Friday, 17 July 2026

अवकाश के संदर्भ में -- पत्र - 68

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हारी इस योजना का समर्थन करता हूँ। अवकाश में एकांतवास करो। लेकिन यह तथ्य भी छिपाए रखो कि तुम अवकाश में हो। यह समझो कि ऐसा करके तुम स्टोइक दार्शनिकों के उदाहरण का अनुसरण करोगे, भले ही उनके शब्दशः उपदेशों का नहीं। बल्कि वास्तव में तुम उनके उपदेशों का भी पालन ही करोगे क्योंकि तुम्हारा यह आचरण तुम्हारी अपनी दृष्टि में भी उचित होगा और वस्तुतः किसी भी विवेकशील व्यक्ति की दृष्टि में भी। जब हम राज्य-सेवा का उपदेश देते हैं तो हमारा आशय किसी भी राज्य से नहीं होता न ही यह कि मनुष्य को हर समय और जीवन भर निरंतर राज्य की सेवा ही करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, हम बुद्धिमान व्यक्ति के लिए उसके योग्य जिस राज्य की कल्पना करते हैं, वह समस्त विश्व है। इसलिए यदि वह सार्वजनिक जीवन से निवृत्त भी हो जाए, तब भी वह राज्य से बाहर नहीं होता। बल्कि संभव है कि इस छोटे-से कोने को छोड़कर वह एक अधिक विशाल और व्यापक राज्य में प्रवेश कर रहा हो, मानो वह स्वर्ग में अपना स्थान ग्रहण कर रहा हो। अब उसे यह अनुभव हो रहा हो कि न्यायासन पर बैठते समय या उच्च राजकीय पद पर आसीन रहते समय उसका स्थान कितना तुच्छ था। इस बात को अपने मन में दृढ़ता से बसा लो। जब बुद्धिमान मनुष्य के सामने दैवी और मानवीय विषय उपस्थित होते हैं, तब वह कभी भी उससे अधिक सक्रिय नहीं होता।



    अब मैं अपनी पहले की सलाह पर लौटता हूँ कि तुम अपने अवकाश के बारे में किसी को भी पता न चलने दो। 'दर्शन' और 'शांति' की कोई संकेत-पट्टी मत लगाओ। अपनी योजना को कोई और नाम दो। उसे बीमारी, दुर्बलता या आलस्य कह दो। अपने अवकाश का प्रदर्शन करना भी व्यर्थ की महत्वाकांक्षा का ही एक रूप है। कुछ जीव अपने बिलों के आस-पास अपने पदचिह्नों को इस प्रकार छिपा देते हैं कि उनका ठिकाना पता न चले। तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिए। अन्यथा ऐसे लोग होंगे जो तुम्हें खोज निकालने का प्रयत्न करेंगे। बहुत-से लोग जो वस्तु सबके सामने पड़ी होती है, उसे अनदेखा कर देते हैं। लेकिन जो चीज़ छिपाकर रखी जाती है, उसी की टोह लेते हैं। किसी प्रवेश-द्वार पर ताला लगा देना मानो चोर को चुनौती देना है। जो वस्तु खुली दृष्टि में रहती है, वह कम मूल्यवान प्रतीत होती है। उसे खुले में छोड़ दो तो चोर उसे छोड़कर आगे बढ़ जाता है। सामान्य लोगों का स्वभाव यही होता है। यह उनका अज्ञान है। जहाँ कोई चीज़ छिपाई जाती है, वहीं घुसने की उनकी इच्छा होती है। इसलिए सबसे अच्छा उपाय यही है कि अपने अवकाश का कभी प्रदर्शन न किया जाए। लेकिन अत्यधिक एकांत में रहना, अपने को पूरी तरह सबकी दृष्टि से ओझल कर लेना, यह भी एक प्रकार का प्रदर्शन ही है। कोई टारेंटम (प्राचीन इटली का एक दूरस्थ एवं शांत शहर) में जाकर छिप जाता है, कोई नेपल्स में स्वयं को दफना लेता है और कोई वर्षों तक अपने घर की चौखट तक नहीं लाँघता। जो व्यक्ति किसी न किसी प्रकार अपने अवकाश को किंवदंती बना देता है, वह वास्तव में उसी के लिए दर्शकों को आमंत्रित कर रहा होता है।

