प्रिय लूसीलियस
तुम शिकायत करते हो कि मैं तुम्हें जो पत्र भेजता हूँ, उन्हें लिखने में पहले जैसी सावधानी नहीं बरतता। यह बात सच है। आखिर बातचीत करते समय कौन हर शब्द को अत्यधिक सँवारने में लग जाता है? ऐसा तो वही व्यक्ति करता है जो जान-बूझकर बनावटी ढंग से बोलना चाहता है। मैं चाहता हूँ कि मेरे पत्र बिल्कुल वैसे ही हों जैसे हमारी बातचीत होती, यदि हम दोनों साथ बैठे होते या साथ-साथ टहल रहे होते— सरल, सहज और बिना किसी कृत्रिम तैयारी के। उनमें न तो कोई बनावट हो न कोई दिखावा। यदि यह संभव होता तो मैं तुम्हें अपने विचार कहने के बजाय सीधे दिखाना अधिक पसंद करता। यहाँ तक कि यदि मैं कोई भाषण भी दे रहा होता, तब भी न मैं अपने पैरों से ज़ोर देकर ठोकर मारता न हाथों से नाटकीय इशारे करता और न ही अपनी आवाज़ ऊँची करता। ये सब बातें मैं वक्ताओं (ओरेटरों) के लिए छोड़ देता। केवल इस बात से संतुष्ट रहता कि अपने विचार तुम्हारे सामने ऐसे ढंग से रखूँ जो न तो अलंकृत हो और न ही असावधान या अव्यवस्थित।
मैं तुम पर केवल यही प्रभाव छोड़ना चाहता हूँ कि जिन बातों को मैं कहता हूँ, उन्हें मैं केवल समझता ही नहीं बल्कि पूरे मन से अनुभव भी करता हूँ। इतना ही नहीं, मैं उनसे प्रेम भी करता हूँ। लोग अपने प्रिय को जिस प्रकार चूमते हैं, उसी प्रकार अपने बच्चों को नहीं चूमते। फिर भी बच्चों के प्रति उस पवित्र और संयमित चुम्बन में भी स्नेह की पर्याप्त अभिव्यक्ति होती है। ईश्वर की शपथ, मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि इतने महान विषयों पर कही जाने वाली बातें नीरस और रूखी हों क्योंकि दर्शन में भी साहित्यिक कौशल का अपना स्थान है। फिर भी, शब्दों को सँवारने-सजाने में अत्यधिक परिश्रम करना उचित नहीं है। हमारा समूचा उद्देश्य केवल इतना होना चाहिए कि जो हम अनुभव करते हैं, वही कहें। जो हम कहते हैं, उसे सचमुच अनुभव भी करें। हमारी वाणी और हमारा जीवन परस्पर पूर्ण सामंजस्य में हों। अपने वचन को निभाने का अर्थ क्या है? इसका अर्थ यह है कि जिस व्यक्ति को हम देखते हैं और जिसकी वाणी हम सुनते हैं, दोनों एक ही हों। तभी हमें यह ज्ञात होता है कि वचन देने वाला व्यक्ति वास्तव में कैसा है और उसका चरित्र कितना महान है क्योंकि तब उसके भीतर कोई द्वैत नहीं रहता। वह पूर्णतः एक ही व्यक्ति होता है।
हमारे शब्दों का उद्देश्य आनंद पहुँचाना नहीं बल्कि लाभ पहुँचाना होना चाहिए। फिर भी, यदि वाग्मिता बिना किसी विशेष प्रयास के प्राप्त हो जाए, यदि वह सहज रूप से आ जाए या बहुत थोड़े परिश्रम से मिल जाए तो उसे आने दीजिए और सर्वोत्तम विषयों की सेवा में उपस्थित रहने दीजिए। किंतु उसकी प्रकृति ऐसी हो कि वह स्वयं का नहीं बल्कि विषय का सौंदर्य और महत्त्व उजागर करे। अन्य कलाएँ पूरी तरह व्यक्ति की प्रतिभा से संबंधित होती हैं। पर यहाँ जिस बात का प्रश्न है, वह मन का कार्य है। रोगी किसी ऐसे चिकित्सक की खोज में नहीं