प्रिय लूसीलियस
सामान्य बातों से आरंभ करूँ। वसंत ने अपने रूप को फैलाना शुरू कर दिया है किंतु यद्यपि वह अब ग्रीष्म की ओर बढ़ रहा है और गर्मी पड़ जानी चाहिए थी। फिर भी मौसम कुछ ठंडा बना हुआ है और अभी भी उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अक्सर ऐसा होता है कि वह फिर से शीत ऋतु की ओर लौट जाता है। क्या तुम जानना चाहते हो कि मौसम अभी भी कितना अनिश्चित है? मैं अभी तक पूरी तरह ठंडे पानी से स्नान करने का साहस नहीं करता। उसकी ठंडक को थोड़ा कम कर ही स्नान करता हूँ। तुम कहोगे, “इसका अर्थ तो यह हुआ कि तुम न गर्मी सह सकते हो, न ठंड।” बिल्कुल ठीक कहते हो, प्रिय लूसीलियस। मेरी आयु अब अपनी ही स्वाभाविक ठंडक से संतुष्ट है। ग्रीष्म ऋतु के मध्य में भी मुझे शायद ही कभी पूरी तरह गर्मी महसूस होती है और बहुत कम ऐसा होता है कि मैं अपने शरीर से कोई वस्त्र उतारूँ।
मैं वृद्धावस्था का इस बात के लिए आभारी हूँ कि उसने मुझे बिस्तर तक सीमित कर दिया है। इसके लिए आभारी क्यों न रहूँ? जिन कामों को करने की इच्छा मुझे नहीं करनी चाहिए थी, अब उन्हें करना मेरे लिए संभव ही नहीं रहा। अब मेरा सबसे अधिक संवाद पुस्तकों से होता है। जब भी तुम्हारा कोई पत्र आता है, मुझे ऐसा लगता है मानो मैं तुम्हारे साथ ही बैठा हूँ। ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं तुम्हें केवल उत्तर लिख नहीं रहा बल्कि सचमुच तुम्हारे प्रश्नों का प्रत्यक्ष उत्तर दे रहा हूँ। इसलिए आओ, जिस विषय के बारे में तुमने पूछा है, उसी पर विचार करें और उसकी प्रकृति की उसी प्रकार सावधानी से जाँच करें, जैसे हम आमने-सामने बैठकर बातचीत कर रहे हों।
तुम पूछते हो कि क्या प्रत्येक शुभ वस्तु वांछनीय होती है। तुम कहते हो, “यदि यातनाएँ सहते हुए साहसपूर्वक व्यवहार करना, आग में जलते हुए भी वीरतापूर्वक अडिग रहना और रोगग्रस्त होने पर धैर्य बनाए रखना, ये सब शुभ हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि ये सब वांछनीय भी हैं। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि इनमें से कौन-सी ऐसी चीज़ है जिसकी कोई कामना करे। निश्चय ही मैं ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता जिसकी इच्छा इस रूप में पूरी हुई हो कि उसे कोड़ों से पीटा गया हो, गठिया की पीड़ा ने उसके शरीर को मरोड़ दिया हो या उसे यातना-यंत्र पर खींचकर कष्ट दिया गया हो।”
प्रिय लूसीलियस, इन बातों में भेद करके देखो, तब तुम्हें समझ में आएगा कि इनमें भी कुछ ऐसा है जिसे चुनना उचित है। मैं यह पसंद करूँगा कि मुझे कभी यातनाएँ न सहनी पड़ें। लेकिन यदि कभी उन्हें सहना ही पड़े तो मेरी इच्छा होगी कि उस परिस्थिति में मैं साहस, सम्मान और निर्भीकता के साथ अपना आचरण करूँ। मैं यही चाहूँगा और इसमें आश्चर्य ही क्या है कि मेरे जीवन में कभी युद्ध न आए। लेकिन यदि युद्ध आ ही जाए तो मेरी इच्छा होगी कि उसके साथ आने वाले घावों, भूख और अन्य सभी अनिवार्य कष्टों को मैं गरिमा और धैर्य के साथ सहन करूँ। मैं बीमार पड़ना नहीं चाहता। मैं इतना भी मूर्ख नहीं हूँ! किंतु यदि कभी रोगग्रस्त होना पड़े तो मेरी इच्छा होगी कि मेरा आचरण न तो असंयमपूर्ण हो और न ही कायरतापूर्ण। इसलिए वांछनीय स्वयं वे कष्ट नहीं हैं बल्कि वह सद्गुण है जिसके सहारे मनुष्य उन कष्टों को धैर्य, साहस और गरिमा के साथ सहन करता है।
