प्रिय लूसीलियस
जिस विषय के बारे में तुम पूछ रहे हो, वह कभी मेरे लिए दिन के उजाले की तरह बिल्कुल स्पष्ट था। मैं उसे इतनी अच्छी तरह जानता था। किन्तु उसे परखे हुए बहुत समय बीत गया है। इसलिए अब उसे सहजता से स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ। तुम जानते हो कि जब पेपिरस के पत्रों की बनी हुई पांडुलिपियाँ लंबे समय तक उपयोग में नहीं आतीं तो उनके पन्ने आपस में चिपक जाते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे मन की भी वही अवस्था हो गई है। समय-समय पर उसे खोलना आवश्यक है ताकि उसमें सुरक्षित बातें फिर से प्रकाश में आ जाएँ और आवश्यकता पड़ने पर तुरंत उपलब्ध हो सकें। इसलिए अभी के लिए तुम्हारे प्रश्न को स्थगित रहने दें। वह ऐसा विषय है, जिस पर गंभीर परिश्रम और एकाग्र ध्यान की आवश्यकता है। जैसे ही मुझे किसी एक स्थान पर कुछ अधिक समय तक ठहरने का अवसर मिलेगा, मैं उस पर पूरी सावधानी से काम करूँगा। कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर यात्रा के दौरान रथ में बैठे-बैठे भी लिखा जा सकता है। किन्तु कुछ विषय ऐसे भी होते हैं जिनके लिए आरामदायक आसन, पर्याप्त अवकाश और हर प्रकार के व्यवधान से मुक्त वातावरण आवश्यक होता है।
फिर भी, इन अत्यन्त व्यस्त दिनों में भी मेरे पास कोई न कोई ऐसा कार्य अवश्य होना चाहिए, जिस पर मैं मन लगाकर काम कर सकूँ। क्योंकि एक काम समाप्त होते ही उसकी जगह दूसरा काम आ जाता है। हम स्वयं ही कार्यों को बीजों की तरह बोते जाते हैं और प्रत्येक कार्य से अनेक नए कार्य उत्पन्न हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, हम अपने आपको निरन्तर टालते भी रहते हैं। हम कहते हैं, "यह काम पूरा हो जाए, फिर मैं पूरे मन से इस विषय में लगूँगा," या "जैसे ही इस कठिन कार्य से छुटकारा मिल जाएगा, मैं स्वयं को अध्ययन के लिए समर्पित कर दूँगा।" किन्तु दर्शन का अभ्यास करने के लिए हमें खाली समय की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत, हमें अन्य कार्यों की उपेक्षा करके स्वयं को इसी एक कार्य में लगाना चाहिए क्योंकि इसके लिए तो इतना समय भी पर्याप्त नहीं होगा, जितना मनुष्य के जीवन की सबसे लम्बी सम्भावित आयु में उपलब्ध हो सकता है। यदि तुम दर्शन का अभ्यास बीच-बीच में, कभी-कभार ही करने वाले हो तो उसके अभ्यास का कोई विशेष लाभ नहीं होगा। क्योंकि दर्शन किसी व्यवधान के बीच अपनी स्थिति बनाए नहीं रखता। वह उस वस्तु के समान है जिसे दबाने पर वह सिकुड़ जाती है और दबाव हटते ही फिर अपने पुराने रूप में लौट आती है। यदि अभ्यास में ढील दी जाए तो मन भी अपनी पुरानी अवस्था में लौट जाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने विविध कार्यों का दृढ़ता से सामना करें। केवल अपने बोझ को थोड़ा कम कर देना पर्याप्त नहीं है। जहाँ तक सम्भव हो, उसे पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। ऐसा कोई समय नहीं होता जो इस आत्मिक उपचाररूपी अध्ययन के लिए अनुपयुक्त हो। फिर भी विडम्बना यह है कि अनेक लोग उन्हीं समस्याओं में इतने उलझे रहते हैं, जिनके कारण उन्हें दर्शन का अध्ययन करना सबसे अधिक आवश्यक होता है।