निकलता जो प्रभावशाली वक्ता भी हो। हाँ, यदि उसे रोगमुक्त करने की क्षमता रखने वाला चिकित्सक उपचार के उपायों को परिष्कृत और सुंदर भाषा में भी समझा सके तो वह इसे एक अतिरिक्त गुण अवश्य मानेगा। फिर भी, उसे इस बात पर स्वयं को भाग्यशाली समझने का कोई विशेष कारण नहीं कि उसे ऐसा चिकित्सक मिला जो एक उत्कृष्ट वक्ता भी है। इसका महत्त्व उतना ही है जितना इस बात का कि एक कुशल नाविक देखने में भी सुंदर हो।
तुम मेरे कानों को क्यों गुदगुदा रहे हो? इतना मनोरंजक बनने की क्या आवश्यकता है? इस समय इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य सामने है। मुझे तो दागकर उपचार करने की, शल्य-चिकित्सा करने की और कठोर आहार-विधान पर रखने की आवश्यकता है। तुम्हें इसी कार्य के लिए बुलाया गया है। तुम्हारा दायित्व एक ऐसे दीर्घकालिक रोग का उपचार करना है, जो गंभीर भी है और व्यापक भी। यह उतना ही बड़ा दायित्व है जितना किसी महामारी के समय एक चिकित्सक का होता है। क्या तुम शब्दों में ही उलझे हुए हो? यदि अपने वास्तविक कर्तव्य में असफल न हो तो इसी में प्रसन्न रहो।
जानने के लिए इतनी सारी बातें हैं। तुम उन्हें कब सीखोगे? कब उन्हें अपने मन में इस प्रकार दृढ़ करोगे कि वे कभी विस्मृत न हों? कब उन्हें अपने जीवन में परखोगे? क्योंकि ये अन्य विषयों की तरह नहीं हैं। इनके लिए केवल कंठस्थ कर लेना पर्याप्त नहीं। इन्हें जीवन में उतारना आवश्यक है। वास्तव में सुखी वह नहीं है जो इन्हें केवल जानता है बल्कि वह है जो इनके अनुसार आचरण करता है।
“पर देखो, क्या उस व्यक्ति से नीचे कोई और स्तर नहीं हैं? क्या केवल प्रज्ञा है और उसके बाद एकदम गहरी गिरावट?” नहीं, मेरा ऐसा विचार नहीं है। जो व्यक्ति प्रगति के मार्ग पर है, उसे अभी भी अज्ञानी लोगों में ही गिना जाता है। फिर भी वह उनसे एक बहुत बड़े अंतर से अलग होता है। स्वयं प्रगति करने वालों के बीच भी महत्त्वपूर्ण भेद किए जाने चाहिए।
कुछ दार्शनिकों के अनुसार, प्रगति करने वालों के तीन प्रकार होते हैं। पहला प्रकार उन लोगों का है जिन्होंने अभी तक प्रज्ञा प्राप्त नहीं की है, किंतु उसके अत्यंत निकट पहुँच चुके हैं। क्योंकि निकट होना भी अभी बाहर ही होना है। यदि तुम पूछो कि ये कौन हैं तो ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी वासनाओं और दोषों पर काफ़ी हद तक विजय पा ली है, परंतु जिनकी स्थिरता और निष्ठा की अभी परीक्षा नहीं हुई है। उन्होंने अभी अपने सद्गुण को इस प्रकार अपना नहीं बनाया है कि उसका पूर्ण उपयोग कर सकें। फिर भी अब उनके लिए उन बुराइयों में लौट जाना संभव नहीं है जिन्हें वे पीछे छोड़ चुके हैं। वे अब ऐसी अवस्था में पहुँच चुके हैं जहाँ से पीछे फिसलने का कोई खतरा नहीं है, किंतु उन्हें स्वयं अभी इसका बोध नहीं है। जैसा कि मैंने अपने एक पत्र में लिखा था, “वे यह नहीं जानते कि वे जानते हैं।” अब उनका सौभाग्य यह है कि वे अपने सद्गुण का फल भोगने लगे हैं, परंतु अभी उन्हें उस पर पूर्ण विश्वास और आत्मनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ है।
