभकारी समझेगा। जो कर्म सम्माननीय है, चाहे वह कितना ही कठोर और कष्टसाध्य क्यों न हो, उसका स्थान उसकी दृष्टि में वैसा ही होगा जैसा किसी अच्छे मनुष्य का, चाहे वह निर्धन हो, निर्वासित हो, या दुर्बल और पीला दिखाई देता हो। 

    अब मान लो कि एक ओर एक श्रेष्ठ मनुष्य है जिसके पास अपार धन-संपत्ति है, और दूसरी ओर एक ऐसा श्रेष्ठ मनुष्य है जिसके पास स्वयं के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है किन्तु अपने भीतर ही वह सब कुछ रखता है। दोनों समान रूप से श्रेष्ठ हैं, यद्यपि भाग्य ने उन्हें बिल्कुल भिन्न परिस्थितियाँ प्रदान की हैं। मैं फिर कहता हूँ, जिस प्रकार हम व्यक्तियों का मूल्यांकन करते हैं, ठीक उसी प्रकार उनकी परिस्थितियों का भी मूल्यांकन करना चाहिए।

    सद्गुण उतना ही प्रशंसनीय होता है जब वह किसी स्वस्थ और स्वतंत्र शरीर में पाया जाता है, जितना कि तब जब वह किसी रोगग्रस्त और बेड़ियों में जकड़े हुए शरीर में विद्यमान हो। इसलिए यदि भाग्य ने तुम्हारे सद्गुण को एक स्वस्थ और पूर्ण शरीर प्रदान किया है तो उसके कारण उसे अधिक मूल्यवान मत समझो, जितना कि तब समझते यदि उसका शरीर किसी प्रकार से विकृत होता। ऐसा करना वैसा ही होगा जैसे किसी स्वामी का मूल्य उसके दासों के वस्त्रों के आधार पर आँकना। क्योंकि ये सभी वस्तुएँ, जो भाग्य के अधीन हैं। धन, शरीर और यश— सिर्फ सेवक हैं। वे दुर्बल, क्षणभंगुर, नश्वर और अस्थिर हैं; उनका स्वामित्व कभी स्थायी नहीं रहता। इसके विपरीत, सद्गुण के कार्य स्वतंत्र और अजेय होते हैं। वे इस कारण अधिक वरणीय नहीं हो जाते कि भाग्य उनके प्रति अनुकूल है। न ही इस कारण कम वरणीय हो जाते हैं कि परिस्थितियाँ उनके प्रतिकूल हैं।

    जीवन की परिस्थितियों में चयन का वही स्थान है, जो मनुष्यों के बीच मित्रता का होता है। यदि तुम्हारा मित्र एक श्रेष्ठ व्यक्ति है तो क्या तुम उसे इस कारण अधिक प्रेम करोगे कि वह निर्धन होने के बजाय धनी है या इसलिए कि उसका शरीर दुर्बल और कृश होने के बजाय बलवान और सुदृढ़ है? निश्चय ही नहीं। ठीक उसी प्रकार, अपनी जीवन-परिस्थितियों में भी तुम किसी अवस्था को केवल इसलिए अधिक नहीं अपनाओगे या उससे अधिक प्रेम नहीं करोगे कि वह सुखद और शांतिपूर्ण है, बजाय उस अवस्था के जो चिंताओं और कठिन परिश्रम से भरी हुई है। यदि तुम ऐसा करते हो तो फिर दो समान रूप से श्रेष्ठ व्यक्तियों में भी तुम उस व्यक्ति को अधिक प्रिय मानोगे जिसने अभी-अभी स्नान किया हो और शरीर पर तेल-मालिश करवाई हो, बजाय उस व्यक्ति के जो धूल से लथपथ हो और जिसे दाढ़ी बनाने की आवश्यकता हो। फिर धीरे-धीरे तुम यहाँ तक पहुँच जाओगे कि जिस व्यक्ति का शरीर पूर्णतः स्वस्थ और अक्षुण्ण हो, उससे उस व्यक्ति की अपेक्षा अधिक स्नेह करोगे जो लँगड़ा हो या जिसकी एक आँख न हो।अंततः तुम्हारी रुचि इतनी नखरे वाली हो जाएगी कि दो समान रूप से सम्माननीय और बुद्धिमान व्यक्तियों में भी तुम उसी को चुनोगे जिसके लंबे और घुँघराले बाल हों! किन्तु जब दोनों में सद्गुण समान है, तब अन्य बातों की असमानता का कोई महत्व नहीं रह जाता। क्योंकि वे अन्य सभी विशेषताएँ उनके वास्तविक व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं हैं बल्कि केवल बाहरी और आकस्मिक जोड़ हैं।

