Friday, 31 July 2026

सच्चे व्यक्तित्व के बारे में -- पत्र - 96

 प्रिय लूसीलियस 


जो व्यक्ति अपने सुख के लिए भाग्य पर निर्भर करता है, उसे कभी भी वास्तव में भाग्यशाली मत समझो। जिसका आनंद संयोग और भाग्य के सहारे टिका हो, उसके सुख का आधार अत्यंत कमजोर होता है। जो प्रसन्नता बाहर से आती है, वह एक दिन बाहर चली भी जाती है। लेकिन जो आनंद मनुष्य के अपने भीतर से उत्पन्न होता है, वह विश्वसनीय और दृढ़ होता है। वह निरंतर बढ़ता है और जीवन के अंतिम क्षण तक हमारा साथ नहीं छोड़ता। जिन वस्तुओं की लोग सामान्यतः प्रशंसा करते हैं, वे तो केवल एक दिन के लिए मिलने वाले लाभ हैं। कोई पूछ सकता है, "क्या वे उपयोगी और आनंददायक दोनों नहीं हो सकतीं?" निस्संदेह हो सकती हैं। बशर्ते वे हमारे अधीन हों, न कि हम उनके अधीन।



    भाग्य जिन वस्तुओं पर कृपा करता है, वे तभी वास्तव में लाभदायक और सुखद बनती हैं, जब उनका स्वामी स्वयं का भी स्वामी हो और अपनी संपत्ति का दास न बन जाए। प्रिय लूसीलियस, यह भूल है कि हम अपने लिए जो कुछ अच्छा या बुरा होता है, उसके लिए भाग्य को उत्तरदायी ठहराएँ। भाग्य तो केवल हमें अच्छी और बुरी परिस्थितियों का कच्चा माल उपलब्ध कराता है। ऐसी प्रारंभिक स्थितियाँ, जिनसे हमारे भीतर आगे चलकर या तो अच्छाई उत्पन्न होगी या बुराई। क्योंकि मन हर प्रकार के भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। वही अपने बल पर अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है और स्वयं ही अपने लिए सुखी या दुखी जीवन का कारण बनता है। दुष्ट मन हर वस्तु को बुरा बना देता है, यहाँ तक कि उन चीज़ों को भी जो देखने में अत्यंत उत्तम प्रतीत होती हैं। इसके विपरीत, सीधा और स्वस्थ मन भाग्य की कठोरताओं को भी सुधार लेता है। वह धैर्यपूर्वक सहन करने की कला से उसकी कठोरता और खुरदुरेपन को कोमल बना देता है। वह समृद्धि को कृतज्ञता और संयम के साथ स्वीकार करता है। विपत्ति के सामने दृढ़ता तथा साहस का परिचय देता है। तुम बुद्धिमान हो सकते हो, हर कार्य विवेकपूर्वक कर सकते हो और कभी अपनी सामर्थ्य से आगे न बढ़ो। फिर भी तुम उस सच्चे और अडिग कल्याण को प्राप्त नहीं कर सकते, जो किसी खतरे से परे है, जब तक कि अस्थिर और अनिश्चित परिस्थितियों का सामना करते समय तुम्हारा मन स्वयं सुरक्षित और स्थिर न हो।

    चाहे तुम दूसरे लोगों को देखो क्योंकि जिन बातों का संबंध हमसे व्यक्तिगत रूप से नहीं होता, उनका निर्णय हम अधिक निष्पक्ष होकर कर पाते हैं या फिर बिना किसी पक्षपात के स्वयं को ही देखो, तुम यह समझ जाओगे और स्वीकार करोगे कि तुम्हारी कोई भी प्रिय वस्तु वास्तव में तब तक उपयोगी नहीं है, जब तक तुम अपने आपको भाग्य की चंचलता और उसके परिणामों का सामना करने के लिए प्रशिक्षित नहीं कर लेते। जब तक तुम अपनी प्रत्येक विपत्ति के समय बिना किसी शिकायत के यह कहना नहीं सीख लेते, 'देवताओं ने अन्यथा निर्णय किया।'

