प्रिय लूसीलियस
बार-बार तुम मुझसे विशेष विषयों पर परामर्श माँगते हो, यह भूलकर कि तुम्हारे और मेरे बीच एक विशाल और निर्जन समुद्र फैला हुआ है। चूँकि अधिकांश सलाह परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए कुछ विषयों पर मेरा उत्तर तुम्हारे पास ऐसे समय पहुँच सकता है, जब उसके ठीक विपरीत सलाह तुम्हारे लिए अधिक लाभकारी होती। क्योंकि सलाह का स्वरूप घटनाओं के अनुसार निर्धारित होता है और घटनाएँ निरन्तर बदलती रहती हैं बल्कि तीव्र गति से आगे बढ़ती हैं। इसलिए सलाह उसी दिन दी जानी चाहिए, जिस दिन उसकी आवश्यकता हो। वह भी पर्याप्त शीघ्र नहीं है। जैसा कि कहा जाता है, 'सलाह तो 'उसी क्षण, उसी स्थान पर' दी जानी चाहिए।
तो फिर सलाह कैसे प्राप्त की जाए? मैं तुम्हें बताता हूँ। जब भी तुम्हें यह जानना हो कि किसका अनुसरण करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, तब अपने सर्वोच्च कल्याण (परम हित) की ओर देखो। उस लक्ष्य की ओर, जो तुम्हारे सम्पूर्ण जीवन का उद्देश्य है। हमारे प्रत्येक कर्म का उसी लक्ष्य के अनुरूप होना चाहिए। केवल वही व्यक्ति जीवन के छोटे-छोटे कार्यों को सही ढंग से व्यवस्थित कर सकता है, जिसकी दृष्टि अपने पूरे जीवन पर होती है।चित्रकार के पास यदि सभी रंग तैयार भी हों तो भी वह तब तक किसी का चित्र नहीं बना सकता, जब तक यह न तय कर ले कि उसे क्या चित्रित करना है। हमारी भूल भी यही है। हर व्यक्ति जीवन के अलग-अलग पक्षों पर विचार करता है पर सम्पूर्ण जीवन के बारे में नहीं। यदि तुम तीर चलाना चाहते हो तो पहले यह जानना आवश्यक है कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है। तभी तुम तीर की नोक को सही दिशा दे सकते हो और उसे स्थिरता से छोड़ सकते हो। हमारी सारी सलाहें इसलिए भटक जाती हैं क्योंकि उनके सामने कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसे किस बन्दरगाह तक पहुँचना है, उसके लिए कोई भी हवा अनुकूल सिद्ध नहीं हो सकती।
संयोग (भाग्य) का हमारे जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हमारा जीवित होना भी संयोग का ही परिणाम है। किन्तु कभी-कभी मनुष्य किसी बात को जाने बिना भी जानता है। जैसे हम अनेक बार अपने पास ही खड़े व्यक्ति को ढूँढ़ते फिरते हैं, वैसे ही जीवन के लक्ष्य और परम कल्याण (सर्वोच्च हित) को भी प्रायः नहीं पहचान पाते, जबकि वह हमारे सामने ही उपस्थित होता है।
लम्बी-चौड़ी व्याख्याएँ तुम्हें यह नहीं बता सकतीं कि परम कल्याण क्या है; उसे तो मानो उँगली रखकर स्पष्ट दिखा देना चाहिए, ताकि वह इधर-उधर बिखर न जाए। मुझे उसके सभी विवरणों में जाने की क्या आवश्यकता है, जबकि सरलता से यह कहा जा सकता है— "परम कल्याण वही है जो सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) है।" या इससे भी अधिक स्पष्ट रूप में— "एकमात्र वास्तविक कल्याण वही है जो सम्माननीय है। अन्य सभी तथाकथित कल्याण तो केवल जाली सिक्कों के समान हैं।"
