Saturday, 29 August 2026

जेम्स बाल्डविन के उपन्यास Go Tell It on the Mountain का हिंदी अनुवाद- भाग- 2 (संतों की प्रार्थनाएँ/तीन: एलिज़ाबेथ की प्रार्थना)

 

तीन: एलिज़ाबेथ की प्रार्थना

हे प्रभु, काश मैं मिस्र देश में ही मर गया होती![1]

 

जब एलिशा बोल रहा था, तब एलिज़ाबेथ को लगा कि प्रभु उसके हृदय से कोई संदेश कह रहे हैं कि यह अग्निमय आध्यात्मिक आगमन उसी के लिए था। यदि वह स्वयं को नम्र करके ध्यानपूर्वक सुने तो परमेश्वर उसे इसका अर्थ समझा देंगे। इस निश्चितता से उसके भीतर उल्लास नहीं बल्कि भय भर गया। उसे डर था कि परमेश्वर क्या कहेंगे, कौन-सी अप्रसन्नता, कैसी निंदा या आने वाले किन ऐसे कष्टों की भविष्यवाणी उनके मुख से निकलेगी, जिन्हें अभी उसे सहना बाकी है।



अब एलिशा बोलना बंद करके उठ खड़ा हुआ। वह पियानो के पास जाकर बैठ गया। उसके चारों ओर धीमे स्वर में भजन गाया जा रहा थाफिर भी वह प्रतीक्षा करती रही। उसके मन की आँखों के सामने, आग की रोशनी जैसी एक चमक में, जॉन का चेहरा डोलता हुआ दिखाई दिया। उस जॉन का, जिसे वह इतनी अनिच्छा के साथ इस संसार में लाई थी। आज रात वह इसी मुक्ति के लिए रो रही थी कि जॉन को असीम क्रोध से पार ले जाकर अनुग्रह की अवस्था में पहुँचा दिया जाए।

वे गा रहे थे, क्या यीशु को अकेले ही क्रूस उठाना होगा

और क्या सारी दुनिया बिना क्रूस के मुक्त हो जाएगी?”

एलिशा ने पियानो पर उस धुन को धीरे-धीरे बजाना शुरू किया, उसकी उँगलियाँ ऐसी लग रही थीं मानो झिझक रही हों, जैसे वे भी बजाने के लिए लगभग अनिच्छुक हों। वह भी अपने भीतर की उस प्रबल अनिच्छा के विरुद्ध संघर्ष कर रही थीलेकिन उसने अपने हृदय को किसी तरह “आमीन” कहने के लिए विवश किया। तभी प्रेइंग मदर वॉशिंगटन की आवाज़ ने उत्तर का अगला पद उठा लिया,  

नहीं, हर एक के लिए एक क्रूस है

और मेरे लिए भी एक क्रूस है।”

 

उसने अपने पास किसी के रोने की आवाज़ सुनी। क्या वह एला मे थी या फ्लोरेंस या फिर उसकी अपनी ही आँखों से बहते आँसुओं की बढ़ी हुई प्रतिध्वनि? वह रुदन भजन के स्वरों के नीचे दब गया था। वह यह गीत जीवन भर सुनती आई थी, वह इसी गीत को सुनते हुए बड़ी हुई थी। लेकिन आज जितनी गहराई से वह इसे समझ रही थी, उतनी पहले कभी नहीं समझी थी। पूरा चर्च इस गीत से भर गया था, मानो चर्च स्वयं केवल एक खोखला स्थान या शून्य बन गया हो, जो उन आवाज़ों की प्रतिध्वनि से गूँज रहा था, जिन्होंने उसे इस अँधेरे स्थान तक पहुँचा दिया था। उसकी मौसी इसे हमेशा कठोर स्वर में, दबी हुई आवाज़ में और एक कटु गर्व के साथ गाया करती थी,

पवित्र किया हुआ यह क्रूस मैं उठाती रहूँगी...

जब तक मृत्यु मुझे मुक्त न कर दे,

और तब घर लौटूँगी, सिर पर मुकुट धारण किए,

क्योंकि मेरे लिए भी एक मुकुट है।”

 

शायद अब वह बहुत, बहुत बूढ़ी हो चुकी होगी और अब भी उसी कठोर मनोवृत्ति के साथ उस छोटे-से घर में यह गीत गा रही होगी, जो कभी उसने और एलिज़ाबेथ ने इतने लंबे समय तक साथ साझा किया था। उसे एलिज़ाबेथ की उस लज्जा के बारे में कुछ पता नहीं था। एलिज़ाबेथ ने जॉन के बारे में तब तक कुछ नहीं लिखा था, जब तक उसकी गैब्रियल से शादी हुए काफी समय नहीं बीत गया था। प्रभु ने उसकी मौसी को कभी न्यूयॉर्क शहर आने की अनुमति नहीं दी थी। उसकी मौसी हमेशा भविष्यवाणी किया करती थी कि एलिज़ाबेथ का अंत अच्छा नहीं होगा। वह जितनी घमंडी, दिखावटी और मूर्ख थी और बचपन के सारे दिनों में उसे जिस तरह मनमानी करने की छूट मिली थी, उसके कारण।

उसकी मौसी उन विपत्तियों की श्रृंखला में दूसरी थी, जिन्होंने एलिज़ाबेथ का बचपन समाप्त कर दिया था। पहली विपत्ति तब आई थी, जब वह आठ वर्ष की थी और नौ की होने वाली थी। उसकी माँ की मृत्यु हो गई। उस समय एलिज़ाबेथ ने इसे तुरंत कोई विपत्ति नहीं माना था क्योंकि वह अपनी माँ को मुश्किल से जानती थी और निश्चित रूप से उससे प्रेम भी नहीं करती थी। उसकी माँ बहुत गोरी, सुंदर और नाज़ुक स्वास्थ्य वाली थीइसलिए वह अपना अधिकांश समय बिस्तर पर ही बिताती थी। वह बीमारी के लाभों के बारे में आध्यात्मवादी पुस्तिकाएँ पढ़ती रहती और एलिज़ाबेथ के पिता से अपनी तकलीफ़ों की शिकायत करती रहती थी। एलिज़ाबेथ को अपनी माँ की बस इतनी ही याद थी कि वह बहुत आसानी से रो पड़ती थी और उसके शरीर से बासी दूध जैसी गंध आती थी। शायद उसकी माँ का वह बेचैन कर देने वाला रंग ही था, जिसकी वजह से जब भी उसकी माँ उसे अपनी बाँहों में लेती, एलिज़ाबेथ को दूध का ख़याल आता। हालाँकि उसकी माँ उसे बहुत अधिक बार बाँहों में नहीं लेती थी। एलिज़ाबेथ को बहुत जल्दी संदेह होने लगा था कि ऐसा इसलिए था क्योंकि उसका रंग उसकी माँ से बहुत अधिक गहरा था। स्वाभाविक रूप से वह उसकी माँ जितनी सुंदर भी नहीं थी। जब वह अपनी माँ के सामने होती, तो संकोच से सिर झुकाए, उदास और रूखी बनी रहती। उसे समझ नहीं आता था कि अपनी माँ के उन तीखे और निरर्थक सवालों का क्या जवाब दे, जो माँ की चिंता जताने के उग्र दिखावे के साथ पूछे जाते थे। जब वह अपनी माँ को चूमती या अपनी माँ को उसे चूमने देती, तब वह यह दिखावा नहीं कर सकती थी कि उसके भीतर किसी अप्रिय कर्तव्य-बोध के अलावा कोई और भावना भी है। इससे, स्वाभाविक रूप से, उसकी माँ के भीतर एक तरह का असमंजस भरा क्रोध पैदा हो गया था और वह एलिज़ाबेथ को यह कहते-कहते कभी नहीं थकती थी कि वह एक “अप्राकृतिक” बच्ची है।

लेकिन अपने पिता के साथ उसका संबंध बिल्कुल अलग था। एलिज़ाबेथ की स्मृति में वे हमेशा जवान, सुंदर, दयालु और उदार थे। वे अपनी बेटी से प्रेम करते थे। वे उससे कहते थे कि वह उनकी आँखों का तारा है वह उनके हृदय से लिपटी हुई है और निश्चय ही वह इस धरती की सबसे अच्छी छोटी बच्ची है। जब एलिज़ाबेथ अपने पिता के साथ होती तो किसी रानी की तरह अकड़कर चलती और नखरे करतीउसे किसी चीज़ से डर नहीं लगता था। सिवाय उस क्षण के जब उसके पिता कहते कि अब उसके सोने का समय हो गया है या कि अब उन्हें “चलना चाहिए।” वे उसके लिए हमेशा चीज़ें खरीदते रहते। पहनने के लिए भी और खेलने के लिए भी। रविवार को वे उसे देहात में लंबी सैर पर ले जाते या जब शहर में सर्कस आया होता तो सर्कस दिखाने ले जाते या पंच एंड जूडी[2] के कठपुतली तमाशे दिखाने ले जाते। उनका रंग भी एलिज़ाबेथ की तरह साँवला थावे कोमल और स्वाभिमानी थे। उन्होंने कभी उस पर क्रोध नहीं किया था। हाँ, उसने उन्हें कुछ बार दूसरे लोगों पर क्रोधित होते देखा था। मसलन, उसकी माँ पर और बाद में  निश्चित रूप से, उसकी मौसी पर भी। उसकी माँ हमेशा क्रोधित रहती थी और एलिज़ाबेथ उस पर ध्यान नहीं देती थी। बाद में उसकी मौसी भी लगातार क्रोधित रहने लगी तो एलिज़ाबेथ ने उसे सहना सीख लिया। लेकिन अगर उन दिनों उसके पिता कभी उस पर क्रोधित हो गए होते तो वह मर जाना चाहती।

उसके पिता को भी कभी उसकी उस बदनामी के बारे में पता नहीं चला था। जब वह घटना घटी तो एलिज़ाबेथ समझ ही नहीं पाई कि उन्हें कैसे बताए। उस व्यक्ति को इतना दर्द कैसे पहुँचाए जिसने पहले ही इतना दर्द सहा था। बाद में, जब वह उन्हें बताना चाहती, तब तक वे बहुत पहले ही उस शांत धरती के नीचे जा चुके थे और किसी भी बात की परवाह करने से बहुत दूर हो चुके थे।

अब, जब उसके चारों ओर गाना और रोना जारी थावह अपने पिता के बारे में सोच रही थी। सोच रही थी कि वह अपने उस नाती से कितना प्रेम करते, जो इतने तरीकों से उनके जैसा था। शायद वह केवल उसका सपना थालेकिन जब कभी उसे जॉन में अपने पिता की कोमलता की अजीब तरह से दूर और विकृत प्रतिध्वनियाँ सुनाई देती थीं तो उसे यह सपना नहीं लगता था। उसे अपने पिता की हँसी का वह ढंग भी याद आता। वे अपना सिर पीछे की ओर झटका देते थे और उनके चेहरे पर अंकित वर्षों के निशान जैसे गायब हो जाते थे। उनकी कोमल आँखें और भी कोमल हो जाती थीं और उनके होंठों के कोने ऊपर उठ जाते थे बिल्कुल किसी छोटे लड़के के होंठों की तरह। उसके पिता के भीतर वह घातक स्वाभिमान भी था, जिसके पीछे वे तब छिप जाते थे, जब उन्हें दूसरे लोगों की नीचता का सामना करना पड़ता था। वही थे जिन्होंने उससे कहा था कि जब वह अकेले रोए तो रो ले। लेकिन दुनिया को कभी यह न दिखाए कि वह रो रही है, कभी दया न माँगे। अगर किसी को मरना ही पड़े तो आगे बढ़कर मर जाएलेकिन कभी खुद को पराजित न होने दे। उन्होंने यह बात उससे उन आखिरी अवसरों में से एक पर कही थी, जब उसने उन्हें देखा था, तब उसे कई मील दूर मैरीलैंड ले जाया जा रहा था ताकि वह अपनी मौसी के साथ रह सके। आने वाले वर्षों में उसे बार-बार उनके ये शब्द याद करने पड़े अंततः उसे अपने भीतर उस कड़वाहट की गहराई का पता चला, जो उसके पिता के भीतर थी और जिससे ये शब्द निकले थे।

क्योंकि जब उसकी माँ मर गई तो उसकी दुनिया जैसे ढह गई। उसकी माँ की बड़ी बहन, उसकी मौसी, वहाँ पहुँची और एलिज़ाबेथ के घमंड तथा निकम्मेपन को देखकर स्तब्ध रह गई। उसने तुरंत यह निर्णय कर लिया कि उसका पिता किसी बच्चे का पालन-पोषण करने योग्य व्यक्ति नहीं है। विशेषकर, जैसा कि उसने रहस्यमय ढंग से कहा, एक मासूम छोटी लड़की का। उसकी मौसी का यही निर्णय, जिसके लिए एलिज़ाबेथ ने उसे कई वर्षों तक कभी क्षमा नहीं किया, तीसरी विपत्ति का कारण बना। अपने पिता से अलग हो जाना, उस हर चीज़ से अलग हो जाना, जिसे वह इस धरती पर सबसे अधिक प्रेम करती थी।

क्योंकि उसके पिता एक ऐसे “घर” को चलाते थे, जैसा उसकी मौसी उसे कहती थी, वह घर नहीं जिसमें वे स्वयं रहते थे बल्कि कोई दूसरा घर, जहाँ, जैसा कि एलिज़ाबेथ समझ पाई थी, अक्सर दुष्ट लोग आया करते थे। उसकी मौसी के अनुसार उनके पास एक “अस्तबल” भी था। चारों ओर से निम्न, साधारण अश्वेत लोग, सबसे निम्न श्रेणी के लोग वहाँ आते थे (और कभी-कभी अपनी औरतों को भी साथ लाते थेकभी-कभी वहीं औरतें मिल जाती थीं), खाने-पीने, सस्ती देसी शराब पीने और पूरी रात संगीत बजाने के लिए। उससे भी बदतर काम करने के लिए, जैसा कि उस समय उसकी मौसी की भयावह चुप्पी संकेत करती थीऐसे काम जिनके बारे में न कहना ही बेहतर था। उसकी मौसी कसम खाकर कहती थी कि वह अपनी बहन की बेटी को ऐसे आदमी के साथ बड़ा होने देने से पहले आकाश-पाताल एक कर देगी। हालाँकि उसने न तो आकाश की ओर देखा और न धरती के उस छोटे-से हिस्से के अलावा किसी और धरती की परवाह की, जहाँ अदालत की इमारत थी, फिर भी वह अपनी बात मनवाने में सफल रही। मानो अचानक बिजली गिरी हो या कोई जादुई मंत्र चल गया हो। एक क्षण में उजाला था और अगले ही क्षण अँधेरा। एलिज़ाबेथ का जीवन बदल गया। उसकी माँ मर चुकी थी, उसके पिता को उसके जीवन से निकाल दिया गया था और अब वह अपनी मौसी की छाया में रहती थी।

या अधिक ठीक-ठीक कहें तो जैसा कि वह अब सोच रही थी, जिस छाया में वह रहती आई थी, वह वास्तव में भय था। घृणा ने उस भय को और भी गहरा कर दिया था। उसने एक क्षण के लिए भी अपने पिता को दोषी नहीं माना था। अगर उसे यह बताया जाता और प्रमाणित करके दिखा भी दिया जाता कि उसके पिता शैतान के सगे चचेरे भाई थे, तब भी इससे उसके प्रति उसका प्रेम तनिक भी कम नहीं होता। उसके लिए वह प्रमाण कभी वास्तविक नहीं होता। यदि होता भी तो उसे उनकी बेटी होने का कोई पछतावा नहीं होता। वह इससे अधिक और कुछ नहीं चाहती कि नरक में भी उनके साथ कष्ट सहती। जब उसे उनसे अलग कर दिया गया, तब उसकी कल्पना उनके ऊपर लगाए गए दुष्कर्मों को वास्तविक रूप देने में पूरी तरह असमर्थ थी। निश्चित रूप से, वह स्वयं उन्हें दोषी नहीं मानती थी। जब उसके पिता ने उसे अपने से अलग कर दिया और मुड़कर चले गए, तब वह पीड़ा से चीख पड़ी थी और उसे उठाकर रेलगाड़ी तक ले जाना पड़ा था। बाद में, जब वह उस समय घटी हर बात को पूरी तरह समझने लगी, तब भी अपने हृदय में वह उन्हें दोषी नहीं ठहरा सकी। हो सकता है उनका जीवन पापपूर्ण रहा हो। लेकिन उन्होंने उसके साथ बहुत भलाई की थी। उनके जीवन ने उन्हें इतना दर्द अवश्य दिया था कि दुनिया का फैसला उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था। दुनिया के लोग उन्हें उस तरह नहीं जानते थे, जिस तरह वह जानती थीवे उस तरह परवाह नहीं करते थे, जिस तरह उसने की थी। उसे केवल इस बात का दुख था कि उसके पिता ने जैसा उन्होंने वादा किया था, कभी आकर उसे वहाँ से नहीं निकाला और उसके बड़े होने के दौरान वह उन्हें बहुत कम देख पाई। जब वह युवती हुई, तब उसने उन्हें बिल्कुल नहीं देखालेकिन इसके लिए दोष उसी का था।