हमारे मत के कुछ अनुयायियों का कहना है कि ऐसे सभी कष्टों को साहसपूर्वक सहन करना, यद्यपि उनसे पूरी तरह बचना आवश्यक नहीं है। फिर भी वे स्वयं वांछनीय नहीं हैं। उनका तर्क है कि इच्छा और आकांक्षा का लक्ष्य केवल वही होना चाहिए जो पूर्णतः शुभ, शांत और हर प्रकार की व्याकुलता से परे हो। मैं इस मत से सहमत नहीं हूँ। क्यों? पहला कारण यह है कि कोई भी वस्तु शुभ हो और साथ ही वांछनीय न हो, यह संभव नहीं है। दूसरा, यदि सद्गुण वांछनीय है और सद्गुण के बिना कोई भी वस्तु शुभ नहीं है तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रत्येक शुभ वस्तु वांछनीय है। तीसरा, भले ही यातना स्वयं वांछनीय न हो परंतु यातना को साहसपूर्वक सहन करना निश्चय ही वांछनीय है।
मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या साहस स्वयं वांछनीय नहीं है? किंतु साहस तो संकटों की परवाह नहीं करता बल्कि वह उनका सामना करने की चुनौती स्वीकार करता है। साहस का सबसे सुंदर और प्रशंसनीय रूप यही है कि वह अग्नि के सामने झुकने से इंकार करता है, घावों का सामना करने के लिए स्वयं आगे बढ़ता है और कभी-कभी तो तीरों से बचने का प्रयत्न भी नहीं करता बल्कि उन्हें अपनी छाती पर सह लेता है। यदि साहस वांछनीय है तो यातना को धैर्यपूर्वक सहन करना भी वांछनीय है क्योंकि वह साहस का ही एक अविभाज्य अंग है।
जैसा कि मैंने कहा, यदि तुम इस भेद को समझ लोगे तो कोई भी बात तुम्हें भ्रमित नहीं करेगी। क्योंकि वांछनीय यातना भोगना नहीं है बल्कि उसे साहसपूर्वक सहन करना वांछनीय है। मेरी इच्छा तो यही है कि मैं हर परिस्थिति में साहस के साथ आचरण करूँ और यही सद्गुण है।
“लेकिन ऐसा कौन है जिसने अपने लिए कभी ऐसी इच्छा की हो?” कुछ इच्छाएँ स्पष्ट रूप से व्यक्त की जाती हैं क्योंकि वे किसी विशेष वस्तु या घटना से संबंधित होती हैं जबकि कुछ इच्छाएँ अप्रकट रहती हैं क्योंकि एक ही इच्छा के भीतर अनेक बातें समाहित होती हैं। उदाहरण के लिए, मैं अपने लिए एक सम्मानपूर्ण जीवन की कामना करता हूँ। किंतु सम्मानपूर्ण जीवन अनेक सम्मानजनक कर्मों से मिलकर बनता है। इस एक इच्छा के भीतर ही रेगुलस (Regulas) का यातना-पीड़ित बंदी जीवन, कैटो का अपने ही हाथों से अपने घाव को फिर से खोल देना, रुटिलियस का निर्वासन और वह विष का प्याला भी शामिल है जिसने सुकरात को कारागार से उठाकर अमर गौरव की ओर पहुँचा दिया। इस प्रकार, जब मैंने अपने लिए एक सम्मानपूर्ण जीवन की कामना की तो उसके साथ उन सभी परिस्थितियों को भी स्वीकार किया जिनके बिना कभी-कभी जीवन सम्मानपूर्ण नहीं बन सकता।
“वे तीन बार, चार बार धन्य हैं,जिनके भाग्य में ट्रॉय की ऊँची प्राचीरों के नीचे,अपने पिताओं की आँखों के सामने, वीरगति प्राप्त करना लिखा था।”
क्या किसी व्यक्ति के लिए ऐसी मृत्यु की कामना करना और यह स्वीकार करना कि ऐसी मृत्यु वांछनीय है, इन दोनों में वास्तव में कोई अंतर है?
डेसियस ने अपने देश के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया। वह मृत्यु की खोज में अपने घोड़े को पूरी गति से शत्रु-सेना के बीच ले गया। उसके बाद एक अन्य डेसियस ने भी अपने पिता के सद्गुण का अनुसरण करते हुए वही पवित्र और अब प्रसिद्ध हो चुकी प्रतिज्ञा ली और युद्ध के सबसे भीषण संघर्ष में कूद पड़ा। उसकी एकमात्र चिंता यह थी कि उसका आत्मबलिदान शुभ और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो क्योंकि वह मानता था कि ऐसी श्रेष्ठ मृत्यु, जो सद्गुण के कार्य के साथ प्राप्त हो, मनुष्य की कामना के योग्य होती है। तो क्या अब भी तुम्हें संदेह है कि सद्गुण का कोई महान कार्य करते हुए ऐसी मृत्यु प्राप्त करना जो सदा स्मरणीय बनी रहे, मनुष्य के लिए सर्वोत्तम और वांछनीय है?