यदि तुम इस सत्य को अपने मन में दृढ़ता से स्थापित कर लो और सद्गुण (Virtue) से गहरा प्रेम करने लगो क्योंकि केवल उसे पसंद करना पर्याप्त नहीं है तो फिर सद्गुण जिस किसी वस्तु या परिस्थिति को स्पर्श करेगा। वह तुम्हारी दृष्टि में अत्यन्त शुभ और प्रशंसनीय होगी, चाहे दूसरों को वह कैसी भी क्यों न दिखाई दे। यदि तुम यातना सहो तो उसे उसी शान्ति और निर्लिप्तता से सहोगे, जितनी स्वयं यातना देने वाले में होती है। यदि रोग आए तो तुम भाग्य को दोष नहीं दोगे और न ही रोग को अपने मन पर विजय पाने दोगे। वास्तव में, जिन बातों को दूसरे लोग बुरा मानते हैं, वे भी तुम्हारे लिए अच्छी सिद्ध होंगी, यदि तुम उनसे ऊपर उठ सको। जब यह बात तुम्हारे लिए पूर्णतः स्पष्ट हो जाएगी कि केवल सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही वास्तविक कल्याण है, तब जो भी वस्तु या परिस्थिति अपने-आप में कष्टदायक प्रतीत होती है, वह भी सद्गुण के कारण सम्माननीय बनकर तुम्हारी दृष्टि में कल्याण ही मानी जाएगी। बहुत-से लोग सोचते हैं कि हम स्टोइक (Stoics) मनुष्य की सामर्थ्य से कहीं अधिक ऊँची बातें करते हैं। ऐसा सोचने का उनके पास कारण भी है क्योंकि वे केवल मनुष्य के शरीर को देखते हैं। यदि वे एक बार फिर अपने मन की ओर दृष्टि करें तो उन्हें ज्ञात होगा कि मनुष्य की वास्तविक सीमा और मापदण्ड ईश्वर में निहित है।
प्रिय लूसीलियस, उठो और स्वयं को जागृत करो। उस व्याकरण-विद्यालय और उन पांडित्य-प्रिय दार्शनिकों को पीछे छोड़ दो, जो इस अद्भुत विषय को केवल शब्दों और अक्षरों तक सीमित कर देते हैं। वे सूक्ष्म और तुच्छ बातों की शिक्षा देकर मन की गरिमा को घटा देते हैं और उसकी शक्ति को व्यर्थ नष्ट कर देते हैं। उन लोगों के समान बनो जिन्होंने इन सत्यों की खोज की थी न कि उन लोगों के समान जो दर्शन को महान बनाने के बजाय उसे कठिन प्रतीत कराने के उद्देश्य से पढ़ाते हैं। सुकरात, जिन्होंने दर्शन को पुनः नैतिक जीवन की ओर लौटाया, कहा करते थे कि बुद्धिमत्ता का सर्वोच्च शिखर यह जानने में है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। वे कहते थे—
"यदि मेरी बात का तुम्हारे लिए कोई महत्व है तो उन सिद्धान्तों का अनुसरण करो जिनसे तुम सुखी बन सको। यदि कोई तुम्हें मूर्ख समझे तो उसे ऐसा समझने दो। जो चाहे तुम्हारा अपमान करे या तुम्हारे साथ अन्याय करे। जब तक सद्गुण तुम्हारे साथ है, तब तक इन बातों से तुम अप्रभावित रहोगे। यदि तुम सचमुच सुखी होना चाहते हो, यदि वास्तव में एक अच्छा मनुष्य बनना चाहते हो तो लोगों की अवमानना सहने के लिए तैयार रहो।"
इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को स्वयं सभी बाहरी वस्तुओं के प्रति उदासीन होना सीखना चाहिए। जिन वस्तुओं को हम अच्छा मानते हैं, उनके बीच किसी प्रकार का भेद नहीं रखना चाहिए क्योंकि सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) के अतिरिक्त कोई भी वस्तु वास्तव में अच्छी नहीं है और जो सम्माननीय है, वह प्रत्येक परिस्थिति में समान रहता है।
"तुम्हारा क्या आशय है? क्या इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि कैटो प्रेटर निर्वाचित हुआ या पराजित हो गया? क्या इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह फ़ार्सालस के युद्ध में हार गया या अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर ली? क्या उस सद्गुण का मूल्य, जिसके कारण वह अपनी ओर की हार के बाद भी अजेय बना रहा, वास्तव में उसी सद्गुण के बराबर है जो उसे युद्ध जीतकर, अपने देश लौटकर और शांति स्थापित करके प्राप्त होता?" हाँ, क्यों नहीं? विपत्ति पर विजय प्राप्त करते समय सद्गुण जैसा होता है, वैसा ही वह समृद्धि और सफलता के बीच भी बना रहता है। सद्गुण न तो बढ़ाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। उसका केवल एक ही स्वरूप और एक ही परिमाण होता है।