नहीं, वह अपने पिता को दोषी नहीं मानती थी वह अपनी मौसी को दोषी मानती थी और उस क्षण से, जब उसे समझ आया कि उसकी मौसी उसकी माँ से प्रेम करती थी, लेकिन उसके पिता से प्रेम नहीं करती थी। इसका केवल यही अर्थ हो सकता था कि उसकी मौसी उससे भी प्रेम नहीं करती थी। अपनी मौसी के साथ बिताए जीवन में ऐसी कोई बात नहीं हुई जिसने एलिज़ाबेथ को गलत साबित किया हो। यह सच था कि उसकी मौसी हमेशा कहती रहती थी कि वह अपनी बहन की बेटी से कितना प्रेम करती है, उसके लिए उसने कितने बड़े त्याग किए हैं और इस बात का कितना ध्यान रखती है कि एलिज़ाबेथ एक अच्छी, ईसाई लड़की बनकर बड़ी हो। लेकिन एलिज़ाबेथ एक पल के लिए भी इस धोखे में नहीं आई और जब तक वह उसके साथ रही, उसने अपनी मौसी को तुच्छ समझना बंद नहीं किया। उसे महसूस होता था कि उसकी मौसी जिस चीज़ को प्रेम कहती है, वह वास्तव में कुछ और है। एक रिश्वत, एक धमकी, सत्ता पर अधिकार जमाने की एक अशोभनीय इच्छा। वह जानती थी कि प्रेम जिस तरह की कैद थोप सकता है, वह रहस्यमय ढंग से आत्मा और मन के लिए स्वतंत्रता भी हो सकती हैवह सूखी जगह में पानी जैसी हो सकती है। उसका मौसी के मन में छाए उन कारागारों, चर्चों, कानूनों, पुरस्कारों और दंडों से कोई संबंध नहीं था, जिन्होंने उसकी मौसी की मानसिक दुनिया को पूरी तरह भर रखा था।

फिर भी, आज रात, अपने गहरे भ्रम में, वह सोच रही थी कि कहीं वह गलत तो नहीं थीकहीं कोई ऐसी बात तो नहीं थी जिसे उसने नज़रअंदाज़ कर दिया था और जिसके लिए प्रभु ने उसे कष्ट सहने दिया था। अरी, अपने आपको बहुत बड़ी समझने वाली लड़की,” उन दिनों उसकी मौसी उससे कहा करती थी, “अपने कदम संभालकर रखना, सुन रही हो? तुम नाक हवा में उठाए घूमती रहोगी तो प्रभु तुम्हें सीधे धरती की गहराई में गिरा देंगे। मेरी बात याद रखना। तुम देखोगी।”

इस लगातार लगाए जाने वाले आरोप का एलिज़ाबेथ ने कभी उत्तर नहीं दिया। वह बस अपनी मौसी को बड़ी-बड़ी, निर्भीक आँखों से इस तरह घूरती रहती थी, जिसमें एक साथ उसकी अवमानना भी झलकती थी और सज़ा देने का कोई बहाना भी विफल हो जाता था। यह तरकीब, जिसे उसने अनजाने में अपने पिता से सीखा था, शायद ही कभी असफल होती थी। जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए, उसकी मौसी मानो एक ही नज़र में उस बर्फीली दूरी को समझ लेती थी, जो एलिज़ाबेथ ने उनके बीच खड़ी कर दी थी और जिसे अब शायद कभी पार नहीं किया जा सकता था। तब वह नीचे देखते हुए, धीमी आवाज़ में जोड़ देती, क्योंकि भगवान इसे पसंद नहीं करते।”

एलिज़ाबेथ का हृदय उत्तर देता, मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि भगवान को क्या पसंद नहीं है और न तुम्हारी। मैं यहाँ से चली जाऊँगी। वह आएँगे और मुझे यहाँ से ले जाएँगे और मैं यहाँ से चली जाऊँगी।”

वह” उसका पिता था, जो कभी नहीं आया। समय बीतता गया और वह केवल इतना कहती रही, मैं यहाँ से चली जाऊँगी।” यह दृढ़ संकल्प उसके दोनों स्तनों के बीच किसी भारी रत्न की तरह लटका रहता थाउसके मन के अँधेरे आकाश पर वह आग की लपटों में लिखा हुआ था।

लेकिन हाँ, एक ऐसी बात थी जिसे उसने नज़रअंदाज़ कर दिया था। विनाश से पहले घमंड आता है और पतन से पहले अहंकारी मन।” वह यह नहीं जानती थीउसने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि वह गिर सकती है। आज रात वह सोच रही थी कि यह ज्ञान वह अपने बेटे तक कैसे पहुँचा सकती हैक्या वह उसे उस चीज़ को सहने में मदद कर सकती है, जिसे अब बदला नहीं जा सकता? क्या जीवन रहते-रहते वह उसे क्षमा कर देगा? उसके घमंड, उसकी मूर्खता और परमेश्वर के साथ उसके सौदेबाज़ी करने के लिए? क्योंकि आज रात, उसके पतन से पहले के वे वर्ष, उसकी मौसी के उस अँधेरे घर में, उस घर में जो हमेशा बहुत देर तक अलमारियों में बंद रखे कपड़ों और बूढ़ी औरतों की गंध से भरा रहता था, जहाँ उनकी चुगलियों की गंध जैसे हर जगह फैली रहती थी, जहाँ किसी तरह उसकी मौसी की चाय में डाले जाने वाले नींबू की गंध, तली हुई मछली की गंध और उस भट्ठी की गंध भी फैली रहती थी जिसे कोई तहखाने में रखता था। उसके सामने पूरी तरह और अत्यंत तीव्रता से लौट आया। उसे अपना वह रूप याद आया। जब भी उसकी मौसी किसी कमरे में बैठी होती, वह उस कमरे में प्रवेश करती। मौसी जो कुछ कहती, उसका उत्तर देती और उसके सामने धातु की तरह तनी हुई खड़ी रहती। घृणा और भय से भीतर तक ग्रस्त, हर घंटे, हर दिन एक युद्ध में। ऐसा युद्ध जिसे वह अपने सपनों में भी जारी रखती थी। अब वह समझती थी कि उसने इतनी चुपचाप और इतनी कम उम्र में अपनी मौसी पर किस बात का आरोप लगाया था। उसने उस असमंजस में पड़े बच्चे को उसके प्रिय पिता की बाँहों से छीन लिया था। अब वह यह भी समझती थी कि कभी-कभी, बहुत धुँधले ढंग से और अनिच्छा से, उसे क्यों लगता था कि उसके पिता ने उसके साथ विश्वासघात किया है क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी को उस स्त्री से दूर ले जाने के लिए, जो उससे प्रेम नहीं करती थी और जिससे वह स्वयं प्रेम नहीं करती थी, धरती-पाताल एक नहीं कर दिया था। फिर भी आज रात वह जानती थी कि धरती-पाताल एक करना कितना कठिन होता है क्योंकि उसने स्वयं एक बार ऐसा करने की कोशिश की थी और असफल रही थी। वह यह भी जानती थी। इस एहसास ने उसके मुँह तक आए आँसुओं को सबसे कड़वी जड़ी-बूटी से भी अधिक कड़वा बना दिया था कि अपनी मौसी के प्रति इतने लंबे समय से हृदय में सँजोए हुए उस घमंड और कड़वाहट के बिना वह उसके साथ अपना जीवन कभी सह नहीं पाती।

उसने रिचर्ड के बारे में सोचा। रिचर्ड ही वह व्यक्ति था जो उसे उस घर से और दक्षिण से बाहर निकालकर, विनाश के नगर में ले गया था। वह अचानक उसके जीवन में आया था। जिस क्षण से वह आया, उसी क्षण से लेकर अपनी मृत्यु के क्षण तक उसने उसके जीवन को पूरी तरह भर दिया था। आज रात भी, हृदय के उस लगभग अभेद्य गुप्त स्थान में, जहाँ सत्य छिपा रहता है और जहाँ केवल सत्य ही जीवित रह सकता है, वह यह इच्छा नहीं कर सकती थी कि काश उसने उसे जाना ही न होतान ही वह इस बात से इनकार कर सकती थी कि जब तक वह उसके साथ था, स्वर्ग का उल्लास उसके लिए कोई अर्थ नहीं रख सकता था। यदि उसे रिचर्ड और परमेश्वर में से किसी एक को चुनने के लिए विवश किया जाता तो रोते हुए भी वह केवल परमेश्वर से मुँह मोड़ सकती थी।

इसी कारण परमेश्वर ने उसे उससे छीन लिया था। इन सभी बातों के लिए अब वह दंड चुका रही थीयही घमंड, घृणा, कड़वाहट, वासना, यह मूर्खता, यह पतन, उसका पुत्र विरासत में पाए हुए था।

रिचर्ड का जन्म मैरीलैंड में नहीं हुआ था। जिस गर्मी में एलिज़ाबेथ उससे मिली, उस समय वह वहाँ किराने की दुकान में क्लर्क का काम कर रहा था। वर्ष 1919 था और वह उस शताब्दी से एक वर्ष छोटी थी। रिचर्ड बाईस वर्ष का था, जो उन दिनों एलिज़ाबेथ को बहुत बड़ी उम्र लगती थी। उसने उसे तुरंत नोटिस किया क्योंकि वह इतना उदासीन और रूखा था और केवल नाममात्र का शिष्ट था। उसकी मौसी गुस्से में कहा करती थी कि वह लोगों को इस तरह सामान देता था, जैसे उसे उम्मीद हो कि जो खाना वे खरीद रहे हैं, वही उन्हें ज़हर दे देगा। एलिज़ाबेथ को उसे चलते हुए देखना अच्छा लगता था। उसका शरीर बहुत पतला, सुंदर और बेचैन था। एलिज़ाबेथ ने समझदारी से सोचा, बहुत तनावपूर्ण स्वभाव वाला। वह बिलकुल बिल्ली की तरह चलता था। लगातार अपने पैरों के अगले हिस्से पर और बिल्ली जैसी प्रभावशाली, उदासीन दूरी बनाए हुए। उसका चेहरा बंद-सा रहता था और उसकी आँखों में ज़रा भी चमक नहीं होती थी। वह हर समय सिगरेट पीता रहता था। हिसाब जोड़ते समय भी सिगरेट उसके होंठों के बीच दबी रहती और कभी-कभी वह उसे काउंटर पर जलती हुई छोड़कर सामान ढूँढ़ने चला जाता। जब कोई व्यक्ति दुकान में प्रवेश करता और वह “सुप्रभात” या “शुभ दिन” कहता तो वह लगभग सिर उठाए बिना ही कहता और उसके स्वर में ऐसी उदासीनता होती जो बदतमीज़ी से बस थोड़ी-सी कम थी। जब ग्राहक अपनी ज़रूरत का सामान खरीदकर, पैसे गिनकर और बचे हुए पैसे लेकर जाने को मुड़ता और रिचर्ड कहता, “धन्यवाद,” तो उसका स्वर इतना शाप जैसा लगता कि लोग कभी-कभी आश्चर्य से मुड़कर उसे देखने लगते।

एक बार एलिज़ाबेथ ने अपनी मौसी से कहा, “उसे उस दुकान में काम करना ज़रा भी पसंद नहीं है।”

उसकी मौसी ने तिरस्कार से कहा, “उसे काम करना ही पसंद नहीं है। उसे तो बस तुम पसंद हो।”

एक उजले गर्मियों के दिन जो उसकी स्मृति में हमेशा के लिए उजला बना रहा, वह अकेली दुकान में आई। उसने अपनी सबसे अच्छी सफेद गर्मियों वाली पोशाक पहन रखी थी और हाल ही में सीधे किए गए अपने बालों के सिरों को घुमाकर लाल रंग की रिबन से बाँध रखा था। वह अपनी मौसी के साथ चर्च के एक बड़े पिकनिक में जाने वाली थी और कुछ नींबू खरीदने आई थी। दुकान के मालिक के पास से गुजरते हुए, जो बहुत मोटा आदमी था और फुटपाथ पर बैठकर खुद को पंखा झल रहा था, उसने उसे जाते-जाते पूछा कि क्या उसके लिए मौसम बहुत गर्म है। उसने कुछ जवाब दिया और फिर उस अँधेरी, भारी गंध वाली दुकान में चली गई, जहाँ मक्खियाँ भिनभिना रही थीं और रिचर्ड काउंटर पर बैठा एक किताब पढ़ रहा था।

उसे तुरंत लगा कि उसने रिचर्ड को परेशान करके गलती की है। उसने माफी माँगते हुए धीमे से कहा कि उसे बस कुछ नींबू खरीदने हैं। उसे उम्मीद थी कि वह अपने उसी रूखे ढंग से उसके लिए नींबू निकालेगा और फिर अपनी किताब में लौट जाएगालेकिन वह मुस्कराया और बोला, बस इतना ही चाहिए? अब अच्छी तरह सोच लो। पक्का कुछ और तो नहीं भूल गई?”

उसने उसे पहले कभी मुस्कराते हुए नहीं देखा था। सच कहें तो उसकी आवाज़ भी उसने पहले कभी ठीक से नहीं सुनी थी। उसके हृदय ने एक भयानक छलाँग लगाई और फिर उतनी ही भयावह तरह से लगा कि वह हमेशा के लिए रुक गया है। वह बस वहीं खड़ी उसे देखती रह गई। अगर वह उससे पूछता कि उसे क्या चाहिए तो वह शायद यह भी याद नहीं रख पाती कि वह क्या खरीदने आई थी। तब उसने पाया कि वह उसकी आँखों में देख रही थी। जहाँ उसे लगता था कि बिल्कुल कोई रोशनी नहीं है, वहाँ उसे ऐसी रोशनी दिखाई दी, जैसी उसने पहले कभी नहीं देखी थी। वह अब भी मुस्करा रहा थालेकिन उसकी मुस्कान में कुछ अजीब-सी तीव्रता थी। फिर उसने पूछा, “कितने नींबू चाहिए, छोटी लड़की?”

छह,” उसने आखिरकार कहा और उसे बहुत राहत हुई कि कुछ भी नहीं हुआ था। सूरज अब भी चमक रहा था, मोटा आदमी अब भी दरवाज़े पर बैठा था और उसका हृदय ऐसे धड़क रहा था जैसे, वह कभी रुका ही न हो। लेकिन वह धोखे में नहीं आई। उसे वह क्षण याद था, जब उसका हृदय रुक गया था। वह जानती थी कि अब वह पहले से अलग ढंग से धड़क रहा था।

उसने नींबू एक थैले में डाल दिए। एलिज़ाबेथ एक अजीब संकोच के साथ काउंटर के और पास आई ताकि उसे पैसे दे सके। उसकी हालत बहुत विचित्र थी क्योंकि न तो वह उससे अपनी आँखें हटा पा रही थी, न ही ठीक से उसकी ओर देख पा रही थी।

उसने पूछा, “क्या वह तुम्हारी माँ है, जिसके साथ तुम हमेशा आती हो?”

नहीं,” उसने कहा, “वह मेरी मौसी हैं।” उसे पता नहीं था कि उसने ऐसा क्यों कहालेकिन फिर उसने कह दिया, “मेरी माँ मर चुकी हैं।”

ओह,” उसने कहा। फिर बोला, “मेरी भी।” दोनों ने काउंटर पर रखे पैसों को कुछ सोचते हुए देखा। उसने पैसे उठा लिएलेकिन अपनी जगह से हिला नहीं। कुछ देर बाद उसने कहा, “मुझे नहीं लगा था कि वह तुम्हारी माँ है।”

क्यों?”

पता नहीं। वह तुम्हारी जैसी नहीं दिखती।”

उसने सिगरेट जलाने के लिए पैकेट निकाला, फिर उसकी ओर देखा और पैकेट वापस जेब में रख लिया।

एलिज़ाबेथ ने जल्दी से कहा, “मेरी परवाह मत करो। वैसे भी मुझे जाना है। वह इंतज़ार कर रही हैं। हम बाहर जा रहे हैं।”

वह मुड़ा और कैश रजिस्टर को ज़ोर से बंद किया। एलिज़ाबेथ ने अपने नींबू उठा लिए। उसने उसे बचे हुए पैसे दे दिए। एलिज़ाबेथ को लगा कि उसे कुछ और कहना चाहिए। न जाने क्यों, बस इस तरह वहाँ से निकल जाना उसे ठीक नहीं लग रहा था। लेकिन उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे। लेकिन रिचर्ड ने पूछा, तो आज तुमने इतने अच्छे कपड़े इसी वजह से पहने हैं। कहाँ जा रही हो?”

हम पिकनिक पर जा रहे हैं... चर्च के पिकनिक पर,” उसने कहा और अचानक, बिना किसी स्पष्ट कारण के पहली बार मुस्कराई।

वह भी मुस्कराया और अपनी सिगरेट जला ली। धुआँ उसने सावधानी से उसकी ओर से दूसरी दिशा में उड़ाया। तुम्हें पिकनिक पसंद है?”

कभी-कभी,” उसने कहा। वह अभी भी उसके साथ पूरी तरह सहज नहीं थीफिर भी उसके भीतर यह भावना जन्म लेने लगी थी कि वह पूरे दिन वहीं खड़ी रहकर उससे बातें करना चाहेगी। वह उससे पूछना चाहती थी कि वह क्या पढ़ रहा था। लेकिन उसमें पूछने की हिम्मत नहीं थी। फिर अचानक उसके मुँह से निकला, “तुम्हारा नाम क्या है?”

रिचर्ड,” उसने कहा।

ओह,” उसने सोचते हुए कहा। फिर बोली, “मेरा एलिज़ाबेथ है।”

मुझे पता है,” उसने कहा। “मैंने एक बार उसे तुम्हें बुलाते हुए सुना था।”

काफी देर की चुप्पी के बाद एलिज़ाबेथ ने असहाय-सी आवाज़ में कहा, “अच्छा... गुड बाय।”

“‘गुड बाय?’ तुम जा तो नहीं रही हो?”

ओह, नहीं,” उसने उलझन में कहा।

अच्छा,” उसने मुस्कराते हुए और सिर झुकाते हुए कहा, “गुड डे।”

हाँ,” उसने कहा, “गुड डे।”

वह मुड़ी और सड़क पर निकल गईलेकिन ये वे सड़कें नहीं थीं, जिनसे वह कुछ क्षण पहले वहाँ आई थी। ये सड़कें, ऊपर का आकाश, सूरज, इधर-उधर चलते लोग सब कुछ एक ही क्षण में बदल गया था और अब फिर कभी पहले जैसा नहीं होने वाला था।

बहुत बाद में उसने उससे पूछा, “तुम्हें वह दिन याद है, जब तुम दुकान में आई थीं?”

हाँ?”