    क्या किसी परिवार में कोई माता या पिता इतना अन्यायपूर्ण भेदभाव करता है कि वह स्वस्थ संतान को बीमार संतान की अपेक्षा अधिक प्रेम करे या लंबे और सुंदर पुत्र को छोटे या सामान्य कद वाले पुत्र से अधिक स्नेह दे? जंगली पशु भी अपने बच्चों में ऐसा भेद नहीं करते। जब वे उन्हें दूध पिलाने के लिए लेटते हैं तो सभी शावकों को समान रूप से दूध पिलाते हैं। पक्षी भी अपने घोंसले के सभी बच्चों में भोजन समान रूप से बाँटते हैं। जिस प्रकार ओडीसियस अपनी पथरीली और साधारण इथाका लौटने के लिए उतना ही उत्सुक है, जितना अगामेम्नोन अपनी भव्य मायसीनी की विशाल प्राचीरों के पास लौटने के लिए। कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभूमि से इसलिए प्रेम नहीं करता कि वह महान या समृद्ध है। वह उससे केवल इसलिए प्रेम करता है क्योंकि वह उसकी अपनी मातृभूमि है।

    इन उपमाओं का उद्देश्य क्या है? यह दिखाना कि सद्गुण अपनी सभी कृतियों को अपनी ही संतान के समान निष्पक्ष दृष्टि से देखता है और उन सब पर समान रूप से अपना स्नेह रखता है। हाँ, यदि कोई अंतर होता भी है तो वह यह कि जो कर्म अधिक कठिनाइयों और संकटों में पड़े होते हैं, उनकी ओर उसका ध्यान और भी अधिक होता है। जिस प्रकार माता-पिता का स्नेह उस संतान की ओर कुछ अधिक झुक जाता है जो दया और सहारे की अधिक आवश्यकता रखती है, उसी प्रकार सद्गुण भी अपने उन कर्मों से अधिक प्रेम नहीं करता जो संकट या कष्ट में दिखाई देते हैं बल्कि एक अच्छे माता-पिता की तरह उन पर अधिक ध्यान देता है और उनका अधिक पालन-पोषण करता है।