    जब तुम सार्वजनिक जीवन से निवृत्त हो जाओ तो तुम्हारा उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि लोग तुम्हारी चर्चा करें बल्कि यह होना चाहिए कि तुम स्वयं अपने आप से संवाद करो। तुम अपने आप से क्या कहोगे? वही बात, जो लोग दूसरों के बारे में कहने में बहुत तत्पर रहते हैं— कठोर और निष्पक्ष मूल्यांकन। सत्य बोलने और सत्य सुनने का अभ्यास करो। विशेष रूप से उन बातों पर ध्यान केंद्रित करो, जहाँ तुम स्वयं को सबसे अधिक दुर्बल पाते हो।हर व्यक्ति अपने शरीर की कमजोरियों को जानता है। इसलिए कोई अपनी पाचन-शक्ति को वमन करके हल्का करता है, कोई बार-बार थोड़ा-थोड़ा भोजन करके उसे संभालता है और कोई उपवास के माध्यम से अपने शरीर को शुद्ध और हल्का करता है। जो लोग गठिया से पीड़ित होते हैं, वे या तो मदिरा का त्याग कर देते हैं या गरम स्नान से बचते हैं। अन्य बातों में चाहे वे लापरवाह हों, लेकिन अपनी विशेष बीमारी के विषय में वे अत्यंत सावधान रहते हैं। इसी प्रकार हमारे मन में भी कुछ रोगग्रस्त स्थान होते हैं। उपचार तो उन्हीं का करना चाहिए। मैं अपने इस अवकाश में क्या कर रहा हूँ? मैं अपने घाव की देखभाल कर रहा हूँ। यदि मैं तुम्हें अपना सूजा हुआ पैर, बदरंग हाथ या इतनी अकड़ी हुई नसें दिखाता कि मेरे पैर सीधे भी न हो पाते तो तुम निश्चय ही मुझे एक ही स्थान पर पड़े रहने और अपनी बीमारी की देखभाल करने की अनुमति देते। लेकिन मेरा रोग इससे भी अधिक गंभीर है। मैं उसे तुम्हें दिखा भी नहीं सकता क्योंकि उसका संक्रमण, उसका फोड़ा, मेरे हृदय के भीतर है।

    नहीं, मेरी प्रशंसा मत करो। यह मत कहो, "क्या महान व्यक्ति है! इसने सब कुछ तुच्छ समझ लिया है, मानव जीवन की इस पागलपन भरी दौड़ की निंदा कर दी है और उससे निकल भागा है।" मैंने किसी और की नहीं, केवल अपनी ही निंदा की है। यदि तुम यह आशा लेकर मेरे पास आओ कि यहाँ तुम्हें कोई मार्गदर्शन या सहायता मिलेगी तो तुम भूल कर रहे हो। यहाँ कोई वैद्य नहीं बल्कि एक रोगी रहता है। बेहतर होगा कि यहाँ से जाने के बाद तुम यह कहो, "मैं तो समझता था कि यह व्यक्ति बड़ा भाग्यशाली और विद्वान है। मैं उत्सुकता से इसकी बातें सुनने आया था लेकिन मुझे निराशा हुई। मैंने यहाँ ऐसा कुछ न देखा, न सुना, जिसे पाने या फिर से सुनने की इच्छा हो। मेरे लिए दोबारा यहाँ आने का कोई कारण नहीं है।" यदि तुम्हारी यही भावना हो और तुम ऐसा ही कहो तो समझो कि तुम्हें वास्तव में कुछ लाभ हुआ है। मैं चाहता हूँ कि मेरे इस अवकाश के लिए तुम मुझे क्षमा करो, न कि उससे ईर्ष्या करो।