"लेकिन ग्नेयस पोम्पेई अपनी सेना खो देगा। गणराज्य का सबसे उज्ज्वल आभूषण, कुलीन वर्ग और पोम्पेई के पक्ष की प्रथम पंक्ति अर्थात शस्त्रधारी सीनेटर, एक ही युद्ध में नष्ट हो जाएँगे। इतनी महान शक्ति के पतन के बाद उसके अवशेष पूरे संसार में बिखर जाएँगे। एक भाग मिस्र में, दूसरा अफ्रीका में और तीसरा स्पेन में। हमारा अभागा गणराज्य इतना भी सौभाग्यशाली नहीं होगा कि उसका केवल एक ही बार पतन हो।" यह सब हो सकता है। जूबा को अपने देश की भौगोलिक जानकारी का कोई लाभ न मिले। अपने राजा की रक्षा में लड़ने वाले उसके साधारण सैनिकों का अडिग साहस भी निष्फल हो जाए। विपत्तियों से टूटकर यूटिका के लोगों की निष्ठा भी डगमगा जाए और अफ्रीका में सिपियो भी अपने नाम से जुड़ी अब तक की शुभ-प्रतिष्ठा के अनुरूप सफलता प्राप्त न कर सके। किन्तु बहुत पहले ही यह सुनिश्चित हो चुका था कि कैटो को किसी प्रकार की वास्तविक हानि नहीं पहुँच सकती। "लेकिन वह तो पराजित हुआ।" हाँ, यह भी कैटो के लिए केवल एक और असफलता थी। उसने अपनी विजय में आने वाली बाधा को उतनी ही गरिमा से स्वीकार किया, जितनी गरिमा से उसने प्रेटर के चुनाव में मिली असफलता को स्वीकार किया था। जिस दिन वह चुनाव हार गया, उस दिन उसने खेल खेला और जिस रात उसे मृत्यु का वरण करना था, उस रात उसने एक पुस्तक पढ़ी। उसके लिए प्रेटर का पद खोना और अपना जीवन खोना, दोनों समान थे क्योंकि उसने अपने मन को इस सत्य के लिए तैयार कर लिया था कि जो कुछ भी घटे, उसे धैर्यपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
और वास्तव में, वह गणराज्य में आए परिवर्तन को साहस और शान्ति के साथ क्यों न सहन करे? परिवर्तन के जोखिम से कौन मुक्त है? न पृथ्वी, न आकाश और न ही स्वयं यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड। यद्यपि इसकी रचना स्वयं ईश्वर ने की है, फिर भी यह सदा अपने वर्तमान स्वरूप में नहीं रहेगा। एक दिन ऐसा अवश्य आएगा, जो इसकी वर्तमान व्यवस्था को बदल देगा। सभी वस्तुएँ एक निश्चित क्रम के अनुसार चलती हैं। उनका जन्म होना है, उनका विकास होना है और अंततः उनका नाश होना है। जो कुछ तुम अपने ऊपर आकाश में देख रहे हो और जो कुछ तुम्हें अपने पैरों के नीचे इतना स्थिर प्रतीत होता है, वह सब एक दिन विघटित हो जाएगा। प्रत्येक वस्तु की अपनी एक आयु होती है। प्रकृति सबको अलग-अलग समय तक टिकाए रखती है, पर अंततः सबको उसी एक स्थान की ओर लौटा देती है। जो आज विद्यमान है, वह एक दिन नहीं रहेगा।
यह नहीं कि वह पूर्णतः नष्ट हो जाता है बल्कि उसका विघटन हो जाता है। किन्तु हमें यह विघटन ही विनाश प्रतीत होता है क्योंकि हमारी दृष्टि केवल अपने निकट की वस्तुओं तक सीमित रहती है। हमारी मन्द बुद्धि शरीर के अधीन रहती है और उससे आगे देखने की क्षमता नहीं रखती। यदि हम यह समझ पाते कि जीवन और मृत्यु भी अन्य सभी वस्तुओं की भाँति क्रमशः आते और जाते रहते हैं तो हम अपने स्वयं के अंत और अपने प्रियजनों के वियोग को कहीं अधिक धैर्य और साहस के साथ सह सकते। संयुक्त वस्तुएँ विघटित हो जाती हैं और उनके पृथक् तत्त्व फिर नए रूप में संयोजित हो जाते हैं। इसी प्रकार समस्त सृष्टि का संचालन करने वाले ईश्वर की शाश्वत सृजन-प्रक्रिया निरन्तर कार्य करती रहती है। इसलिए मार्कस कैटो की भाँति हमारे विचार भी समय के पार दृष्टि डालते हुए कहेंगे—