    एक शुभ दूसरे शुभ से बड़ा क्यों नहीं होता? क्योंकि जो वस्तु उचित है, उससे अधिक उचित कुछ नहीं हो सकता। जो समतल है, उससे अधिक समतल भी कुछ नहीं हो सकता। जब दो वस्तुएँ समान हों, तब यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से कोई एक दूसरी से अधिक समान है। इसी प्रकार, जो सम्माननीय है, उससे अधिक सम्माननीय भी कुछ नहीं हो सकता। यदि सभी सद्गुणों का स्वभाव समान है तो शुभ की तीनों श्रेणियाँ भी समान हैं। मेरा आशय यह है कि संयमपूर्वक आनंदित होना और संयमपूर्वक दुःख सहना— दोनों समान हैं। वहाँ का हर्ष यहाँ की उस दृढ़चित्तता से बढ़कर नहीं है, जो यातना देने वाले के सामने भी अपनी पीड़ा की चीखों को रोक लेती है। वे शुभ वरणीय हैं और ये प्रशंसनीय। फिर भी दोनों समान हैं क्योंकि श्रेष्ठ शुभ की शक्ति इतनी पर्याप्त होती है कि वह उससे जुड़ी किसी भी असुविधा का सामना कर सकती है। जो व्यक्ति इन्हें असमान समझता है, वह स्वयं सद्गुणों से अपनी दृष्टि हटाकर बाहरी वस्तुओं की ओर देखने लगता है। वास्तविक शुभों का भार भी समान होता है और उनका महत्व भी समान होता है। झूठे शुभ भीतर से प्रायः खोखले होते हैं। वे देखने में बड़े और आकर्षक प्रतीत होते हैं किन्तु जब उन्हें तराजू पर तौला जाता है, तब उनका छल प्रकट हो जाता है। इसलिए, प्रिय लूसीलियस, जिस वस्तु की प्रशंसा युक्तिसंगत विवेक करता है, वही दृढ़ और स्थायी होती है। वह मन को सुदृढ़ बनाती है और उसे ऊँचाइयों तक उठाती है, जहाँ वह सदा के लिए स्थित रहता है। इसके विपरीत, जिन वस्तुओं की बिना उचित कारण के प्रशंसा की जाती है और जिन्हें केवल जनसामान्य शुभ मानते हैं, वे हमें केवल व्यर्थ के गर्व से भर देती हैं और तुच्छ वस्तुओं में आनंद लेने के लिए प्रेरित करती हैं। इसी प्रकार, जिन वस्तुओं को लोग अनिष्ट समझकर उनसे भयभीत होते हैं, वे भी हमारे मन को उसी प्रकार आतंकित करती हैं, जैसे पशु केवल भयावह दिखाई देकर लोगों को डरा देते हैं। अतः दोनों ही स्थितियों में हमारा मन बिना किसी उचित कारण के प्रभावित होता है। पहली स्थिति में वह व्यर्थ ही फूल जाता है और दूसरी स्थिति में व्यर्थ ही चिंता और भय से ग्रस्त हो जाता है। न पहली प्रकार की वस्तुएँ वास्तव में आनंद के योग्य हैं और न दूसरी प्रकार की भय के।

    केवल विवेक ही अपने निर्णय में अपरिवर्तनीय और अडिग रहता है क्योंकि वह इंद्रियों का दास नहीं बल्कि उनका स्वामी होता है। जैसे एक सही विवेक दूसरे सही विवेक के समान होता है, वैसे ही एक सही बात दूसरी सही बात के समान होती है। इसलिए सद्गुण भी सद्गुण के समान होता है क्योंकि सद्गुण और कुछ नहीं बल्कि सम्यक् विवेक ही है। सभी सद्गुण विवेक की कार्यप्रणालियाँ हैं। यदि वे सम्यक् हैं तो वे विवेक की कार्यप्रणालियाँ हैं। यदि वे सम्यक् हैं तो वे एक-दूसरे के समान भी हैं। जैसा विवेक होता है, वैसे ही विवेक से उत्पन्न कर्म भी होते हैं इसलिए वे भी सभी समान हैं। क्योंकि वे विवेक के अनुरूप होते हैं इसलिए वे एक-दूसरे के भी अनुरूप और समान होते हैं।

    मेरा कहना यह है कि कर्म एक-दूसरे के समान हैं, जहाँ तक वे सम्माननीय और उचित हैं। फिर भी उनके बीच उनके विषय या परिस्थितियों के कारण बड़े अंतर हो सकते हैं। किसी कर्म का क्षेत्र कभी व्यापक होता है, कभी सीमित, कभी वह उच्च पद या प्रतिष्ठा से संबंधित होता है तो कभी साधारण होता है। कभी उसका संबंध बहुत-से लोगों से होता है, तो कभी केवल कुछ ही लोगों से। फिर भी इन सभी कर्मों में जो सर्वोत्तम तत्व है, वह समान है क्योंकि वे सभी सम्माननीय हैं। ठीक यही बात श्रेष्ठ मनुष्यों पर भी लागू होती है। जहाँ तक उनके श्रेष्ठ होने का प्रश्न है, वे सभी समान हैं। किन्तु उनमें आयु का अंतर हो सकता है। कोई बड़ा है, कोई छोटा। शरीर का अंतर हो सकता है। कोई सुंदर है, कोई कुरूप भाग्य का भी अंतर हो सकता है। कोई धनी है, कोई निर्धन, कोई प्रभावशाली, सामर्थ्यवान और नगरों तथा जनसमुदायों में प्रसिद्ध है जबकि दूसरा सामान्यतः अपरिचित और गुमनाम है। फिर भी जहाँ तक उनकी श्रेष्ठता का संबंध है, वे सभी समान हैं।