    या इससे भी बेहतर, यदि तुम अपने मन को अधिक साहसी और अधिक उपयुक्त सूत्र से दृढ़ करना चाहो—तो जब भी कोई घटना तुम्हारी अपेक्षा के विपरीत घटित हो, यह कहो, 'देवताओं ने इससे बेहतर निर्णय किया।' जिस व्यक्ति का ऐसा दृष्टिकोण होगा, उसे किसी भी घटना में कोई दोष दिखाई नहीं देगा। ऐसा दृष्टिकोण उसी व्यक्ति में उत्पन्न होता है जो जीवन की बदलती हुई परिस्थितियों और उतार-चढ़ावों की संभावना पर उनके वास्तव में आने से पहले ही विचार कर लेता है। जो अपने बच्चों, जीवनसाथी और संपत्ति को स्थायी अधिकार या ऐसा धन नहीं मानता कि भविष्य में उनके खो जाने पर उसका जीवन अनिवार्य रूप से दुःखमय हो जाए। जो मन भविष्य की चिंता में डूबा रहता है और विपत्ति आने से पहले ही दुखी हो उठता है, वह स्वयं अपने लिए एक विपत्ति बन जाता है। वह इस चिंता में रहता है कि जिन वस्तुओं से उसे आनंद मिलता है, वे सदा बनी रहें। ऐसा मन कभी शांति नहीं पा सकता। भविष्य की आशंकाओं में उलझकर वह वर्तमान की उन वस्तुओं का आनंद भी खो देता है, जिनका वह अभी उपभोग कर सकता है। किसी वस्तु को खो देने का भय, उसे वास्तव में खो देने के दुःख के समान ही होता है।

    इसका यह अर्थ नहीं है कि मैं तुम्हें लापरवाह बनने की सलाह दे रहा हूँ। जहाँ तक संभव हो, भय उत्पन्न करने वाली बातों से बचो। दूरदर्शिता के साथ उन खतरों से अपनी रक्षा करो जिनसे बचा जा सकता है। जो भी तुम्हें हानि पहुँचा सकता हो, उस पर पहले से ही नज़र रखो और उसके घटित होने से बहुत पहले ही उससे बचने का प्रयास करो। लेकिन तुम्हारा सबसे बड़ा सहारा आत्मविश्वास और ऐसा मन होगा जो हर परिस्थिति को सहने के लिए दृढ़ बना हो। जो व्यक्ति विपत्ति को सहन कर सकता है, वही उससे बचने के लिए उचित सावधानी भी बरत सकता है। और जब समुद्र अभी शांत हो, तब वह घबराता नहीं। असमय भयभीत होने से अधिक दयनीय और अधिक मूर्खतापूर्ण कोई बात नहीं है। अपने ही कष्टों की पहले से कल्पना करके स्वयं को सताना कितना बड़ा पागलपन है! संक्षेप में, यदि मैं अपने विचार का सार बताऊँ और उन उन्मत्त लोगों का चित्र प्रस्तुत करूँ जो स्वयं अपने लिए ही बोझ बन जाते हैं, तो वे लोग अपने कष्ट आने से पहले भी उतने ही व्याकुल रहते हैं, जितने कष्ट आने पर होते हैं। जो व्यक्ति आवश्यकता से पहले ही दुखी होने लगता है, वह आवश्यकता से अधिक दुख उठाता है। 

    वास्तविक दुख का सही आकलन न कर पाना और उसके आने से पहले ही उसकी कल्पना करके भयभीत हो जाना, इन दोनों का कारण एक ही है: आत्मसंयम का अभाव। यही आत्मसंयम की कमी लोगों को यह भ्रम भी देती है कि उनका सौभाग्य सदा बना रहेगा, और यह आशा भी कि जो लाभ उन्हें प्राप्त हुए हैं, वे न केवल बने रहेंगे बल्कि लगातार बढ़ते भी जाएँगे। वे मानव जीवन की उस उछालभरी प्रकृति को भूल जाते हैं, जो परिस्थितियों को कभी ऊपर तो कभी नीचे ले जाती है। उन्हें ऐसा लगता है मानो केवल उनके ही जीवन में भाग्य कभी नहीं बदलेगा और परिस्थितियाँ सदा एक-सी बनी रहेंगी। 