कुछ दार्शनिक ऊपर वर्णित प्रगति करने वालों के इस वर्ग की सीमा इस प्रकार निर्धारित करते हैं कि उनके अनुसार वे अब मन की दुर्बलताओं से तो मुक्त हो चुके हैं, किंतु अभी भावावेगों से मुक्त नहीं हुए हैं। इसलिए वे अभी भी पतन के जोखिम में हैं क्योंकि कोई भी व्यक्ति दुर्गुण के खतरे से तब तक पूरी तरह मुक्त नहीं होता जब तक वह उसे जड़ से समाप्त न कर दे। वह उसे तब तक पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता जब तक उसके स्थान पर प्रज्ञा को स्थापित न कर दे। मन की दुर्बलताओं और भावावेगों के बीच का अंतर मैं पहले भी अनेक बार स्पष्ट कर चुका हूँ। फिर भी अब उसका संक्षिप्त स्मरण करा देता हूँ। मन की दुर्बलताएँ वे दोष हैं जो गहराई से जड़ जमा चुके होते हैं और कठोर बन चुके होते हैं, जैसे लोभ और महत्त्वाकांक्षा। ये ऐसी अवस्थाएँ हैं जो मन को कहीं अधिक दृढ़ता से बाँध लेती हैं और स्थायी व्याधि का रूप धारण कर चुकी होती हैं। संक्षेप में कहें तो, मन की दुर्बलता उस भ्रष्ट निर्णय का स्थायी रूप है जिसके कारण मनुष्य उन वस्तुओं को अत्यंत मूल्यवान और प्राप्त करने योग्य समझता है, जो वास्तव में बहुत कम महत्त्व रखती हैं। अथवा यदि इस प्रकार कहना अधिक उपयुक्त लगे तो यह ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें मनुष्य उन वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है जिनका अनुसरण या तो केवल साधारण रूप से करना चाहिए या बिल्कुल नहीं करना चाहिए अथवा वह किसी ऐसी वस्तु को अत्यधिक मूल्यवान मान बैठता है जो वास्तव में या तो कम मूल्य की है या सर्वथा मूल्यहीन है। इसके विपरीत, भावावेग मन की वे अनुचित, आकस्मिक और उग्र हलचलें हैं जो अचानक उत्पन्न होती हैं। यदि इनका बार-बार उदय हो और उनका कोई उपचार न किया जाए तो यही आगे चलकर मन की दुर्बलताओं का रूप ले लेती हैं। जैसे सिर में होने वाला साधारण जुकाम यदि अधिक समय तक न रहे तो उससे केवल खाँसी होती है। किंतु यदि वही बार-बार और लंबे समय तक बना रहे तो वह क्षय जैसे गंभीर रोग का कारण बन जाता है। इसी कारण जिन्होंने सबसे अधिक प्रगति कर ली है। वे मन की दुर्बलताओं से तो ऊपर उठ चुके होते हैं। फिर भी उनमें भावावेगों का अनुभव शेष रहता है, यद्यपि वे पूर्णता के अत्यंत निकट पहुँच चुके होते हैं।
दूसरे प्रकार में वे लोग आते हैं जिन्होंने मन के सबसे गंभीर दोषों और भावावेगों, दोनों का त्याग तो कर दिया है, किंतु इस प्रकार नहीं कि उनकी आंतरिक शांति अब पूर्णतः सुरक्षित हो गई हो। उनमें अभी भी फिर से पतित हो जाने की संभावना बनी रहती है। तीसरे प्रकार में वे लोग हैं जो अनेक गंभीर दोषों से तो मुक्त हो चुके हैं, किंतु सभी दोषों से नहीं। वे लोभ से छुटकारा पा चुके हैं, परंतु अभी भी क्रोध का अनुभव करते हैं। वे कामवासना से विचलित नहीं होते, किंतु अभी भी महत्त्वाकांक्षा के वश में रहते हैं। उनमें अब तृष्णा नहीं रह गई है, परंतु भय अभी भी बना हुआ है। भय के मामले में भी वे कुछ बातों के सामने अडिग रहते हैं जबकि कुछ के सामने डगमगा जाते हैं। वे मृत्यु से नहीं डरते, किंतु पीड़ा से अभी भी भयभीत होते हैं।