    इंद्रियाँ शुभ और अशुभ के विषय में कोई निर्णय नहीं करतीं। वे यह नहीं जानतीं कि क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी। जब तक कोई वस्तु उनके सामने उपस्थित न हो, वे उसके विषय में कोई मत नहीं बना सकतीं। उनमें न भविष्य को पहले से देखने की क्षमता होती है और न अतीत को स्मरण रखने की। वे तर्कसंगत संबंधों को भी नहीं समझतीं। जबकि यही तर्कसंगत संबंध समय की संपूर्ण श्रृंखला को और उस जीवन की एकता को, जिसे सीधे मार्ग पर चलना है, परस्पर जोड़ते हैं। इसलिए शुभ और अशुभ का निर्णय करने वाला विवेक है। विवेक उन सभी वस्तुओं को, जो बाहरी हैं और उसकी अपनी नहीं हैं, तुच्छ समझता है। उसके विचार में जो वस्तुएँ न शुभ हैं और न अशुभ, वे अत्यंत छोटी और नगण्य बाहरी जोड़ मात्र हैं क्योंकि विवेक की दृष्टि में प्रत्येक वास्तविक शुभ मन के भीतर ही स्थित होता है। किन्तु विवेक कुछ शुभों को प्रधान मानता है, जिनकी ओर वह जान-बूझकर अग्रसर होता है जैसे, विजय, योग्य संतान और मातृभूमि का कल्याण। कुछ शुभ द्वितीय श्रेणी के हैं, जो केवल प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रकट होते हैं जैसे, रोग, अग्नि या निर्वासन को समभाव से सहना। कुछ अन्य मध्यवर्ती हैं, जो न प्रकृति के अधिक अनुकूल हैं और न उसके प्रतिकूल जैसे, विवेकपूर्ण ढंग से चलना या शांत भाव से बैठना। क्योंकि बैठना प्रकृति के अधिक अनुकूल नहीं है, जितना कि खड़ा होना या चलना। शुभ की पहली दो श्रेणियाँ एक-दूसरे से भिन्न हैं। पहली श्रेणी के शुभ प्रकृति के अनुकूल होते हैं, जैसे अपनी संतान की भक्ति और स्नेह से आनंदित होना या अपनी मातृभूमि की सुरक्षा से प्रसन्न होना। दूसरी श्रेणी के शुभ प्रकृति के प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रकट होते हैं जैसे, यातना के सामने साहसपूर्वक अडिग रहना और रोग से शरीर के भीतर के अंग सूख जाने पर भी प्यास को धैर्यपूर्वक सहना।

    "यह क्या? क्या प्रकृति के प्रतिकूल कोई वस्तु भी शुभ हो सकती है?" नहीं, किन्तु कभी-कभी वह परिस्थिति जिसमें शुभ प्रकट होता है, प्रकृति के प्रतिकूल होती है। घायल होना, धीमी आग पर जलाया जाना या रोग से पीड़ित होना, ये सभी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। किन्तु ऐसी विपत्तियों के बीच भी अटूट और अडिग मनोबल बनाए रखना प्रकृति के अनुकूल है। संक्षेप में कहें तो, शुभ जिस परिस्थिति में प्रकट होता है, वह कभी-कभी प्रकृति के प्रतिकूल हो सकती है। परन्तु स्वयं शुभ कभी भी प्रकृति के प्रतिकूल नहीं होता क्योंकि विवेक के बिना कोई शुभ नहीं है। विवेक सदैव प्रकृति का अनुसरण करता है।

    तो फिर विवेक क्या है? वह प्रकृति का अनुकरण है। मनुष्य का परम शुभ क्या है? वही आचरण करना जैसा, प्रकृति ने उसके लिए निर्धारित किया है।