"कोई आकस्मिक घटना मुझे बाधित कर देगी।" किन्तु उस व्यक्ति को कोई भी बाधा रोक नहीं सकती, जिसका मन प्रत्येक कार्य में प्रसन्न और उत्साहपूर्ण रहता है। जो अभी पूर्ण नहीं हुआ है, उसकी प्रसन्नता बीच-बीच में भंग हो जाती है। परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति का आनंद अखण्ड होता है। किसी भी कारण या आकस्मिक घटना से उसमें व्यवधान नहीं आता। बुद्धिमान व्यक्ति हर समय और हर स्थान पर शांत रहता है क्योंकि वह किसी दूसरी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर नहीं होता। वह न तो भाग्य की कृपा की प्रतीक्षा करता है और न किसी अन्य मनुष्य की। उसका सुख उसके अपने भीतर निवास करता है। यदि वह बाहर से उसके मन में आया होता तो बाहर ही चला भी जाता। किन्तु वह तो उसके अपने अंतःकरण में जन्म लेता है। हाँ, कभी-कभी बाहरी परिस्थितियाँ उसे उसकी नश्वरता का स्मरण अवश्य करा देती हैं, पर वह स्मरण इतना हल्का होता है कि केवल सतह को ही स्पर्श कर पाता है। निश्चय ही वह विपत्ति की प्रतिकूल हवाओं को अनुभव करता है। किन्तु उसका सर्वोच्च कल्याण दृढ़तापूर्वक अपनी जगह पर स्थिर रहता है। अर्थात कुछ बाहरी असुविधाएँ उसे अवश्य प्रभावित कर सकती हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक स्वस्थ और सबल शरीर पर कभी खरोंच या छोटी-सी फुंसी हो सकती है, जबकि भीतर कोई गम्भीर रोग न हो।
मेरा आशय यह है कि पूर्ण बुद्धिमान व्यक्ति और उस व्यक्ति के बीच, जो अभी प्रज्ञा की ओर अग्रसर है, वही अंतर है जो एक पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति और उस व्यक्ति के बीच होता है, जो किसी लम्बी और गंभीर बीमारी से धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहा हो। ऐसे रोगमुक्त हो रहे व्यक्ति के लिए तो रोग का केवल हल्का पड़ जाना ही स्वास्थ्य का लक्षण माना जाता है। किन्तु यदि वह सावधान न रहे तो उसकी प्रगति बार-बार रुक जाती है और वह फिर पीछे लौटने लगता है। इसके विपरीत, बुद्धिमान व्यक्ति को न तो पुनः उसी रोग का आक्रमण सहना पड़ता है और न ही किसी प्रकार की गिरावट का सामना करना पड़ता है। शरीर का स्वास्थ्य तो एक अस्थायी अवस्था है। कोई भी वैद्य उसे स्थायी रूप से प्रदान नहीं कर सकता। वह केवल उसे पुनः स्थापित कर सकता है। इसलिए वही रोगी बार-बार चिकित्सक को बुलाता है और चिकित्सक को अनेक बार उसी की सेवा के लिए जाना पड़ता है। किन्तु जब मन वास्तव में स्वस्थ हो जाता है, तब उसका उपचार एक बार के लिए और सदा के लिए पूर्ण हो जाता है।
मैं तुम्हें बताता हूँ कि मन के वास्तव में स्वस्थ हो जाने का क्या अर्थ है। ऐसा मन अपने आप में ही संतुष्ट रहता है और स्वयं पर पूर्ण विश्वास रखता है। वह यह समझ चुका होता है कि जिन वस्तुओं की हम नश्वर मनुष्य कामना करते हैं और जिन उपकारों का हम आदान-प्रदान करते हैं, उनका वास्तविक सुख से कोई संबंध नहीं है। जिस वस्तु में कुछ और जोड़ा जा सकता हो, वह अभी पूर्ण नहीं है। जिसे घटाया जा सकता हो, वह शाश्वत नहीं है। यदि प्रसन्नता को स्थायी बनाए रखना है तो मनुष्य को अपने ही आंतरिक साधनों और अपने ही सद्गुणों में आनंद प्राप्त करना चाहिए। जिन वस्तुओं की सामान्य लोग इच्छा करते हैं, वे सब निरन्तर परिवर्तनशील हैं; वे कभी इधर जाती हैं, कभी उधर। भाग्य के उपहार हमारे स्थायी अधिकार में नहीं होते।