अच्छा, उस दिन तुम बहुत सुंदर लग रही थीं।”

मुझे तो लगा था कि तुमने मेरी ओर देखा तक नहीं।”

अच्छा, मुझे भी तो लगा था कि तुमने मेरी ओर देखा तक नहीं।”

तुम एक किताब पढ़ रहे थे।”

हाँ।”

वह कौन-सी किताब थी, रिचर्ड?”

ओह, मुझे याद नहीं। बस एक किताब थी।”

तुम मुस्कराए थे।”

तुम भी मुस्कराई थीं।”

नहीं, मैं नहीं मुस्कराई थी। मुझे याद है।”

हाँ, मुस्कराई थीं।”

नहीं, नहीं मुस्कराई थी। तब तक नहीं, जब तक तुम नहीं मुस्कराए।”

खैर, जो भी हो... तुम उस दिन बहुत सुंदर लग रही थीं।”

अब उसे यह सोचना अच्छा नहीं लगता था कि उसने किस कठोर हृदय, किस सोची-समझी तरह के आँसुओं, किस छल और किस निर्ममता के साथ अपनी स्वतंत्रता के लिए अपनी मौसी से युद्ध किया था। और उसने वह स्वतंत्रता हासिल भी कर ली थी। यद्यपि कुछ ऐसी शर्तों के साथ जिन्हें टाला नहीं जा सकता था। मुख्य शर्त यह थी कि वह अपनी मौसी की एक दूर की, अत्यंत सम्मानित महिला रिश्तेदार के संरक्षण में रहेगी, जो न्यूयॉर्क शहर में रहती थी। क्योंकि गर्मियाँ समाप्त होने पर रिचर्ड ने कहा था कि वह न्यूयॉर्क जा रहा है और चाहता है कि एलिज़ाबेथ भी उसके साथ जाए। वहाँ वे शादी कर लेंगे। रिचर्ड ने कहा था कि उसे दक्षिण से घृणा है। शायद इसी कारण उन दोनों में से किसी के मन में यह विचार ही नहीं आया कि वे अपना वैवाहिक जीवन वहीं से शुरू करें। एलिज़ाबेथ इस भय से भी बँधी हुई थी कि यदि उसकी मौसी को उसके और रिचर्ड के बीच के संबंध का पता चल गया तो वह जैसे, बहुत वर्षों पहले उसके पिता के मामले में कर चुकी थी, किसी न किसी तरह उन दोनों को अलग करने का उपाय खोज लेगी। बाद में एलिज़ाबेथ ने जब इस बात पर विचार किया तो उसे लगा कि यह उन घटिया गलतियों की लंबी श्रृंखला की पहली गलती थी, जिसने अंततः उसे इतनी गहराई तक गिरा दिया।

लेकिन जिस पत्थरीले मैदान से पीछे मुड़कर उस रास्ते को देखना, जो किसी को उस स्थान तक ले गया था, उस रास्ते पर चलने से बिल्कुल अलग बात है। कम-से-कम इतना तो निश्चित है कि रास्ते की वास्तविक दृष्टि केवल यात्रा के साथ बदलती है। जब रास्ता अचानक और विश्वासघाती ढंग से और ऐसी पूर्णता के साथ कि कोई तर्क भी उसका प्रतिवाद न कर सके, मुड़ जाता है, नीचे उतर जाता है या ऊपर उठ जाता है, तभी मनुष्य वह सब देख पाता है, जो किसी दूसरी जगह से कभी नहीं देख सकता था। उन दिनों यदि स्वयं प्रभु स्वर्ग से तुरहियाँ बजाते हुए उतरकर उससे पीछे लौट जाने को कहते तो शायद वह उनकी आवाज़ सुन भी नहीं पाती और निश्चित रूप से उनकी बात नहीं मानती। उन दिनों वह एक प्रचंड अग्निमय तूफ़ान के भीतर जी रही थी, जिसका केंद्र और हृदय रिचर्ड था। वह केवल उसी तक पहुँचने के लिए लड़ रही थी... बस उसी के लिए। उसे केवल इस बात का भय था कि अगर किसी तरह उन्हें एक-दूसरे से दूर कर दिया गया तो क्या होगा। उसके बाद क्या होगा, इसके बारे में सोचने या डरने के लिए उसके पास कोई विचार या भय शेष नहीं था।

न्यूयॉर्क आने का उसका बहाना यह था कि उत्तर में अश्वेत लोगों के लिए उपलब्ध अधिक अवसरों का लाभ उठाया जाएकिसी उत्तरी विद्यालय में पढ़ाई की जाए और दक्षिण में मिलने वाली किसी भी नौकरी से बेहतर नौकरी खोजी जाए। उसकी मौसी ने यह बात अपनी हमेशा की तिरस्कारपूर्ण भावना के साथ सुनी, फिर भी वह इस बात से इनकार नहीं कर सकी कि, जैसा कि उसने अनिच्छा से कहा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिस्थितियाँ बदलना तो निश्चित ही था। वह ऐसा भी नहीं दिखाना चाहती थी कि वह एलिज़ाबेथ के रास्ते में खड़ी हो रही है। 1920 की सर्दियों में, जैसे ही वह वर्ष शुरू हुआ, एलिज़ाबेथ ने स्वयं को हार्लेम के एक बदसूरत पिछवाड़े वाले कमरे में पाया। वह उसकी मौसी की एक रिश्तेदार के घर में रहती थी। एक ऐसी स्त्री, जिसकी अत्यधिक सम्मानित होने की छवि उसके कमरों में जलाए जाने वाले धूप और हर शनिवार रात आयोजित किए जाने वाले आध्यात्मवादी सत्रों से तुरंत स्पष्ट हो जाती थी।

वह घर अभी भी वहाँ था, बहुत दूर नहीं। उसे अक्सर उसके पास से होकर गुजरना पड़ता था। बिना ऊपर देखे भी वह उस मकान की खिड़कियाँ देख सकती थी, जिसमें वह रही थीउस स्त्री का बोर्ड अब भी खिड़की में लगा हुआ था, मैडम विलियम्स, आध्यात्मवादी।”

उसे उसी होटल में कमरे की सफाई करने वाली नौकरानी की नौकरी मिल गई, जिसमें रिचर्ड लिफ्टमैन के रूप में काम करता था। रिचर्ड ने कहा था कि जैसे ही वह कुछ पैसे बचा लेगा, वे शादी कर लेंगे। लेकिन वह रात में स्कूल भी जाता था और बहुत कम कमाता था। इसलिए उनकी शादी, जिसके बारे में एलिज़ाबेथ ने सोचा था कि उसके न्यूयॉर्क पहुँचते ही लगभग तुरंत हो जाएगी, ऐसे भविष्य के लिए टलती चली गई जो हर दिन और अधिक दूर होता जा रहा था। इससे उसके सामने एक ऐसी समस्या आ खड़ी हुई थी, जिसके बारे में उसने मैरीलैंड में रहते हुए सोचने से इनकार कर दिया थालेकिन अब उससे बच नहीं सकती थी। उन दोनों के साथ-साथ जीवन बिताने की समस्या। मानो वास्तविकता पहली बार उसके बड़े स्वप्न के भीतर आकर फट पड़ी थी। और उसे दुख के साथ यह सोचने का अवसर मिला कि आखिर उसने यह कैसे कल्पना कर ली थी कि रिचर्ड के साथ रहने के बाद वह उसका सामना कर पाएगी। जब वह मैरीलैंड में घर पर रिचर्ड के साथ थी, तब उसने बड़ी मुश्किल से वह चीज़ बचाए रखी थी, जिसे उसकी मौसी “अनमोल मोती” कहा करती थी। उसने इसे अपनी स्त्री-सुलभ नैतिक शक्ति का प्रमाण समझा था। लेकिन अब पता चला कि ऐसा केवल उसकी मौसी के भय और उस छोटे-से शहर में अवसरों की कमी के कारण हुआ था। यहाँ, इस विशाल शहर में जहाँ किसी को किसी की परवाह नहीं थी, जहाँ लोग वर्षों तक एक ही इमारत में रह सकते थे और फिर भी एक-दूसरे से बात नहीं करते थे, जब रिचर्ड ने उसे अपनी बाँहों में लिया तो उसने स्वयं को एक खड़ी, गहरी ढलान के किनारे पाया। फिर वह उस ढलान से नीचे भागती चली गई। बिना किसी परवाह के नीचे उतरती हुई और जा गिरी उस भयावह समुद्र में।

तो यह सब शुरू हुआ। क्या यह उसी दिन से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था, जिस दिन उसे उसके पिता की बाँहों से छीन लिया गया था? जिस संसार में अब वह स्वयं को पा रही थी, वह उस संसार से बहुत अलग नहीं था, जहाँ से उसे इतने वर्षों पहले बचाकर निकाला गया था। यहाँ वे औरतें थीं, जिनके कारण उसकी मौसी ने उसके पिता की सबसे तीखी निंदा की थी। बहुत शराब पीने वाली, कठोर भाषा बोलने वाली, जिनकी साँसों से व्हिस्की और सिगरेट की गंध आती थी और जो उन स्त्रियों के रहस्यमय अधिकार-भाव के साथ चलती थीं, जो जानती थीं कि चाँद और तारों के नीचे या शहर की बाघ जैसी चंचल रोशनियों के नीचे, शोरगुल भरे भूसे पर या गाते हुए बिस्तर पर कैसी मधुर हिंसा घटित हो सकती है। क्या अब वह... एलिज़ाबेथ, इतनी सहजता से पतित और इतनी कसकर जकड़ी हुई, इन्हीं स्त्रियों में से एक थी? यहाँ वे पुरुष भी थे, जो दिन-रात उसके पिता के “अस्तबल” में आया करते थे। अपनी मीठी बातों, संगीत, हिंसा और यौन संबंधों के साथ, काले, साँवले और गेहुँए रंग के, जो उसे कामुक, वासनापूर्ण और हँसती हुई आँखों से देखते थे। और यही रिचर्ड के मित्र थे। उनमें से एक भी कभी चर्च नहीं जाता था। शायद ही यह कल्पना की जा सकती थी कि उन्हें यह भी मालूम था कि चर्च नाम की कोई चीज़ होती है। वे सभी हर घंटे, हर दिन, अपनी बातों में, अपने जीवन में और अपने हृदय में परमेश्वर को कोसते थे। वे सब मानो वही कह रहे थे, जो रिचर्ड ने तब कहा था, जब उसने एक बार संकोच से यीशु के प्रेम का उल्लेख किया था, उस उल्टी कराने वाले **मी से कह दो कि वह मेरी काली बड़ी गांड को चूमे।”

यह सुनकर वह भय से रो पड़ी थीफिर भी वह इस बात से इनकार नहीं कर सकती थी कि इतनी प्रचुर कड़वाहट के पीछे दुख का एक अथाह स्रोत था। आखिर उत्तर के संसार और उस दक्षिणी संसार में, जिससे वह भागकर आई थी, बहुत बड़ा अंतर नहीं था। केवल एक अंतर था। उत्तर उससे अधिक वादे करता था और एक समानता थी। वह जो वादा करता था, उसे देता नहीं था और जो कुछ देता था, उसे अंततः बड़ी अनिच्छा से एक हाथ से देता और दूसरे हाथ से वापस ले लेता। अब इस बेचैन, खोखली, गूँजती हुई नगरी में वह रिचर्ड की उस बेचैनी को समझने लगी थी, जिसने उसे पहले इतना आकर्षित किया था। एक ऐसा पूर्ण तनाव, जिसमें न मुक्ति की कोई आशा थी, न संभावना, न समाधान। वह उस तनाव को रिचर्ड की मांसपेशियों में महसूस करती थी और उसकी साँसों में सुनती थी, यहाँ तक कि जब वह उसके सीने पर सिर रखकर सो जाता था।

और शायद यही कारण था कि उसने कभी उसे छोड़ने के बारे में नहीं सोचा, यद्यपि उस पूरे समय वह भयभीत रही थी और ऐसे संसार में जी रही थी जिसमें रिचर्ड के बिना उसके लिए पैर रखने की कोई जगह नहीं थी। उसने उसे इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि उसे डर था कि उसके बिना रिचर्ड का क्या होगा। उसने उसका विरोध नहीं किया क्योंकि उसे उसकी ज़रूरत थी। उसने विवाह के लिए दबाव नहीं डाला क्योंकि वह हर बात को लेकर पहले ही इतना परेशान था कि उसे डर था कहीं उसके कारण भी वह परेशान न हो जाए। वह स्वयं को उसकी शक्ति समझती थीपरछाइयों से भरी दुनिया में वह एक ऐसी निर्विवाद वास्तविकता थी, जिसके पास रिचर्ड हमेशा लौट सकता था। और फिर भी जो कुछ हुआ था, उसके बावजूद वह इसका पछतावा नहीं कर सकती थी। उसने कोशिश की थी। लेकिन वह कभी सचमुच पछताई नहीं थी और आज रात भी उसके भीतर सच्चा पश्चात्ताप नहीं था। फिर उसका पश्चात्ताप कहाँ था? और परमेश्वर उसकी पुकार कैसे सुन सकते थे?

शुरुआत में वे दोनों साथ बहुत खुश थेअंत तक रिचर्ड उसके साथ बहुत अच्छा रहा था। उसने उससे प्रेम करना कभी बंद नहीं किया था और हमेशा यह जताने की कोशिश की थी कि वह उससे प्रेम करता है। जिस तरह वह अपने पिता पर कभी आरोप नहीं लगा सकी थी, उसी तरह वह रिचर्ड पर भी कभी आरोप नहीं लगा सकी। उसकी कमजोरी को वह समझती थी, उसके भय को समझती थी और यहाँ तक कि उसके खूनी अंत को भी समझती थी। उसके प्रेमी, इस जंगली, दुखी लड़के को जीवन ने जो कुछ सहने के लिए मजबूर किया था, उसे शायद उससे अधिक शक्तिशाली और अधिक सदाचारी कितने ही पुरुष भी इतनी अच्छी तरह न सह पाते।

शनिवार उनका सबसे अच्छा दिन होता था क्योंकि उस दिन वे केवल दोपहर एक बजे तक काम करते थे। पूरी दोपहर वे साथ बिता सकते थे और लगभग पूरी रात भी क्योंकि मैडम विलियम्स शनिवार रात को अपने आध्यात्मवादी सत्र आयोजित करती थी और वह पसंद करती थी कि एलिज़ाबेथ घर में न हो क्योंकि उसकी मौन संशयवादी उपस्थिति के सामने मृत आत्माएँ शायद बोलने में संकोच कर सकती थीं। वे होटल के सेवा-द्वार पर मिलते थे। रिचर्ड हमेशा उससे पहले वहाँ पहुँच जाता था। काम के समय पहनने वाली उस भद्दी, शरीर से चिपकी हुई काली वर्दी के बिना वह अजीब तरह से बहुत छोटा और कम अनजान-सा दिखाई देता था। वह दूसरे लड़कों के साथ बातें करता, हँसता या पासा खेलता रहता। और जब वह लंबे पत्थर वाले गलियारे से नीचे आती तो उसके कदमों की आहट सुनकर वह हँसते हुए ऊपर देखता और शरारत से किसी दूसरे लड़के को कुहनी मारकर आधा चिल्लाते, आधा गाते हुए कहता, अरे! देखो तो क्या यह सुंदर नहीं है?”

हर बार और शायद इसी कारण वह ऐसा करना कभी नहीं छोड़ता था, एलिज़ाबेथ शरमाती, आधी मुस्कराती, आधी भौंहें सिकोड़ती और घबराकर अपनी पोशाक का गला छूती।

स्वीट जॉर्जिया ब्राउन!” कोई कह सकता था।

तब रिचर्ड कहता, “तुम्हारे लिए मिस ब्राउन,” और उसका हाथ पकड़ लेता।

हाँ, ठीक है,” कोई दूसरा कहता, “छोटी चमकती आँखों वाली लड़की को सँभालकर रखनानहीं तो कोई उसे तुमसे ज़रूर छीन लेगा।”

हाँ,” दूसरी आवाज़ आती, “और वह मैं भी हो सकता हूँ।”

अरे नहीं,” रिचर्ड उसके साथ सड़क की ओर बढ़ते हुए कहता, “कोई भी मेरी लिटिल-बिट को मुझसे नहीं छीन सकता।”

लिटिल-बिट,” यह उसका रिचर्ड द्वारा रखा गया नाम था। कभी-कभी वह उसे “सैंडविच माउथ”, “फनीफेस” या “फ्रॉग-आइज़” भी कहता था। निश्चित ही, वह ये नाम किसी और से नहीं सहती। यदि वह आनंद, असहायता और भीतर सोए हुए भय के साथ इस जीवन को जीने की स्थिति में न आ गई होती तो वह कभी भी इतनी खुले तौर पर स्वयं को किसी पुरुष की संपत्ति बनने नहीं देती, “रखैल,” उसकी मौसी कहती। रात में, अकेली होने पर, वह उस शब्द को अपनी जीभ पर ऐसे घुमाती रहती जैसे, नींबू के छिलके की खटास हो।

वह रिचर्ड के साथ समुद्र की ओर उतर रही थी। उसे वापस अकेले ऊपर चढ़ना पड़तालेकिन उस समय वह यह नहीं जानती थी। लड़कों को गलियारे में छोड़कर वे दोनों मिडटाउन न्यूयॉर्क की सड़कों पर आ गए।

तो आज हम क्या करने वाले हैं, लिटिल-बिट?” उसकी वही मुस्कान और वे अथाह आँखें थीं। ऊपर सफेद शहर की ऊँची इमारतें थीं और चारों ओर गोरे लोग जल्दी-जल्दी भागते हुए जा रहे थे।

मुझे नहीं पता, हनी। तुम क्या करना चाहते हो?”

अच्छा, हम किसी संग्रहालय में चलें।”

पहली बार जब उसने यह सुझाव दिया तो एलिज़ाबेथ ने घबराकर पूछा कि क्या उन्हें वहाँ अंदर जाने दिया जाएगा।

रिचर्ड ने कहा, “ज़रूर, वे नीग्रो लोगों को अंदर आने देते हैं। क्या हमें भी शिक्षित नहीं होना चाहिए। इन हरामियों के बीच रहने के लिए?”