"समस्त मानवजाति, वर्तमान और भविष्य की मृत्यु के अधीन है। वे सभी नगर, जिन्होंने कभी संसार पर शासन किया और वे सभी नगर, जो किसी अन्य शक्ति की विजय के प्रतीक बने, एक दिन दृष्टि से ओझल हो जाएँगे और विभिन्न प्रकार के विनाश से मिट जाएँगे। कुछ युद्धों द्वारा नष्ट होंगे। कुछ उपेक्षा, शान्ति से उत्पन्न आलस्य और उस वस्तु के कारण, जो महान समृद्धि के लिए सबसे अधिक विनाशकारी है। विलासिता के कारण नष्ट हो जाएँगे। ये सभी उपजाऊ मैदान भी एक दिन समुद्र के किसी आकस्मिक विस्तार से ढँक जाएँगे अथवा पृथ्वी के धँसकर किसी अप्रत्याशित गर्त में समा जाने से विलीन हो जाएँगे। फिर मैं शिकायत क्यों करूँ? मैं इस बात से दुःखी क्यों होऊँ कि मुझे राष्ट्रों और जनसमुदायों के लिए निर्धारित अंतिम समय से केवल कुछ क्षण पहले ही जाना पड़ रहा है? एक महान आत्मा को ईश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए और विश्व-व्यवस्था के नियमों का अनुसरण करने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। या तो वह एक श्रेष्ठ जीवन की ओर भेजी जा रही है, जहाँ वह ईश्वर के लोक में अधिक महान और अधिक शांतिमय प्रकाश के बीच निवास करेगी अथवा कम-से-कम वह सभी कष्टों से मुक्त होकर पुनः प्रकृति में विलीन हो जाएगी और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में लौट जाएगी।"
इस प्रकार कैटो का सम्माननीय जीवन उसके सम्माननीय मृत्यु से अधिक श्रेष्ठ नहीं है क्योंकि सद्गुण में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं हो सकती। सुकरात कहा करते थे कि सत्य और सद्गुण एक ही हैं। जिस प्रकार सत्य न तो बढ़ता है और न घटता है, उसी प्रकार सद्गुण भी न बढ़ता है और न घटता है। वह अपने पूर्ण स्वरूप में रहता है; उसमें किसी प्रकार की वृद्धि या कमी संभव नहीं है।
इसलिए तुम्हें यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सभी वास्तविक कल्याण समान हैं, चाहे वे वे हों जिन्हें हमें सक्रिय रूप से प्राप्त करना चाहिए या वे जिन्हें परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार करना पड़ता है। क्योंकि यदि तुम यह मान लो कि उनमें कोई असमानता है और यह समझो कि यातना को साहसपूर्वक सहना अपेक्षाकृत कम महत्त्व का कल्याण है तो तुम अंततः उसे बुराई भी मानने लगोगे। तब तुम्हें कहना पड़ेगा कि कारागार में सुकरात दुर्भाग्यशाली थे कि कैटो दुर्भाग्यशाली थे, जब उन्होंने अपने घावों को पहले से भी अधिक साहस के साथ पुनः खोल दिया कि रेगुलस उन सब से भी अधिक दुःखी था क्योंकि उसने अपने शत्रुओं से किया हुआ वचन निभाया और उसी के कारण कठोर दण्ड सहा। किन्तु सबसे अधिक भयभीत व्यक्ति ने भी ऐसा कहने का साहस नहीं किया। लोग यह तो कहते हैं कि रेगुलस सुखी नहीं था, परन्तु यह भी स्वीकार करते हैं कि वह दुःखी भी नहीं था। प्राचीन अकादमिक दार्शनिक यह मानते थे कि रेगुलस इतनी भीषण यातनाओं के बीच भी सुखी था, किन्तु पूर्ण और परिपूर्ण अर्थ में नहीं। यह मत सर्वथा अस्वीकार्य है। यदि कोई वास्तव में सुखी नहीं है,तो उसने सर्वोच्च कल्याण प्राप्त ही नहीं किया। और यदि सर्वोच्च