Friday, 17 July 2026

दर्शन के मार्ग के बारे में -- पत्र - 69 (Hindi Translation of Seneca's Letters)

  प्रिय लूसीलियस


मैं चाहता हूँ कि तुम एक स्थान से दूसरे स्थान यूँ ही भटकते न फिरो। इसके दो कारण हैं। पहला, बार-बार यात्रा करना मन की अशांति का संकेत है। जब तक मन इधर-उधर देखने और भटकने की आदत नहीं छोड़ता, तब तक वह अपने विश्राम में भी दृढ़ता प्राप्त नहीं कर सकता। अपने मन को सीमाओं में रखना चाहते हो तो सबसे पहले अपने शरीर को भागते-फिरते रहने से रोकना होगा। दूसरा, वही उपचार सबसे अधिक लाभ पहुँचाता है जो लंबे समय तक निरंतर चलता है। तुम्हें बिना किसी व्यवधान के एक ही स्थान पर ठहरना चाहिए और अपने पुराने जीवन को भूल जाना चाहिए। तुम्हारी आँखें जो कुछ अब तक देखती रही हैं, उन्हें उसे भूलना सीखना चाहिए। तुम्हारे कानों को अधिक स्वास्थ्यप्रद और हितकारी वचनों का अभ्यस्त होना चाहिए। जैसे ही तुम बाहर निकलते हो, अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले ही तुम्हारी पुरानी इच्छाएँ फिर से जाग उठती हैं। यह प्रेम के समान है। जब कोई व्यक्ति उस आसक्ति से मुक्त होना चाहता है तो उसे उस व्यक्ति के शरीर की हर याद से बचना पड़ता है जिससे उसका स्नेह जुड़ा रहा हो क्योंकि कोई भी भावना इतनी आसानी से फिर अपनी पूरी शक्ति प्राप्त नहीं कर लेती। यही बात प्रत्येक प्रबल इच्छा पर भी लागू होती है। जिसे पीछे छोड़ आए हो, उससे अपनी आँखें और कान दोनों फेर लेने चाहिए। 

    भावनाएँ बहुत शीघ्र फिर से प्रतिरोध करने लगती हैं। वे जिस ओर भी मुड़ती हैं, वहाँ अपने प्रयत्न का कोई न कोई तात्कालिक लाभ उन्हें दिखाई देता है। प्रत्येक बुराई के पास मनुष्य को लुभाने का कोई न कोई प्रलोभन होता है। लोभ तुम्हें धन का वादा करता है। भोग-विलास अनेक प्रकार के सुखों का आश्वासन देता है। महत्त्वाकांक्षा तुम्हें राजवैभव, भीड़ की जय-जयकार, उनसे प्राप्त होने वाली शक्ति और उस शक्ति से मिलने वाले हर प्रकार के अधिकार का प्रलोभन देती है। तुम्हारे दोष तुम्हें पुरस्कारों का लालच देकर अपने वश में रखते हैं। पर यहाँ अर्थात दर्शन के मार्ग पर, तुम्हें बिना किसी बाहरी पुरस्कार की अपेक्षा के जीवन बिताना होगा।

By Paul Klee

    हमारे दोषों को इतने लंबे समय तक बढ़ने-फलने दिया गया है कि उन्हें वश में करने और अनुशासन के अधीन लाने के लिए पूरा जीवन भी शायद पर्याप्त न हो। यदि हम अपने इस छोटे-से जीवन को बार-बार के व्यवधानों में बाँट दें तो हमारी संभावना और भी कम हो जाती है। निरंतर सावधानी और अविराम प्रयास के बावजूद भी जीवन के किसी एक गुण को पूर्णता तक पहुँचाना कठिन होता है।

    यदि तुम मेरी सलाह मानना चाहते हो तो अपने आपको इस बात का अभ्यास और प्रशिक्षण दो कि मृत्यु का स्वागत कर सको। यदि परिस्थितियाँ ऐसी माँग करें तो उसे स्वयं भी बुला सको। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मृत्यु हमारे पास आए या हम मृत्यु के पास जाएँ। अपने मन को यह विश्वास दिलाओ कि जैसा अज्ञानी लोग अक्सर कहते हैं, “अपने ही स्वाभाविक मृत्यु से मरना कितना सुंदर है”, वैसा कहना अनुचित है। कोई भी व्यक्ति किसी और की मृत्यु नहीं मरता। हर व्यक्ति अपनी ही मृत्यु मरता है। इस बात पर भी विचार करो कि कोई भी व्यक्ति किसी और के दिन नहीं मरता। वह केवल अपने ही मृत्यु-दिवस पर मरता है। तुम अपने निर्धारित समय में से कुछ भी नहीं खो रहे हो क्योंकि जो समय तुम पीछे छोड़ जाते हो, वह वास्तव में तुम्हारा था ही नहीं।

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दर्शन के मार्ग के बारे में -- पत्र - 69 (Hindi Translation of Seneca's Letters)

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