वह एलिज़ाबेथ के सामने कभी अपनी भाषा पर “नियंत्रण” नहीं रखता था। शुरू में उसने इसे इस बात का प्रमाण समझा कि वह उससे इसलिए तिरस्कार करता है क्योंकि वह इतनी आसानी से उसके सामने समर्पित हो गई थी। बाद में उसने इसी को उसके प्रेम का प्रमाण माना।

जब वह उसे प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय या मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट ले जाता, जहाँ लगभग निश्चित था कि वे वहाँ अकेले अश्वेत लोग होंगे और वह उसे उन विशाल कक्षों में घुमाता, जो उसकी कल्पना में कब्र के पत्थरों की तरह ठंडे बने रहते थे, तब उसे रिचर्ड के भीतर एक दूसरा जीवन दिखाई देता था। वह उस जुनून से भयभीत हुए बिना नहीं रह पाती थी, जो वह ऐसी चीज़ के प्रति दिखाता था जिसे वह समझ नहीं सकती थी।

क्योंकि वह कभी पूरी तरह कम-से-कम अपने विवेक-बुद्धि के स्तर पर यह समझ नहीं पाई कि शनिवार की उन दोपहरों में वह इतनी प्रचंड उत्कटता के साथ उसे क्या बताने की कोशिश करता था। अफ्रीकी मूर्ति या उस टोटम-स्तंभ के बीच, जिसे वह इतनी उदास विस्मय-भरी दृष्टि से देखता था, उसे अपने और उनके बीच कोई संबंध दिखाई नहीं देता था। उसे केवल इस बात की खुशी थी कि वह स्वयं वैसी नहीं दिखती थी। दूसरे संग्रहालय में उसे चित्र देखना अधिक पसंद था। लेकिन वहाँ भी चित्रों के बारे में रिचर्ड जो कुछ कहता, वह उसे समझ नहीं आता था। उसे समझ नहीं आता था कि वह इतनी पुरानी, बहुत पहले मर चुकी चीज़ों से इतना प्रेम क्यों करता थावे उसे क्या सहारा देती थीं और उनसे वह कौन-से रहस्य छीन लेना चाहता था। लेकिन कम-से-कम वह यह समझती थी कि वे उसे एक तरह का कड़वा पोषण अवश्य देती थीं और उनके भीतर छिपे रहस्य उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न थे। यह बात उसे डराती थी क्योंकि उसे लगता था कि रिचर्ड चाँद तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है और इसलिए अंततः चट्टानों पर आ गिरने वाला है। लेकिन उसने इनमें से कुछ भी उससे नहीं कहा। वह केवल सुनती रही और मन-ही-मन उसके लिए प्रार्थना करती रही।

लेकिन कुछ दूसरे शनिवारों को वे फिल्म देखने जातेकोई नाटक देखते। उसके मित्रों से मिलने जाते या सेंट्रल पार्क में घूमते। उसे पार्क पसंद था क्योंकि चाहे वह कितनी भी बनावटी समानता क्यों न हो, वह उस भू-दृश्य की कुछ झलक फिर से पैदा करता था, जिसे वह पहले से जानती थी। वे वहाँ कितनी ही दोपहरें घूमते रहे थे! बाद में उसने हमेशा उससे बचने की कोशिश की। वे मूँगफली खरीदते और घंटों चिड़ियाघर में जानवरों को खिलातेसोडा खरीदकर घास पर बैठकर पीतेजलाशय के किनारे चलते और रिचर्ड उसे समझाता कि न्यूयॉर्क जैसे शहर को पीने के लिए पानी कहाँ से मिलता है। रिचर्ड को लेकर उसके भय के साथ-साथ उसके भीतर उसके प्रति गहरी प्रशंसा भी थी। इतनी कम उम्र में उसने इतना कुछ सीख लिया था। लोग उन्हें घूरते थे। लेकिन उसे इसकी परवाह नहीं थी। रिचर्ड ध्यान देता थालेकिन ऐसा लगता था जैसे वह ध्यान नहीं दे रहा हो। लेकिन कभी-कभी, किसी वाक्य के बीच में ही, जब वह प्राचीन रोम के बारे में बात कर रहा होता वह पूछ बैठता, लिटिल-बिट—क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?”

और वह सोचती कि वह इस बात पर संदेह कैसे कर सकता है। उसे लगता कि उसमें कितनी कमी होगी कि वह उसे यह विश्वास नहीं दिला पाई कि वह उससे प्रेम करती है। वह अपनी आँखें उठाकर उसकी आँखों में देखती और केवल वही कह पाती जो कह सकती थी, अगर मैं तुमसे प्यार नहीं करती तो भगवान करे मैं मर जाऊँ। अगर मैं तुमसे प्यार नहीं करती तो हमारे ऊपर आसमान भी न रहे।”

तब वह व्यंग्य से आकाश की ओर देखता, उसका हाथ कुछ अधिक दृढ़ता से पकड़ता और दोनों आगे चलते रहते। एक बार उसने उससे पूछा, रिचर्ड, जब तुम छोटे थे, तब तुमने बहुत स्कूल जाना किया था?” उसने काफी देर तक उसकी ओर देखा। फिर बोला, बेबी, मैंने तुम्हें बताया तो था, मेरी माँ मेरे पैदा होते ही मर गई थी। और मेरे पिता का कहीं पता नहीं था। मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। मैं एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहा। जब एक परिवार मुझसे ऊब जाता तो वे मुझे किसी दूसरे के पास भेज देते। मैं लगभग स्कूल गया ही नहीं।”

तो फिर तुम इतने बुद्धिमान कैसे हो गए? तुम्हें इतना सब कैसे मालूम है?”

वह प्रसन्न होकर मुस्कराया, लेकिन बोला, लिटिल-बिट, मुझे इतना सब नहीं मालूम।” फिर उसके चेहरे और आवाज़ में वह बदलाव आया, जिसे वह अब पहचानने लगी थी, एक दिन मैंने बस यह तय कर लिया कि जो कुछ उन गोरे कमीने लोगों को मालूम है, वह सब मैं सीखूँगा और उनसे भी बेहतर सीखूँगा ताकि दुनिया में कोई गोरा हरामी मुझे नीचा न दिखा सके और न मुझे कभी यह महसूस करा सके कि मैं गंदगी हूँ जबकि मैं उसे वर्णमाला आगे से, पीछे से और हर तरफ से पढ़कर सुना सकता हूँ। धत्, तब वह मेरी ऐसी-तैसी नहीं कर सकता था। और अगर उसने मुझे मारने की कोशिश की तो मैं उसे भी अपने साथ ले जाता, अपनी माँ की कसम, ले जाता।” फिर उसने उसकी ओर देखा, मुस्कराया और उसे चूमा। उसने कहा, बस इसी तरह, बेबी, मुझे इतना सब जानना आया।”

उसने पूछा, और तुम क्या करने वाले हो, रिचर्ड? तुम क्या बनना चाहते हो?”

उसका चेहरा उदास हो गया। मुझे नहीं पता। मुझे पता लगाना होगा। लगता है कि मैं किसी भी तरह अपने दिमाग को सीधा नहीं कर पाता।”

वह नहीं जानती थी कि वह ऐसा क्यों नहीं कर पाता था या शायद वह इसका सामना केवल धुँधले ढंग से ही कर पाती थी। लेकिन वह जानती थी कि रिचर्ड सच कह रहा था।

रिचर्ड के मामले में उसकी सबसे बड़ी गलती यह थी कि उसने उसे यह नहीं बताया कि वह एक बच्चे को जन्म देने वाली है। अब वह सोचती थी कि शायद अगर उसने उसे सब कुछ बता दिया होता तो सब कुछ बहुत अलग होता और वह आज भी जीवित होता। लेकिन जिन परिस्थितियों में उसे अपने गर्भवती होने का पता चला था, वे ऐसी थीं कि उसने रिचर्ड की खातिर कुछ समय तक चुप रहने का निर्णय लिया। वह स्वयं जितनी डरी हुई थी, उसके जीवन की उस आखिरी गर्मी में रिचर्ड पर छा जाने वाली घबराहट को और बढ़ाने का साहस उसमें नहीं था।

फिर भी शायद अंततः, यही उसकी गलती थी। उसकी शक्ति से वह माँग न करना, जिसे उस समय शायद चमत्कारिक रूप से, वह सहन करने में सक्षम हो सकता थाकौन जानता है, शायद उसी से उसकी शक्ति और बढ़ जाती। आज रात वह इसी बात के लिए क्षमा की प्रार्थना कर रही थी। शायद उसने अपने प्रेम को इसलिए खो दिया क्योंकि अंत में उसे अपने प्रेम पर पर्याप्त विश्वास ही नहीं रहा था।

वह रिचर्ड से काफी दूर रहती थी। चार सबवे स्टेशन दूर। जब उसके घर लौटने का समय होता तो रिचर्ड हमेशा उसके साथ सबवे में ऊपर की दिशा में जाता और उसे उसके दरवाज़े तक छोड़कर आता। एक शनिवार को वे समय का ध्यान ही नहीं रख पाए और सामान्य से देर तक साथ रहे। रात के दो बजे उसने उसे उसके दरवाज़े पर छोड़ा। उन्होंने जल्दी-जल्दी शुभरात्रि कहा क्योंकि उसे डर था कि ऊपर जाने पर कोई परेशानी होगी। हालाँकि वास्तव में मैडम विलियम्स एलिज़ाबेथ के घर लौटने के समय को लेकर आश्चर्यजनक रूप से उदासीन लगती थी। रिचर्ड भी जल्दी-जल्दी अपने घर लौटकर सो जाना चाहता था। फिर भी, जब वह अँधेरी, धीमे स्वर में गूँजती सड़क पर तेजी से दूर जाने लगा तो एलिज़ाबेथ के भीतर अचानक उसे वापस बुलाने की तीव्र इच्छा उठी। उससे कहे कि वह उसे अपने साथ ले जाए और फिर कभी उसे अपने से दूर न जाने दे। वह सीढ़ियाँ जल्दी-जल्दी चढ़ी और इस कल्पना पर हल्का-सा मुस्कराई। ऐसा इसलिए था क्योंकि दूर जाते हुए वह इतना युवा और असहाय-सा दिखाई दे रहा था और फिर भी इतना बेफिक्र और मजबूत।

अगली शाम खाने के समय उसे आना था ताकि अंततः एलिज़ाबेथ के आग्रह पर वह मैडम विलियम्स से परिचित हो सके। लेकिन वह नहीं आया। सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आहट सुनते ही एलिज़ाबेथ की अचानक बढ़ी संवेदनशीलता ने मैडम विलियम्स को परेशान कर दिया। एलिज़ाबेथ ने मैडम विलियम्स को बता दिया था कि एक सज्जन उससे मिलने आने वाले हैं। इसलिए स्वाभाविक ही वह घर से निकलकर उसे खोजने बाहर जाने का साहस नहीं कर सकती थी। ऐसा करने पर मैडम विलियम्स को यह आभास हो जाता कि वह सड़क से पुरुषों को घर में खींच लाती है। रात दस बजे तक उसने रात का खाना भी नहीं खाया था। इस बात पर उसकी मेज़बान ने ध्यान तक नहीं दिया। फिर वह बिस्तर पर चली गई। उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था और उसका हृदय भय से व्याकुल था। उस बात को लेकर जो रिचर्ड के साथ घट गई थी क्योंकि उसने उसे पहले कभी इस तरह इंतज़ार नहीं कराया था और उस भय को लेकर भी, जो उसके शरीर में घट रही उन सारी नई घटनाओं से जुड़ा था, जो अब धीरे-धीरे सामने आने लगी थीं।

सोमवार की सुबह वह काम पर नहीं आया। दोपहर के भोजन के समय वह उसका हालचाल लेने उसके कमरे पर गई। वह वहाँ नहीं था। उसकी मकान-मालकिन ने बताया कि वह पूरे सप्ताहांत वहाँ आया ही नहीं था। एलिज़ाबेथ उस गलियारे में काँपती हुई और असमंजस में खड़ी ही थी कि दो गोरे पुलिसवाले भीतर आए।

उन्हें देखते ही और उनके रिचर्ड का नाम लेने से पहले ही, वह समझ गई कि रिचर्ड के साथ कुछ भयानक घटा है। उसका हृदय उसी तरह बुरी तरह उछला जैसे, उस उजली गर्मी की दोपहर में, जब रिचर्ड ने पहली बार उससे बात की थीफिर वह भयानक, घायल-सी निस्तब्धता के साथ थम गया। उसने खड़े रहने के लिए एक हाथ दीवार पर टिका दिया।

यह लड़की अभी-अभी उसे ढूँढ़ रही थी,” उसने मकान-मालकिन को कहते सुना।

सबकी निगाहें उसकी ओर उठ गईं।

एक पुलिसवाले ने पूछा, “तुम रिचर्ड की दोस्त (लड़की) हो?”

उसने उसके पसीने से चमकते चेहरे की ओर देखा, जिस पर तुरंत एक कामुक मुस्कान फैल गई थी। उसने अपने काँपने पर काबू पाने की कोशिश करते हुए स्वयं को सीधा किया।

हाँ,” उसने कहा। “वह कहाँ है?”

वह जेल में है, हनी,” दूसरे पुलिसवाले ने कहा।

किसलिए?”

एक गोरे आदमी की दुकान लूटने के लिए, काली लड़की। इसी लिए।”

उसने जाना और इसके लिए उसने परमेश्वर को धन्यवाद दिया कि उसके भीतर ठंडे पत्थर जैसी क्रोध की एक कठोर लहर भर गई है। वरना वह निश्चित ही गिर पड़ती या रोने लगती। उसने मुस्कराते पुलिसवाले की ओर देखा।

रिचर्ड ने कोई दुकान नहीं लूटी,” उसने कहा। “मुझे बताओ, वह कहाँ है।”

और मैं तुम्हें बता रहा हूँ,” उसने मुस्कराना बंद करके कहा, “कि तुम्हारे प्रेमी ने एक दुकान लूटी है और इसी वजह से वह जेल में है और वहीं रहेगा भी अब बताओ, तुम्हें इस बारे में क्या कहना है?”

दूसरे पुलिसवाले ने कहा, “और शायद उसने यह तुम्हारे लिए ही किया हो। तुम ऐसी लड़की लगती हो, जिसके लिए कोई आदमी दुकान लूट सकता है।”

उसने कुछ नहीं कहा। वह सोच रही थी कि उससे कैसे मिले, उसे वहाँ से कैसे बाहर निकाले।

मुस्कराने वाला पुलिसवाला अब मकान-मालकिन की ओर मुड़ा और बोला, “चलो, उसके कमरे की चाबी दो। कितने समय से यहाँ रह रहा है?”

लगभग एक साल से,” मकान-मालकिन ने कहा। उसने दुखी होकर एलिज़ाबेथ की ओर देखा। “वह तो बड़ा अच्छा लड़का लगता था।”

अच्छा, हाँ,” वह सीढ़ियाँ चढ़ते हुए बोला, “जब तक वे किराया देते हैं, तब तक सब अच्छे लड़के ही लगते हैं।”

क्या आप मुझे उससे मिलाने ले जाएँगे?” उसने दूसरे पुलिसवाले से पूछा। उसकी निगाह उसके होल्स्टर में रखी पिस्तौल और बगल में लटकी लाठी पर टिक गई। उसके भीतर इच्छा हुई कि वह उस पिस्तौल को छीनकर उसके गोल, लाल चेहरे में सारी गोलियाँ उतार देउस लाठी को छीनकर अपनी पूरी ताकत से उसकी खोपड़ी के उस हिस्से पर दे मारे जहाँ उसकी टोपी खत्म होती थी, जब तक कि उसके बदसूरत, रेशमी, गोरे बाल खून और दिमाग से न सन जाएँ।

ज़रूर, लड़की,” उसने कहा, “तुम हमारे साथ ही चल रही हो। थाने में वह आदमी तुमसे कुछ सवाल करना चाहता है।”

मुस्कराता हुआ पुलिसवाला फिर नीचे आया। ऊपर कुछ नहीं है,” उसने कहा। “चलो।”

वह दोनों के बीच से निकलकर धूप में आ गई। वह जानती थी कि अब उनसे और बात करने का कोई लाभ नहीं था। वह पूरी तरह उनके अधिकार में थी। उसे उनसे भी तेज़ सोचना होगाउसे अपने भय और घृणा को अपने भीतर रोककर रखना होगा और पता लगाना होगा कि क्या किया जा सकता है। रिचर्ड की जान बचाने से कम किसी भी चीज़ के लिए और शायद उसकी जान बचाने के लिए भी नहीं वह उनके सामने रोती या उनसे किसी दया की भीख माँगती।

बच्चों और उत्सुक राहगीरों की एक छोटी भीड़ उनके पीछे चलने लगी। वे लंबी, धूल भरी, धूप से चमकती सड़क पर आगे बढ़ रहे थे। एलिज़ाबेथ केवल यही चाहती थी कि रास्ते में कोई परिचित व्यक्ति न मिल जाए। वह सिर ऊँचा किए सीधे सामने देखती रही और उसे लगा कि उसकी त्वचा उसकी हड्डियों पर इस तरह जम गई है, मानो उसने कोई मुखौटा पहन रखा हो।

थाने में भी वह किसी तरह उनके क्रूर ठहाकों को सह गई। (रात के दो बजे तक तुम उसके साथ क्या कर रही थी, लड़की?” अगली बार जब तुम्हारा मन ऐसा करे तो यहाँ मेरे पास आकर बात करना, लड़की।”) उसे लगा कि वह फट पड़ेगी, उल्टी कर देगी या मर जाएगी। उसके माथे पर पसीना निर्दयता से सुइयों की तरह उभर आया था और उसे लगा कि चारों ओर से उसे दुर्गंध और गंदगी से ढका जा रहा है। फिर भी, जब उन लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार पूछताछ पूरी की तो उसे वह पता चल गया जो वह जानना चाहती थी। रिचर्ड को शहर के बीचोंबीच स्थित एक जेल में रखा गया था, जिसे “द टॉम्ब्स” कहा जाता था। (यह नाम सुनकर उसका दिल उलट-सा गया।) वह अगले दिन उससे मिल सकती थी। राज्य, जेल या किसी अन्य संस्था ने उसके लिए पहले ही एक वकील नियुक्त कर दिया था। अगले सप्ताह उसका मुकदमा होने वाला था।