आओ, इस विषय पर कुछ विचार करें। यदि हम कम-से-कम इस अंतिम वर्ग में भी स्थान पा सकें तो यह हमारे लिए बड़ी उपलब्धि होगी। असाधारण प्राकृतिक प्रतिभा और निरंतर अध्ययन तथा साधना के बल पर कोई व्यक्ति दूसरे वर्ग तक भी पहुँच सकता है, किंतु तीसरे वर्ग को भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए। अपने चारों ओर फैली बुराइयों पर दृष्टि डालो। देखो कि ऐसा कौन-सा अपराध है जिसका कोई उदाहरण न मिलता हो, देखो कि दुष्टता दिन-प्रतिदिन किस प्रकार बढ़ती जा रही है और यह भी देखो कि सार्वजनिक तथा निजी, दोनों ही जीवनों में कितने प्रकार के दुष्कर्म किए जा रहे हैं। तब तुम्हें अनुभव होगा कि यदि हम सबसे निकृष्ट लोगों में सम्मिलित नहीं हैं तो यही अपने-आप में एक पर्याप्त उपलब्धि है।
“तुम कहते हो, ‘मुझे आशा है कि मैं इससे भी ऊँचा स्थान प्राप्त कर सकूँ।’” यही मेरी भी कामना है। पर यह केवल कामना है, कोई वचन या आश्वासन नहीं। हम पहले ही दोषों के वश में आ चुके हैं। सद्गुण की ओर प्रयत्न करते हुए भी हम अभी दोषों की पकड़ में हैं। यह कहते हुए मुझे लज्जा होती है कि हम सदाचार का अनुसरण केवल अपने अवकाश के समय में करते हैं। फिर भी, यदि हम उन बातों से पूर्णतः नाता तोड़ दें जो हमें उलझाए रखती हैं। उन दोषों से भी जो हमसे इतने गहरे चिपके हुए हैं तो हमारे लिए कितना महान प्रतिफल प्रतीक्षारत है! तब न हमें इच्छाएँ प्रेरित करेंगी और न भय। किसी भी प्रकार की चिंता से विचलित हुए बिना और सुख-विलास से कलुषित हुए बिना, हम न मृत्यु से डरेंगे और न देवताओं से। क्योंकि हम जान लेंगे कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है और देवता हमारा कोई अहित नहीं करते। जो स्वयं हानि पहुँचाता है, वह उतना ही दुर्बल होता है जितना वह जो हानि सहता है। जो वस्तुएँ वास्तव में सर्वोत्तम हैं, उनमें किसी का अहित करने की कोई क्षमता ही नहीं होती।
यदि कभी हम इस अंधकारमय गहराई से निकलकर उस ऊँचे और उज्ज्वल प्रदेश तक पहुँच सकें तो वहाँ हमारी प्रतीक्षा कर रही होगी— मन की शांति और वह स्वतंत्रता तथा स्वाधीनता जो समस्त भ्रम और मिथ्या धारणाओं के समाप्त हो जाने पर प्राप्त होती है। तुम पूछते हो, “स्वतंत्रता क्या है?” स्वतंत्रता है—किसी मनुष्य से भय न रखना, किसी देवता से भय न रखना, न किसी निकृष्ट वस्तु की इच्छा करना और न किसी अतिरेक की तथा स्वयं पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लेना। अपने ही स्वामी बन जाना ऐसी संपत्ति है जिसका कोई मोल नहीं लगाया जा सकता।
अभी के लिए विदा
No comments:
Post a Comment