कल्याण प्राप्त हो गया है तो उसमें किसी और प्रकार की श्रेष्ठता जोड़ी नहीं जा सकती, क्योंकि जहाँ सद्गुण विद्यमान है, वहाँ उससे बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। जब तक विपत्तियाँ सद्गुण को कमज़ोर नहीं करतीं और जब तक शरीर के क्षत-विक्षत हो जाने पर भी सद्गुण अक्षुण्ण बना रहता है, तब तक सर्वोच्च कल्याण भी पूर्ण बना रहता है। और वास्तव में सद्गुण अक्षुण्ण ही रहता है क्योंकि मैं सद्गुण से उस साहसी और उदात्त शक्ति का आशय लेता हूँ, जो अपने विरोध में खड़ी प्रत्येक कठिनाई से ही अपनी शक्ति प्राप्त करती है।
उदात्त स्वभाव वाले युवा, जब किसी सम्माननीय कर्म की महानता और सौन्दर्य से प्रभावित होते हैं तो प्रायः ऐसी मनःस्थिति अपना लेते हैं कि वे बाहरी परिस्थितियों की कोई परवाह नहीं करते। किन्तु प्रज्ञा (विवेकपूर्ण ज्ञान) बिना किसी कठिनाई के मनुष्य में वही दृष्टिकोण उत्पन्न कर देती है। वह हमें इस दृढ़ विश्वास से भर देती है कि सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही एकमात्र वास्तविक कल्याण है। उसे न तो घटाया जा सकता है और न बढ़ाया जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे सीधापन मापने वाली पूर्णतः सीधी रेखा को तुम मोड़ नहीं सकते। यदि तुम उसमें कोई परिवर्तन करोगे तो वह सीधी रेखा नहीं रह जाएगी। इसी प्रकार हम सद्गुण के विषय में भी कहते हैं कि वह भी पूर्णतः सीधा और निष्कलंक है; उसमें किसी प्रकार का टेढ़ापन नहीं आ सकता। जो वस्तु पहले से ही पूर्णतः सीधी है, उसमें और क्या वृद्धि की जा सकती है? सद्गुण ही सभी वस्तुओं का मापदण्ड है। सद्गुण का मापदण्ड कोई अन्य वस्तु नहीं हो सकती। यदि स्वयं सद्गुण को अधिक सीधा या अधिक श्रेष्ठ नहीं बनाया जा सकता तो उसके द्वारा किए गए कार्यों में भी कोई एक दूसरे से अधिक श्रेष्ठ नहीं हो सकता क्योंकि वे सभी सद्गुण के एक ही मापदण्ड के अनुरूप होते हैं। इसलिए वे सभी समान हैं।
"क्या सचमुच?" तुम कहोगे। "क्या भोजन-सभा में आराम से बैठकर भोजन करना और यातना सहना समान हो सकते हैं?" यदि यह बात तुम्हें आश्चर्यचकित करती है तो इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात सुनो। यदि भोजन-सभा में बैठना अनैतिक ढंग से किया जाए, तो वह बुरा है और यदि यातना सम्मानपूर्वक और सद्गुण के साथ सहन की जाए, तो वह अच्छा है। किसी कार्य का अच्छा या बुरा होना उसके बाहरी रूप या परिस्थिति पर निर्भर नहीं करता बल्कि सद्गुण पर निर्भर करता है। जहाँ सद्गुण उपस्थित होता है, वहाँ सब कुछ समान माप और समान मूल्य का हो जाता है।
इस पर वह व्यक्ति, जो प्रत्येक मनुष्य के चरित्र का आकलन अपने ही मन के अनुसार करता है, मेरे सामने हाथ हिलाकर विरोध करने लगता है क्योंकि मैं यह कहता हूँ कि एक सम्माननीय न्यायाधीश और एक सम्माननीय अभियुक्त का कल्याण समान है। उसी प्रकार विजयी होकर विजय-यात्रा निकालने वाले सेनापति का कल्याण और उस बंदी का कल्याण भी समान है, जो उसके रथ के आगे बाँधकर ले जाया जा रहा है। पर जिसका मन किसी भी प्रकार से पराजित नहीं हुआ है। ऐसे लोग यह मान लेते हैं कि जो कार्य वे स्वयं नहीं कर सकते, वह किसी और के लिए भी असंभव है। वे सद्गुण का मूल्यांकन अपनी ही दुर्बलता के आधार पर करते हैं।