लेकिन अगले दिन जब उसने उसे देखा तो वह रो पड़ी। उसने धीमे स्वर में बताया कि उसे पीटा गया था और वह मुश्किल से चल पा रहा था। बाद में एलिज़ाबेथ को पता चला कि उसके शरीर पर लगभग कोई चोट के निशान नहीं थे,लेकिन उसके शरीर के भीतर जगह-जगह अजीब और पीड़ादायक सूजन थी और एक आँख के ऊपर चोट का गहरा निशान था।

उसने स्वाभाविक ही दुकान नहीं लूटी थी। बल्कि उस शनिवार की रात एलिज़ाबेथ को छोड़ने के बाद वह सबवे स्टेशन में अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा करने गया था। रात काफी हो चुकी थी और ट्रेनें धीरे चल रही थीं। वह प्लेटफ़ॉर्म पर बिल्कुल अकेला था, आधा जागा हुआ और जैसा उसने बताया, एलिज़ाबेथ के बारे में सोच रहा था।

तभी प्लेटफ़ॉर्म के दूर वाले छोर से उसे किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनाई दी। उसने ऊपर देखा तो दो अश्वेत लड़के सीढ़ियों से दौड़ते हुए नीचे आ रहे थे। उनके कपड़े फटे हुए थे और वे डरे हुए थे। वे प्लेटफ़ॉर्म पर आए और उसके पास खड़े होकर तेज़-तेज़ साँस लेने लगे। वह उनसे पूछने ही वाला था कि बात क्या है कि उसने देखा। एक और अश्वेत लड़का पटरियों को पार करते हुए उनकी ओर दौड़ रहा था और उसके पीछे एक गोरा आदमी था। उसी क्षण एक और गोरा आदमी सबवे की सीढ़ियों से नीचे दौड़ता हुआ आया।

अब वह पूरी तरह घबरा कर होश में आ गया। उसे समझ में आ गया कि मामला चाहे जो भी हो, अब वह भी उसका हिस्सा बन चुका था। क्योंकि इन गोरे लोगों के लिए उसके और उन तीन लड़कों के बीच कोई अंतर नहीं था, जिनका वे पीछा कर रहे थे। वे सभी अश्वेत थे, लगभग एक ही उम्र के थे और इस समय सबवे के प्लेटफ़ॉर्म पर एक साथ खड़े थे। बिना कोई सवाल पूछे, उन सभी को हाँककर ऊपर ले जाया गया, गाड़ी में डाला गया और थाने पहुँचा दिया गया।

थाने में रिचर्ड ने अपना नाम, पता, उम्र और पेशा बताया। फिर पहली बार उसने स्पष्ट कहा कि उसका इस घटना से कोई संबंध नहीं है और दूसरे लड़कों में से किसी एक से अपने बयान की पुष्टि करने को कहा। उन लड़कों ने कुछ निराशा के साथ उसकी बात की पुष्टि कर दी। एलिज़ाबेथ को लगा कि शायद उन्हें यह बात पहले ही कह देनी चाहिए थीलेकिन संभवतः उन्हें भी लगा होगा कि बोलना बेकार होगा। उनकी बात पर विश्वास नहीं किया गया। दुकान के मालिक को पहचान के लिए वहाँ लाया जा रहा था। रिचर्ड ने स्वयं को शांत करने की कोशिश की। वह सोच रहा था कि वह आदमी यह कैसे कह सकता है कि वह वहाँ था जबकि उसने उसे पहले कभी देखा ही नहीं था।

लेकिन जब दुकान का मालिक आया, एक नाटा आदमी, जिसकी कमीज खून से सनी हुई थी क्योंकि हमलावरों ने उसे चाकू मारा था और उसके साथ एक और पुलिसवाला था, तब उसने सामने खड़े चारों लड़कों को देखा और कहा, हाँ, यही हैं।”

तब रिचर्ड चिल्लाया, लेकिन मैं वहाँ था ही नहीं! मुझे देखो, भगवान तुम्हें श्राप देंमैं वहाँ नहीं था!”

गोरे आदमी ने उसकी ओर देखते हुए कहा, तुम काले कमीने लोग, तुम सब एक जैसे हो।”

थाने में सन्नाटा छा गया। सारे गोरे लोगों की आँखें उन पर टिकी थीं। तब रिचर्ड ने धीमे स्वर में कहा क्योंकि वह जान चुका था कि वह फँस चुका है, लेकिन फिर भी, साहब, मैं वहाँ नहीं था।” उसने उस गोरे आदमी की खून से सनी कमीज़ की ओर देखा और (जैसा उसने एलिज़ाबेथ को बताया) अपने मन की गहराई में सोचा, भगवान करे उन्होंने तुम्हें मार ही डाला होता।”

फिर पूछताछ शुरू हुई। तीनों लड़कों ने तुरंत एक स्वीकारोक्ति पर हस्ताक्षर कर दिए। लेकिन रिचर्ड ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। अंततः उसने कहा कि वह मर जाएगा लेकिन ऐसी घटना की स्वीकारोक्ति पर हस्ताक्षर नहीं करेगा जो उसने की ही नहीं। अच्छा, तो शायद तुम मरोगे ही, काले हरामी,” उनमें से एक ने कहा और अचानक उसके सिर पर वार कर दिया। और फिर पिटाई शुरू हो गई। इसके बाद वह एलिज़ाबेथ से इस बारे में बात नहीं करना चाहता था। उसके मन में उमड़ते भय और घृणा के सामने उसकी कल्पना भी लड़खड़ा गई और उसने चुप्पी साध ली।

अब हम क्या करेंगे?” उसने आखिर पूछा।

वह एक विकृत, क्रूर मुस्कान मुस्कराया। एलिज़ाबेथ ने उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान पहले कभी नहीं देखी थी। शायद तुम्हें अपने उस यीशु से प्रार्थना करनी चाहिए और उसे नीचे भेजना चाहिए ताकि वह इन गोरे आदमियों को कुछ समझा सके।” उसने लंबे समय तक उसकी ओर देखा जैसे, उसकी आँखों में मृत्यु उतर आई हो। क्योंकि मुझे और कुछ करना नहीं आता,” उसने कहा।

उसने सुझाव दिया, रिचर्ड, किसी दूसरे वकील का क्या?”

वह फिर मुस्कराया। मैं कहता हूँ,” उसने कहा, “लिटिल-बिट मुझसे कुछ छिपाती रही है। उसके पास मोज़े में बँधा पूरा खज़ाना है और उसने मुझे कभी बताया ही नहीं।”

वह पूरे एक साल से पैसे बचाने की कोशिश कर रही थीलेकिन उसके पास केवल तीस डॉलर थे। वह उसके सामने बैठी मन-ही-मन उन सभी तरीकों के बारे में सोचती रही, जिनसे वह पैसे जुटा सकती थी। यहाँ तक कि सड़क पर जाकर अपना शरीर बेचने तक के बारे में। फिर अपनी पूर्ण असहायता के कारण वह सिसकते हुए काँपने लगी। उसे रोता देखकर उसका चेहरा फिर रिचर्ड का चेहरा बन गया। उसने काँपती आवाज़ में कहा, अब देखो, लिटिल-बिट, ऐसी मत हो। हम सब ठीक कर लेंगे।” लेकिन वह रोना बंद नहीं कर सकी। एलिज़ाबेथ,” उसने फुसफुसाकर कहा, “एलिज़ाबेथ, एलिज़ाबेथ।” तभी एक आदमी आया और उसने कहा कि अब उसके जाने का समय हो गया है। वह उठ खड़ी हुई। वह उसके लिए सिगरेट के दो पैकेट लाई थी, जो अभी भी उसके बैग में पड़े थे। जेल के नियमों की उसे बिल्कुल जानकारी नहीं थी इसलिए उस आदमी की निगाहों के सामने वह उन्हें रिचर्ड को देने का साहस नहीं कर सकी। यह बात कि वह सिगरेट देना भूल गई थी जबकि वह जानती थी कि रिचर्ड कितना धूम्रपान करता था, उसे और भी अधिक रुलाने लगी। उसने मुस्कराने की कोशिश की लेकिन असफल रहीउसे धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर ले जाया गया। बाहर की धूप ने उसकी आँखें लगभग चौंधिया दीं। उसने अपने पीछे रिचर्ड की फुसफुसाहट सुनी, फिर मिलेंगे, बेबी। अपना खयाल रखना।”

सड़कों पर आकर उसे समझ नहीं आया कि अब क्या करे। वह कुछ देर उन भयानक फाटकों के सामने खड़ी रही। फिर चलती रही, चलती रही, जब तक कि वह एक कॉफी की दुकान तक नहीं पहुँच गई, जहाँ टैक्सी चालक और पास के दफ्तरों में काम करने वाले लोग पूरे दिन जल्दी-जल्दी आते-जाते रहते थे। आमतौर पर वह शहर के उस हिस्से की उन जगहों में जाने से डरती थी, जहाँ केवल गोरे लोग होते थेलेकिन आज उसे कोई परवाह नहीं थी। उसे लग रहा था कि अगर किसी ने उससे कुछ कहा तो वह पलटकर उसे सड़क की सबसे नीच औरत की तरह गालियाँ देगी। और अगर किसी ने उसे छुआ तो वह अपनी पूरी कोशिश करेगी कि उसकी आत्मा को नरक पहुँचा दे। लेकिन किसी ने उसे छुआ नहींकिसी ने उससे कुछ नहीं कहा। वह खिड़की से भीतर आ रही तेज़ धूप में बैठी कॉफी पीती रही। अब उसे अचानक एहसास हुआ कि वह कितनी अकेली और कितनी डरी हुई हैवह अपने जीवन में इससे पहले कभी इतनी भयभीत नहीं हुई थी। वह जानती थी कि वह गर्भवती है, जानती थी जैसा कि बूढ़े लोग कहते हैं, अपनी हड्डियों तक में। और अगर रिचर्ड को जेल भेज दिया गया तो भगवान के नाम पर, वह क्या करेगी? दो साल, तीन साल... उसे कुछ पता नहीं था कि उसे कितने समय के लिए भेजा जा सकता है। वह क्या करेगी? वह अपनी मौसी को यह बात जानने से कैसे रोक पाएगी? और अगर उसकी मौसी को पता चल गया तो उसके पिता को भी पता चल जाएगा। उसकी आँखों में आँसू उमड़ आए और वह अपनी ठंडी, बेस्वाद कॉफी पीती रही। वे रिचर्ड के साथ क्या करेंगे? और अगर उसे जेल भेज दिया गया तो लौटकर आने पर वह कैसा होगा? उसने शांत, धूप से नहाई सड़कों की ओर देखा और अपने जीवन में पहली बार उसे यह सब घृणित लगा। यह गोरा शहर, यह गोरी दुनिया। उस दिन वह पूरी दुनिया में एक भी ऐसा भला गोरा व्यक्ति नहीं सोच सकी। वह वहीं बैठी रही और उसने मन-ही-मन कामना की कि एक दिन परमेश्वर, अकल्पनीय यातनाओं के द्वारा, उन सबको पूरी तरह विनम्रता में पीस डालें और उन्हें यह समझा दें कि जिन अश्वेत लड़कों और लड़कियों के साथ वे इतना उपेक्षापूर्ण, इतना तिरस्कारपूर्ण और फिर भी इतने सहज हँसमुख ढंग से व्यवहार करते हैं, उनके भीतर भी मनुष्यों जैसे हृदय हैं। बल्कि उनसे भी अधिक मानवीय हृदय हैं।

लेकिन रिचर्ड को जेल नहीं भेजा गया। तीनों लुटेरों के बयान, एलिज़ाबेथ की अपनी गवाही और शपथ लेकर दिए गए दुकानदार के अनिश्चित बयान के बावजूद, रिचर्ड को दोषी ठहराने के लिए कोई प्रमाण नहीं था। अदालत-कक्ष में ऐसा लग रहा था कि लोग कुछ आत्मसंतोष और कुछ निराशा के साथ यह महसूस कर रहे थे कि इतनी आसानी से छूट जाना रिचर्ड का बहुत बड़ा सौभाग्य था। वे तुरंत उसके कमरे में चले गए। वहाँ, जिस घटना को वह जीवन भर कभी नहीं भूल सकी, रिचर्ड ने मुँह के बल अपने बिस्तर पर गिरकर रोना शुरू कर दिया।

उसने अपने जीवन में इससे पहले केवल एक दूसरे पुरुष को रोते देखा था। अपने पिता को, लेकिन यह रोना वैसा नहीं था। उसने उसे छुआ लेकिन वह रोना बंद नहीं कर सका। उसके अपने आँसू उसके गंदे, अस्त-व्यस्त बालों पर गिरने लगे। उसने उसे बाँहों में भरने की कोशिश की लेकिन बहुत देर तक वह स्वयं को उसकी बाँहों में आने नहीं देता रहा। उसका शरीर लोहे जैसा कठोर था। उसमें उसे कहीं कोई कोमलता नहीं मिली। वह डरी हुई बच्ची की तरह बिस्तर के किनारे सिकुड़कर बैठी रही, उसका हाथ रिचर्ड की पीठ पर था और वह आँधी के गुजर जाने की प्रतीक्षा करती रही। उसी समय उसने निर्णय लिया कि वह अभी उसे बच्चे के बारे में नहीं बताएगी।

कुछ देर बाद उसने उसका नाम पुकारा। फिर वह पलटा और उसने उसे अपने सीने से लगा लिया जबकि वह आहें भरता और काँपता रहा। अंततः वह उससे इस तरह चिपककर सो गया जैसे, आखिरी बार पानी में डूबने जा रहा हो।

और सचमुच वह आखिरी बार था। उस रात उसने उस्तरे से अपनी कलाइयाँ काट लीं और सुबह उसकी मकान-मालकिन ने उसे पाया। उसकी आँखें ऊपर की ओर खुली थीं, उनमें कोई रोशनी नहीं थीलाल चादरों के बीच वह मृत पड़ा था।

और अब वे गा रहे थे:, हे प्रभु, किसी को तुम्हारी ज़रूरत है, यहाँ आ जाओ।”

उसके पीछे, ऊपर की ओर, उसने गैब्रियल की आवाज़ सुनी। वह उठ खड़ा हुआ था और दूसरों को प्रार्थना में आगे बढ़ने में सहायता कर रहा था। वह सोचने लगी कि क्या जॉन अभी भी घुटनों के बल है या वह भी किसी बच्चे की अधीरता के साथ उठ खड़ा हुआ है और चर्च के चारों ओर देख रहा है। उसके भीतर एक ऐसी कठोरता थी जिसे तोड़ना कठिन था लेकिन फिर भी एक दिन वह निश्चित रूप से टूटने वाली थी। ठीक वैसे ही जैसे उसकी अपनी कठोरता टूटी थी और रिचर्ड की भी। किसी के लिए कोई बच निकलने का रास्ता नहीं था। परमेश्वर हर जगह थे। भयावह, जीवित परमेश्वर। गीत कहता था कि वे इतने ऊँचे हैं कि तुम उनके ऊपर से निकल नहीं सकतेइतने नीचे हैं कि उनके नीचे से नहीं निकल सकतेइतने विस्तृत हैं कि उनके चारों ओर से नहीं निकल सकतेतुम्हें द्वार से होकर ही भीतर जाना होगा।

वह एलिज़ाबेथ, आज उस द्वार को जानती थी। एक जीवित, क्रोध से भरा द्वार। वह जानती थी कि आत्मा को किन अग्नियों के बीच से रेंगकर गुजरना पड़ता है और किस प्रकार रोते हुए उस पार जाना पड़ता है। लोग कहते थे कि हृदय टूट जाता है लेकिन कोई यह नहीं कहता था कि जीवित और मृत के बीच के उस विराम, उस शून्य और उस आतंक में आत्मा किस तरह निःशब्द लटकी रहती हैकिस तरह सारे वस्त्र फाड़कर उतार फेंकने के बाद, नग्न आत्मा स्वयं नरक के मुँह के ठीक ऊपर से गुजरती है। एक बार वहाँ पहुँच जाने के बाद लौटने का कोई रास्ता नहीं था। एक बार वहाँ पहुँचकर आत्मा सब कुछ याद रखती थी, भले ही हृदय कभी-कभी भूल जाता हो। क्योंकि संसार हृदय को पुकारता था और हकलाता हुआ हृदय उसका उत्तर देने की कोशिश करता था। जीवन, प्रेम और उल्लास, और सबसे बढ़कर झूठी आशा, उस भूलने वाले मानवीय हृदय को पुकारते थे। केवल आत्मा, उस यात्रा से ग्रस्त जिसे वह तय कर चुकी थी और जिसे अभी भी तय करना था, अपने उस रहस्यमय और भयावह अंत की ओर बढ़ती रहती थीरोने तथा कड़वाहट से भारी उस हृदय को भी अपने साथ ढोती रहती थी।

इसलिए स्वर्ग में युद्ध था और सिंहासन के सामने रोना था। आत्मा से जकड़ा हुआ हृदय और शरीर के भीतर कैद आत्मा। सारी पृथ्वी पर ऐसा रोना, ऐसा भ्रम और ऐसा असहनीय बोझ भर गया था। केवल परमेश्वर का प्रेम ही इस अराजकता में व्यवस्था स्थापित कर सकता थामुक्ति पाने के लिए आत्मा को उसी की ओर मुड़ना था।