    "इसमें कोई संदेह नहीं कि वह शांति, जिसे कभी संघर्ष का सामना ही न करना पड़ा हो, उस शांति की अपेक्षा अधिक सौभाग्यशाली है जो बहुत अधिक रक्तपात के बाद प्राप्त हुई हो। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि वह स्वास्थ्य, जो कभी बाधित न हुआ हो, उस स्वास्थ्य की अपेक्षा अधिक सौभाग्यशाली है जो गंभीर और प्राणघातक रोगों से संघर्ष तथा धैर्य के बल पर पुनः प्राप्त किया गया हो। उसी प्रकार, इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आनंद उस मन की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ शुभ है, जो घावों और अग्नि की यातनाओं को सहने के लिए स्वयं को दृढ़ बनाए रखता है।" नहीं। क्योंकि ये सब आकस्मिक परिस्थितियाँ हैं जिनमें बहुत अधिक भिन्नता हो सकती है। उनका मूल्यांकन उन लोगों के लिए उनकी उपयोगिता के आधार पर किया जाता है जो उनका सामना करते हैं। परंतु उन सभी में जो शुभ विद्यमान है, वह प्रकृति के अनुरूप रहने का दृढ़ संकल्प है, और यह सभी में समान होता है। जब हम सीनेट में किसी प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करते हैं तो यह नहीं कहा जा सकता कि एक सीनेटर दूसरे की अपेक्षा अधिक सहमत था। सभी ने समान रूप से समर्थन किया। मैं सद्गुणों के विषय में भी यही कहता हूँ। वे सभी प्रकृति के अनुरूप हैं। और शुभों के विषय में भी यही कहता हूँ। वे सभी प्रकृति के अनुकूल हैं। एक व्यक्ति युवावस्था में मर जाता है, दूसरा वृद्धावस्था में और तीसरा जन्म लेते ही, जीवन की केवल एक झलक देखकर। फिर भी वे सभी समान रूप से नश्वर थे, चाहे मृत्यु ने किसी को अधिक समय तक जीने दिया हो, किसी को युवावस्था में ही रोक दिया हो और किसी के जीवन का आरंभ ही समाप्त कर दिया हो।

    एक व्यक्ति भोजन करते-करते ही गिरकर मर जाता है। दूसरा नींद से फिर कभी नहीं जागता और तीसरे की मृत्यु संभोग के समय हो जाती है। अब इनकी तुलना उन लोगों से करो जो तलवार से मारे जाते हैं, साँप के डसने से प्राण खो देते हैं, भवन के गिरने से दबकर मर जाते हैं या जिनकी नसों को धीरे-धीरे मरोड़कर और कसकर उन्हें यातनापूर्वक मृत्यु के घाट उतार दिया जाता है। इनमें से कुछ की मृत्यु को अपेक्षाकृत बेहतर और कुछ की मृत्यु को अधिक कष्टदायक कहा जा सकता है। किन्तु वास्तव में उनकी मृत्यु समान है। उन्होंने मृत्यु तक पहुँचने का मार्ग भिन्न-भिन्न प्रकार से तय किया, पर जहाँ वे पहुँचे, वह एक ही स्थान था। कोई मृत्यु बड़ी या छोटी नहीं होती क्योंकि हर मृत्यु की एक ही सीमा होती है— जीवन का अंत। मैं शुभों के विषय में भी तुमसे यही कहता हूँ। एक शुभ पूर्णतः सुखद परिस्थितियों के बीच प्राप्त होता है। दूसरा कटु एवं कष्टपूर्ण परीक्षाओं के बीच। एक को भाग्य की उदारता का संयमपूर्वक उपयोग करना पड़ता है जबकि दूसरे को भाग्य की कठोरता पर विजय पानी पड़ती है। फिर भी दोनों समान रूप से शुभ हैं, यद्यपि एक ने समतल और सुगम मार्ग पर यात्रा की है और दूसरे ने पथरीले तथा कठिन मार्ग पर। क्योंकि उन सबका लक्ष्य एक ही है—वे शुभ हैं, प्रशंसनीय हैं और सद्गुण तथा विवेक के सहचर हैं। सद्गुण उन सभी वस्तुओं को जिन्हें वह शुभ के रूप में पहचानता है, समान मानता है।

