Wednesday, 22 July 2026

स्वयं को जानने के बारे में -- पत्र - 78

 प्रिय लूसीलियस 


आज मुझे कुछ अवकाश मिला है। यह मेरे अपने प्रयास से नहीं बल्कि उन खेलों के कारण है जिन्होंने सभी परेशान करने वाले लोगों को मुक्केबाज़ी देखने के लिए बुला लिया है। अब कोई अचानक भीतर नहीं आएगा। कोई मेरे विचारों की श्रृंखला को बीच में नहीं तोड़ेगा। इस निश्चिंतता के कारण मेरे विचार और भी अधिक निर्भीकता से आगे बढ़ रहे हैं। द्वार का बार-बार चरमराना बंद हो गया है। कोई परदा हटाकर भीतर नहीं झाँकेगा। अब मुझे निश्चिंत होकर आगे बढ़ने की स्वतंत्रता है, जैसी उस व्यक्ति को चाहिए जो अपना मार्ग स्वयं बना रहा हो और अपने बल पर आगे बढ़ रहा हो। क्या इसका अर्थ यह है कि मैं अपने पूर्ववर्ती विचारकों का अनुसरण नहीं करता? नहीं, मैं उनका अनुसरण करता हूँ। परन्तु मैं स्वयं भी नए विचार खोजने, कुछ बातों में परिवर्तन करने और कुछ पुराने मतों को छोड़ देने का अधिकार अपने पास रखता हूँ। मैं उनसे सहमत हो सकता हूँ, पर उनका दास नहीं बन सकता। 


By Paul Klee 

    किन्तु मैंने समय से पहले ही यह सोच लिया था कि मुझे पूर्ण शांति और निर्बाध एकांत मिलेगा। देखो, अब तो रंगशाला (स्टेडियम) से एक बड़ा कोलाहल सुनाई दे रहा है। यद्यपि वह मेरे संकल्प को विचलित नहीं करता, फिर भी वह मेरा ध्यान इस विषय पर विचार करने के लिए अवश्य आकर्षित करता है। मैं अपने आप से कहता हूँ, “कितने लोग अपने शरीर का अभ्यास करते हैं और कितने कम लोग अपने मन का! केवल मनोरंजन के लिए इस चंचल तमाशे को देखने कितनी बड़ी भीड़ उमड़ पड़ती है, जबकि ज्ञान और संस्कृति के साधकों के साथ कितना गहरा एकांत जुड़ा रहता है! जिन लोगों की शक्तिशाली भुजाओं और चौड़े कंधों की हम प्रशंसा करते हैं, वे मन से कितने दुर्बल होते हैं!”

    सबसे अधिक मैं इसी बात पर विचार करता हूँ। यदि शरीर अभ्यास के द्वारा इतनी सहनशक्ति प्राप्त कर सकता है कि वह एक से अधिक प्रतिद्वंद्वियों के घूँसों और लातों को सह सके, प्रचंड धूप और धूल की झुलसा देने वाली गर्मी को झेल सके और अपने ही रक्त से लथपथ होकर भी पूरे दिन डटा रहे तो निश्चय ही मन को इससे कहीं अधिक आसानी से इतना दृढ़ बनाया जा सकता है कि वह भाग्य के आघातों को सहन कर सके, गिराए जाने और पैरों तले रौंदे जाने पर भी फिर उठ खड़ा हो सके। शरीर को विकसित होने के लिए अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती है परन्तु मन स्वयं ही विकसित होता है, स्वयं ही अपना पोषण करता है और स्वयं ही अपना अभ्यास करता है। पहलवानों को बहुत अधिक भोजन और पेय, पर्याप्त तेल-मालिश तथा लंबे समय तक कठिन अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है किन्तु सद्गुण तुम्हें बिना किसी सामग्री और बिना किसी खर्च के प्राप्त हो सकता है। जो कुछ भी तुम्हें एक अच्छा मनुष्य बना सकता है, वह पहले से ही तुम्हारे भीतर विद्यमान है।

    अच्छा बनने के लिए तुम्हें किस चीज़ की आवश्यकता है? केवल इच्छा-शक्ति की। तुम्हारी इच्छा का इससे श्रेष्ठ लक्ष्य क्या हो सकता है कि तुम अपने आपको उस दासता से मुक्त कर लो, जो लगभग सभी मनुष्यों को जकड़े हुए है? यह वही दासता है जिससे मिट्टी में जन्मे सबसे साधारण दास भी अपनी सामर्थ्य भर हर उपाय करके छुटकारा पाने का प्रयास करते हैं। वे भूख सहते हैं, केवल इसलिए कि अपनी स्वतंत्रता खरीदने के लिए थोड़ा-थोड़ा धन बचा सकें। तुम, जो अपने आपको जन्म से स्वतंत्र मानते हो, क्या अपनी वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए आवश्यक कोई भी मूल्य चुकाने की इच्छा नहीं रखोगे? तुम बार-बार अपनी धन-पेटी की ओर क्यों देखते हो? स्वतंत्रता खरीदी नहीं जा सकती। इसलिए अपनी हिसाब-किताब की पुस्तक में 'स्वतंत्रता' नाम से कोई प्रविष्टि लिखना व्यर्थ है। स्वतंत्रता उन लोगों की संपत्ति नहीं है जो उसे खरीदते या बेचते हैं। यह ऐसा वरदान है जिसे तुम्हें स्वयं अपने भीतर खोजना होगा और स्वयं अपने आपको देना होगा।