लेकिन कैसी वापसी थी यह! वह कैसे प्रार्थना न करती कि परमेश्वर उसके पुत्र पर दया करें और उसे उसके पिता और उसकी माँ के पाप से जन्मी पीड़ा से बचा लें। और यह भी कि लंबी कड़वाहट उतर आने से पहले उसके हृदय को थोड़ी-सी खुशी मिल सके।

फिर भी वह जानती थी कि उसका रोना और उसकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ थीं। जो आने वाला था, वह निश्चित रूप से आएगाउसे कोई नहीं रोक सकता था। एक बार उसने किसी की रक्षा करने की कोशिश की थी और परिणाम केवल इतना हुआ था कि वह व्यक्ति जेल में जा पहुँचा। आज रात उसने सोचा, जैसा कि वह बहुत बार सोच चुकी थी कि शायद आखिरकार वही करना बेहतर होता जो उसने शुरू में अपने मन में ठाना था। अपने बेटे को किसी अनजान परिवार को दे देना, जो उससे उतना प्रेम कर सकता जितना गैब्रियल ने कभी नहीं किया। जब गैब्रियल ने कहा था कि परमेश्वर ने उसे उसके पास एक संकेत के रूप में भेजा है, तब उसने उस पर विश्वास किया था। उसने कहा था कि वह कब्र तक उसे सँभालकर रखेगा और उसके अनाम बेटे से ऐसा प्रेम करेगा जैसे वह उसका अपना रक्त-मांस हो। उसने अपने वचन की ऊपरी मर्यादा निभाई थी। उसने जॉन को भोजन दिया, कपड़े पहनाए और बाइबल सिखाई। लेकिन वचन की आत्मा वहाँ नहीं थी। यदि वह उससे प्रेम करता भी था तो केवल इसलिए कि वह उसके बेटे रॉय की माँ थी। इन सभी बातों को उसने वर्षों की पीड़ा के दौरान धीरे-धीरे समझ लिया था। गैब्रियल को निश्चित रूप से यह पता नहीं था कि वह इन बातों को जानती है और वह सोचती थी कि क्या उसे स्वयं भी इनका एहसास था।

फ्लोरेंस के माध्यम से उसकी मुलाकात गैब्रियल से हुई थी। फ्लोरेंस और उसकी मुलाकात काम की जगह पर हुई थी, रिचर्ड की मृत्यु के एक वर्ष बाद, गर्मियों के मध्य में। उस समय जॉन छह महीने से कुछ अधिक उम्र का था।

उस गर्मी में वह बहुत अकेली और पूरी तरह टूट चुकी थी। वह जॉन के साथ अकेली एक सजे-सजाए कमरे में रहती थी, जो मैडम विलियम्स के अपार्टमेंट वाले कमरे से भी अधिक उदास और कठोर था। रिचर्ड की मृत्यु के तुरंत बाद उसने मैडम विलियम्स का घर छोड़ दिया था। उसने कहा था कि उसे देहात में ऐसा काम मिल गया है जहाँ रहने की भी व्यवस्था है। उस गर्मी में वह मैडम विलियम्स की उदासीनता के लिए बेहद आभारी थी। उस औरत को जैसे यह दिखाई ही नहीं दिया था कि एलिज़ाबेथ एक ही रात में बूढ़ी औरत बन गई थी और भय तथा शोक से लगभग पागल हो गई थी। उसने अपनी मौसी को सबसे सूखा, सबसे छोटा और सबसे ठंडा पत्र लिखा। वह किसी भी तरह उसके भीतर सोई हुई थोड़ी-सी चिंता को भी जगाना नहीं चाहती थी। उसने वही बात लिखी जो मैडम विलियम्स से कही थी और उसे चिंता न करने के लिए कहा। वह परमेश्वर के हाथों में थी। सचमुच वह परमेश्वर के ही हाथों में थी। ऐसी कड़वाहट के बीच, जिसे केवल परमेश्वर का हाथ ही उस पर डाल सकता था, उसी हाथ ने उसे उस कठिनाई से पार भी पहुँचाया।

फ्लोरेंस और एलिज़ाबेथ वॉल स्ट्रीट की एक ऊँची, विशाल और पत्थर जैसी कठोर कार्यालय-इमारत में सफाई का काम करती थीं। वे शाम को वहाँ पहुँचतीं और पूरी रात बड़े सुनसान गलियारों और शांत कार्यालयों में पोछे, बाल्टियाँ और झाड़ू लेकर काम करती रहतीं। यह भयानक काम था और एलिज़ाबेथ को इससे घृणा थी। लेकिन काम रात में होता था और उसने इसे खुशी-खुशी स्वीकार किया था क्योंकि इसका मतलब था कि वह दिन भर स्वयं जॉन की देखभाल कर सकती थी और उसे नर्सरी में रखने के लिए अतिरिक्त पैसे खर्च नहीं करने पड़ते थे। वह पूरी रात स्वाभाविक ही, उसके लिए चिंतित रहती थीलेकिन कम-से-कम रात में जॉन सो रहा होता था। वह केवल प्रार्थना कर सकती थी कि घर में आग न लगे, वह बिस्तर से न गिर जाए या किसी रहस्यमय तरीके से गैस का चूल्हा न जला दे। उसने पड़ोस में रहने वाली एक औरत से, जो दुर्भाग्य से बहुत अधिक शराब पीती थी, जॉन पर नज़र रखने के लिए कहा था। वही औरत, जिसके साथ वह कभी-कभी दोपहर में एक-दो घंटे बिताती थी। उसकी मकान-मालकिन बस यही दो लोग थे जिन्हें वह देखती थी। उसने रिचर्ड के दोस्तों से मिलना बंद कर दिया था क्योंकि किसी कारण से वह नहीं चाहती थी कि उन्हें रिचर्ड के बच्चे के बारे में पता चले। इसलिए भी कि रिचर्ड की मृत्यु होते ही दोनों पक्षों के लिए यह तुरंत स्पष्ट हो गया था कि उनके बीच वास्तव में कितनी कम समानताएँ थीं। उसने नए लोगों से मिलने की कोशिश भी नहीं कीबल्कि उनसे दूर भागती रही। वह अपनी बदली हुई और पतित अवस्था में दूसरों की निगाहों के सामने स्वयं को रखने का विचार तक सहन नहीं कर सकती थी। वह एलिज़ाबेथ, जो कभी थी, बहुत दूर दफन हो चुकी थी। अपने खोए हुए और मौन पिता के साथ, अपनी मौसी के साथ, रिचर्ड की कब्र में। जो एलिज़ाबेथ अब बन चुकी थी, उसे वह पहचानती नहीं थी और उसे जानना भी नहीं चाहती थी।

लेकिन एक रात काम समाप्त होने के बाद फ्लोरेंस ने उसे पास की चौबीसों घंटे खुली कॉफी की दुकान में एक कप कॉफी पीने के लिए साथ चलने का निमंत्रण दिया। स्वाभाविक ही, इससे पहले भी दूसरे लोगों ने उसे आमंत्रित किया था। मसलन, रात का चौकीदार। लेकिन उसने हमेशा मना कर दिया था। वह अपने बच्चे का बहाना बनाती थी, जिसे खाना खिलाने के लिए उसे जल्दी घर जाना पड़ता था। उन दिनों वह स्वयं को एक युवा विधवा बताती थी और विवाह की अंगूठी पहनती थी। बहुत जल्द लोगों ने उससे पूछना कम कर दिया और उसकी छवि एक ऐसी औरत की बन गई जो “घमंडी” थी।

फ्लोरेंस ने उससे लगभग कभी बात नहीं की थी, इससे पहले कि एलिज़ाबेथ ने अपने लिए यह दयापूर्ण अलोकप्रियता अर्जित कर ली थीलेकिन एलिज़ाबेथ ने फ्लोरेंस पर ध्यान दिया था। वह गरिमा से भरी एक ऐसी मूक उग्रता के साथ चलती थी, जो हास्यास्पद हो जाने से बस थोड़ा ही बचती थी। वह भी बेहद अलोकप्रिय थी और जिन स्त्रियों के साथ वह काम करती थी, उनसे उसका कोई मेल-जोल नहीं था। एक तो वह उनसे काफी बड़ी थी और ऐसा लगता था कि उसके पास न हँसने के लिए कुछ था, न गपशप करने के लिए। वह काम पर आती, अपना काम करती और चली जाती। जब वह सिर पर एक कपड़ा बाँधे, हाथ में बाल्टी और पोछा लिए, इतनी कठोरता से गलियारों में आगे बढ़ती थी तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसके मन में क्या चल रहा होगा। एलिज़ाबेथ को लगता था कि कभी वह बहुत धनी रही होगी और उसने अपना धन खो दिया होगाएक गिरी हुई स्त्री के रूप में दूसरी गिरी हुई स्त्री के प्रति उसके मन में एक तरह की आत्मीयता थी।

धीरे-धीरे, दिन निकलने के समय साथ बैठकर एक कप कॉफी पीना उनकी आदत बन गई। वे उस कॉफी-शॉप में साथ बैठतीं, जो उनके पहुँचने के समय हमेशा खाली होती और पंद्रह मिनट बाद, जब वे वहाँ से निकलतीं, लोगों से भर जाती। वे कॉफी और डोनट खातीं और फिर सबवे से ऊपर शहर की ओर चली जातीं। कॉफी पीते समय और सबवे की यात्रा के दौरान वे मुख्यतः फ्लोरेंस के बारे में बातें करतीं। लोग उसके साथ कितना बुरा व्यवहार करते थे और उसके पति की मृत्यु के बाद उसका जीवन कितना खाली हो गया था। फ्लोरेंस ने एलिज़ाबेथ को बताया कि उसका पति उसे बहुत चाहता था और उसकी हर इच्छा पूरी करता था। लेकिन उसमें गैर-जिम्मेदारी की प्रवृत्ति थी। वह उससे कहती रही थी और सौ बार कहा होगा, “फ्रैंक, तुम्हें जीवन बीमा करा लेना चाहिए।” लेकिन उसने सोचा था भला यह किसी पुरुष के स्वभाव जैसा ही नहीं था कि वह हमेशा जीवित रहेगा। अब देखो, वह खुद एक ऐसी उम्रदराज़ स्त्री थी जिसे इस दुष्ट शहर के सारे काले निकम्मे लोगों के बीच अपनी रोज़ी कमानी पड़ रही थी। एलिज़ाबेथ इस गर्वीली स्त्री के भीतर छिपी स्वीकारोक्ति की आवश्यकता को देखकर थोड़ी चकित हुई, फिर भी उसने बहुत सहानुभूति से उसकी बातें सुनीं। फ्लोरेंस की दिलचस्पी के लिए वह उसकी बहुत आभारी थी। फ्लोरेंस उससे काफी बड़ी थी और बहुत दयालु लगती थी।

निस्संदेह, फ्लोरेंस की उम्र और उसकी दयालुता ही वे कारण थे जिनसे एलिज़ाबेथ ने बिना पहले से कुछ सोचे-विचारे उसे अपने मन की बात बता दी। पीछे मुड़कर देखने पर उसे विश्वास करना कठिन लगता था कि वह इतनी निराश या इतनी बचकानी हो सकती थी. फिर भी, पीछे मुड़कर देखने पर वह उस बात को स्पष्ट रूप से समझ पाती थी जिसे उस समय वह केवल अस्पष्ट रूप से महसूस कर पा रही थी कि उसे कहीं न कहीं एक ऐसे दूसरे मनुष्य की कितनी आवश्यकता थी, जो उसके बारे में सच्चाई जानता हो।

फ्लोरेंस अक्सर कहती थी कि उसे छोटी जॉनी से मिलने में कितनी खुशी होगीउसे पूरा विश्वास था, वह कहती कि एलिज़ाबेथ का कोई भी बच्चा अद्भुत बच्चा होगा। उस गर्मी के अंत के करीब एक रविवार को एलिज़ाबेथ ने उसे उसके सबसे अच्छे कपड़े पहनाए और फ्लोरेंस के घर ले गई। उस दिन वह अजीब तरह से और भय से भरी हुई उदास थीजॉन भी अच्छे मूड में नहीं था। वह अँधेरी निगाहों से उसे देखती रहती, मानो उसके चेहरे पर उसका भविष्य पढ़ने की कोशिश कर रही हो। एक दिन वह बड़ा होगा, बोलने लगेगा और उससे सवाल पूछेगा। वह उससे क्या सवाल पूछेगा और वह क्या जवाब देगी? वह हमेशा उसके पिता के बारे में उससे झूठ नहीं बोल पाएगी क्योंकि एक दिन वह इतना बड़ा हो जाएगा कि समझ सकेगा कि उसके नाम के साथ उसके पिता का नाम क्यों नहीं है। एलिज़ाबेथ को कड़वे असहायपन के साथ याद आया कि रिचर्ड भी पिता-विहीन बच्चा था। जब एक परिवार के लोग मुझसे ऊब जाते थे तो वे मुझे दूसरे के पास भेज देते थे। हाँ, एक के बाद दूसरे के पास। गरीबी, भूख, भटकन, क्रूरता, भय और काँपते हुए जीवन से होते हुए मृत्यु तक। उसे उन लड़कों का ध्यान आया जो जेल चले गए थे। क्या वे अब भी वहाँ थे? क्या एक दिन जॉन भी उन लड़कों में से एक होगा? वे लड़के, जो अब हर गली के नुक्कड़ पर, दवा की दुकानों की खिड़कियों के सामने, बिलियर्ड-कक्षों के बाहर खड़े रहते थे, जो उसके पीछे सीटी बजाते थे, जिनके दुबले शरीर मानो आलस्य, द्वेष और निराशा से झनझना रहे थे। वह अकेली और ऐसी अभावग्रस्त अवस्था में, कैसे उम्मीद कर सकती थी कि वह खुद को उसके और इस इतनी विशाल तथा उफनती हुई विनाशकारी दुनिया के बीच खड़ा कर पाएगी? और फिर, मानो उसके सारे अँधेरे अनुमानों की पुष्टि करने के लिए, जैसे ही वह सबवे की सीढ़ियों तक पहुँची, जॉन सिसकने, कराहने और रोने लगा।

वह पूरे रास्ते ऊपर शहर तक रोता-कराहता रहा। उस दिन उसे किसी भी तरह खुश कर पाना असंभव थाउसके बेचैन शरीर का भार, गर्मी, मुस्कराते और घूरते लोग और वह अजीब भय जो उस पर इतना भारी पड़ा था। इन सबके कारण जब वह फ्लोरेंस के दरवाज़े तक पहुँची तो वह लगभग रो पड़ने वाली थी।

लेकिन उसी क्षण, उसकी झुँझलाहट भरी राहत के लिए, जॉन सबसे प्रसन्नचित्त शिशु बन गया। फ्लोरेंस ने भारी, पुराने ढंग का गहरे लाल रंग का एक ब्रोच लगा रखा था। दरवाज़ा खोलते ही जॉन की नज़र उस पर पड़ गई। वह उस ब्रोच को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाने लगा और फ्लोरेंस से इस तरह बड़बड़ाने और लार टपकाने लगा जैसे, वह अपने छोटे-से पूरे जीवन से उसे जानता हो।

अच्छा!” फ्लोरेंस ने कहा, “जब यह इतना बड़ा हो जाएगा कि सचमुच लड़कियों के पीछे जाने लगेगा, तब तो तुम्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ेगी, लड़की।”

यह,” एलिज़ाबेथ ने गंभीरता से कहा, “बिल्कुल प्रभु की सच्ची बात है। अभी से यह मुझे इतना व्यस्त रखता है कि आधे समय मुझे खुद नहीं पता होता कि मैं कहाँ आ रही हूँ या कहाँ जा रही हूँ।”

इस बीच फ्लोरेंस ने जॉन का ध्यान ब्रोच से हटाने के लिए उसे एक संतरा दियालेकिन वह संतरे देख चुका था। उसने बस एक क्षण उसे देखा और फिर उसे फर्श पर गिरा दिया। वह फिर अपने उस विचलित कर देने वाले सहज अंदाज़ में ब्रोच को लेकर झगड़ने लगा।

इसे तुम पसंद हो,” एलिज़ाबेथ ने आखिरकार कहा। उसे उसे देखते हुए थोड़ी शांति मिली थी।

तुम थक गई होगी,” फ्लोरेंस ने कहा। “इसे वहाँ नीचे बैठा दो।” उसने एक बड़ी आराम-कुर्सी को मेज़ के पास खींच दिया ताकि जॉन उनके खाने के समय उन्हें देख सके।

मुझे पिछले दिनों अपने भाई का एक पत्र मिला था,” खाना मेज़ पर लाते हुए उसने कहा। “उसकी पत्नी, बेचारी बीमार और परेशान रहने वाली औरत, मर गई है और अब वह उत्तर की ओर आने के बारे में सोच रहा है।”

तुमने मुझे कभी बताया ही नहीं,” एलिज़ाबेथ ने जल्दी से और कुछ बनावटी उत्सुकता के साथ कहा, “कि तुम्हारा कोई भाई है! और वह यहाँ आ रहा है?”

वह तो ऐसा ही कहता है। अब मुझे नहीं लगता कि उसे वहाँ नीचे रोकने वाली कोई चीज़ बची है। अब जब डेबोरा चली गई।” वह एलिज़ाबेथ के सामने बैठ गई। मैंने उसे,” उसने सोचते हुए कहा, “बीस साल से भी ज़्यादा समय से नहीं देखा है।”

तो फिर,” एलिज़ाबेथ मुस्कराई, “जब तुम दोनों फिर मिलोगी तो वह बहुत बड़ा दिन होगा।”

फ्लोरेंस ने सिर हिलाया और एलिज़ाबेथ को खाना शुरू करने का संकेत किया। नहीं,” उसने कहा, “हम दोनों की कभी नहीं बनी और मुझे नहीं लगता कि वह बदला है।”

बीस साल बहुत लंबा समय होता है,” एलिज़ाबेथ ने कहा, “उसे कुछ तो बदलना ही पड़ा होगा।”

उस आदमी को,” फ्लोरेंस ने कहा, “मेरे और उसके बीच निभने के लिए बहुत कुछ बदलना पड़ेगा। नहीं...” वह कुछ क्षण रुकी, गंभीर और उदास होकर बोली, “मुझे बहुत अफसोस है कि वह आ रहा है। मैंने तो सोचा भी नहीं था कि इस दुनिया में या अगली दुनिया में भी मैं उसे फिर कभी देखूँगी।”

एलिज़ाबेथ को लगा कि किसी बहन को अपने भाई के बारे में इस तरह बात नहीं करनी चाहिए, खासकर ऐसे व्यक्ति के सामने जो उसे बिल्कुल नहीं जानता और जिससे शायद आगे चलकर उसकी मुलाकात भी हो। उसने असहाय भाव से पूछा, तुम्हारा भाई क्या करता है?”