तुम्हें इसमें आश्चर्य क्यों होता है कि जलाया जाना, घायल होना, प्रहार सहना या बेड़ियों में जकड़ा जाना भी कभी-कभी संतोष का बल्कि आनंद का कारण बन सकता है? जो व्यक्ति विलासिता का आदी होता है, उसके लिए सादगी दंड के समान होती है। जो आलसी होता है, उसके लिए श्रम किसी सज़ा जैसा लगता है। जो व्यक्ति कोमल और आरामप्रिय है, वह परिश्रमी मनुष्य पर दया करता है और निकम्मे व्यक्ति को अध्ययन भी यातना जैसा प्रतीत होता है। ठीक इसी प्रकार, जिन कार्यों को करने के लिए हम स्वयं बहुत दुर्बल होते हैं, उन्हें हम कठोर और असहनीय मान लेते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिन्हें मदिरा के बिना रहना या प्रातःकाल जल्दी उठना अत्यंत कठिन लगता है। वास्तव में ये बातें स्वभावतः कठिन नहीं हैं। कठिनाई हमारे अपने आलस्य और दुर्बलता में है। महान चुनौतियों का सही मूल्यांकन करने के लिए महान मन की आवश्यकता होती है। अन्यथा हम दोष अपनी परिस्थितियों में ढूँढ़ते हैं, स्वयं में नहीं। यह उसी प्रकार है जैसे कुछ वस्तुएँ पूरी तरह सीधी होने पर भी पानी में डुबो देने पर टेढ़ी या टूटी हुई दिखाई देती हैं। महत्त्व केवल इस बात का नहीं है कि तुम क्या देखते हो बल्कि इस बात का भी है कि तुम उसे किस प्रकार देखते हो। हमारे मन इतने धुँधले और भ्रमग्रस्त हैं कि वे वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में नहीं देख पाते।
मुझे ऐसा तीक्ष्ण बुद्धि वाला युवक दो, जिसका चरित्र अभी तक भ्रष्ट न हुआ हो। वह अवश्य कहेगा कि उसके विचार में वास्तव में अधिक सौभाग्यशाली वही व्यक्ति है, जिसके कंधे विपत्तियों का समस्त भार उठाने पर भी नहीं झुकते, जो भाग्य की प्रतिकूलताओं से ऊपर उठकर खड़ा रहता है। शांत और अनुकूल परिस्थितियों में विचलित न होना कोई विशेष बात नहीं है। आश्चर्य तो तब होता है जब सबके निराश हो जाने पर भी कोई दृढ़ता से उठ खड़ा हो। जब सब गिर पड़े हों, तब भी कोई अटल खड़ा रहे।
यातना या उन अन्य घटनाओं में, जिन्हें हम प्रतिकूल मानते हैं, वास्तव में बुराई क्या है? मेरे विचार में केवल यही कि मनुष्य अपने मन को हीन बना ले, उसे झुका दे और परिस्थितियों के सामने आत्मसमर्पण कर दे। इनमें से कोई भी बात बुद्धिमान व्यक्ति के साथ नहीं हो सकती। वह किसी भी भार के नीचे सीधा और अडिग खड़ा रहता है। कोई भी विपत्ति उसे छोटा नहीं बना सकती और जो कुछ उसे सहना पड़ता है, उससे वह अप्रसन्न नहीं होता। मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी घट सकता है, उनमें से किसी भी बात की वह केवल इसलिए शिकायत नहीं करता कि वह उसके साथ घटी है। वह अपनी शक्ति को जानता है। वह जानता है कि उसका जन्म ही भारों को धैर्यपूर्वक वहन करने के लिए हुआ है।
मैं बुद्धिमान व्यक्ति को शेष मानवजाति से अलग कोई विशेष वर्ग नहीं मानता और न ही उसे ऐसा निर्जीव पत्थर समझता हूँ, जिसे पीड़ा या दुःख का कोई अनुभव ही न हो। मैं यह ध्यान में रखता हूँ कि वह दो भागों से बना है। एक भाग अतार्किक है। वही पीड़ा, जलन और शारीरिक कष्ट का अनुभव करता है। दूसरा भाग तर्कसंगत है। वही दृढ़ और अडिग धारणाओं को धारण करता है तथा निर्भय और अजेय रहता है। मनुष्य का सर्वोच्च कल्याण इसी तर्कसंगत भाग में स्थित है। जब तक यह सर्वोच्च कल्याण पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो जाता, तब तक मन अस्थिर और व्याकुल बना रहता है। परन्तु जब वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तब मन स्थिर, शांत और अविचल हो जाता है।