    तुम्हें हमारे इस सिद्धांत पर आश्चर्य क्यों होना चाहिए? एपिक्यूरस के दर्शन में भी दो शुभ हैं जो उसके अनुसार परम और सर्वाधिक सुखमय जीवन के आधार हैं— एक, शरीर पीड़ा से मुक्त हो। दूसरा, मन अशांति से मुक्त हो। जब ये दोनों पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाते हैं, तब इनमें कोई वृद्धि नहीं हो सकती। जो पहले ही पूर्ण है, उसमें और क्या बढ़ाया जा सकता है? यदि शरीर पीड़ा से मुक्त है तो इस पीड़ारहित अवस्था में और क्या जोड़ा जा सकता है? यदि मन स्वयं से संतुष्ट और शांत है तो उस शांति में और क्या वृद्धि हो सकती है? जिस प्रकार निर्मल और बादलरहित आकाश, जो एक छोर से दूसरे छोर तक स्वच्छ प्रकाश से भरा हो, उससे अधिक निर्मल नहीं हो सकता, उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति अपने शरीर और मन— दोनों की समुचित देखभाल करता है और इन्हीं दोनों के आधार पर अपना कल्याण निर्मित करता है, तब उसकी अवस्था पूर्ण हो जाती है। यदि उसके मन में कोई अशांति नहीं है और उसके शरीर में कोई पीड़ा नहीं है तो उसकी इच्छा पूरी तरह पूर्ण हो चुकी है। इसके बाद यदि उसे और भी सुखद अनुभव प्राप्त हों तो वे उसके परम शुभ में कोई वृद्धि नहीं करते। वे केवल मानो उसमें थोड़ा-सा रस और माधुर्य जोड़ देते हैं।

    मैं तुम्हें एपिक्यूरस के यहाँ शुभों का एक ऐसा विभाजन दिखाऊँगा जो हमारे इस विभाजन से बहुत मिलता-जुलता है। उसकी रचनाओं में कुछ ऐसी अवस्थाएँ हैं जिन्हें वह अपने लिए घटित होते देखना चाहता है जैसे, शरीर को प्रत्येक प्रकार की पीड़ा से मुक्त विश्राम मिलना और मन का अपने ही शुभों का चिंतन करते हुए आनंदपूर्वक शांत रहना। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी अवस्थाएँ भी हैं जिन्हें वह अपने ऊपर आना तो नहीं चाहता किन्तु यदि वे आ जाएँ तो भी उनकी प्रशंसा करता है और उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है। इनमें वही बातें आती हैं जिनका मैंने अभी कुछ पहले उल्लेख किया था— रोग और अत्यंत तीव्र पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहना। ऐसा अनुभव स्वयं एपिक्यूरस ने अपने जीवन के 'अंतिम और परम धन्य दिन' में किया था। उसने लिखा कि मूत्राशय की पीड़ा और पेट के घावों से उसे ऐसी यातनाएँ हो रही थीं जिनमें पीड़ा की और कोई वृद्धि संभव नहीं थी। फिर भी वह दिन उसके लिए 'धन्य' था। किन्तु कोई व्यक्ति उस दिन को धन्य नहीं कह सकता, जब तक कि वह परम शुभ का अधिकारी न हो। इस प्रकार, स्वयं एपिक्यूरस के दर्शन में भी ऐसे शुभ हैं जिन्हें मनुष्य सामान्यतः अपने जीवन में नहीं चाहता। किन्तु यदि वे आ जाएँ तो उन्हें स्वीकार करना चाहिए, उनकी प्रशंसा करनी चाहिए और उन्हें सर्वोत्तम शुभों के समान मानना चाहिए। यह स्वीकार करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसा शुभ भी महानतम शुभों के समान था क्योंकि उसी ने एपिक्यूरस के धन्य जीवन का समापन किया और उसी के लिए उसने अपने अंतिम श्वास तक कृतज्ञता व्यक्त की। क्योंकि मनुष्य-स्वभाव का परम शुभ शरीर और मन— दोनों की शांति तक ही सीमित है।