किसी तरह का पादरी है,” फ्लोरेंस ने कहा। “मैंने उसे कभी बोलते हुए नहीं सुना। जब मैं घर पर थी, तब वह और कुछ नहीं करता था। औरतों के पीछे भागता था और नशे में नालियों में पड़ा रहता था।”

आशा है,” एलिज़ाबेथ हँसते हुए बोली, “कम-से-कम उसने अपनी आदतें तो बदल ली होंगी।”

लोग,” फ्लोरेंस ने कहा, “जितनी बार चाहें अपनी आदतें बदल सकते हैं। लेकिन तुम चाहे कितनी ही बार अपनी चाल-चलन बदल लो, तुम्हारे भीतर जो है, वह तो तुम्हारे भीतर ही है और आखिरकार बाहर आ ही जाएगा।”

हाँ,” एलिज़ाबेथ ने गंभीरता से कहा। फिर कुछ झिझकते हुए पूछा, “लेकिन क्या तुम्हें नहीं लगता कि प्रभु किसी व्यक्ति का हृदय बदल सकते हैं?”

मैंने यह बात बहुत बार सुनी है,” फ्लोरेंस ने कहा, “लेकिन अभी तक अपनी आँखों से देखा नहीं। ये काले लोग इधर-उधर घूमते रहते हैं और कहते रहते हैं कि प्रभु ने उनके दिल बदल दिए हैं। लेकिन उन लोगों के साथ कुछ नहीं हुआ। उनके वही पुराने काले दिल हैं, जो उन्हें जन्म से मिले थे। मेरा खयाल है कि प्रभु ने उन्हें ऐसे ही दिल दिए हैं और, प्यारी, मैं तुम्हें बता रही हूँ, प्रभु दोबारा किसी को दूसरा दिल नहीं देते।”

नहीं,” एलिज़ाबेथ ने एक लंबे मौन के बाद भारी स्वर में कहा। उसने जॉन की ओर देखा, जो फ्लोरेंस की आराम-कुर्सी को सजाने वाले चौकोर, झालरदार मेज़पोश जैसे सजावटी कपड़ों को बड़ी बेरहमी से नष्ट कर रहा था। “मेरा भी यही खयाल है कि यही सच है। लगता है, मौका एक ही बार मिलता है और बस, बात खत्म। उसे खो दिया तो फिर हमेशा के लिए सब तय हो गया।”

अब तुम,” फ्लोरेंस ने कहा, “अचानक बहुत उदास लग रही हो। तुम्हें क्या हुआ है?”

कुछ नहीं,” उसने कहा। वह फिर मेज़ की ओर मुड़ गई। फिर असहाय होकर, यह सोचते हुए कि उसे बहुत ज़्यादा नहीं कहना चाहिए बोली, “मैं बस इस बच्चे के बारे में सोच रही थी कि इसका क्या होगा, मैं इसे कैसे पालूँगी, इस भयानक शहर में बिल्कुल अकेली।”

लेकिन तुम ऐसा तो नहीं सोच रही,” फ्लोरेंस ने पूछा, “कि सारी ज़िंदगी अकेली ही रहोगी? तुम अभी जवान हो, और बहुत सुंदर भी। अगर मैं तुम्हारी जगह होती तो नया पति ढूँढ़ने की कोई जल्दी नहीं करती। मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई निग्रो पैदा हुआ है जो किसी औरत के साथ ठीक से रहना जानता हो। तुम्हारे पास समय है, प्यारी, इसलिए आराम से सोचो।”

मेरे पास,” एलिज़ाबेथ ने धीरे से कहा, “इतना समय नहीं है।” वह अपने आपको रोक नहीं सकीभीतर से कुछ उसे चुप रहने की चेतावनी दे रहा था, फिर भी शब्द उसके मुँह से बह निकले। “तुम यह शादी की अंगूठी देख रही हो? यह अंगूठी मैंने खुद खरीदी थी। इस बच्चे का कोई पिता नहीं है।”

अब वह यह कह चुकी थीउन शब्दों को वापस नहीं लिया जा सकता था। और फ्लोरेंस की मेज़ पर काँपते हुए बैठे-बैठे उसे एक बेपरवाह, पीड़ादायक राहत महसूस हुई।

फ्लोरेंस उसे ऐसी तीव्र करुणा से देखती रही, जो क्रोध जैसी प्रतीत होती थी। उसने जॉन की ओर देखा और फिर एलिज़ाबेथ की ओर।

बेचारी,” फ्लोरेंस ने कहा। वह कुर्सी पर पीछे की ओर झुक गई। उसके चेहरे पर अब भी वही विचित्र, भीतर तक धँसा हुआ क्रोध था। “तुमने बहुत कुछ सहा है, है न?”

मैं डर गई थी,” एलिज़ाबेथ ने काँपते हुए कहा। वह बोलने के लिए विवश थी।

मैंने कभी ऐसा नहीं देखा,” फ्लोरेंस ने कहा, “कि यह बात न हुई हो। लगता है, ऐसी कोई औरत पैदा ही नहीं हुई जिसे किसी निकम्मे आदमी ने रौंद न डाला हो। लगता है, दुनिया में ऐसी कोई औरत नहीं है जिसे किसी आदमी ने मिट्टी में घसीटकर न गिराया हो और फिर वहीं छोड़कर अपने काम में न लग गया हो।”

एलिज़ाबेथ मेज़ पर सुन्न बैठी रही। अब कहने के लिए उसके पास कुछ नहीं था।

उसने क्या किया?” आखिरकार फ्लोरेंस ने पूछा, “भाग गया और तुम्हें छोड़ गया?”

ओह, नहीं,” एलिज़ाबेथ ने जल्दी से कहा और उसकी आँखों में आँसू उमड़ आए, “वह ऐसा नहीं था! वह मर गया जैसा मैंने कहा, वह किसी मुसीबत में पड़ गया था और मर गया। बहुत पहले, इस बच्चे के पैदा होने से।” वह उसी असहायता के साथ रोने लगी, जिस असहायता के साथ अब तक बोलती रही थी। फ्लोरेंस उठकर एलिज़ाबेथ के पास आई और उसका सिर अपनी छाती से लगा लिया। वह मुझे कभी छोड़कर नहीं जाता,” एलिज़ाबेथ ने कहा, “लेकिन वह मर गया।”

अब, इतने लंबे समय तक अपनी भावनाओं को कठोरता से दबाए रखने के बाद, वह इस तरह रोई जैसे अब वह कभी रोना बंद ही नहीं कर पाएगी।

अब चुप हो जाओ,” फ्लोरेंस ने धीरे से कहा, “चुप हो जाओ। तुम इस छोटे बच्चे को डरा दोगी। वह अपनी माँ को रोते हुए नहीं देखना चाहता। सब ठीक है,” उसने जॉन से फुसफुसाकर कहा, जो अब चीज़ें नष्ट करने की अपनी कोशिश छोड़ चुका था और दोनों स्त्रियों को देख रहा था, “सब ठीक है। सब कुछ ठीक है।”

एलिज़ाबेथ सीधी बैठ गई और अपने हैंडबैग से रूमाल निकालकर आँखें पोंछने लगी।

हाँ,” फ्लोरेंस खिड़की की ओर जाते हुए बोली, “मर्द तो मर ही जाते हैं। और हम औरतें, जैसा बाइबल कहती है, घूमती रहती हैं और शोक मनाती हैं। मर्द मर जाते हैं और उनका सब कुछ वहीं खत्म हो जाता हैलेकिन हम औरतों को जीते रहना पड़ता है और यह भूलने की कोशिश करनी पड़ती है कि उन्होंने हमारे साथ क्या किया था। हाँ, प्रभु...” वह रुकी और फिर एलिज़ाबेथ के पास लौट आई। “हाँ, प्रभु,” उसने दोहराया, “मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ।”

मुझे बहुत अफसोस है,” एलिज़ाबेथ ने कहा, “कि मैंने तुम्हारा इतना अच्छा खाना इस तरह खराब कर दिया।”

लड़की,” फ्लोरेंस ने कहा, “माफी की एक भी बात मत कहना, वरना मैं तुम्हें इसी दरवाज़े से बाहर निकाल दूँगी। उस बच्चे को उठाओ और वहाँ उस आराम-कुर्सी पर बैठो और खुद को संभालो। मैं रसोई में जाकर हम दोनों के लिए कुछ ठंडा पीने को बनाती हूँ। चिंता मत करो, प्यारी। प्रभु तुम्हें बस इतनी दूर तक ही गिरने देंगे।”

….. …..

 

इसके दो-तीन सप्ताह बाद, एक रविवार को फ्लोरेंस के घर पर उसकी मुलाकात गैब्रियल से हुई।

फ्लोरेंस ने उसके बारे में जो कुछ बताया था, उससे एलिज़ाबेथ उसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसने सोचा था कि वह फ्लोरेंस से उम्र में बड़ा होगा और उसके बाल सफेद या सिर गंजा होगा। लेकिन वह तो अपनी बहन से काफी छोटा दिखाई देता था। उसके सारे दाँत थे और सिर पर पूरे बाल भी। उस रविवार को वह फ्लोरेंस के छोटे-से, नाज़ुक बैठक-कक्ष में बैठा था। एलिज़ाबेथ की उलझन और थकान से भरी दृष्टि को वह मानो इस थकी हुई धरती पर एक चट्टान जैसा लगा।

उसे याद था कि जॉन को अपनी भारी बाँहों में उठाए जब वह सीढ़ियाँ चढ़ रही थी और दरवाज़े के भीतर प्रवेश कर रही थी, तब उसने संगीत सुना था, जो फ्लोरेंस के दरवाज़ा बंद करते ही स्पष्ट रूप से धीमा पड़ गया। जॉन ने भी उसे सुना था और हाथ हवा में हिलाते हुए, शरीर मटकाते हुए और आवाज़ें निकालते हुए उसका जवाब दिया था, जिन्हें शायद वह गाना समझे जाने के लिए निकाल रहा था। तू पक्का निग्रो ही है,” उसने मनोरंजन और झुँझलाहट के साथ सोचा क्योंकि नीचे की किसी मंज़िल पर किसी का ग्रामोफोन बज रहा था और हवा में ब्लूज़ संगीत का धीमा, ऊँचा और नपा-तुला विलाप भर रहा था।

गैब्रियल उठा। एलिज़ाबेथ को लगा कि उसकी उठने की गति और उत्सुकता केवल शिष्टाचार के कारण नहीं थी। उसके मन में तुरंत सवाल उठा कि क्या फ्लोरेंस ने उसे उसके बारे में बता दिया था। इससे उसके भीतर फ्लोरेंस के प्रति एक संकोची-सा क्रोध, साथ ही गर्व और भय पैदा हो गया। लेकिन जब उसने गैब्रियल की आँखों में देखा तो वहाँ उसे एक अजीब विनम्रता और ऐसी अप्रत्याशित दयालुता दिखाई दी, जिसकी उसने उम्मीद नहीं की थी। उसका क्रोध और अपनी रक्षा करने वाला गर्व तुरंत समाप्त हो गयालेकिन कहीं भीतर दुबका हुआ भय अब भी बना रहा।

तब फ्लोरेंस ने उनका परिचय कराया। उसने कहा, “एलिज़ाबेथ, यही मेरा भाई है जिसके बारे में मैं तुम्हें इतना कुछ बताती रही हूँ। यह पादरी है, प्यारी... इसलिए जब यह आस-पास हो तो हमें बहुत संभलकर बातें करनी पड़ती हैं।”

तब उसने अपनी बहन की बात से कहीं कम चुभते और कम अस्पष्ट मुस्कान के साथ कहा, “मुझसे डरने की कोई जरूरत नहीं, बहन। मैं तो प्रभु के हाथों में रखा हुआ एक गरीब, कमजोर पात्र हूँ।”

देखा!” फ्लोरेंस ने गंभीरता से कहा। उसने जॉन को उसकी माँ की बाँहों से ले लिया। “और यह है छोटा जॉनी,” उसने कहा, “पादरी से हाथ मिलाओ, जॉनी।”

लेकिन जॉन उस दरवाज़े को देख रहा था जिसके पीछे संगीत बंद था। उसके हाथ अब भी उसी दिशा में फैले हुए थे—एक ऐसी ज़िद के साथ, जिसमें क्रोध भी था और असहायता भी। उसने अपनी माँ की ओर प्रश्न और शिकायत भरी निगाहों से देखा। एलिज़ाबेथ उसे देखकर हँसी और बोली, “जॉनी और वह संगीत सुनना चाहता है। ऊपर सीढ़ियाँ चढ़ते समय ही वह नाचने लगा था।”

गैब्रियल हँसा और फ्लोरेंस के चारों ओर घूमकर जॉन के चेहरे में देखने लगा। बेटा,” उसने कहा, “बाइबल में एक आदमी था जिसे संगीत बहुत पसंद था। वह राजा के सामने अपनी वीणा बजाया करता था और एक दिन प्रभु के सामने नाचने लगा। क्या तुम्हें लगता है कि एक दिन तुम भी प्रभु के लिए नाचोगे?”

जॉन ने बच्चे की उस अपारदर्शी गंभीरता के साथ पादरी के चेहरे में देखा जैसे, वह इस सवाल पर मन ही मन विचार कर रहा हो और सोच-विचार पूरा कर लेने के बाद ही उत्तर देगा। गैब्रियल ने उसे एक अजीब मुस्कान से देखा। एलिज़ाबेथ को वह मुस्कान अजीब ढंग से प्रेम से भरी लगी और उसके सिर के ऊपर हाथ फेर दिया।

यह बहुत अच्छा लड़का है,” गैब्रियल ने कहा। “इन बड़ी-बड़ी आँखों से तो इसे बाइबल में सब कुछ दिखाई देना चाहिए।”

वे सब हँस पड़े। फ्लोरेंस जॉन को उस आराम-कुर्सी पर बैठाने चली गई, जो रविवार के दिनों में उसका सिंहासन हुआ करती थी। और एलिज़ाबेथ ने पाया कि वह गैब्रियल को देख रही थी। लेकिन सामने बैठे इस आदमी में उसे वह भाई दिखाई ही नहीं दे रहा था, जिसे फ्लोरेंस इतना नापसंद करती थी।

वे मेज़ पर बैठ गए। जॉन एलिज़ाबेथ और फ्लोरेंस के बीच तथा गैब्रियल के सामने बैठा था।

तो,” एलिज़ाबेथ ने घबराई हुई शिष्टता से कहा, उसे लगा कि कुछ न कुछ कहना आवश्यक है, “तुम अभी-अभी इस बड़े शहर में आए हो? तुम्हें यह जगह बहुत अजीब लगती होगी।”

उसकी आँखें अब भी जॉन पर टिकी थीं, जिसकी आँखें उससे हटी नहीं थीं। फिर उसने दोबारा एलिज़ाबेथ की ओर देखा। उसे लगा कि उनके बीच की हवा में कोई तनाव भरने लगा है और उसके भीतर उठने वाली उस गुप्त उत्तेजना का वह कोई नाम या कारण नहीं खोज पा रही थी।

बहुत बड़ा है,” उसने कहा, “और मुझे तो ऐसा लगता है और सुनाई भी ऐसा ही देता है जैसे, यहाँ शैतान हर दिन काम करता है।”

वह संगीत के बारे में कह रहा था, जो अब भी बंद नहीं हुआ थालेकिन एलिज़ाबेथ को तुरंत लगा कि उसकी बात में वह स्वयं भी शामिल है। यह भावना और गैब्रियल की आँखों में दिखाई देने वाली किसी दूसरी चीज़ के कारण उसने जल्दी से अपनी निगाह प्लेट पर झुका ली।

वह यहाँ,” फ्लोरेंस ने फुर्ती से कहा, “वहाँ घर से ज़्यादा मेहनत नहीं कर रहा। वहाँ नीचे के वे निग्रो,” उसने एलिज़ाबेथ से कहा, “सोचते हैं कि न्यूयॉर्क बस एक लंबी रविवार की शराबखोरी है। उन्हें क्या पता। किसी को उन्हें बताना चाहिए कि जितनी अच्छी मूनशाइन[3] उन्हें वहीं मिल सकती है, उतनी शायद यहाँ न मिले और सस्ती भी।”

लेकिन मुझे उम्मीद है,” उसने मुस्कराकर कहा, “कि तुमने मूनशाइन पीना शुरू नहीं कर दिया होगा, बहन।”

यह आदत तो मुझे कभी थी ही नहीं,” उसने तुरंत कहा।

पता नहीं,” वह मुस्कराते हुए और अब भी एलिज़ाबेथ की ओर देखते हुए बोला, “लोग कहते हैं कि उत्तर में लोग ऐसी चीज़ें करते हैं, जिनके बारे में वे घर पर करने की सोच भी नहीं सकते।”

लोगों को अपनी गंदगी करनी होती है,” फ्लोरेंस ने कहा। “वे उसे करेंगे, चाहे कहीं भी रहें। घर पर लोग बहुत-सी ऐसी चीज़ें करते हैं जिनके बारे में वे नहीं चाहते कि किसी को पता चले।”

जैसा मेरी मौसी कहा करती थीं,” एलिज़ाबेथ ने संकोच से मुस्कराते हुए कहा, “वह कहती थीं कि लोगों को अँधेरे में वह काम करने से ज़रूर बचना चाहिए, जिसे वे उजाले में देखने से डरते हों।”

उसने यह बात एक तरह के मज़ाक के रूप में कही थी। लेकिन शब्द उसके मुँह से निकलते ही उसे उन्हें वापस बुला लेने की तीव्र इच्छा हुई। वे उसके अपने कानों में किसी स्वीकारोक्ति की तरह गूँज रहे थे।

यह तो प्रभु का ही सत्य है,” उसने बहुत थोड़ी-सी देर रुककर कहा। “क्या तुम सचमुच ऐसा मानती हो?”