    इसी कारण मुझे लगता है कि मेट्रोडोरस ने अपनी उस चिट्ठी में, जो उन्होंने अपने अत्यंत प्रतिभाशाली पुत्र को खो चुकी अपनी बहन को लिखी थी, बहुत उत्कृष्ट बात कही थी, "नश्वर मनुष्यों के लिए जो कुछ भी अच्छा है, वह भी स्वयं नश्वर है।" उनका आशय उन वस्तुओं से था जिनके पीछे लोग भागते हैं क्योंकि वास्तविक कल्याण, बुद्धिमत्ता और सद्गुण, नष्ट नहीं होते। वे सुरक्षित और शाश्वत हैं। यही एक ऐसी अमर संपत्ति है जो नश्वर मनुष्य प्राप्त कर सकता है। किन्तु लोग इतने त्रुटिपूर्ण और इतने असावधान होते हैं कि उन्हें इस बात का ध्यान ही नहीं रहता कि प्रत्येक बीतता हुआ दिन उन्हें उनके अंतिम गंतव्य की ओर ले जा रहा है। इसलिए जब वे कोई वस्तु खो देते हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है, जबकि एक दिन ऐसा भी आएगा जब वे सब कुछ खो देंगे। जिन वस्तुओं को तुम अपना समझते हो, वे भले ही तुम्हारे घर में रखी हों, लेकिन वे वास्तव में तुम्हारी नहीं हैं। जो स्वयं असुरक्षित है, उसके लिए कोई भी वस्तु सुरक्षित नहीं हो सकती। जो मनुष्य स्वयं नश्वर और नाज़ुक है, उसके लिए कोई भी वस्तु स्थायी और अजेय नहीं हो सकती। केवल हमारी संपत्ति ही नहीं जानी है। हमें स्वयं भी एक दिन इस संसार से जाना है। यदि हम इस सत्य को वास्तव में समझ लें तो यही बात हमारे लिए सांत्वना का कारण बन जाती है।जब कोई वस्तु तुमसे चली जाए, तो शांत रहो क्योंकि एक दिन तुम्हें भी जाना है।

    तो फिर इन हानियों का सामना करने के लिए हमें कौन-सा सहारा मिलता है? बस यही कि जो कुछ हमने खो दिया है, उसे अपनी स्मृति में संजोकर रखें और उससे जो आनंद हमें कभी प्राप्त हुआ था, उसे उसके साथ नष्ट न होने दें। हमसे किसी वस्तु का 'स्वामित्व' छीना जा सकता है लेकिन यह तथ्य कभी नहीं छीना जा सकता कि "वह कभी हमारे पास थी।" किसी वस्तु को खो देने के बाद यदि हम उसके लिए कोई कृतज्ञता ही अनुभव न करें तो यह अत्यंत अकृतज्ञता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कभी वह वस्तु हमें प्राप्त हुई थी और उसने हमें आनंद दिया था। भाग्य हमसे किसी वस्तु का स्वामित्व छीन सकता है, लेकिन उससे पहले वह हमें कुछ समय तक उसका उपयोग करने का अवसर भी देता है। यदि हम अनुचित लालसा और व्यर्थ की तड़प में डूब जाएँ तो हम उस बीते हुए सुख का आनंद भी खो बैठते हैं। 

    अपने आप से कहो, "जो बातें इतनी भयावह प्रतीत होती हैं, उन सभी पर विजय पाई जा सकती है।" अनेक लोगों ने विभिन्न प्रकार की कठिन परीक्षाओं पर विजय प्राप्त की है। मूकियस ने अग्नि पर विजय पाई। रेगुलस ने यातनाओं पर। सुकरात ने विषपान पर। रूटिलियस ने निर्वासन पर और कैटो ने तलवार द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त की। हमें भी किसी-न-किसी कठिनाई पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। इसके विपरीत, जिन वस्तुओं को लोग सामान्यतः सौभाग्य का प्रतीक समझकर ललचाते हैं, उन्हें भी अनेक महान व्यक्तियों ने ठुकरा दिया है।फैब्रिसियस ने सेनापति रहते हुए धन को अस्वीकार किया और सेंसर के रूप में उसे सार्वजनिक रूप से निंदनीय ठहराया। ट्यूबेरो ने निर्धनता को अपने लिए भी और कैपिटोल के लिए भी उपयुक्त माना। उन्होंने एक सार्वजनिक भोज में मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करके यह दिखाया कि मनुष्य को उतने में ही संतुष्ट रहना चाहिए, जितने में उस समय देवता भी संतुष्ट थे। सेक्स्टियस ने सम्मान और उच्च पदों को ठुकरा दिया। जन्म और योग्यता के आधार पर वे सार्वजनिक पद धारण कर सकते थे। लेकिन जब जूलियस सीज़र ने उन्हें सीनेटर का पद देना चाहा तो उन्होंने उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया। वे जानते थे कि जो वस्तु दी जा सकती है, वह कभी भी वापस भी ली जा सकती है। आओ, हम भी अपने जीवन में साहसपूर्ण कार्य करें। हमारा नाम भी उन आदर्श व्यक्तियों में शामिल हो। हमने साहस क्यों छोड़ दिया है? हमने आशा क्यों खो दी है? जो कुछ अतीत में संभव था, वह आज भी संभव है, यदि हम अपने मन को शुद्ध करें और प्रकृति के अनुरूप जीवन जीएँ। जब मनुष्य प्रकृति से भटक जाता है, तभी वह इच्छाओं का दास बनता है, भय में जीता है और भाग्य का गुलाम बन जाता है। हम फिर से सही मार्ग पर लौट सकते हैं। हम अपनी स्वस्थ और संतुलित अवस्था को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। आओ, स्वयं को फिर से ऐसा बनाएँ कि जब भी शरीर पर कोई पीड़ा आक्रमण करे, हम भाग्य से कह सकें, "तुम्हारा सामना एक मनुष्य से है। जाओ, किसी ऐसे को खोजो जिसे तुम वास्तव में पराजित कर सको!"