जब कोई व्यक्ति यातना को साहसपूर्वक सहन करता है, तब वह अपने भीतर के सभी सद्गुणों का प्रयोग करता है। संभव है कि उनमें से कोई एक सद्गुण सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई दे जैसे, धैर्य। फिर भी वहाँ साहस भी उपस्थित होता है क्योंकि धैर्य, दृढ़ता और सहनशीलता का आधार वही है। वहाँ बुद्धि भी होती है क्योंकि उसके बिना कोई भी कार्य सोच-समझकर नहीं किया जा सकता। वही बुद्धि मनुष्य को प्रेरित करती है कि जब किसी परिस्थिति से बच निकलना संभव न हो, तब उसे यथासंभव साहस और गरिमा के साथ सहन करे। वहाँ अडिगता भी होती है जो अपने स्थान से कभी नहीं हटती और जिस पर चाहे जितना भी दबाव डाला जाए, वह अपने संकल्प को नहीं छोड़ती। वास्तव में, उस समय सभी सद्गुणों का अविभाज्य समूह उपस्थित होता है। प्रत्येक सम्मानजनक कर्म भले ही किसी एक विशेष सद्गुण द्वारा किया हुआ प्रतीत हो किंतु वह वास्तव में सभी सद्गुणों के सामूहिक विवेक और परामर्श के अनुरूप संपन्न होता है। इसलिए जिस कर्म को सभी सद्गुण मिलकर स्वीकार और अनुमोदित करते हैं, वह चाहे देखने में किसी एक सद्गुण का कार्य ही क्यों न लगे, वह निस्संदेह वांछनीय है।
तो फिर क्या? क्या तुम यह समझते हो कि केवल वही वस्तुएँ वांछनीय हैं जो सुख, आराम और ऐश्वर्य के साथ प्राप्त होती हैं जो भव्य भवनों के भीतर विलासपूर्ण जीवन के बीच मिलती हैं? नहीं, कुछ शुभ वस्तुओं का स्वरूप कठोर होता है। कुछ ऐसी भी कामनाएँ होती हैं जिनकी पूर्ति पर लोग बधाइयाँ नहीं देते बल्कि विस्मय, श्रद्धा और आदर के साथ उन्हें नमन करते हैं। क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि रेगुलस ने कार्थेज लौटने का मार्ग अपनी इच्छा से नहीं चुना था? कुछ क्षणों के लिए अपने मन को एक महान व्यक्ति के मन के समान बना लो। सामान्य लोगों की धारणाओं से स्वयं को अलग कर लो। सद्गुण की ऐसी कल्पना करो जो उसके वास्तविक गौरव के अनुरूप हो, उस सद्गुण की जो अपने सर्वोच्च और सबसे भव्य रूप में प्रकट होता है। ऐसे सद्गुण की जिसकी पूजा धूप और पुष्पमालाओं से नहीं बल्कि पसीने और रक्त से की जानी चाहिए। मार्कस कैटो को देखो। वह अपने निष्कलंक हाथों को अपने ही पवित्र वक्ष पर उठाता है और उस घाव को जो पर्याप्त गहरा नहीं था, स्वयं और अधिक गहरा कर देता है। मुझे बताओ, क्या तुम उससे कहोगे, “हाय, कितना दुखद!” या “मुझे तुम्हारे लिए बहुत खेद है”? या फिर तुम यह कहोगे, “मैं तुम्हारे इस महान कर्म की प्रशंसा करता हूँ।”
इस प्रसंग पर मुझे हमारे दार्शनिक दिमीत्रियस की बात याद आती है। वे उस जीवन को जो हर प्रकार की चिंता से मुक्त हो और जिस पर भाग्य का कोई आघात न हो, 'मृत सागर' कहा करते थे। पूर्ण निश्चिंतता में पड़े रहना, जहाँ न कोई चुनौती हो, न कोई लक्ष्य जिसकी ओर बढ़ना हो, न कोई बुराई जिसका विरोध करना हो, न कोई संघर्ष जिसमें अपने मन की दृढ़ता की परीक्षा हो, यह वास्तविक शांति नहीं है। यह तो मनुष्य की शक्ति का क्षीण हो जाना है। स्टोइक दार्शनिक अतालस कहा करते थे, “मैं यह अधिक पसंद करूँगा कि भाग्य मुझे अपने युद्ध-शिविर में रखे, न कि विलासिता के बीच। यदि मुझ पर यातनाएँ आएँ तो मैं उन्हें साहसपूर्वक सहूँ, यही उचित है। यदि मुझे मृत्यु मिले तो भी मैं उसका सामना साहस के साथ करूँ, यही उचित है।” एपिक्यूरस भी कहेगा, “यह सुखद है।” किंतु मैं ऐसे कठोर और गौरवपूर्ण कर्म को इतने कोमल शब्द ‘सुखद’ से कभी संबोधित नहीं करूँगा। यदि मैं अग्नि में जल रहा हूँ किंतु पराजित नहीं हुआ हूँ तो यह वांछनीय क्यों न हो? इसलिए नहीं कि अग्नि मुझे जलाती है बल्कि इसलिए कि वह मुझे परास्त नहीं कर पाती।
सद्गुण से बढ़कर कोई वस्तु उत्कृष्ट नहीं है और उससे अधिक सुंदर भी कुछ नहीं। इसलिए जो कुछ भी सद्गुण की आज्ञा के अनुसार किया जाता है, वह केवल शुभ ही नहीं बल्कि वांछनीय भी होता है।
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