उसने स्वयं को विवश करके उसकी ओर देखा और उसी क्षण उसे महसूस हुआ कि फ्लोरेंस कितनी तीव्रता से उसे देख रही थी, मानो वह चिल्लाकर उसे कोई चेतावनी देना चाहती हो। एलिज़ाबेथ समझ गई कि गैब्रियल की आवाज़ में ऐसी कौन-सी बात थी, जिसने अचानक फ्लोरेंस को इतना सतर्क और तनावग्रस्त कर दिया था। लेकिन उसने गैब्रियल की आँखों से अपनी आँखें नहीं हटाईं। उसने उत्तर दिया, “हाँ। मैं इसी तरह जीना चाहती हूँ।”

तो प्रभु तुम्हें आशीष देंगे,” उसने कहा, “और तुम्हारे लिए, तुम्हारे और उस लड़के के लिए... स्वर्ग की खिड़कियाँ खोल देंगे। वे तुम पर इतनी आशीषें बरसाएँगे कि तुम्हें समझ नहीं आएगा कि उन्हें कहाँ रखो। मेरी बात याद रखना।”

हाँ,” फ्लोरेंस ने धीमे स्वर में कहा, “उसकी बात याद रखना।”

लेकिन उन दोनों में से किसी ने भी उसकी ओर नहीं देखा। एलिज़ाबेथ के मन में एक वाक्य कौंध उठा और उसके पूरे मन को भर गया, जो लोग प्रभु से प्रेम करते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही उत्पन्न करती हैं।” उसने इस जलते हुए वाक्य को और उससे अपने भीतर उठ रही अनुभूति को मिटा देने की कोशिश की। क्योंकि रिचर्ड की मृत्यु के बाद पहली बार उसके भीतर आशा जागी थी। गैब्रियल की आवाज़ ने उसे यह महसूस कराया था कि वह पूरी तरह धराशायी नहीं हुई हैकि ईश्वर उसे फिर से सम्मान के साथ उठा सकते हैंउसकी आँखों ने उसे यह विश्वास दिलाया था कि वह फिर से इस बार सम्मान के साथ एक स्त्री बन सकती है। फिर जैसे, किसी बहुत दूर, बादलों से ढकी दूरी से उसने उसकी ओर मुस्कराकर देखा और एलिज़ाबेथ भी मुस्करा दी।

दूर बज रहा ग्रामोफोन अचानक एक घिसटती हुई, कराहती, व्यंग्यपूर्ण तुरही की ध्वनि पर अटक गया। यह अंधा, कुरूप विलाप उस क्षण को और तीव्र कर कमरे में भर गया। उसने जॉन की ओर देखा। कहीं से किसी हाथ ने ग्रामोफोन की भुजा को छुआ और चाँदी की सुई घूमती हुई काली ध्वनि-रेखाओं पर फिर आगे बढ़ गई, मानो समुद्र के बीच कोई चीज़ बिना लंगर के डोल रही हो।

जॉनी सो गया है,” उसने कहा।

वह, जो इतनी प्रसन्नता और पीड़ा के साथ नीचे उतर गई थी, अब अपने बच्चे को लेकर ऊपर की ओर चढ़ाई शुरू कर चुकी थी। उस बहुत ऊँचे, बहुत खड़े पहाड़ की ढलान पर ऊपर की ओर।

.... ....

उसे अपने चारों ओर हवा में एक महान हलचल महसूस हुई। एक बड़ा-सा उत्साह, जो प्रभु की प्रतीक्षा में दबा हुआ था। हवा ऐसी काँपती प्रतीत हुई जैसे तूफ़ान आने से पहले काँपती है। एक प्रकाश-सा उनके ठीक ऊपर और चारों ओर ठहरा हुआ लगता था, मानो अभी फूट पड़ेगा और कोई रहस्य प्रकट कर देगा। उसके चारों ओर उठते महान विलाप और महान गायन में उस हवा में जो चर्च को भरने के लिए इकट्ठी हो रही थीउसने अपने पति की आवाज़ नहीं सुनी। उसने जॉन के बारे में सोचा, जो अब चुप और उनींदा होकर चर्च के बहुत पीछे बैठा होगा। अपनी आँखों में वही विस्मय और भय लिए हुए। उसने सिर नहीं उठाया। वह थोड़ी देर और ठहरना चाहती थी ताकि ईश्वर उससे बोलें।

इसी वेदी के सामने वह बहुत वर्ष पहले घुटनों के बल झुककर क्षमा माँगने आई थी। जब उसका पतन हुआ था, जब हवा सूखी और तीखी थी और तेज़ हवा चल रही थी, तब वह हमेशा गैब्रियल के साथ थी। फ्लोरेंस को यह पसंद नहीं था और वह अक्सर यह बात कहती भी थीलेकिन उसने इससे अधिक कभी कुछ नहीं कहा। एलिज़ाबेथ ने इसका कारण यही समझा कि उसके पास गैब्रियल के विरुद्ध कहने के लिए कोई ऐसी बुरी बात नहीं थी जिसे वह प्रमाणित कर सके। बस, उसे अपना भाई पसंद नहीं था। अगर फ्लोरेंस अपनी आशंकाओं को स्पष्ट से स्पष्ट भाषा में भी बता पाती, तब भी एलिज़ाबेथ उसकी बात पर ध्यान नहीं दे सकती थी क्योंकि गैब्रियल उसका सहारा बन चुका था। वह उसकी और उसके बच्चे की ऐसे देखभाल करता था, मानो यही उसका जीवन-धर्म हो गया हो। वह जॉन के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करता, उसके साथ खेलता और उसके लिए चीज़ें खरीदता, मानो जॉन उसी का अपना बेटा हो। एलिज़ाबेथ जानती थी कि गैब्रियल की पत्नी निःसंतान मर गई थी और वह हमेशा से एक बेटा चाहता था। वह अब भी प्रार्थना करता थाउसने उससे कहा था कि ईश्वर उसे एक पुत्र का आशीर्वाद दें। कभी-कभी एलिज़ाबेथ अकेली बिस्तर पर लेटी हुई, उसकी सारी दयालुता के बारे में सोचते हुए कल्पना करती कि शायद जॉन ही वह बेटा है और एक दिन वह बड़ा होकर उन दोनों को सुख और आशीष देगा। तब वह सोचती कि अब वह फिर से उस विश्वास को अपना लेगी जिसे उसने छोड़ दिया थाफिर उसी प्रकाश में चलने लगेगी जिससे वह रिचर्ड के साथ इतनी दूर भाग गई थी। कभी-कभी गैब्रियल के बारे में सोचते हुए उसे रिचर्ड याद आ जाता। उसकी आवाज़, उसकी साँस, उसकी बाँहें और उसके भीतर भयानक पीड़ा उठती। तब गैब्रियल के संभावित स्पर्श की कल्पना से ही वह सिकुड़ जाती। लेकिन वह इस संकोच को स्वीकार नहीं करना चाहती थी। वह अपने आप से कहती कि पीछे मुड़कर देखना मूर्खता और पाप हैजबकि उसकी सुरक्षा उसके सामने है, मानो पहाड़ की चट्टान में तराशी हुई कोई सुरक्षित शरण।

एक रात उसने उससे पूछा, “सिस्टर, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अपना हृदय प्रभु को दे देना चाहिए?”

वे अँधेरी गलियों से होकर चर्च जा रहे थे। वह यह प्रश्न पहले भी उससे पूछ चुका थालेकिन इस बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले कभी नहीं थाइससे पहले उसे कभी उत्तर देने की इतनी तीव्र आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी।

मुझे लगता है,” उसने कहा।

अगर तुम प्रभु को पुकारोगी,” उसने कहा, “तो वे तुम्हें ऊपर उठा लेंगे, तुम्हें तुम्हारे हृदय की इच्छा देंगे। मैं इसका गवाह हूँ,” उसने मुस्कराते हुए कहा। “तुम प्रभु को पुकारो, प्रभु की प्रतीक्षा करो, वे उत्तर देंगे। ईश्वर के वादे कभी विफल नहीं होते।”

उसकी बाँह गैब्रियल की बाँह में थी और उसने महसूस किया कि वह अपनी भावनाओं के आवेग से काँप रहा था।

तुम्हारे आने तक,” उसने धीमी, काँपती आवाज़ में कहा, “मैं लगभग कभी चर्च नहीं जाती थी, रेवरेंड। ऐसा लगता था जैसे मुझे कोई रास्ता ही दिखाई नहीं देता था। मैं शर्म और... पाप के बोझ से पूरी तरह झुक गई थी।”

आखिरी शब्द उसके मुँह से बड़ी कठिनाई से निकले और बोलते समय उसकी आँखों में आँसू थे। उसने उसे बता दिया था कि जॉन का कोई नामित पिता नहीं है। उसने अपने कष्टों के बारे में भी उसे कुछ बताने की कोशिश की थी। उन दिनों उसे लगता था कि गैब्रियल उसकी बात समझता है और उसने उसे कभी दोषी ठहराकर नहीं देखा। वह कब इतना बदल गया था? या फिर ऐसा था कि वह बदला ही नहीं था बल्कि उसके कारण हुए दुख ने उसकी आँखें खोल दी थीं?

खैर,” उसने कहा, “मैं आ गया हूँ और यह प्रभु का ही हाथ था जिसने मुझे यहाँ भेजा। उसने हमें एक संकेत के रूप में एक-दूसरे से मिलाया है। तुम घुटनों के बल गिरो और देखो, क्या ऐसा नहीं है... घुटनों के बल गिरो और उनसे कहो कि आज रात वे तुमसे बोलें।”

हाँ, एक संकेत, उसने सोचा... उनकी दया का संकेत, उनकी क्षमा का संकेत।

जब वे चर्च के दरवाज़े तक पहुँचे तो वह रुक गया, उसकी ओर देखा और अपना वचन दिया।

सिस्टर एलिज़ाबेथ,” उसने कहा, “जब तुम आज रात घुटनों के बल झुको तो मैं चाहता हूँ कि तुम प्रभु से कहो कि वे तुम्हारे हृदय से बोलें और तुम्हें बताएँ कि मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसका उत्तर तुम्हें क्या देना चाहिए।”

वह उससे थोड़ी नीचे खड़ी थी। उसका एक पैर चर्च के प्रवेश-द्वार तक जाने वाली छोटी-सी पत्थर की सीढ़ी पर उठा हुआ था। वह ऊपर उसकी ओर देख रही थी। उसके चेहरे में देखते हुए जो उस धुँधली पीली रोशनी में ऐसे चमक रहा था जैसे किसी ऐसे मनुष्य का चेहरा हो जिसने स्वर्गदूतों और राक्षसों से युद्ध किया हो और ईश्वर का मुख देखा हो, अचानक और विचित्र रूप से उसके मन में यह बात आई कि वह एक स्त्री बन चुकी थी।

सिस्टर एलिज़ाबेथ,” उसने कहा, “प्रभु मेरे हृदय से बोल रहे हैं और मेरा विश्वास है कि उनकी इच्छा है कि तुम और मैं पति-पत्नी बनें।”

वह रुक गया। उसने (एलिज़ाबेथ) कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें उसके शरीर पर घूमीं।

मैं जानता हूँ,” उसने मुस्कराने की कोशिश करते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “कि मैं तुमसे बहुत बड़ा हूँ। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अभी भी बहुत ताकतवर आदमी हूँ। मैं भी जीवन की राह में बहुत नीचे तक जा चुका हूँ, सिस्टर एलिज़ाबेथ और शायद मैं तुम्हें... अपनी कुछ गलतियाँ करने से रोक सकूँ। प्रभु की कृपा हो... शायद मैं तुम्हारे पैर को फिर से ठोकर खाने से बचाने में मदद कर सकूँ... लड़की... जब तक हम इस संसार में हैं।”

फिर भी वह प्रतीक्षा करती रही।

और मैं तुमसे प्रेम करूँगा,” उसने कहा, “और तुम्हारा सम्मान करूँगा... उस दिन तक, जब तक ईश्वर मुझे अपने पास बुला न लें।”

उसकी आँखों में धीरे-धीरे आँसू भर आए। उस खुशी के आँसू, जहाँ तक वह पहुँच गई थीउस पीड़ा के आँसू, जिस राह से होकर उसे यहाँ तक आना पड़ा था।

और मैं तुम्हारे बेटे से, तुम्हारे उस छोटे लड़के से भी प्रेम करूँगा,” उसने अंततः कहा, “ठीक वैसे ही जैसे वह मेरा अपना बेटा हो। उसे कभी किसी बात की चिंता या परेशानी नहीं उठानी पड़ेगीजब तक मैं जीवित हूँ और मेरे पास काम करने के लिए ये दो हाथ हैं, उसे कभी ठंड या भूख नहीं सहनी पड़ेगी। मैं अपने ईश्वर के सामने इसकी शपथ लेता हूँ,” उसने कहा, “क्योंकि उन्होंने मुझे वह चीज़ वापस दे दी है, जिसे मैं समझता था कि मैं खो चुका हूँ।”

हाँ, उसने सोचा, एक संकेत... इस बात का संकेत कि वह बचाने में कितना सामर्थी है। फिर वह आगे बढ़ी और उसके बगल में उस छोटी-सी सीढ़ी पर खड़ी हो गई, चर्च के दरवाज़ों के सामने।

सिस्टर एलिज़ाबेथ,” उसने कहा और उस क्षण उसकी कृपा और विनम्रता की स्मृति वह अपनी कब्र तक अपने साथ ले जाती, “क्या तुम प्रार्थना करोगी?”

हाँ,” उसने कहा। “मैं प्रार्थना करती रही हूँ। मैं प्रार्थना करूँगी।”

वे इस चर्च में, इन दरवाज़ों से होकर भीतर गए और जब पादरी ने वेदी के पास आने का आह्वान किया तो वह उठ खड़ी हुई। उसने लोगों को ईश्वर की स्तुति करते हुए सुना और चर्च की लंबी मध्य-गली से होकर आगे बढ़ीइसी गली से, इसी वेदी तक, इस सुनहरी क्रूस के सामने। इन आँसुओं में, इस संघर्ष में क्या यह संघर्ष कभी समाप्त होगा? जब वह उठी और वे फिर एक बार सड़कों पर साथ-साथ चले तो उसने उसे ईश्वर की पुत्री, ईश्वर के सेवक की दासी कहा था। उसने आँसुओं के साथ उसके माथे को चूमा था और कहा था कि ईश्वर ने उन्हें एक-दूसरे की मुक्ति बनने के लिए एक साथ मिलाया है। और वह रो पड़ी थी। इस महान आनंद में कि ईश्वर के हाथ ने उसका जीवन बदल दिया था, उसे उठा लिया था और अकेले ही उसे उस दृढ़ चट्टान पर स्थापित कर दिया था।

उसे उस बहुत दूर के दिन की याद आई जब जॉन इस संसार में आया था वह क्षण, जो उसके जीवन और मृत्यु की शुरुआत था। उस दिन वह अकेली नीचे उतर गई थी। कमर के पास असहनीय भारीपन लिए, अपनी देह के भीतर एक रहस्य लिए, अँधेरे में नीचे, रोती हुई, कराहती हुई और ईश्वर को कोसती हुई। वह कितनी देर तक रक्त बहाती रही, पसीना बहाती रही और रोती रही। इसे पृथ्वी की कोई भाषा नहीं बता सकती। वह कितनी देर तक उस अँधेरे में रेंगती रही। यह वह कभी, कभी नहीं जान पाएगी। वहीं से उसकी शुरुआत हुई थी और वह अब भी उस अँधेरे से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ रही थी। उस क्षण की ओर, जब वह ईश्वर के साथ अपना मेल कर लेगी, जब वह उन्हें बोलते हुए सुनेगी और वे उसकी आँखों से सारे आँसू पोंछ देंगे। ठीक वैसे ही जैसे उस दूसरे अँधेरे में, अनंत काल के बाद, उसने जॉन के रोने की आवाज़ सुनी थी।

अब, अचानक छा गई निस्तब्धता में उसने उसे फिर रोते हुए सुना। यह उस नवजात शिशु का रोना नहीं था, जो धरती के सामान्य प्रकाश के सामने रोता है बल्कि यह उस मनुष्य-पुत्र का रोना था, जो स्वर्ग से उतरने वाले प्रकाश के सामने आदिम और पशुवत पुकार कर रहा था। उसने अपनी आँखें खोलीं और सीधी खड़ी हो गई। सभी संत उसे चारों ओर से घेरे खड़े थे। गैब्रियल स्तब्ध होकर उसे देख रहा था, मंदिर के किसी खंभे की तरह जड़ और अचल। खलिहान के फर्श पर, रोते-गाते संतों के बीचोंबीच, जॉन प्रभु की शक्ति के अधीन विस्मय से पड़ा हुआ था।


[1] यहाँ “मिस्र” इसलिए आया है क्योंकि यह प्रसंग मूसा के नेतृत्व में इस्राएलियों के मिस्र से निकलने की कथा से जुड़ा है। इस्राएली मिस्र में गुलाम थे। ईश्वर ने मूसा के माध्यम से उन्हें मिस्र से निकालकर प्रतिज्ञात देश की ओर ले जाना शुरू किया। लेकिन रास्ते में उन्हें भूख, प्यास, कठिन यात्रा और अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा। तब वे पछताकर कहने लगे, काश, हम मिस्र में ही मर गए होते! 

[2] मारपीट और हास्य से भरा कठपुतली खेल

[3] देसी शराब

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