इसी कारण जो व्यक्ति सद्गुण के मार्ग पर चलना प्रारम्भ कर चुका है, जो उसके प्रति समर्पित है, किन्तु अभी भी शिखर की ओर बढ़ रहा है, जो पूर्णता के निकट तो पहुँच गया है। पर अभी अंतिम सिद्धि प्राप्त नहीं कर सका, वह कभी-कभी शिथिल पड़ जाता है और उसका ध्यान डगमगा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह अभी अनिश्चितताओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। वह अभी भी अस्थिर भूमि पर खड़ा है। किन्तु जो व्यक्ति वास्तव में सुखी है और जिसने सद्गुण की पूर्णता प्राप्त कर ली है, वह स्वयं से सबसे अधिक संतुष्ट तब होता है जब उसने किसी चुनौती का असाधारण साहस के साथ सामना किया हो। जिन परीक्षाओं से अन्य लोग भयभीत होते हैं, उन्हें वह केवल सहन ही नहीं करता बल्कि यदि वे किसी सम्माननीय कर्तव्य का मूल्य हों, तो उनका स्वागत भी करता है। वह 'क्या सौभाग्य है!' सुनने की अपेक्षा 'क्या महान कर्म है!' सुनना कहीं अधिक पसंद करेगा।
अब मैं उस विषय पर आता हूँ, जिसके बारे में उत्तर देने की तुम्हें प्रतीक्षा थी। ऐसा न लगे कि हमारा यह सद्गुण प्रकृति के नियमों से बाहर चला जाता है। इसलिए मैं स्पष्ट कहता हूँ कि बुद्धिमान व्यक्ति भी काँपेगा, पीड़ा का अनुभव करेगा और उसका चेहरा भी पीला पड़ जाएगा। क्योंकि ये सभी शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रियाएँ हैं। फिर रोग कहाँ है? वास्तविक हानि किस बात में है? मैं बताता हूँ। वास्तविक हानि तब होती है जब ये प्रतिक्रियाएँ मन को नीचे गिरा दें, जब वे उसे यह स्वीकार करने पर विवश कर दें कि वह परिस्थितियों का दास है और जब वे उसे अपने ही मानवीय स्वभाव पर पश्चात्ताप करने के लिए बाध्य कर दें। बुद्धिमान व्यक्ति साहस के द्वारा दुर्भाग्य पर विजय प्राप्त करता है। किन्तु ऐसे बहुत-से लोग, जो स्वयं को बुद्धिमान कहते हैं, कभी-कभी अत्यन्त तुच्छ भय से भी आतंकित हो जाते हैं। यहाँ दोष हमारा है क्योंकि हम उस व्यक्ति से, जो अभी प्रगति के मार्ग पर है, वही अपेक्षा करते हैं जो एक पूर्णतः सिद्ध बुद्धिमान व्यक्ति से की जानी चाहिए। मैं स्वयं अभी उन सिद्धान्तों को अपने भीतर दृढ़ करने का प्रयत्न कर रहा हूँ, जिनकी मैं प्रशंसा करता हूँ। मुझे अभी उन पर पूर्ण विश्वास भी प्राप्त नहीं हुआ है। यदि हो भी गया हो, तब भी मैंने उनका इतना अभ्यास नहीं किया है कि वे प्रत्येक विपत्ति के समय तत्काल मेरी सहायता के लिए उपस्थित हो जाएँ। जिस प्रकार कुछ रंग ऊन पर तुरंत चढ़ जाते हैं, जबकि कुछ रंगों को अच्छी तरह चढ़ाने के लिए बार-बार भिगोना और उबालना पड़ता है, उसी प्रकार कुछ विद्याएँ ऐसी होती हैं जो उन्हें सीखते ही हमारे मन पर अपना प्रभाव छोड़ देती हैं। परन्तु यह शिक्षा ऐसी नहीं है। इसे हमारे भीतर पूरी तरह समा जाना चाहिए। यह केवल ऊपर-ऊपर रंग न चढ़ाए बल्कि हमारे व्यक्तित्व में गहराई तक उतरकर स्थायी रंग बन जाए। अन्यथा यह अपने किसी भी वचन को पूरा नहीं कर सकेगी।