    प्रिय लूसीलियस, मुझे इससे भी अधिक साहसपूर्ण बात कहने की अनुमति दो। यदि वास्तव में कुछ शुभ अन्य शुभों से बड़े हो सकते तो मैं सुखद और विलासपूर्ण शुभों की अपेक्षा उन कठोर और कठिन शुभों को अधिक महत्व देता। क्योंकि कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना, सुख-सुविधाओं पर नियंत्रण रखने से अधिक महान है। निस्संदेह, जिस कारण कोई व्यक्ति समृद्धि का उचित ढंग से उपयोग करता है, उसी कारण वह विपत्ति का भी साहसपूर्वक सामना करता है। जो सैनिक शत्रु के आक्रमण न होने के कारण शिविर के बाहर निश्चिंत होकर विश्राम कर रहा है, वह भी उतना ही साहसी हो सकता है जितना वह सैनिक, जिसकी जाँघ की नसें कट जाने पर भी वह घुटनों के बल सीधा खड़ा रहता है और अपने हथियार हाथ से नहीं गिरने देता। फिर भी 'शाबाश, वीरों!' का जयघोष तो उन्हीं के लिए सुनाई देता है जो युद्धभूमि से रक्तरंजित होकर लौटते हैं। इसलिए यदि मुझे किसी शुभ की विशेष प्रशंसा करनी हो, तो मैं उन्हीं शुभों की प्रशंसा करूँगा, जो साहस से भरे हों, जो कठिन परीक्षाओं में परखे गए हों और जिन्होंने भाग्य की प्रतिकूलताओं से संघर्ष करके विजय प्राप्त की हो।

    क्या मैं म्यूशियस (Mucias) के उस झुलसे हुए और विकलांग हाथ की प्रशंसा किसी दूसरे साहसी व्यक्ति के अक्षत हाथ से अधिक करने में संकोच करूँगा? वह शत्रुओं से घिरा खड़ा था, चारों ओर अग्नि जल रही थी। फिर भी उसने उनकी तनिक भी परवाह नहीं की। वह अपने ही हाथ को शत्रु की अग्नि पर धीरे-धीरे जलते हुए देखता रहा, यहाँ तक कि पोर्सेना (Porsenna) जिसके दंड को वह स्वयं अपनी अडिगता से अर्थहीन बना रहा था, उसकी कीर्ति से ईर्ष्या करने लगा और उसने उसकी इच्छा के विरुद्ध आग हटाने का आदेश दे दिया। मैं इस घटना को प्रमुख शुभों में क्यों न गिनूँ? मैं इसे उन निश्चिंत और भाग्य की किसी परीक्षा से न गुज़रे शुभों से अधिक महान क्यों न मानूँ? क्योंकि बिना हाथ के शत्रु पर विजय प्राप्त करना, हाथ में तलवार लेकर विजय पाने की अपेक्षा जितना अधिक दुर्लभ है, उतना ही अधिक महान भी है।

    "क्या कहा?" तुम पूछते हो। "क्या तुम स्वयं अपने लिए ऐसे शुभ का चयन करोगे?" क्यों नहीं? यदि ऐसे कर्म का चयन ही नहीं किया जा सकता। हाँ, यदि उसे सचमुच चुनना ही संभव न हो तो फिर उसे किया भी नहीं जा सकता। तो क्या मैं इसके बजाय यह चुनूँ कि अपने हाथ किसी दास-प्रिय (कैटामाइट) से अपनी उँगलियों के जोड़ दबवाने के लिए बढ़ाऊँ या किसी गणिका, अथवा वेश्यावृत्ति करने वाले पुरुष से अपनी उँगलियों का स्पर्श और मालिश करवाऊँ? मैं म्यूशियस को अधिक सौभाग्यशाली क्यों न मानूँ? उसने अपना हाथ अग्नि को छूने के लिए उसी सहजता से आगे बढ़ाया जैसे, कोई व्यक्ति मालिश कराने के लिए अपना हाथ बढ़ाता है। उसने अपनी भूल का प्रायश्चित कर लिया; निःशस्त्र और एक हाथ से विकलांग हो जाने पर भी उसने अपना युद्ध जीत लिया। अपने उसी झुलसे और विकृत हाथ के बल पर उसने दो राजाओं पर विजय प्राप्त की।


अभी के लिए विदा 

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सद्गुणों की वांछनीयता एवं साहस के संदर्भ में -- पत्र - 67 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस  सामान्य बातों से आरंभ करूँ। वसंत ने अपने रूप को फैलाना शुरू कर दिया है किंतु यद्यपि वह अब ग्रीष्म की ओर बढ़ रहा है और गर्मी...