    "तो, सेनेका," तुम कहोगे, "क्या तुम मुझे अवकाश का उपदेश दे रहे हो? क्या तुम स्वयं को एपिक्यूरस के सिद्धांतों तक गिरा रहे हो?" हाँ, मैं सचमुच तुम्हें अवकाश का ही परामर्श दे रहा हूँ। लेकिन ऐसे अवकाश का जो तुम्हें उन कार्यों से भी अधिक महान और श्रेष्ठ कार्य करने का अवसर दे। जिन्हें तुम पीछे छोड़ रहे हो। बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों के द्वारों पर दस्तक देना, उन वृद्ध लोगों की वर्णक्रमानुसार सूचियाँ बनाना जिनका कोई उत्तराधिकारी नहीं है या न्यायालयों और सार्वजनिक जीवन में प्रभाव और शक्ति का प्रदर्शन करना, ऐसी सारी शक्ति क्षणभंगुर है, ईर्ष्या को जन्म देने वाली है और यदि सच कहा जाए तो अत्यंत निकृष्ट भी है। कोई व्यक्ति राजनीतिक प्रभाव में मुझसे बहुत आगे होगा, कोई सैन्य सेवा और उससे मिलने वाली प्रतिष्ठा में और कोई अपने आश्रितों तथा प्रभाव-क्षेत्र की व्यापकता में। मैं उनकी बराबरी नहीं कर सकता। उनका प्रभाव मुझसे अधिक है। लेकिन मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं कि मैं उन सब से पीछे रहूँ, यदि बदले में मैं भाग्य पर विजय प्राप्त कर सकूँ।

    काश, तुमने बहुत पहले ही यह मार्ग अपना लिया होता! काश, जब मृत्यु अब हमारे सामने दिखाई देने लगी है, तब हमें सुख के स्वरूप पर बहस न करनी पड़ती! फिर भी, चाहे हम देर से ही सही, अब हमें और विलंब नहीं करना चाहिए। पहले हमारे पास केवल तर्क था जो हमें बताता था कि बहुत-सी चीज़ें अनावश्यक हैं बल्कि हानिकारक भी हैं। अब हमारे पास उसका प्रत्यक्ष अनुभव भी है।

    इसलिए आओ, हम उन यात्रियों की तरह बनें जो प्रस्थान करने में देर कर चुके हैं। अब हमें अपनी गति तेज करनी चाहिए और अधिक वेग से चलकर बीते हुए समय की भरपाई करनी चाहिए। जीवन का यह चरण ऐसे अध्ययन के लिए अत्यंत उपयुक्त है। अब इसकी उफनती हुई झाग बैठ चुकी है और वे दोष जिन्हें युवावस्था का उन्माद वश में नहीं कर सका था, अब थककर झुकने लगे हैं। शीघ्र ही वे पूरी तरह समाप्त हो जाएँगे। 

"लेकिन जब प्रस्थान का समय आ पहुँचा हो, तब सीखी गई शिक्षाओं से तुम्हें क्या लाभ होगा?" तुम पूछोगे। "और किसलिए?" इसलिए कि मैं इस संसार से एक बेहतर मनुष्य बनकर विदा हो सकूँ। तुम्हें यह मानने की आवश्यकता नहीं कि मन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए वृद्धावस्था से अधिक उपयुक्त जीवन का कोई और समय होता है। जब मनुष्य अनेक परीक्षाओं और लंबे समय तक रहने वाले पश्चात्तापों के द्वारा स्वयं को अनुशासित कर चुका होता है, जब उसने अपनी भावनाओं को वश में कर लिया होता है और अंततः मानसिक स्वास्थ्य एवं संतुलन की अवस्था तक पहुँच जाता है तभी यह सर्वोत्तम साधना संभव होती है। यही वह समय है जब इस श्रेष्ठता को प्राप्त किया जा सकता है। जो व्यक्ति वृद्धावस्था में बुद्धिमत्ता प्राप्त करता है, वह उतने ही अधिक वर्षों का अनुभव लेकर बुद्धिमान बनता है।


अभी के लिए विदा 

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