इसे कहने के लिए केवल कुछ ही शब्द पर्याप्त हैं। सद्गुण ही एकमात्र वास्तविक कल्याण है और यह भी निश्चित है कि सद्गुण के बिना कोई भी वस्तु कल्याण नहीं है। साथ ही, सद्गुण हमारे श्रेष्ठतम भाग में स्थित है अर्थात हमारे तर्कसंगत मन में। यह सद्गुण क्या है? यह सत्य तथा अडिग निर्णय-शक्ति है। इसी से मन की सभी प्रेरणाएँ उत्पन्न होती हैं और इसी के द्वारा प्रत्येक वह अनुभूति, जो किसी प्रेरणा को जन्म देती है, पूर्णतः स्पष्ट और सही रूप में समझी जाती है।
इस निर्णय-शक्ति के अनुरूप यही उचित है कि सद्गुण से सम्बद्ध सभी वस्तुओं को कल्याण माना जाए और उन्हें एक-दूसरे के समान समझा जाए। शरीर से सम्बन्धित वस्तुएँ शरीर के लिए उपयोगी अवश्य हैं किन्तु वे वास्तविक अर्थ में कल्याण नहीं हैं। उनका कुछ मूल्य तो हो सकता है परन्तु उनका कोई सच्चा नैतिक महत्व नहीं होता। इसलिए वे एक-दूसरे से भिन्न होती हैं; कुछ का मूल्य कम होता है और कुछ का अधिक। जो लोग प्रज्ञा की खोज में लगे हैं, उनके बीच भी भिन्नता स्वीकार करनी होगी। किसी व्यक्ति ने इतनी प्रगति कर ली होती है कि वह भाग्य की चुनौतियों का सामना करने का साहस रखता है, किन्तु वह अभी स्थिर नहीं हुआ होता। परिस्थितियों की तीव्रता से चकाचौंध होकर उसका साहस डगमगा जाता है। दूसरा व्यक्ति इतना आगे बढ़ चुका होता है कि वह भाग्य का सीधे सामना कर सकता है। सम्भव है कि वह पूर्णता के शिखर तक भी पहुँच चुका हो और उसका आत्मविश्वास पूर्णतः दृढ़ हो। जो अभी अपूर्ण है, उसका कभी-कभी लड़खड़ा जाना स्वाभाविक है। वह आगे बढ़ता है, फिर कभी पीछे फिसल जाता है या गिर पड़ता है। किन्तु यदि वह अपने संघर्ष और प्रगति में निरन्तर बना नहीं रहता, यदि वह अपने प्रयासों और दृढ़ संकल्प को शिथिल कर देता है तो उसका पीछे हटना निश्चित है। जो व्यक्ति किसी साधना को बीच में छोड़ देता है, वह दोबारा आरम्भ करने पर वहीं से शुरू नहीं कर पाता जहाँ उसने उसे छोड़ा था।
आओ, हम आगे बढ़ें और निरन्तर प्रयास करते रहें। हमारे सामने जो चुनौतियाँ हैं, वे उन चुनौतियों से भी बड़ी हैं जिन्हें हम पहले ही पार कर चुके हैं। किन्तु प्रगति का सबसे बड़ा भाग तो प्रगति करने की सच्ची इच्छा में ही निहित है। मैं अपने भीतर इस इच्छा को स्पष्ट रूप से अनुभव करता हूँ। मैं पूरे मन से आगे बढ़ना चाहता हूँ। मैं देखता हूँ कि तुम भी उसी प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। तुम उत्साहपूर्वक जीवन के सबसे सुंदर लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हो। आओ, हम दोनों शीघ्रता करें। तभी जीवन वास्तव में जीने योग्य है। अन्यथा हम केवल समय व्यतीत कर रहे हैं और वह भी लज्जाजनक ढंग से, चारों ओर की कुरूपताओं से घिरे हुए। हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए कि जीवन का प्रत्येक क्षण हमारा अपना हो। किन्तु कोई भी क्षण वास्तव में हमारा नहीं हो सकता, जब तक हम स्वयं अपने स्वामी न बन जाएँ।
कब वह समय आएगा जब मैं अच्छे और बुरे भाग्य, दोनों को समान भाव से तुच्छ समझ सकूँगा? कब मैं अपनी सभी वासनाओं और भावनाओं को अपने विवेक के अधीन कर सकूँगा और यह कह सकूँगा—'विजय मेरी है!' क्या तुम पूछते हो कि मैंने किस पर विजय प्राप्त की है? न तो फ़ारसियों पर, न दूरवर्ती मेड लोगों पर और न ही पार्थियों की सीमाओं से परे रहने वाली किसी युद्धप्रिय जाति पर। मैंने विजय प्राप्त की है लोभ पर, महत्वाकांक्षा पर और उस शक्ति पर जो राष्ट्रों के विजेताओं को भी पराजित कर देती है, मृत्यु के भय पर।
अभी के लिए विदा
No comments:
Post a Comment