किन्तु भाग्य से जो कुछ हमें प्राप्त होता है, वह भी तभी वास्तविक संतोष देता है, जब विवेक उसे उचित मर्यादा और संतुलन के साथ ग्रहण करता है। बाहरी वस्तुओं का मूल्य भी हमारे लिए विवेक ही निर्धारित करता है। यदि हम उनके प्रति लोभ से भर जाएँ तो उनसे हमें कभी वास्तविक संतोष प्राप्त नहीं हो सकता। अटालस प्रायः यह उपमा दिया करते थे—
"क्या तुमने कभी किसी कुत्ते को देखा है, जो अपने स्वामी द्वारा फेंके गए रोटी या मांस के टुकड़ों को लपकता है? जैसे ही वह एक टुकड़ा पकड़ता है, उसे बिना चबाए तुरंत निगल जाता है। उसका मुँह फिर अगले टुकड़े की प्रतीक्षा में खुला रहता है। हमारी दशा भी कुछ ऐसी ही है। भाग्य हमारी ओर जो कुछ भी फेंकता है, हम उसे तुरंत हड़प लेते हैं। किन्तु हमारा मन उसी क्षण फिर किसी और अधिक आकर्षक वस्तु की आशा में आगे देखने लगता है, जो अभी हमारी पहुँच से बाहर है।"
बुद्धिमान व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता। वह अपने भीतर से ही पूर्ण होता है। यदि भाग्य से उसे कुछ प्राप्त हो भी जाए तो वह उसे बिना किसी विशेष आसक्ति के ग्रहण करता है और उसी सहजता से छोड़ भी देता है। उसका आनंद प्रचुर, स्थिर और उसका अपना होता है।
जिस व्यक्ति के इरादे अच्छे हैं और जो प्रगति के मार्ग पर चल रहा है। किन्तु अभी पूर्णता के शिखर से बहुत दूर है, उसकी अवस्था बदलती रहती है। कभी वह ऊपर उठता है, मानो आकाश तक पहुँच गया हो और कभी फिर नीचे धरती पर लौट आता है। जो नवशिक्षु हैं और जिनके पास अभी अभ्यास तथा आत्मसंयम का प्रशिक्षण नहीं है, वे निरन्तर नीचे गिरते रहते हैं। वे एपिक्यूरस द्वारा वर्णित उस असीम शून्य के समान भ्रम और अस्थिरता में जा गिरते हैं, जहाँ कोई स्थिर आधार नहीं होता। इसके अतिरिक्त एक तीसरा वर्ग भी है। वे लोग जो प्रज्ञा के अत्यन्त निकट पहुँच चुके हैं। यद्यपि उन्होंने अभी उसे पूरी तरह प्राप्त नहीं किया है, फिर भी वह उनकी दृष्टि में है, मानो वे उससे केवल एक कदम की दूरी पर हों। अब वे जीवन की लहरों से इधर-उधर नहीं उछाले जाते और न ही उन्हें भीतर की कोई धारा पीछे खींचती है। यद्यपि वे अभी किनारे पर नहीं पहुँचे हैं, फिर भी वे पहले ही सुरक्षित बंदरगाह की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं।
अतः जब प्रगति के सर्वोच्च और निम्नतम स्तरों के बीच इतना अधिक अंतर है और मध्यवर्ती अवस्था भी अनेक उतार-चढ़ावों के अधीन है। जबकि सबसे निम्न अवस्था में पुनः पतन का बड़ा जोखिम बना रहता है, तब हमें अपने आपको विविध सांसारिक व्यस्तताओं का दास नहीं बनने देना चाहिए। इन व्यस्तताओं को आरम्भ में ही अपने जीवन से दूर रखना चाहिए। क्योंकि यदि वे एक बार भीतर प्रवेश कर गईं तो अपने साथ और भी अनेक व्यस्तताओं को ले आएँगी। इसलिए हमें प्रारम्भ से ही उनका दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध करना चाहिए क्योंकि यदि आरम्भ पर हमारा अधिकार नहीं रहा तो अंत कभी भी आरम्भ से बेहतर नहीं होगा।
अभी के लिए विदा
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