    सबसे पहले अपने आपको मृत्यु के भय से मुक्त करो। उस भय से, जो हमारे गले में जुए की तरह पड़ा हुआ है। उसके बाद निर्धनता के भय से भी स्वयं को मुक्त करो। यदि तुम जानना चाहते हो कि निर्धनता वास्तव में कितनी कम हानि पहुँचाती है तो गरीबों के चेहरों की तुलना धनवानों के चेहरों से करके देखो। गरीब व्यक्ति अक्सर खुलकर और हृदय से हँसता है। उसकी चिंताएँ उसके मन की गहराइयों तक नहीं पहुँचतीं। यदि कोई चिंता आ भी जाती है तो वह बादल के एक हल्के टुकड़े की तरह शीघ्र ही गुजर जाती है। किन्तु जिन्हें संसार सम्पन्न और सुखी मानता है, उनके चेहरे पर जो प्रसन्नता दिखाई देती है, वह प्रायः बनावटी होती है। उसके नीचे गहरे तक फैला हुआ दुःख छिपा रहता है, जो भीतर ही भीतर उनके जीवन को खोखला करता रहता है। उनका दुख इसलिए और भी गहरा हो जाता है कि वे सामान्यतः दूसरों के सामने अपने दुखी होने का प्रदर्शन नहीं कर सकते। उनके हृदय को पीड़ा भीतर-ही-भीतर कुतरती रहती है, फिर भी उन्हें बाहर से प्रसन्न, सफल और सुखी होने का अभिनय करना पड़ता है।

    मैं तुम्हें एक उपमा देता हूँ और मुझे इसका प्रयोग अधिक बार करना चाहिए क्योंकि यह मेरे विचार को व्यक्त करने का सबसे उपयुक्त माध्यम है। मानव जीवन एक नाटक के समान है, जिसमें हमें ऐसी भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं जिन्हें हम प्रायः पूरी तरह निभाने में भी समर्थ नहीं होते। वह व्यक्ति जो रंगमंच पर लंबे और भव्य वस्त्र पहनकर आता है, गर्व से सिर उठाकर कहता है—

“देखो, मैं पेलोप्स का उत्तराधिकारी होकर यूनानियों पर शासन करता हूँ। मेरा राज्य आयोनियन सागर और हेल्सपॉन्ट से लेकर कोरिन्थ के स्थलडमरूमध्य तक फैला हुआ है।”

वास्तव में वह एक दास है। उस अभिनय के बदले उसे केवल पाँच नाप अनाज और पाँच डेनारियस का पारिश्रमिक मिलता है। वही अभिमानी और कठोर स्वभाव का पात्र, जो अपनी शक्ति के गर्व से फूलकर कहता है—

“मेनिलाउस, चुप रहो, नहीं तो मेरे हाथों मारे जाओगे।”

वह भी प्रतिदिन मजदूरी पाता है और रात को फटे-पुराने टुकड़ों को जोड़कर बने कंबल पर सोता है। ऐसा ही उन सभी लोगों के बारे में भी कहा जा सकता है जिन्हें भीड़ के सिरों के ऊपर पालकियों में बैठाकर ले जाया जाता है और जिन्हें लोग बड़ा प्रतिष्ठित समझते हैं। उनका सुख भी केवल एक अभिनय है। यदि तुम उनके भव्य वस्त्र और बाहरी आडंबर उतार दो तो तुम उन्हें तुच्छ समझोगे।

    जब तुम कोई घोड़ा खरीदने जाते हो तो सबसे पहले उसकी जीन उतरवाते हो। बिक्री के लिए लाए गए घोड़े से उसके सभी साज-सामान हटवा देते हो ताकि उसके शरीर का कोई दोष तुम्हारी नज़र से छिप न जाए। तो फिर क्या तुम किसी मनुष्य का मूल्यांकन उसके ऊपर लिपटे हुए वस्त्रों के आधार पर करोगे? दासों के व्यापारी अपने व्यापार की युक्तियों से उनके उन दोषों को छिपा देते हैं जो खरीदार को अप्रिय लग सकते हैं। इसी कारण समझदार खरीदार हर प्रकार के बाहरी आडंबर पर संदेह करता है। यदि तुम किसी का हाथ या पैर किसी पट्टी में बँधा हुआ देखो तो तुम अवश्य कहोगे कि उसे खोलकर वास्तविक अंग दिखाया जाए। क्या तुम उस स्किथिया या सार्मातिया के राजा को देखते हो, जिसके सिर पर अत्यंत भव्य मुकुट सुशोभित है? यदि तुम उसका वास्तविक मूल्य और उसके चरित्र का सच्चा स्वरूप जानना चाहते हो तो पहले उसका मुकुट उतार दो। उसके नीचे बहुत-सी बुराइयाँ छिपी हो सकती हैं।

    पर मैं दूसरों की ही बात क्यों करूँ? यदि तुम स्वयं अपना सही मूल्यांकन करना चाहते हो तो अपने धन, अपने घर, अपने पद और प्रतिष्ठा, इन सबको एक ओर रख दो और अपने भीतर झाँको। जब तक तुम ऐसा नहीं करोगे, तब तक तुम अपने बारे में वही जानते रहोगे जो दूसरे लोग तुम्हें बताते हैं, न कि जो तुम वास्तव में हो।


अभी के लिए विदा 

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