    ऐसी और इसी प्रकार की बातचीत उसके घाव की पीड़ा को कुछ कम कर रही है। मैं सच्चे मन से आशा करता हूँ कि वह घाव या तो धीरे-धीरे भर जाएगा या फिर कम-से-कम बढ़ना बंद कर देगा और उसी के साथ बूढ़ा हो जाएगा। फिर भी, वास्तव में मुझे उसके लिए चिंता नहीं है। मुझे तो इस बात की चिंता है कि यदि ऐसा उत्कृष्ट वृद्ध पुरुष हमसे छिन गया, तो हमारी कितनी बड़ी हानि होगी। उसने अपना जीवन पूर्ण रूप से जी लिया है। वह अपने लिए जीवन में कुछ और नहीं चाहता; यदि वह जीवित रहना चाहता है, तो केवल उन लोगों के लिए, जिनके लिए वह अभी भी उपयोगी है। उसका जीवित रहना उसके उदार हृदय का प्रमाण है। कोई दूसरा व्यक्ति होता तो शायद इन यातनाओं का अंत करने के लिए स्वयं ही अपने जीवन का अंत कर चुका होता। लेकिन वह मानता है कि मृत्यु की शरण लेना उतना ही लज्जाजनक है जितना उससे भागना। "अच्छा, लेकिन यदि परिस्थितियाँ वास्तव में इसकी माँग करें, तो क्या वह तब भी नहीं जाएगा?" निश्चय ही जाएगा। यदि वह किसी के लिए भी उपयोगी न रह जाए और उसके सामने केवल पीड़ा ही शेष रह जाए, तब वह जीवन छोड़ देगा। प्रिय लूसीलियस, यही है जीवन के बीच रहकर दर्शन का अध्ययन करना और उसे वास्तव में व्यवहार में उतारना, यह देखना कि जब मृत्यु सामने आ खड़ी हो और पीड़ा पूरे बल से दबाव डाल रही हो, तब एक बुद्धिमान मनुष्य कितने साहस के साथ उनका सामना करता है। 

    हमें यह सीखना चाहिए कि क्या करना चाहिए और यह शिक्षा उसी से लेनी चाहिए, जो स्वयं वैसा करके दिखा रहा है। अब तक हम केवल इस बात पर तर्क-वितर्क करते रहे हैं कि क्या कोई व्यक्ति पीड़ा सह सकता है या क्या मृत्यु का आगमन सबसे साहसी मनुष्य को भी विचलित कर सकता है। लेकिन अब और शब्दों की क्या आवश्यकता है? आओ, वर्तमान उदाहरण को ही देखें। यह व्यक्ति पीड़ा का सामना इसलिए साहसपूर्वक नहीं कर रहा कि मृत्यु निकट है; और न ही वह मृत्यु का सामना इसलिए अधिक साहस से कर रहा है कि वह पीड़ा से थक चुका है। दोनों ही परिस्थितियों में उसका सहारा केवल उसका अपना आत्मबल है। मृत्यु की आशा उसकी पीड़ा को अधिक सहनीय नहीं बनाती और वह केवल इसलिए प्रसन्नतापूर्वक मृत्यु का स्वागत नहीं करता कि वह कष्टों से ऊब गया है। वह पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहता है और मृत्यु की शांतिपूर्वक प्रतीक्षा करता है।

No comments:

Post a Comment

सच्चे व्यक्तित्व के बारे में -- पत्र - 96

 प्रिय लूसीलियस  जो व्यक्ति अपने सुख के लिए भाग्य पर निर्भर करता है, उसे कभी भी वास्तव में भाग्यशाली मत समझो।  जिसका आनंद संयोग और भाग्य के ...